आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 79
बभ्रुवाहन और अर्जुन का युद्ध
मणलूर के राजा बभ्रुवाहन विनयपूर्वक अपने पिता अर्जुन का स्वागत करने निकलते हैं, पर अर्जुन उन्हें क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध न करने पर फटकारते हैं। उलूपी पृथ्वी फोड़कर आती है और बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए प्रेरित करती है। दोनों में युद्ध होता है; पुत्र के बाण से अर्जुन मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं और पहले से घायल बभ्रुवाहन भी गिर जाता है। चित्राङ्गदा रणभूमि में आकर अपने पति को मरा हुआ-सा पड़ा देखती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.79.1)
श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्तं पितरं बभ्रुवाहनः । निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्मणार्यपुरःसरः ॥
śrutvā tu nṛpatiḥ prāptaṃ pitaraṃ babhruvāhanaḥ | niryayau vinayenātha brāhmaṇāryapuraḥsaraḥ
पिता के आगमन का समाचार सुनकर राजा बभ्रुवाहन ब्राह्मणों और माननीय जनों को आगे करके विनयपूर्वक उनसे मिलने निकला।
श्लोक 2 (14.79.2)
मणलूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयः । नाभ्यनन्दत्स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥
maṇalūreśvaraṃ tvevamupayātaṃ dhanaṃjayaḥ | nābhyanandatsa medhāvī kṣatradharmamanusmaran
किन्तु बुद्धिमान् धनंजय ने मणलूर के स्वामी को इस प्रकार आते देखकर उसका अभिनन्दन नहीं किया, क्योंकि उन्हें क्षत्रिय-धर्म का स्मरण था।
श्लोक 3 (14.79.3)
उवाच च स धर्मात्मा समन्युः फल्गुनस्तदा । प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ॥
uvāca ca sa dharmātmā samanyuḥ phalgunastadā | prakriyeyaṃ na te yuktā bahistvaṃ kṣatradharmataḥ
तब धर्मात्मा फल्गुन ने क्रोध से भरकर कहा, "तुम्हारा यह व्यवहार उचित नहीं है; इसमें तुम क्षत्रिय-धर्म से बाहर हो गए हो।
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (14.79.4)
संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् । यज्ञियं विषयान्ते मां नायोत्सीः किंनु पुत्रक ॥
saṃrakṣyamāṇaṃ turagaṃ yaudhiṣṭhiramupāgatam | yajñiyaṃ viṣayānte māṃ nāyotsīḥ kiṃnu putraka
युधिष्ठिर का यज्ञ-अश्व, रक्षकों के साथ, तुम्हारे राज्य की सीमा पर आया; बेटा, तब तुमने मुझसे युद्ध क्यों नहीं किया?
श्लोक 5 (14.79.5)
धिक्त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्माविशारदम् । यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्णथाः ॥
dhiktvāmastu sudurbuddhiṃ kṣatradharmāviśāradam | yo māṃ yuddhāya samprāptaṃ sāmnaiva pratyagṛhṇathāḥ
तुझे धिक्कार है, दुर्बुद्धि, जो क्षत्रिय-धर्म को नहीं जानता! मैं युद्ध के लिए आया था और तूने मुझे केवल मीठे वचनों से ही ग्रहण किया।
श्लोक 6 (14.79.6)
न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता । यस्त्वं स्त्रीवद्युधा प्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्णथाः ॥
na tvayā puruṣārtho hi kaścidastīha jīvatā | yastvaṃ strīvadyudhā prāptaṃ māṃ sāmnā pratyagṛhṇathāḥ
तेरे जीवित रहने से कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता, क्योंकि युद्ध के लिए आए हुए मुझको तूने स्त्री की भाँति सान्त्वना से ही स्वीकार किया।
श्लोक 7 (14.79.7)
यद्यहं न्यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते । प्रक्रियेयं भवेद्युक्ता तावत्तव नराधम ॥
yadyahaṃ nyastaśastrastvāmāgaccheyaṃ sudurmate | prakriyeyaṃ bhavedyuktā tāvattava narādhama
दुर्मते, यदि मैं शस्त्र त्यागकर तेरे पास आता, तब तेरा यह आचरण उचित होता, नराधम!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (14.79.8)
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा । अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ॥
tamevamuktaṃ bhartrā tu viditvā pannagātmajā | amṛṣyamāṇā bhittvorvīmulūpī samupāgamat
पति ने उससे ऐसा कहा है, यह जानकर नागकन्या उलूपी से यह सहा नहीं गया; वह पृथ्वी को भेदकर वहाँ आ पहुँची।
श्लोक 9 (14.79.9)
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् । संतर्ज्यमानमसकृत्पित्रा युद्धार्थिना विभो ॥
sā dadarśa tataḥ putraṃ vimṛśantamadhomukham | saṃtarjyamānamasakṛtpitrā yuddhārthinā vibho
वहाँ उसने अपने पुत्र को सिर झुकाए सोच में डूबा देखा, जिसे युद्ध चाहने वाले पिता बार-बार डाँट रहे थे। हे विभो!
श्लोक 10 (14.79.10)
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपेत्योरगात्मजा । उलूपी प्राह वचनं क्षत्रधर्मविशारद ॥
tataḥ sā cārusarvāṅgī samupetyoragātmajā | ulūpī prāha vacanaṃ kṣatradharmaviśārada
तब सुन्दर अङ्गों वाली उस नागकन्या उलूपी ने पास आकर ये वचन कहे। हे क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता!
उलूप्युवाच
श्लोक 11 (14.79.11)
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् । कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ॥
ulūpīṃ māṃ nibodha tvaṃ mātaraṃ pannagātmajām | kuruṣva vacanaṃ putra dharmaste bhavitā paraḥ
"तुम मुझे नागकन्या उलूपी, अपनी माता जानो। बेटा, मेरा कहा करो; इससे तुम्हें परम धर्म प्राप्त होगा।
श्लोक 12 (14.79.12)
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं धनंजयमरिन्दमम् । एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ॥
yudhyasvainaṃ kuruśreṣṭhaṃ dhanaṃjayamarindamam | evameṣa hi te prīto bhaviṣyati na saṃśayaḥ
शत्रुओं का दमन करने वाले इन कुरुश्रेष्ठ धनंजय से युद्ध करो; ऐसा करने से ये निःसन्देह तुमसे प्रसन्न होंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (14.79.13)
एवमुद्धर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः । मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ॥
evamuddharṣito rājā sa mātrā babhruvāhanaḥ | manaścakre mahātejā yuddhāya bharatarṣabha
माता के इस प्रकार उत्साहित करने पर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन ने युद्ध का निश्चय किया। हे भरतश्रेष्ठ!
श्लोक 14 (14.79.14)
सन्नह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् । तूणीरशतसंबाधमारुरोह रथोत्तमम् ॥
sannahya kāñcanaṃ varma śirastrāṇaṃ ca bhānumat | tūṇīraśatasaṃbādhamāruroha rathottamam
उसने सोने का कवच और चमकता हुआ शिरस्त्राण धारण किया और सैकड़ों तूणीरों से भरे अपने उत्तम रथ पर सवार हुआ।
श्लोक 15 (14.79.15)
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः । सचक्रोपस्करं श्रीमान्हेमभाण्डपरिष्कृतम् ॥
sarvopakaraṇopetaṃ yuktamaśvairmanojavaiḥ | sacakropaskaraṃ śrīmānhemabhāṇḍapariṣkṛtam
वह रथ सब सामग्री से सुसज्जित था, मन के समान वेग वाले घोड़ों से जुता था, उसके चक्र और साज उत्तम थे, और वह सोने के आभूषणों से सजा हुआ था।
श्लोक 16 (14.79.16)
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं हंसं हिरण्मयम् । प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहनः ॥
paramārcitamucchritya dhvajaṃ haṃsaṃ hiraṇmayam | prayayau pārthamuddiśya sa rājā babhruvāhanaḥ
हंस के चिह्न वाली अत्यन्त पूजित सुनहरी ध्वजा फहराकर राजा बभ्रुवाहन पार्थ की ओर चल पड़ा।
श्लोक 17 (14.79.17)
ततोऽभ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् । ग्राहयामास पुरुषैर्हयशिक्षाविशारदैः ॥
tato'bhyetya hayaṃ vīro yajñiyaṃ pārtharakṣitam | grāhayāmāsa puruṣairhayaśikṣāviśāradaiḥ
तब उस वीर ने पार्थ द्वारा रक्षित यज्ञ-अश्व के पास जाकर अश्व-शिक्षा में निपुण पुरुषों से उसे पकड़वा लिया।
श्लोक 18 (14.79.18)
गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनंजयः । पुत्रं रथस्थं भूमिष्ठः संन्यवारयदाहवे ॥
gṛhītaṃ vājinaṃ dṛṣṭvā prītātmā sa dhanaṃjayaḥ | putraṃ rathasthaṃ bhūmiṣṭhaḥ saṃnyavārayadāhave
अश्व को पकड़ा गया देखकर धनंजय मन में प्रसन्न हुए; वे भूमि पर खड़े थे और रथ पर बैठे पुत्र को उन्होंने युद्ध में रोका।
श्लोक 19 (14.79.19)
स तत्र राजा तं वीरं शरसङ्घैरनेकशः । अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमैः ॥
sa tatra rājā taṃ vīraṃ śarasaṅghairanekaśaḥ | ardayāmāsa niśitairāśīviṣaviṣopamaiḥ
तब उस राजा ने विषैले सर्पों के विष के समान तीखे बाणों के समूहों से उस वीर को अनेक बार पीड़ित किया।
श्लोक 20 (14.79.20)
तयोः समभवद्युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् । देवासुररणप्रख्यमुभयोः प्रीयमाणयोः ॥
tayoḥ samabhavadyuddhaṃ pituḥ putrasya cātulam | devāsuraraṇaprakhyamubhayoḥ prīyamāṇayoḥ
तब पिता और पुत्र के बीच अनुपम युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्राम के समान था; दोनों उसमें प्रसन्न हो रहे थे।
श्लोक 21 (14.79.21)
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा । जत्रुदेशे नरव्याघ्रं प्रहसन्बभ्रुवाहनः ॥
kirīṭinaṃ pravivyādha śareṇānataparvaṇā | jatrudeśe naravyāghraṃ prahasanbabhruvāhanaḥ
हँसते हुए बभ्रुवाहन ने सीधी गाँठों वाले बाण से नरव्याघ्र किरीटी के कण्ठ के पास हँसली के स्थान पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (14.79.22)
सोभ्यगात्सहपुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः । विनिर्भद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम् ॥
sobhyagātsahapuṅkhena valmīkamiva pannagaḥ | vinirbhadya ca kaunteyaṃ praviveśa mahītalam
वह बाण पुङ्ख-सहित ऐसे घुस गया जैसे साँप बाँबी में घुसता है; कुन्तीपुत्र को बींधकर वह पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 23 (14.79.23)
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् । दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सोभवत् ॥
sa gāḍhavedano dhīmānālambya dhanuruttamam | divyaṃ tejaḥ samāviśya pramīta iva sobhavat
गहरी पीड़ा से व्याकुल बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुष का सहारा लेकर खड़े रहे और दिव्य तेज से व्याप्त होकर मृतप्राय-से हो गए।
श्लोक 24 (14.79.24)
स संज्ञामुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभः । पुत्रं शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युतिः ॥
sa saṃjñāmupalabhyātha praśasya puruṣarṣabhaḥ | putraṃ śakrātmajo vākyamidamāha mahādyutiḥ
तब होश में आकर शक्र के पुत्र महातेजस्वी पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ने अपने पुत्र की सराहना करके ये वचन कहे।
अर्जुन उवाच
श्लोक 25 (14.79.25)
साधुसाधु महाबाहो वत्स चित्राङ्गदात्मज । सदृशं कर्म ते दृष्ट्वा प्रीतिमानस्मि पुत्रक ॥
sādhusādhu mahābāho vatsa citrāṅgadātmaja | sadṛśaṃ karma te dṛṣṭvā prītimānasmi putraka
"शाबाश, शाबाश, महाबाहु वत्स चित्राङ्गदा-पुत्र! तुम्हारे योग्य कर्म देखकर मैं प्रसन्न हूँ, बेटा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (14.79.26)
विमुञ्चाम्येष ते बाणान्पुत्र युद्धे स्थिरो भव । इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा ॥
vimuñcāmyeṣa te bāṇānputra yuddhe sthiro bhava | ityevamuktvā nārācairabhyavarṣadamitrahā
पुत्र, अब मैं तुम पर बाण छोड़ता हूँ; युद्ध में डटे रहो।" ऐसा कहकर शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन ने उस पर नाराच बाणों की वर्षा की।
श्लोक 27 (14.79.27)
तान्स गाण्डीवनिर्मुक्तान्वज्राशनिसमप्रभान् । नाराचानच्छिनद्राजा भल्लैः सर्वांस्त्रिधा द्विधा ॥
tānsa gāṇḍīvanirmuktānvajrāśanisamaprabhān | nārācānacchinadrājā bhallaiḥ sarvāṃstridhā dvidhā
गाण्डीव से छूटे हुए और वज्र तथा बिजली के समान चमकने वाले उन सब नाराचों को राजा ने भल्ल बाणों से तीन-तीन या दो-दो टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 28 (14.79.28)
तस्य पार्थः शरैर्दिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् । सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद्रथात् ॥
tasya pārthaḥ śarairdivyairdhvajaṃ hemapariṣkṛtam | suvarṇatālapratimaṃ kṣureṇāpāharadrathāt
पार्थ ने दिव्य बाणों से, एक क्षुर-बाण द्वारा, उसके रथ से सोने से सजी, सुनहरे ताड़ के समान ऊँची ध्वजा गिरा दी।
श्लोक 29 (14.79.29)
हयांश्चास्य महाकायान्महावेगानरिंदम । चकार राजन्निर्जीवान्प्रहसन्निव पाण्डवः ॥
hayāṃścāsya mahākāyānmahāvegānariṃdama | cakāra rājannirjīvānprahasanniva pāṇḍavaḥ
हे शत्रुदमन! हे राजन्! पाण्डव अर्जुन ने मानो हँसते-हँसते उसके विशालकाय और अत्यन्त वेगवान् घोड़ों को निर्जीव कर दिया।
श्लोक 30 (14.79.30)
स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपनः । पदातिः पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम् ॥
sa rathādavatīryātha rājā paramakopanaḥ | padātiḥ pitaraṃ kruddho yodhayāmāsa pāṇḍavam
तब अत्यन्त क्रोधित राजा रथ से उतर पड़ा और पैदल ही क्रोध में भरकर अपने पिता पाण्डव अर्जुन से लड़ने लगा।
श्लोक 31 (14.79.31)
सम्प्रीयमाणः पार्थानामृषभः पुत्रविक्रमात् । नात्यर्थं पीडयामास पुत्रं वज्रधरात्मजः ॥
samprīyamāṇaḥ pārthānāmṛṣabhaḥ putravikramāt | nātyarthaṃ pīḍayāmāsa putraṃ vajradharātmajaḥ
पुत्र के पराक्रम से प्रसन्न होकर वज्रधारी इन्द्र के पुत्र, पाण्डवों के श्रेष्ठ अर्जुन ने पुत्र को अधिक पीड़ा नहीं पहुँचाई।
श्लोक 32 (14.79.32)
स हन्यमानोऽभिमुखं पितरं बभ्रुवाहनः । शरैराशीविषाकारैः पुनरेवार्दयद्बली ॥
sa hanyamāno'bhimukhaṃ pitaraṃ babhruvāhanaḥ | śarairāśīviṣākāraiḥ punarevārdayadbalī
सामने से पिता द्वारा मारे जाने पर भी बलवान् बभ्रुवाहन ने विषैले सर्पों जैसे बाणों से उन्हें फिर पीड़ित किया।
श्लोक 33 (14.79.33)
ततः स बाल्यात्पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा । निशितेन सुपुङ्खेन बलवद्बभ्रुवाहनः ॥
tataḥ sa bālyātpitaraṃ vivyādha hṛdi patriṇā | niśitena supuṅkhena balavadbabhruvāhanaḥ
तब बभ्रुवाहन ने बालकपन के कारण पिता के हृदय में तेज धार और सुन्दर पङ्ख वाले बाण से बलपूर्वक प्रहार किया।
श्लोक 34 (14.79.34)
स बाणस्तेजसा दीप्तो ज्वलन्निव हुताशनः । विवेश पाण्डवं राजन्मर्म भित्त्वाऽतिदुःखकृत् ॥
sa bāṇastejasā dīpto jvalanniva hutāśanaḥ | viveśa pāṇḍavaṃ rājanmarma bhittvā'tiduḥkhakṛt
हे राजन्! अपने तेज से जलती आग के समान दीप्त वह बाण पाण्डव के मर्मस्थान को बींधकर उसमें घुस गया और उसे अत्यन्त दुःख देने लगा।
श्लोक 35 (14.79.35)
स तेनातिभृशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दनः । महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन्धनंजयः ॥
sa tenātibhṛśaṃ viddhaḥ putreṇa kurunandanaḥ | mahīṃ jagāma mohārtastato rājandhanaṃjayaḥ
हे राजन्! पुत्र के द्वारा अत्यन्त गहरा बींधे जाने पर कुरुनन्दन धनंजय मूर्छा से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 36 (14.79.36)
तस्मिन्निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे । सोपि मोहं जगामाथ ततश्चित्राङ्गदासुतः ॥
tasminnipatite vīre kauravāṇāṃ dhuraṃdhare | sopi mohaṃ jagāmātha tataścitrāṅgadāsutaḥ
कौरवों का भार वहन करने वाले उस वीर के गिर जाने पर चित्राङ्गदा का पुत्र भी मूर्छित हो गया।
श्लोक 37 (14.79.37)
व्यायम्य संयुगे राजा दृष्ट्वा च पितरं हतम् । पूर्वमेव स बाणौघैर्गाढविद्धोऽर्जुनेन ह । पपात सोपि धरणीमालिङ्ग्य रणमूर्धनि ॥
vyāyamya saṃyuge rājā dṛṣṭvā ca pitaraṃ hatam | pūrvameva sa bāṇaughairgāḍhaviddho'rjunena ha | papāta sopi dharaṇīmāliṅgya raṇamūrdhani
युद्ध में बहुत परिश्रम करके और पिता को गिरा हुआ देखकर राजा बभ्रुवाहन, जो पहले ही अर्जुन के बाण-समूहों से गहरा घायल हो चुका था, वह भी रणभूमि के अग्रभाग में धरती को आलिङ्गन करके गिर पड़ा।
श्लोक 38 (14.79.38)
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि । चित्राङ्गदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे ॥
bhartāraṃ nihataṃ dṛṣṭvā putraṃ ca patitaṃ bhuvi | citrāṅgadā paritrastā praviveśa raṇājire
पति को मरा हुआ और पुत्र को भूमि पर गिरा देखकर चित्राङ्गदा भयभीत होकर रणभूमि में आ पहुँची।
श्लोक 39 (14.79.39)
शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् । मणलूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम् ॥
śokasaṃtaptahṛdayā rudatī vepatī bhṛśam | maṇalūrapatermātā dadarśa nihataṃ patim
शोक से जलते हृदय वाली, रोती और काँपती हुई मणलूर-नरेश की माता चित्राङ्गदा ने अपने पति को मारा हुआ पड़ा देखा।