भीष्म पर्व · अध्याय 99
सर्वतोभद्र व्यूह और नौवें दिन के अपशकुन
भीष्म सेना लेकर निकलते हैं और विशाल सर्वतोभद्र व्यूह रचते हैं: उसके मुहाने पर भीष्म और धृतराष्ट्रपुत्रों के साथ कृप, कृतवर्मा, शैब्य, शकुनि, सिन्धुराज और सुदक्षिण खड़े होते हैं; दाहिने पक्ष पर द्रोण, भूरिश्रवा, शल्य और भगदत्त, बाएँ पर अश्वत्थामा, सोमदत्त और अवन्ती के दोनों राजकुमार, मध्य में त्रिगर्तों से घिरा दुर्योधन और पीछे अलम्बुष तथा श्रुतायु रहते हैं। पाण्डव युधिष्ठिर, भीम और नकुल-सहदेव को आगे रखकर प्रतिव्यूह रचते हैं, और दोनों सेनाएँ नगाड़ों और शंखों के घोर नाद के बीच एक-दूसरे पर टूट पड़ती हैं। सेनाओं के भिड़ते ही भयानक अपशकुन होते हैं: सियारिनें रोती हैं, धूल, रक्त और हड्डियों की वर्षा होती है और उल्काएँ सूर्य से टकराकर गिरती हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.99.1)
ततः शान्तनवो भीष्मो निर्ययौ सह सेनया । व्यूहं चाव्यूहत महत्सर्वतोभद्रमात्मनः ॥
tataḥ śāntanavo bhīṣmo niryayau saha senayā | vyūhaṃ cāvyūhata mahatsarvatobhadramātmanaḥ
तब शान्तनुनन्दन भीष्म सेना के साथ निकले और उन्होंने अपना 'सर्वतोभद्र' नामक विशाल व्यूह रचा।
श्लोक 2 (6.99.2)
कृपश्च कृतवर्मा च शैब्यश्चैव महारथः । शकुनिः सैन्धवश्चैव काम्भोजश्च सुदक्षिणः ॥
kṛpaśca kṛtavarmā ca śaibyaścaiva mahārathaḥ | śakuniḥ saindhavaścaiva kāmbhojaśca sudakṣiṇaḥ
कृप, कृतवर्मा, महारथी शैब्य, शकुनि, सिन्धुराज और काम्बोजराज सुदक्षिण,
श्लोक 3 (6.99.3)
भीष्मेण सहिताः सर्वे पुत्रैश्च तव भारत । अग्रतः सर्वसैन्यानां व्यूहस्य प्रमुखे स्थिताः ॥
bhīṣmeṇa sahitāḥ sarve putraiśca tava bhārata | agrataḥ sarvasainyānāṃ vyūhasya pramukhe sthitāḥ
हे भारत, ये सब भीष्म और आपके पुत्रों के साथ समस्त सेना के आगे व्यूह के मुहाने पर खड़े हुए।
श्लोक 4 (6.99.4)
द्रोणो भूरिश्रवाः शल्यो भगदत्तश्च मारिष । दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ॥
droṇo bhūriśravāḥ śalyo bhagadattaśca māriṣa | dakṣiṇaṃ pakṣamāśritya sthitā vyūhasya daṃśitāḥ
हे माननीय, द्रोण, भूरिश्रवा, शल्य और भगदत्त कवच पहनकर व्यूह के दाहिने पक्ष पर डटे।
श्लोक 5 (6.99.5)
अश्वत्थामा सोमदत्तश्चावन्त्यौ च महारथौ । महत्या सेनया युक्ता वामं पक्षमपालयन् ॥
aśvatthāmā somadattaścāvantyau ca mahārathau | mahatyā senayā yuktā vāmaṃ pakṣamapālayan
अश्वत्थामा, सोमदत्त और अवन्ती के दोनों महारथी विशाल सेना के साथ बाएँ पक्ष की रक्षा करते रहे।
श्लोक 6 (6.99.6)
दुर्योधनो महाराज त्रिगर्तैः सर्वतो वृतः । व्यूहमध्ये स्थितो राजन्पाण्डवान्प्रति भारत ॥
duryodhano mahārāja trigartaiḥ sarvato vṛtaḥ | vyūhamadhye sthito rājanpāṇḍavānprati bhārata
हे महाराज, हे भारत, दुर्योधन त्रिगर्तों से चारों ओर घिरा हुआ व्यूह के मध्य में पाण्डवों के सम्मुख खड़ा था।
श्लोक 7 (6.99.7)
अलम्बुसो रथश्रेष्ठः श्रुतायुश्च महारथः । पृष्ठतः सर्वसैन्यानां स्थितौ व्यूहस्य दंशितौ ॥
alambuso rathaśreṣṭhaḥ śrutāyuśca mahārathaḥ | pṛṣṭhataḥ sarvasainyānāṃ sthitau vyūhasya daṃśitau
रथियों में श्रेष्ठ अलम्बुष और महारथी श्रुतायु कवच पहनकर समस्त सेना के पीछे व्यूह के पृष्ठभाग में खड़े हुए।
श्लोक 8 (6.99.8)
एवं च तं तदा व्यूहं कृत्वा भारत तावकाः । सन्नद्धाः समदृश्यन्त प्रतपन्त इवाग्नयः ॥
evaṃ ca taṃ tadā vyūhaṃ kṛtvā bhārata tāvakāḥ | sannaddhāḥ samadṛśyanta pratapanta ivāgnayaḥ
हे भारत, इस प्रकार वह व्यूह रचकर आपके योद्धा युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर धधकती अग्नियों के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 9 (6.99.9)
ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पाण्डवः । नकुलः सहदेवश्च माद्रीपुत्रावुभावपि ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | nakulaḥ sahadevaśca mādrīputrāvubhāvapi
तब राजा युधिष्ठिर, पाण्डुपुत्र भीमसेन, तथा माद्री के दोनों पुत्र नकुल और सहदेव
श्लोक 10 (6.99.10)
अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थिता व्यूहस्य दंशिताः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्च महारथः ॥
agrataḥ sarvasainyānāṃ sthitā vyūhasya daṃśitāḥ | dhṛṣṭadyumno virāṭaśca sātyakiśca mahārathaḥ
समस्त सेना के आगे व्यूह के मुहाने पर कवच पहनकर खड़े हुए। धृष्टद्युम्न, विराट और महारथी सात्यकि
श्लोक 11 (6.99.11)
स्थिताः सैन्येन महता परानीकविनाशनाः । शिखण्डी विजयश्चैव राक्षसश्च घटोत्कचः ॥
sthitāḥ sainyena mahatā parānīkavināśanāḥ | śikhaṇḍī vijayaścaiva rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ
शत्रु-सेनाओं का नाश करने वाले ये वीर विशाल सेना के साथ खड़े थे। शिखण्डी, विजय (अर्जुन), राक्षस घटोत्कच,
श्लोक 12 (6.99.12)
चेकितानो महाबाहुः कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् । स्थिता रणे महाराज महत्या सेनया वृताः ॥
cekitāno mahābāhuḥ kuntibhojaśca vīryavān | sthitā raṇe mahārāja mahatyā senayā vṛtāḥ
महाबाहु चेकितान और पराक्रमी कुन्तिभोज, हे महाराज, विशाल सेना से घिरे रण में खड़े थे।
श्लोक 13 (6.99.13)
अभिमन्युर्महेष्वासो द्रुपदश्च महाबलः । युयुधानो महेष्वासो युधामन्युश्च वीर्यवान् ॥
abhimanyurmaheṣvāso drupadaśca mahābalaḥ | yuyudhāno maheṣvāso yudhāmanyuśca vīryavān
महाधनुर्धर अभिमन्यु, महाबली द्रुपद, महाधनुर्धर युयुधान और पराक्रमी युधामन्यु,
श्लोक 14 (6.99.14)
केकया भ्रातरश्चैव स्थिता युद्धाय दंशिताः । एवं तेऽपि महाव्यूहं प्रतिव्यूह्य सुदुर्जयम् ॥
kekayā bhrātaraścaiva sthitā yuddhāya daṃśitāḥ | evaṃ te'pi mahāvyūhaṃ prativyūhya sudurjayam
और केकय भाई युद्ध के लिए कवच पहनकर खड़े थे। इस प्रकार पाण्डवों ने भी उसके विरुद्ध अत्यन्त दुर्जय महाव्यूह रचा,
श्लोक 15 (6.99.15)
पाण्डवाः समरे शूराः स्थिता युद्धाय दंशिताः । तावकास्तु रणे यत्ताः सहसेना नराधिपाः ॥
pāṇḍavāḥ samare śūrāḥ sthitā yuddhāya daṃśitāḥ | tāvakāstu raṇe yattāḥ sahasenā narādhipāḥ
और शूरवीर पाण्डव कवच पहनकर युद्ध के लिए डट गए। आपकी ओर के राजा अपनी सेनाओं सहित रण में सावधान होकर
श्लोक 16 (6.99.16)
अभ्युद्ययू रणे पार्थान्भीष्मं कृत्वाऽग्रतो नृप । तथैव पाण्डवा राजन्भीमसेनपरोगमाः ॥
abhyudyayū raṇe pārthānbhīṣmaṃ kṛtvā'grato nṛpa | tathaiva pāṇḍavā rājanbhīmasenaparogamāḥ
हे राजन्, भीष्म को आगे करके रण में पार्थों पर चढ़ आए। उसी प्रकार हे राजन्, भीमसेन के नेतृत्व में पाण्डव
श्लोक 17 (6.99.17)
भीष्मं योद्धुमभीप्सन्तः संग्रामे विजयैषिणः । क्ष्वेलाः किलकिलाः शङ्खान्क्रकचान्गोविषाणिकाः ॥
bhīṣmaṃ yoddhumabhīpsantaḥ saṃgrāme vijayaiṣiṇaḥ | kṣvelāḥ kilakilāḥ śaṅkhānkrakacāngoviṣāṇikāḥ
भीष्म से युद्ध करने के इच्छुक और संग्राम में विजय चाहने वाले, सिंहनाद और किलकारियाँ करते हुए, शंख, क्रकच, सींग के बाजे,
श्लोक 18 (6.99.18)
भेरीमृदङ्गपणवान्नादयन्तश्च पुष्करान् । पाण्डवा अभ्यवर्तन्त नदन्तो भैरवान्रवान् ॥
bherīmṛdaṅgapaṇavānnādayantaśca puṣkarān | pāṇḍavā abhyavartanta nadanto bhairavānravān
भेरी, मृदंग, पणव और पुष्कर बजाते हुए, भयंकर गर्जना करते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 19 (6.99.19)
भेरीमृदङ्गशङ्खानां दुन्दुभीनां च निःस्वनैः । उत्कृष्टसिंहनादैश्च वल्गितैश्च पृथग्विधैः ॥
bherīmṛdaṅgaśaṅkhānāṃ dundubhīnāṃ ca niḥsvanaiḥ | utkṛṣṭasiṃhanādaiśca valgitaiśca pṛthagvidhaiḥ
भेरी, मृदंग, शंख और दुन्दुभियों के निनाद से, ऊँचे सिंहनादों से और भाँति-भाँति की उछल-कूद से
श्लोक 20 (6.99.20)
वयं प्रतिनदन्तस्तानगच्छाम त्वरान्विताः । सहसैवाभिसंक्रुद्धास्तदासीत्तुमुलं महत् ॥
vayaṃ pratinadantastānagacchāma tvarānvitāḥ | sahasaivābhisaṃkruddhāstadāsīttumulaṃ mahat
हम भी उनके उत्तर में गर्जते हुए, सहसा अत्यन्त क्रुद्ध होकर, शीघ्रता से आगे बढ़े; तब बड़ा भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 21 (6.99.21)
ततोऽन्योन्यं प्रधावन्तः संप्रहारं प्रचक्रिरे । ततः शब्देन महता प्रचकम्पे वसुंधरा ॥
tato'nyonyaṃ pradhāvantaḥ saṃprahāraṃ pracakrire | tataḥ śabdena mahatā pracakampe vasuṃdharā
फिर वे एक-दूसरे पर झपटते हुए प्रहार करने लगे, और उस महान् शब्द से पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 22 (6.99.22)
पक्षिणश्च महाघोरं व्याहरन्तो विबभ्रमुः । सप्रभश्चोदितः सूर्यो निष्प्रभः समपद्यत ॥
pakṣiṇaśca mahāghoraṃ vyāharanto vibabhramuḥ | saprabhaścoditaḥ sūryo niṣprabhaḥ samapadyata
पक्षी अत्यन्त भयानक स्वर में चीखते हुए मँडराने लगे, और प्रभा के साथ उदित हुआ सूर्य प्रभाहीन हो गया।
श्लोक 23 (6.99.23)
ववुश्च वातास्तुमुलाः शंसन्तः सुमहद्भयम् । घोराश्च घोरनिर्ह्रादाः शिवास्तत्र ववाशिरे ॥
vavuśca vātāstumulāḥ śaṃsantaḥ sumahadbhayam | ghorāśca ghoranirhrādāḥ śivāstatra vavāśire
भारी भय की सूचना देती हुई प्रचण्ड आँधियाँ चलने लगीं, और भयानक स्वर वाली घोर सियारिनें वहाँ रोने लगीं,
श्लोक 24 (6.99.24)
वेदयन्त्यो महाराज महद्वैशसमागतम् । दिशः प्रज्वलिता राजन्पांसुवर्षं पपात च ॥
vedayantyo mahārāja mahadvaiśasamāgatam | diśaḥ prajvalitā rājanpāṃsuvarṣaṃ papāta ca
हे महाराज, मानो आ पहुँचे महासंहार की सूचना दे रही हों। हे राजन्, दिशाएँ जलने लगीं और धूल की वर्षा होने लगी,
श्लोक 25 (6.99.25)
रुधिरेण समुन्मिश्रमस्थिवर्षं पपात च । रुदतां वाहनानां च नेत्रेभ्यः प्रापतञ्जलम् ॥
rudhireṇa samunmiśramasthivarṣaṃ papāta ca | rudatāṃ vāhanānāṃ ca netrebhyaḥ prāpatañjalam
और रक्त से सनी हड्डियों की वर्षा भी हुई। रोते हुए वाहन-पशुओं की आँखों से आँसू गिरने लगे,
श्लोक 26 (6.99.26)
सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रं प्रध्यायन्तो विशांपते । अन्तर्हिता महानादाः श्रूयन्ते भरतर्षभ ॥
susruvuśca śakṛnmūtraṃ pradhyāyanto viśāṃpate | antarhitā mahānādāḥ śrūyante bharatarṣabha
और हे प्रजानाथ, वे मानो चिन्ता में डूबे मल-मूत्र त्यागने लगे। हे भरतश्रेष्ठ, अदृश्य प्राणियों के बड़े-बड़े नाद सुनाई देने लगे,
श्लोक 27 (6.99.27)
रक्षसां पुरुषादानां नदतां भैरवान्रवान् । संपतन्तश्च दृश्यन्ते गोमायुबलवायसाः ॥
rakṣasāṃ puruṣādānāṃ nadatāṃ bhairavānravān | saṃpatantaśca dṛśyante gomāyubalavāyasāḥ
नरभक्षी राक्षसों की भयंकर गर्जनाएँ। सियार और बलवान् कौए झपटते हुए दिखाई दिए,
श्लोक 28 (6.99.28)
श्वानश्च विविधैर्नादैर्भषन्तस्तत्र मारिष । ज्वलिताश्च महोल्का वै समाहत्य दिवाकरम् । निपेतुः सहसा भूमौ वेदयन्त्यो महद्भयम् ॥
śvānaśca vividhairnādairbhaṣantastatra māriṣa | jvalitāśca maholkā vai samāhatya divākaram | nipetuḥ sahasā bhūmau vedayantyo mahadbhayam
और हे माननीय, वहाँ कुत्ते भाँति-भाँति के स्वरों में भौंकने लगे। बड़ी-बड़ी जलती उल्काएँ सूर्य से टकराकर सहसा पृथ्वी पर गिरीं, जो महान् भय की सूचना दे रही थीं।
श्लोक 29 (6.99.29)
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रये । ततस्तयोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः । चकम्पिरे शङ्खमृदङ्गनिःस्वनैः । प्रकम्पितानीव वनानि वायुना ॥
mahāntyanīkāni mahāsamucchraye | tatastayoḥ pāṇḍavadhārtarāṣṭrayoḥ | cakampire śaṅkhamṛdaṅganiḥsvanaiḥ | prakampitānīva vanāni vāyunā
तब उस महायुद्ध में पाण्डवों और धृतराष्ट्रपुत्रों की विशाल सेनाएँ शंखों और मृदंगों के निनाद से वैसे ही काँप उठीं, जैसे वायु से वन काँपते हैं।
श्लोक 30 (6.99.30)
नरेन्द्रनागाश्वसमाकुलाना- । मभ्यायतीनामशिवे मुहूर्ते । बभूव घोषस्तुमुलश्चमूनां । वातोद्धुतानामिव सागराणाम् ॥
narendranāgāśvasamākulānā- | mabhyāyatīnāmaśive muhūrte | babhūva ghoṣastumulaścamūnāṃ | vātoddhutānāmiva sāgarāṇām
उस अशुभ मुहूर्त में राजाओं, हाथियों और घोड़ों से भरी, एक-दूसरे की ओर बढ़ती उन सेनाओं का कोलाहल वायु से उद्वेलित सागरों के गर्जन जैसा भयंकर हो उठा।