आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 75
अर्जुन और भगदत्तपुत्र यज्ञदत्त का युद्ध
यज्ञ का अश्व प्राग्ज्योतिष पहुँचता है, जहाँ भगदत्त का पुत्र यज्ञदत्त युद्ध के लिए निकलता है। अर्जुन के बाणों से वह मूर्च्छित-सा होकर अश्व को छोड़ देता है, पर फिर विशाल हाथी पर चढ़कर बचपने और मोह में अर्जुन को ललकारता है। भूमि पर खड़े अर्जुन आकाश में ही उसके तोमरों को काट डालते हैं और सुनहरे पंखों वाले बाणों से उसे गिरा देते हैं। यज्ञदत्त फिर हाथी पर चढ़कर आक्रमण करता है, और अर्जुन उस हाथी को बाणों से बींध देते हैं, जिससे वह रक्त बहाता हुआ दिखाई देता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.75.1)
प्राग्ज्योतिषमथाभ्येत्य व्यचरत्स हयोत्तमः । भगदत्तात्मजस्तत्र निर्ययौ रणकर्कशः ॥
prāgjyotiṣamathābhyetya vyacaratsa hayottamaḥ | bhagadattātmajastatra niryayau raṇakarkaśaḥ
वह उत्तम अश्व प्राग्ज्योतिष पहुँचकर वहाँ विचरने लगा; तब रण में कठोर भगदत्त का पुत्र उसके सामने निकला।
श्लोक 2 (14.75.2)
सहयं पाण्डुपुत्रं तु विषयान्तमुपागतम् । युयुधे भरतश्रेष्ठ यज्ञदत्तो महीपतिः ॥
sahayaṃ pāṇḍuputraṃ tu viṣayāntamupāgatam | yuyudhe bharataśreṣṭha yajñadatto mahīpatiḥ
हे भरतश्रेष्ठ, जब अश्व के साथ पाण्डुपुत्र उसके राज्य की सीमा पर पहुँचे, तब राजा यज्ञदत्त उनसे लड़ा।
श्लोक 3 (14.75.3)
सोऽभिनिर्याय नगराद्भगदत्तसुतो नृपः । अश्वमायान्तमुन्मथ्य नगराभिमुखो ययौ ॥
so'bhiniryāya nagarādbhagadattasuto nṛpaḥ | aśvamāyāntamunmathya nagarābhimukho yayau
भगदत्त का पुत्र राजा यज्ञदत्त नगर से निकला, और आते हुए अश्व को रोककर नगर की ओर लौट चला।
श्लोक 4 (14.75.4)
तमालक्ष्य महाबाहुः कुरूणामृषभस्तदा । गाण्डीवं विक्षिपंस्तूर्णं सहसा समुपाद्रवत् ॥
tamālakṣya mahābāhuḥ kurūṇāmṛṣabhastadā | gāṇḍīvaṃ vikṣipaṃstūrṇaṃ sahasā samupādravat
उसे देखकर कुरुओं के महाबाहु वृषभ (अर्जुन) ने तुरन्त गाण्डीव को झंकारा और सहसा उस पर टूट पड़े।
श्लोक 5 (14.75.5)
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपः । हयमुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत् ॥
tato gāṇḍīvanirmuktairiṣubhirmohito nṛpaḥ | hayamutsṛjya taṃ vīrastataḥ pārthamupādravat
तब गाण्डीव से छूटे बाणों से मूर्च्छित-सा हुआ वह राजा अश्व को छोड़कर उस वीर के साथ पार्थ पर झपटा।
श्लोक 6 (14.75.6)
पुनः प्रविश्य नगरं दंशितः स नृपोत्तमः । आरुह्य नागप्रवरं निर्ययौ युद्धकाङ्क्षया ॥
punaḥ praviśya nagaraṃ daṃśitaḥ sa nṛpottamaḥ | āruhya nāgapravaraṃ niryayau yuddhakāṅkṣayā
नगर में फिर जाकर उस श्रेष्ठ राजा ने कवच धारण किया और एक श्रेष्ठ हाथी पर चढ़कर युद्ध की इच्छा से बाहर निकला।
श्लोक 7 (14.75.7)
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । दोधूयता चामरेण श्वेतेन च महारथः ॥
pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani | dodhūyatā cāmareṇa śvetena ca mahārathaḥ
उसके सिर पर श्वेत छत्र तना हुआ था और श्वेत चँवर डुलाया जा रहा था, और वह महारथी इस प्रकार आया।
श्लोक 8 (14.75.8)
ततः पार्थं समासाद्य पाण्डवानां महारथम् । आह्वयामास बीभत्सुं बाल्यान्मोहाच्च संयुगे ॥
tataḥ pārthaṃ samāsādya pāṇḍavānāṃ mahāratham | āhvayāmāsa bībhatsuṃ bālyānmohācca saṃyuge
फिर पाण्डवों के महारथी पार्थ के पास पहुँचकर उसने बचपने और मोह के कारण युद्ध में बीभत्सु को ललकारा।
श्लोक 9 (14.75.9)
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् । प्रेषयामास संक्रुद्धः श्वेताश्वं प्रति पार्थिवः ॥
sa vāraṇaṃ nagaprakhyaṃ prabhinnakaraṭāmukham | preṣayāmāsa saṃkruddhaḥ śvetāśvaṃ prati pārthivaḥ
क्रोध में भरे राजा ने पर्वत जैसे, मद बहाते गण्डस्थल वाले हाथी को श्वेत अश्वों वाले अर्जुन की ओर बढ़ाया।
श्लोक 10 (14.75.10)
विक्षरन्तं महामेघं परवारणवारणम् । शस्त्रवत्कल्पितं सङ्ख्ये विवशं युद्धदुर्मदम् ॥
vikṣarantaṃ mahāmeghaṃ paravāraṇavāraṇam | śastravatkalpitaṃ saṅkhye vivaśaṃ yuddhadurmadam
वह बादल की तरह मद बरसा रहा था, शत्रुओं के हाथियों को मारने वाला था, युद्ध के लिए शस्त्रों से सज्जित था, किसी के वश में न रहने वाला और युद्ध के लिए मदमत्त था।
श्लोक 11 (14.75.11)
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महाबलः । तदाऽङ्कुशेन विबभावुत्पतिष्यन्निवाम्बरम् ॥
pracodyamānaḥ sa gajastena rājñā mahābalaḥ | tadā'ṅkuśena vibabhāvutpatiṣyannivāmbaram
राजा द्वारा अंकुश से हाँका जाता हुआ वह महाबली हाथी तब ऐसा लगा मानो आकाश में उछल जाएगा।
श्लोक 12 (14.75.12)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धो राजन्धनंजयः । भूमिष्ठो वारणगतं योधयामास भारत ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya kruddho rājandhanaṃjayaḥ | bhūmiṣṭho vāraṇagataṃ yodhayāmāsa bhārata
उसे आते देखकर, हे राजन्, धनञ्जय क्रुद्ध हुए, और हे भारत, भूमि पर खड़े रहकर ही हाथी पर बैठे उस राजा से लड़े।
श्लोक 13 (14.75.13)
यज्ञदत्तस्ततः क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये । तोमरानग्निसङ्काशाञ्शलभानिव वेगितान् ॥
yajñadattastataḥ kruddho mumocāśu dhanaṃjaye | tomarānagnisaṅkāśāñśalabhāniva vegitān
तब क्रुद्ध यज्ञदत्त ने धनञ्जय पर शीघ्र ही अग्नि के समान चमकते, टिड्डियों जैसे वेगवान् तोमर फेंके।
श्लोक 14 (14.75.14)
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान्गाण्डीवप्रभवैः शरैः । द्विधा त्रिधा च चिच्छेद खगमान्खगमैस्तदा ॥
arjunastānasamprāptāngāṇḍīvaprabhavaiḥ śaraiḥ | dvidhā tridhā ca ciccheda khagamānkhagamaistadā
अर्जुन ने गाण्डीव से छूटे बाणों से उन तोमरों को उनके पास पहुँचने से पहले ही, आकाश में उड़ते हुए बाणों से उड़ते हुए तोमरों को, दो-दो और तीन-तीन टुकड़ों में काट दिया।
श्लोक 15 (14.75.15)
स तान्दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान्भगदत्तजः । इषूनसक्तांस्त्वरितः प्राहिणोत्पाण्डवं प्रति ॥
sa tāndṛṣṭvā tathā chinnāṃstomarānbhagadattajaḥ | iṣūnasaktāṃstvaritaḥ prāhiṇotpāṇḍavaṃ prati
अपने तोमरों को इस प्रकार कटा देखकर भगदत्त के पुत्र ने जल्दी से पाण्डव पर अप्रतिहत बाण चलाए।
श्लोक 16 (14.75.16)
ततोऽर्जुनस्तूर्णतरं रुक्मपुङ्खानजिह्मगान् । प्रेषयामास संक्रुद्धो भगदत्तात्मजं प्रति ॥
tato'rjunastūrṇataraṃ rukmapuṅkhānajihmagān | preṣayāmāsa saṃkruddho bhagadattātmajaṃ prati
तब क्रुद्ध अर्जुन ने और भी तेज़ी से सुनहरे पंखों वाले, सीधे उड़ने वाले बाण भगदत्त के पुत्र पर चलाए।
श्लोक 17 (14.75.17)
स तैर्विद्धो महातेजा यज्ञदत्तो महामृधे । भृशाहतः पपातोर्व्यां न त्वेनमजहात्स्मृतिः ॥
sa tairviddho mahātejā yajñadatto mahāmṛdhe | bhṛśāhataḥ papātorvyāṃ na tvenamajahātsmṛtiḥ
उन बाणों से बिंधा हुआ महातेजस्वी यज्ञदत्त उस महायुद्ध में बुरी तरह घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा, फिर भी उसकी चेतना उसे छोड़ नहीं गई।
श्लोक 18 (14.75.18)
ततः स पुनरारुह्य वारणप्रवरं रणे । अव्यग्रः प्रेषयामास जयार्थी विजयं प्रति ॥
tataḥ sa punarāruhya vāraṇapravaraṃ raṇe | avyagraḥ preṣayāmāsa jayārthī vijayaṃ prati
तब वह फिर उस श्रेष्ठ हाथी पर चढ़कर, शान्त भाव से और विजय की इच्छा से उसे विजय (अर्जुन) की ओर बढ़ा ले गया।
श्लोक 19 (14.75.19)
तस्मै बाणांस्ततो जिष्णुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् । प्रेषयामास संक्रुद्धो ज्वलितज्वलनोपमान् ॥
tasmai bāṇāṃstato jiṣṇurnirmuktāśīviṣopamān | preṣayāmāsa saṃkruddho jvalitajvalanopamān
तब क्रुद्ध जिष्णु ने उस पर विषैले साँपों की तरह छूटे हुए, जलती आग के समान बाण चलाए।
श्लोक 20 (14.75.20)
स तैर्विद्धो महानागो विस्रवन्रुधिरं बभौ । हिमवानिव शैलेन्द्रो बहुप्रस्रवणस्तदा ॥
sa tairviddho mahānāgo visravanrudhiraṃ babhau | himavāniva śailendro bahuprasravaṇastadā
उन बाणों से बिंधा हुआ वह महान् हाथी रक्त बहाता हुआ ऐसा शोभित हुआ जैसे अनेक झरनों वाला पर्वतराज हिमालय।