आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 80
चित्राङ्गदा का विलाप और बभ्रुवाहन का प्रायोपवेशन
चित्राङ्गदा मूर्छा से जागकर अर्जुन की मृत्यु के लिए उलूपी को उलाहना देती है, उनसे अर्जुन को जीवित करने की प्रार्थना करती है और पति के पास प्रायोपवेशन का निश्चय करती है। होश में आकर बभ्रुवाहन पिता के वध पर शोक करता है, उसके प्रायश्चित्त की बात कहता है और प्रतिज्ञा करता है कि यदि अर्जुन नहीं उठे तो वह यहीं प्राण त्याग देगा; फिर वह मौन होकर अनशन में बैठ जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.80.1)
ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा । मुमोह दुःखसंतप्ता पपात च महीतले ॥
tato bahutaraṃ bhīrurvilapya kamalekṣaṇā | mumoha duḥkhasaṃtaptā papāta ca mahītale
तब कमल जैसे नेत्रों वाली, भीरु स्वभाव की चित्राङ्गदा ने बहुत देर तक विलाप किया और दुःख से सन्तप्त होकर मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 2 (14.80.2)
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा । उलूपीं पन्नगसुतां दृष्ट्वेदं वाक्यमब्रवीत् ॥
pratilabhya ca sā saṃjñāṃ devī divyavapurdharā | ulūpīṃ pannagasutāṃ dṛṣṭvedaṃ vākyamabravīt
होश में आने पर दिव्य शरीर धारण करने वाली उस देवी ने नागकन्या उलूपी को देखकर यह वचन कहा।
चित्राङ्गदोवाच
श्लोक 3 (14.80.3)
उलूपि पश्य भर्तारं शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम् ॥
ulūpi paśya bhartāraṃ śayānaṃ nihataṃ raṇe | tvatkṛte mama putreṇa bāṇena samitiṃjayam
"उलूपी, देखो, तुम्हारे ही कारण मेरे पुत्र के बाण से मारे गए युद्धविजयी तुम्हारे पति रणभूमि में पड़े हैं।
श्लोक 4 (14.80.4)
ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता । यत्त्वत्कृतेऽयं पतितः पतिस्ते निहतो रणे ॥
nanu tvamāryadharmajñā nanu cāsi pativratā | yattvatkṛte'yaṃ patitaḥ patiste nihato raṇe
क्या तुम आर्या और धर्म को जानने वाली नहीं हो? क्या तुम पतिव्रता नहीं हो? फिर भी तुम्हारे ही कारण तुम्हारे पति युद्ध में मारे जाकर गिर पड़े हैं।
श्लोक 5 (14.80.5)
किंनु मन्देऽपराद्धोऽयं यदि तेऽद्य धनंजयः । क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम् ॥
kiṃnu mande'parāddho'yaṃ yadi te'dya dhanaṃjayaḥ | kṣamasva yācyamānā vai jīvayasva dhanaṃjayam
मूर्खे, यदि आज धनंजय तुम्हारे ही हैं, तो क्या उन्होंने तुम्हारा कोई अपराध किया है? मैं तुमसे याचना करती हूँ, क्षमा करो और धनंजय को जिला दो।
श्लोक 6 (14.80.6)
ननु त्वमार्ये धर्मज्ञे त्रैलोक्यविदिता शुभे । यद्धातयित्वा पुत्रेण भर्तारं नानुशोचसि ॥
nanu tvamārye dharmajñe trailokyaviditā śubhe | yaddhātayitvā putreṇa bhartāraṃ nānuśocasi
हे आर्ये, क्या तुम धर्म को जानने वाली और तीनों लोकों में प्रसिद्ध शुभलक्षणा नहीं हो? फिर पुत्र के हाथों पति का वध करवाकर भी तुम शोक क्यों नहीं करतीं?
श्लोक 7 (14.80.7)
नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि । पतिमेव तु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम् ॥
nāhaṃ śocāmi tanayaṃ hataṃ pannaganandini | patimeva tu śocāmi yasyātithyamidaṃ kṛtam
हे नागनन्दिनी, मैं मरे हुए अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करती; मैं तो अपने उन पति के लिए शोक करती हूँ जिनका यह अतिथि-सत्कार किया गया है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (14.80.8)
इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् । भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी ॥
ityuktvā sā tadā devīmulūpīṃ pannagātmajām | bhartāramabhigamyedamityuvāca yaśasvinī
नागकन्या देवी उलूपी से यह कहकर यशस्विनी चित्राङ्गदा अपने पति के पास गई और यह बोली।
चित्राङ्गदोवाच
श्लोक 9 (14.80.9)
उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय । अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षितः ॥
uttiṣṭha kurumukhyasya priyamukhya mama priya | ayamaśvo mahābāho mayā te parimokṣitaḥ
"उठिए, कुरुश्रेष्ठ, मेरे प्रिय, प्रियजनों में अग्रगण्य! हे महाबाहो, यह आपका अश्व मैंने छोड़ दिया है।
श्लोक 10 (14.80.10)
ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञियः । अयमश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले ॥
nanu tvayā nāma vibho dharmarājasya yajñiyaḥ | ayamaśvo'nusartavyaḥ sa śeṣe kiṃ mahītale
हे प्रभो, धर्मराज के इस यज्ञ-अश्व का अनुसरण तो आपको ही करना है; फिर आप भूमि पर क्यों पड़े हैं?
श्लोक 11 (14.80.11)
त्वयि प्राणा ममायत्ताः कुरूणां कुरुनन्दन । स कस्मात्प्राणदोऽन्येषां प्राणान्संत्यक्तवानसि ॥
tvayi prāṇā mamāyattāḥ kurūṇāṃ kurunandana | sa kasmātprāṇado'nyeṣāṃ prāṇānsaṃtyaktavānasi
हे कुरुनन्दन, मेरे प्राण और कुरुओं के प्राण आप पर ही टिके हैं। दूसरों को प्राण देने वाले आपने अपने प्राण क्यों त्याग दिए?
श्लोक 12 (14.80.12)
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि । पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि ॥
ulūpi sādhu paśyemaṃ patiṃ nipatitaṃ bhuvi | putraṃ cemaṃ samutsādya ghātayitvā na śocasi
उलूपी, ज़रा इन पति को देखो जो भूमि पर पड़े हैं। इस पुत्र को भी नष्ट कराके और पति का वध करवाके तुम शोक नहीं करती हो।
श्लोक 13 (14.80.13)
कामं स्वपितु बालोऽयं भूमौ मृत्युवशं गतः । लोहिताक्षो गुडाकेशो विजयः साधु जीवतु ॥
kāmaṃ svapitu bālo'yaṃ bhūmau mṛtyuvaśaṃ gataḥ | lohitākṣo guḍākeśo vijayaḥ sādhu jīvatu
यह बालक भले ही भूमि पर मृत्यु के वश में होकर सोया रहे; पर लाल नेत्रों वाले गुडाकेश विजय अर्जुन जीवित हो जाएँ।
श्लोक 14 (14.80.14)
नापराधोऽस्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता । प्रमदानां भवत्येष मा ते भूद्बुद्धिरीदृशी ॥
nāparādho'sti subhage narāṇāṃ bahubhāryatā | pramadānāṃ bhavatyeṣa mā te bhūdbuddhirīdṛśī
हे सौभाग्यवती, पुरुषों का अनेक पत्नियाँ रखना कोई अपराध नहीं है; यह भाव तो स्त्रियों में ही होता है। तुम्हारे मन में ऐसी बुद्धि न रहे।
श्लोक 15 (14.80.15)
सख्यं चैतत्कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु । सख्यं समभिजानीहि सत्यं सङ्गतमस्तु ते ॥
sakhyaṃ caitatkṛtaṃ dhātrā śaśvadavyayameva tu | sakhyaṃ samabhijānīhi satyaṃ saṅgatamastu te
यह सख्य विधाता का बनाया हुआ है, सदा रहने वाला और अविनाशी। इस मित्रता को पहचानो और तुम्हारा मेल सच्चा हो।
श्लोक 16 (14.80.16)
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेऽद्य वै । जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥
putreṇa ghātayitvainaṃ patiṃ yadi na me'dya vai | jīvantaṃ darśayasyadya parityakṣyāmi jīvitam
पुत्र के हाथों इन पति को मरवाकर यदि तुम आज मुझे इन्हें जीवित नहीं दिखाओगी, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।
श्लोक 17 (14.80.17)
साऽहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता । इहैव प्रायमाशिष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशयः ॥
sā'haṃ duḥkhānvitā devi patiputravinākṛtā | ihaiva prāyamāśiṣye prekṣantyāste na saṃśayaḥ
हे देवि, पति और पुत्र से वंचित होकर दुःख से घिरी मैं तुम्हारे देखते-देखते यहीं प्रायोपवेशन करके बैठ जाऊँगी, इसमें सन्देह नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (14.80.18)
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नी चैत्रवाहनी । ततः प्रायमुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप ॥
ityuktvā pannagasutāṃ sapatnī caitravāhanī | tataḥ prāyamupāsīnā tūṣṇīmāsījjanādhipa
हे जनाधिप, नागकन्या से ऐसा कहकर चित्रवाहन की पुत्री चित्राङ्गदा, उसकी सपत्नी, प्रायोपवेशन करके मौन बैठ गई।
श्लोक 19 (14.80.19)
ततो विलप्य विरता भर्तुः पादौ प्रगृह्य सा । उपविष्टा भवद्दीना सोच्छ्वासं पुत्रमीक्षती ॥
tato vilapya viratā bhartuḥ pādau pragṛhya sā | upaviṣṭā bhavaddīnā socchvāsaṃ putramīkṣatī
तब विलाप करके चुप हुई चित्राङ्गदा पति के चरण पकड़कर दीन भाव से बैठ गई और आहें भरती हुई पुत्र की ओर देखने लगी।
श्लोक 20 (14.80.20)
ततः संज्ञां पुनर्लब्ध्वा स राजा बभ्रुवाहनः । मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाब्रवीत् ॥
tataḥ saṃjñāṃ punarlabdhvā sa rājā babhruvāhanaḥ | mātaraṃ tāmathālokya raṇabhūmāvathābravīt
तब राजा बभ्रुवाहन ने फिर होश पाकर रणभूमि में अपनी माता को देखा और कहा।
बभ्रुवाहन उवाच
श्लोक 21 (14.80.21)
इतो दुःखतरं किंनु यन्मे माता सुखैधिता । भूमौ निपतितं वीरमनुशेते मृतं पतिम् ॥
ito duḥkhataraṃ kiṃnu yanme mātā sukhaidhitā | bhūmau nipatitaṃ vīramanuśete mṛtaṃ patim
"इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा कि सुख में पली मेरी माता भूमि पर गिरे हुए, मृत वीर पति के पास पड़ी है?
श्लोक 22 (14.80.22)
निहन्तारं रणेऽरीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् । मया विनिहतं सङ्ख्ये प्रेक्षते दुर्मरं बत ॥
nihantāraṃ raṇe'rīṇāṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | mayā vinihataṃ saṅkhye prekṣate durmaraṃ bata
वह रणभूमि में शत्रुओं का संहार करने वाले, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ अपने पति को मेरे द्वारा युद्ध में मारा हुआ देख रही है और फिर भी जीवित है। हाय, मरना कितना कठिन है!
श्लोक 23 (14.80.23)
अहोऽस्या हृदयं देव्या दृढं यन्न विदीर्यते । व्यूढोरस्कं महाबाहुं प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम् ॥
aho'syā hṛdayaṃ devyā dṛḍhaṃ yanna vidīryate | vyūḍhoraskaṃ mahābāhuṃ prekṣantyā nihataṃ patim
अहो, इस देवी का हृदय कितना दृढ़ है कि चौड़ी छाती वाले महाबाहु पति को मरा हुआ देखकर भी वह फटता नहीं।
श्लोक 24 (14.80.24)
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये काले ह्यनागते । यत्र नाहं न मे माता न वियुक्तौ स्वजीवितात् ॥
durmaraṃ puruṣeṇeha manye kāle hyanāgate | yatra nāhaṃ na me mātā na viyuktau svajīvitāt
मुझे लगता है कि समय आने से पहले मनुष्य के लिए मरना कठिन होता है; तभी तो न मैं और न मेरी माता अपने जीवन से अलग हुई।
श्लोक 25 (14.80.25)
हाहा धिक्कुरुवीरस्य किरीटं काञ्चनं भुवि । अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत ॥
hāhā dhikkuruvīrasya kirīṭaṃ kāñcanaṃ bhuvi | apaviddhaṃ hatasyeha mayā putreṇa paśyata
हाय, धिक्कार है! कुरुवीर का सोने का मुकुट भूमि पर फेंका पड़ा है, जिन्हें यहाँ मुझ पुत्र ने ही मारा है; देखो।
श्लोक 26 (14.80.26)
भोभो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि । शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम् ॥
bhobho paśyata me vīraṃ pitaraṃ brāhmaṇā bhuvi | śayānaṃ vīraśayane mayā putreṇa pātitam
हे ब्राह्मणो, देखो, मेरे वीर पिता भूमि पर वीर-शय्या पर लेटे हैं, जिन्हें मुझ पुत्र ने गिराया है।
श्लोक 27 (14.80.27)
ब्राह्मणाः कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता हयसारिणः । कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे योऽयं मया हतः ॥
brāhmaṇāḥ kurumukhyasya ye muktā hayasāriṇaḥ | kurvanti śāntiṃ kāmasya raṇe yo'yaṃ mayā hataḥ
कुरुश्रेष्ठ के अश्व के साथ जो ब्राह्मण भेजे गए हैं, वे मेरे हाथ से युद्ध में मारे गए इन पुरुष के लिए जो भी शान्ति-कर्म हो, उसे करें।
श्लोक 28 (14.80.28)
व्यादिशन्तु च किं विप्राः प्रायश्चित्तमिहाद्य मे । सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे ॥
vyādiśantu ca kiṃ viprāḥ prāyaścittamihādya me | sunṛśaṃsasya pāpasya pitṛhantū raṇājire
और ब्राह्मण आज मुझ पापी के लिए यहाँ क्या प्रायश्चित्त है, यह बताएँ, जो अत्यन्त क्रूर हूँ और जिसने रणभूमि में अपने पिता का वध किया है।
श्लोक 29 (14.80.29)
दुश्चरा द्वादश समा हत्वा पितरमद्य वै । ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा ॥
duścarā dvādaśa samā hatvā pitaramadya vai | mameha sunṛśaṃsasya saṃvītasyāsya carmaṇā
पिता का वध करने पर बारह वर्ष का कठिन प्रायश्चित्त है; मुझ जैसे अत्यन्त क्रूर के लिए, जो इन्हीं की चर्म से लिपटा रहे,
श्लोक 30 (14.80.30)
शिरःकपाले चास्यैव भुञ्जतः पितुरद्य मे । प्रायश्चित्तं हि नास्त्यन्यद्धत्वाऽद्य पितरं मम ॥
śiraḥkapāle cāsyaiva bhuñjataḥ pituradya me | prāyaścittaṃ hi nāstyanyaddhatvā'dya pitaraṃ mama
और इन्हीं पिता की खोपड़ी में भोजन करे। पिता का वध करने वाले के लिए इसके सिवा दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
श्लोक 31 (14.80.31)
पश्य नागोत्तमसुते भर्तारं निहतं मया । कृतं प्रियं मया तेऽद्य निहत्य समरेऽर्जुनम् ॥
paśya nāgottamasute bhartāraṃ nihataṃ mayā | kṛtaṃ priyaṃ mayā te'dya nihatya samare'rjunam
हे श्रेष्ठ नाग की कन्या, देखो, तुम्हारे पति मेरे द्वारा मारे गए हैं। आज मैंने अर्जुन को युद्ध में मारकर तुम्हारा प्रिय कर दिया।
श्लोक 32 (14.80.32)
सोऽहमद्य गमिष्यामि गतिं पितृनिषेविताम् । न शक्नोम्यात्मनाऽऽत्मानमहं दारयितुं शुभे ॥
so'hamadya gamiṣyāmi gatiṃ pitṛniṣevitām | na śaknomyātmanā''tmānamahaṃ dārayituṃ śubhe
अतः आज मैं उसी मार्ग पर जाऊँगा जिस पर पितर चले हैं, यद्यपि हे शुभे, मैं अपने हाथ से अपने को चीर नहीं सकता।
श्लोक 33 (14.80.33)
सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि । भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे ॥
sā tvaṃ mayi mṛte mātastathā gāṇḍīvadhanvani | bhava prītimatī devi satyenātmānamālabhe
माता, मेरे और गाण्डीवधारी के मर जाने पर तुम प्रसन्न हो जाना। हे देवि, मैं सत्य की शपथ लेता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (14.80.34)
इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहतः । उपस्पृश्य महाराज दुःखाद्वचनमब्रवीत् ॥
ityuktvā sa tato rājā duḥkhaśokasamāhataḥ | upaspṛśya mahārāja duḥkhādvacanamabravīt
हे महाराज, यह कहकर दुःख और शोक से पीड़ित राजा बभ्रुवाहन ने आचमन किया और वेदना से ये वचन कहे।
बभ्रुवाहन उवाच
श्लोक 35 (14.80.35)
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च । त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे ॥
śṛṇvantu sarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | tvaṃ ca mātaryathā satyaṃ bravīmi bhujagottame
"सब चर और अचर प्राणी सुनें, और हे माता, हे नागश्रेष्ठे, तुम भी सुनो; मैं सत्य कहता हूँ।
श्लोक 36 (14.80.36)
यदि नोत्तिष्ठति जयः पिता मे नरसत्तमः । अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम् ॥
yadi nottiṣṭhati jayaḥ pitā me narasattamaḥ | asminneva raṇoddeśe śoṣayiṣye kalevaram
यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ जय (अर्जुन) नहीं उठे, तो मैं इसी रणभूमि में अपना शरीर सुखा दूँगा।
श्लोक 37 (14.80.37)
नहि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् । नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दितः ॥
nahi me pitaraṃ hatvā niṣkṛtirvidyate kvacit | narakaṃ pratipatsyāmi dhruvaṃ guruvadhārditaḥ
पिता को मारने के बाद मेरे लिए कहीं कोई प्रायश्चित्त नहीं है। गुरु-वध से पीड़ित मैं निश्चय ही नरक में जाऊँगा।
श्लोक 38 (14.80.38)
वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते । पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम ॥
vīraṃ hi kṣatriyaṃ hatvā gośatena pramucyate | pitaraṃ tu nihatyaivaṃ durlabhā niṣkṛtirmama
वीर क्षत्रिय को मारने वाला सौ गायें देने से छूट जाता है, पर पिता को मारकर मेरे लिए प्रायश्चित्त पाना कठिन है।
श्लोक 39 (14.80.39)
एष एको महातेजाः पाण्डुपुत्रो धनंजयः । पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृतिः कुतः ॥
eṣa eko mahātejāḥ pāṇḍuputro dhanaṃjayaḥ | pitā ca mama dharmātmā tasya me niṣkṛtiḥ kutaḥ
ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय महातेजस्वी हैं और मेरे धर्मात्मा पिता भी हैं; इनके वध का प्रायश्चित्त मेरे लिए कहाँ है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (14.80.40)
इत्येवमुक्त्वा नृपते धनंजयसुतो नृपः । उपस्पृश्याभवत्तूष्णीं प्रायोपेतो महामतिः ॥
ityevamuktvā nṛpate dhanaṃjayasuto nṛpaḥ | upaspṛśyābhavattūṣṇīṃ prāyopeto mahāmatiḥ
हे राजन्, ऐसा कहकर धनंजय के पुत्र महामति राजा बभ्रुवाहन ने आचमन किया और प्रायोपवेशन का निश्चय करके चुप हो गया।