आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 87
कृष्ण का आगमन और अर्जुन का सन्देश
राजाओं और वेदवेत्ताओं के एकत्र होने पर युधिष्ठिर भीम से कहते हैं कि सबका यथोचित सत्कार हो। कृष्ण बलदेव और वृष्णि वीरों के साथ आते हैं और ठहराए जाते हैं। बातचीत में कृष्ण युधिष्ठिर को द्वारका के एक पुरुष के बारे में बताते हैं जिसने अनेक युद्धों से थके अर्जुन को देखा था, और अर्जुन का सन्देश सुनाते हैं: आने वाले हर राजा का आदर किया जाए ताकि अर्घ्य के अवसर जैसी विपत्ति न हो, और मणलूर के राजा, उनके पुत्र बभ्रुवाहन, का विधिवत् सत्कार किया जाए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.87.1)
समागतान्वेदविदो राज्ञश्च पृथिवीश्वरान् । दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनमभाषत ॥
samāgatānvedavido rājñaśca pṛthivīśvarān | dṛṣṭvā yudhiṣṭhiro rājā bhīmasenamabhāṣata
एकत्र हुए वेदवेत्ताओं और पृथ्वी के राजाओं को देखकर राजा युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (14.87.2)
उपयाता नरव्याघ्रा य एते पृथिवीश्वराः । एतेषां क्रियतां पूजा पूजार्हा हि नराधिपाः ॥
upayātā naravyāghrā ya ete pṛthivīśvarāḥ | eteṣāṃ kriyatāṃ pūjā pūjārhā hi narādhipāḥ
"ये जो पृथ्वी के स्वामी, पुरुषों में व्याघ्र रूप राजा आए हैं, इनका सत्कार किया जाए; क्योंकि राजा पूजा के योग्य होते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (14.87.3)
इत्युक्तः स तथा चक्रे नरेन्द्रेण यशस्विना । भीमसेनो महातेजा यमाभ्यां सह पाण्डवः ॥
ityuktaḥ sa tathā cakre narendreṇa yaśasvinā | bhīmaseno mahātejā yamābhyāṃ saha pāṇḍavaḥ
यशस्वी राजा के ऐसा कहने पर महातेजस्वी पाण्डव भीमसेन ने दोनों जुड़वाँ भाइयों के साथ वैसा ही किया।
श्लोक 4 (14.87.4)
अथाभ्यगच्छद्गोविन्दो वृष्णिभिः सह धर्मजम् । बलदेवं पुरस्कृत्य सर्वप्राणभूतां वरः ॥
athābhyagacchadgovindo vṛṣṇibhiḥ saha dharmajam | baladevaṃ puraskṛtya sarvaprāṇabhūtāṃ varaḥ
तब समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ गोविन्द बलदेव को आगे करके वृष्णियों के साथ धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पास आए,
श्लोक 5 (14.87.5)
युयुधानेन सहितः प्रद्युम्नेन गदेन च । निशठेनाथ सांबेन तथैव कृतवर्मणा ॥
yuyudhānena sahitaḥ pradyumnena gadena ca | niśaṭhenātha sāṃbena tathaiva kṛtavarmaṇā
उनके साथ युयुधान, प्रद्युम्न, गद, निशठ, साम्ब और कृतवर्मा भी थे।
श्लोक 6 (14.87.6)
तेषामपि परां पूजां चक्रे भीमो महारथः । विविशुस्ते च वेश्मानि रत्नवन्ति च सर्वशः ॥
teṣāmapi parāṃ pūjāṃ cakre bhīmo mahārathaḥ | viviśuste ca veśmāni ratnavanti ca sarvaśaḥ
महारथी भीम ने उनका भी परम सत्कार किया, और वे सब ओर से रत्नों से भरे घरों में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 7 (14.87.7)
युधिष्ठिरसमीपे तु कथान्ते मधुसूदनः । अर्जुनं कथयामास बहुसङ्ग्रामकर्शितम् ॥
yudhiṣṭhirasamīpe tu kathānte madhusūdanaḥ | arjunaṃ kathayāmāsa bahusaṅgrāmakarśitam
युधिष्ठिर के पास बातचीत के अन्त में मधुसूदन ने अनेक युद्धों से थके हुए अर्जुन के विषय में बताया।
श्लोक 8 (14.87.8)
स तं पप्रच्छ कौन्तेयः पुनःपुनररिंदमम् । धर्मजः शक्रजं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ॥
sa taṃ papraccha kaunteyaḥ punaḥpunarariṃdamam | dharmajaḥ śakrajaṃ jiṣṇuṃ samācaṣṭa jagatpatiḥ
धर्म के पुत्र कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर शत्रुनाशक, इन्द्रपुत्र जिष्णु के विषय में उनसे बार-बार पूछते रहे; और जगत् के स्वामी कृष्ण ने उन्हें बताया।
वासुदेव उवाच
श्लोक 9 (14.87.9)
आगमद्द्वारकावासी समाप्तः पुरुषो नृप । योऽद्राक्षीत्पाण्डवश्रेष्ठ बहुसङ्ग्रामकर्शितम् ॥
āgamaddvārakāvāsī samāptaḥ puruṣo nṛpa | yo'drākṣītpāṇḍavaśreṣṭha bahusaṅgrāmakarśitam
"हे राजन्, द्वारका में रहने वाला एक पुरुष अपना कार्य पूरा करके आया है; उसने पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन को अनेक युद्धों से थका हुआ देखा था।
श्लोक 10 (14.87.10)
समीपे च महाबाहुमाचष्ट च मम प्रभो । कुरु कार्याणि कौन्तेय हयमेधार्थसिद्धये ॥
samīpe ca mahābāhumācaṣṭa ca mama prabho | kuru kāryāṇi kaunteya hayamedhārthasiddhaye
और उस महाबाहु के समीप उसने मुझसे, हे प्रभो, कहा—'हे कौन्तेय, अश्वमेध की सिद्धि के लिए आवश्यक कार्य कीजिए।'"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (14.87.11)
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं धर्मराजो युधिष्ठिरः । दिष्ट्या स कुशली जिष्णुरुपायाति च माधव ॥
ityuktaḥ pratyuvācainaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | diṣṭyā sa kuśalī jiṣṇurupāyāti ca mādhava
ऐसा कहे जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें उत्तर दिया, "सौभाग्य से जिष्णु कुशल हैं और आ रहे हैं, हे माधव।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (14.87.12)
यदिदं संदिदेशास्मिन्पाण्डवानां बलाग्रणीः । तदाख्यातमिहेच्छामि भवता यदुनन्दन ॥
yadidaṃ saṃdideśāsminpāṇḍavānāṃ balāgraṇīḥ | tadākhyātamihecchāmi bhavatā yadunandana
हे यदुनन्दन, पाण्डवों की सेना के उस अग्रणी ने जो सन्देश दिया है, वह मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (14.87.13)
इत्युक्तो धर्मराजेन वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा । प्रोवाचेदं वचो वाग्मी धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥
ityukto dharmarājena vṛṣṇyandhakapatistadā | provācedaṃ vaco vāgmī dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram
धर्मराज के ऐसा कहने पर वृष्णियों और अन्धकों के स्वामी वाक्पटु कृष्ण ने तब धर्मात्मा युधिष्ठिर से यह वचन कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 14 (14.87.14)
इदमाह महाराज पार्थवाक्यं नरेश्वरः । वाच्यो युधिष्ठिरः कृष्ण काले वाक्यमिदं मम ॥
idamāha mahārāja pārthavākyaṃ nareśvaraḥ | vācyo yudhiṣṭhiraḥ kṛṣṇa kāle vākyamidaṃ mama
"हे महाराज, पार्थ का यह सन्देश नरेश्वर ने मुझे दिया: 'कृष्ण, मेरा यह वचन उचित समय पर युधिष्ठिर से कहना—
श्लोक 15 (14.87.15)
आगमिष्यन्ति राजानः सर्वे वै कौरवर्षभ । प्राप्तानां महतां पूजा कार्या ह्येतत्क्षमं हि नः ॥
āgamiṣyanti rājānaḥ sarve vai kauravarṣabha | prāptānāṃ mahatāṃ pūjā kāryā hyetatkṣamaṃ hi naḥ
हे कुरुश्रेष्ठ, सभी राजा आएँगे। आए हुए उन महापुरुषों का सत्कार करना चाहिए; यही हमारे लिए उचित है।
श्लोक 16 (14.87.16)
इत्येतद्वचनाद्राजा विज्ञाप्यो मम मानद । तथा चात्ययिकं न स्याद्यदर्घाहरणेऽभवत् ॥
ityetadvacanādrājā vijñāpyo mama mānada | tathā cātyayikaṃ na syādyadarghāharaṇe'bhavat
हे मानद, इस वचन से मेरी ओर से राजा को सूचित किया जाए, ताकि वैसी विपत्ति न आए जैसी अर्घ्य लाए जाने के समय हुई थी।
श्लोक 17 (14.87.17)
कर्तुमर्हति तद्राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् । राजद्वेषान्न नश्येयुरिमा राजन्पुनः प्रजाः ॥
kartumarhati tadrājā bhavāṃścāpyanumanyatām | rājadveṣānna naśyeyurimā rājanpunaḥ prajāḥ
राजा को यह करना चाहिए, और आप भी इसका अनुमोदन करें; ताकि राजाओं के आपसी द्वेष से ये प्रजाएँ फिर नष्ट न हों।'
श्लोक 18 (14.87.18)
इदमन्यच्च कौन्तेय वचः स पुरुषोऽब्रवीत् । धनंजयस्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ॥
idamanyacca kaunteya vacaḥ sa puruṣo'bravīt | dhanaṃjayasya nṛpate tanme nigadataḥ śṛṇu
"हे कौन्तेय, उस पुरुष ने धनंजय की ओर से यह और भी कहा था; हे राजन्, मैं सुनाता हूँ, आप सुनिए—
श्लोक 19 (14.87.19)
उपयास्यति यज्ञं नो मणलूरपतिर्नृपः । पुत्रो मम महातेजा दयितो बभ्रुवाहनः ॥
upayāsyati yajñaṃ no maṇalūrapatirnṛpaḥ | putro mama mahātejā dayito babhruvāhanaḥ
'मेरा पुत्र, महातेजस्वी और प्रिय, मणलूर का स्वामी राजा बभ्रुवाहन हमारे यज्ञ में आएगा।
श्लोक 20 (14.87.20)
तं भवान्मदपेक्षार्थं विधिवत्प्रतिपूजयेत् । स तु भक्तोऽनुरक्तश्च मम नित्यमिति प्रभो ॥
taṃ bhavānmadapekṣārthaṃ vidhivatpratipūjayet | sa tu bhakto'nuraktaśca mama nityamiti prabho
आप मेरा ध्यान रखकर विधिपूर्वक उसका सत्कार कीजिए, क्योंकि वह भक्त है और मुझसे सदा अनुराग रखता है, हे प्रभो।'"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (14.87.21)
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिनन्द्यास्य तद्वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥
ityetadvacanaṃ śrutvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | abhinandyāsya tadvākyamidaṃ vacanamabravīt
यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उस सन्देश का अभिनन्दन किया और यह बात कही।