आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 81
उलूपी द्वारा संजीवन-मणि से अर्जुन का पुनर्जीवन
बभ्रुवाहन माता के साथ प्रायोपवेशन में बैठा है, तब उलूपी नागों की संजीवन-मणि का स्मरण करती है। वह बताती है कि अर्जुन तुम्हारे हाथ से मारे नहीं गए; यह उसकी रची मोहिनी माया थी, क्योंकि अर्जुन अपने पुत्र के बल की परीक्षा लेना चाहते थे। मणि पिता की छाती पर रखते ही अर्जुन मानो सोकर उठे, देवताओं ने पुष्प-वर्षा की, और उन्होंने पुत्र को गले लगाकर पूछा कि स्त्रियाँ रणभूमि में क्यों आई हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.81.1)
प्रायोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा । पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप ॥
prāyopaviṣṭe nṛpatau maṇipūreśvare tadā | pitṛśokasamāviṣṭe saha mātrā paraṃtapa
हे परंतप! जब मणिपुर के स्वामी राजा बभ्रुवाहन पिता के शोक से भरकर माता के साथ प्रायोपवेशन में बैठा था,
श्लोक 2 (14.81.2)
उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् । स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम् ॥
ulūpī cintayāmāsa tadā saṃjīvanaṃ maṇim | sa copātiṣṭhata tadā pannagānāṃ parāyaṇam
तब उलूपी ने नागों के आश्रय-रूप संजीवन मणि का स्मरण किया, और वह उसी क्षण उसके पास आ उपस्थित हुई।
श्लोक 3 (14.81.3)
तं गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपतेः सुता । मनःप्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत् ॥
taṃ gṛhītvā tu kauravya nāgarājapateḥ sutā | manaḥprahlādanīṃ vācaṃ sainikānāmathābravīt
हे कौरव्य! उस मणि को लेकर नागराज की पुत्री ने सैनिकों के बीच मन को आनन्द देने वाली वाणी में कहा।
उलूप्युवाच
श्लोक 4 (14.81.4)
उत्तिष्ठ मा शुचः पुत्र नैव जिष्णुस्त्वया हतः । अजेयः पुरुषैरेष तथा देवैः सवासवैः ॥
uttiṣṭha mā śucaḥ putra naiva jiṣṇustvayā hataḥ | ajeyaḥ puruṣaireṣa tathā devaiḥ savāsavaiḥ
"उठो पुत्र, शोक मत करो; जिष्णु तुम्हारे हाथ से मारे नहीं गए हैं। ये मनुष्यों से अजेय हैं, और इन्द्रसहित देवताओं से भी।
श्लोक 5 (14.81.5)
मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता । प्रियार्थं पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेऽद्य यशस्विनः ॥
mayā tu mohanī nāma māyaiṣā sampradarśitā | priyārthaṃ puruṣendrasya pituste'dya yaśasvinaḥ
मैंने यह मोहिनी नाम की माया आज तुम्हारे यशस्वी पिता, नरेन्द्र अर्जुन, का प्रिय करने के लिए दिखाई थी।
श्लोक 6 (14.81.6)
जिज्ञासुर्ह्येष पुत्रस्य बलस्य तव कौरव । सङ्ग्रामे युद्ध्यतो राजन्नागतः परवीरहा ॥
jijñāsurhyeṣa putrasya balasya tava kaurava | saṅgrāme yuddhyato rājannāgataḥ paravīrahā
हे कौरव! हे राजन्! शत्रुवीरों का संहार करने वाले ये अर्जुन युद्ध करते हुए अपने पुत्र के बल की परीक्षा लेने की इच्छा से यहाँ आए थे।
श्लोक 7 (14.81.7)
तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदितः । मा पापमात्मनः पुत्र शङ्केथा ह्यण्वपि प्रभो ॥
tasmādasi mayā putra yuddhāya paricoditaḥ | mā pāpamātmanaḥ putra śaṅkethā hyaṇvapi prabho
इसीलिए पुत्र, मैंने तुम्हें युद्ध के लिए प्रेरित किया था। हे प्रभो, अपने में अणुमात्र भी पाप की शंका मत करो।
श्लोक 8 (14.81.8)
ऋषिरेष महानात्मा पुराणः शाश्वतोऽक्षरः । नैनं शक्तो हि सङ्ग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ॥
ṛṣireṣa mahānātmā purāṇaḥ śāśvato'kṣaraḥ | nainaṃ śakto hi saṅgrāme jetuṃ śakro'pi putraka
ये महान् आत्मा ऋषि हैं, पुराण, शाश्वत और अविनाशी। पुत्र, युद्ध में इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकता।
श्लोक 9 (14.81.9)
अयं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशांपते । मृतान्मृतान्पन्नगेन्द्रान्यो जीवयति नित्यदा ॥
ayaṃ tu me maṇirdivyaḥ samānīto viśāṃpate | mṛtānmṛtānpannagendrānyo jīvayati nityadā
हे राजन्, यह मेरी दिव्य मणि है, जो मैं ले आई हूँ; यह मरे हुए नागेन्द्रों को हर बार जीवित कर देती है।
श्लोक 10 (14.81.10)
एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितुः प्रभो । संजीवितं तदा पार्थं स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम् ॥
enamasyorasi tvaṃ ca sthāpayasva pituḥ prabho | saṃjīvitaṃ tadā pārthaṃ sa tvaṃ draṣṭāsi pāṇḍavam
हे प्रभो, इसे अपने पिता की छाती पर रख दो; तब तुम पाण्डव पार्थ को जीवित हुआ देखोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (14.81.11)
इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मणिं तदा । पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ॥
ityuktaḥ sthāpayāmāsa tasyorasi maṇiṃ tadā | pārthasyāmitatejāḥ sa pituḥ snehādapāpakṛt
ऐसा कहे जाने पर अमित तेजस्वी, निष्पाप बभ्रुवाहन ने पिता के प्रेम से वह मणि पार्थ की छाती पर रख दी।
श्लोक 12 (14.81.12)
तस्मिन्न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः । चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ॥
tasminnyaste maṇau vīro jiṣṇurujjīvitaḥ prabhuḥ | cirasupta ivottasthau mṛṣṭalohitalocanaḥ
मणि रखते ही वीर प्रभु जिष्णु जीवित हो गए; वे मानो बहुत देर के सोये हुए की तरह लाल आँखें पोंछते हुए उठ बैठे।
श्लोक 13 (14.81.13)
तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् । समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बभ्रुवाहनः ॥
tamutthitaṃ mahātmānaṃ labdhasaṃjñaṃ manasvinam | samīkṣya pitaraṃ svasthaṃ vavande babhruvāhanaḥ
उन महात्मा, मनस्वी अर्जुन को उठा हुआ, होश में आया हुआ और स्वस्थ देखकर बभ्रुवाहन ने पिता को प्रणाम किया।
श्लोक 14 (14.81.14)
उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो । दिव्याः सुमनसः पुण्या ववृषे पाकशासनः ॥
utthite puruṣavyāghre punarlakṣmīvati prabho | divyāḥ sumanasaḥ puṇyā vavṛṣe pākaśāsanaḥ
हे प्रभो! पुरुषव्याघ्र अर्जुन के फिर शोभा से युक्त होकर उठने पर पाकशासन इन्द्र ने पवित्र दिव्य पुष्पों की वर्षा की।
श्लोक 15 (14.81.15)
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मघनिःस्वनाः । साधुसाध्विति चाकाशे बभूव सुमहान्स्वनः ॥
anāhatā dundubhayo vinedurmaghaniḥsvanāḥ | sādhusādhviti cākāśe babhūva sumahānsvanaḥ
बिना बजाए ही दुन्दुभियाँ बादलों के समान गर्जन करने लगीं, और आकाश में "साधु, साधु" की बड़ी ध्वनि गूँज उठी।
श्लोक 16 (14.81.16)
उत्थाय च महाबाहुः पर्याश्वस्तो धनंजयः । बभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ॥
utthāya ca mahābāhuḥ paryāśvasto dhanaṃjayaḥ | babhruvāhanamāliṅgya samājighrata mūrdhani
महाबाहु धनंजय उठकर पूर्णतः आश्वस्त हुए और उन्होंने बभ्रुवाहन को गले लगाकर उसका मस्तक सूँघा।
श्लोक 17 (14.81.17)
ददर्श चापि दूरेऽस्य मातरं शोककर्शिताम् । उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततोऽपृच्छद्धनंजयः ॥
dadarśa cāpi dūre'sya mātaraṃ śokakarśitām | ulūpyā saha tiṣṭhantīṃ tato'pṛcchaddhanaṃjayaḥ
उन्होंने कुछ दूरी पर शोक से दुबली हुई उसकी माता को उलूपी के साथ खड़ी देखा; तब धनंजय ने पूछा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 18 (14.81.18)
किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मयहर्षवत् । रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ॥
kimidaṃ lakṣyate sarvaṃ śokavismayaharṣavat | raṇājiramamitraghna yadi jānāsi śaṃsa me
"रणभूमि में यह सब शोक, विस्मय और हर्ष से भरा क्यों दिखाई देता है? हे अमित्रघ्न, यदि जानते हो तो मुझे बताओ।
श्लोक 19 (14.81.19)
जननी च किमर्थं ते रणभूमिमुपागता । नागेन्द्रदुहिता चेयमुलूपी किमिहागता ॥
jananī ca kimarthaṃ te raṇabhūmimupāgatā | nāgendraduhitā ceyamulūpī kimihāgatā
तुम्हारी माता रणभूमि में किसलिए आई है? और नागराज की यह पुत्री उलूपी यहाँ क्यों आई है?
श्लोक 20 (14.81.20)
जानाम्यहमिदं युद्धं त्वया मद्वचनात्कृतम् । स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम् ॥
jānāmyahamidaṃ yuddhaṃ tvayā madvacanātkṛtam | strīṇāmāgamane hetumahamicchāmi veditum
मैं जानता हूँ कि यह युद्ध तुमने मेरे कहने से किया है; पर इन स्त्रियों के आने का कारण मैं जानना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (14.81.21)
तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा । प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामिति ॥
tamuvāca tathā pṛṣṭo maṇipūrapatistadā | prasādya śirasā vidvānulūpī pṛcchyatāmiti
इस प्रकार पूछे जाने पर विद्वान् मणिपूर-नरेश ने सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा, "उलूपी से पूछा जाए।"