आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 78
दुःशला की प्रार्थना पर अर्जुन का सैन्धवों को क्षमा करना
अर्जुन सैन्धवों को चेताते हैं कि वे बालकों, स्त्रियों और हार मानने वालों को नहीं मारेंगे, और उनके बाण, प्रास तथा शक्तियाँ काटते जाते हैं। जब वे थक जाते हैं, तब धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला अपने शिशु पौत्र को लेकर आती है, जिसके पिता सुरथ अर्जुन के आने की बात सुनकर शोक से चल बसे थे, और शान्ति की याचना करती है। अर्जुन दुर्योधन और क्षत्रिय-धर्म को धिक्कारते हैं, उसे सान्त्वना देकर घर भेजते हैं और फिर घोड़े के पीछे चलते हैं, जो मणिपूर देश में पहुँचता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.78.1)
ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः । विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥
tato gāṇḍīvabhṛcchūro yuddhāya samupasthitaḥ | vibabhau yudhi durdharṣo himavānacalo yathā
तब गाण्डीवधारी वीर युद्ध के लिए तैयार खड़े हुए और रण में हिमालय पर्वत के समान अजेय होकर शोभित हुए।
श्लोक 2 (14.78.2)
ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः । व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धाः शरवर्षाणि भारत ॥
tataste saindhavā yodhāḥ punareva vyavasthitāḥ | vyamuñcanta susaṃrabdhāḥ śaravarṣāṇi bhārata
तब वे सैन्धव योद्धा फिर अपने स्थान पर जम गए और, हे भारत, अत्यन्त क्रोध से बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 3 (14.78.3)
तान्प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् । ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षूञ्श्लक्ष्णया गिरा ॥
tānprahasya mahābāhuḥ punareva vyavasthitān | tataḥ provāca kaunteyo mumūrṣūñślakṣṇayā girā
महाबाहु कुन्तीपुत्र ने फिर से डटे हुए उन सैन्धवों पर हँसकर, मरने पर तुले हुए उन लोगों से कोमल वाणी में कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (14.78.4)
युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम । कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद्वो भयमागतम् ॥
yudhyadhvaṃ parayā śaktyā yatadhvaṃ vijaye mama | kurudhvaṃ sarvakāryāṇi mahadvo bhayamāgatam
"अपनी पूरी शक्ति से लड़ो, मुझे जीतने का प्रयत्न करो और जो भी करना हो कर लो; तुम पर बड़ा भय आ पड़ा है।
श्लोक 5 (14.78.5)
एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् । तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः ॥
eṣa yotsyāmi sarvāṃstu nivārya śaravāgurām | tiṣṭhadhvaṃ yuddhamanaso darpaṃ śamayitāsmi vaḥ
मैं तुम सबके बाणों के जाल को रोककर तुम सबसे लड़ूँगा। युद्ध में मन लगाकर डटे रहो; मैं तुम्हारा घमण्ड तोड़ दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (14.78.6)
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद्गाण्डीवभृत्तदा । ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ॥
etāvaduktvā kauravyo roṣādgāṇḍīvabhṛttadā | tato'tha vacanaṃ smṛtvā bhrāturjyeṣṭhasya bhārata
यह कहकर क्रोध में भरे उन कौरववीर गाण्डीवधारी ने, हे भारत, अपने बड़े भाई का वचन स्मरण किया,
श्लोक 7 (14.78.7)
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः । जेतव्याश्चेति यत्प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना । चिन्तयामास स तदा फल्गुनः पुरुषर्षभः ॥
na hantavyā raṇe tāta kṣatriyā vijigīṣavaḥ | jetavyāśceti yatproktaṃ dharmarājñā mahātmanā | cintayāmāsa sa tadā phalgunaḥ puruṣarṣabhaḥ
और तब पुरुषश्रेष्ठ फाल्गुन ने महात्मा धर्मराज के कहे हुए उस वचन पर विचार किया: "हे तात, विजय चाहने वाले क्षत्रियों को युद्ध में मारना नहीं है, उन्हें जीतना है।"
श्लोक 8 (14.78.8)
इत्युक्तोऽहं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नृपा इति । कथितं न मृषेदं स्याद्धर्मराजवचः शुभम् ॥
ityukto'haṃ narendreṇa na hantavyā nṛpā iti | kathitaṃ na mṛṣedaṃ syāddharmarājavacaḥ śubham
"राजा ने मुझसे यही कहा था कि राजाओं को नहीं मारना है। धर्मराज का कहा हुआ यह शुभ वचन झूठा नहीं होना चाहिए।
श्लोक 9 (14.78.9)
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् । इति सञ्चिन्त्य स तदा फल्गुनः पुरुषर्षभः ॥
na hanyeraṃśca rājāno rājñaścājñā kṛtā bhavet | iti sañcintya sa tadā phalgunaḥ puruṣarṣabhaḥ
राजा मारे न जाएँ और राजा की आज्ञा पूरी हो।" ऐसा सोचकर पुरुषश्रेष्ठ फाल्गुन ने,
श्लोक 10 (14.78.10)
प्रोवाच वाक्यं धर्मज्ञः सैन्धवान्युद्धदुर्मदान् । बालांस्त्रियो वा युष्माकं न हनिष्ये व्यवस्थितान् ॥
provāca vākyaṃ dharmajñaḥ saindhavānyuddhadurmadān | bālāṃstriyo vā yuṣmākaṃ na haniṣye vyavasthitān
धर्म को जानने वाले अर्जुन ने युद्ध के मद में चूर सैन्धवों से कहा: "तुम्हारे बालकों या स्त्रियों में से जो यहाँ खड़े हैं, उन्हें मैं नहीं मारूँगा,
अर्जुन उवाच
श्लोक 11 (14.78.11)
यश्च वक्ष्यति सङ्ग्रामे तवास्मीति पराजितः । एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं कुरुध्वं हितमात्मनः ॥
yaśca vakṣyati saṅgrāme tavāsmīti parājitaḥ | etacchrutvā vaco mahyaṃ kurudhvaṃ hitamātmanaḥ
और न उसे जो युद्ध में हार कर कहेगा, 'मैं आपका हूँ।' मेरी यह बात सुनकर अपने हित का काम करो;
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (14.78.12)
ततोऽन्यथा कृच्छ्रगता भविष्यथ मयाऽर्दिताः । एवमुक्त्वा तु तान्वीरान्युयुधे कुरुपुङ्गवः ॥
tato'nyathā kṛcchragatā bhaviṣyatha mayā'rditāḥ | evamuktvā tu tānvīrānyuyudhe kurupuṅgavaḥ
नहीं तो मेरे सताए जाने पर तुम बड़ी विपत्ति में पड़ोगे।" उन वीरों से यह कहकर कुरुश्रेष्ठ ने उनसे युद्ध किया,
श्लोक 13 (14.78.13)
अत्वरावानसम्भ्रान्तः संक्रुद्धैर्विजिगीषुभिः । शतं शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥
atvarāvānasambhrāntaḥ saṃkruddhairvijigīṣubhiḥ | śataṃ śatasahasrāṇi śarāṇāṃ nataparvaṇām
बिना हड़बड़ी और बिना घबराहट के, क्रोध से भरे उन विजयाभिलाषियों से। झुकी गाँठों वाले बाणों के सौ-सौ हजार,
श्लोक 14 (14.78.14)
मुमुचुः सैन्धवा राजंस्तदा गाण्डीवधन्वनि । शरानापततः क्रूरानाशीविषविषोपमान् । चिच्छेद निशितैर्बाणैरन्तरा स धनंजयः ॥
mumucuḥ saindhavā rājaṃstadā gāṇḍīvadhanvani | śarānāpatataḥ krūrānāśīviṣaviṣopamān | ciccheda niśitairbāṇairantarā sa dhanaṃjayaḥ
हे राजन्, सैन्धवों ने गाण्डीवधारी पर छोड़े; किन्तु धनंजय ने साँपों के विष के समान घातक उन क्रूर बाणों को अपनी ओर आते ही बीच में तीखे बाणों से काट दिया।
श्लोक 15 (14.78.15)
छित्त्वा तु तानाशु चैव कङ्कपत्राञ्शिलाशितान् । एकैकमेषां समरे बिभेद निशितैः शरैः ॥
chittvā tu tānāśu caiva kaṅkapatrāñśilāśitān | ekaikameṣāṃ samare bibheda niśitaiḥ śaraiḥ
कंकपक्षी के पंखों वाले और पत्थर पर तेज किए हुए उन शीघ्रगामी बाणों को काटकर उसने युद्ध में उनमें से एक-एक योद्धा को तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 16 (14.78.16)
ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनंजये । जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपुः सैन्धवा नृपाः ॥
tataḥ prāsāṃśca śaktīśca punareva dhanaṃjaye | jayadrathaṃ hataṃ smṛtvā cikṣipuḥ saindhavā nṛpāḥ
तब सैन्धव राजाओं ने जयद्रथ के मारे जाने को याद करके धनंजय पर फिर प्रास और शक्तियाँ फेंकीं।
श्लोक 17 (14.78.17)
तेषां किरीटी सङ्कल्पं मोघं चक्रे महाबलः । सर्वांस्तानन्तरा च्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डवः ॥
teṣāṃ kirīṭī saṅkalpaṃ moghaṃ cakre mahābalaḥ | sarvāṃstānantarā cchittvā tadā cukrośa pāṇḍavaḥ
महाबली किरीटधारी ने उनका संकल्प व्यर्थ कर दिया; उन सबको बीच में ही काटकर पाण्डुपुत्र ने तब गर्जना की।
श्लोक 18 (14.78.18)
तथैवापततां तेषां योधानां जयगृद्धिनाम् । शिरांसि पातयामास भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥
tathaivāpatatāṃ teṣāṃ yodhānāṃ jayagṛddhinām | śirāṃsi pātayāmāsa bhallaiḥ sannataparvabhiḥ
विजय के लोभी उन आक्रमण करते योद्धाओं के सिर उसने सीधी गाँठ वाले भल्ल बाणों से गिरा दिए।
श्लोक 19 (14.78.19)
तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम् । निवर्ततां च शब्दोऽभूत्पूर्णस्येव महोदधेः ॥
teṣāṃ pradravatāṃ cāpi punarevābhidhāvatām | nivartatāṃ ca śabdo'bhūtpūrṇasyeva mahodadheḥ
भागते, फिर दौड़ पड़ते और लौटते हुए उन योद्धाओं से ऐसी गर्जना उठी जैसी भरे हुए महासागर की होती है।
श्लोक 20 (14.78.20)
ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा । यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुरर्जुनम् ॥
te vadhyamānāstu tadā pārthenāmitatejasā | yathāprāṇaṃ yathotsāhaṃ yodhayāmāsurarjunam
अपार तेज वाले पार्थ से इस प्रकार मारे जाते हुए वे अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार अर्जुन से लड़ते रहे।
श्लोक 21 (14.78.21)
ततस्ते फल्गुनेनाजौ शरैः सन्नतपर्वभिः । कृता विसंज्ञा भूयिष्ठा क्लान्तवाहनसैनिकाः ॥
tataste phalgunenājau śaraiḥ sannataparvabhiḥ | kṛtā visaṃjñā bhūyiṣṭhā klāntavāhanasainikāḥ
तब उस युद्ध में फाल्गुन के झुकी गाँठों वाले बाणों से उनमें से अधिकांश अचेत हो गए, और उनके वाहन तथा सैनिक थक गए।
श्लोक 22 (14.78.22)
तांस्तु सर्वान्परिग्लानान्विदित्वा धृतराष्ट्रजा । दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा ॥
tāṃstu sarvānpariglānānviditvā dhṛtarāṣṭrajā | duḥśalā bālamādāya naptāraṃ prayayau tadā
उन सबको थका हुआ जानकर धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला तब अपने नाती बालक को गोद में लेकर चली,
श्लोक 23 (14.78.23)
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनाथागमत्तदा । शान्त्यर्थं सर्वयोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् ॥
surathasya sutaṃ vīraṃ rathenāthāgamattadā | śāntyarthaṃ sarvayodhānāmabhyagacchata pāṇḍavam
सुरथ के उस वीर पुत्र को लेकर रथ से सब योद्धाओं में शान्ति कराने के लिए पाण्डुपुत्र के पास आई।
श्लोक 24 (14.78.24)
सा धनंजयमासाद्य रुरोदार्तस्वरं तदा । धनंजयोपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः ॥
sā dhanaṃjayamāsādya rurodārtasvaraṃ tadā | dhanaṃjayopi tāṃ dṛṣṭvā dhanurvisasṛje prabhuḥ
धनंजय के पास पहुँचकर वह दुःख भरे स्वर में रो पड़ी; और उसे देखकर प्रभु धनंजय ने भी धनुष नीचे रख दिया।
श्लोक 25 (14.78.25)
समुत्सृज्य धनुः पार्थो विधिवद्भगिनीं तदा । प्राह किं करवाणीति सा च तं प्रत्युवाच ह ॥
samutsṛjya dhanuḥ pārtho vidhivadbhaginīṃ tadā | prāha kiṃ karavāṇīti sā ca taṃ pratyuvāca ha
धनुष रखकर पार्थ ने विधिपूर्वक अपनी बहन से कहा, "मैं क्या करूँ?" और उसने उनसे कहा:
दुःशलोवाच
श्लोक 26 (14.78.26)
एष ते भरतश्रेष्ठ स्वस्रीयस्यात्मजः शिशुः । अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ ॥
eṣa te bharataśreṣṭha svasrīyasyātmajaḥ śiśuḥ | abhivādayate pārtha taṃ paśya puruṣarṣabha
"हे भरतश्रेष्ठ, यह तुम्हारे भानजे का नन्हा पुत्र है; हे पार्थ, यह तुम्हें प्रणाम करता है। हे पुरुषश्रेष्ठ, इसे देखो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (14.78.27)
इत्युक्तस्तस्य पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा । क्वासाविति ततो राजन्दुःशला वाक्यमब्रवीत् ॥
ityuktastasya pitaraṃ sa papracchārjunastathā | kvāsāviti tato rājanduḥśalā vākyamabravīt
ऐसा कहे जाने पर अर्जुन ने उस बालक के पिता के बारे में पूछा, "वह कहाँ है?" तब, हे राजन्, दुःशला ने उत्तर दिया:
दुःशलोवाच
श्लोक 28 (14.78.28)
पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता । पञ्चत्वमगमद्वीरो यथा तन्मे निशामय ॥
pitṛśokābhisaṃtapto viṣādārto'sya vai pitā | pañcatvamagamadvīro yathā tanme niśāmaya
"इस बालक के पिता अपने पिता के शोक से जलते और विषाद से व्याकुल होकर, हे वीर, मृत्यु को प्राप्त हुए। यह कैसे हुआ, मुझसे सुनो।
श्लोक 29 (14.78.29)
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयाऽनघ । त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् । पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात्प्राणान्धनंजय ॥
sa pūrvaṃ pitaraṃ śrutvā hataṃ yuddhe tvayā'nagha | tvāmāgataṃ ca saṃśrutya yuddhāya hayasāriṇam | pituśca mṛtyuduḥkhārto'jahātprāṇāndhanaṃjaya
हे निष्पाप, उसने पहले सुना था कि उसके पिता युद्ध में तुम्हारे हाथों मारे गए; फिर यह सुनकर कि तुम घोड़े के पीछे चलते हुए युद्ध के लिए आ गए हो, पिता की मृत्यु के दुःख से पीड़ित होकर उसने प्राण त्याग दिए, हे धनंजय।
श्लोक 30 (14.78.30)
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ । विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ॥
prāpto bībhatsurityeva nāma śrutvaiva te'nagha | viṣādārtaḥ papātorvyāṃ mamāra ca mamātmajaḥ
'बीभत्सु आ गया है'—बस यह नाम सुनते ही, हे निष्पाप, मेरा पुत्र विषाद से व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ा और मर गया।
श्लोक 31 (14.78.31)
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो । गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ॥
taṃ dṛṣṭvā patitaṃ tatra tatastasyātmajaṃ prabho | gṛhītvā samanuprāptā tvāmadya śaraṇaiṣiṇī
उसे वहाँ गिरा देखकर, हे प्रभो, मैं उसके पुत्र को लेकर आज शरण की इच्छा से तुम्हारे पास आई हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (14.78.32)
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा । दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ॥
ityuktvā''rtasvaraṃ sā tu mumoca dhṛtarāṣṭrajā | dīnā dīnaṃ sthitaṃ pārthamabravīccāpyadhomukham
यह कहकर धृतराष्ट्र की पुत्री दुःख भरे स्वर में रो पड़ी; और दीन होकर उसने सिर झुकाए खड़े दीन पार्थ से कहा:
दुःशलोवाच
श्लोक 33 (14.78.33)
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्रीयात्मजमेव च । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरुकुलोद्वह । विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ॥
svasāraṃ samavekṣasva svasrīyātmajameva ca | kartumarhasi dharmajña dayāṃ kurukulodvaha | vismṛtya kururājānaṃ taṃ ca mandaṃ jayadratham
"अपनी बहन को और उसके नाती को देखो। हे धर्मज्ञ, हे कुरुवंश के श्रेष्ठ, कुरुराज को और उस मूढ़ जयद्रथ को भुलाकर तुम्हें दया करनी चाहिए।
श्लोक 34 (14.78.34)
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित्परवीरहा । तथाऽयं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुज ॥
abhimanyoryathā jātaḥ parikṣitparavīrahā | tathā'yaṃ surathājjāto mama pautro mahābhuja
जैसे अभिमन्यु से शत्रुवीरों को मारने वाला परीक्षित उत्पन्न हुआ, वैसे ही, हे महाबाहु, सुरथ से यह मेरा पौत्र उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 35 (14.78.35)
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्रप्तास्मि तवान्तिकम् । शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम ॥
tamādāya naravyāghra sampraptāsmi tavāntikam | śamārthaṃ sarvayodhānāṃ śṛṇu cedaṃ vaco mama
उसे लेकर, हे पुरुषसिंह, मैं सब योद्धाओं में शान्ति कराने के लिए तुम्हारे पास आई हूँ। मेरी यह बात सुनो।
श्लोक 36 (14.78.36)
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः । प्रसादमस्य बालस्य तस्मात्त्वं कर्तुमर्हसि ॥
āgato'yaṃ mahābāho tasya mandasya putrakaḥ | prasādamasya bālasya tasmāttvaṃ kartumarhasi
हे महाबाहु, यह उस अभागे का नन्हा पुत्र आया है। इसलिए तुम्हें इस बालक पर कृपा करनी चाहिए।
श्लोक 37 (14.78.37)
एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम । याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय ॥
eṣa prasādya śirasā praśamārthamariṃdama | yācate tvāṃ mahābāho śamaṃ gaccha dhanaṃjaya
हे शत्रुदमन, सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करते हुए यह शान्ति की याचना करता है। हे धनंजय, शान्त हो जाओ।
श्लोक 38 (14.78.38)
बालस्य हतबन्धोश्च पार्थ किञ्चिदजानतः । प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः ॥
bālasya hatabandhośca pārtha kiñcidajānataḥ | prasādaṃ kuru dharmajña mā manyuvaśamanvagāḥ
हे पार्थ, हे धर्मज्ञ, जिसके बन्धु मारे जा चुके हैं और जो कुछ भी नहीं जानता, उस बालक पर कृपा करो; क्रोध के वश में मत जाओ।
श्लोक 39 (14.78.39)
तमनार्थं नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम् । आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
tamanārthaṃ nṛśaṃsaṃ ca vismṛtyāsya pitāmaham | āgaskāriṇamatyarthaṃ prasādaṃ kartumarhasi
उसके पितामह को भुलाकर, जो अनार्य, क्रूर और तुम्हारा बहुत बड़ा अपराधी था, तुम्हें इस पर कृपा करनी चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (14.78.40)
एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजयः । संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् । उवाच दुःखशोकार्तः क्षत्रधर्मं व्यगर्हयत् ॥
evaṃ bruvatyāṃ karuṇaṃ duḥśalāyāṃ dhanaṃjayaḥ | saṃsmṛtya devīṃ gāndhārīṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca pārthivam | uvāca duḥkhaśokārtaḥ kṣatradharmaṃ vyagarhayat
दुःशला के इस प्रकार करुणा से बोलने पर धनंजय ने देवी गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र को याद किया और दुःख तथा शोक से व्याकुल होकर क्षत्रिय-धर्म की निन्दा करते हुए कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (14.78.41)
धिक्तं दुर्योधनं क्षुद्रं राज्यलुब्धं च मानिनम् । यत्कृते बान्धवाः सर्वे मया नीता यमक्षयम् ॥
dhiktaṃ duryodhanaṃ kṣudraṃ rājyalubdhaṃ ca māninam | yatkṛte bāndhavāḥ sarve mayā nītā yamakṣayam
"उस क्षुद्र, राज्य के लोभी और अभिमानी दुर्योधन को धिक्कार है, जिसके कारण मैंने अपने सब बन्धुओं को यमलोक पहुँचा दिया!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (14.78.42)
इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादि प्रसादमकरोज्जयः । परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान्प्रति ॥
ityuktvā bahu sāntvādi prasādamakarojjayaḥ | pariṣvajya ca tāṃ prīto visasarja gṛhānprati
यह कहकर जय (अर्जुन) ने उसे बहुत सान्त्वना दी और कृपा की; प्रसन्न होकर उसे गले लगाया और घर भेज दिया।
श्लोक 43 (14.78.43)
दुःशला चापि तान्योधान्निवार्य महतो रणात् । सम्पूज्य पार्थं प्रययौ गृहानेव शुभानना ॥
duḥśalā cāpi tānyodhānnivārya mahato raṇāt | sampūjya pārthaṃ prayayau gṛhāneva śubhānanā
सुन्दर मुख वाली दुःशला ने भी उन योद्धाओं को उस महायुद्ध से रोककर पार्थ का सत्कार किया और अपने घर चली गई।
श्लोक 44 (14.78.44)
एवं निर्जित्य तान्वीरान्सैन्धवान्स धनंजयः । अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम् ॥
evaṃ nirjitya tānvīrānsaindhavānsa dhanaṃjayaḥ | anvadhāvata dhāvantaṃ hayaṃ kāmavicāriṇam
इस प्रकार उन सैन्धव वीरों को जीतकर धनंजय अपनी इच्छा से दौड़ते हुए घोड़े के पीछे चले।
श्लोक 45 (14.78.45)
ततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् । ससार तं तथा वीरो विधिवद्यज्ञियं हयम् ॥
tato mṛgamivākāśe yathā devaḥ pinākadhṛk | sasāra taṃ tathā vīro vidhivadyajñiyaṃ hayam
तब उस वीर ने यज्ञ के घोड़े का विधिपूर्वक पीछा किया, जैसे आकाश में पिनाकधारी देव मृग का पीछा करते हैं।
श्लोक 46 (14.78.46)
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान्देशान्यथाक्रमम् । विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥
sa ca vājī yatheṣṭena tāṃstāndeśānyathākramam | vicacāra yathākāmaṃ karma pārthasya vardhayan
और वह घोड़ा क्रम से एक के बाद एक देश में अपनी इच्छा से घूमता हुआ पार्थ के कार्य को आगे बढ़ाता रहा।
श्लोक 47 (14.78.47)
क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन्पुरुषर्षभ । मणिपूरपतेर्देशमुपायात्सहपाण्डवः ॥
krameṇa sa hayastvevaṃ vicaranpuruṣarṣabha | maṇipūrapaterdeśamupāyātsahapāṇḍavaḥ
इस प्रकार क्रम से घूमता हुआ वह घोड़ा, हे पुरुषश्रेष्ठ, पाण्डुपुत्र के साथ मणिपूर के राजा के देश में पहुँचा।