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भीष्म पर्व · अध्याय 101

अभिमन्यु द्वारा अलम्बुस की पराजय; सात्यकि का कृप, अश्वत्थामा और द्रोण से युद्ध

युद्ध के नौवें दिन धृतराष्ट्र पूछते हैं कि राक्षस अलम्बुस के सामने अभिमन्यु ने कैसा युद्ध किया। सञ्जय बताते हैं कि दोनों में बाणों का भीषण आदान-प्रदान हुआ; अलम्बुस ने रणभूमि पर माया का अन्धकार फैला दिया, जिसे अभिमन्यु ने भास्कर अस्त्र से नष्ट कर दिया, और वह राक्षस रथ छोड़कर भाग गया। अभिमन्यु ने कौरव-सेना को रौंद डाला, तब भीष्म और कौरव महारथियों ने उसे घेर लिया। अर्जुन अपने पुत्र की सहायता के लिए भीष्म से भिड़े; सात्यकि ने कृप से और फिर अश्वत्थामा से युद्ध करके उसे मूर्च्छित कर दिया, और जब द्रोण अपने पुत्र को बचाने आए, तब अर्जुन द्रोण की ओर बढ़े।

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.101.1)

आर्जुनिं समरे शूरं विनिघ्नन्तं महारथान् । अलम्बुसः कथं युद्धे प्रत्ययुध्यत सञ्जय ॥

ārjuniṃ samare śūraṃ vinighnantaṃ mahārathān | alambusaḥ kathaṃ yuddhe pratyayudhyata sañjaya

सञ्जय, जब वीर अर्जुनपुत्र रणभूमि में महारथियों का संहार कर रहा था, तब अलम्बुस ने युद्ध में उसका सामना किस प्रकार किया?

श्लोक 2 (6.101.2)

आर्श्यशृङ्गिं कथं चैव सौभद्रः परवीरहा । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन यथावृत्तं स्म संयुगे ॥

ārśyaśṛṅgiṃ kathaṃ caiva saubhadraḥ paravīrahā | tanmamācakṣva tattvena yathāvṛttaṃ sma saṃyuge

और शत्रुवीरों का संहार करने वाले सुभद्रानन्दन ने ऋष्यशृङ्ग के पुत्र से कैसे युद्ध किया? युद्ध में जो कुछ जैसा हुआ, वह मुझे ठीक-ठीक बताओ।

श्लोक 3 (6.101.3)

धनंजयश्च किं चक्रे मम सैन्येषु संयुगे । भीमो वा रथिनां श्रेष्ठो राक्षसो वा घटोत्कचः ॥

dhanaṃjayaśca kiṃ cakre mama sainyeṣu saṃyuge | bhīmo vā rathināṃ śreṣṭho rākṣaso vā ghaṭotkacaḥ

और धनञ्जय ने युद्ध में मेरी सेनाओं के बीच क्या किया? अथवा रथियों में श्रेष्ठ भीम ने, या राक्षस घटोत्कच ने क्या किया?

श्लोक 4 (6.101.4)

नकुलः सहदेवो वा सात्यकिर्वा महारथः । एतदाचक्ष्व मे सत्यं कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥

nakulaḥ sahadevo vā sātyakirvā mahārathaḥ | etadācakṣva me satyaṃ kuśalo hyasi sañjaya

अथवा नकुल और सहदेव ने, या महारथी सात्यकि ने क्या किया? सञ्जय, यह सब मुझे सच-सच बताओ, क्योंकि तुम वर्णन करने में कुशल हो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (6.101.5)

हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि संग्रामं रोमहर्षणम् । यथाऽभूद्राक्षसेन्द्रस्य सौभद्रस्य च मारिष ॥

hanta te'haṃ pravakṣyāmi saṃgrāmaṃ romaharṣaṇam | yathā'bhūdrākṣasendrasya saubhadrasya ca māriṣa

अच्छा, मान्यवर, मैं आपको वह रोमांचकारी संग्राम सुनाता हूँ, जैसा राक्षसराज और सुभद्रानन्दन के बीच हुआ;

श्लोक 6 (6.101.6)

अर्जुनश्च यथा सङ्ख्ये भीमसेनश्च पाण्डवः । नकुलः सहदेवश्च रणे चक्रुः पराक्रमम् ॥

arjunaśca yathā saṅkhye bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | nakulaḥ sahadevaśca raṇe cakruḥ parākramam

और यह भी कि अर्जुन, पाण्डुपुत्र भीमसेन, नकुल और सहदेव ने रण में कैसा पराक्रम दिखाया;

श्लोक 7 (6.101.7)

तथैव तावकाः सर्वे भीष्मद्रोणपुरःसराः । अद्भुतानि विचित्राणि चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥

tathaiva tāvakāḥ sarve bhīṣmadroṇapuraḥsarāḥ | adbhutāni vicitrāṇi cakruḥ karmāṇyabhītavat

तथा भीष्म और द्रोण के नेतृत्व में आपके सभी योद्धाओं ने भी मानो निर्भय होकर कैसे अद्भुत और विचित्र पराक्रम किए।

श्लोक 8 (6.101.8)

अलम्बुसस्तु समरे अभिमन्युं महारथम् । विनद्य सुमहानादं तर्जयित्वा मुहुर्मुहुः ॥

alambusastu samare abhimanyuṃ mahāratham | vinadya sumahānādaṃ tarjayitvā muhurmuhuḥ

रणभूमि में अलम्बुस ने महारथी अभिमन्यु को देखकर बड़ी भारी गर्जना की और बार-बार उसे धमकाते हुए

श्लोक 9 (6.101.9)

अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । अभिमन्युश्च वेगेन सिंहवद्विनदन्मुहुः ॥

abhidudrāva vegena tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | abhimanyuśca vegena siṃhavadvinadanmuhuḥ

वेग से उस पर धावा बोला और कहा, "ठहर, ठहर!" अभिमन्यु भी सिंह के समान बार-बार गरजता हुआ वेग से

श्लोक 10 (6.101.10)

आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं पितुरत्यन्तवैरिणम् । ततः समीयतुः सङ्ख्ये त्वरितौ नरराक्षसौ ॥

ārśyaśṛṅgiṃ maheṣvāsaṃ pituratyantavairiṇam | tataḥ samīyatuḥ saṅkhye tvaritau nararākṣasau

ऋष्यशृङ्ग के पुत्र, उस महाधनुर्धर की ओर बढ़ा जो उसके पिता का घोर शत्रु था। तब वह मनुष्य और वह राक्षस शीघ्रता से युद्ध में भिड़ गए,

श्लोक 11 (6.101.11)

रथाभ्यां रथिनौ श्रेष्ठौ यथा वै देवदानवौ । मायावी राक्षसश्रेष्ठो दिव्यास्त्रश्चैव फाल्गुनिः ॥

rathābhyāṃ rathinau śreṣṭhau yathā vai devadānavau | māyāvī rākṣasaśreṣṭho divyāstraścaiva phālguniḥ

रथों पर सवार वे दोनों श्रेष्ठ रथी देवता और दानव के समान थे: राक्षसों में श्रेष्ठ वह मायावी था, और फाल्गुन (अर्जुन) का पुत्र दिव्य अस्त्रों से सम्पन्न।

श्लोक 12 (6.101.12)

ततः कार्ष्णिर्महाराज निशितैः सायकैस्त्रिभिः । आर्श्यशृङ्गिं रणे विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥

tataḥ kārṣṇirmahārāja niśitaiḥ sāyakaistribhiḥ | ārśyaśṛṅgiṃ raṇe viddhvā punarvivyādha pañcabhiḥ

महाराज, तब अर्जुनपुत्र ने तीन तीखे बाणों से ऋष्यशृङ्ग के पुत्र को रण में बींधकर फिर पाँच बाणों से बींध दिया।

श्लोक 13 (6.101.13)

अलम्बुसोऽपि संक्रुद्धः कार्ष्णिं नवभिराशुगैः । हृदि विव्याध वेगेन तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥

alambuso'pi saṃkruddhaḥ kārṣṇiṃ navabhirāśugaiḥ | hṛdi vivyādha vegena totrairiva mahādvipam

अलम्बुस ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर नौ शीघ्रगामी बाणों से अर्जुनपुत्र की छाती पर वेग से प्रहार किया, जैसे कोई बड़े हाथी को अंकुशों से बेधता है।

श्लोक 14 (6.101.14)

ततः शरसहस्रेण क्षिप्रकारी निशाचरः । अर्जुनस्य सुतं सङ्ख्ये पीडयामास भारत ॥

tataḥ śarasahasreṇa kṣiprakārī niśācaraḥ | arjunasya sutaṃ saṅkhye pīḍayāmāsa bhārata

हे भारत, तब फुर्तीले उस निशाचर ने सहस्र बाणों से युद्ध में अर्जुनपुत्र को पीड़ित कर दिया।

श्लोक 15 (6.101.15)

अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो नवभिर्नतपर्वभिः । बिभेद निशितैर्बाणै राक्षसेन्द्रं महोरसि ॥

abhimanyustataḥ kruddho navabhirnataparvabhiḥ | bibheda niśitairbāṇai rākṣasendraṃ mahorasi

तब अभिमन्यु ने क्रुद्ध होकर झुकी गाँठों वाले नौ तीखे बाणों से राक्षसराज की चौड़ी छाती को बींध डाला।

श्लोक 16 (6.101.16)

ते तस्य विविशुस्तूर्णं कायं निर्भिद्य मर्मसु । स तैर्विभिन्नसर्वाङ्गः शुशुभे राक्षसोत्तमः ॥

te tasya viviśustūrṇaṃ kāyaṃ nirbhidya marmasu | sa tairvibhinnasarvāṅgaḥ śuśubhe rākṣasottamaḥ

वे बाण उसके मर्मस्थानों को चीरते हुए शीघ्र ही उसके शरीर में घुस गए। उनसे सारे अंग बिंध जाने पर वह श्रेष्ठ राक्षस ऐसा शोभित हुआ

श्लोक 17 (6.101.17)

पुष्पितैः किंशुकै राजन्संस्तीर्ण इव पर्वतः । स संदधानश्च शरान्हेमपुङ्खान्महाबलः ॥

puṣpitaiḥ kiṃśukai rājansaṃstīrṇa iva parvataḥ | sa saṃdadhānaśca śarānhemapuṅkhānmahābalaḥ

हे राजन्, मानो खिले हुए पलाश-वृक्षों से ढका पर्वत हो। सोने के पंखों वाले उन बाणों को धारण किए हुए वह महाबली

श्लोक 18 (6.101.18)

विबभौ राक्षसश्रेष्ठः सज्वाल इव पर्वतः । ततः क्रुद्धो महाराज आर्श्यशृङ्गिरमर्षणः ॥

vibabhau rākṣasaśreṣṭhaḥ sajvāla iva parvataḥ | tataḥ kruddho mahārāja ārśyaśṛṅgiramarṣaṇaḥ

राक्षसश्रेष्ठ ज्वालाओं से घिरे पर्वत के समान चमक उठा। महाराज, तब ऋष्यशृङ्ग के उस असहिष्णु पुत्र ने क्रोध में भरकर

श्लोक 19 (6.101.19)

महेन्द्रप्रतिमं कार्ष्णिं छादयामास पत्रिभिः । तेन ते विशिखा मुक्ता यमदण्डोपमाः शिताः ॥

mahendrapratimaṃ kārṣṇiṃ chādayāmāsa patribhiḥ | tena te viśikhā muktā yamadaṇḍopamāḥ śitāḥ

महेन्द्र के समान पराक्रमी अर्जुनपुत्र को पंखदार बाणों से ढक दिया। उसके छोड़े हुए यमदण्ड के समान तीखे बाण

श्लोक 20 (6.101.20)

अभिमन्युं विनिर्भिद्य प्राविशन्त धरातलम् । तथैवार्जुनिना मुक्ताः शराः कनकभूषणाः ॥

abhimanyuṃ vinirbhidya prāviśanta dharātalam | tathaivārjuninā muktāḥ śarāḥ kanakabhūṣaṇāḥ

अभिमन्यु को बेधकर धरती में समा गए। इसी प्रकार अर्जुनपुत्र के छोड़े हुए स्वर्णभूषित बाण

श्लोक 21 (6.101.21)

अलम्बुसं विनिर्भिद्य प्राविशन्त धरातलम् । सौभद्रस्तु रणे रक्षः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

alambusaṃ vinirbhidya prāviśanta dharātalam | saubhadrastu raṇe rakṣaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

अलम्बुस को बेधकर धरती में समा गए। फिर सुभद्रानन्दन ने झुकी गाँठों वाले बाणों से

श्लोक 22 (6.101.22)

चक्रे विमुखमासाद्य बलं शक्र इवाहवे । विमुखं च रणे रक्षो वध्यमानं रणेऽरिणा ॥

cakre vimukhamāsādya balaṃ śakra ivāhave | vimukhaṃ ca raṇe rakṣo vadhyamānaṃ raṇe'riṇā

उस राक्षस पर चढ़ाई करके उसे युद्ध में विमुख कर दिया, जैसे इन्द्र ने संग्राम में बल दैत्य को विमुख किया था। रण में विमुख होकर और शत्रु की मार खाकर उस राक्षस ने

श्लोक 23 (6.101.23)

प्रादुश्चक्रे महामायां तामसीमरिघातिनीम् । ततस्ते तमसा सर्वे वृताश्चासन्महीपते ॥

prāduścakre mahāmāyāṃ tāmasīmarighātinīm | tataste tamasā sarve vṛtāścāsanmahīpate

शत्रुओं का नाश करने वाली अन्धकारमयी महामाया प्रकट की। हे पृथ्वीपति, तब सब लोग अन्धकार से ढक गए;

श्लोक 24 (6.101.24)

नाभिमन्युमपश्यन्त नैव स्वान्न परान्रणे । अभिमन्युश्च तद्दृष्ट्वा घोररूपं महत्तमः ॥

nābhimanyumapaśyanta naiva svānna parānraṇe | abhimanyuśca taddṛṣṭvā ghorarūpaṃ mahattamaḥ

रण में वे न अभिमन्यु को देख पाते थे, न अपने पक्ष को, न शत्रुओं को। उस भयंकर और घने अन्धकार को देखकर

श्लोक 25 (6.101.25)

प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमत्युग्रं भास्करं कुरुनन्दनः । ततः प्रकाशमभवज्जगत्सर्वं महीपते ॥

prāduścakre'stramatyugraṃ bhāskaraṃ kurunandanaḥ | tataḥ prakāśamabhavajjagatsarvaṃ mahīpate

कुरुनन्दन अभिमन्यु ने अत्यन्त उग्र भास्कर (सूर्य) अस्त्र प्रकट किया। हे पृथ्वीपति, तब सारा जगत् प्रकाशित हो उठा

श्लोक 26 (6.101.26)

तां चाभिजघ्निवान्मायां राक्षसस्य दुरात्मनः । संक्रुद्धश्च महावीर्यो राक्षसेन्द्रं नरोत्तमः ॥

tāṃ cābhijaghnivānmāyāṃ rākṣasasya durātmanaḥ | saṃkruddhaśca mahāvīryo rākṣasendraṃ narottamaḥ

और उसने उस दुष्ट राक्षस की माया नष्ट कर दी। फिर उस महापराक्रमी नरश्रेष्ठ ने क्रोध में भरकर राक्षसराज को

श्लोक 27 (6.101.27)

छादयामास समरे शरैः सन्नतपर्वभिः । बह्वीस्तथाऽन्या मायाश्च प्रयुक्तास्तेन रक्षसा ॥

chādayāmāsa samare śaraiḥ sannataparvabhiḥ | bahvīstathā'nyā māyāśca prayuktāstena rakṣasā

रण में झुकी गाँठों वाले बाणों से ढक दिया। उस राक्षस ने और भी बहुत-सी मायाएँ रचीं,

श्लोक 28 (6.101.28)

सर्वास्त्रविदमेयात्मा वारयामास फाल्गुनिः । हतमायं ततो रक्षो वध्यमानं च सायकैः ॥

sarvāstravidameyātmā vārayāmāsa phālguniḥ | hatamāyaṃ tato rakṣo vadhyamānaṃ ca sāyakaiḥ

किन्तु सब अस्त्रों के ज्ञाता, अपरिमित आत्मबल वाले फाल्गुनपुत्र ने उन सबको रोक दिया। माया नष्ट हो जाने पर और बाणों से घायल होकर वह राक्षस

श्लोक 29 (6.101.29)

रथं तत्रैव संत्यज्य प्राद्रवन्महतो भयात् । तस्मिन्विनिर्जिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ॥

rathaṃ tatraiva saṃtyajya prādravanmahato bhayāt | tasminvinirjite tūrṇaṃ kūṭayodhini rākṣase

अपना रथ वहीं छोड़कर बड़े भय से भाग खड़ा हुआ। छल से लड़ने वाले उस राक्षस के शीघ्र पराजित हो जाने पर

श्लोक 30 (6.101.30)

आर्जुनिः समरे सैन्यं तावकं संममर्द ह । मदान्धो वन्यनागेन्द्रः सपद्मां पद्मिनीमिव ॥

ārjuniḥ samare sainyaṃ tāvakaṃ saṃmamarda ha | madāndho vanyanāgendraḥ sapadmāṃ padminīmiva

अर्जुनपुत्र ने युद्ध में आपकी सेना को वैसे ही रौंद डाला, जैसे मद से अन्धा जंगली गजराज कमलों से भरे सरोवर को रौंद डालता है।

श्लोक 31 (6.101.31)

ततः शान्तनवो भीष्मः सैन्यं दृष्ट्वाऽभिविद्रुतम् । महता शरवर्षेण सौभद्रं पर्यवारयत् ॥

tataḥ śāntanavo bhīṣmaḥ sainyaṃ dṛṣṭvā'bhividrutam | mahatā śaravarṣeṇa saubhadraṃ paryavārayat

तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने अपनी सेना को भागते देखकर बाणों की भारी वर्षा से सुभद्रानन्दन को घेर लिया।

श्लोक 32 (6.101.32)

कोष्ठीकृत्य च तं वीरं धार्तराष्ट्रा महारथाः । एवं सुबहवो युद्धे ततक्षुः सायकैर्दृढम् ॥

koṣṭhīkṛtya ca taṃ vīraṃ dhārtarāṣṭrā mahārathāḥ | evaṃ subahavo yuddhe tatakṣuḥ sāyakairdṛḍham

उस वीर को चारों ओर से घेरकर धृतराष्ट्र-पक्ष के बहुत-से महारथी युद्ध में बाणों से उस पर कसकर प्रहार करने लगे।

श्लोक 33 (6.101.33)

स तेषां रथिनां वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः । सदृशो वासुदेवस्य विक्रमेण बलेन च ॥

sa teṣāṃ rathināṃ vīraḥ pitustulyaparākramaḥ | sadṛśo vāsudevasya vikrameṇa balena ca

पिता के समान पराक्रमी और विक्रम तथा बल में वासुदेव के समान वह वीर उन रथियों के सामने डटा रहा;

श्लोक 34 (6.101.34)

उभयोः सदृशं कर्म स पितुर्मातुलस्य च । रणे बहुविधं चक्रे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥

ubhayoḥ sadṛśaṃ karma sa piturmātulasya ca | raṇe bahuvidhaṃ cakre sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ

सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उस वीर ने रण में अपने पिता और मामा दोनों के योग्य अनेक प्रकार के पराक्रम किए।

श्लोक 35 (6.101.35)

ततो धनञ्जयो वीरो विनिघ्नंस्तव सैनिकान् । आससाद रणे भीष्मं पुत्रप्रेप्सुरमर्षणः ॥

tato dhanañjayo vīro vinighnaṃstava sainikān | āsasāda raṇe bhīṣmaṃ putraprepsuramarṣaṇaḥ

तब वीर धनञ्जय आपके सैनिकों का संहार करते हुए अपने पुत्र तक पहुँचने की इच्छा से, क्रोध में भरे, रण में भीष्म के सामने आ पहुँचे।

श्लोक 36 (6.101.36)

तथैव समरे राजन्पिता देवव्रतस्तव । आससाद रणे पार्थं स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥

tathaiva samare rājanpitā devavratastava | āsasāda raṇe pārthaṃ svarbhānuriva bhāskaram

हे राजन्, उसी प्रकार आपके पिता देवव्रत (भीष्म) रण में पार्थ के सामने आ डटे, जैसे स्वर्भानु (राहु) सूर्य पर आ झपटता है।

श्लोक 37 (6.101.37)

ततः सरथनागाश्वाः पुत्रास्तव जनेश्वर । परिवव्रू रणे भीष्मं जुगुपुश्च समन्ततः ॥

tataḥ sarathanāgāśvāḥ putrāstava janeśvara | parivavrū raṇe bhīṣmaṃ jugupuśca samantataḥ

हे जनेश्वर, तब रथों, हाथियों और घोड़ों के साथ आपके पुत्रों ने रण में भीष्म को घेर लिया और चारों ओर से उनकी रक्षा करने लगे।

श्लोक 38 (6.101.38)

तथैव पाण्डवा राजन्परिवार्य धनञ्जयम् । रणाय महते युक्ता दंशिता भरतर्षभ ॥

tathaiva pāṇḍavā rājanparivārya dhanañjayam | raṇāya mahate yuktā daṃśitā bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ राजन्, उसी प्रकार कवच धारण किए, महान् युद्ध के लिए तत्पर पाण्डवों ने धनञ्जय को घेर लिया।

श्लोक 39 (6.101.39)

शारद्वतस्ततो राजन्भीष्मस्य प्रमुखे स्थितम् । अर्जुनं पञ्चविंशत्या सायकानां समाचिनोत् ॥

śāradvatastato rājanbhīṣmasya pramukhe sthitam | arjunaṃ pañcaviṃśatyā sāyakānāṃ samācinot

हे राजन्, तब शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य ने भीष्म के सामने खड़े अर्जुन को पच्चीस बाणों से ढक दिया।

श्लोक 40 (6.101.40)

प्रत्युद्गम्याथ विव्याध सात्यकिस्तं शितैः शरैः । पाण्डवप्रियकामार्थं शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥

pratyudgamyātha vivyādha sātyakistaṃ śitaiḥ śaraiḥ | pāṇḍavapriyakāmārthaṃ śārdūla iva kuñjaram

पाण्डव का प्रिय करने की इच्छा से सात्यकि ने आगे बढ़कर तीखे बाणों से कृप को वैसे ही बींधा, जैसे बाघ हाथी पर प्रहार करता है।

श्लोक 41 (6.101.41)

गौतमोऽपि त्वरायुक्तो माधवं नवभिः शरैः । हृदि विव्याध संक्रुद्धः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥

gautamo'pi tvarāyukto mādhavaṃ navabhiḥ śaraiḥ | hṛdi vivyādha saṃkruddhaḥ kaṅkapatraparicchadaiḥ

गौतम (कृप) ने भी फुर्ती से, क्रोध में भरकर, कंकपक्षी के पंखों वाले नौ बाणों से माधव (सात्यकि) की छाती बींध दी।

श्लोक 42 (6.101.42)

शैनेयोऽपि ततः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान् । गौतमान्तकरं तूर्णं समाधत्त शिलीमुखम् ॥

śaineyo'pi tataḥ kruddhaścāpamānamya vegavān | gautamāntakaraṃ tūrṇaṃ samādhatta śilīmukham

तब शिनि के पौत्र सात्यकि ने क्रुद्ध होकर वेग से धनुष झुकाया और तुरन्त उस पर गौतम का अन्त कर देने वाला बाण चढ़ाया।

श्लोक 43 (6.101.43)

तमापतन्तं वेगेन शक्राशनिसमद्युतिम् । द्विधा चिच्छेद संक्रुद्धो द्रौणिः परमकोपनः ॥

tamāpatantaṃ vegena śakrāśanisamadyutim | dvidhā ciccheda saṃkruddho drauṇiḥ paramakopanaḥ

इन्द्र के वज्र के समान चमकते हुए उस बाण को वेग से आते देख अत्यन्त क्रोधी द्रोणपुत्र ने क्रुद्ध होकर उसके दो टुकड़े कर दिए।

श्लोक 44 (6.101.44)

समुत्सृज्याथ शैनेयो गौतमं रथिनां वरः । अभ्यद्रवद्रणे द्रौणिं राहुः खे शशिनं यथा ॥

samutsṛjyātha śaineyo gautamaṃ rathināṃ varaḥ | abhyadravadraṇe drauṇiṃ rāhuḥ khe śaśinaṃ yathā

तब रथियों में श्रेष्ठ सात्यकि गौतम को छोड़कर रण में द्रोणपुत्र पर ऐसे टूट पड़े, जैसे आकाश में राहु चन्द्रमा पर झपटता है।

श्लोक 45 (6.101.45)

तस्य द्रोणसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद भारत । अथैनं छिन्नधन्वानं ताडयामास सायकैः ॥

tasya droṇasutaścāpaṃ dvidhā ciccheda bhārata | athainaṃ chinnadhanvānaṃ tāḍayāmāsa sāyakaiḥ

हे भारत, द्रोणपुत्र ने उनका धनुष काटकर दो टुकड़े कर दिया और फिर धनुष कट जाने पर उन्हें बाणों से घायल किया।

श्लोक 46 (6.101.46)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय शत्रुघ्नं भारसाधनम् । द्रौणिं षष्ट्या महाराज बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

so'nyatkārmukamādāya śatrughnaṃ bhārasādhanam | drauṇiṃ ṣaṣṭyā mahārāja bāhvorurasi cārpayat

महाराज, सात्यकि ने शत्रुनाशक और भारी बोझ सहने वाला दूसरा धनुष लेकर द्रोणपुत्र की भुजाओं और छाती में साठ बाण मारे।

श्लोक 47 (6.101.47)

स विद्धो व्यथितश्चैव मुहूर्तं कश्मलायुतः । निषसाद रथोपस्थे ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥

sa viddho vyathitaścaiva muhūrtaṃ kaśmalāyutaḥ | niṣasāda rathopasthe dhvajayaṣṭiṃ samāśritaḥ

घायल और पीड़ित होकर अश्वत्थामा क्षण भर के लिए मूर्च्छा से घिर गया और ध्वजदण्ड का सहारा लेकर रथ की बैठक में बैठ गया।

श्लोक 48 (6.101.48)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । वार्ष्णेयं समरे क्रुद्धो नाराचेन समार्पयत् ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ droṇaputraḥ pratāpavān | vārṣṇeyaṃ samare kruddho nārācena samārpayat

होश में आने पर प्रतापी द्रोणपुत्र ने क्रुद्ध होकर रण में वार्ष्णेय (सात्यकि) पर नाराच बाण से प्रहार किया।

श्लोक 49 (6.101.49)

शैनेयं स तु निर्भिद्य प्राविशद्धरणीतलम् । वसन्तकाले बलवान्बिलं सर्पशिशुर्यथा ॥

śaineyaṃ sa tu nirbhidya prāviśaddharaṇītalam | vasantakāle balavānbilaṃ sarpaśiśuryathā

वह बाण सात्यकि को बेधकर धरती में ऐसे समा गया, जैसे वसन्त ऋतु में कोई बलवान् सर्प-शिशु बिल में घुस जाता है।

श्लोक 50 (6.101.50)

अथापरेण भल्लेन माधवस्य ध्वजोत्तमम् । चिच्छेद समरे द्रौणिः सिंहनादं मुमोच ह ॥

athāpareṇa bhallena mādhavasya dhvajottamam | ciccheda samare drauṇiḥ siṃhanādaṃ mumoca ha

फिर द्रोणपुत्र ने एक और भल्ल बाण से रण में माधव की उत्तम ध्वजा काट गिराई और सिंहनाद किया।

श्लोक 51 (6.101.51)

पुनश्चैनं शरैर्घोरैश्छादयामास भारत । निदाघान्ते महाराज यथा मेघो दिवाकरम् ॥

punaścainaṃ śarairghoraiśchādayāmāsa bhārata | nidāghānte mahārāja yathā megho divākaram

हे भारत, महाराज, उसने फिर भयंकर बाणों से सात्यकि को वैसे ही ढक दिया, जैसे ग्रीष्म के अन्त में मेघ सूर्य को ढक लेता है।

श्लोक 52 (6.101.52)

सात्यकिश्च महाराज शरजालं निहत्य तत् । द्रौणिमभ्याकिरत्तूर्णं शरजालैरनेकधा ॥

sātyakiśca mahārāja śarajālaṃ nihatya tat | drauṇimabhyākirattūrṇaṃ śarajālairanekadhā

महाराज, सात्यकि ने बाणों के उस जाल को नष्ट करके तुरन्त अनेक प्रकार से बाणों के जाल द्रोणपुत्र पर बरसा दिए।

श्लोक 53 (6.101.53)

तापयामास च द्रौणिं शैनेयः परवीरहा । विमुक्तो मेघजालेन यथैव तपनस्तथा ॥

tāpayāmāsa ca drauṇiṃ śaineyaḥ paravīrahā | vimukto meghajālena yathaiva tapanastathā

और शत्रुवीरों का संहार करने वाले सात्यकि ने बादलों के जाल से छूटे हुए सूर्य के समान द्रोणपुत्र को संतप्त कर दिया।

श्लोक 54 (6.101.54)

शराणां च सहस्रेण पुनरेव समुद्यतः । सात्यकिश्छादयामास ननाद च महाबलः ॥

śarāṇāṃ ca sahasreṇa punareva samudyataḥ | sātyakiśchādayāmāsa nanāda ca mahābalaḥ

फिर से उद्यत होकर महाबली सात्यकि ने सहस्र बाणों से उसे ढक दिया और गर्जना की।

श्लोक 55 (6.101.55)

दृष्ट्वा पुत्रं च तं ग्रस्तं राहुणेव निशाकरम् । अभ्यद्रवत शैनेयं भारद्वाजः प्रतापवान् ॥

dṛṣṭvā putraṃ ca taṃ grastaṃ rāhuṇeva niśākaram | abhyadravata śaineyaṃ bhāradvājaḥ pratāpavān

अपने पुत्र को राहु से ग्रस्त चन्द्रमा के समान घिरा देखकर प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोण सात्यकि पर टूट पड़े

श्लोक 56 (6.101.56)

विव्याध च सुतीक्ष्णेन पृषत्केन महामृधे । परीप्सन्स्वसुतं राजन्वार्ष्णेयेनाभिपीडितम् ॥

vivyādha ca sutīkṣṇena pṛṣatkena mahāmṛdhe | parīpsansvasutaṃ rājanvārṣṇeyenābhipīḍitam

और हे राजन्, वार्ष्णेय से पीड़ित अपने पुत्र को बचाने की इच्छा से उस महासमर में उन्होंने अत्यन्त तीखे बाण से सात्यकि को बींध दिया।

श्लोक 57 (6.101.57)

सात्यकिस्तु रणे हित्वा गुरुपुत्रं महारथम् । द्रोणं विव्याध विंशत्या सर्वपारशवैः शरैः ॥

sātyakistu raṇe hitvā guruputraṃ mahāratham | droṇaṃ vivyādha viṃśatyā sarvapāraśavaiḥ śaraiḥ

परन्तु सात्यकि ने रण में महारथी गुरुपुत्र को छोड़कर पूर्णतः लोहे के बने बीस बाणों से द्रोण को बींध दिया।

श्लोक 58 (6.101.58)

तदन्तरममेयात्मा कौन्तेयः शत्रुतापनः । अभ्यद्रवद्रणे क्रुद्धो द्रोणं प्रति महारथः ॥

tadantaramameyātmā kaunteyaḥ śatrutāpanaḥ | abhyadravadraṇe kruddho droṇaṃ prati mahārathaḥ

इसी बीच अपरिमित आत्मबल वाले, शत्रुओं को तपाने वाले महारथी कुन्तीपुत्र अर्जुन क्रोध में भरकर रण में द्रोण पर टूट पड़े।

श्लोक 59 (6.101.59)

ततो द्रोणश्च पार्थश्च समेयातां महामृधे । यथा बुधश्च शुक्रश्च महाराज नभस्तले ॥

tato droṇaśca pārthaśca sameyātāṃ mahāmṛdhe | yathā budhaśca śukraśca mahārāja nabhastale

महाराज, तब उस महासमर में द्रोण और पार्थ ऐसे भिड़ गए, जैसे आकाश में बुध और शुक्र मिलते हैं।

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