Skip to main content

आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 90

अश्वमेध की पूर्ति; पृथ्वी का दान और वापसी

घोड़े का वध और आहुतियाँ होती हैं, और युधिष्ठिर पापनाशक वपा-धूम का आघ्राण करते हैं। वे व्यास को दक्षिणा में पृथ्वी देते हैं; व्यास उसे लौटाकर उसके बदले सोना माँगते हैं, और ब्राह्मणों का धन न लेने वाले युधिष्ठिर सारा सोना ऋत्विजों में बँटवा देते हैं, फिर तिगुनी दक्षिणा में गायें देते हैं। व्यास अपना भाग कुन्ती को देते हैं। अवभृथ स्नान के बाद युधिष्ठिर राजाओं, बभ्रुवाहन और वृष्णि वीरों का सत्कार करके उन्हें विदा करते हैं; यज्ञ अन्न की नदियों और निरन्तर दान के लिए स्मरण किया जाता है।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (14.90.1)

श्रपयित्वा पशूनन्यान्विधिवद्द्विजसत्तमाः । तं तुरङ्गं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातयः ॥

śrapayitvā paśūnanyānvidhivaddvijasattamāḥ | taṃ turaṅgaṃ yathāśāstramālabhanta dvijātayaḥ

श्रेष्ठ द्विजों ने विधिपूर्वक अन्य पशुओं को पकाकर शास्त्र के अनुसार उस घोड़े को यज्ञ के लिए ग्रहण किया।

श्लोक 2 (14.90.2)

ततः संज्ञप्य तुरगं विधिवद्याजकर्षभाः । उपसंवेशयांचक्रुस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् । कलाभिस्तिसृभी राजन्यथाविधि मनस्विनीम् ॥

tataḥ saṃjñapya turagaṃ vidhivadyājakarṣabhāḥ | upasaṃveśayāṃcakrustatastāṃ drupadātmajām | kalābhistisṛbhī rājanyathāvidhi manasvinīm

फिर श्रेष्ठ याजकों ने विधिपूर्वक घोड़े का संज्ञपन करके, हे राजन्, उस मनस्विनी द्रुपदकन्या को तीन कलाओं के साथ यथाविधि उसके पास लिटाया।

श्लोक 3 (14.90.3)

उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजातयः । श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद्भरतर्षभ ॥

uddhṛtya tu vapāṃ tasya yathāśāstraṃ dvijātayaḥ | śrapayāmāsuravyagrā vidhivadbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, फिर द्विजों ने शास्त्र के अनुसार उसकी वपा निकालकर शान्त मन से विधिपूर्वक पकाई।

श्लोक 4 (14.90.4)

तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः । उपाजिघ्रद्यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा ॥

taṃ vapādhūmagandhaṃ tu dharmarājaḥ sahānujaiḥ | upājighradyathāśāstraṃ sarvapāpāpahaṃ tadā

तब धर्मराज ने अपने छोटे भाइयों के साथ शास्त्र के अनुसार उस वपा के धुएँ की गन्ध को सूँघा, जो सब पापों को हर लेती है।

श्लोक 5 (14.90.5)

शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप । तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः ॥

śiṣṭānyaṅgāni yānyāsaṃstasyāśvasya narādhipa | tānyagnau juhuvurdhīrāḥ samastāḥ ṣoḍaśartvijaḥ

हे नराधिप, उस घोड़े के जो शेष अंग थे, उन सबको धीर सोलह ऋत्विजों ने अग्नि में होम दिया।

श्लोक 6 (14.90.6)

संस्थाप्यैवं तस्य राज्ञस्तं यज्ञं शक्रतेजसः । व्यासः सशिष्यो भगवान्वर्धयामास तं नृपम् ॥

saṃsthāpyaivaṃ tasya rājñastaṃ yajñaṃ śakratejasaḥ | vyāsaḥ saśiṣyo bhagavānvardhayāmāsa taṃ nṛpam

इस प्रकार इन्द्र के समान तेजस्वी उस राजा का यज्ञ पूर्ण कराकर शिष्यों सहित भगवान व्यास ने उस राजा का उत्साह बढ़ाया।

श्लोक 7 (14.90.7)

ततो युधिष्ठिरः प्रादात्सदस्येभ्यो यथाविधि । कोटीः सहस्रं निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम् ॥

tato yudhiṣṭhiraḥ prādātsadasyebhyo yathāvidhi | koṭīḥ sahasraṃ niṣkāṇāṃ vyāsāya tu vasuṃdharām

तब युधिष्ठिर ने यथाविधि सदस्यों को हज़ार करोड़ निष्क दिए, परन्तु व्यास को पृथ्वी दे दी।

श्लोक 8 (14.90.8)

प्रतिगृह्य धरां राजन्व्यासः सत्यवतीसुतः । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

pratigṛhya dharāṃ rājanvyāsaḥ satyavatīsutaḥ | abravīdbharataśreṣṭhaṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

हे राजन्, पृथ्वी को ग्रहण करके सत्यवती के पुत्र व्यास ने भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर से कहा:

व्यास उवाच

श्लोक 9 (14.90.9)

वसुधा भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम । निष्क्रयो दीयतां मह्यं ब्राह्मणा हि धनार्थिनः ॥

vasudhā bhavatastveṣā saṃnyastā rājasattama | niṣkrayo dīyatāṃ mahyaṃ brāhmaṇā hi dhanārthinaḥ

हे राजसत्तम, यह पृथ्वी आपकी ही है, मैं इसे आपको लौटाता हूँ। इसके बदले मुझे मूल्य दीजिए, क्योंकि ब्राह्मण धन चाहने वाले होते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (14.90.10)

युधिष्ठिरस्तु तान्विप्रान्प्रत्युवाच महामनाः । भ्रातृभिः सहितो धीमान्मध्ये राज्ञां महात्मनाम् ॥

yudhiṣṭhirastu tānviprānpratyuvāca mahāmanāḥ | bhrātṛbhiḥ sahito dhīmānmadhye rājñāṃ mahātmanām

तब महामना और बुद्धिमान युधिष्ठिर ने भाइयों सहित महात्मा राजाओं के बीच उन ब्राह्मणों को उत्तर दिया:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 11 (14.90.11)

अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता । अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्यः प्रापिता मया ॥

aśvamedhe mahāyajñe pṛthivī dakṣiṇā smṛtā | arjunena jitā ceyamṛtvigbhyaḥ prāpitā mayā

अश्वमेध महायज्ञ में पृथ्वी ही दक्षिणा कही गई है। अर्जुन के द्वारा जीती हुई यह पृथ्वी मैंने ऋत्विजों को दे दी।

श्लोक 12 (14.90.12)

वनं प्रवेक्ष्ये विप्राग्र्या विभजध्वं महीमिमाम् । चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः ॥

vanaṃ pravekṣye viprāgryā vibhajadhvaṃ mahīmimām | caturdhā pṛthivīṃ kṛtvā cāturhotrapramāṇataḥ

मैं वन को जाऊँगा। हे श्रेष्ठ विप्रो, चारों होता-वर्गों के अनुपात से पृथ्वी के चार भाग करके इसे आपस में बाँट लो।

श्लोक 13 (14.90.13)

नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्मस्वं द्विजसत्तमाः । इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातॄणां चैव मे सदा ॥

nāhamādātumicchāmi brahmasvaṃ dvijasattamāḥ | idaṃ nityaṃ mano viprā bhrātṝṇāṃ caiva me sadā

हे द्विजश्रेष्ठो, मैं ब्राह्मणों का धन लेना नहीं चाहता। हे विप्रो, यही मेरा और मेरे भाइयों का भी सदा का मत है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (14.90.14)

इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा । एवमेतदिति प्राहुस्तदभूद्रोमहर्षणम् ॥

ityuktavati tasmiṃstu bhrātaro draupadī ca sā | evametaditi prāhustadabhūdromaharṣaṇam

जब उन्होंने ऐसा कहा, तब उनके भाइयों और द्रौपदी ने कहा, "ऐसा ही है"; और यह रोमांच उत्पन्न करने वाला दृश्य था।

श्लोक 15 (14.90.15)

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत्साधुसाध्विति भारत । तथैव द्विजसङ्घानां शंसतां विबभौ स्वनः ॥

tato'ntarikṣe vāgāsītsādhusādhviti bhārata | tathaiva dvijasaṅghānāṃ śaṃsatāṃ vibabhau svanaḥ

हे भारत, तब आकाश से वाणी हुई, "साधु, साधु", और उसी प्रकार प्रशंसा करते हुए ब्राह्मणों के समूहों का घोष भी गूँज उठा।

श्लोक 16 (14.90.16)

द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् । प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन्मुनिः ॥

dvaipāyanastathā kṛṣṇaḥ punareva yudhiṣṭhiram | provāca madhye viprāṇāmidaṃ sampūjayanmuniḥ

तब मुनि कृष्ण द्वैपायन ने ब्राह्मणों के बीच फिर से युधिष्ठिर का सम्मान करते हुए यह कहा:

व्यास उवाच

श्लोक 17 (14.90.17)

दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् । हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धराऽस्तु ते ॥

dattaiṣā bhavatā mahyaṃ tāṃ te pratidadāmyaham | hiraṇyaṃ dīyatāmebhyo brāhmaṇebhyo dharā'stu te

यह पृथ्वी तुमने मुझे दी थी; मैं इसे तुम्हें लौटाता हूँ। इन ब्राह्मणों को सोना दिया जाए और पृथ्वी तुम्हारी रहे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (14.90.18)

ततोऽब्रवीद्वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । यथाऽऽह भगवान्व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥

tato'bravīdvāsudevo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | yathā''ha bhagavānvyāsastathā tvaṃ kartumarhasi

तब वासुदेव ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, "जैसा भगवान व्यास ने कहा है, वैसा ही आपको करना चाहिए।"

श्लोक 19 (14.90.19)

इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह । कोटिं कोटिं गवां प्रादाद्दक्षिणां त्रिगुणीकृताम् ॥

ityuktaḥ sa kuruśreṣṭhaḥ prītātmā bhrātṛbhiḥ saha | koṭiṃ koṭiṃ gavāṃ prādāddakṣiṇāṃ triguṇīkṛtām

ऐसा कहे जाने पर कुरुश्रेष्ठ ने प्रसन्न मन से भाइयों सहित करोड़-करोड़ गायों की दक्षिणा दी, जिसे तिगुना कर दिया गया था।

श्लोक 20 (14.90.20)

न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः । यत्कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता ॥

na kariṣyati talloke kaścidanyo narādhipaḥ | yatkṛtaṃ kururājena maruttasyānukurvatā

मरुत्त का अनुसरण करते हुए कुरुराज ने जो किया, उसे संसार में कोई और राजा नहीं करेगा।

श्लोक 21 (14.90.21)

प्रतिगृह्य तु तद्द्रव्यं कृष्णद्वैपायनो मुनिः । ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते ॥

pratigṛhya tu taddravyaṃ kṛṣṇadvaipāyano muniḥ | ṛtvigbhyaḥ pradadau vidvāṃścaturdhā vyabhajaṃśca te

उस धन को ग्रहण करके विद्वान मुनि कृष्ण द्वैपायन ने ऋत्विजों को दे दिया, और उन्होंने उसके चार भाग किए।

श्लोक 22 (14.90.22)

धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिष्ठिरः । धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ॥

dharaṇyā niṣkrayaṃ dattvā taddhiraṇyaṃ yudhiṣṭhiraḥ | dhūtapāpo jitasvargo mumude bhrātṛbhiḥ saha

पृथ्वी के मूल्य के रूप में वह सोना देकर युधिष्ठिर ने पाप झाड़ दिया, स्वर्ग जीत लिया और भाइयों के साथ आनन्द मनाया।

श्लोक 23 (14.90.23)

ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा । व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम् ॥

ṛtvijastamaparyantaṃ suvarṇanicayaṃ tathā | vyabhajanta dvijātibhyo yathotsāhaṃ yathāsukham

ऋत्विजों ने उस अपार सुवर्ण-राशि को ब्राह्मणों में उनके उत्साह और इच्छा के अनुसार बाँट दिया।

श्लोक 24 (14.90.24)

यज्ञवाटे च यत्किञ्चिद्धिरण्यं अपि भूषणम् । तोरणानि च यूपांश्च घटान्पात्रीस्तथेष्टकाः । युधिष्ठिराभ्यनुज्ञाताः सर्वं तद्व्यभजन्द्विजाः ॥

yajñavāṭe ca yatkiñciddhiraṇyaṃ api bhūṣaṇam | toraṇāni ca yūpāṃśca ghaṭānpātrīstatheṣṭakāḥ | yudhiṣṭhirābhyanujñātāḥ sarvaṃ tadvyabhajandvijāḥ

यज्ञभूमि में जो भी सोना था, यहाँ तक कि आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, पात्र और ईंटें, उन सबको युधिष्ठिर की अनुमति से ब्राह्मणों ने बाँट लिया।

श्लोक 25 (14.90.25)

अनन्तरं द्विजातिभ्यः क्षत्रिया जह्रिरे वसु । तथा विट्शूद्रसङ्घाश्च तथाऽन्ये म्लेच्छजातयः । कालेन महता जह्रुस्तत्सुवर्णं ततस्ततः ॥

anantaraṃ dvijātibhyaḥ kṣatriyā jahrire vasu | tathā viṭśūdrasaṅghāśca tathā'nye mlecchajātayaḥ | kālena mahatā jahrustatsuvarṇaṃ tatastataḥ

ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों ने धन ले लिया, फिर वैश्यों और शूद्रों के समूहों ने, और अन्य म्लेच्छ जातियों ने भी; बहुत समय में वे उस सोने को यहाँ-वहाँ से उठा ले गए।

श्लोक 26 (14.90.26)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे मुदिता जग्मुरालयान् । तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता ॥

tataste brāhmaṇāḥ sarve muditā jagmurālayān | tarpitā vasunā tena dharmarājena dhīmatā

तब वे सब ब्राह्मण बुद्धिमान धर्मराज के उस धन से तृप्त और प्रसन्न होकर अपने घर चले गए।

श्लोक 27 (14.90.27)

स्वमंशं भगवान्व्यासः कुन्त्यै पादाभिवादितः । प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ॥

svamaṃśaṃ bhagavānvyāsaḥ kuntyai pādābhivāditaḥ | pradadau tasya mahato hiraṇyasya mahādyutiḥ

कुन्ती ने जिनके चरणों में प्रणाम किया था, उन तेजस्वी भगवान व्यास ने उस महान सुवर्ण में से अपना भाग उन्हें दे दिया।

श्लोक 28 (14.90.28)

श्वशुरात्प्रीतिदायं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा । चकार पुण्यकं तेन सुमहत्सङ्घशः पृथा ॥

śvaśurātprītidāyaṃ taṃ prāpya sā prītamānasā | cakāra puṇyakaṃ tena sumahatsaṅghaśaḥ pṛthā

श्वसुर से यह प्रेम-भेंट पाकर प्रसन्न मन वाली पृथा ने उससे बहुत बड़े पैमाने पर, अनेक समूहों के साथ, पुण्य-कर्म किया।

श्लोक 29 (14.90.29)

गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह । सभाज्यमानः शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव ॥

gatvā tvavabhṛthaṃ rājā vipāpmā bhrātṛbhiḥ saha | sabhājyamānaḥ śuśubhe mahendrastridaśairiva

अवभृथ स्नान के लिए जाकर पापमुक्त राजा भाइयों के साथ सम्मानित होते हुए वैसे ही शोभित हुए जैसे देवताओं के बीच महेन्द्र।

श्लोक 30 (14.90.30)

पाण्डवाश्च महीपालैः समेतैरभिसंवृताः । अशोभन्त महाराज ग्रहस्तारागणैरिव ॥

pāṇḍavāśca mahīpālaiḥ sametairabhisaṃvṛtāḥ | aśobhanta mahārāja grahastārāgaṇairiva

हे महाराज, एकत्र हुए राजाओं से घिरे पाण्डव तारागणों के बीच ग्रहों की भाँति शोभित हुए।

श्लोक 31 (14.90.31)

राजभ्योऽपि ततः प्रादाद्रत्नानि विविधानि च । गजानश्वानलङ्कारान्स्त्रियो वासांसि काञ्चनम् ॥

rājabhyo'pi tataḥ prādādratnāni vividhāni ca | gajānaśvānalaṅkārānstriyo vāsāṃsi kāñcanam

फिर उन्होंने राजाओं को भी अनेक प्रकार के रत्न दिए: हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सोना।

श्लोक 32 (14.90.32)

तद्धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले । विसृजञ्शुशुभे राजन्यथा वैश्रवणस्तथा ॥

taddhanaughamaparyantaṃ pārthaḥ pārthivamaṇḍale | visṛjañśuśubhe rājanyathā vaiśravaṇastathā

हे राजन्, राजाओं के मण्डल में उस अपार धन-राशि को बिखेरते हुए पार्थ कुबेर के समान शोभित हुए।

श्लोक 33 (14.90.33)

आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम् । प्रदाय विपुलं वित्तं गृहान्प्रास्थापयत्तदा ॥

ānīya ca tathā vīraṃ rājānaṃ babhruvāhanam | pradāya vipulaṃ vittaṃ gṛhānprāsthāpayattadā

और वीर राजा बभ्रुवाहन को बुलाकर, उसे बहुत धन देकर, उन्होंने तब उसे उसके घर के लिए विदा किया।

श्लोक 34 (14.90.34)

दुःशलायाश्च तं पौत्रं बालकं भरतर्षभ । स्वराज्येऽथ पितुर्धाम्नि स्वसुः प्रीत्या न्यवेशयत् ॥

duḥśalāyāśca taṃ pautraṃ bālakaṃ bharatarṣabha | svarājye'tha piturdhāmni svasuḥ prītyā nyaveśayat

हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने दुःशला के उस पौत्र बालक को अपने ही राज्य में, पिता के आसन पर, बहन के प्रति स्नेह से स्थापित किया।

श्लोक 35 (14.90.35)

नृपतींश्चैव तान्सर्वान्सुविभक्तान्सुपूजितान् । प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥

nṛpatīṃścaiva tānsarvānsuvibhaktānsupūjitān | prasthāpayāmāsa vaśī kururājo yudhiṣṭhiraḥ

संयमी कुरुराज युधिष्ठिर ने उन सब राजाओं को भली-भाँति सत्कार करके और सम्मान देकर विदा किया।

श्लोक 36 (14.90.36)

गोविन्दं च महात्मानं बलदेवं महाबलम् । तथाऽन्यान्वृष्णिवीरांश्च प्रद्युम्नाद्यान्सहस्रशः ॥

govindaṃ ca mahātmānaṃ baladevaṃ mahābalam | tathā'nyānvṛṣṇivīrāṃśca pradyumnādyānsahasraśaḥ

और महात्मा गोविन्द को, महाबली बलदेव को, तथा प्रद्युम्न आदि अन्य हज़ारों वृष्णि वीरों को,

श्लोक 37 (14.90.37)

पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युतिः । भ्रातृभिः सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदमः ॥

pūjayitvā mahārāja yathāvidhi mahādyutiḥ | bhrātṛbhiḥ sahito rājā prāsthāpayadariṃdamaḥ

हे महाराज, विधिपूर्वक उनका सत्कार करके तेजस्वी शत्रुदमन राजा ने भाइयों सहित उन्हें विदा किया।

श्लोक 38 (14.90.38)

एवं बभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः । बह्वन्नधनरत्नौघः सुरामैरेयसागरः ॥

evaṃ babhūva yajñaḥ sa dharmarājasya dhīmataḥ | bahvannadhanaratnaughaḥ surāmaireyasāgaraḥ

इस प्रकार बुद्धिमान धर्मराज का वह यज्ञ अन्न, धन और रत्नों की बाढ़ तथा सुरा और मैरेय का सागर बन गया,

श्लोक 39 (14.90.39)

सर्पिःपङ्का ह्रदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वताः । रसालकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ ॥

sarpiḥpaṅkā hradā yatra babhūvuścānnaparvatāḥ | rasālakardamā nadyo babhūvurbharatarṣabha

जहाँ घी की कीचड़ वाले सरोवर थे, अन्न के पर्वत थे, और रसाल की कीचड़ वाली नदियाँ थीं, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 40 (14.90.40)

भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां वध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥

bhakṣyakhāṇḍavarāgāṇāṃ kriyatāṃ bhujyatāṃ tathā | paśūnāṃ vadhyatāṃ caiva nāntaṃ dadṛśire janāḥ

"भक्ष्य, खाण्डव और राग तैयार करो! खाओ!" और "पशुओं का वध करो!" - ऐसी पुकारों का लोगों ने कोई अन्त नहीं देखा।

श्लोक 41 (14.90.41)

मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् । मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत्तदा ॥

mattapramattamuditaṃ suprītayuvatījanam | mṛdaṅgaśaṅkhanādaiśca manoramamabhūttadā

मतवालों, उन्मत्तों और आनन्दित जनों से तथा प्रसन्न युवतियों से भरा, और मृदंग-शंखों के नाद से मनोहर, वह उस समय ऐसा हो गया।

श्लोक 42 (14.90.42)

दीयतां भुज्यतां चापि तत्र शब्दो महानभूत् । दीयतां दीयतां चेति दिवारात्रमवारितम् ॥

dīyatāṃ bhujyatāṃ cāpi tatra śabdo mahānabhūt | dīyatāṃ dīyatāṃ ceti divārātramavāritam

"दो!" "खाओ!" - वहाँ बड़ा कोलाहल उठा; "दो! दो!" - यह पुकार दिन-रात बिना रुके चलती रही।

श्लोक 43 (14.90.43)

तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् । कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः ॥

taṃ mahotsavasaṃkāśaṃ hṛṣṭapuṣṭajanākulam | kathayanti sma puruṣā nānādeśanivāsinaḥ

नाना देशों में रहने वाले लोग उस उत्सव जैसे महा-समारोह की चर्चा करते थे, जो हृष्ट-पुष्ट और आनन्दित जनों से भरा था।

श्लोक 44 (14.90.44)

वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा । विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत्पुरम् ॥

varṣitvā dhanadhārābhiḥ kāmai ratnai rasaistathā | vipāpmā bharataśreṣṭhaḥ kṛtārthaḥ prāviśatpuram

धन की धाराएँ, मनचाहे भोग, रत्न और रस बरसाकर पापमुक्त और कृतकार्य भरतश्रेष्ठ ने नगर में प्रवेश किया।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91