भीष्म पर्व · अध्याय 2
व्यास द्वारा संजय को दिव्य दृष्टि और अपशकुनों का वर्णन
दोनों सेनाओं के व्यूहबद्ध हो जाने पर व्यास शोकाकुल धृतराष्ट्र के पास एकान्त में आते हैं, उन्हें बताते हैं कि उनके पुत्रों और अन्य राजाओं का अन्त निकट है, और युद्ध देखने के लिए उन्हें दृष्टि देने का प्रस्ताव करते हैं। धृतराष्ट्र स्वजनों का वध देखने से मना करते हैं पर उसका वृत्तान्त सुनना चाहते हैं, इसलिए व्यास संजय को दिव्य दृष्टि, युद्ध की हर बात का ज्ञान और शस्त्रों से सुरक्षा का वर देते हैं। फिर व्यास उन भयानक अपशकुनों का वर्णन करते हैं जो वे देख रहे हैं: मांसभक्षी पक्षियों का जमघट, परिवेष और कबन्धों से घिरा सूर्य, अग्नि-वर्ण चन्द्रमा, रोती और रक्त उगलती देव-प्रतिमाएँ, रोहिणी को पीड़ित करता शनि और वसिष्ठ को पीछे छोड़ती अरुन्धती।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (6.2.1)
ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषिः । सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवतीसुतः ॥
tataḥ pūrvāpare sainye samīkṣya bhagavānṛṣiḥ | sarvavedavidāṃ śreṣṭho vyāsaḥ satyavatīsutaḥ
तब समस्त वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ, सत्यवती-पुत्र भगवान् महर्षि व्यास ने पूर्व और पश्चिम में खड़ी दोनों सेनाओं को देखा;
श्लोक 2 (6.2.2)
भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामहः । प्रत्यक्षदर्शी भगवान्भूतभव्यभविष्यवित् ॥
bhaviṣyati raṇe ghore bharatānāṃ pitāmahaḥ | pratyakṣadarśī bhagavānbhūtabhavyabhaviṣyavit
और जब भयंकर युद्ध होने ही वाला था, तब भरतवंशियों के पितामह, सब कुछ प्रत्यक्ष देखने वाले तथा भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता भगवान् व्यास ने
श्लोक 3 (6.2.3)
वैचित्रवीर्यं राजानं रहस्स्थमिदमब्रवीत् । शोचन्तमार्तं ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा ॥
vaicitravīryaṃ rājānaṃ rahassthamidamabravīt | śocantamārtaṃ dhyāyantaṃ putrāṇāmanayaṃ tadā
विचित्रवीर्य-पुत्र राजा धृतराष्ट्र से, जो उस समय अपने पुत्रों की अनीति का चिन्तन करते हुए शोकाकुल और दुःखी थे, एकान्त में यह कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 4 (6.2.4)
राजन्परीतकालास्ते पुत्राश्चान्ये च पार्थिवाः । ते हिंसन्तीव सङ्ग्रामे समासाद्येतरेतरम् ॥
rājanparītakālāste putrāścānye ca pārthivāḥ | te hiṃsantīva saṅgrāme samāsādyetaretaram
राजन्, तुम्हारे पुत्रों और अन्य राजाओं का काल आ पहुँचा है। वे संग्राम में एक-दूसरे से भिड़कर परस्पर संहार करेंगे।
श्लोक 5 (6.2.5)
तेषु कालपरीतेषु विनश्यत्स्वेव भारत । कालपर्यायमाज्ञाय मा स्म शोके मनः कृथाः ॥
teṣu kālaparīteṣu vinaśyatsveva bhārata | kālaparyāyamājñāya mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ
हे भारत, जब वे काल के वश में होकर नष्ट हो ही रहे हैं, तो काल के इस उलट-फेर को समझकर अपने मन को शोक में मत डुबाओ।
श्लोक 6 (6.2.6)
यदि चेच्छसि संग्रामं द्रष्टुमेनं विशांपते । चक्षुर्ददानि ते पुत्र युद्धमेतन्निशामय ॥
yadi cecchasi saṃgrāmaṃ draṣṭumenaṃ viśāṃpate | cakṣurdadāni te putra yuddhametanniśāmaya
हे प्रजानाथ, यदि तुम इस संग्राम को देखना चाहते हो, तो पुत्र, मैं तुम्हें दृष्टि देता हूँ; इस युद्ध को देखो।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 7 (6.2.7)
न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्षिसत्तम । युद्धमेतत्त्वशेषेण शृणुयां तव तेजसा ॥
na rocaye jñātivadhaṃ draṣṭuṃ brahmarṣisattama | yuddhametattvaśeṣeṇa śṛṇuyāṃ tava tejasā
हे ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ, मुझे अपने स्वजनों का वध देखना अच्छा नहीं लगता; पर आपके तेज से मैं इस युद्ध का पूरा वृत्तान्त सुन सकूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (6.2.8)
तस्मिन्ननिच्छति द्रष्टुं संग्रामं श्रोतुमिच्छति । वराणामीश्वरो व्यासः संजयाय वरं ददौ ॥
tasminnanicchati draṣṭuṃ saṃgrāmaṃ śrotumicchati | varāṇāmīśvaro vyāsaḥ saṃjayāya varaṃ dadau
जब राजा युद्ध को देखना नहीं, केवल सुनना चाहते थे, तब वरदान देने में समर्थ व्यास ने संजय को वर दिया।
व्यास उवाच
श्लोक 9 (6.2.9)
एष ते संजयो राजन्युद्धमेतद्वदिष्यति । एतस्य सर्वं संग्रामे न परोक्षं भविष्यति ॥
eṣa te saṃjayo rājanyuddhametadvadiṣyati | etasya sarvaṃ saṃgrāme na parokṣaṃ bhaviṣyati
राजन्, यह संजय तुम्हें इस युद्ध का वर्णन सुनाएगा। संग्राम में कुछ भी इसकी आँखों से ओझल नहीं रहेगा।
श्लोक 10 (6.2.10)
चक्षुषा संजयो राजन्दिव्येनैव समन्वितः । कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति ॥
cakṣuṣā saṃjayo rājandivyenaiva samanvitaḥ | kathayiṣyati te yuddhaṃ sarvajñaśca bhaviṣyati
राजन्, दिव्य दृष्टि से युक्त होकर संजय तुम्हें युद्ध का हाल सुनाएगा और वह सब कुछ जानने वाला हो जाएगा।
श्लोक 11 (6.2.11)
प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि । मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति संजयः ॥
prakāśaṃ vā'prakāśaṃ vā divā vā yadi vā niśi | manasā cintitamapi sarvaṃ vetsyati saṃjayaḥ
जो कुछ प्रकट हो या गुप्त, दिन में हो या रात में, यहाँ तक कि जो केवल मन में सोचा गया हो, वह सब संजय जान लेगा।
श्लोक 12 (6.2.12)
नैनं शस्त्राणि भेत्स्यन्ति नैनं बाधिष्यते श्रमः । गावल्गणिरयं जीवन्युद्धादस्माद्विमोक्ष्यते ॥
nainaṃ śastrāṇi bhetsyanti nainaṃ bādhiṣyate śramaḥ | gāvalgaṇirayaṃ jīvanyuddhādasmādvimokṣyate
शस्त्र इसे भेद नहीं सकेंगे और थकान इसे सताएगी नहीं। गवल्गण का यह पुत्र इस युद्ध से जीवित बच निकलेगा।
श्लोक 13 (6.2.13)
अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ । पाण्डवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुचः ॥
ahaṃ tu kīrtimeteṣāṃ kurūṇāṃ bharatarṣabha | pāṇḍavānāṃ ca sarveṣāṃ prathayiṣyāmi mā śucaḥ
और हे भरतश्रेष्ठ, मैं इन कुरुओं और सभी पाण्डवों की कीर्ति का विस्तार करूँगा। शोक मत करो।
श्लोक 14 (6.2.14)
दिष्टमेतन्नरव्याघ्र नाभिशोचितुमर्हसि । न चैव शक्यं संयन्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥
diṣṭametannaravyāghra nābhiśocitumarhasi | na caiva śakyaṃ saṃyantuṃ yato dharmastato jayaḥ
हे पुरुषसिंह, यह विधि का विधान है; इस पर शोक करना तुम्हें उचित नहीं। इसे रोका भी नहीं जा सकता। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (6.2.15)
एवमुक्त्वा स भगवान्कुरूणां प्रपितामहः । पुनरेव महाभागो धृतराष्ट्रमुवाच ह ॥
evamuktvā sa bhagavānkurūṇāṃ prapitāmahaḥ | punareva mahābhāgo dhṛtarāṣṭramuvāca ha
ऐसा कहकर कुरुओं के प्रपितामह, महाभाग भगवान् व्यास ने फिर धृतराष्ट्र से कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 16 (6.2.16)
इह युद्धे महाराज भविष्यति महान्क्षयः । तथेह च निमित्तानि भयदान्युपलक्षये ॥
iha yuddhe mahārāja bhaviṣyati mahānkṣayaḥ | tatheha ca nimittāni bhayadānyupalakṣaye
महाराज, इस युद्ध में महान् संहार होगा; और यहाँ मुझे भय देने वाले अपशकुन भी दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक 17 (6.2.17)
श्येना गृध्राश्च काकाश्च कङ्काश्च सहिता बकैः । संपतन्ति ध्वजाग्रेषु समवायांश्च कुर्वते ॥
śyenā gṛdhrāśca kākāśca kaṅkāśca sahitā bakaiḥ | saṃpatanti dhvajāgreṣu samavāyāṃśca kurvate
बाज़, गिद्ध, कौए और कंक पक्षी बगुलों के साथ ध्वजाओं के सिरों पर आ बैठते हैं और झुंड बनाते हैं।
श्लोक 18 (6.2.18)
अभ्यग्रं च प्रपश्यन्ति युद्धमानन्दिनो द्विजाः । क्रव्यादा भक्षयिष्यन्ति मांसानि गजवाजिनां ॥
abhyagraṃ ca prapaśyanti yuddhamānandino dvijāḥ | kravyādā bhakṣayiṣyanti māṃsāni gajavājināṃ
ये पक्षी प्रसन्न होकर युद्ध को निकट आता देख रहे हैं; मांसभक्षी जीव हाथियों और घोड़ों का मांस खाएँगे।
श्लोक 19 (6.2.19)
कटाकटेति वाशन्तो भैरवा भयवेदिनः । कङ्काः क्रोशन्ति मध्याह्ने दक्षिणामभितो दिशं ॥
kaṭākaṭeti vāśanto bhairavā bhayavedinaḥ | kaṅkāḥ krośanti madhyāhne dakṣiṇāmabhito diśaṃ
"कटा-कटा" का शब्द करते हुए, भय की सूचना देने वाले भयंकर कंक पक्षी दोपहर में दक्षिण दिशा की ओर चीखते हैं।
श्लोक 20 (6.2.20)
उभे पूर्वापरे सन्ध्ये नित्यं पश्यामि भारत । उदयास्तमने सूर्यं कबन्धैः परिवारितम् ॥
ubhe pūrvāpare sandhye nityaṃ paśyāmi bhārata | udayāstamane sūryaṃ kabandhaiḥ parivāritam
हे भारत, प्रातः और सायं दोनों सन्ध्याओं में मैं उगते और डूबते सूर्य को प्रतिदिन कबन्धों (सिरकटे धड़ों) से घिरा देखता हूँ।
श्लोक 21 (6.2.21)
श्वेतलोहितपर्यन्ताः कृष्णग्रीवाः सविद्युतः । त्रिवर्णाः परिघाः सन्धौ भानुमावारयन्त्युत ॥
śvetalohitaparyantāḥ kṛṣṇagrīvāḥ savidyutaḥ | trivarṇāḥ parighāḥ sandhau bhānumāvārayantyuta
सन्ध्या के समय तीन रंगों वाले परिवेष, जिनके किनारे श्वेत और लाल हैं और बीच का भाग काला है, बिजली की चमक के साथ सूर्य को घेर लेते हैं।
श्लोक 22 (6.2.22)
ज्वलितार्केन्दुनक्षत्रं निर्विशेषदिनक्षपम् । अहोरात्रं मया दृष्टं तत्क्षयाय भविष्यति ॥
jvalitārkendunakṣatraṃ nirviśeṣadinakṣapam | ahorātraṃ mayā dṛṣṭaṃ tatkṣayāya bhaviṣyati
मैंने ऐसा दिन-रात देखा है जिसमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र जलते हुए दिखे और दिन तथा रात में कोई भेद नहीं रहा; वह विनाश का कारण बनेगा।
श्लोक 23 (6.2.23)
आलक्षे प्रभया हीनां पौर्णमासीं च कार्त्तिकीम् । चन्द्रोऽभूदग्निवर्णश्च पद्मवर्णे नभस्तले ॥
ālakṣe prabhayā hīnāṃ paurṇamāsīṃ ca kārttikīm | candro'bhūdagnivarṇaśca padmavarṇe nabhastale
मैंने कार्तिक की पूर्णिमा को प्रभाहीन देखा; लाल कमल के रंग वाले आकाश में चन्द्रमा अग्नि के वर्ण का हो गया।
श्लोक 24 (6.2.24)
स्वप्स्यन्ति निहता वीरा भूमिमावृत्य पार्थिवाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ॥
svapsyanti nihatā vīrā bhūmimāvṛtya pārthivāḥ | rājāno rājaputrāśca śūrāḥ parighabāhavaḥ
मारे गए वीर भूपाल पृथ्वी को ढककर सोएँगे: राजा और राजकुमार, परिघ जैसी भुजाओं वाले शूरवीर।
श्लोक 25 (6.2.25)
अन्तरिक्षे वराहस्य वृषदंशस्य चोभयोः । प्रणादं युध्यतो रात्रौ रौद्रं नित्यं प्रलक्षये ॥
antarikṣe varāhasya vṛṣadaṃśasya cobhayoḥ | praṇādaṃ yudhyato rātrau raudraṃ nityaṃ pralakṣaye
रात में मैं प्रतिदिन आकाश में आपस में लड़ते हुए सूअर और बिलाव, दोनों का भयंकर नाद सुनता हूँ।
श्लोक 26 (6.2.26)
देवताप्रतिमाश्चैव कम्पन्ति च हसन्ति च । वमन्ति रुधिरं चास्यैः स्विद्यन्ति प्रपतन्ति च ॥
devatāpratimāścaiva kampanti ca hasanti ca | vamanti rudhiraṃ cāsyaiḥ svidyanti prapatanti ca
देवताओं की प्रतिमाएँ काँपती और हँसती हैं, मुँह से रक्त उगलती हैं, पसीने से भीग जाती हैं और गिर पड़ती हैं।
श्लोक 27 (6.2.27)
अनाहता दुन्दुभयः प्रणदन्ति विशांपते । अयुक्ताश्च प्रवर्तन्ते क्षत्रियाणां महारथाः ॥
anāhatā dundubhayaḥ praṇadanti viśāṃpate | ayuktāśca pravartante kṣatriyāṇāṃ mahārathāḥ
हे प्रजानाथ, बिना बजाए नगाड़े बज उठते हैं, और क्षत्रियों के बड़े-बड़े रथ बिना घोड़े जुते ही चल पड़ते हैं।
श्लोक 28 (6.2.28)
कोकिलाः शतपत्राश्च चाषा भासाः शुकास्तथा । सारसाश्च मयूराश्च वाचो मुञ्चन्ति दारुणाः ॥
kokilāḥ śatapatrāśca cāṣā bhāsāḥ śukāstathā | sārasāśca mayūrāśca vāco muñcanti dāruṇāḥ
कोयल, शतपत्र (कठफोड़वा), चाष (नीलकण्ठ), भास, तोते, सारस और मोर भयानक बोलियाँ बोलते हैं।
श्लोक 29 (6.2.29)
गृहीतशस्त्राः क्रोशन्ति चर्मिणो वाजिपृष्ठगाः । अरुणोदये प्रदृश्यन्ते शतशः शलभव्रजाः ॥
gṛhītaśastrāḥ krośanti carmiṇo vājipṛṣṭhagāḥ | aruṇodaye pradṛśyante śataśaḥ śalabhavrajāḥ
लोहे जैसी चोंच वाले पक्षी और काले चर्मी कीट घोड़ों की पीठ पर बैठकर चीखते हैं, और सूर्योदय के समय सैकड़ों टिड्डी-दल दिखाई देते हैं।
श्लोक 30 (6.2.30)
उभे सन्ध्ये प्रकाशन्ते दिशो दाहसमन्विते । पर्जन्यः पांसुवर्षी च मांसवर्षी च भारत ॥
ubhe sandhye prakāśante diśo dāhasamanvite | parjanyaḥ pāṃsuvarṣī ca māṃsavarṣī ca bhārata
हे भारत, दोनों सन्ध्याओं में दिशाएँ मानो जलती हुई-सी दमकती हैं, और मेघ धूल तथा मांस की वर्षा करता है।
श्लोक 31 (6.2.31)
या चैषा विश्रुता राजंस्त्रैलोक्ये साधुसंमता । अरुन्धती तयाप्येष वसिष्ठः पृष्ठतः कृतः ॥
yā caiṣā viśrutā rājaṃstrailokye sādhusaṃmatā | arundhatī tayāpyeṣa vasiṣṭhaḥ pṛṣṭhataḥ kṛtaḥ
राजन्, तीनों लोकों में विख्यात और सज्जनों द्वारा सम्मानित जो अरुन्धती है, उसने भी वसिष्ठ को अपने पीछे कर दिया है।
श्लोक 32 (6.2.32)
रोहिणीं पीडयन्नेष स्थितो राजञ्शनैश्चरः । व्यावृत्तं लक्ष्म सोमस्य भविष्यति महद्भयम् ॥
rohiṇīṃ pīḍayanneṣa sthito rājañśanaiścaraḥ | vyāvṛttaṃ lakṣma somasya bhaviṣyati mahadbhayam
राजन्, शनैश्चर रोहिणी को पीड़ित करता हुआ स्थित है; चन्द्रमा का चिह्न उलट गया है। महान् भय आने वाला है।
श्लोक 33 (6.2.33)
अनभ्रे च महाघोरस्तनितं श्रूयते भृशम् । वाहनानां च रुदतां निपतन्त्यश्रुबिन्दवः ॥
anabhre ca mahāghorastanitaṃ śrūyate bhṛśam | vāhanānāṃ ca rudatāṃ nipatantyaśrubindavaḥ
बादल न होने पर भी अत्यन्त भयानक गर्जना जोर से सुनाई देती है, और रोते हुए वाहन-पशुओं की आँखों से आँसू गिरते हैं।