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भीष्म पर्व · अध्याय 100

अभिमन्यु का पराक्रम; अलम्बुष और द्रौपदीपुत्रों का युद्ध

अभिमन्यु अपने पीले-भूरे घोड़ों वाले रथ से दुर्योधन की सेना पर टूट पड़ता है और उसे तितर-बितर कर देता है; वह धूमरहित अग्नि-सा दमकता है, उसका धनुष सूर्यमण्डल-सा मण्डलाकार खिंचा रहता है, और लोग समझते हैं कि संसार में दो अर्जुन हैं। दुर्योधन ऋष्यशृंगपुत्र राक्षस अलम्बुष को उसके विरुद्ध भेजता है; राक्षस की गर्जना से पाण्डव-सेना में भगदड़ मच जाती है, और वह उसे भगाकर द्रौपदी के पाँचों पुत्रों पर झपटता है। वे उसे इतना घायल करते हैं कि वह मूर्च्छित हो जाता है, पर होश में आकर वह उनके धनुष और ध्वज काट देता है, घोड़े और सारथि मार डालता है और उन्हें रथहीन कर देता है; तब अभिमन्यु उनकी सहायता को दौड़ता है और दोनों में इन्द्र और शम्बर जैसा भीषण द्वन्द्व छिड़ जाता है।

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.100.1)

अभिमन्यू रथोदारः पिशङ्गैस्तुरगोत्तमैः । अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनबलं महत् ॥

abhimanyū rathodāraḥ piśaṅgaisturagottamaiḥ | abhidudrāva tejasvī duryodhanabalaṃ mahat

उदार रथी, तेजस्वी अभिमन्यु अपने पीले-भूरे श्रेष्ठ घोड़ों के साथ दुर्योधन की विशाल सेना पर टूट पड़ा,

श्लोक 2 (6.100.2)

विकिरञ्शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदः । न शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम् ॥

vikirañśaravarṣāṇi vāridhārā ivāmbudaḥ | na śekuḥ samare kruddhaṃ saubhadramarisūdanam

जैसे मेघ जल की धाराएँ बरसाता है, वैसे ही बाणों की झड़ी लगाता हुआ। शत्रुओं का संहार करने वाला वह क्रुद्ध सुभद्रानन्दन

श्लोक 3 (6.100.3)

शस्त्रौघिणं गाहमानं सेनासागरमक्षयम् । निवारयितुमप्याजौ त्वदीयाः कुरुनन्दन ॥

śastraughiṇaṃ gāhamānaṃ senāsāgaramakṣayam | nivārayitumapyājau tvadīyāḥ kurunandana

शस्त्रों की बाढ़ लिए अक्षय सेना-सागर में घुसता चला गया, और हे कुरुनन्दन, आपके योद्धा युद्ध में उसे रोक भी न सके।

श्लोक 4 (6.100.4)

तेन मुक्ता रणे राजञ्शराः शत्रुनिबर्हणाः । क्षत्रियाननयञ्शूरान्प्रेतराजनिवेशनम् ॥

tena muktā raṇe rājañśarāḥ śatrunibarhaṇāḥ | kṣatriyānanayañśūrānpretarājaniveśanam

हे राजन्, युद्ध में उसके छोड़े शत्रुनाशक बाणों ने शूरवीर क्षत्रियों को प्रेतराज यम के लोक पहुँचा दिया।

श्लोक 5 (6.100.5)

यमदण्डोपमान्घोराञ्ज्वलिताशीविषोपमान् । सौभद्रः समरे क्रुद्धः प्रेषयामास सायकान् ॥

yamadaṇḍopamānghorāñjvalitāśīviṣopamān | saubhadraḥ samare kruddhaḥ preṣayāmāsa sāyakān

रण में क्रुद्ध सुभद्रानन्दन ने यमदण्ड के समान भयानक, प्रज्वलित विषधर सर्पों जैसे बाण छोड़े।

श्लोक 6 (6.100.6)

सरथान्रथिनस्तूर्णं हयांश्चैव ससादिनः । गजारोहांश्च सगजान्दारयामास फाल्गुनिः ॥

sarathānrathinastūrṇaṃ hayāṃścaiva sasādinaḥ | gajārohāṃśca sagajāndārayāmāsa phālguniḥ

अर्जुनपुत्र ने शीघ्र ही रथियों को रथों सहित, घुड़सवारों को घोड़ों सहित और हाथीसवारों को हाथियों सहित चीर डाला।

श्लोक 7 (6.100.7)

तस्य तत्कुर्वतः कर्म महत्सङ्ख्ये महीभृतः । पूजयांचक्रिरे हृष्टाः प्रशशंसुश्च फाल्गुनिम् ॥

tasya tatkurvataḥ karma mahatsaṅkhye mahībhṛtaḥ | pūjayāṃcakrire hṛṣṭāḥ praśaśaṃsuśca phālgunim

युद्ध में उसे यह महान् पराक्रम करते देख राजा प्रसन्न हुए; उन्होंने अर्जुनपुत्र का सम्मान किया और उसकी प्रशंसा की।

श्लोक 8 (6.100.8)

तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावयामास भारत । तूलराशीनिवाकाशे मारुतः सर्वतो दिशम् ॥

tānyanīkāni saubhadro drāvayāmāsa bhārata | tūlarāśīnivākāśe mārutaḥ sarvato diśam

हे भारत, सुभद्रानन्दन ने उन सेना-दलों को ऐसे भगा दिया जैसे वायु आकाश में रुई के ढेरों को सब दिशाओं में उड़ा देती है।

श्लोक 9 (6.100.9)

तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्के मग्ना इव द्विपाः ॥

tena vidrāvyamāṇāni tava sainyāni bhārata | trātāraṃ nādhyagacchanta paṅke magnā iva dvipāḥ

हे भारत, उसके द्वारा भगाई गई आपकी सेनाओं को कोई रक्षक न मिला, जैसे कीचड़ में धँसे हाथियों को।

श्लोक 10 (6.100.10)

विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तम । अभिमन्युः स्थितो राजन्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

vidrāvya sarvasainyāni tāvakāni narottama | abhimanyuḥ sthito rājanvidhūmo'gniriva jvalan

हे नरश्रेष्ठ, आपकी सारी सेनाओं को भगाकर अभिमन्यु, हे राजन्, धूमरहित अग्नि की भाँति प्रज्वलित होता हुआ खड़ा रहा।

श्लोक 11 (6.100.11)

न चैनं तावका राजन्विषेहुररिघातिनम् । प्रदीप्तं पावकं यद्वत्पतङ्गाः कालचोदिताः ॥

na cainaṃ tāvakā rājanviṣehurarighātinam | pradīptaṃ pāvakaṃ yadvatpataṅgāḥ kālacoditāḥ

हे राजन्, आपके योद्धा उस शत्रुघाती का वेग वैसे ही न सह सके, जैसे काल से प्रेरित पतंगे जलती आग को नहीं सह पाते।

श्लोक 12 (6.100.12)

प्रहरन्सर्वशत्रुभ्यः पाण्डवानां महारथः । अदृश्यत महेष्वासः सवज्र इव वासवः ॥

praharansarvaśatrubhyaḥ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | adṛśyata maheṣvāsaḥ savajra iva vāsavaḥ

सब शत्रुओं पर प्रहार करता हुआ पाण्डवों का वह महारथी महाधनुर्धर वज्रधारी इन्द्र के समान दिखाई देता था।

श्लोक 13 (6.100.13)

हेमपृष्ठं धनुश्चास्य ददृशे विचरद्दिशः । तोयदेषु यथा राजन्राजमाना शतह्रदा ॥

hemapṛṣṭhaṃ dhanuścāsya dadṛśe vicaraddiśaḥ | toyadeṣu yathā rājanrājamānā śatahradā

हे राजन्, उसका सुनहरी पीठ वाला धनुष दिशाओं में घूमता हुआ ऐसा दिखाई देता था, जैसे बादलों में चमकती बिजली।

श्लोक 14 (6.100.14)

शराश्च निशिताः पीता निश्चरन्ति स्म संयुगे । वनात्फुल्लद्रुमाद्राजन्भ्रमराणामिव व्रजाः ॥

śarāśca niśitāḥ pītā niścaranti sma saṃyuge | vanātphulladrumādrājanbhramarāṇāmiva vrajāḥ

हे राजन्, युद्ध में उससे तीखे, पीले चमकते बाण ऐसे निकलते थे, जैसे फूलों से लदे वृक्षों वाले वन से भौंरों के झुंड।

श्लोक 15 (6.100.15)

तथैव चरतस्तस्य सौभद्रस्य महात्मनः । रथेन काञ्चनाङ्गेन ददृशुर्नान्तरं जनाः ॥

tathaiva caratastasya saubhadrasya mahātmanaḥ | rathena kāñcanāṅgena dadṛśurnāntaraṃ janāḥ

सोने से सजे रथ पर इस प्रकार विचरते हुए महात्मा सुभद्रानन्दन में लोगों को कोई छिद्र (अवसर) दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 16 (6.100.16)

मोहयित्वा कृपं द्रोणं द्रौणिं च सबृहद्बलम् । सैन्धवं च महेष्वासो व्यचरल्लघु सुष्ठु च ॥

mohayitvā kṛpaṃ droṇaṃ drauṇiṃ ca sabṛhadbalam | saindhavaṃ ca maheṣvāso vyacarallaghu suṣṭhu ca

कृप, द्रोण, द्रोणपुत्र, बृहद्बल और महाधनुर्धर सिन्धुराज को मोह में डालकर वह फुर्ती और सुन्दरता से विचरता रहा।

श्लोक 17 (6.100.17)

मण्डलीकृतमेवास्य धनुः पश्याम भारत । सूर्यमण्डलसंकाशं दहतस्तव वाहिनीम् ॥

maṇḍalīkṛtamevāsya dhanuḥ paśyāma bhārata | sūryamaṇḍalasaṃkāśaṃ dahatastava vāhinīm

हे भारत, आपकी सेना को जलाते हुए उसका धनुष हमें सदा मण्डलाकार खिंचा हुआ, सूर्यमण्डल के समान दिखाई देता था।

श्लोक 18 (6.100.18)

तं दृष्ट्वा क्षत्रियाः शूराः प्रतपन्तं तरस्विनम् । द्विफल्गुनमिमं लोकं मेनिरे तस्य कर्मभिः ॥

taṃ dṛṣṭvā kṣatriyāḥ śūrāḥ pratapantaṃ tarasvinam | dviphalgunamimaṃ lokaṃ menire tasya karmabhiḥ

उस वेगशाली वीर को इस प्रकार तपते देखकर शूरवीर क्षत्रियों ने उसके कर्मों से यही समझा कि इस लोक में दो अर्जुन हैं।

श्लोक 19 (6.100.19)

तेनार्दिता महाराज भारती सा महाचमूः । व्यभ्रमत्तत्रतत्रैव योषिन्मदवशादिव ॥

tenārditā mahārāja bhāratī sā mahācamūḥ | vyabhramattatratatraiva yoṣinmadavaśādiva

हे महाराज, उससे पीड़ित वह विशाल भारती सेना मद से विवश स्त्री के समान इधर-उधर डगमगाने लगी।

श्लोक 20 (6.100.20)

द्रावयित्वा महासैन्यं कम्पयित्वा महारथान् । नन्दयामास सुहृदो मयं जित्वेव वासवः ॥

drāvayitvā mahāsainyaṃ kampayitvā mahārathān | nandayāmāsa suhṛdo mayaṃ jitveva vāsavaḥ

विशाल सेना को भगाकर और महारथियों को कँपाकर उसने अपने मित्रों को वैसे ही आनन्दित किया, जैसे मय को जीतकर इन्द्र ने किया था।

श्लोक 21 (6.100.21)

तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि संयुगे । चक्रुरार्तस्वनं घोरं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥

tena vidrāvyamāṇāni tava sainyāni saṃyuge | cakrurārtasvanaṃ ghoraṃ parjanyaninadopamam

युद्ध में उसके द्वारा भगाई गई आपकी सेनाएँ मेघ-गर्जन के समान भयानक आर्तनाद करने लगीं।

श्लोक 22 (6.100.22)

तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य भारत । मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ॥

taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ tava sainyasya bhārata | mārutoddhūtavegasya sāgarasyeva parvaṇi

हे भारत, पर्व के दिन वायु से उछाले गए वेग वाले समुद्र के गर्जन जैसा आपकी सेना का वह भयानक नाद सुनकर

श्लोक 23 (6.100.23)

दुर्योधनस्तदा राजन्नार्श्यशृङ्गिमभाषत । एष कार्ष्णिर्महाबाहो द्वितीय इव फल्गुनः ॥

duryodhanastadā rājannārśyaśṛṅgimabhāṣata | eṣa kārṣṇirmahābāho dvitīya iva phalgunaḥ

तब हे राजन्, दुर्योधन ने ऋष्यशृंगपुत्र (अलम्बुष) से कहा: "हे महाबाहो, यह अर्जुनपुत्र दूसरे अर्जुन के समान है;

दुर्योधन उवाच

श्लोक 24 (6.100.24)

चमूं द्रावयते क्रोधाद्वृत्रो देवचमूमिव । तस्य नान्यत्र पश्यामि संयुगे भेषजं महत् ॥

camūṃ drāvayate krodhādvṛtro devacamūmiva | tasya nānyatra paśyāmi saṃyuge bheṣajaṃ mahat

वह क्रोध से हमारी सेना को वैसे ही भगा रहा है जैसे वृत्र ने देवसेना को भगाया था। युद्ध में उसके लिए मुझे और कहीं कोई बड़ी औषधि नहीं दिखती,

श्लोक 25 (6.100.25)

ऋते त्वां राक्षसश्रेष्ठं सर्वविद्यासु पारगम् । स गत्वा त्वरितं वीरं जहि सौभद्रमाहवे ॥

ṛte tvāṃ rākṣasaśreṣṭhaṃ sarvavidyāsu pāragam | sa gatvā tvaritaṃ vīraṃ jahi saubhadramāhave

हे राक्षसश्रेष्ठ, सब विद्याओं में पारंगत तुम्हारे सिवा। तुम शीघ्र जाकर रण में उस वीर सुभद्रानन्दन को मार डालो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (6.100.26)

वयं पार्थं हनिष्यामो भीष्मद्रोणपुरोगमाः । स एवमुक्तो बलवान्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥

vayaṃ pārthaṃ haniṣyāmo bhīṣmadroṇapurogamāḥ | sa evamukto balavānrākṣasendraḥ pratāpavān

हम भीष्म और द्रोण को आगे रखकर पार्थ को मार डालेंगे।" ऐसा कहे जाने पर वह बलवान् और प्रतापी राक्षसराज

श्लोक 27 (6.100.27)

प्रययौ समरे तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् । नर्दमानो महानादं प्रावृषीव बलाहकः ॥

prayayau samare tūrṇaṃ tava putrasya śāsanāt | nardamāno mahānādaṃ prāvṛṣīva balāhakaḥ

आपके पुत्र की आज्ञा से शीघ्र रणभूमि में गया, वर्षा ऋतु के मेघ की भाँति महान् गर्जना करता हुआ।

श्लोक 28 (6.100.28)

तस्य शब्देन महता पाण्डवानां बलं महत् । प्राचलत्सर्वतो राजन्वातोद्धूत इवार्णवः ॥

tasya śabdena mahatā pāṇḍavānāṃ balaṃ mahat | prācalatsarvato rājanvātoddhūta ivārṇavaḥ

हे राजन्, उसकी भारी गर्जना से पाण्डवों की विशाल सेना वायु से उद्वेलित समुद्र के समान चारों ओर डोल उठी।

श्लोक 29 (6.100.29)

बहवश्च महाराज तस्य नादेन भीषिताः । प्रियान्प्राणान्परित्यज्य निपेतुर्धरणीतले ॥

bahavaśca mahārāja tasya nādena bhīṣitāḥ | priyānprāṇānparityajya nipeturdharaṇītale

हे महाराज, उसकी गर्जना से भयभीत होकर बहुत-से योद्धा अपने प्रिय प्राण त्यागकर धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 30 (6.100.30)

कार्ष्णिश्चापि मुदा युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः । नृत्यन्निव रथोपस्थे तद्रक्षः समुपाद्रवत् ॥

kārṣṇiścāpi mudā yuktaḥ pragṛhya saśaraṃ dhanuḥ | nṛtyanniva rathopasthe tadrakṣaḥ samupādravat

पर अर्जुनपुत्र हर्ष से भरकर, बाण चढ़ा धनुष लेकर, मानो रथ पर नाचता हुआ, उस राक्षस पर टूट पड़ा।

श्लोक 31 (6.100.31)

ततः स राक्षसः क्रुद्धः संप्राप्यैवार्जुनिं रणे । नातिदूरे स्थितां तस्य द्रावयामास वै चमूम् ॥

tataḥ sa rākṣasaḥ kruddhaḥ saṃprāpyaivārjuniṃ raṇe | nātidūre sthitāṃ tasya drāvayāmāsa vai camūm

तब क्रुद्ध राक्षस ने रण में अर्जुनपुत्र के सामने पहुँचकर उसके निकट खड़ी सेना को भगा दिया।

श्लोक 32 (6.100.32)

तां वध्यमानां च तथा पाण्डवानां महाचमूम् । प्रत्युद्ययौ रणे रक्षो देवसेनां यथा बलः ॥

tāṃ vadhyamānāṃ ca tathā pāṇḍavānāṃ mahācamūm | pratyudyayau raṇe rakṣo devasenāṃ yathā balaḥ

इस प्रकार मारी जा रही पाण्डवों की उस विशाल सेना पर वह राक्षस रण में वैसे ही चढ़ आया, जैसे बल असुर देवसेना पर चढ़ आया था।

श्लोक 33 (6.100.33)

विमर्दः सुमहानासीत्तस्य सैन्यस्य मारिष । रक्षसा घोररूपेण वध्यमानस्य संयुगे ॥

vimardaḥ sumahānāsīttasya sainyasya māriṣa | rakṣasā ghorarūpeṇa vadhyamānasya saṃyuge

हे माननीय, भयंकर रूप वाले राक्षस द्वारा युद्ध में मारी जा रही उस सेना में भारी मार-काट मच गई।

श्लोक 34 (6.100.34)

ततः शरसहस्रैस्तां पाण्डवानां महाचमूम् । व्यद्रावयद्रणे रक्षो दर्शयत्स्वपराक्रमम् ॥

tataḥ śarasahasraistāṃ pāṇḍavānāṃ mahācamūm | vyadrāvayadraṇe rakṣo darśayatsvaparākramam

फिर उस राक्षस ने अपना पराक्रम दिखाते हुए हज़ारों बाणों से पाण्डवों की उस विशाल सेना को रण में भगा दिया।

श्लोक 35 (6.100.35)

सा वध्यमाना च तथा पाण्डवानामनीकिनी । रक्षसा घोररूपेण प्रदुद्राव रणे भयात् ॥

sā vadhyamānā ca tathā pāṇḍavānāmanīkinī | rakṣasā ghorarūpeṇa pradudrāva raṇe bhayāt

भयंकर रूप वाले राक्षस से इस प्रकार मारी जाती हुई पाण्डव-सेना भय से रणभूमि से भाग खड़ी हुई।

श्लोक 36 (6.100.36)

प्रमृद्य च रणे सेनां पद्मिनीं वारणो यथा । ततोऽभिदुद्राव रणे द्रौपदेयान्महाबलान् ॥

pramṛdya ca raṇe senāṃ padminīṃ vāraṇo yathā | tato'bhidudrāva raṇe draupadeyānmahābalān

जैसे हाथी कमलों से भरे सरोवर को रौंद डालता है, वैसे ही रण में सेना को रौंदकर वह फिर महाबली द्रौपदीपुत्रों पर झपटा।

श्लोक 37 (6.100.37)

ते तु क्रुद्धा महेष्वासा द्रौपदेयाः प्रहारिणः । राक्षसं दुद्रुवुः सङ्ख्ये ग्रहाः पञ्च रविं यथा ॥

te tu kruddhā maheṣvāsā draupadeyāḥ prahāriṇaḥ | rākṣasaṃ dudruvuḥ saṅkhye grahāḥ pañca raviṃ yathā

पर प्रहार में कुशल, महाधनुर्धर द्रौपदीपुत्र क्रोध में भरकर युद्ध में उस राक्षस पर वैसे ही टूट पड़े, जैसे पाँच ग्रह सूर्य पर।

श्लोक 38 (6.100.38)

वीर्यवद्भिस्ततस्तैस्तु पीडितो राक्षसोत्तमः । यथा युगक्षये घोरे चन्द्रमाः पञ्चभिर्ग्रहैः ॥

vīryavadbhistatastaistu pīḍito rākṣasottamaḥ | yathā yugakṣaye ghore candramāḥ pañcabhirgrahaiḥ

उन पराक्रमी वीरों से पीड़ित वह राक्षसश्रेष्ठ वैसा ही हो गया, जैसे भयंकर युगान्त के समय पाँच ग्रहों से पीड़ित चन्द्रमा।

श्लोक 39 (6.100.39)

प्रतिविन्ध्यस्ततो रक्षो बिभेद निशितैः शरैः । सर्वपारशवैस्तूर्णमकुण्ठाग्रैर्महाबलः ॥

prativindhyastato rakṣo bibheda niśitaiḥ śaraiḥ | sarvapāraśavaistūrṇamakuṇṭhāgrairmahābalaḥ

तब महाबली प्रतिविन्ध्य ने शीघ्र ही पूरे लोहे के बने, कुण्ठित न होने वाली नोकों वाले तीखे बाणों से राक्षस को बींध डाला।

श्लोक 40 (6.100.40)

स तैर्भिन्नतनुत्राणः शुशुभे राक्षसोत्तमः । मरीचिभिरिवार्कस्य संस्यूतो जलदो महान् ॥

sa tairbhinnatanutrāṇaḥ śuśubhe rākṣasottamaḥ | marīcibhirivārkasya saṃsyūto jalado mahān

उन बाणों से कवच छिद जाने पर वह राक्षसश्रेष्ठ सूर्य की किरणों से गुँथे विशाल मेघ के समान शोभा पाने लगा।

श्लोक 41 (6.100.41)

विषक्तैः सशरैश्चापि तपनीयपरिच्छदैः । आर्श्यशृङ्गिर्बभौ राजन्दीप्तशृङ्ग इवाचलः ॥

viṣaktaiḥ saśaraiścāpi tapanīyaparicchadaiḥ | ārśyaśṛṅgirbabhau rājandīptaśṛṅga ivācalaḥ

हे राजन्, सोने से जड़े बाणों के शरीर में धँसे रहने से ऋष्यशृंगपुत्र जलते शिखरों वाले पर्वत के समान शोभित हुआ।

श्लोक 42 (6.100.42)

ततस्ते भ्रातरः पञ्च राक्षसेन्द्रं महाहवे । विव्यधुर्निशितैर्बाणैस्तपनीयविभूषितैः ॥

tataste bhrātaraḥ pañca rākṣasendraṃ mahāhave | vivyadhurniśitairbāṇaistapanīyavibhūṣitaiḥ

तब उन पाँचों भाइयों ने उस महायुद्ध में राक्षसराज को सोने से विभूषित तीखे बाणों से बींध डाला।

श्लोक 43 (6.100.43)

स निर्भिन्नः शरैर्घोरैर्भुजगैः कोपितैरिव । अलम्बुसो भृशं राजन्नागेन्द्र इव चुक्रुधे ॥

sa nirbhinnaḥ śarairghorairbhujagaiḥ kopitairiva | alambuso bhṛśaṃ rājannāgendra iva cukrudhe

हे राजन्, क्रुद्ध सर्पों जैसे उन भयंकर बाणों से छिदकर अलम्बुष नागराज के समान अत्यन्त कुपित हो उठा।

श्लोक 44 (6.100.44)

सोऽतिविद्धो महाराज मुहूर्तमथ मारिष । प्रविवेश तमो दीर्घं पीडितस्तैर्महारथैः ॥

so'tividdho mahārāja muhūrtamatha māriṣa | praviveśa tamo dīrghaṃ pīḍitastairmahārathaiḥ

हे महाराज, उन महारथियों से बुरी तरह बिंधा और पीड़ित होकर वह, हे माननीय, कुछ देर के लिए गहरी मूर्च्छा में डूब गया।

श्लोक 45 (6.100.45)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां क्रोधेन द्विगुणीकृतः । चिच्छेद सायकैस्तेषां ध्वजांश्चैव धनूंषि च ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ krodhena dviguṇīkṛtaḥ | ciccheda sāyakaisteṣāṃ dhvajāṃścaiva dhanūṃṣi ca

फिर होश में आकर, दुगुने क्रोध से भरकर, उसने बाणों से उनकी ध्वजाएँ और धनुष काट डाले।

श्लोक 46 (6.100.46)

एकैकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्मयन्निव । अलम्बुसो रथोपस्थे नृत्यन्निव महारथः ॥

ekaikaṃ pañcabhirbāṇairājaghāna smayanniva | alambuso rathopasthe nṛtyanniva mahārathaḥ

महारथी अलम्बुष ने मानो मुस्कराते हुए और रथ पर नाचते हुए-से उनमें से प्रत्येक को पाँच-पाँच बाण मारे।

श्लोक 47 (6.100.47)

त्वरमाणः सुसंबद्धो हयांस्तेषां महात्मनाम् । जघान राक्षसः क्रुद्धः सारथींश्च सहस्रशः ॥

tvaramāṇaḥ susaṃbaddho hayāṃsteṣāṃ mahātmanām | jaghāna rākṣasaḥ kruddhaḥ sārathīṃśca sahasraśaḥ

युद्ध के लिए भली-भाँति सन्नद्ध उस क्रुद्ध राक्षस ने फुर्ती से उन महात्माओं के घोड़े मार डाले, और हज़ारों सारथि भी।

श्लोक 48 (6.100.48)

बिभेद च सुसंरब्धः पुनश्चैनान्सुसंशितैः । शरैर्बहुविधाकारैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

bibheda ca susaṃrabdhaḥ punaścainānsusaṃśitaiḥ | śarairbahuvidhākāraiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने फिर उन्हें अनेक प्रकार के तीखे बाणों से सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में बींध डाला।

श्लोक 49 (6.100.49)

विरथांश्च महेष्वासान्कृत्वा तत्र स राक्षसः । अभिदुद्राव वेगेन हन्तुकामो निशाचरः ॥

virathāṃśca maheṣvāsānkṛtvā tatra sa rākṣasaḥ | abhidudrāva vegena hantukāmo niśācaraḥ

उन महाधनुर्धरों को रथहीन करके वह निशाचर राक्षस उन्हें मार डालने की इच्छा से वेग से उन पर झपटा।

श्लोक 50 (6.100.50)

तानर्दितान्रणे तेन राक्षसेन दुरात्मना । दृष्ट्वाऽर्जुनसुतः सङ्ख्ये राक्षसं समुपाद्रवत् ॥

tānarditānraṇe tena rākṣasena durātmanā | dṛṣṭvā'rjunasutaḥ saṅkhye rākṣasaṃ samupādravat

उन्हें उस दुष्ट राक्षस से रण में पीड़ित देखकर अर्जुनपुत्र युद्ध में राक्षस पर टूट पड़ा।

श्लोक 51 (6.100.51)

तयोः समभवद्युद्धं वृत्रवासवयोरिव । ददृशुस्तावकाः सर्वे पाण्डवाश्च परस्परम् ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ vṛtravāsavayoriva | dadṛśustāvakāḥ sarve pāṇḍavāśca parasparam

उन दोनों में वृत्र और इन्द्र जैसा युद्ध हुआ; आपके सब योद्धा और पाण्डव आमने-सामने खड़े होकर उसे देखते रहे।

श्लोक 52 (6.100.52)

तौ समेतौ महायुद्धे क्रोधदीप्तौ परस्परम् । महाबलौ महाराज क्रोधसंरक्तलोचनौ ॥

tau sametau mahāyuddhe krodhadīptau parasparam | mahābalau mahārāja krodhasaṃraktalocanau

हे महाराज, वे दोनों महाबली उस महायुद्ध में एक-दूसरे पर क्रोध से जलते हुए भिड़ गए; क्रोध से उनकी आँखें लाल थीं।

श्लोक 53 (6.100.53)

परस्परमवेक्षेतां कालानलसमौ युधि । आशीविषाविव क्रुद्धौ नेत्राभ्यामितरेतरम् । तयोः समागमो घोरो बभूव कटुकोदयः ॥

parasparamavekṣetāṃ kālānalasamau yudhi | āśīviṣāviva kruddhau netrābhyāmitaretaram | tayoḥ samāgamo ghoro babhūva kaṭukodayaḥ

युद्ध में कालाग्नि के समान वे एक-दूसरे को देखने लगे, क्रुद्ध विषधर सर्पों की भाँति आँखों से एक-दूसरे को घूरते हुए। उनका वह भिड़ना भयंकर और कटु परिणाम वाला हुआ,

श्लोक 54 (6.100.54)

यथा देवासुरे युद्धे शक्रशम्बरयोः पुरा ॥

yathā devāsure yuddhe śakraśambarayoḥ purā

जैसा पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में इन्द्र और शम्बर का हुआ था।

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