आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 83
अर्जुन द्वारा मगधराज मेघसन्धि की पराजय
यज्ञ का घोड़ा हस्तिनापुर की ओर लौटता है और उसके पीछे चलते अर्जुन राजगृह पहुँचते हैं, जहाँ सहदेव का पुत्र बालक मेघसन्धि उन्हें युद्ध के लिए ललकारता है। अर्जुन उसके बाण, धनुष, रथ और गदा नष्ट कर देते हैं, पर युधिष्ठिर के आदेश के कारण राजाओं का वध न करने से उसे जीवित छोड़ देते हैं। मेघसन्धि हार मान लेता है और अर्जुन उसे अश्वमेध में आने का निमन्त्रण देते हैं; फिर घोड़ा समुद्र-तट से वङ्ग, पुण्ड्र और केरल होकर चलता है और अर्जुन अनेक म्लेच्छ सेनाओं को जीतते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.83.1)
स तु वाजी समुद्रान्तां पर्येत्य वसुधामिमाम् । निवृत्तोऽभिमुखो राजन्येन वारणसाह्वयम् ॥
sa tu vājī samudrāntāṃ paryetya vasudhāmimām | nivṛtto'bhimukho rājanyena vāraṇasāhvayam
समुद्र तक फैली हुई इस सारी पृथ्वी का चक्कर लगाकर वह घोड़ा, हे राजन्, लौट पड़ा और उसी ओर चला जिधर हाथियों के नाम वाला नगर हस्तिनापुर है।
श्लोक 2 (14.83.2)
अनुगच्छंश्च तुरगं निवृत्तोऽथ किरीटभृत् । यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा ॥
anugacchaṃśca turagaṃ nivṛtto'tha kirīṭabhṛt | yadṛcchayā samāpede puraṃ rājagṛhaṃ tadā
लौटते हुए घोड़े के पीछे चलते हुए किरीटधारी अर्जुन संयोग से राजगृह नगर में जा पहुँचे।
श्लोक 3 (14.83.3)
तमभ्याशगतं दृष्ट्वा सहदेवात्मजः प्रभो । क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समरायाजुहाव ह ॥
tamabhyāśagataṃ dṛṣṭvā sahadevātmajaḥ prabho | kṣatradharme sthito vīraḥ samarāyājuhāva ha
उन्हें पास आया देखकर, हे प्रभो, क्षत्रिय-धर्म में स्थित सहदेव के वीर पुत्र ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।
श्लोक 4 (14.83.4)
ततः पुरात्स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली । मेघसन्धिः पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत् ॥
tataḥ purātsa niṣkramya rathī dhanvī śarī talī | meghasandhiḥ padātiṃ taṃ dhanaṃjayamupādravat
तब मेघसन्धि रथ पर सवार होकर, धनुष, बाण और दस्ताना धारण किए नगर से बाहर निकला और पैदल खड़े धनंजय पर टूट पड़ा।
श्लोक 5 (14.83.5)
आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम् । बालभावान्महाराज प्रोवाचेदं न कौशलात् ॥
āsādya ca mahātejā meghasandhirdhanaṃjayam | bālabhāvānmahārāja provācedaṃ na kauśalāt
धनंजय के पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धि ने, हे महाराज, बालपन के कारण, किसी कौशल से नहीं, यह बात कही।
मेघसन्धिरुवाच
श्लोक 6 (14.83.6)
किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे ॥
kimayaṃ cāryate vājī strīmadhya iva bhārata | hayamenaṃ hariṣyāmi prayatasva vimokṣaṇe
"हे भारत, यह घोड़ा स्त्रियों के बीच रखे हुए की तरह क्यों रक्षित किया जा रहा है? मैं इस घोड़े को हर ले जाऊँगा; इसे छुड़ाने का प्रयत्न करो।
श्लोक 7 (14.83.7)
अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम । करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहरामि च ॥
adattānunayo yuddhe yadi tvaṃ pitṛbhirmama | kariṣyāmi tavātithyaṃ prahara praharāmi ca
यदि मेरे पूर्वजों ने युद्ध में तुम्हें अब तक सबक नहीं सिखाया, तो मैं तुम्हारा आतिथ्य करूँगा; तुम प्रहार करो, मैं भी प्रहार करता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (14.83.8)
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डवः । विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम् ॥
ityuktaḥ pratyuvācainaṃ prahasanniva pāṇḍavaḥ | vighnakartā mayā vārya iti me vratamāhitam
ऐसा कहे जाने पर पाण्डव ने मानो हँसते हुए उत्तर दिया, "जो विघ्न डाले उसे मुझे रोकना ही है, यही मैंने व्रत लिया है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 9 (14.83.9)
भ्रात्रा ज्येष्ठेन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम् । प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ॥
bhrātrā jyeṣṭhena nṛpate tavāpi viditaṃ dhruvam | praharasva yathāśakti na manyurvidyate mama
हे राजन्, मेरे बड़े भाई ने यह बात निश्चय ही तुम्हें भी बता दी होगी। तुम अपनी शक्ति भर प्रहार करो; मुझे तुम पर क्रोध नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (14.83.10)
इत्युक्तः प्राहरत्पूर्वं पाण्डवं मगधेश्वरः । किरञ्शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ॥
ityuktaḥ prāharatpūrvaṃ pāṇḍavaṃ magadheśvaraḥ | kirañśarasahasrāṇi varṣāṇīva sahasradṛk
यह सुनकर मगध के स्वामी ने पहले पाण्डव पर प्रहार किया; वह सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र की भाँति वर्षों तक होने वाली वर्षा के समान हज़ारों बाण बरसा रहा था।
श्लोक 11 (14.83.11)
ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितैः शरैः । चकार मोघांस्तान्बाणान्सयत्नान्भरतर्षभ ॥
tato gāṇḍīvabhṛcchūro gāṇḍīvaprahitaiḥ śaraiḥ | cakāra moghāṃstānbāṇānsayatnānbharatarṣabha
तब गाण्डीवधारी वीर अर्जुन ने, हे भरतश्रेष्ठ, गाण्डीव से छोड़े हुए बाणों से यत्नपूर्वक चलाए गए उन बाणों को व्यर्थ कर दिया।
श्लोक 12 (14.83.12)
स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतनः । शरान्मुमोच ज्वलितान्दीप्तास्यानिव पन्नगान् ॥
sa moghaṃ tasya bāṇaughaṃ kṛtvā vānaraketanaḥ | śarānmumoca jvalitāndīptāsyāniva pannagān
उसकी बाण-वर्षा को व्यर्थ करके वानर-ध्वज वाले अर्जुन ने जलते हुए, अग्नि-सी लपटों वाले मुखों के सर्पों जैसे बाण छोड़े।
श्लोक 13 (14.83.13)
ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च । अन्येषु च रथाङ्गेषु न शरीरे न सारथौ ॥
dhvaje patākādaṇḍeṣu rathe yantre hayeṣu ca | anyeṣu ca rathāṅgeṣu na śarīre na sārathau
वे बाण उसकी ध्वजा, पताका के दण्डों, रथ और उसके यन्त्रों, घोड़ों तथा रथ के अन्य अंगों पर लगे, पर न उसके शरीर पर लगे, न सारथि पर।
श्लोक 14 (14.83.14)
संरक्ष्यमाणः पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना । मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ॥
saṃrakṣyamāṇaḥ pārthena śarīre savyasācinā | manyamānaḥ svavīryaṃ tanmāgadhaḥ prāhiṇoccharān
सव्यसाची पार्थ ने उसके शरीर को बचाए रखा, पर उसे अपना ही पराक्रम मानता हुआ वह मागध बाण चलाता रहा।
श्लोक 15 (14.83.15)
ततो गाण्डीवधन्वा तु मागधेन भृशाहतः । बभौ वसन्तसमये पलासः पुष्पितो यथा ॥
tato gāṇḍīvadhanvā tu māgadhena bhṛśāhataḥ | babhau vasantasamaye palāsaḥ puṣpito yathā
तब मागध के भारी प्रहार से घायल हुए गाण्डीवधारी अर्जुन वसन्त ऋतु में फूले हुए पलाश के वृक्ष की भाँति शोभित हुए।
श्लोक 16 (14.83.16)
अवध्यमानः सोऽभ्यघ्नन्मागधः पाण्डवर्षभम् । तेन तस्थौ स कौरव्य लोकवीरस्य दर्शने ॥
avadhyamānaḥ so'bhyaghnanmāgadhaḥ pāṇḍavarṣabham | tena tasthau sa kauravya lokavīrasya darśane
उस पर प्रहार न किए जाने से मागध पाण्डवश्रेष्ठ को मारता ही रहा, और इसी कारण, हे कौरव्य, वह लोकवीर अर्जुन की दृष्टि के सामने टिका रहा।
श्लोक 17 (14.83.17)
सव्यसाची तु संक्रुद्धो विकृष्य बलवद्धनुः । हयांश्चकार निर्जीवान्सारथेश्च शिरोऽहरत् ॥
savyasācī tu saṃkruddho vikṛṣya balavaddhanuḥ | hayāṃścakāra nirjīvānsāratheśca śiro'harat
तब सव्यसाची ने क्रुद्ध होकर अपना बलवान् धनुष खींचा, उसके घोड़ों को प्राणहीन कर दिया और सारथि का सिर काट डाला।
श्लोक 18 (14.83.18)
धनुश्चास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह । हस्तावापं पताकां च ध्वजं चास्यन्यपातयत् ॥
dhanuścāsya mahaccitraṃ kṣureṇa pracakarta ha | hastāvāpaṃ patākāṃ ca dhvajaṃ cāsyanyapātayat
उसने छुरे जैसे फल वाले बाण से राजा का बड़ा और सुन्दर धनुष काट डाला तथा उसके भुजबन्ध, पताका और ध्वज को भी गिरा दिया।
श्लोक 19 (14.83.19)
स राजा व्यथितो व्यश्वो विधनुर्हतसारथिः । गदामादाय कौन्तेयमभिद्रद्राव वेगवान् ॥
sa rājā vyathito vyaśvo vidhanurhatasārathiḥ | gadāmādāya kaunteyamabhidradrāva vegavān
वह राजा घबराया हुआ, घोड़ों, धनुष और सारथि से रहित होकर, गदा लेकर वेग से कुन्तीपुत्र पर झपटा।
श्लोक 20 (14.83.20)
तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् । शरैश्चकर्त बहुधा बहुभिर्गृध्रवाजितैः ॥
tasyāpatata evāśu gadāṃ hemapariṣkṛtām | śaraiścakarta bahudhā bahubhirgṛdhravājitaiḥ
उसके ऊपर गिरती हुई उस सोने से सजी गदा को अर्जुन ने गीध के पंखों वाले अनेक बाणों से शीघ्र ही कई टुकड़ों में काट दिया।
श्लोक 21 (14.83.21)
सा गदा शकलीभूता विशीर्णमणिबन्धना । व्याली विमुच्यमानेन पपात धरणीतले ॥
sā gadā śakalībhūtā viśīrṇamaṇibandhanā | vyālī vimucyamānena papāta dharaṇītale
टुकड़े-टुकड़े हुई, मणियों से जड़ी उसकी मूठ बिखर गई थी, और वह गदा छोड़ी गई सर्पिणी की तरह धरती पर गिर पड़ी।
श्लोक 22 (14.83.22)
विरथं विधनुष्कं च गदया परिवर्जितम् । नैच्छत्ताडयितुं धीमानर्जुनः समराग्रणीः ॥
virathaṃ vidhanuṣkaṃ ca gadayā parivarjitam | naicchattāḍayituṃ dhīmānarjunaḥ samarāgraṇīḥ
उसे रथहीन, धनुषहीन और गदा से वंचित देखकर युद्ध में अग्रणी बुद्धिमान् अर्जुन ने उस पर प्रहार करना नहीं चाहा।
श्लोक 23 (14.83.23)
तत एनं विमनसं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमब्रवीत्कपिकेतनः ॥
tata enaṃ vimanasaṃ kṣatradharme vyavasthitam | sāntvapūrvamidaṃ vākyamabravītkapiketanaḥ
तब क्षत्रिय-धर्म में स्थित रहते हुए भी उसे उदास देखकर कपिध्वज अर्जुन ने उससे सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 24 (14.83.24)
पर्याप्तः क्षत्रधर्मोऽयं दर्शितः पुत्र गम्यताम् । बह्वेतत्समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव ॥
paryāptaḥ kṣatradharmo'yaṃ darśitaḥ putra gamyatām | bahvetatsamare karma tava bālasya pārthiva
"क्षत्रिय-धर्म का पालन तुमने पर्याप्त दिखा दिया; पुत्र, अब जाओ। हे राजन्, तुम जैसे बालक के लिए युद्ध में यह कर्म बहुत है।
श्लोक 25 (14.83.25)
युधिष्ठिरस्य संदेशो न हन्तव्या नृपा इति । तेन जीवसि राजंस्त्वमपराद्धोऽपि मे रणे ॥
yudhiṣṭhirasya saṃdeśo na hantavyā nṛpā iti | tena jīvasi rājaṃstvamaparāddho'pi me raṇe
युधिष्ठिर का आदेश है कि राजाओं का वध न किया जाए। इसी से, हे राजन्, युद्ध में मेरे प्रति अपराध करने पर भी तुम जीवित हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (14.83.26)
इति मत्वा तदाऽऽत्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः । तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजयत् ॥
iti matvā tadā''tmānaṃ pratyādiṣṭaṃ sma māgadhaḥ | tathyamityabhigamyainaṃ prāñjaliḥ pratyapūjayat
अपने को इस प्रकार लौटा दिया गया मानकर मागध ने इसे सच माना और हाथ जोड़कर उनके पास जाकर उनका सम्मान किया।
मेघसन्धिरुवाच
श्लोक 27 (14.83.27)
परिजितोस्मि भद्रं ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे । यद्यत्कृत्यं मया तेऽद्य तद्ब्रूहि कृतमेव तु ॥
parijitosmi bhadraṃ te nāhaṃ yoddhumihotsahe | yadyatkṛtyaṃ mayā te'dya tadbrūhi kṛtameva tu
"मैं हार गया हूँ, आपका कल्याण हो। अब मैं यहाँ युद्ध नहीं कर सकता। आज मुझे आपके लिए जो कुछ करना है, वह कहिए; वह हुआ ही समझिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (14.83.28)
तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमब्रवीत् । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥
tamarjunaḥ samāśvāsya punarevedamabravīt | āgantavyaṃ parāṃ caitrīmaśvamedhe nṛpasya naḥ
अर्जुन ने उसे आश्वासन देकर फिर यह कहा, "हमारे राजा के अश्वमेध यज्ञ में तुम्हें आगामी चैत्र की पूर्णिमा पर आना होगा।"
श्लोक 29 (14.83.29)
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पूजयमास तं हयम् । फल्गुनं च युधिश्रेष्ठं विधिवत्सहदेवजः ॥
ityuktaḥ sa tathetyuktvā pūjayamāsa taṃ hayam | phalgunaṃ ca yudhiśreṣṭhaṃ vidhivatsahadevajaḥ
ऐसा कहे जाने पर सहदेव के पुत्र ने "ऐसा ही हो" कहकर घोड़े का और योद्धाओं में श्रेष्ठ फल्गुन अर्जुन का विधिपूर्वक सत्कार किया।
श्लोक 30 (14.83.30)
ततो यथेष्टमगमत्पुनरेव स कौरवः । ततः समुद्रतीरेण वङ्गान्पुण्ड्रान्सकेरलान् ॥
tato yatheṣṭamagamatpunareva sa kauravaḥ | tataḥ samudratīreṇa vaṅgānpuṇḍrānsakeralān
तब वह कुरुवीर फिर अपनी इच्छा से आगे बढ़ा, और वहाँ से समुद्र के किनारे-किनारे वङ्ग, पुण्ड्र और केरल देशों से होकर गया;
श्लोक 31 (14.83.31)
तत्रतत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकशः । विजिग्ये धनुषा राजन्गाण्डीवेन धनंजयः ॥
tatratatra ca bhūrīṇi mlecchasainyānyanekaśaḥ | vijigye dhanuṣā rājangāṇḍīvena dhanaṃjayaḥ
और स्थान-स्थान पर, हे राजन्, धनंजय ने गाण्डीव धनुष से म्लेच्छों की अनेक सेनाओं को जीता।