आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 76
अर्जुन द्वारा भगदत्त-पुत्र यज्ञदत्त की पराजय
तीन रात के युद्ध के बाद भगदत्त का पुत्र यज्ञदत्त अर्जुन को ललकारता है और उन पर अपना हाथी छोड़ता है। अर्जुन बाणों के जाल से उसे रोकते हैं और दहकते नाराच से उसे गिरा देते हैं। फिर वे भूमि पर पड़े राजा से कहते हैं कि डरो मत, क्योंकि युधिष्ठिर ने राजाओं को मारने से मना किया है, और उसे आगामी चैत्र की पूर्णिमा पर अश्वमेध में आने का निमन्त्रण देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.76.1)
एवं त्रिरात्रमभवत्तद्युद्धं भरतर्षभ । अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः ॥
evaṃ trirātramabhavattadyuddhaṃ bharatarṣabha | arjunasya narendreṇa vṛtreṇeva śatakratoḥ
इस प्रकार, हे भरतश्रेष्ठ, अर्जुन और उस राजा का वह युद्ध तीन रात तक चलता रहा, जैसे इन्द्र और वृत्र का चला था।
श्लोक 2 (14.76.2)
ततश्चतुर्थे दिवसे यज्ञदत्तो महाबलः । जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमताब्रवीत् ॥
tataścaturthe divase yajñadatto mahābalaḥ | jahāsa sasvanaṃ hāsaṃ vākyaṃ cedamatābravīt
चौथे दिन महाबली यज्ञदत्त ने जोर से हँसकर यह बात कही:
यज्ञदत्त उवाच
श्लोक 3 (14.76.3)
अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन्विमोक्ष्यसे । त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि ॥
arjunārjuna tiṣṭhasva na me jīvanvimokṣyase | tvāṃ nihatya kariṣyāmi pitustoyaṃ yathāvidhi
"अर्जुन, अर्जुन, ठहर! तू मुझसे जीवित नहीं बचेगा। तुझे मारकर मैं विधिपूर्वक अपने पिता को जलांजलि दूँगा।"
श्लोक 4 (14.76.4)
त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा । हतो वृद्धोऽपि बाधित्वा शिशुं मामद्य योधय ॥
tvayā vṛddho mama pitā bhagadattaḥ pituḥ sakhā | hato vṛddho'pi bādhitvā śiśuṃ māmadya yodhaya
"मेरे पिता भगदत्त वृद्ध थे और तेरे पिता के मित्र थे। तूने उन्हें सताकर मार डाला, वृद्ध होने पर भी। आज मुझ बालक से लड़।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (14.76.5)
इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो यज्ञदत्तो नराधिपः । प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति ॥
ityevamuktvā saṃkruddho yajñadatto narādhipaḥ | preṣayāmāsa kauravya vāraṇaṃ pāṇḍavaṃ prati
ऐसा कहकर क्रोध से भरे राजा यज्ञदत्त ने, हे कुरुवंशी, अपने हाथी को पाण्डुपुत्र की ओर बढ़ाया।
श्लोक 6 (14.76.6)
सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो यज्ञदत्तेन धीमता । उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम् ॥
sampreṣyamāṇo nāgendro yajñadattena dhīmatā | utpatiṣyannivākāśamabhidudrāva pāṇḍavam
बुद्धिमान यज्ञदत्त के हाँकने पर वह गजराज मानो आकाश में उछलने को हो, इस तरह पाण्डुपुत्र की ओर दौड़ा।
श्लोक 7 (14.76.7)
अग्रहस्तसुमुक्तेन शीकरेण स नागराट् । समौक्षत गुडाकेशं शैलं नील इवाम्बुदः ॥
agrahastasumuktena śīkareṇa sa nāgarāṭ | samaukṣata guḍākeśaṃ śailaṃ nīla ivāmbudaḥ
उस गजराज ने सूँड़ के अगले भाग से छोड़ी हुई फुहार से गुडाकेश को भिगो दिया, जैसे काला बादल पर्वत को भिगो देता है।
श्लोक 8 (14.76.8)
स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद्विनदन्मुहुः । मुखाडम्बरसंह्रादैरभ्यद्रवत फल्गुनम् ॥
sa tena preṣito rājñā meghavadvinadanmuhuḥ | mukhāḍambarasaṃhrādairabhyadravata phalgunam
राजा के भेजे जाने पर बादल की तरह बार-बार गरजता हुआ वह हाथी मुँह फाड़कर की गई भीषण चिंघाड़ों के साथ फाल्गुन पर टूट पड़ा।
श्लोक 9 (14.76.9)
स नृत्यन्निव नागेन्द्रो यज्ञदत्तप्रचोदितः । आससाद द्रुतं राजन्कौरवाणां महारथम् ॥
sa nṛtyanniva nāgendro yajñadattapracoditaḥ | āsasāda drutaṃ rājankauravāṇāṃ mahāratham
यज्ञदत्त की प्रेरणा से वह गजराज मानो नाचता हुआ, हे राजन्, कौरवों के उस महारथी के पास शीघ्र आ पहुँचा।
श्लोक 10 (14.76.10)
तमायान्तमथालक्ष्य यज्ञदत्तस्य वारणम् । गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा ॥
tamāyāntamathālakṣya yajñadattasya vāraṇam | gāṇḍīvamāśritya balī na vyakampata śatruhā
यज्ञदत्त के हाथी को अपनी ओर आता देखकर शत्रुओं का संहार करने वाले उस बलवान वीर ने गाण्डीव का सहारा लेकर कम्पन नहीं दिखाया।
श्लोक 11 (14.76.11)
चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपतेः । कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत ॥
cukrodha balavaccāpi pāṇḍavastasya bhūpateḥ | kāryavighnamanusmṛtya pūrvavairaṃ ca bhārata
हे भारत, उस राजा पर पाण्डुपुत्र भी बहुत क्रुद्ध हुए; उन्हें अपने कार्य में डाली गई बाधा और पुरानी शत्रुता याद आ गई।
श्लोक 12 (14.76.12)
ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः । निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम् ॥
tatastaṃ vāraṇaṃ kruddhaḥ śarajālena pāṇḍavaḥ | nivārayāmāsa tadā veleva makarālayam
तब क्रोध में भरे पाण्डुपुत्र ने बाणों के जाल से उस हाथी को रोक दिया, जैसे तट समुद्र को रोक लेता है।
श्लोक 13 (14.76.13)
स नागप्रवरः श्रीमानर्जुनेन निवारितः । तस्थौ शरैर्विनुन्नाङ्गः श्वाविच्छललितो यथा ॥
sa nāgapravaraḥ śrīmānarjunena nivāritaḥ | tasthau śarairvinunnāṅgaḥ śvāvicchalalito yathā
अर्जुन के रोक देने पर वह श्रीसम्पन्न श्रेष्ठ हाथी बाणों से बिंधे अंगों वाला खड़ा रह गया, जैसे काँटों से भरा साही हो।
श्लोक 14 (14.76.14)
निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तसुतो नृपः । उत्ससर्ज शितान्बाणानर्जुने क्रोधमूर्छितः ॥
nivāritaṃ gajaṃ dṛṣṭvā bhagadattasuto nṛpaḥ | utsasarja śitānbāṇānarjune krodhamūrchitaḥ
अपने हाथी को रुका हुआ देखकर भगदत्त के पुत्र राजा ने क्रोध से व्याकुल होकर अर्जुन पर तीखे बाण छोड़े।
श्लोक 15 (14.76.15)
अर्जुनस्तु महाबाहुः शरैररिनिघातिभिः । वारयामास तान्बाणांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
arjunastu mahābāhuḥ śarairarinighātibhiḥ | vārayāmāsa tānbāṇāṃstadadbhutamivābhavat
परन्तु महाबाहु अर्जुन ने शत्रुओं को मार गिराने वाले बाणों से उन बाणों को रोक दिया, और वह दृश्य अद्भुत-सा लगा।
श्लोक 16 (14.76.16)
ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः । प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत्पर्वतोपमम् ॥
tataḥ punarabhikruddho rājā prāgjyotiṣādhipaḥ | preṣayāmāsa nāgendraṃ balavatparvatopamam
तब प्राग्ज्योतिष के राजा ने फिर अत्यन्त कुपित होकर पर्वत के समान अपने बलवान हाथी को आगे बढ़ाया।
श्लोक 17 (14.76.17)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवान्पाकशासनिः । नाराचमग्निसङ्काशं प्राहिणोद्वारणं प्रति ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya balavānpākaśāsaniḥ | nārācamagnisaṅkāśaṃ prāhiṇodvāraṇaṃ prati
उसे अपनी ओर झपटते देखकर बलवान इन्द्रपुत्र अर्जुन ने उस हाथी पर अग्नि के समान दहकता हुआ नाराच बाण चलाया।
श्लोक 18 (14.76.18)
स तेन वारणो राजन्मर्मस्वभिहतो भृशम् । पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ॥
sa tena vāraṇo rājanmarmasvabhihato bhṛśam | papāta sahasā bhūmau vajrarugṇa ivācalaḥ
हे राजन्, उस बाण से मर्मस्थान में गहरी चोट खाकर वह हाथी वज्र से टूटे पर्वत की तरह सहसा भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 19 (14.76.19)
स पतञ्शुशुभे नागो धनंजयशराहतः । विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ॥
sa patañśuśubhe nāgo dhanaṃjayaśarāhataḥ | viśanniva mahāśailo mahīṃ vajraprapīḍitaḥ
धनंजय के बाणों से मारा गया वह गिरता हुआ हाथी ऐसा शोभित हुआ, मानो वज्र से कुचला हुआ कोई महान पर्वत धरती में धँस रहा हो।
श्लोक 20 (14.76.20)
तस्मिन्निपतिते नागे यज्ञदत्तस्य पाण्डवः । तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ॥
tasminnipatite nāge yajñadattasya pāṇḍavaḥ | taṃ na bhetavyamityāha tato bhūmigataṃ nṛpam
यज्ञदत्त का हाथी गिर जाने पर पाण्डुपुत्र ने भूमि पर पड़े उस राजा से कहा, "डरो मत।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 21 (14.76.21)
अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः । राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथञ्चन ॥
abravīddhi mahātejāḥ prasthitaṃ māṃ yudhiṣṭhiraḥ | rājānaste na hantavyā dhanaṃjaya kathañcana
"जब मैं चलने लगा, तब महातेजस्वी युधिष्ठिर ने मुझसे कहा था, 'धनंजय, तुम्हें किसी भी प्रकार राजाओं को नहीं मारना है।
श्लोक 22 (14.76.22)
सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम् । योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया ॥
sarvametannaravyāghra bhavatyetāvatā kṛtam | yodhāścāpi na hantavyā dhanaṃjaya raṇe tvayā
हे नरव्याघ्र, इतने से ही सब कुछ पूरा हो जाता है। हे धनंजय, उनके योद्धाओं को भी तुम्हें युद्ध में नहीं मारना है।
श्लोक 23 (14.76.23)
वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सह सुहृज्जनैः । युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम् ॥
vaktavyāścāpi rājānaḥ sarve saha suhṛjjanaiḥ | yudhiṣṭhirasyāśvamedho bhavadbhiranubhūyatām
सब राजाओं से, उनके मित्रों और सम्बन्धियों सहित, यह भी कहना कि आप लोग युधिष्ठिर के अश्वमेध का आनन्द लें।'
श्लोक 24 (14.76.24)
इति भ्रातृवचः श्रुत्वा न हन्मि त्वां नराधिप । उत्तिष्ठ न भयं तेऽस्ति स्वस्तिमान्गच्छ पार्थिव ॥
iti bhrātṛvacaḥ śrutvā na hanmi tvāṃ narādhipa | uttiṣṭha na bhayaṃ te'sti svastimāngaccha pārthiva
अपने भाई की यह बात सुनकर, हे नरेश, मैं तुम्हें नहीं मारता। उठो, तुम्हें कोई भय नहीं है। हे राजन्, कुशलपूर्वक जाओ।"
श्लोक 25 (14.76.25)
आगच्छेथा महाराज परां चैत्रीमुपस्थिताम् । तदाऽश्वमेधो भविता धर्मिराजस्य धीमतः ॥
āgacchethā mahārāja parāṃ caitrīmupasthitām | tadā'śvamedho bhavitā dharmirājasya dhīmataḥ
"हे महाराज, जब आगामी चैत्र की पूर्णिमा आए, तब आना; बुद्धिमान धर्मराज का अश्वमेध तभी होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (14.76.26)
एवमुक्तः स राजा तु भगदत्तात्मजस्तदा । तथेत्वेवाब्रवीद्वाक्यं पाण्डवेनाभिनिर्जितः ॥
evamuktaḥ sa rājā tu bhagadattātmajastadā | tathetvevābravīdvākyaṃ pāṇḍavenābhinirjitaḥ
ऐसा कहे जाने पर पाण्डव से पराजित हुए भगदत्त के पुत्र उस राजा ने "ऐसा ही हो" कहकर उत्तर दिया।