आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 82
उलूपी द्वारा वसुओं के शाप का वर्णन; अर्जुन का प्रस्थान
अर्जुन पूछते हैं कि स्त्रियाँ रणभूमि में क्यों आई हैं। उलूपी बताती है कि अर्जुन ने शिखण्डी की आड़ लेकर भीष्म को मारा था, इसलिए वसु और गङ्गा उन्हें शाप देने को उद्यत थे; उसके पिता की प्रार्थना पर वसुओं ने कहा कि उनका पुत्र उन्हें युद्ध में गिराएगा, इससे वे शाप से मुक्त होंगे। अर्जुन प्रसन्न होकर बभ्रुवाहन को दोनों माताओं सहित अश्वमेध में आने को कहते हैं, दीक्षा के कारण मणलूर में प्रवेश से इनकार करते हैं और आगे चल पड़ते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (14.82.1)
किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि । मणलूरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे ॥
kimāgamanakṛtyaṃ te kauravyakulanandini | maṇalūrapatermātustathaiva ca raṇājire
"हे कौरव्य-कुल को आनन्द देने वाली, तुम्हारे और मणलूर-नरेश की माता के इस रणभूमि में आने का क्या प्रयोजन है?
श्लोक 2 (14.82.2)
कच्चित्कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे । मम वा चपलापाङ्गि कच्चित्त्वं शुभमिच्छसि ॥
kaccitkuśalakāmāsi rājño'sya bhujagātmaje | mama vā capalāpāṅgi kaccittvaṃ śubhamicchasi
हे नागकन्या, क्या तुम इस राजा का कुशल चाहती हो? और हे चञ्चल नेत्रों वाली, क्या तुम मेरा भी हित चाहती हो?
श्लोक 3 (14.82.3)
कच्चित्ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने । अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः ॥
kaccitte pṛthulaśroṇi nāpriyaṃ priyadarśane | akārṣamahamajñānādayaṃ vā babhruvāhanaḥ
हे विशाल कटि वाली, प्रियदर्शने! आशा है कि मुझसे या इस बभ्रुवाहन से अज्ञानवश तुम्हारा कोई अप्रिय कार्य नहीं हुआ।
श्लोक 4 (14.82.4)
कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी । चित्राङ्गदा वरारोहा नापराध्यति किञ्चन ॥
kaccinnu rājaputrī te sapatnī caitravāhanī | citrāṅgadā varārohā nāparādhyati kiñcana
और आशा है कि तुम्हारी सपत्नी, चित्रवाहन की सुन्दर कटि वाली राजकुमारी चित्राङ्गदा, तुम्हारे प्रति कोई अपराध नहीं करती।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (14.82.5)
तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्त्यथ । न मे त्वमपराद्धोसि न हि मे बभ्रुवाहनः । न जनित्री तथाऽस्येयं मम या प्रेष्यवत्स्थिता ॥
tamuvācoragapaterduhitā prahasantyatha | na me tvamaparāddhosi na hi me babhruvāhanaḥ | na janitrī tathā'syeyaṃ mama yā preṣyavatsthitā
तब नागराज की पुत्री उलूपी ने हँसते हुए उनसे कहा, "तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया, न बभ्रुवाहन ने; और न इसकी यह माता ही, जो मेरी दासी की भाँति खड़ी है।
उलूप्युवाच
श्लोक 6 (14.82.6)
श्रूयतां यद्यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम् । न मे कोपस्त्वया कार्यः शिरसा त्वां प्रसादये ॥
śrūyatāṃ yadyathā cedaṃ mayā sarvaṃ viceṣṭitam | na me kopastvayā kāryaḥ śirasā tvāṃ prasādaye
मैंने यह सब जो और जिस कारण किया, उसे सुनो। तुम मुझ पर क्रोध न करो; मैं सिर झुकाकर तुम्हें मनाती हूँ।
श्लोक 7 (14.82.7)
त्वत्प्रियार्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मया विभो । यत्तच्छृणु महाबाहो निखिलेन धनंजय ॥
tvatpriyārthaṃ hi kauravya kṛtametanmayā vibho | yattacchṛṇu mahābāho nikhilena dhanaṃjaya
हे कौरव्य, हे विभो! यह सब मैंने तुम्हारे प्रिय के लिए किया है। हे महाबाहु धनंजय, उसे पूरा सुनो।
श्लोक 8 (14.82.8)
महाभारतयुद्धे यत्त्वया शान्तनवो नृपः । अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृतिः कृता ॥
mahābhāratayuddhe yattvayā śāntanavo nṛpaḥ | adharmeṇa hataḥ pārtha tasyaiṣā niṣkṛtiḥ kṛtā
हे पार्थ, महाभारत-युद्ध में तुमने राजा शान्तनु के पुत्र भीष्म को अधर्म से मारा था; उसी का यह प्रायश्चित्त किया गया है।
श्लोक 9 (14.82.9)
न हि भीष्मस्त्वया वीर युद्ध्यमानो हि पातितः । शिखण्डिना तु संयुक्तस्तमाश्रित्य हतस्त्वया ॥
na hi bhīṣmastvayā vīra yuddhyamāno hi pātitaḥ | śikhaṇḍinā tu saṃyuktastamāśritya hatastvayā
हे वीर, भीष्म तुम्हारे द्वारा युद्ध करते हुए नहीं गिराए गए थे; वे शिखण्डी से उलझे हुए थे, और उसी की आड़ लेकर तुमने उन्हें मारा।
श्लोक 10 (14.82.10)
तस्य शान्तिमकृत्वा त्वं त्यजेथा यदि जीवितम् । कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरये ध्रुवम् । एषा तु विहिता शान्तिः पुत्राद्यां प्राप्तवानसि ॥
tasya śāntimakṛtvā tvaṃ tyajethā yadi jīvitam | karmaṇā tena pāpena patethā niraye dhruvam | eṣā tu vihitā śāntiḥ putrādyāṃ prāptavānasi
यदि तुम उसका प्रायश्चित्त किए बिना प्राण त्याग देते, तो उस पाप-कर्म के कारण निश्चय ही नरक में गिरते। किन्तु यह जो विधान किया हुआ प्रायश्चित्त है, उसे तुमने पुत्र के हाथ से प्राप्त किया है,
श्लोक 11 (14.82.11)
वसुभिर्वसुधापाल गङ्गया च महामते । पुरा हि श्रुतमेतत्ते वसुभिः कथितं मया ॥
vasubhirvasudhāpāla gaṅgayā ca mahāmate | purā hi śrutametatte vasubhiḥ kathitaṃ mayā
जो वसुओं और गङ्गा द्वारा विहित है, हे बुद्धिमान् पृथ्वीपाल! यह बात मैंने बहुत पहले वसुओं से सुनी थी और अब तुम्हें कह दी।
श्लोक 12 (14.82.12)
गङ्गायास्तीरमाश्रित्य हते शान्तनवे नृप । आप्लुत्य देवा वसवः समेत्य च महानदीम् । इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा ॥
gaṅgāyāstīramāśritya hate śāntanave nṛpa | āplutya devā vasavaḥ sametya ca mahānadīm | idamūcurvaco ghoraṃ bhāgīrathyā mate tadā
शान्तनु-पुत्र के मारे जाने पर वसु देवता गङ्गा के तट पर आए, स्नान किया और महानदी के पास एकत्र होकर भागीरथी की सम्मति से उन्होंने ये भयंकर वचन कहे।
श्लोक 13 (14.82.13)
एष शान्तनवो भीष्मो निहतः सव्यसाचिना । अयुद्ध्यमानः सङ्ग्रामे संसक्तोऽन्येन भामिनि ॥
eṣa śāntanavo bhīṣmo nihataḥ savyasācinā | ayuddhyamānaḥ saṅgrāme saṃsakto'nyena bhāmini
"हे भामिनी, शान्तनु-पुत्र भीष्म सव्यसाची के द्वारा तब मारे गए जब वे युद्ध नहीं कर रहे थे, किसी दूसरे से उलझे हुए थे।
श्लोक 14 (14.82.14)
तदनेनानुषङ्गेण वयमद्य धनञ्जयम् । शापेन योजयामेति तथाऽस्त्विति च साऽब्रवीत् ॥
tadanenānuṣaṅgeṇa vayamadya dhanañjayam | śāpena yojayāmeti tathā'stviti ca sā'bravīt
इस कारण हम आज धनंजय को शाप से बाँध दें।" इस पर उसने कहा, "ऐसा ही हो।"
श्लोक 15 (14.82.15)
तदहं पितुरावेद्य प्रविश्य व्यथितेन्द्रिया । अभवं स च तच्छ्रुत्वा विषादमगमत्परम् ॥
tadahaṃ piturāvedya praviśya vyathitendriyā | abhavaṃ sa ca tacchrutvā viṣādamagamatparam
मैंने यह बात अपने पिता को बताई, और पास जाकर व्यथित इन्द्रियों वाली हो गई; उसे सुनकर वे भी बहुत विषाद में पड़ गए।
श्लोक 16 (14.82.16)
पिता तु मे वसून्गत्वा त्वदर्थे समयाचत । पुनः पुनः प्रसाद्यैतांस्त एनमिदमब्रुवन् ॥
pitā tu me vasūngatvā tvadarthe samayācata | punaḥ punaḥ prasādyaitāṃsta enamidamabruvan
मेरे पिता ने वसुओं के पास जाकर तुम्हारे लिए प्रार्थना की; उन्हें बार-बार मनाने पर उन्होंने उनसे यह कहा।
श्लोक 17 (14.82.17)
पुत्रस्तस्य महाभाग मणलूरेश्वरो युवा । स एनं रणमध्यस्थः शरैः पातयिता भुवि ॥
putrastasya mahābhāga maṇalūreśvaro yuvā | sa enaṃ raṇamadhyasthaḥ śaraiḥ pātayitā bhuvi
"हे महाभाग! उसका पुत्र, मणलूर का युवा स्वामी, रण के बीच खड़े उसे बाणों से भूमि पर गिरा देगा।
श्लोक 18 (14.82.18)
एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति । गच्छेति वसुभिश्चोक्तो मम चेदं शशंस सः ॥
evaṃ kṛte sa nāgendra muktaśāpo bhaviṣyati | gaccheti vasubhiścokto mama cedaṃ śaśaṃsa saḥ
ऐसा हो जाने पर, हे नागेन्द्र, वह शाप से मुक्त हो जाएगा। जाओ।" वसुओं के यह कहने पर उन्होंने मुझे यह बताया।
श्लोक 19 (14.82.19)
तच्छ्रुत्वा त्वं मया तस्माच्छापादसि विमोक्षितः । न हि त्वां देवराजोऽपि समरेषु पराजयेत् ॥
tacchrutvā tvaṃ mayā tasmācchāpādasi vimokṣitaḥ | na hi tvāṃ devarājo'pi samareṣu parājayet
यह सुनकर मैंने तुम्हें उस शाप से छुड़ा दिया। देवराज इन्द्र भी युद्धों में तुम्हें पराजित नहीं कर सकता।
श्लोक 20 (14.82.20)
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्तेनेहासि पराजितः । न हि दोषो मम मतः कथं वा मन्यसे विभो ॥
ātmā putraḥ smṛtastasmāttenehāsi parājitaḥ | na hi doṣo mama mataḥ kathaṃ vā manyase vibho
पुत्र अपना ही आत्मा माना गया है, इसीलिए तुम यहाँ उससे पराजित हुए। मैं इसमें अपना दोष नहीं मानती। अथवा हे प्रभो, तुम क्या मानते हो?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (14.82.21)
इत्येवमुक्तो विजयः प्रसन्नात्माऽब्रवीदिदम् । सर्वं मे सुप्रियं देवि यदेतत्कृतवत्यसि ॥
ityevamukto vijayaḥ prasannātmā'bravīdidam | sarvaṃ me supriyaṃ devi yadetatkṛtavatyasi
ऐसा कहे जाने पर प्रसन्नचित्त विजय ने कहा, "हे देवि, तुमने जो कुछ किया है, वह सब मुझे बहुत प्रिय है।"
श्लोक 22 (14.82.22)
इत्युक्त्वा सोऽब्रवीत्पुत्रं मणलूरपतिं जयः । चित्राङ्गदायाः शृण्वन्त्याः कौरव्यदुहितुस्तदा ॥
ityuktvā so'bravītputraṃ maṇalūrapatiṃ jayaḥ | citrāṅgadāyāḥ śṛṇvantyāḥ kauravyaduhitustadā
ऐसा कहकर जय (अर्जुन) ने तब अपने पुत्र मणलूर-नरेश से कहा, जबकि चित्राङ्गदा और कौरव्य की पुत्री उलूपी सुन रही थीं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 23 (14.82.23)
युधिष्ठिरस्याश्वमेधः परिचैत्रीं भविष्यति । तत्रागच्छेः सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नृप ॥
yudhiṣṭhirasyāśvamedhaḥ paricaitrīṃ bhaviṣyati | tatrāgaccheḥ sahāmātyo mātṛbhyāṃ sahito nṛpa
"आगामी चैत्री पूर्णिमा पर युधिष्ठिर का अश्वमेध होगा। हे राजन्, तुम मन्त्रियों और दोनों माताओं के साथ वहाँ आना।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (14.82.24)
इत्येवमुक्तः पार्थेन स राजा बभ्रुवाहनः । उवाच पितरं धीमानिदमस्राविलेक्षणः ॥
ityevamuktaḥ pārthena sa rājā babhruvāhanaḥ | uvāca pitaraṃ dhīmānidamasrāvilekṣaṇaḥ
पार्थ के ऐसा कहने पर बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन ने आँसुओं से भरी आँखों से पिता से कहा।
बभ्रुवाहन उवाच
श्लोक 25 (14.82.25)
उपयास्यामि धर्मज्ञ भवतः शासनादहम् । अश्वमेधे महायज्ञे द्विजातिपरिवेषकः ॥
upayāsyāmi dharmajña bhavataḥ śāsanādaham | aśvamedhe mahāyajñe dvijātipariveṣakaḥ
"हे धर्मज्ञ, मैं आपकी आज्ञा से अश्वमेध महायज्ञ में आऊँगा और द्विजों को परोसने का कार्य करूँगा।
श्लोक 26 (14.82.26)
मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम् । भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ माभूत्तेऽत्र विचारणा ॥
mama tvanugrahārthāya praviśasva puraṃ svakam | bhāryābhyāṃ saha dharmajña mābhūtte'tra vicāraṇā
और मुझ पर कृपा करने के लिए आप दोनों पत्नियों के साथ अपने ही नगर में प्रवेश कीजिए, हे धर्मज्ञ; इसमें आपको कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 27 (14.82.27)
उषित्वेह निशामेकां सुखं स्वभवने प्रभो । पुनरश्वानुगमनं कर्तासि जयतांवर ॥
uṣitveha niśāmekāṃ sukhaṃ svabhavane prabho | punaraśvānugamanaṃ kartāsi jayatāṃvara
हे प्रभो, यहाँ अपने भवन में एक रात सुखपूर्वक रहकर आप फिर अश्व के पीछे चल सकते हैं, हे विजेताओं में श्रेष्ठ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (14.82.28)
इत्युक्तः स तु पुत्रेण तदा वानरकेतनः । स्मयन्प्रोवाच कौन्तेयस्तदा चित्राङ्गदासुतम् ॥
ityuktaḥ sa tu putreṇa tadā vānaraketanaḥ | smayanprovāca kaunteyastadā citrāṅgadāsutam
पुत्र के इस प्रकार कहने पर वानर-ध्वज कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मुस्कराते हुए चित्राङ्गदा के पुत्र से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 29 (14.82.29)
विदितं ते महाबाहो यथा दीक्षां चराम्यहम् । न स तावत्प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पृथुलोचन ॥
viditaṃ te mahābāho yathā dīkṣāṃ carāmyaham | na sa tāvatpravekṣyāmi puraṃ te pṛthulocana
"हे महाबाहो, तुम जानते हो कि मैं दीक्षा का व्रत निभा रहा हूँ; इसलिए हे विशाल नेत्रों वाले, मैं अभी तुम्हारे नगर में प्रवेश नहीं करूँगा।
श्लोक 30 (14.82.30)
यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि न स्थानं विद्यते मम ॥
yathākāmaṃ vrajatyeṣa yajñiyāśvo nararṣabha | svasti te'stu gamiṣyāmi na sthānaṃ vidyate mama
हे नरश्रेष्ठ, यह यज्ञ-अश्व अपनी इच्छा से जहाँ चाहे जाता है। तुम्हारा कल्याण हो; मैं चलूँगा, मेरे ठहरने का कोई स्थान नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (14.82.31)
स तत्र विधिवत्तेन पूजितः पाकशासनिः । भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्रायाद्भरतसत्तमः ॥
sa tatra vidhivattena pūjitaḥ pākaśāsaniḥ | bhāryābhyāmabhyanujñātaḥ prāyādbharatasattamaḥ
वहाँ उसके द्वारा विधिपूर्वक सम्मानित होकर और दोनों पत्नियों से अनुमति पाकर इन्द्रपुत्र भरतश्रेष्ठ अर्जुन आगे चल पड़े।