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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 86

भीम द्वारा यज्ञभूमि की रचना और राजाओं का समागम

युधिष्ठिर को समाचार मिलता है कि घोड़ा अर्जुन के सकुशल साथ लौट रहा है। माघ की द्वादशी को वे भीम से कहते हैं कि विद्वान् ब्राह्मण यज्ञ के योग्य स्थान चुनें, क्योंकि चैत्र की पूर्णिमा में एक मास शेष है। भीम सभा-भवनों, सोने के खम्भों और तोरणों वाली भव्य यज्ञभूमि तथा राजाओं और ब्राह्मणों के आवास बनवाते हैं और राजाओं के पास दूत भेजते हैं। वे उपहार लेकर आते हैं और युधिष्ठिर उनका सत्कार करते हैं। यज्ञ आरम्भ होने पर राजा सोने के पात्रों, पशुओं और पर्वत-जैसे अन्न के ढेरों को देखकर चकित होते हैं और विशाल जनसमूह को भोजन कराया जाता है।

अध्याय 85अध्याय-सूचीअध्याय 87

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.86.1)

न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम् । तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः । श्रुत्वाऽर्जुनं कुशलिनं स च हृष्टमनाऽभवत् ॥

nyavartata tato vājī yena nāgāhvayaṃ puram | taṃ nivṛttaṃ tu śuśrāva cāreṇaiva yudhiṣṭhiraḥ | śrutvā'rjunaṃ kuśalinaṃ sa ca hṛṣṭamanā'bhavat

तब वह घोड़ा उस ओर लौट पड़ा जहाँ नागाह्वय, हस्तिनापुर, नगर है। युधिष्ठिर ने गुप्तचरों से उसके लौटने की बात सुनी, और अर्जुन को सकुशल सुनकर वे प्रसन्न मन हो गए।

श्लोक 2 (14.86.2)

विजयस्य च तत्कर्म गान्धारविषये तदा । श्रुत्वा चान्येषु देशेषु स सुप्रीतोऽभवत्तदा ॥

vijayasya ca tatkarma gāndhāraviṣaye tadā | śrutvā cānyeṣu deśeṣu sa suprīto'bhavattadā

गान्धार देश में और अन्य देशों में विजय अर्जुन का वह पराक्रम सुनकर वे उस समय बहुत प्रसन्न हुए।

श्लोक 3 (14.86.3)

एतस्मिन्नेव काले तु द्वादशीं माघमासिकीम् । इष्टं गृहीत्वा नक्षत्रं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

etasminneva kāle tu dvādaśīṃ māghamāsikīm | iṣṭaṃ gṛhītvā nakṣatraṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

उसी समय माघ मास की द्वादशी को शुभ नक्षत्र का चयन करके धर्मराज युधिष्ठिर ने—

श्लोक 4 (14.86.4)

समानीय महातेजाः सर्वान्भ्रातॄन्महीपतिः । भीमं च नकुलं चैव सहदेवं च कौरव ॥

samānīya mahātejāḥ sarvānbhrātṝnmahīpatiḥ | bhīmaṃ ca nakulaṃ caiva sahadevaṃ ca kaurava

उन महातेजस्वी पृथ्वीपति ने, हे कौरव, अपने सब भाइयों, भीम, नकुल और सहदेव को बुलाकर—

श्लोक 5 (14.86.5)

प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतांवरः । आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं प्रहरतां वरम् ॥

provācedaṃ vacaḥ kāle tadā dharmabhṛtāṃvaraḥ | āmantrya vadatāṃ śreṣṭho bhīmaṃ praharatāṃ varam

तब धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ और वक्ताओं में श्रेष्ठ उन्होंने योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम को सम्बोधित करके उचित समय पर यह वचन कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (14.86.6)

आयाति भीमसेनासौ सहाश्वेन तवानुजः । यथा मे पुरुषाः प्राहुर्ये धनंजयसारिणः ॥

āyāti bhīmasenāsau sahāśvena tavānujaḥ | yathā me puruṣāḥ prāhurye dhanaṃjayasāriṇaḥ

"भीमसेन, तुम्हारा छोटा भाई घोड़े के साथ आ रहा है, जैसा धनंजय के साथ चलने वाले मेरे आदमियों ने मुझे बताया है।

श्लोक 7 (14.86.7)

उपस्थितश्च कालोऽयमभितो वर्तते हयः । माघी च पौर्णमासीयं मासः शेषो वृकोदर ॥

upasthitaśca kālo'yamabhito vartate hayaḥ | māghī ca paurṇamāsīyaṃ māsaḥ śeṣo vṛkodara

यह समय आ गया है और घोड़ा चारों ओर घूमता हुआ निकट ही है। यह माघ की पूर्णिमा है; हे वृकोदर, अब एक मास शेष है।

श्लोक 8 (14.86.8)

तत्प्रस्थाप्यन्तु विद्वांसो ब्राह्मणा वेदपारगाः । वाजिमेधार्थसिद्ध्यर्थं देशं पश्यन्तु यज्ञियम् ॥

tatprasthāpyantu vidvāṃso brāhmaṇā vedapāragāḥ | vājimedhārthasiddhyarthaṃ deśaṃ paśyantu yajñiyam

इसलिए वेद के पारंगत विद्वान् ब्राह्मण प्रस्थान करें और अश्वमेध की सिद्धि के लिए यज्ञ के योग्य स्थान देखें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (14.86.9)

इत्युक्तः स तु तच्चक्रे भीमो नृपतिशासनम् । हृष्टः श्रुत्वा गुडाकेशमायान्तं पुरुषर्षभम् ॥

ityuktaḥ sa tu taccakre bhīmo nṛpatiśāsanam | hṛṣṭaḥ śrutvā guḍākeśamāyāntaṃ puruṣarṣabham

ऐसा कहे जाने पर भीम ने राजा की आज्ञा का पालन किया; पुरुषश्रेष्ठ गुडाकेश के आने की बात सुनकर वे प्रसन्न थे।

श्लोक 10 (14.86.10)

ततो ययौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह । ब्राह्मणानग्रतः कृत्वा कुशलान्यज्ञकर्मणि ॥

tato yayau bhīmasenaḥ prājñaiḥ sthapatibhiḥ saha | brāhmaṇānagrataḥ kṛtvā kuśalānyajñakarmaṇi

तब भीमसेन यज्ञ-कर्म में कुशल ब्राह्मणों को आगे करके बुद्धिमान् शिल्पकार-स्थपतियों के साथ गए।

श्लोक 11 (14.86.11)

तं ससालचयं श्रीमत्सप्रतोलीसुघट्टितम् । मापयामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ॥

taṃ sasālacayaṃ śrīmatsapratolīsughaṭṭitam | māpayāmāsa kauravyo yajñavāṭaṃ yathāvidhi

कौरव्य भीम ने उस शोभायमान यज्ञभूमि को, जो परकोटों से युक्त और तोरणों से सुघड़ बनी थी, विधि के अनुसार नपवाया।

श्लोक 12 (14.86.12)

प्रासादशतसम्बन्धं मणिप्रवरकुट्टिमम् । सदः स पत्नीसदनं साग्नीध्रमपि चोत्तरम् । कारयामास विधिवद्धेमरत्नविभूषितम् ॥

prāsādaśatasambandhaṃ maṇipravarakuṭṭimam | sadaḥ sa patnīsadanaṃ sāgnīdhramapi cottaram | kārayāmāsa vidhivaddhemaratnavibhūṣitam

सैकड़ों महलों से जुड़ा और श्रेष्ठ मणियों से जड़े फर्श वाला, तथा विधि के अनुसार सदस् मण्डप, पत्नी का निवास, आग्नीध्र का स्थान और उत्तरवेदी—इन सबको उन्होंने सोने और रत्नों से सजाकर बनवाया।

श्लोक 13 (14.86.13)

स्तंभान्कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च । यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काञ्चनम् ॥

staṃbhānkanakacitrāṃśca toraṇāni bṛhanti ca | yajñāyatanadeśeṣu dattvā śuddhaṃ ca kāñcanam

यज्ञस्थल के विभिन्न भागों में उन्होंने सोने से चित्रित खम्भे और विशाल तोरण खड़े कराए और उनके लिए शुद्ध सोना दिया।

श्लोक 14 (14.86.14)

अन्तःपुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम् । कारयामास धर्मात्मा तत्रतत्र यथाविधि ॥

antaḥpurāṇāṃ rājñāṃ ca nānādeśasamīyuṣām | kārayāmāsa dharmātmā tatratatra yathāvidhi

धर्मात्मा युधिष्ठिर ने विविध देशों से आने वाले राजाओं के लिए जगह-जगह विधिपूर्वक अन्तःपुर बनवाए।

श्लोक 15 (14.86.15)

ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम् । कारयामास कौन्तेयो विधिवत्तान्यनेकशः ॥

brāhmaṇānāṃ ca veśmāni nānādeśasamīyuṣām | kārayāmāsa kaunteyo vidhivattānyanekaśaḥ

और कुन्तीपुत्र ने विविध देशों से आए ब्राह्मणों के लिए विधिपूर्वक अनेक घर बनवाए।

श्लोक 16 (14.86.16)

तथा सम्प्रेषयामास दूतान्नृपतिशासनात् । भीमसेनो महाबाहो राज्ञामक्लिष्टकर्मणाम् ॥

tathā sampreṣayāmāsa dūtānnṛpatiśāsanāt | bhīmaseno mahābāho rājñāmakliṣṭakarmaṇām

तब महाबाहु भीमसेन ने राजा की आज्ञा से अक्लिष्टकर्मा राजाओं के पास दूत भेजे।

श्लोक 17 (14.86.17)

ते प्रियार्थं कुरुपतेराययुर्नृपसत्तम । रत्नान्यनेकान्यादाय स्त्रियोऽश्वानायुधानि च ॥

te priyārthaṃ kurupaterāyayurnṛpasattama | ratnānyanekānyādāya striyo'śvānāyudhāni ca

हे नृपश्रेष्ठ, कुरुराज को प्रसन्न करने के लिए वे अनेक रत्न, स्त्रियाँ, घोड़े और शस्त्र लेकर आए।

श्लोक 18 (14.86.18)

तेषां निर्विशतां तेषु शिबिरेषु महात्मनाम् । नर्दतः सागरस्येव दिवस्पृगभवत्स्वनः ॥

teṣāṃ nirviśatāṃ teṣu śibireṣu mahātmanām | nardataḥ sāgarasyeva divaspṛgabhavatsvanaḥ

उन महात्मा राजाओं के शिविरों में ठहरते समय गरजते समुद्र की-सी ध्वनि आकाश को छूने लगी।

श्लोक 19 (14.86.19)

प्रत्युद्गम्य नमस्कृत्य ब्राह्मणांश्च न्यवेदयत् ॥

pratyudgamya namaskṛtya brāhmaṇāṃśca nyavedayat

उन्होंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और ब्राह्मणों को प्रणाम करके उनके आगमन की सूचना दी।

श्लोक 20 (14.86.20)

तेषामभ्यागतानां च स राजा कुरुवर्धनः । व्यादिदेशान्नपानानि शय्याश्चाप्यतिमानुषाः ॥

teṣāmabhyāgatānāṃ ca sa rājā kuruvardhanaḥ | vyādideśānnapānāni śayyāścāpyatimānuṣāḥ

आए हुए उन लोगों के लिए कुरुवंश को बढ़ाने वाले उस राजा ने अन्न-पान और अलौकिक शय्याओं की व्यवस्था का आदेश दिया।

श्लोक 21 (14.86.21)

वाहनानां च विविधाः शालाः शालीक्षुगोरसैः । उपेता भरतश्रेष्ठो व्यादिदेश स धर्मराट् ॥

vāhanānāṃ ca vividhāḥ śālāḥ śālīkṣugorasaiḥ | upetā bharataśreṣṭho vyādideśa sa dharmarāṭ

उनके वाहनों के लिए भी भरतश्रेष्ठ धर्मराज ने धान, ईख और दूध-दही आदि से भरी अनेक प्रकार की शालाओं का आदेश दिया।

श्लोक 22 (14.86.22)

वर्णाः पृथक्सन्निविष्टा ह्युत्तरोत्तरपूजिताः । तथा तस्मिन्महायज्ञे धर्मराजस्य धीमतः । समाजग्मुर्मुनिगणा बहवो ब्रह्मवादिनः ॥

varṇāḥ pṛthaksanniviṣṭā hyuttarottarapūjitāḥ | tathā tasminmahāyajñe dharmarājasya dhīmataḥ | samājagmurmunigaṇā bahavo brahmavādinaḥ

वर्ण अलग-अलग ठहराए गए और उत्तरोत्तर अधिक सम्मानित हुए। बुद्धिमान् धर्मराज के उस महायज्ञ में ब्रह्मवादी मुनियों के अनेक समूह आ पहुँचे।

श्लोक 23 (14.86.23)

ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन्पृथिवीपते । समाजग्मुः सशिष्यांस्तान्प्रतिजग्राह कौरवः ॥

ye ca dvijātipravarāstatrāsanpṛthivīpate | samājagmuḥ saśiṣyāṃstānpratijagrāha kauravaḥ

हे पृथ्वीपति, जो श्रेष्ठ द्विज वहाँ थे, वे शिष्यों सहित आए, और कौरव ने उनका स्वागत किया।

श्लोक 24 (14.86.24)

सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान्प्रति । स्वयमेव महातेजा दंभं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः ॥

sarvāṃśca tānanuyayau yāvadāvasathānprati | svayameva mahātejā daṃbhaṃ tyaktvā yudhiṣṭhiraḥ

और महातेजस्वी युधिष्ठिर स्वयं अभिमान छोड़कर उन सबके पीछे-पीछे उनके निवासों तक गए।

श्लोक 25 (14.86.25)

ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा । कृत्स्नं यज्ञविधिं राजन्धर्मराजे न्यवेदयन् ॥

tataḥ kṛtvā sthapatayaḥ śilpino'nye ca ye tadā | kṛtsnaṃ yajñavidhiṃ rājandharmarāje nyavedayan

तब स्थपतियों और अन्य शिल्पियों ने काम पूरा करके, हे राजन्, धर्मराज को यज्ञ की सारी व्यवस्था की सूचना दी।

श्लोक 26 (14.86.26)

तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः । हृष्टरूपोऽभवद्राजन्सह भ्रातृभिरादृतः ॥

tacchrutvā dharmarājastu kṛtaṃ sarvamatandritaḥ | hṛṣṭarūpo'bhavadrājansaha bhrātṛbhirādṛtaḥ

सब कुछ पूरा हो गया सुनकर अथक धर्मराज भाइयों से आदर पाते हुए प्रसन्न हो गए।

श्लोक 27 (14.86.27)

तस्मिन्यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः । हेतुवादान्बहूनाहुः परस्परजिगीषवः ॥

tasminyajñe pravṛtte tu vāgmino hetuvādinaḥ | hetuvādānbahūnāhuḥ parasparajigīṣavaḥ

यज्ञ आरम्भ होने पर तर्कवादी वाग्मी लोग एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से बहुत-से तर्क देने लगे।

श्लोक 28 (14.86.28)

ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत ॥

dadṛśustaṃ nṛpatayo yajñasya vidhimuttamam | devendrasyeva vihitaṃ bhīmasenena bhārata

हे भारत, राजाओं ने भीमसेन के रचे हुए उस यज्ञ के उत्तम विधान को देखा, जो मानो देवराज के लिए बना हो।

श्लोक 29 (14.86.29)

ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुंभमयानि ते । शय्यासनविहारांश्च सुबहून्रत्नसंचयान् ॥

dadṛśustoraṇānyatra śātakuṃbhamayāni te | śayyāsanavihārāṃśca subahūnratnasaṃcayān

उन्होंने वहाँ सोने के बने तोरण, शय्याएँ, आसन और विहार-स्थल तथा रत्नों के बहुत-से ढेर देखे।

श्लोक 30 (14.86.30)

घटान्पात्रीः कटाहानि कलशान्वर्धमानकान् । न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यन्वसुधाधिपाः ॥

ghaṭānpātrīḥ kaṭāhāni kalaśānvardhamānakān | na hi kiñcidasauvarṇamapaśyanvasudhādhipāḥ

घड़े, पात्र, कड़ाह, कलश और कटोरे—राजाओं ने वहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं देखी जो सोने की न हो।

श्लोक 31 (14.86.31)

यूपांश्च शास्त्रपठितान्दारवान्हेमभूषितान् । उपक्लृप्तान्यथाकालं विधिवद्भूरिवर्चसः ॥

yūpāṃśca śāstrapaṭhitāndāravānhemabhūṣitān | upaklṛptānyathākālaṃ vidhivadbhūrivarcasaḥ

उन्होंने शास्त्र में बताए हुए, सोने से सजे, काठ के यज्ञ-स्तम्भ देखे, जो उचित समय पर विधिपूर्वक खड़े किए गए थे और बड़ी आभा वाले थे।

श्लोक 32 (14.86.32)

स्थलजा जलजा ये च पशवः केचन प्रभो । सर्वानेव समानीतानपश्यंस्तत्र ते नृपाः ॥

sthalajā jalajā ye ca paśavaḥ kecana prabho | sarvāneva samānītānapaśyaṃstatra te nṛpāḥ

हे प्रभो, स्थल या जल में उत्पन्न जो भी पशु थे, उन सबको वहाँ लाया हुआ राजाओं ने देखा।

श्लोक 33 (14.86.33)

गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोपि च । औदकानि च सत्वानि श्वापदानि वयांसि च ॥

gāścaiva mahiṣīścaiva tathā vṛddhastriyopi ca | audakāni ca satvāni śvāpadāni vayāṃsi ca

गायें और भैंसें, वृद्ध स्त्रियाँ भी, जल के जीव, हिंस्र पशु और पक्षी—

श्लोक 34 (14.86.34)

जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युद्भिदानि च । पर्वतानूपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ॥

jarāyujāṇḍajātāni svedajānyudbhidāni ca | parvatānūpajātāni bhūtāni dadṛśuśca te

गर्भ से और अण्डे से, पसीने से और अंकुर से उत्पन्न होने वाले, पर्वतों और दलदली भूमि में जन्मे—इन सभी प्राणियों को उन्होंने देखा।

श्लोक 35 (14.86.35)

एवं प्रमुदितं सर्वं पशुगोधनधान्यतः । यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागताः ॥

evaṃ pramuditaṃ sarvaṃ paśugodhanadhānyataḥ | yajñavāṭaṃ nṛpā dṛṣṭvā paraṃ vismayamāgatāḥ

पशुओं, गोधन और अन्न से इस प्रकार भरी-पूरी यज्ञभूमि को देखकर राजा परम विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 36 (14.86.36)

अनिशं दीयते च स्म तत्र भोज्यं पृथग्विधम् । ब्राह्मणानां विशां चैव बहुमृष्टान्नमृद्धिमत् ॥

aniśaṃ dīyate ca sma tatra bhojyaṃ pṛthagvidham | brāhmaṇānāṃ viśāṃ caiva bahumṛṣṭānnamṛddhimat

वहाँ ब्राह्मणों और वैश्यों को बिना रुके अनेक प्रकार का भोजन दिया जाता रहा, जो प्रचुर और बहुत सुस्वादु पकाया हुआ था।

श्लोक 37 (14.86.37)

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् । दुन्दुभिर्मेघनिर्घोषो मुहुर्मुहुरताड्यत । विननादासकृच्चापि दिवसेदिवसे गते ॥

pūrṇe śatasahasre tu viprāṇāṃ tatra bhuñjatām | dundubhirmeghanirghoṣo muhurmuhuratāḍyata | vinanādāsakṛccāpi divasedivase gate

जब वहाँ एक लाख ब्राह्मण भोजन कर चुकते, तब मेघ-गर्जन जैसी ध्वनि वाला नगाड़ा बार-बार बजाया जाता, और दिन-प्रतिदिन बीतते हुए वह बार-बार गूँजता रहा।

श्लोक 38 (14.86.38)

एवं स ववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः । अन्नस्य सुबहून्राजन्नुत्सर्गान्पर्वतोपमान् । दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदाञ्जनाः ॥

evaṃ sa vavṛte yajño dharmarājasya dhīmataḥ | annasya subahūnrājannutsargānparvatopamān | dadhikulyāśca dadṛśuḥ sarpiṣaśca hradāñjanāḥ

इस प्रकार बुद्धिमान् धर्मराज का वह यज्ञ चलता रहा। हे राजन्, वहाँ लोगों ने पर्वत के समान अन्न के ढेर, दही की नदियाँ और घी के सरोवर देखे।

श्लोक 39 (14.86.39)

जंबूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुतः । राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्य महामखे ॥

jaṃbūdvīpo hi sakalo nānājanapadāyutaḥ | rājannadṛśyataikastho rājñastasya mahāmakhe

हे राजन्, अनेक जनपदों से भरा सारा जम्बूद्वीप उस राजा के उस महायज्ञ में एक ही स्थान पर इकट्ठा दिखाई देता था।

श्लोक 40 (14.86.40)

तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः । गृहीत्वा धनमाजग्मुर्बहूनि भरतर्षभ ॥

tatra jātisahasrāṇi puruṣāṇāṃ tatastataḥ | gṛhītvā dhanamājagmurbahūni bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ चारों ओर से मनुष्यों के हज़ारों समुदाय बहुत-सा धन लेकर आए।

श्लोक 41 (14.86.41)

स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमुष्टमणिकुण्डलाः । पर्यवेषन्द्विजातींस्ताञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

sragviṇaścāpi te sarve sumuṣṭamaṇikuṇḍalāḥ | paryaveṣandvijātīṃstāñśataśo'tha sahasraśaḥ

वे सब मालाएँ पहने हुए थे और उनके मणिमय कुण्डल खूब चमक रहे थे; वे सैकड़ों-हज़ारों द्विजों को भोजन परोसते थे।

श्लोक 42 (14.86.42)

विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिनः । ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह ॥

vividhānyannapānāni puruṣā ye'nuyāyinaḥ | te vai nṛpopabhojyāni brāhmaṇānāṃ daduśca ha

राजाओं के साथ आए सेवकों ने राजाओं के भोग के योग्य अनेक प्रकार के अन्न-पान ब्राह्मणों को दिए।

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