भीष्म पर्व · अध्याय 98
भीष्म की प्रतिज्ञा; दुर्योधन द्वारा भीष्म की रक्षा का प्रबन्ध
दुर्योधन के कटु वचनों से आहत भीष्म उसे शान्त किन्तु दृढ़ स्वर में उत्तर देते हैं: खाण्डव वन, गन्धर्वों से युद्ध, विराट के गोग्रहण और निवातकवचों पर अर्जुन की विजय इस बात का प्रमाण है कि वासुदेव से रक्षित पाण्डवों को जीता नहीं जा सकता। फिर भी वे प्रतिज्ञा करते हैं कि अगले दिन वे शिखण्डी को छोड़कर, जो स्त्री के रूप में जन्मा था, सब सोमकों और पाञ्चालों का संहार करेंगे। नौवें दिन भोर होते ही दुर्योधन सेना को सजने की आज्ञा देता है और दुःशासन से भीष्म को रथों से घेरवा देता है ताकि शिखण्डी उन तक न पहुँच सके; उधर अर्जुन धृष्टद्युम्न से कहते हैं कि शिखण्डी को भीष्म के सामने खड़ा करो, उसकी रक्षा वे स्वयं करेंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.98.1)
वाक्शल्यैस्तव पुत्रेण सोऽतिविद्धो महामनाः । नोवाच दुःखोपहतो ह्यप्रियं प्रियमण्वपि ॥
vākśalyaistava putreṇa so'tividdho mahāmanāḥ | novāca duḥkhopahato hyapriyaṃ priyamaṇvapi
आपके पुत्र के वचन-बाणों से गहरे बिंधे महामना भीष्म दुःख से आहत होकर कुछ भी न बोले, न अप्रिय, न तनिक-सा भी प्रिय।
श्लोक 2 (6.98.2)
स ध्यात्वा सुचिरं कालं दुःखरोषसमन्वितः । श्वसन्निव महानागः प्रणुन्नो वाक्शलाकया ॥
sa dhyātvā suciraṃ kālaṃ duḥkharoṣasamanvitaḥ | śvasanniva mahānāgaḥ praṇunno vākśalākayā
दुःख और क्रोध से भरे वे बहुत देर तक सोचते रहे, और वचन-रूपी अंकुश से कोंचे गए महानाग की भाँति लम्बी साँसें भरते रहे।
श्लोक 3 (6.98.3)
उद्वृत्य चक्षुषी कोपान्निर्दहन्निव भारत । सदेवासुरगन्धर्वं लोकं काल इवापरः ॥
udvṛtya cakṣuṣī kopānnirdahanniva bhārata | sadevāsuragandharvaṃ lokaṃ kāla ivāparaḥ
फिर, हे भारत, क्रोध से आँखें तरेरते हुए, मानो देवताओं, असुरों और गन्धर्वों सहित सारे लोक को भस्म कर देंगे, दूसरे काल के समान,
श्लोक 4 (6.98.4)
अब्रवीत्तव पुत्रं च सामपूर्वमिदं वचः । किं त्वं दुर्योधनैवं मां वाक्शल्यैरपकृन्तसि ॥
abravīttava putraṃ ca sāmapūrvamidaṃ vacaḥ | kiṃ tvaṃ duryodhanaivaṃ māṃ vākśalyairapakṛntasi
उन्होंने पहले सान्त्वना देते हुए आपके पुत्र से यह वचन कहा: "दुर्योधन, तुम इस प्रकार वचन-बाणों से मुझे क्यों छील रहे हो,
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (6.98.5)
घटमानं यथाशक्तिं कुर्वाणं च तव प्रियम् । जुह्वानं समरे प्राणांस्तव वै प्रियकाम्यया ॥
ghaṭamānaṃ yathāśaktiṃ kurvāṇaṃ ca tava priyam | juhvānaṃ samare prāṇāṃstava vai priyakāmyayā
जबकि मैं यथाशक्ति प्रयत्न कर रहा हूँ, तुम्हारा प्रिय कर रहा हूँ और तुम्हें ही प्रसन्न करने की इच्छा से युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दे रहा हूँ?
श्लोक 6 (6.98.6)
यदा तु पाण्डवः शूरः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । पराजित्य रणे शक्रं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
yadā tu pāṇḍavaḥ śūraḥ khāṇḍave'gnimatarpayat | parājitya raṇe śakraṃ paryāptaṃ tannidarśanam
जब शूरवीर पाण्डुपुत्र ने युद्ध में इन्द्र को हराकर खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया था, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 7 (6.98.7)
यदा च त्वां महाबाहो गन्धर्वैर्हृतमोजसा । अमोचयत्पाण्डुसुतः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
yadā ca tvāṃ mahābāho gandharvairhṛtamojasā | amocayatpāṇḍusutaḥ paryāptaṃ tannidarśanam
हे महाबाहो, जब गन्धर्व तुम्हें बलपूर्वक हर ले गए थे और पाण्डुपुत्र ने तुम्हें छुड़ाया था, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 8 (6.98.8)
द्रवमाणेषु शूरेषु सोदरेषु तव प्रभो । सूतपुत्रे च राधेये पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
dravamāṇeṣu śūreṣu sodareṣu tava prabho | sūtaputre ca rādheye paryāptaṃ tannidarśanam
हे प्रभो, जब तुम्हारे शूर सगे भाई भाग खड़े हुए थे और राधापुत्र सूतपुत्र कर्ण भी, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 9 (6.98.9)
यच्च नः सहितान्सर्वान्विराटनगरे तदा । एक एवाजयत्पार्थः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
yacca naḥ sahitānsarvānvirāṭanagare tadā | eka evājayatpārthaḥ paryāptaṃ tannidarśanam
जब विराटनगर में हम सबको, जो एक साथ थे, अकेले पार्थ ने जीत लिया था, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 10 (6.98.10)
द्रोणं च युधि संरब्धं मां च निर्जित्य संयुगे । वासांसि स समादत्त पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
droṇaṃ ca yudhi saṃrabdhaṃ māṃ ca nirjitya saṃyuge | vāsāṃsi sa samādatta paryāptaṃ tannidarśanam
जब उसने युद्ध में क्रुद्ध द्रोण को और मुझे जीतकर हमारे वस्त्र ले लिए थे, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 11 (6.98.11)
तथा द्रौणिं महेष्वासं शारद्वतमथापि च । गोग्रहे जितवान्पूर्वं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
tathā drauṇiṃ maheṣvāsaṃ śāradvatamathāpi ca | gograhe jitavānpūrvaṃ paryāptaṃ tannidarśanam
इसी प्रकार गोग्रहण के समय उसने महाधनुर्धर द्रोणपुत्र को और शरद्वान् के पुत्र कृप को भी जीता था, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 12 (6.98.12)
विजित्य च यदा कर्णं सदा पुरुषमानिनम् । उत्तरायै ददौ वस्त्रं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
vijitya ca yadā karṇaṃ sadā puruṣamāninam | uttarāyai dadau vastraṃ paryāptaṃ tannidarśanam
जब उसने सदा अपने पौरुष का अभिमान करने वाले कर्ण को जीतकर उसका वस्त्र उत्तरा को दे दिया था, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 13 (6.98.13)
निवातकवचान्युद्धे वासवेनापि दुर्जयान् । जितवान्समरे पार्थः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
nivātakavacānyuddhe vāsavenāpi durjayān | jitavānsamare pārthaḥ paryāptaṃ tannidarśanam
जब पार्थ ने युद्ध में उन निवातकवचों को जीत लिया था, जिन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते थे, वही पर्याप्त प्रमाण था।
श्लोक 14 (6.98.14)
को हि शक्तो रणे जेतुं पाण्डवं रभसं तदा । यस्य गोप्ता जगद्गोप्ता शङ्खचक्रगदाधरः ॥
ko hi śakto raṇe jetuṃ pāṇḍavaṃ rabhasaṃ tadā | yasya goptā jagadgoptā śaṅkhacakragadādharaḥ
तब युद्ध में उस वेगशाली पाण्डुपुत्र को कौन जीत सकता है, जिसके रक्षक स्वयं जगत् के रक्षक, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले
श्लोक 15 (6.98.15)
वासुदेवोऽनन्तशक्तिः सृष्टिसंहारकारकः । सर्वेश्वरो देवदेवः परमात्मा सनातनः ॥
vāsudevo'nantaśaktiḥ sṛṣṭisaṃhārakārakaḥ | sarveśvaro devadevaḥ paramātmā sanātanaḥ
अनन्त शक्ति वाले, सृष्टि और संहार के कर्ता, सर्वेश्वर, देवों के देव, सनातन परमात्मा वासुदेव हैं?
श्लोक 16 (6.98.16)
उक्तोऽस्ति बहुशो राजन्नारदाद्यैर्महर्षिभिः । त्वं तु मोहान्न जानीषे वाच्यावाच्यं सुयोधन ॥
ukto'sti bahuśo rājannāradādyairmaharṣibhiḥ | tvaṃ tu mohānna jānīṣe vācyāvācyaṃ suyodhana
हे राजन्, नारद आदि महर्षियों ने बार-बार उनका ऐसा वर्णन किया है। पर सुयोधन, तुम मोहवश यह नहीं जानते कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं।
श्लोक 17 (6.98.17)
मुमूर्षुर्हि नरः सर्वान्वृक्षान्पश्यति काञ्चनान् । तथा त्वमपि गान्धारे विपरीतानि पश्यसि ॥
mumūrṣurhi naraḥ sarvānvṛkṣānpaśyati kāñcanān | tathā tvamapi gāndhāre viparītāni paśyasi
मरणासन्न मनुष्य सब वृक्षों को सोने के देखता है; उसी प्रकार हे गान्धारीनन्दन, तुम भी सब कुछ उलटा देख रहे हो।
श्लोक 18 (6.98.18)
स्वयं वैरं महत्कृत्वा पाण्डवैः सह सृञ्जयैः । युद्ध्यस्व तानद्य रणे पश्यामः पुरुषो भव । अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः ॥
svayaṃ vairaṃ mahatkṛtvā pāṇḍavaiḥ saha sṛñjayaiḥ | yuddhyasva tānadya raṇe paśyāmaḥ puruṣo bhava | aśakyāḥ pāṇḍavā jetuṃ devairapi savāsavaiḥ
तुमने स्वयं पाण्डवों और सृञ्जयों से यह बड़ा वैर ठाना है; अब युद्ध में उनसे लड़ो, हम देखेंगे। पुरुष बनो! पर पाण्डवों को तो इन्द्र सहित देवता भी नहीं जीत सकते।
श्लोक 19 (6.98.19)
अहं तु सोमकान्सर्वान्पाञ्चालांश्च समागतान् । निहनिष्ये नरव्याघ्र वर्जयित्वा शिखण्डिनम् ॥
ahaṃ tu somakānsarvānpāñcālāṃśca samāgatān | nihaniṣye naravyāghra varjayitvā śikhaṇḍinam
पर हे नरश्रेष्ठ, मैं शिखण्डी को छोड़कर सब सोमकों और यहाँ एकत्र पाञ्चालों का वध करूँगा।
श्लोक 20 (6.98.20)
तैर्वाऽहं निहतः सङ्ख्ये गमिष्ये यमसादनम् । तान्वा निहत्य समरे प्रीतिं दास्याम्यहं तव ॥
tairvā'haṃ nihataḥ saṅkhye gamiṣye yamasādanam | tānvā nihatya samare prītiṃ dāsyāmyahaṃ tava
या तो उनके हाथों युद्ध में मारा जाकर मैं यमलोक जाऊँगा, या रण में उन्हें मारकर तुम्हें प्रसन्न करूँगा।
श्लोक 21 (6.98.21)
पूर्वं हि स्त्री समुत्पन्ना शिखण्डी राजवेश्मनि । वरदानात्पुमाञ्जातः सैषा वै स्त्री शिखण्डिनी ॥
pūrvaṃ hi strī samutpannā śikhaṇḍī rājaveśmani | varadānātpumāñjātaḥ saiṣā vai strī śikhaṇḍinī
क्योंकि शिखण्डी पहले राजमहल में स्त्री के रूप में जन्मा था और वरदान से पुरुष बना; यह वही स्त्री शिखण्डिनी है।
श्लोक 22 (6.98.22)
तमहं न हनिष्यामि प्राणत्यागेऽपि भारत । याऽसौ प्राङ्निर्मिता धात्रा सैषा वै स्त्री शिखण्डिनी ॥
tamahaṃ na haniṣyāmi prāṇatyāge'pi bhārata | yā'sau prāṅnirmitā dhātrā saiṣā vai strī śikhaṇḍinī
हे भारत, प्राण चले जाएँ तब भी मैं उसे नहीं मारूँगा; विधाता ने जिसे पहले स्त्री बनाया था, वह वही स्त्री शिखण्डिनी है।
श्लोक 23 (6.98.23)
सुखं स्वपिहि गान्धारे श्वोऽस्मि कर्ता महारणम् । यं जनाः कथयिष्यन्ति यावत्स्थास्यति मेदिनी ॥
sukhaṃ svapihi gāndhāre śvo'smi kartā mahāraṇam | yaṃ janāḥ kathayiṣyanti yāvatsthāsyati medinī
गान्धारीनन्दन, सुख से सोओ। कल मैं ऐसा महासंग्राम करूँगा जिसकी चर्चा लोग तब तक करेंगे जब तक यह पृथ्वी रहेगी।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (6.98.24)
एवमुक्तस्तव सुतो निर्जगाम जनेश्वर । अभिवाद्य गुरुं मूर्ध्ना प्रययौ स्वं निवेशनम् ॥
evamuktastava suto nirjagāma janeśvara | abhivādya guruṃ mūrdhnā prayayau svaṃ niveśanam
हे जनेश्वर, ऐसा कहे जाने पर आपका पुत्र बाहर निकला और अपने गुरुजन (भीष्म) को सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने निवास को चला गया।
श्लोक 25 (6.98.25)
आगम्य तु ततो राजा विसृज्य च महाजनम् । प्रविवेश ततस्तूर्णं क्षयं शत्रुक्षयंकरः ॥
āgamya tu tato rājā visṛjya ca mahājanam | praviveśa tatastūrṇaṃ kṣayaṃ śatrukṣayaṃkaraḥ
वहाँ पहुँचकर शत्रुओं का नाश करने वाले राजा ने बड़ी भीड़ को विदा किया और शीघ्र अपने भवन में प्रवेश किया।
श्लोक 26 (6.98.26)
प्रहृष्टः स निशां तां च गमयामास पार्थिवः । प्रभातायां च शर्वर्यां प्रातरुत्थाय तान्नृपः ॥
prahṛṣṭaḥ sa niśāṃ tāṃ ca gamayāmāsa pārthivaḥ | prabhātāyāṃ ca śarvaryāṃ prātarutthāya tānnṛpaḥ
प्रसन्नचित्त होकर राजा ने वह रात बिताई। रात बीतने पर भोर हुई तो राजा ने प्रातः उठकर
श्लोक 27 (6.98.27)
राज्ञः समाज्ञापयत सेनां योजयतेति ह । अद्य भीष्मो रणे क्रुद्धो निहनिष्यति सोमकान् ॥
rājñaḥ samājñāpayata senāṃ yojayateti ha | adya bhīṣmo raṇe kruddho nihaniṣyati somakān
उन राजाओं को आज्ञा दी: "सेना सजाओ! आज भीष्म रण में क्रुद्ध होकर सोमकों का संहार करेंगे।"
श्लोक 28 (6.98.28)
दुर्योधनस्य तच्छ्रुत्वा रात्रौ विलपितं बहु । मन्यमानः स तं राजन्प्रत्यादेशमिवात्मनः ॥
duryodhanasya tacchrutvā rātrau vilapitaṃ bahu | manyamānaḥ sa taṃ rājanpratyādeśamivātmanaḥ
हे राजन्, रात में दुर्योधन का बहुत-सा विलाप सुनकर और उसे अपने लिए फटकार मानकर
श्लोक 29 (6.98.29)
निर्वेदं परमं गत्वा विनिन्द्य परवश्यताम् । दीर्घं दध्यौ शान्तनवो योद्धुकामोऽर्जुनं रणे ॥
nirvedaṃ paramaṃ gatvā vinindya paravaśyatām | dīrghaṃ dadhyau śāntanavo yoddhukāmo'rjunaṃ raṇe
शान्तनुनन्दन भीष्म गहरे खेद में डूब गए; पराधीनता की निन्दा करते हुए वे अर्जुन से युद्ध करने की इच्छा लिए देर तक चिन्तन करते रहे।
श्लोक 30 (6.98.30)
इङ्गितेन तु तज्ज्ञात्वा गाङ्गेयेन विचिन्तितम् । दुर्योधनो महाराज दुःशासनमचोदयत् ॥
iṅgitena tu tajjñātvā gāṅgeyena vicintitam | duryodhano mahārāja duḥśāsanamacodayat
हे महाराज, गंगापुत्र के मन की बात उनके हाव-भाव से भाँपकर दुर्योधन ने दुःशासन को प्रेरित किया:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 31 (6.98.31)
दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः । द्वाविंशतिमनीकानि सर्वाण्येवाभिचोदय ॥
duḥśāsana rathāstūrṇaṃ yujyantāṃ bhīṣmarakṣiṇaḥ | dvāviṃśatimanīkāni sarvāṇyevābhicodaya
दुःशासन, भीष्म की रक्षा करने वाले रथ तुरन्त जोते जाएँ; बाईसों सेना-दलों को आगे बढ़ाओ।
श्लोक 32 (6.98.32)
अयं हि समनुप्राप्तो वर्षपूगाभिचिन्तितः । पाण्डवानां ससैन्यानां वधो राज्यस्य चागमः ॥
ayaṃ hi samanuprāpto varṣapūgābhicintitaḥ | pāṇḍavānāṃ sasainyānāṃ vadho rājyasya cāgamaḥ
क्योंकि अब वह घड़ी आ पहुँची है जिसका हम बरसों से चिन्तन करते रहे: सेनाओं सहित पाण्डवों का वध और राज्य की प्राप्ति।
श्लोक 33 (6.98.33)
तत्र कार्यमहं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् । स नो गुप्तः सहायः स्याद्धन्यात्पार्थांश्च संयुगे ॥
tatra kāryamahaṃ manye bhīṣmasyaivābhirakṣaṇam | sa no guptaḥ sahāyaḥ syāddhanyātpārthāṃśca saṃyuge
इसमें मैं भीष्म की रक्षा को ही हमारा मुख्य कर्तव्य मानता हूँ। सुरक्षित रहकर वे हमारे सहायक होंगे और युद्ध में पार्थों को मार डालेंगे।
श्लोक 34 (6.98.34)
अब्रवीद्धि विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । स्त्रीपूर्वको ह्यसौ राजंस्तस्माद्वर्ज्यो मया रणे ॥
abravīddhi viśuddhātmā nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam | strīpūrvako hyasau rājaṃstasmādvarjyo mayā raṇe
क्योंकि उन शुद्धात्मा ने कहा है: 'मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा। हे राजन्, वह पहले स्त्री था, इसलिए युद्ध में मुझे उसे छोड़ देना है।
श्लोक 35 (6.98.35)
लोकस्तद्वेद यदहं पितुः प्रियचिकीर्षया । राज्यं स्फीतं महाबाहो स्त्रियश्च त्यक्तवान्पुरा ॥
lokastadveda yadahaṃ pituḥ priyacikīrṣayā | rājyaṃ sphītaṃ mahābāho striyaśca tyaktavānpurā
हे महाबाहो, संसार जानता है कि पूर्वकाल में पिता का प्रिय करने की इच्छा से मैंने समृद्ध राज्य और स्त्रियों का त्याग कर दिया था।
श्लोक 36 (6.98.36)
नैव चाहं स्त्रियं जातु न स्त्रीपूर्वं कथंचन । हन्यां युधि नरश्रेष्ठ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
naiva cāhaṃ striyaṃ jātu na strīpūrvaṃ kathaṃcana | hanyāṃ yudhi naraśreṣṭha satyametadbravīmi te
हे नरश्रेष्ठ, मैं युद्ध में कभी किसी स्त्री को, या जो पहले स्त्री रहा हो उसे, किसी भी प्रकार नहीं मारूँगा; यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।
श्लोक 37 (6.98.37)
अयं स्त्रीपूर्वको राजञ्छिखण्डी यदि ते श्रुतः । उद्योगे कथितं सर्वं यथा जाता शिखण्डिनी ॥
ayaṃ strīpūrvako rājañchikhaṇḍī yadi te śrutaḥ | udyoge kathitaṃ sarvaṃ yathā jātā śikhaṇḍinī
हे राजन्, यह शिखण्डी पहले स्त्री था, यदि तुमने सुना हो; शिखण्डिनी का जन्म कैसे हुआ, यह सब युद्ध से पहले की तैयारी (उद्योग) के समय बताया जा चुका है।
श्लोक 38 (6.98.38)
कन्या भूत्वा पुमाञ्जातः स च योत्स्यति भारत । तस्याहं प्रमुखे बाणान्न मुञ्चेयं कथंचन ॥
kanyā bhūtvā pumāñjātaḥ sa ca yotsyati bhārata | tasyāhaṃ pramukhe bāṇānna muñceyaṃ kathaṃcana
वह कन्या के रूप में जन्म लेकर पुरुष बना है, और हे भारत, वह युद्ध करेगा; पर जब वह मेरे सामने होगा, मैं उस पर किसी भी प्रकार बाण नहीं छोड़ूँगा।
श्लोक 39 (6.98.39)
युद्धे हि क्षत्रियांस्तात पाण्डवानां जयैषिणः । सर्वानन्यान्हनिष्यामि संप्राप्तान्रणमूर्धनि ॥
yuddhe hi kṣatriyāṃstāta pāṇḍavānāṃ jayaiṣiṇaḥ | sarvānanyānhaniṣyāmi saṃprāptānraṇamūrdhani
पर हे तात, युद्ध में पाण्डवों की विजय चाहने वाले अन्य सब क्षत्रियों को, जो रण के अग्रभाग में आएँगे, मैं मार डालूँगा।'
श्लोक 40 (6.98.40)
एवं मां भरतश्रेष्ठ गाङ्गेयः प्राह शास्त्रवित् । तत्र सर्वात्मना मन्ये गाङ्गेयस्यैव पालनम् ॥
evaṃ māṃ bharataśreṣṭha gāṅgeyaḥ prāha śāstravit | tatra sarvātmanā manye gāṅgeyasyaiva pālanam
हे भरतश्रेष्ठ, शास्त्रों के ज्ञाता गंगापुत्र ने मुझसे ऐसा कहा है। इसलिए मैं मानता हूँ कि हमें पूरी शक्ति से गंगापुत्र की ही रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 41 (6.98.41)
अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात्सिंहं महाहवे । मा वृकेणेव गाङ्गेयं घातयेम शिखण्डिना ॥
arakṣyamāṇaṃ hi vṛko hanyātsiṃhaṃ mahāhave | mā vṛkeṇeva gāṅgeyaṃ ghātayema śikhaṇḍinā
क्योंकि महायुद्ध में अरक्षित सिंह को भेड़िया भी मार सकता है; ऐसा न हो कि भेड़िये जैसे शिखण्डी के हाथों हम गंगापुत्र को मरवा बैठें।
श्लोक 42 (6.98.42)
मातुलः शकुनिः शल्यः कृपो द्रोणो विविंशतिः । यत्ता रक्षन्तु गाङ्गेयं तस्मिन्गुप्ते ध्रुवो जयः ॥
mātulaḥ śakuniḥ śalyaḥ kṛpo droṇo viviṃśatiḥ | yattā rakṣantu gāṅgeyaṃ tasmingupte dhruvo jayaḥ
मामा शकुनि, शल्य, कृप, द्रोण और विविंशति सावधान होकर गंगापुत्र की रक्षा करें; उनके सुरक्षित रहते विजय निश्चित है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 43 (6.98.43)
एतच्छ्रुत्वा तु ते सर्वे दुर्योधनवचस्तदा । सर्वतो रथवंशेन गाङ्गेयं पर्यवारयन् ॥
etacchrutvā tu te sarve duryodhanavacastadā | sarvato rathavaṃśena gāṅgeyaṃ paryavārayan
दुर्योधन के ये वचन सुनकर उन सबने रथों के समूह से गंगापुत्र को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 44 (6.98.44)
पुत्राश्च तव गाङ्गेयं परिवार्य ययुर्मुदा । कम्पयन्तो भुवं द्यां च क्षोभयन्तश्च पाण्डवान् ॥
putrāśca tava gāṅgeyaṃ parivārya yayurmudā | kampayanto bhuvaṃ dyāṃ ca kṣobhayantaśca pāṇḍavān
आपके पुत्र भी प्रसन्न होकर गंगापुत्र को घेरे हुए चले, पृथ्वी और आकाश को कँपाते हुए तथा पाण्डवों को क्षुब्ध करते हुए।
श्लोक 45 (6.98.45)
ते रथैः सुप्रसंयुक्तैर्दन्तिभिश्च महारथाः । परिवार्य रणे भीष्मं दंशिताः समवस्थिताः ॥
te rathaiḥ suprasaṃyuktairdantibhiśca mahārathāḥ | parivārya raṇe bhīṣmaṃ daṃśitāḥ samavasthitāḥ
वे कवचधारी महारथी भली-भाँति जुते रथों और हाथियों के साथ रण में भीष्म को घेरकर डट गए।
श्लोक 46 (6.98.46)
यथा देवासुरे युद्धे त्रिदशा वज्रधारिणम् । सर्वे ते स्म व्यतिष्ठन्त रक्षन्तस्तं महारथम् ॥
yathā devāsure yuddhe tridaśā vajradhāriṇam | sarve te sma vyatiṣṭhanta rakṣantastaṃ mahāratham
जैसे देवासुर-संग्राम में देवता वज्रधारी इन्द्र को घेरे खड़े रहते थे, वैसे ही वे सब उस महारथी की रक्षा करते हुए खड़े रहे।
श्लोक 47 (6.98.47)
ततो दुर्योधनो राजा पुनर्भ्रातरमब्रवीत् । सव्यं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम् । गोप्तारावर्जुनस्यैतावर्जुनोऽपि शिखण्डिनः ॥
tato duryodhano rājā punarbhrātaramabravīt | savyaṃ cakraṃ yudhāmanyuruttamaujāśca dakṣiṇam | goptārāvarjunasyaitāvarjuno'pi śikhaṇḍinaḥ
तब राजा दुर्योधन ने फिर अपने भाई से कहा: "अर्जुन के बाएँ पहिये की रक्षा युधामन्यु और दाएँ की उत्तमौजा करते हैं; ये दोनों अर्जुन के रक्षक हैं और अर्जुन शिखण्डी का।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 48 (6.98.48)
रक्ष्यमाणः स पार्थेन तथास्माभिर्विवर्जितः । यथा भीष्मं न नो हन्याद्दुःशासन तथा कुरु ॥
rakṣyamāṇaḥ sa pārthena tathāsmābhirvivarjitaḥ | yathā bhīṣmaṃ na no hanyādduḥśāsana tathā kuru
पार्थ से रक्षित और हमारे द्वारा छोड़ा गया वह (शिखण्डी) हमारे भीष्म को न मार सके, दुःशासन, ऐसा प्रबन्ध करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 49 (6.98.49)
भ्रातुस्तद्वचनं श्रुत्वा पुत्रो दुःशासनस्तव । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सह सेनया ॥
bhrātustadvacanaṃ śrutvā putro duḥśāsanastava | bhīṣmaṃ pramukhataḥ kṛtvā prayayau saha senayā
भाई के वे वचन सुनकर आपका पुत्र दुःशासन भीष्म को आगे करके सेना के साथ चल पड़ा।
श्लोक 50 (6.98.50)
भीष्मं तु रथवंशेन दृष्ट्वा समभिसंवृतम् । अर्जुनो रथिनां श्रेष्ठो धृष्टद्युम्नमुवाच ह ॥
bhīṣmaṃ tu rathavaṃśena dṛṣṭvā samabhisaṃvṛtam | arjuno rathināṃ śreṣṭho dhṛṣṭadyumnamuvāca ha
भीष्म को रथ-समूह से घिरा देखकर रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने धृष्टद्युम्न से कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 51 (6.98.51)
शिखण्डिनं नरव्याघ्रं भीष्मस्य प्रमुखे नृप । स्थापयस्वाद्य पाञ्चाल्य तस्य गोप्ताऽहमित्युत ॥
śikhaṇḍinaṃ naravyāghraṃ bhīṣmasya pramukhe nṛpa | sthāpayasvādya pāñcālya tasya goptā'hamityuta
हे पाञ्चालकुमार, आज नरश्रेष्ठ शिखण्डी को भीष्म के सामने खड़ा करो; उसका रक्षक मैं रहूँगा।