आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 88
घोड़े के साथ अर्जुन का लौटना
युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि सब शुभ लक्षणों से युक्त होने पर भी अर्जुन सदा कष्ट और भटकन क्यों भोगते हैं। कृष्ण कहते हैं कि उन्हें केवल अर्जुन की अधिक लम्बी पिण्डलियाँ ही कारण दिखती हैं, जो उन्हें सदा मार्ग में रखती हैं। फिर एक दूत अर्जुन के घोड़े सहित आने की सूचना देता है; लोग उनके कार्य की प्रशंसा करते हैं, और अर्जुन यज्ञभूमि में प्रवेश कर धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर, भीम और कृष्ण का अभिवादन करके विश्राम करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (14.88.1)
श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत्त्वमर्हसि भाषितुम् । तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥
śrutaṃ priyamidaṃ kṛṣṇa yattvamarhasi bhāṣitum | tanme'mṛtarasaṃ puṇyaṃ mano hlādayati prabho
हे कृष्ण, जो वृत्तान्त आप कहने योग्य थे, वह प्रिय बात मैंने सुनी। वह पवित्र है, अमृत के रस के समान है, और हे प्रभो, मेरे मन को आनन्द देती है।
श्लोक 2 (14.88.2)
बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः । पुनरासन्हृषीकेश तत्रतत्रेति मे श्रुतम् ॥
bahūni kila yuddhāni vijayasya narādhipaiḥ | punarāsanhṛṣīkeśa tatratatreti me śrutam
हे हृषीकेश, मैंने सुना है कि विजय (अर्जुन) ने राजाओं के साथ बार-बार, यहाँ-वहाँ, अनेक युद्ध किए।
श्लोक 3 (14.88.3)
किंनिमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः । अतीव विजयो धीमानिति मे दूयते मनः ॥
kiṃnimittaṃ sa nityaṃ hi pārthaḥ sukhavivarjitaḥ | atīva vijayo dhīmāniti me dūyate manaḥ
वह बुद्धिमान पार्थ विजय सदा सुख से रहित क्यों रहता है, और इतना अधिक? यही सोचकर मेरा मन दुःखी होता है।
श्लोक 4 (14.88.4)
संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥
saṃcintayāmi kaunteyaṃ raho jiṣṇuṃ janārdana | atīva duḥkhabhāgī sa satataṃ pāṇḍunandanaḥ
हे जनार्दन, मैं एकान्त में कुन्तीपुत्र जिष्णु (अर्जुन) के विषय में निरन्तर सोचता हूँ; वह पाण्डुपुत्र सदा बहुत दुःख का भागी रहता है।
श्लोक 5 (14.88.5)
किंनु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते । अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥
kiṃnu tasya śarīre'sti sarvalakṣaṇapūjite | aniṣṭaṃ lakṣaṇaṃ kṛṣṇa yena duḥkhānyupāśnute
हे कृष्ण, सब शुभ लक्षणों से पूजित उसके शरीर में कौन-सा अशुभ लक्षण है, जिसके कारण वह दुःख पाता है?
श्लोक 6 (14.88.6)
अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद्वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
atīvāsukhabhogī sa satataṃ kuntinandanaḥ | na hi paśyāmi bībhatsornindyaṃ gātreṣu kiṃcana | śrotavyaṃ cenmayaitadvai tanme vyākhyātumarhasi
कुन्तीपुत्र सदा बहुत कष्ट में रहता है, फिर भी मुझे बीभत्सु (अर्जुन) के किसी अंग में कोई दोष नहीं दिखता। यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, तो आप मुझे समझाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (14.88.7)
इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदन्तरम् । राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ॥
ityuktaḥ sa hṛṣīkeśo dhyātvā sumahadantaram | rājānaṃ bhojarājanyavardhano viṣṇurabravīt
ऐसा कहे जाने पर भोज राजकुमारों को बढ़ाने वाले हृषीकेश विष्णु ने बहुत देर तक विचार करके राजा से कहा:
वासुदेव उवाच
श्लोक 8 (14.88.8)
न ह्यस्य नृपते किञ्चिदनिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ॥
na hyasya nṛpate kiñcidaniṣṭamupalakṣaye | ṛte puruṣasiṃhasya piṇḍike'syādhike yataḥ
हे राजन्, मुझे इसमें कुछ भी अशुभ नहीं दिखता, केवल इतना कि इस पुरुषसिंह की दोनों पिण्डलियाँ अधिक लम्बी हैं।
श्लोक 9 (14.88.9)
स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ॥
sa tābhyāṃ puruṣavyāghro nityamadhvasu vartate | na cānyadanupaśyāmi yenāsau duḥkhabhājanam
उन्हीं दोनों के कारण वह पुरुषव्याघ्र सदा यात्राओं में लगा रहता है। मुझे और कुछ नहीं दिखता जिससे वह दुःख का पात्र बने।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (14.88.10)
इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ॥
ityuktaḥ puruṣaśreṣṭhastadā kṛṣṇena dhīmatā | provāca vṛṣṇiśārdūlamevametaditi prabho
बुद्धिमान कृष्ण के ऐसा कहने पर उन पुरुषश्रेष्ठ ने वृष्णिवंश के सिंह से कहा, "हे प्रभो, ऐसा ही है।"
श्लोक 11 (14.88.11)
कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक्सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशिहा । सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः ॥
kṛṣṇā tu draupadī kṛṣṇaṃ tiryaksāsūyamaikṣata | pratijagrāha tasyāstaṃ praṇayaṃ cāpi keśihā | sakhyuḥ sakhā hṛṣīkeśaḥ sākṣādiva dhanaṃjayaḥ
कृष्णा (द्रौपदी) ने तिरछी, कुछ रोष-भरी दृष्टि से कृष्ण को देखा, और केशिहन्ता ने उसके उस स्नेहपूर्ण भाव को भी स्वीकार किया; मित्र के मित्र हृषीकेश मानो साक्षात् धनंजय ही थे।
श्लोक 12 (14.88.12)
तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये । रेमुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् ॥
tatra bhīmādayaste tu kuravo yājakāśca ye | remuḥ śrutvā vicitrāṃ tāṃ dhanaṃjayakathāṃ śubhām
वहाँ भीम आदि, कुरुजन और याजक धनंजय की उस विचित्र और शुभ कथा को सुनकर आनन्दित हुए।
श्लोक 13 (14.88.13)
तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः । उपायाद्वचनाद्दूतो विजयस्य महात्मनः ॥
teṣāṃ kathayatāmeva puruṣo'rjunasaṃkathāḥ | upāyādvacanāddūto vijayasya mahātmanaḥ
वे अर्जुन की कथाएँ कह ही रहे थे कि महात्मा विजय के कहने से भेजा हुआ एक दूत आ पहुँचा।
श्लोक 14 (14.88.14)
सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् । उपायातं नरव्याघ्रं फल्गुनं प्रत्यवेदयत् ॥
so'bhigamya kuruśreṣṭhaṃ namaskṛtya ca buddhimān | upāyātaṃ naravyāghraṃ phalgunaṃ pratyavedayat
उस बुद्धिमान दूत ने कुरुश्रेष्ठ के पास जाकर प्रणाम किया और बताया कि पुरुषव्याघ्र फल्गुन आ पहुँचे हैं।
श्लोक 15 (14.88.15)
तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः । प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा ॥
tacchrutvā nṛpatistasya harṣabāṣpākulekṣaṇaḥ | priyākhyānanimittaṃ vai dadau bahudhanaṃ tadā
यह सुनकर राजा की आँखें हर्ष के आँसुओं से भर गईं, और उन्होंने उस प्रिय समाचार के लिए दूत को बहुत धन दिया।
श्लोक 16 (14.88.16)
ततो द्वितीये दिवसे महाञ्शब्दो व्यवर्धत । आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे ॥
tato dvitīye divase mahāñśabdo vyavardhata | āgacchati naravyāghre kauravāṇāṃ dhuraṃdhare
फिर दूसरे दिन, जब कौरवों का भार वहन करने वाले पुरुषव्याघ्र समीप आ रहे थे, तब बड़ा कोलाहल बढ़ने लगा।
श्लोक 17 (14.88.17)
ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः । अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा ॥
tato reṇuḥ samudbhūto vibabhau tasya vājinaḥ | abhito vartamānasya yathoccaiḥśravasastathā
तब चारों ओर घूमते हुए उस घोड़े के आस-पास धूल उठी और वैसे ही शोभित हुई जैसे उच्चैःश्रवा के आस-पास।
श्लोक 18 (14.88.18)
तत्र हर्षकरीर्वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः । दिष्ट्याऽसि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः ॥
tatra harṣakarīrvāco narāṇāṃ śuśruve'rjunaḥ | diṣṭyā'si pārtha kuśalī dhanyo rājā yudhiṣṭhiraḥ
वहाँ अर्जुन ने लोगों के हर्ष-भरे वचन सुने: "हे पार्थ, सौभाग्य से आप कुशल हैं; राजा युधिष्ठिर धन्य हैं।"
जना ऊचुः
श्लोक 19 (14.88.19)
कोऽन्योहि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वाहि युधि पार्थिवान् । चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् ॥
ko'nyohi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ jitvāhi yudhi pārthivān | cārayitvā hayaśreṣṭhamupāgacchedṛte'rjunāt
अर्जुन के सिवा और कौन समस्त पृथ्वी और उसके राजाओं को युद्ध में जीतकर और श्रेष्ठ घोड़े को घुमाकर लौट सकता है?
श्लोक 20 (14.88.20)
ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः । तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम ॥
ye vyatītā mahātmāno rājānaḥ sagarādayaḥ | teṣāmapīdṛśaṃ karma na kadācana śuśruma
सगर आदि जो महात्मा राजा पहले हो चुके हैं, उनका भी ऐसा कर्म हमने कभी नहीं सुना।
श्लोक 21 (14.88.21)
नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः । यत्त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि ॥
naitadanye kariṣyanti bhaviṣyā vasudhādhipāḥ | yattvaṃ kurukulaśreṣṭha duṣkaraṃ kṛtavānasi
हे कुलश्रेष्ठ, जो दुष्कर कार्य आपने किया है, उसे भविष्य के राजा नहीं करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (14.88.22)
इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिरः । शृण्वन्विवेश धर्मात्मा फल्गुनो यज्ञसंस्तरम् ॥
ityevaṃ vadatāṃ teṣāṃ puṃsāṃ karṇasukhā giraḥ | śṛṇvanviveśa dharmātmā phalguno yajñasaṃstaram
जब वे लोग इस प्रकार कानों को सुख देने वाली बातें कह रहे थे, तब धर्मात्मा फल्गुन उन्हें सुनते हुए यज्ञभूमि में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 23 (14.88.23)
ततो राजा सहामात्यः कृष्णश्च यदुनन्दनः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य तं प्रत्युद्ययतुस्तदा ॥
tato rājā sahāmātyaḥ kṛṣṇaśca yadunandanaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya taṃ pratyudyayatustadā
तब राजा अपने मन्त्रियों के साथ और यदुकुल के आनन्द कृष्ण, धृतराष्ट्र को आगे करके उनकी अगवानी के लिए चले।
श्लोक 24 (14.88.24)
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः । भीमादींश्चापि संपूज्य पर्यष्वजत केशवम् ॥
so'bhivādya pituḥ pādau dharmarājasya dhīmataḥ | bhīmādīṃścāpi saṃpūjya paryaṣvajata keśavam
उन्होंने अपने पिता के और बुद्धिमान धर्मराज के चरणों में प्रणाम किया, भीम आदि का सम्मान किया और केशव को गले लगाया।
श्लोक 25 (14.88.25)
तैः समेत्यार्चितस्तांश्च प्रत्यर्च्याथ यथाविधि । विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारगः ॥
taiḥ sametyārcitastāṃśca pratyarcyātha yathāvidhi | viśaśrāma mahābāhustīraṃ labdhveva pāragaḥ
उनसे मिलकर और उनके द्वारा सम्मानित होकर अर्जुन ने भी विधिपूर्वक उनका प्रति-सम्मान किया, और वे महाबाहु उस पार पहुँचकर तट पा लेने वाले की भाँति विश्राम करने लगे।