आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 84
घोड़े का दक्षिण और पश्चिम में भ्रमण और गान्धार पहुँचना
मगध से सम्मानित होकर अर्जुन घोड़े को दक्षिण दिशा में विचरने देते हैं। चेदि देश के शरभ से सम्मान पाकर वे काशी, अङ्ग, कोसल और किरातों के देशों से गुजरते हैं, दशार्ण के चित्राङ्गद, निषादों के बीच एकलव्य के पुत्र तथा द्रविड़, आन्ध्र, माहिषक और कोल्लगिरेयों से युद्ध करते हैं। घोड़ा द्वारका पहुँचता है, जहाँ उग्रसेन और वसुदेव अर्जुन का स्वागत करते हैं; फिर वह समुद्र के साथ-साथ पश्चिम में और पंजाब होकर गान्धार पहुँचता है, जहाँ शकुनि का पुत्र उनसे युद्ध करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.84.1)
मागधेनार्चितो राजन्पाण्डवः श्वेतवाहनः । दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥
māgadhenārcito rājanpāṇḍavaḥ śvetavāhanaḥ | dakṣiṇāṃ diśamāsthāya cārayāmāsa taṃ hayam
मागध से सम्मानित होकर श्वेत घोड़ों वाले पाण्डव अर्जुन, हे राजन्, दक्षिण दिशा की ओर मुड़े और उन्होंने उस घोड़े को वहाँ विचरने दिया।
श्लोक 2 (14.84.2)
ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली । आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥
tataḥ sa punarāvartya hayaḥ kāmacaro balī | āsasāda purīṃ ramyāṃ cedīnāṃ śuktisāhvayām
तब इच्छानुसार विचरने वाला वह बलवान् घोड़ा फिर लौटकर चेदियों की सुन्दर नगरी शुक्ति के पास पहुँचा।
श्लोक 3 (14.84.3)
शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः । युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥
śarabheṇārcitastatra śiśupālasutena saḥ | yuddhapūrvaṃ tadā tena pūjayā ca mahābalaḥ
वहाँ महाबली अर्जुन का शिशुपाल के पुत्र शरभ ने पहले युद्ध करके और फिर पूजा करके सत्कार किया।
श्लोक 4 (14.84.4)
ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः । काशीनङ्गान्कोसलांश्च किरातानाथ तङ्गणान् ॥
tato'rcito yayau rājaṃstadā sa turagottamaḥ | kāśīnaṅgānkosalāṃśca kirātānātha taṅgaṇān
तब वहाँ सम्मानित होकर वह उत्तम घोड़ा, हे राजन्, काशी, अङ्ग, कोसल, किरात और फिर तङ्गण देशों में गया।
श्लोक 5 (14.84.5)
पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः । पुनरावृत्त्य कौन्तेयो दशार्णानगमत्तदा ॥
pūjāṃ tatra yathānyāyaṃ pratigṛhya dhanaṃjayaḥ | punarāvṛttya kaunteyo daśārṇānagamattadā
वहाँ विधिपूर्वक पूजा स्वीकार करके कुन्तीपुत्र धनंजय लौटे और तब दशार्ण देशों में गए।
श्लोक 6 (14.84.6)
तत्र चित्राङ्गदो नाम बलवानरिमर्दनः । तेन युद्धमभूत्तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥
tatra citrāṅgado nāma balavānarimardanaḥ | tena yuddhamabhūttasya vijayasyātibhairavam
वहाँ चित्राङ्गद नाम का एक बलवान् शत्रुनाशक राजा था; उसके और विजय अर्जुन के बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 7 (14.84.7)
तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः । निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥
taṃ cāpi vaśamānīya kirīṭī puruṣarṣabhaḥ | niṣādarājño viṣayamekalavyasya jagmivān
उसे भी वश में करके पुरुषश्रेष्ठ किरीटी निषादराज एकलव्य के देश में गए।
श्लोक 8 (14.84.8)
एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा । तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं रोमहर्षणम् ॥
ekalavyasutaścainaṃ yuddhena jagṛhe tadā | tatra cakre niṣādaiḥ sa saṃgrāmaṃ romaharṣaṇam
तब एकलव्य के पुत्र ने युद्ध में उनका सामना किया, और वहाँ अर्जुन ने निषादों के साथ रोंगटे खड़े कर देने वाला संग्राम किया।
श्लोक 9 (14.84.9)
ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः । जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥
tatastamapi kaunteyaḥ samareṣvaparājitaḥ | jigāya yudhi durdharṣo yajñavighnārthamāgatam
तब युद्धों में अपराजित और दुर्धर्ष कुन्तीपुत्र ने यज्ञ में विघ्न डालने आए हुए उसको भी युद्ध में जीत लिया।
श्लोक 10 (14.84.10)
स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः । अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥
sa taṃ jitvā mahārāja naiṣādiṃ pākaśāsaniḥ | arcitaḥ prayayau bhūyo dakṣiṇaṃ salilārṇavam
उस निषाद-पुत्र को जीतकर, हे महाराज, इन्द्रपुत्र अर्जुन सम्मानित होकर फिर दक्षिण समुद्र की ओर चले।
श्लोक 11 (14.84.11)
तत्रापि द्रविडैरान्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि । तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीन्किरीटिनः ॥
tatrāpi draviḍairāndhrai raudrairmāhiṣakairapi | tathā kollagireyaiśca yuddhamāsīnkirīṭinaḥ
वहाँ भी किरीटी का द्रविड़ों, आन्ध्रों, रौद्रों, माहिषकों तथा कोल्लगिरेयों के साथ युद्ध हुआ।
श्लोक 12 (14.84.12)
तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा । तुरङ्गमवशेनाथ सुराष्ट्रानभितो ययौ । गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् ॥
tāṃścāpi vijayo jitvā nātitīvreṇa karmaṇā | turaṅgamavaśenātha surāṣṭrānabhito yayau | gokarṇamatha cāsādya prabhāsamapi jagmivān
विजय अर्जुन ने उन्हें भी बहुत कठिन परिश्रम के बिना जीत लिया; फिर घोड़े के चलने के अनुसार वे चारों ओर सुराष्ट्र देशों में गए, और गोकर्ण पहुँचकर प्रभास तक भी गए।
श्लोक 13 (14.84.13)
ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् । आससाद हयः श्रीमान्कुरुराजस्य यज्ञियः ॥
tato dvāravatīṃ ramyāṃ vṛṣṇivīrābhipālitām | āsasāda hayaḥ śrīmānkururājasya yajñiyaḥ
तब कुरुराज का वह शोभायमान यज्ञ-अश्व वृष्णि वीरों से रक्षित सुन्दर द्वारका पहुँचा।
श्लोक 14 (14.84.14)
तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः । प्रययुस्तांस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् ॥
tamunmathya hayaśreṣṭhaṃ yādavānāṃ kumārakāḥ | prayayustāṃstadā rājannugraseno nyavārayat
यादवों के किशोरों ने उस श्रेष्ठ घोड़े को पकड़ लिया और उसे लेकर चल पड़े; पर, हे राजन्, उग्रसेन ने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 15 (14.84.15)
ततः पुराद्विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा । सहितो वासुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ॥
tataḥ purādviniṣkramya vṛṣṇyandhakapatistadā | sahito vāsudevena mātulena kirīṭinaḥ
तब वृष्णियों और अन्धकों के स्वामी उग्रसेन किरीटी के मामा वसुदेव के साथ नगर से बाहर निकले।
श्लोक 16 (14.84.16)
तौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत्प्रीतिपूर्वकम् । परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ । ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ॥
tau sametya kuruśreṣṭhaṃ vidhivatprītipūrvakam | parayā bhārataśreṣṭhaṃ pūjayā samavasthitau | tatastābhyāmanujñāto yayau yena hayo gataḥ
उन दोनों ने कुरुश्रेष्ठ अर्जुन से विधिपूर्वक और प्रेम से भेंट की और उन भरतश्रेष्ठ का परम पूजा से सत्कार करते रहे; फिर उन दोनों से अनुमति पाकर अर्जुन वहीं गए जहाँ घोड़ा गया था।
श्लोक 17 (14.84.17)
ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः । क्रमेण व्यचरत्स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ॥
tataḥ sa paścimaṃ deśaṃ samudrasya tadā hayaḥ | krameṇa vyacaratsphītaṃ tataḥ pañcanadaṃ yayau
तब वह घोड़ा समुद्र के पश्चिमी प्रदेश में गया, क्रम से समृद्ध देशों में विचरता रहा और फिर पंचनद (पंजाब) में पहुँचा।
श्लोक 18 (14.84.18)
तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः । विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ॥
tasmādapi sa kauravya gandhāraviṣayaṃ hayaḥ | vicacāra yathākāmaṃ kaunteyānugatastadā
वहाँ से भी, हे कौरव्य, वह घोड़ा गान्धार देश में इच्छानुसार विचरा, और कुन्तीपुत्र उसके पीछे-पीछे चलते रहे।
श्लोक 19 (14.84.19)
ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत्किरीटिनः । घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ॥
tato gāndhārarājena yuddhamāsītkirīṭinaḥ | ghoraṃ śakuniputreṇa pūrvavairānusāriṇā
तब किरीटी का गान्धारराज, शकुनि के पुत्र, के साथ भयंकर युद्ध हुआ, जो पुराने वैर का अनुसरण कर रहा था।