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भीष्म पर्व · अध्याय 1

कुरुक्षेत्र में सेनाओं का पड़ाव और युद्ध के नियम

भीष्मपर्व का आरम्भ जनमेजय के इस प्रश्न से होता है कि कुरुओं, पाण्डवों और सोमकों ने किस प्रकार युद्ध किया, और वैशम्पायन वृत्तान्त सुनाना आरम्भ करते हैं। पाण्डव समन्तपञ्चक के पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर पड़ाव डालते हैं, युधिष्ठिर सेना के भोजन की व्यवस्था करते हैं और पहचान के संकेत-शब्द तथा चिह्न देते हैं, और सारे जम्बूद्वीप से आई सेनाओं के कारण पृथ्वी पर केवल बालक और बूढ़े रह जाते हैं। दुर्योधन व्यूह रचता है, शंख गूँजते हैं, धूल उठती है और मांस-रक्त की वर्षा होती है; अन्त में दोनों पक्ष धर्मयुद्ध के नियम तय करके अपने-अपने शिविरों में ठहरते हैं।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (6.1.1)

कथं युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः । पार्थिवाश्च महात्मानो नानादेशसमागताः ॥

kathaṃ yuyudhire vīrāḥ kurupāṇḍavasomakāḥ | pārthivāśca mahātmāno nānādeśasamāgatāḥ

कुरु, पाण्डव और सोमक वीरों ने, तथा अनेक देशों से आकर एकत्र हुए महात्मा राजाओं ने किस प्रकार युद्ध किया?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (6.1.2)

यथा युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः । कुरुक्षेत्रे तपःक्षेत्रे शृणु त्वं पृथिवीपते ॥

yathā yuyudhire vīrāḥ kurupāṇḍavasomakāḥ | kurukṣetre tapaḥkṣetre śṛṇu tvaṃ pṛthivīpate

हे पृथ्वीपति, सुनो कि कुरु, पाण्डव और सोमक वीरों ने तप के क्षेत्र कुरुक्षेत्र में किस प्रकार युद्ध किया।

श्लोक 3 (6.1.3)

तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रं पाण्डवाः सहसोमकाः । कौरवानभ्यवर्तन्त जिगीषन्तो महाबलाः ॥

te'vatīrya kurukṣetraṃ pāṇḍavāḥ sahasomakāḥ | kauravānabhyavartanta jigīṣanto mahābalāḥ

कुरुक्षेत्र में उतरकर सोमकों सहित महाबली पाण्डव विजय की इच्छा से कौरवों की ओर बढ़े।

श्लोक 4 (6.1.4)

वेदाध्ययनसंपन्नाः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः । आशंसन्तो जयं युद्धे बलेनाभिमुखा रणे ॥

vedādhyayanasaṃpannāḥ sarve yuddhābhinandinaḥ | āśaṃsanto jayaṃ yuddhe balenābhimukhā raṇe

वे सब वेदाध्ययन से सम्पन्न थे और सब युद्ध का स्वागत करते थे; युद्ध में विजय की आशा रखते हुए वे रणभूमि में अपने पूरे बल के साथ शत्रु के सामने डटे।

श्लोक 5 (6.1.5)

अभियाय च दुर्धर्षा धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् । प्राङ्मुखाः पश्चिमे भागे न्यविशन्त ससैनिकाः ॥

abhiyāya ca durdharṣā dhārtarāṣṭrasya vāhinīm | prāṅmukhāḥ paścime bhāge nyaviśanta sasainikāḥ

धृतराष्ट्र-पुत्र की सेना की ओर बढ़कर वे दुर्धर्ष वीर अपने सैनिकों के साथ पश्चिम भाग में पूर्व की ओर मुख करके ठहरे।

श्लोक 6 (6.1.6)

समन्तपञ्चकाद्बाह्यं शिविराणि सहस्रशः । कारयामास विधिवत्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

samantapañcakādbāhyaṃ śivirāṇi sahasraśaḥ | kārayāmāsa vidhivatkuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने समन्तपञ्चक के बाहर विधिपूर्वक हज़ारों शिविर बनवाए।

श्लोक 7 (6.1.7)

शून्येव पृथिवी सर्वा बालवृद्धावशेषिता । निरश्वपुरुषेवासीद्रथकुञ्जरवर्जिता ॥

śūnyeva pṛthivī sarvā bālavṛddhāvaśeṣitā | niraśvapuruṣevāsīdrathakuñjaravarjitā

सारी पृथ्वी मानो सूनी हो गई थी; उस पर केवल बालक और बूढ़े ही बचे थे। वह घोड़ों और पुरुषों से रहित और रथों तथा हाथियों से शून्य-सी हो गई थी।

श्लोक 8 (6.1.8)

यावत्तपति सूर्यो हि जम्बूद्वीपस्य मण्डलम् । तावदेव समावृत्तं बलं पार्थिवसत्तम ॥

yāvattapati sūryo hi jambūdvīpasya maṇḍalam | tāvadeva samāvṛttaṃ balaṃ pārthivasattama

हे राजश्रेष्ठ, जम्बूद्वीप के जितने मण्डल को सूर्य तपाता है, उस पूरे क्षेत्र से सेनाएँ एकत्र हो आई थीं।

श्लोक 9 (6.1.9)

एकस्थाः सर्ववर्णास्ते मण्डलं बहुयोजनम् । पर्याक्रामन्त देशांश्च नदीः शैलान्वनानि च ॥

ekasthāḥ sarvavarṇāste maṇḍalaṃ bahuyojanam | paryākrāmanta deśāṃśca nadīḥ śailānvanāni ca

सभी वर्णों के लोग एक स्थान पर इकट्ठे होकर अनेक योजन के घेरे में फैल गए; उन्होंने देशों, नदियों, पर्वतों और वनों को घेर लिया।

श्लोक 10 (6.1.10)

तेषां युधिष्ठिरो राजा सर्वेषां पुरुषर्षभ । व्यादिदेश सवाहानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥

teṣāṃ yudhiṣṭhiro rājā sarveṣāṃ puruṣarṣabha | vyādideśa savāhānāṃ bhakṣyabhojyamanuttamam

हे पुरुषश्रेष्ठ, राजा युधिष्ठिर ने उन सबके लिए, उनके वाहनों सहित, उत्तम भोजन और खाद्य-सामग्री की व्यवस्था का आदेश दिया।

श्लोक 11 (6.1.11)

संज्ञाश्च विविधास्तात तेषां चक्रे युधिष्ठिरः । एवंवादी वेदितव्यः पाण्डवेयोऽयमित्युत ॥

saṃjñāśca vividhāstāta teṣāṃ cakre yudhiṣṭhiraḥ | evaṃvādī veditavyaḥ pāṇḍaveyo'yamityuta

और हे तात, युधिष्ठिर ने उनके लिए अनेक प्रकार के संकेत ठहराए, जिससे ऐसा बोलने वाला व्यक्ति पाण्डव-पक्ष का पहचाना जाए।

श्लोक 12 (6.1.12)

अभिज्ञानानि सर्वेषां संज्ञाश्चाभरणानि च । योजयामास कौरव्यो युद्धकाल उपस्थिते ॥

abhijñānāni sarveṣāṃ saṃjñāścābharaṇāni ca | yojayāmāsa kauravyo yuddhakāla upasthite

युद्ध का समय उपस्थित होने पर कुरुवंशी युधिष्ठिर ने सबको पहचान के चिह्न, संकेत-शब्द और आभूषण प्रदान किए।

श्लोक 13 (6.1.13)

दृष्ट्वा ध्वजाग्रं पार्थस्य धार्तराष्ट्रो महामनाः । सहसर्वैर्महीपालैः प्रत्यव्यूहत पाण्डवम् ॥

dṛṣṭvā dhvajāgraṃ pārthasya dhārtarāṣṭro mahāmanāḥ | sahasarvairmahīpālaiḥ pratyavyūhata pāṇḍavam

पार्थ की ध्वजा का अग्रभाग देखकर महामना धृतराष्ट्र-पुत्र ने सब राजाओं के साथ पाण्डव के विरुद्ध व्यूह-रचना की।

श्लोक 14 (6.1.14)

पाण्डरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । मध्ये नागसहस्रस्य भ्रातृभिः परिवारितः ॥

pāṇḍareṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani | madhye nāgasahasrasya bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ

उसके सिर पर श्वेत छत्र तना था, और वह हज़ार हाथियों के बीच अपने भाइयों से घिरा खड़ा था।

श्लोक 15 (6.1.15)

दृष्ट्वा दुर्योधनं हृष्टाः पाञ्चाला युद्धनन्दिनः । दध्मुः प्रीता महाशङ्खान्भेरीर्जघ्नुः सहस्रशः ॥

dṛṣṭvā duryodhanaṃ hṛṣṭāḥ pāñcālā yuddhanandinaḥ | dadhmuḥ prītā mahāśaṅkhānbherīrjaghnuḥ sahasraśaḥ

दुर्योधन को देखकर युद्ध में आनन्द लेने वाले पाञ्चाल हर्षित हो उठे; उन्होंने प्रसन्न होकर बड़े-बड़े शंख बजाए और हज़ारों भेरियाँ पीटीं।

श्लोक 16 (6.1.16)

ततः प्रहृष्टां स्वां सेनामभिवीक्ष्याथ पाण्डवाः । बभूवुर्हृष्टमनसो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥

tataḥ prahṛṣṭāṃ svāṃ senāmabhivīkṣyātha pāṇḍavāḥ | babhūvurhṛṣṭamanaso vāsudevaśca vīryavān

तब अपनी सेना को उत्साह से भरी देखकर पाण्डव मन में प्रसन्न हुए, और पराक्रमी वासुदेव भी।

श्लोक 17 (6.1.17)

स्वयोधान्हर्षयन्तौ च वासुदेवधनञ्जयौ । दध्मतुः पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ शङ्खौ रथे स्थितौ ॥

svayodhānharṣayantau ca vāsudevadhanañjayau | dadhmatuḥ puruṣavyāghrau divyau śaṅkhau rathe sthitau

अपने योद्धाओं का उत्साह बढ़ाते हुए पुरुषसिंह वासुदेव और धनञ्जय ने रथ पर खड़े होकर अपने दिव्य शंख बजाए।

श्लोक 18 (6.1.18)

पाञ्चजन्यस्य शङ्खस्य देवदत्तस्य चोभयोः । श्रुत्वा तु निनदं योधाः शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ॥

pāñcajanyasya śaṅkhasya devadattasya cobhayoḥ | śrutvā tu ninadaṃ yodhāḥ śakṛnmūtraṃ prasusruvuḥ

पाञ्चजन्य और देवदत्त, इन दोनों शंखों का नाद सुनकर योद्धाओं का मल-मूत्र निकल पड़ा।

श्लोक 19 (6.1.19)

यथा सिंहस्य नदतः स्वनं श्रुत्वेतरे मृगाः । त्रसेयुर्निनदं श्रुत्वा तथाऽसीदत तद्बलम् ॥

yathā siṃhasya nadataḥ svanaṃ śrutvetare mṛgāḥ | traseyurninadaṃ śrutvā tathā'sīdata tadbalam

जैसे गरजते हुए सिंह का स्वर सुनकर दूसरे पशु भय से काँप उठते हैं, वैसे ही वह नाद सुनकर वह सेना शिथिल पड़ गई।

श्लोक 20 (6.1.20)

उदतिष्ठद्रजो भौमं न प्राज्ञायत किंचन । अस्तं गत इवादित्यः सैन्येन रजसा वृतः ॥

udatiṣṭhadrajo bhaumaṃ na prājñāyata kiṃcana | astaṃ gata ivādityaḥ sainyena rajasā vṛtaḥ

धरती की धूल उठी और कुछ भी दिखाई नहीं देता था; सेना की धूल से ढका सूर्य मानो अस्त हो गया।

श्लोक 21 (6.1.21)

ववर्ष तत्र पर्जन्यो मांसशोणितवृष्टिमान् । व्युक्षन्सर्वाणि सैन्यानि तदद्भुतमिवाभवत् ॥

vavarṣa tatra parjanyo māṃsaśoṇitavṛṣṭimān | vyukṣansarvāṇi sainyāni tadadbhutamivābhavat

वहाँ मेघ ने मांस और रक्त की वर्षा करके सारी सेनाओं को भिगो दिया; वह एक अद्भुत घटना-सी थी।

श्लोक 22 (6.1.22)

वायुस्ततः प्रादुरभून्नीचैः शर्करकर्षणः । विनिघ्नंस्तान्यनीकानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥

vāyustataḥ prādurabhūnnīcaiḥ śarkarakarṣaṇaḥ | vinighnaṃstānyanīkāni śataśo'tha sahasraśaḥ

तब धरती से सटकर बहती और कंकड़ घसीटती एक आँधी उठी, जो सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में उन सेना-दलों पर प्रहार करती रही।

श्लोक 23 (6.1.23)

उभे सैन्ये च राजेन्द्र युद्धाय मुदिते भृशम् । कुरुक्षेत्रे स्थिते यत्ते सागरक्षुभितोपमे ॥

ubhe sainye ca rājendra yuddhāya mudite bhṛśam | kurukṣetre sthite yatte sāgarakṣubhitopame

हे राजेन्द्र, युद्ध के लिए अत्यन्त हर्षित दोनों सेनाएँ कुरुक्षेत्र में तैयार खड़ी थीं, मानो दो क्षुब्ध सागर हों।

श्लोक 24 (6.1.24)

तयोस्तु सेनयोरासीदद्भुतः स तु संगमः । युगान्ते समनुप्राप्ते द्वयोः सागरयोरिव ॥

tayostu senayorāsīdadbhutaḥ sa tu saṃgamaḥ | yugānte samanuprāpte dvayoḥ sāgarayoriva

उन दोनों सेनाओं का वह मिलन अद्भुत था, जैसे युग का अन्त आने पर दो सागरों का संगम हो।

श्लोक 25 (6.1.25)

शून्याऽऽसीत्पृथिवी सर्वा वृद्धबालावशेषिता । निरश्वपुरुषेवासीद्रथकुञ्जरवर्जिता । तेन सेनासमूहेन समानीतेन कौरवैः ॥

śūnyā''sītpṛthivī sarvā vṛddhabālāvaśeṣitā | niraśvapuruṣevāsīdrathakuñjaravarjitā | tena senāsamūhena samānītena kauravaiḥ

कौरवों द्वारा एकत्र किए गए उस विशाल सैन्य-समूह के कारण सारी पृथ्वी सूनी हो गई थी; केवल बूढ़े और बालक बचे थे, और वह घोड़ों और पुरुषों से रहित तथा रथों और हाथियों से शून्य-सी हो गई थी।

श्लोक 26 (6.1.26)

ततस्ते समयं चक्रुः कुरुपाण्डवसोमकाः । धर्मान्संस्थापयामासुर्युद्धानां भरतर्षभ ॥

tataste samayaṃ cakruḥ kurupāṇḍavasomakāḥ | dharmānsaṃsthāpayāmāsuryuddhānāṃ bharatarṣabha

तब हे भरतश्रेष्ठ, कुरुओं, पाण्डवों और सोमकों ने आपस में समझौता किया और युद्ध के धर्म-नियम निश्चित किए।

श्लोक 27 (6.1.27)

निवृत्ते विहिते युद्धे स्यात्प्रीतिर्नः परस्परम् । यथापुरं यथायोगं न च स्यात्कस्यचित्पुनः ॥

nivṛtte vihite yuddhe syātprītirnaḥ parasparam | yathāpuraṃ yathāyogaṃ na ca syātkasyacitpunaḥ

"निश्चित युद्ध समाप्त हो जाने पर हम में पहले की भाँति और यथोचित परस्पर प्रीति रहे, और फिर किसी के साथ अन्याय न हो।

श्लोक 28 (6.1.28)

वाचा युद्धे प्रवृत्तानां वाचैव प्रतियोधनम् । निष्क्रान्ताः पृतनामध्यान्नहन्तव्याः कदाचन ॥

vācā yuddhe pravṛttānāṃ vācaiva pratiyodhanam | niṣkrāntāḥ pṛtanāmadhyānnahantavyāḥ kadācana

जो वाणी से युद्ध करें, उनका उत्तर वाणी से ही दिया जाए; जो सेना के बीच से निकलकर बाहर चले गए हों, उन्हें कभी न मारा जाए।

श्लोक 29 (6.1.29)

रथी च रथिना योध्यो गजेन गजधूर्गतः । अश्वेनाश्वी पदातिश्च पादातेनैव भारत ॥

rathī ca rathinā yodhyo gajena gajadhūrgataḥ | aśvenāśvī padātiśca pādātenaiva bhārata

हे भारत, रथी रथी से लड़े, हाथी की पीठ पर बैठा योद्धा हाथी वाले से, घुड़सवार घुड़सवार से और पैदल पैदल से ही लड़े।

श्लोक 30 (6.1.30)

यथायोगं यथाकामं यथोत्साहं यथाबलम् । समाभाष्य प्रहर्तव्यं न विश्वस्ते न विह्वले ॥

yathāyogaṃ yathākāmaṃ yathotsāhaṃ yathābalam | samābhāṣya prahartavyaṃ na viśvaste na vihvale

योग्यता, इच्छा, उत्साह और बल के अनुसार प्रहार किया जाए, परन्तु पहले ललकार कर ही; जो विश्वास किए बैठा हो या घबराया हुआ हो, उस पर नहीं।

श्लोक 31 (6.1.31)

परेण सह संयुक्तः प्रमत्तो विमुखस्तथा । क्षीणशस्त्रो विवर्मा च न हन्तव्यः कदाचन ॥

pareṇa saha saṃyuktaḥ pramatto vimukhastathā | kṣīṇaśastro vivarmā ca na hantavyaḥ kadācana

जो किसी दूसरे से भिड़ा हुआ हो, असावधान हो, युद्ध से मुँह मोड़ चुका हो, जिसके शस्त्र समाप्त हो गए हों या जिसका कवच न रहा हो, उसे कभी न मारा जाए।

श्लोक 32 (6.1.32)

न सूतेषु न धुर्येषु न च शस्त्रोपनायिषु । न भेरीशङ्खवादेषु प्रहर्तव्यं कथंचन ॥

na sūteṣu na dhuryeṣu na ca śastropanāyiṣu | na bherīśaṅkhavādeṣu prahartavyaṃ kathaṃcana

सारथियों, रथ में जुते पशुओं, शस्त्र पहुँचाने वालों और भेरी तथा शंख बजाने वालों पर किसी भी प्रकार प्रहार न किया जाए।"

श्लोक 33 (6.1.33)

एवं ते समयं कृत्वा कुरुपाण्डवसोमकाः । विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षमाणाः परस्परम् ॥

evaṃ te samayaṃ kṛtvā kurupāṇḍavasomakāḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmuḥ prekṣamāṇāḥ parasparam

यह समझौता करके कुरु, पाण्डव और सोमक एक-दूसरे को देखते हुए परम विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 34 (6.1.34)

निविश्य च महात्मानस्ततस्ते पुरुषर्षभाः । हृष्टरूपाः सुमनसो बभूवुः सहसैनिकाः ॥

niviśya ca mahātmānastataste puruṣarṣabhāḥ | hṛṣṭarūpāḥ sumanaso babhūvuḥ sahasainikāḥ

फिर वे महात्मा पुरुषश्रेष्ठ अपनी सेनाओं के साथ पड़ाव डालकर हर्षित और प्रसन्नचित्त हुए।

अध्याय-सूचीअध्याय 2