आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 89
बभ्रुवाहन का आगमन; व्यास का यज्ञ-प्रारम्भ का आदेश; यज्ञ का आरम्भ
अर्जुन के पुत्र बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओं, चित्राङ्गदा और उलूपी, के साथ आते हैं और कुन्ती, धृतराष्ट्र, पाण्डवों तथा कृष्ण से सम्मान पाते हैं। तीसरे दिन व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि यज्ञ का समय आ गया है, दक्षिणा तिगुनी करने को कहते हैं, और बताते हैं कि तीन अश्वमेध स्वजनों के वध का पाप धो देंगे। युधिष्ठिर दीक्षा लेते हैं; यज्ञकर्म निर्दोष चलते हैं, भीम सबको भोजन दिलाते हैं, और देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओं से भरे यज्ञमण्डप, यूपों और अग्निचयन की शोभा बढ़ती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.89.1)
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहनः । मातृभ्यां सहितो धीमान्कुरूनभ्याजगाम ह ॥
etasminneva kāle tu sa rājā babhruvāhanaḥ | mātṛbhyāṃ sahito dhīmānkurūnabhyājagāma ha
उसी समय बुद्धिमान राजा बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओं के साथ कुरुओं के पास आए।
श्लोक 2 (14.89.2)
तत्र वृद्धान्यथावत्स कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् । अभिवाद्य महाबाहुस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः । प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ॥
tatra vṛddhānyathāvatsa kurūnanyāṃśca pārthivān | abhivādya mahābāhustaiścāpi pratinanditaḥ | praviveśa pitāmahyāḥ kuntyā bhavanamuttamam
वहाँ उन महाबाहु ने कुरुओं के वृद्धजनों और अन्य राजाओं को यथोचित प्रणाम किया और उनसे भी अभिनन्दन पाया; फिर वे अपनी पितामही कुन्ती के उत्तम भवन में गए।
श्लोक 3 (14.89.3)
स प्रविश्य महाबाहुः पाण्डवानां निवेशनम् । पितामहीमभ्यवन्दत्साम्ना परमवल्गुना ॥
sa praviśya mahābāhuḥ pāṇḍavānāṃ niveśanam | pitāmahīmabhyavandatsāmnā paramavalgunā
उन महाबाहु ने पाण्डवों के भवन में प्रवेश करके अपनी पितामही को अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी से प्रणाम किया।
श्लोक 4 (14.89.4)
तथा चित्राङ्गदा देवी कौरवस्यात्मजाऽपि च । पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतुः । सुभद्रां च यथान्यायं याश्चान्याः कुरुयोषितः ॥
tathā citrāṅgadā devī kauravasyātmajā'pi ca | pṛthāṃ kṛṣṇāṃ ca sahite vinayenopajagmatuḥ | subhadrāṃ ca yathānyāyaṃ yāścānyāḥ kuruyoṣitaḥ
इसी प्रकार देवी चित्राङ्गदा और कौरव्य की पुत्री (उलूपी) दोनों साथ विनयपूर्वक पृथा और कृष्णा (द्रौपदी) के पास गईं, तथा सुभद्रा और कुरुकुल की अन्य स्त्रियों के पास भी यथोचित रीति से गईं।
श्लोक 5 (14.89.5)
ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च । द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्या यदुस्त्रियः ॥
dadau kuntī tatastābhyāṃ ratnāni vividhāni ca | draupadī ca subhadrā ca yāścāpyanyā yadustriyaḥ
तब कुन्ती ने उन दोनों को अनेक प्रकार के रत्न दिए; द्रौपदी, सुभद्रा और यदुकुल की अन्य स्त्रियों ने भी उपहार दिए।
श्लोक 6 (14.89.6)
ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने । सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया ॥
ūṣatustatra te devyau mahārhaśayanāsane | supūjite svayaṃ kuntyā pārthasya hitakāmyayā
वे दोनों देवियाँ वहाँ बहुमूल्य शय्याओं और आसनों पर ठहरीं; पार्थ का हित चाहने वाली स्वयं कुन्ती ने उनका भली-भाँति सत्कार किया।
श्लोक 7 (14.89.7)
स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः । धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि ॥
sa ca rājā mahātejāḥ pūjito babhruvāhanaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ mahīpālamupatasthe yathāvidhi
और महापराक्रमी राजा बभ्रुवाहन ने सम्मानित होकर राजा धृतराष्ट्र की यथाविधि सेवा में उपस्थिति दी।
श्लोक 8 (14.89.8)
युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् । उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् ॥
yudhiṣṭhiraṃ ca rājānaṃ bhīmādīṃścāpi pāṇḍavān | upāgamya mahātejā vinayenābhyavādayat
महातेजस्वी बभ्रुवाहन ने राजा युधिष्ठिर तथा भीम आदि अन्य पाण्डवों के पास जाकर विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया।
श्लोक 9 (14.89.9)
स तैः प्रेम्या परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि । धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः ॥
sa taiḥ premyā pariṣvaktaḥ pūjitaśca yathāvidhi | dhanaṃ cāsmai dadurbhūri prīyamāṇā mahārathāḥ
उन सबने प्रेम से उसे गले लगाया और यथाविधि सम्मान किया, और प्रसन्न महारथियों ने उसे बहुत धन दिया।
श्लोक 10 (14.89.10)
तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् । प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् ॥
tathaiva ca mahīpālaḥ kṛṣṇaṃ cakragadādharam | pradyumna iva govindaṃ vinayenopatasthivān
उसी प्रकार उस राजा ने चक्र और गदा धारण करने वाले कृष्ण की विनयपूर्वक सेवा की, जैसे प्रद्युम्न गोविन्द की करता है।
श्लोक 11 (14.89.11)
तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् । रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् ॥
tasmai kṛṣṇo dadau rājñe mahārhamatipūjitam | rathaṃ hemapariṣkāraṃ divyāśvayujamuttamam
कृष्ण ने उस राजा को सोने से सजा हुआ, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ, अत्यन्त उत्तम और बहुमूल्य, बहुत सम्मानित रथ दिया।
श्लोक 12 (14.89.12)
धर्मराजश्च भीमश्च फल्गुनश्च यमौ तथा । पृथक्पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ॥
dharmarājaśca bhīmaśca phalgunaśca yamau tathā | pṛthakpṛthak ca te cainaṃ mānārthābhyāmayojayan
धर्मराज, भीम, फल्गुन और दोनों जुड़वाँ भाइयों ने अलग-अलग उसे मान और धन से सम्पन्न किया।
श्लोक 13 (14.89.13)
ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः । युधिष्ठिरं समभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥
tatastṛtīye divase satyavatyātmajo muniḥ | yudhiṣṭhiraṃ samabhyetya vāgmī vacanamabravīt
फिर तीसरे दिन सत्यवती के पुत्र वाग्मी मुनि युधिष्ठिर के पास आकर यह वचन बोले।
व्यास उवाच
श्लोक 14 (14.89.14)
अद्यप्रभृति कौन्तेय यज्ञस्य समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥
adyaprabhṛti kaunteya yajñasya samayo hi te | muhūrto yajñiyaḥ prāptaścodayantīha yājakāḥ
हे कुन्तीपुत्र, आज से तुम्हारे यज्ञ का समय है। यज्ञ के योग्य मुहूर्त आ गया है और याजक तुम्हें प्रेरित कर रहे हैं।
श्लोक 15 (14.89.15)
अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं विकल्पवान् । बहुत्वात्काञ्चनस्यास्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥
ahīno nāma rājendra kratuste'yaṃ vikalpavān | bahutvātkāñcanasyāsya khyāto bahusuvarṇakaḥ
हे राजेन्द्र, तुम्हारा यह यज्ञ 'अहीन' नामक है, जिसमें विकल्प होते हैं; इसमें सोना बहुत होने से यह 'बहुसुवर्णक' नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 16 (14.89.16)
एवमत्र महाराज दक्षिणाभिर्गुणीकुरु । श्रीस्त्वां व्रजतु ते राजन्ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥
evamatra mahārāja dakṣiṇābhirguṇīkuru | śrīstvāṃ vrajatu te rājanbrāhmaṇā hyatra kāraṇam
हे महाराज, इसी प्रकार दक्षिणाओं से इस यज्ञ को बढ़ाओ। हे राजन्, तुम्हें श्री प्राप्त हो; इसमें ब्राह्मण ही कारण हैं।
श्लोक 17 (14.89.17)
त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणान् । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यति नराधिप ॥
trīnaśvamedhānatra tvaṃ samprāpya bahudakṣiṇān | jñātivadhyākṛtaṃ pāpaṃ prahāsyati narādhipa
हे नरेश्वर, यहाँ प्रचुर दक्षिणा वाले तीन अश्वमेध पूरे करके तुम स्वजनों के वध से उत्पन्न पाप को धो डालोगे।
श्लोक 18 (14.89.18)
पवित्रं परमं चैतत्पावनानां च पावनम् । यदश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥
pavitraṃ paramaṃ caitatpāvanānāṃ ca pāvanam | yadaśvamedhāvabhṛthaṃ prāpsyase kurunandana
हे कुरुनन्दन, यह परम पवित्र है, पवित्र करने वालों को भी पवित्र करने वाला है, कि तुम अश्वमेध का अवभृथ स्नान प्राप्त करोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (14.89.19)
इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥
ityuktaḥ sa tu tejasvī vyāsenāmitabuddhinā | dīkṣāṃ viveśa dharmātmā vājimedhāptaye tataḥ
अपार बुद्धि वाले व्यास के ऐसा कहने पर तेजस्वी धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अश्वमेध की प्राप्ति के लिए दीक्षा ग्रहण की।
श्लोक 20 (14.89.20)
ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् । बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥
tato yajñaṃ mahābāhurvājimedhaṃ mahākratum | bahvannadakṣiṇaṃ rājā sarvakāmaguṇānvitam
तब महाबाहु राजा ने अश्वमेध महायज्ञ किया, जिसमें अन्न और दक्षिणा बहुत थी और जो सब मनोरथ-गुणों से युक्त था।
श्लोक 21 (14.89.21)
तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः । परिक्रामन्ति शास्त्रज्ञा यथावद्द्विजसत्तमाः ॥
tatra vedavido rājaṃścakruḥ karmāṇi yājakāḥ | parikrāmanti śāstrajñā yathāvaddvijasattamāḥ
हे राजन्, वहाँ वेदों के ज्ञाता और शास्त्र जानने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मण याजकों ने यथाविधि परिक्रमा करते हुए कर्म किए।
श्लोक 22 (14.89.22)
न तेषां स्खलितं किञ्चिदासीदपहुतं तथा । क्रमयुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ॥
na teṣāṃ skhalitaṃ kiñcidāsīdapahutaṃ tathā | kramayuktaṃ ca yuktaṃ ca cakrustatra dvijarṣabhāḥ
उनमें न कोई चूक हुई, न कोई भूल से आहुति पड़ी; उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने सब कर्म क्रम से और ठीक रीति से किए।
श्लोक 23 (14.89.23)
कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्मज्ञा यथावद्द्विजसत्तमाः । चक्रुस्ते विधिवद्राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥
kṛtvā pravargyaṃ dharmajñā yathāvaddvijasattamāḥ | cakruste vidhivadrājaṃstathaivābhiṣavaṃ dvijāḥ
हे राजन्, धर्म के ज्ञाता उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक प्रवर्ग्य करके उसी प्रकार सोम का अभिषव भी विधि के अनुसार किया।
श्लोक 24 (14.89.24)
अभिषूय ततो राजन्सोमं सोमपसत्तमाः । सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ॥
abhiṣūya tato rājansomaṃ somapasattamāḥ | savanānyānupūrvyeṇa cakruḥ śāstrānusāriṇaḥ
हे राजन्, सोम का अभिषव करके सोमपायियों में श्रेष्ठ उन ब्राह्मणों ने शास्त्र के अनुसार क्रम से सवन किए।
श्लोक 25 (14.89.25)
न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वाऽपि प्राकृतो वाऽपि मानवः ॥
na tatra kṛpaṇaḥ kaścinna daridro babhūva ha | kṣudhito duḥkhito vā'pi prākṛto vā'pi mānavaḥ
वहाँ कोई कंजूस या दरिद्र नहीं रहा, न कोई भूखा या दुःखी, और न कोई साधारण मनुष्य ही ऐसा रहा।
श्लोक 26 (14.89.26)
भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा । भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥
bhojanaṃ bhojanārthibhyo dāpayāmāsa śatruhā | bhīmaseno mahātejāḥ satataṃ rājaśāsanāt
महातेजस्वी शत्रुहन्ता भीमसेन राजा की आज्ञा से भोजन चाहने वालों को निरन्तर भोजन दिलाते रहे।
श्लोक 27 (14.89.27)
संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः । दिवसेदिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शात् ॥
saṃstare kuśalāścāpi sarvakāryāṇi yājakāḥ | divasedivase cakruryathāśāstrānudarśāt
वेदी बनाने में कुशल याजकों ने प्रतिदिन शास्त्र के निर्देश के अनुसार सब कर्म किए।
श्लोक 28 (14.89.28)
नाषडङ्गविदत्रासीत्सदस्यस्तस्य धीमतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ॥
nāṣaḍaṅgavidatrāsītsadasyastasya dhīmataḥ | nāvrato nānupādhyāyo na ca vādāvicakṣaṇaḥ
उस बुद्धिमान राजा के सदस्यों में कोई ऐसा नहीं था जो छहों वेदांगों को न जानता हो, जो व्रतहीन हो, गुरुहीन हो या वाद में अकुशल हो।
श्लोक 29 (14.89.29)
ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान्भरतर्षभ । खादिरान्बिल्वसमितांस्तावतः सर्ववर्णिनः ॥
tato yūpocchraye prāpte ṣaḍ bailvānbharatarṣabha | khādirānbilvasamitāṃstāvataḥ sarvavarṇinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, फिर यूप खड़े करने का समय आने पर बिल्व की लकड़ी के छह यूप बनाए गए, उतने ही खदिर के जितने बिल्व के थे, और उतने ही 'सर्ववर्णी' प्रकार के।
श्लोक 30 (14.89.30)
देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥
devadārumayau dvau tu yūpau kurupatermakhe | śleṣmātakamayaṃ caikaṃ yājakāḥ samakalpayan
कुरुराज के यज्ञ में याजकों ने देवदारु के दो यूप और श्लेष्मातक (लिसोड़ा) की लकड़ी का एक यूप भी बनवाया।
श्लोक 31 (14.89.31)
सर्वानेतान्यथाशास्त्रं याजकाः समकारयन् । शोभार्थं चापरान्यूपान्काञ्चनान्भरतर्षभ । स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥
sarvānetānyathāśāstraṃ yājakāḥ samakārayan | śobhārthaṃ cāparānyūpānkāñcanānbharatarṣabha | sa bhīmaḥ kārayāmāsa dharmarājasya śāsanāt
याजकों ने शास्त्र के अनुसार इन सबको बनवाया। और हे पुरुषश्रेष्ठ, शोभा के लिए धर्मराज की आज्ञा से भीम ने दूसरे सोने के यूप भी बनवाए।
श्लोक 32 (14.89.32)
ते व्यराजन्त राजर्षे वासोभिरुपशोभिताः । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥
te vyarājanta rājarṣe vāsobhirupaśobhitāḥ | mahendrānugatā devā yathā saptarṣibhirdivi
हे राजर्षि, वस्त्रों से सजे हुए वे यूप ऐसे शोभित हुए जैसे स्वर्ग में महेन्द्र के पीछे चलने वाले देवता सप्तर्षियों के साथ।
श्लोक 33 (14.89.33)
इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृता विभो । शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥
iṣṭakāḥ kāñcanīścātra cayanārthaṃ kṛtā vibho | śuśubhe cayanaṃ tacca dakṣasyeva prajāpateḥ
हे विभो, वहाँ चयन के लिए सोने की ईंटें बनाई गईं, और वह चयन प्रजापति दक्ष के चयन के समान शोभित हुआ।
श्लोक 34 (14.89.34)
चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः । स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥
catuścityaśca tasyāsīdaṣṭādaśakarātmakaḥ | sa rukmapakṣo nicitastrikoṇo garuḍākṛtiḥ
उसका चयन चार स्तरों वाला और अठारह हाथ का था; वह सुनहरे पंखों वाला, तीन कोनों वाला और गरुड़ के आकार का बनाया गया था।
श्लोक 35 (14.89.35)
ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥
tato niyuktāḥ paśavo yathāśāstraṃ manīṣibhiḥ | taṃ taṃ devaṃ samuddiśya pakṣiṇaḥ paśavaśca ye
फिर मनीषियों ने शास्त्र के अनुसार पशुओं को नियुक्त किया, प्रत्येक को उसके देवता के उद्देश्य से: पक्षी और पशु दोनों।
श्लोक 36 (14.89.36)
ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये । सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥
ṛṣabhāḥ śāstrapaṭhitāstathā jalacarāśca ye | sarvāṃstānabhyayuñjaṃste tatrāgnicayakarmaṇi
शास्त्रों में कहे गए बैल और जलचर प्राणी, इन सबको उन्होंने वहाँ अग्निचयन कर्म में नियुक्त किया।
श्लोक 37 (14.89.37)
यूपेषु नियता चासीत्पशूनां त्रिशती तथा । अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ॥
yūpeṣu niyatā cāsītpaśūnāṃ triśatī tathā | aśvaratnottarā yajñe kaunteyasya mahātmanaḥ
महात्मा कुन्तीपुत्र के उस यज्ञ में यूपों पर तीन सौ पशु बाँधे गए, जिनमें अश्वरत्न सबसे ऊपर था।
श्लोक 38 (14.89.38)
स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद्देवर्षिसंकुलः । गन्धर्वगणसंकीर्णः शोभितोऽप्सरसां गणैः ॥
sa yajñaḥ śuśubhe tasya sākṣāddevarṣisaṃkulaḥ | gandharvagaṇasaṃkīrṇaḥ śobhito'psarasāṃ gaṇaiḥ
वह यज्ञ साक्षात् देवर्षियों से भरा, गन्धर्वगणों से व्याप्त और अप्सराओं के समूहों से सुशोभित होकर शोभित हुआ।
श्लोक 39 (14.89.39)
स किंपुरुषसंकीर्णः किंनरैश्चोपशोभितः । सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥
sa kiṃpuruṣasaṃkīrṇaḥ kiṃnaraiścopaśobhitaḥ | siddhavipranivāsaiśca samantādabhisaṃvṛtaḥ
वह किम्पुरुषों से भरा और किन्नरों से सुशोभित था, और चारों ओर सिद्धों तथा ब्राह्मणों के निवासों से घिरा हुआ था।
श्लोक 40 (14.89.40)
तस्मिन्सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः । सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञकर्मसु ॥
tasminsadasi nityāstu vyāsaśiṣyā dvijarṣabhāḥ | sarvaśāstrapraṇetāraḥ kuśalā yajñakarmasu
उस सभा में व्यास के शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा रहते थे, जो सब शास्त्रों के रचयिता और यज्ञकर्मों में कुशल थे।
श्लोक 41 (14.89.41)
नारदश्च बभूवात्र तुंबुरुश्च महाद्युतिः । विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथाऽन्ये गीतकोविदाः ॥
nāradaśca babhūvātra tuṃburuśca mahādyutiḥ | viśvāvasuścitrasenastathā'nye gītakovidāḥ
वहाँ नारद थे, महातेजस्वी तुम्बुरु थे, विश्वावसु और चित्रसेन थे, और गायन में निपुण अन्य लोग भी थे।
श्लोक 42 (14.89.42)
गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः । रमयन्ति स्म तान्विप्रान्यज्ञकर्मान्तरेषु वै ॥
gandharvā gītakuśalā nṛtyeṣu ca viśāradāḥ | ramayanti sma tānviprānyajñakarmāntareṣu vai
गायन में कुशल और नृत्य में निपुण गन्धर्व यज्ञकर्मों के बीच के अवकाशों में उन ब्राह्मणों का मनोरंजन करते थे।