आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 85
अर्जुन द्वारा गान्धारों की पराजय और शकुनिपुत्र को क्षमा
शकुनि का पुत्र विशाल सेना लेकर अर्जुन का सामना करने निकलता है। अर्जुन युधिष्ठिर का राजाओं को न मारने का आदेश दोहराते हैं, पर गान्धार योद्धा घोड़े को घेर लेते हैं और मारे जाते हैं। शकुनिपुत्र चेतावनी की अनसुनी करता है, अर्धचन्द्र बाण से उसका शिरस्त्राण उड़ा दिया जाता है और वह बाकी सेना के साथ भागता है, जबकि अर्जुन संहार करते रहते हैं। तब उसकी माता अर्घ्य लेकर निकलती है और अर्जुन को प्रसन्न करती है; अर्जुन गान्धारी के सम्मान में उसके पुत्र को छोड़ देते हैं और उसे अगली चैत्र पूर्णिमा पर अश्वमेध में आने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.85.1)
शकुनस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथः । प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः । हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना ॥
śakunastanayo vīro gāndhārāṇāṃ mahārathaḥ | pratyudyayau guḍākeśaṃ sainyena mahatā vṛtaḥ | hastyaśvarathayuktena patākādhvajamālinā
गान्धारों के महारथी वीर शकुनिपुत्र ने हाथियों, घोड़ों और रथों से युक्त, पताकाओं और ध्वजाओं की मालाओं से सजी विशाल सेना से घिरकर गुडाकेश अर्जुन का सामना किया।
श्लोक 2 (14.85.2)
अमृष्यमाणास्ते योधा नृपस्य शकुनेर्वधम् । अभ्ययुः सहिताः पार्थं प्रगृहीतशरासनाः ॥
amṛṣyamāṇāste yodhā nṛpasya śakunervadham | abhyayuḥ sahitāḥ pārthaṃ pragṛhītaśarāsanāḥ
राजा शकुनि के वध को न सह सकने वाले वे योद्धा धनुष चढ़ाकर एक साथ पार्थ पर चढ़ आए।
श्लोक 3 (14.85.3)
स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजितः । युधिष्ठिरस्य वचनं न च ते जगृहुर्हितम् ॥
sa tānuvāca dharmātmā bībhatsuraparājitaḥ | yudhiṣṭhirasya vacanaṃ na ca te jagṛhurhitam
धर्मात्मा और अपराजित बीभत्सु ने उन्हें युधिष्ठिर का आदेश सुनाया, पर उन्होंने उस हितकर बात को नहीं माना।
श्लोक 4 (14.85.4)
वार्यमाणास्तु पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिताः । परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्चुक्रोध पाण्डवः ॥
vāryamāṇāstu pārthena sāntvapūrvamamarṣitāḥ | parivārya hayaṃ jagmustataścukrodha pāṇḍavaḥ
पार्थ के सान्त्वनापूर्वक रोकने पर भी वे रुष्ट होकर घोड़े को घेरकर चल पड़े, तब पाण्डव को क्रोध आ गया।
श्लोक 5 (14.85.5)
ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डवः । क्षुरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैर्नातियत्नादिवार्जुनः ॥
tataḥ śirāṃsi dīptāgraisteṣāṃ ciccheda pāṇḍavaḥ | kṣurairgāṇḍīvanirmuktairnātiyatnādivārjunaḥ
तब पाण्डव अर्जुन ने गाण्डीव से छोड़े हुए, चमकती नोक वाले छुरे जैसे बाणों से उनके सिर काट डाले, मानो उन्हें इसमें कुछ प्रयास ही न करना पड़ा हो।
श्लोक 6 (14.85.6)
ते वध्यमानाः पार्थेन हयमुत्सृज्य संभ्रमात् । न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्दिता भृशम् ॥
te vadhyamānāḥ pārthena hayamutsṛjya saṃbhramāt | nyavartanta mahārāja śaravarṣārditā bhṛśam
पार्थ के बाणों से मारे जाते हुए वे घबराहट में घोड़े को छोड़कर, हे महाराज, बाणों की वर्षा से बहुत पीड़ित होकर लौट पड़े।
श्लोक 7 (14.85.7)
वितुद्यमानस्तैश्चापि गान्धारैः पाण्डुनन्दनः । आदिश्यादिश्य तेजस्वी परानेतानवारयत् ॥
vitudyamānastaiścāpi gāndhāraiḥ pāṇḍunandanaḥ | ādiśyādiśya tejasvī parānetānavārayat
उन गान्धारों द्वारा सताए जाने पर भी तेजस्वी पाण्डुपुत्र एक-एक को निशाना बनाकर उन शत्रुओं को रोकते रहे।
श्लोक 8 (14.85.8)
वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन्ततः । स राजा शकुनेः पुत्रः पाण्डवं प्रत्यवारयत् ॥
vadhyamāneṣu teṣvājau gāndhāreṣu samantataḥ | sa rājā śakuneḥ putraḥ pāṇḍavaṃ pratyavārayat
युद्ध में जब चारों ओर गान्धार मारे जा रहे थे, तब शकुनि के पुत्र उस राजा ने पाण्डव को रोका।
श्लोक 9 (14.85.9)
तं युध्यमानं राजानं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् । पार्थोऽब्रवीन्न मे वध्या राजानो राजशासनात् ॥
taṃ yudhyamānaṃ rājānaṃ kṣatradharme vyavasthitam | pārtho'bravīnna me vadhyā rājāno rājaśāsanāt
क्षत्रिय-धर्म में स्थित वह राजा जब युद्ध करता रहा, तब पार्थ ने कहा, "राजा की आज्ञा से राजाओं का वध मुझे नहीं करना है।
श्लोक 10 (14.85.10)
अलं युद्धेन ते वीर न तेऽस्त्वद्य पराजयः । इत्युक्तस्तदनादृत्य वाक्यमज्ञानमोहितः । स शक्रसमकर्माणं समावाकिरदाशुगैः ॥
alaṃ yuddhena te vīra na te'stvadya parājayaḥ | ityuktastadanādṛtya vākyamajñānamohitaḥ | sa śakrasamakarmāṇaṃ samāvākiradāśugaiḥ
हे वीर, युद्ध बहुत हो गया; आज तुम्हारी पराजय न हो।" ऐसा कहे जाने पर अज्ञान से मोहित उसने उस बात की उपेक्षा की और इन्द्र के समान कर्म करने वाले अर्जुन को तेज़ बाणों से ढक दिया।
श्लोक 11 (14.85.11)
तस्य पार्थः शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा । अपाहरदमेयात्मा जयद्रथशिरो यथा ॥
tasya pārthaḥ śirastrāṇamardhacandreṇa patriṇā | apāharadameyātmā jayadrathaśiro yathā
अमेयात्मा पार्थ ने अर्धचन्द्र बाण से उसका शिरस्त्राण उसी प्रकार उतार लिया जैसे उन्होंने पहले जयद्रथ का सिर काटा था।
श्लोक 12 (14.85.12)
तं दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुर्गान्धाराः सर्व एव ते । इच्छता तेन न हतो राजेत्यपि च ते विदुः ॥
taṃ dṛṣṭvā vismayaṃ jagmurgāndhārāḥ sarva eva te | icchatā tena na hato rājetyapi ca te viduḥ
यह देखकर वे सभी गान्धार चकित रह गए, और वे समझ गए कि राजा केवल इसलिए नहीं मारा गया कि अर्जुन ने ऐसा नहीं चाहा।
श्लोक 13 (14.85.13)
गान्धारराजपुत्रस्तु पलायनकृतक्षणः । ययौ तैरेव सहितस्त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव ॥
gāndhārarājaputrastu palāyanakṛtakṣaṇaḥ | yayau taireva sahitastrastaiḥ kṣudramṛgairiva
पर गान्धारराज का पुत्र भागने का अवसर पाकर उन्हीं के साथ, भयभीत छोटे मृगों की तरह, भाग निकला।
श्लोक 14 (14.85.14)
तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् । प्रजहारोत्तमाङ्गानि भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥
teṣāṃ tu tarasā pārthastatraiva paridhāvatām | prajahārottamāṅgāni bhallaiḥ sannataparvabhiḥ
वहीं इधर-उधर भागते हुए उनके सिरों को पार्थ ने शीघ्रता से झुकी हुई गाँठों वाले भल्ल बाणों से काट डाला।
श्लोक 15 (14.85.15)
उच्छ्रितांस्तु भुजान्केचिन्नाबुध्यन्त शरैर्हृतान् । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैः पृथुभिः पार्थचोदितैः ॥
ucchritāṃstu bhujānkecinnābudhyanta śarairhṛtān | śarairgāṇḍīvanirmuktaiḥ pṛthubhiḥ pārthacoditaiḥ
कुछ लोगों को पता भी न चला कि उनकी उठी हुई भुजाएँ कट चुकी हैं; वे गाण्डीव से छूटे, पार्थ द्वारा चलाए गए चौड़े बाणों से कटी थीं।
श्लोक 16 (14.85.16)
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद्विद्रुतं बलम् । हतविद्रुतभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहुः ॥
sambhrāntanaranāgāśvamapatadvidrutaṃ balam | hatavidrutabhūyiṣṭhamāvartata muhurmuhuḥ
जिसके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबरा गए थे, वह भागती हुई सेना गिरती गई; अधिकतर मारी गई या भाग गई वह बार-बार चक्कर खाती रही।
श्लोक 17 (14.85.17)
नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेऽग्र्यकर्मणः । रिपवः पात्यमाना वै ये सहेरन्महाशरान् ॥
nābhyadṛśyanta vīrasya kecidagre'gryakarmaṇaḥ | ripavaḥ pātyamānā vai ye saheranmahāśarān
उस अग्रगण्य कर्म वाले वीर के सामने ऐसे कोई शत्रु खड़े नहीं दिखाई दिए जो मारे जाते हुए उन महान् बाणों को सह सकते।
श्लोक 18 (14.85.18)
ततो गान्धारराजस्य मन्त्रिवृद्धपुरःसरा । जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम् ॥
tato gāndhārarājasya mantrivṛddhapuraḥsarā | jananī niryayau bhītā puraskṛtyārghyamuttamam
तब गान्धारराज की माता वृद्ध मन्त्रियों को आगे करके, भयभीत होकर, उत्तम अर्घ्य लिए बाहर आई।
श्लोक 19 (14.85.19)
सा न्यवारयदव्यग्रा तं पुत्रं युद्धदुर्मदम् । प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ॥
sā nyavārayadavyagrā taṃ putraṃ yuddhadurmadam | prasādayāmāsa ca taṃ jiṣṇumakliṣṭakāriṇam
उसने शान्त भाव से युद्ध के मद में चूर अपने पुत्र को रोका और सहज ही कर्म करने वाले विजयी अर्जुन को प्रसन्न किया।
श्लोक 20 (14.85.20)
तां पूजयित्वा बीभत्सुः प्रसादमकरोत्प्रभुः । शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥
tāṃ pūjayitvā bībhatsuḥ prasādamakarotprabhuḥ | śakuneścāpi tanayaṃ sāntvayannidamabravīt
उसका सत्कार करके प्रभु बीभत्सु ने कृपा की और शकुनि के पुत्र को सान्त्वना देते हुए यह कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 21 (14.85.21)
न मे प्रियं महाबाहो यत्ते बुद्धिरियं कृता । प्रतियोद्धुममित्रघ्न भ्रातैव त्वं ममानघ ॥
na me priyaṃ mahābāho yatte buddhiriyaṃ kṛtā | pratiyoddhumamitraghna bhrātaiva tvaṃ mamānagha
"हे महाबाहो, तुमने जो मेरा सामना करने का यह निश्चय किया, वह मुझे अच्छा नहीं लगा। हे निष्पाप शत्रुनाशक, तुम तो मेरे भाई के समान ही हो।
श्लोक 22 (14.85.22)
गान्धारीं मातरं स्मृत्वा धृतराष्ट्रकृतेन च । तेन जीवसि राजंस्त्वं निहतास्त्वनुगास्तव ॥
gāndhārīṃ mātaraṃ smṛtvā dhṛtarāṣṭrakṛtena ca | tena jīvasi rājaṃstvaṃ nihatāstvanugāstava
माता गान्धारी का स्मरण करके और धृतराष्ट्र के उपकार के कारण, हे राजन्, तुम जीवित हो, यद्यपि तुम्हारे अनुचर मारे जा चुके हैं।
श्लोक 23 (14.85.23)
मैवं भूः शाम्यतां वैरं मा तेऽभूद्बुद्धिरीदृशी । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥
maivaṃ bhūḥ śāmyatāṃ vairaṃ mā te'bhūdbuddhirīdṛśī | āgantavyaṃ parāṃ caitrīmaśvamedhe nṛpasya naḥ
ऐसे मत होओ; वैर शान्त हो जाए और तुम्हारी ऐसी बुद्धि फिर न हो। हमारे राजा के अश्वमेध यज्ञ में तुम्हें आगामी चैत्र की पूर्णिमा पर आना होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (14.85.24)
इत्युक्त्वाऽनुययौ पार्थो हयं तं कामचारिणम् । ते न्यवर्तन्त गान्धारा हतशिष्टाः स्वकं पुरम् ॥
ityuktvā'nuyayau pārtho hayaṃ taṃ kāmacāriṇam | te nyavartanta gāndhārā hataśiṣṭāḥ svakaṃ puram
यह कहकर पार्थ इच्छानुसार चलने वाले उस घोड़े के पीछे चले, और बचे हुए गान्धार अपने नगर को लौट गए।