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भीष्म पर्व · अध्याय 97

रात्रि में दुर्योधन का भीष्म के पास जाना

आठवें दिन के युद्ध के बाद दुर्योधन शकुनि, दुःशासन और कर्ण के साथ मन्त्रणा करता है और शिकायत करता है कि बड़े-बूढ़े योद्धा पाण्डवों को नहीं रोकते, जबकि भीम उसके भाइयों को मार रहे हैं। कर्ण उसे भीष्म से शस्त्र रखवाने की सलाह देता है और शपथ लेता है कि तब वह अकेला ही पाण्डवों और सोमकों का नाश कर देगा। दुर्योधन सोने के दीपकों के प्रकाश में, भाइयों और सैनिकों से घिरा, ठाठ-बाट से भीष्म के शिविर में जाता है और वहाँ आँसू भरकर पितामह को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाता है, उन पर पाण्डवों को बचाने का आरोप लगाता है और कर्ण को अपनी जगह युद्ध करने की अनुमति देने की प्रार्थना करता है।

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.97.1)

ततो दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः । दुःशासनश्च पुत्रस्ते सूतपुत्रश्च दुर्जयः ॥

tato duryodhano rājā śakuniścāpi saubalaḥ | duḥśāsanaśca putraste sūtaputraśca durjayaḥ

तब राजा दुर्योधन, सुबलपुत्र शकुनि, आपका पुत्र दुःशासन और अजेय सूतपुत्र (कर्ण)

श्लोक 2 (6.97.2)

समागम्य महाराज मन्त्रं चक्रुर्विवक्षितम् । कथं पाण्डुसुताः सङ्ख्ये जेतव्याः सगणा इति ॥

samāgamya mahārāja mantraṃ cakrurvivakṣitam | kathaṃ pāṇḍusutāḥ saṅkhye jetavyāḥ sagaṇā iti

हे महाराज, एकत्र होकर अपने मन की मन्त्रणा करने लगे कि युद्ध में पाण्डुपुत्रों को उनके साथियों सहित कैसे जीता जाए।

श्लोक 3 (6.97.3)

ततो दुर्योधनो राजा सर्वांस्तानाह मन्त्रिणः । सूतपुत्रं समाभाष्य सौबलं च महाबलम् ॥

tato duryodhano rājā sarvāṃstānāha mantriṇaḥ | sūtaputraṃ samābhāṣya saubalaṃ ca mahābalam

तब राजा दुर्योधन ने सूतपुत्र और महाबली सुबलपुत्र को सम्बोधित करते हुए अपने उन सब मन्त्रियों से कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 4 (6.97.4)

द्रोणो भीष्मः कृपः शल्यः सौमदत्तिश्च संयुगे । न पार्थान्प्रति बाधन्ते न जाने किंनु कारणम् ॥

droṇo bhīṣmaḥ kṛpaḥ śalyaḥ saumadattiśca saṃyuge | na pārthānprati bādhante na jāne kiṃnu kāraṇam

"द्रोण, भीष्म, कृप, शल्य और सोमदत्तपुत्र युद्ध में पार्थों को रोक नहीं पाते; मैं नहीं जानता कि इसका क्या कारण है।

श्लोक 5 (6.97.5)

अवध्यमानास्ते चापि क्षपयन्ति बलं मम । सोऽस्मि क्षीणबलः कर्ण क्षीणशस्त्रश्च संयुगे ॥

avadhyamānāste cāpi kṣapayanti balaṃ mama | so'smi kṣīṇabalaḥ karṇa kṣīṇaśastraśca saṃyuge

और वे स्वयं बिना मारे गए मेरी सेना का नाश करते जा रहे हैं। हे कर्ण, इसलिए युद्ध में मेरी शक्ति क्षीण हो गई है और मेरे शस्त्र भी चुक रहे हैं।

श्लोक 6 (6.97.6)

द्रोणस्य प्रमुखे वीरा हतास्ते भ्रातरो मम । भीमसेनेन राधेय मम चैव च पश्यतः ॥

droṇasya pramukhe vīrā hatāste bhrātaro mama | bhīmasenena rādheya mama caiva ca paśyataḥ

हे राधानन्दन, द्रोण के सामने ही, और मेरे देखते-देखते, भीमसेन ने मेरे वीर भाइयों को मार डाला है।

श्लोक 7 (6.97.7)

निकृतः पाण्डवैः शूरैरवध्यैर्दैवतैरपि । सोऽहं संशयमापन्नः प्रकरिष्ये कथं रणम् ॥

nikṛtaḥ pāṇḍavaiḥ śūrairavadhyairdaivatairapi | so'haṃ saṃśayamāpannaḥ prakariṣye kathaṃ raṇam

मुझे उन वीर पाण्डवों ने पछाड़ दिया है, जिन्हें देवता भी नहीं मार सकते। इस संशय में पड़कर मैं युद्ध कैसे करूँ?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 8 (6.97.8)

तमब्रवीन्महाराज सूतपुत्रो नराधिपम् । मा शोच भरतश्रेष्ठ करिष्येऽहं प्रियं तव ॥

tamabravīnmahārāja sūtaputro narādhipam | mā śoca bharataśreṣṭha kariṣye'haṃ priyaṃ tava

हे महाराज, सूतपुत्र ने उस नरेश से कहा: "हे भरतश्रेष्ठ, शोक मत करो; मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा।

कर्ण उवाच

श्लोक 9 (6.97.9)

भीष्मः शान्तनवस्तूर्णमपयातु महारणात् । निवृत्ते युधि गाङ्गेये न्यस्तशस्त्रे च भारत ॥

bhīṣmaḥ śāntanavastūrṇamapayātu mahāraṇāt | nivṛtte yudhi gāṅgeye nyastaśastre ca bhārata

शान्तनुनन्दन भीष्म शीघ्र ही इस महायुद्ध से हट जाएँ। हे भारत, जब गङ्गापुत्र युद्ध से विरत होकर शस्त्र रख देंगे,

श्लोक 10 (6.97.10)

अहं पार्थान्हनिष्यामि सहितान्सर्वसोमकैः । पश्यतो युधि भीष्मस्य शपे सत्येन ते नृप ॥

ahaṃ pārthānhaniṣyāmi sahitānsarvasomakaiḥ | paśyato yudhi bhīṣmasya śape satyena te nṛpa

तब मैं भीष्म के देखते-देखते युद्ध में सब सोमकों सहित पार्थों को मार डालूँगा। हे राजन्, मैं सत्य की शपथ लेकर तुमसे यह कहता हूँ।

श्लोक 11 (6.97.11)

पाण्डवेषु दयां नित्यं स हि भीष्मः करोति वै । अशक्तश्च रणे भीष्मो जेतुमेतान्महारथान् ॥

pāṇḍaveṣu dayāṃ nityaṃ sa hi bhīṣmaḥ karoti vai | aśaktaśca raṇe bhīṣmo jetumetānmahārathān

क्योंकि भीष्म पाण्डवों पर सदा दया करते हैं, और भीष्म रण में इन महारथियों को जीतने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 12 (6.97.12)

अभिमानी रणे भीष्मो नित्यं चापि रणप्रियः । स कथं पाण्डवान्युद्धे जेष्यते तात संगतान् ॥

abhimānī raṇe bhīṣmo nityaṃ cāpi raṇapriyaḥ | sa kathaṃ pāṇḍavānyuddhe jeṣyate tāta saṃgatān

भीष्म युद्ध में अभिमानी हैं और सदा युद्ध के प्रेमी भी हैं; तात, वे युद्ध में एकजुट पाण्डवों को कैसे जीतेंगे?

श्लोक 13 (6.97.13)

स त्वं शीघ्रमितो गत्वा भीष्मस्य शिबिरं प्रति । अनुमान्य गुरुं वृद्धं शस्त्रं न्यासय भारत ॥

sa tvaṃ śīghramito gatvā bhīṣmasya śibiraṃ prati | anumānya guruṃ vṛddhaṃ śastraṃ nyāsaya bhārata

अतः तुम यहाँ से शीघ्र भीष्म के शिविर में जाओ और उन वृद्ध गुरुजन को मनाकर, हे भारत, उनसे शस्त्र रखवा दो।

श्लोक 14 (6.97.14)

न्यस्तशस्त्रे ततो भीष्मे निहतान्पश्य पाण्डवान् । मयैकेन रणे राजन्ससुहृद्गणबान्धवान् ॥

nyastaśastre tato bhīṣme nihatānpaśya pāṇḍavān | mayaikena raṇe rājansasuhṛdgaṇabāndhavān

भीष्म के शस्त्र रख देने पर, हे राजन्, तुम देखोगे कि मैंने अकेले ही रण में पाण्डवों को उनके मित्रों और बन्धु-बान्धवों सहित मार डाला है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (6.97.15)

एवमुक्तस्तु कर्णेन पुत्रो दुर्योधनस्तव । अब्रवीद्भ्रातरं तत्र दुःशासनमिदं वचः ॥

evamuktastu karṇena putro duryodhanastava | abravīdbhrātaraṃ tatra duḥśāsanamidaṃ vacaḥ

कर्ण के ऐसा कहने पर आपके पुत्र दुर्योधन ने वहाँ अपने भाई दुःशासन से ये वचन कहे:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 16 (6.97.16)

अनुयात्रं यथा सर्वं सज्जीभवति सर्वशः । दुःशासन तथा क्षिप्रं सर्वमेवोपपादय ॥

anuyātraṃ yathā sarvaṃ sajjībhavati sarvaśaḥ | duḥśāsana tathā kṣipraṃ sarvamevopapādaya

"दुःशासन, शीघ्र सारी व्यवस्था करो, जिससे मेरे साथ चलने वाले सब अनुचर हर प्रकार से तैयार हो जाएँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (6.97.17)

एवमुक्त्वा ततो राजन्कर्णमाह जनेश्वरः । अनुमान्य रणे भीष्ममेषोऽहं द्विपदां वरम् ॥

evamuktvā tato rājankarṇamāha janeśvaraḥ | anumānya raṇe bhīṣmameṣo'haṃ dvipadāṃ varam

हे राजन्, ऐसा कहकर उस जनेश्वर ने कर्ण से कहा: "मनुष्यों में श्रेष्ठ भीष्म को युद्ध से हटने के लिए मनाकर

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (6.97.18)

आगमिष्ये ततः क्षिप्रं त्वत्सकाशमरिन्दम । अपक्रान्ते ततो भीष्मे प्रहरिष्यसि संयुगे ॥

āgamiṣye tataḥ kṣipraṃ tvatsakāśamarindama | apakrānte tato bhīṣme prahariṣyasi saṃyuge

मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास लौट आऊँगा, हे शत्रुदमन। भीष्म के हट जाने पर तुम युद्ध में प्रहार करना।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 19 (6.97.19)

निष्पपात ततस्तूर्णं पुत्रस्तव विशांपते । सहितो भ्रातृभिस्तैस्तु देवैरिव शतक्रतुः ॥

niṣpapāta tatastūrṇaṃ putrastava viśāṃpate | sahito bhrātṛbhistaistu devairiva śatakratuḥ

हे प्रजानाथ, तब आपका पुत्र अपने उन भाइयों के साथ शीघ्र ही निकल पड़ा, जैसे देवताओं के साथ शतक्रतु (इन्द्र) निकलते हैं।

श्लोक 20 (6.97.20)

ततस्तं नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् । आरोपयद्धयं तूर्णं भ्राता दुःशासनस्तदा ॥

tatastaṃ nṛpaśārdūlaṃ śārdūlasamavikramam | āropayaddhayaṃ tūrṇaṃ bhrātā duḥśāsanastadā

तब उसके भाई दुःशासन ने बाघ के समान पराक्रमी उस नृपश्रेष्ठ को शीघ्र घोड़े पर बिठाया।

श्लोक 21 (6.97.21)

अङ्गदी बद्धमुकुटो हस्ताभरणवान्नृप । धार्तराष्ट्रो महाराज विबभौ स पथि व्रजन् ॥

aṅgadī baddhamukuṭo hastābharaṇavānnṛpa | dhārtarāṣṭro mahārāja vibabhau sa pathi vrajan

बाजूबन्द पहने, मुकुट बाँधे, हाथों में आभूषण धारण किए, हे राजन्, धृतराष्ट्रपुत्र मार्ग पर जाते हुए अत्यन्त शोभा पा रहा था, हे महाराज।

श्लोक 22 (6.97.22)

भण्डीपुष्पनिकाशेन तपनीयनिभेन च । अनुलिप्तः परार्द्ध्येन चन्दनेन सुगन्धिना ॥

bhaṇḍīpuṣpanikāśena tapanīyanibhena ca | anuliptaḥ parārddhyena candanena sugandhinā

उसके शरीर पर मञ्जिष्ठा (भण्डी) के फूल के रंग वाला, तपाए हुए सोने-सा चमकता, बहुमूल्य सुगन्धित चन्दन लगा था।

श्लोक 23 (6.97.23)

अरजोम्बरसंवीतः सिंहखेलगतिर्नृप । शुशुभे विमलार्चिष्मान्नभसीव दिवाकरः ॥

arajombarasaṃvītaḥ siṃhakhelagatirnṛpa | śuśubhe vimalārciṣmānnabhasīva divākaraḥ

निर्मल वस्त्र पहने, सिंह की-सी लीलामयी चाल से चलता हुआ, हे राजन्, वह आकाश में प्रकाशमान निर्मल सूर्य के समान शोभित हुआ।

श्लोक 24 (6.97.24)

तं प्रयान्तं नरव्याघ्रं भीष्मस्य शिबिरं प्रति । अनुजग्मुर्महेष्वासाः सर्वलोकस्य धन्विनः । भ्रातरश्च महेष्वासास्त्रिदशा इव वासवम् ॥

taṃ prayāntaṃ naravyāghraṃ bhīṣmasya śibiraṃ prati | anujagmurmaheṣvāsāḥ sarvalokasya dhanvinaḥ | bhrātaraśca maheṣvāsāstridaśā iva vāsavam

जब वह नरश्रेष्ठ भीष्म के शिविर की ओर जा रहा था, तब सारे संसार के महान् धनुर्धर उसके पीछे चले, और उसके महाधनुर्धर भाई भी, जैसे देवगण इन्द्र के पीछे चलते हैं।

श्लोक 25 (6.97.25)

हयानन्ये समारुह्य गजानन्ये च भारत । रथानन्ये नरश्रेष्ठं परिवव्रुः समन्ततः ॥

hayānanye samāruhya gajānanye ca bhārata | rathānanye naraśreṣṭhaṃ parivavruḥ samantataḥ

हे भारत, कुछ घोड़ों पर, कुछ हाथियों पर और कुछ रथों पर सवार होकर उस नरश्रेष्ठ को चारों ओर से घेरकर चले।

श्लोक 26 (6.97.26)

पदातयश्च त्वरिता नखरप्रासयोधिनः । परिवव्रुर्महेष्वासं धार्तराष्ट्रं महारथम् ॥

padātayaśca tvaritā nakharaprāsayodhinaḥ | parivavrurmaheṣvāsaṃ dhārtarāṣṭraṃ mahāratham

नखर और प्रास से लड़ने वाले पैदल सैनिक भी शीघ्रता से उस महाधनुर्धर, महारथी धृतराष्ट्रपुत्र को घेरकर चलने लगे।

श्लोक 27 (6.97.27)

आत्तशस्त्राश्च सुहृदो रक्षणार्थं महीपतेः । प्रादुर्बभूवुः सहिताः शक्रस्येवामरा दिवि ॥

āttaśastrāśca suhṛdo rakṣaṇārthaṃ mahīpateḥ | prādurbabhūvuḥ sahitāḥ śakrasyevāmarā divi

राजा की रक्षा के लिए उसके मित्र हाथों में शस्त्र लिए एक साथ प्रकट हुए, जैसे स्वर्ग में इन्द्र के चारों ओर देवता।

श्लोक 28 (6.97.28)

स पूज्यमानः कुरुभिः कौरवाणां महाबलः । प्रययौ सदनं राजा गाङ्गेयस्य यशस्विनः । अन्वीयमानः सततं सोदरैः परिवारितः ॥

sa pūjyamānaḥ kurubhiḥ kauravāṇāṃ mahābalaḥ | prayayau sadanaṃ rājā gāṅgeyasya yaśasvinaḥ | anvīyamānaḥ satataṃ sodaraiḥ parivāritaḥ

कुरुवंशियों से सम्मानित होता हुआ, कौरवों का वह महाबली राजा यशस्वी गङ्गापुत्र के भवन की ओर चल पड़ा; उसके सगे भाई निरन्तर उसके पीछे चलते हुए उसे घेरे हुए थे।

श्लोक 29 (6.97.29)

दक्षिणं दक्षिणः काले संभृत्य स्वभुजं तदा । हस्तिहस्तोपमं सौम्यं सर्वशत्रुनिबर्हणम् ॥

dakṣiṇaṃ dakṣiṇaḥ kāle saṃbhṛtya svabhujaṃ tadā | hastihastopamaṃ saumyaṃ sarvaśatrunibarhaṇam

उचित समय पर उस दक्ष राजा ने हाथी की सूँड़-सी, सुन्दर और सब शत्रुओं का नाश करने में समर्थ अपनी दाहिनी भुजा उठाकर

श्लोक 30 (6.97.30)

प्रगृह्णन्नञ्जलीन्नॄणामुद्यतान्सर्वतो दिशः । शुश्राव मधुरा वाचो नानादेशनिवासिनाम् ॥

pragṛhṇannañjalīnnṝṇāmudyatānsarvato diśaḥ | śuśrāva madhurā vāco nānādeśanivāsinām

चारों दिशाओं से उठे लोगों के हाथ जोड़कर किए गए अभिवादन स्वीकार किए, और अनेक देशों के निवासियों के मधुर वचन सुने।

श्लोक 31 (6.97.31)

संस्तूयमानः सूतैश्च मागधैश्च महायशाः । पूजयानश्च तान्सर्वान्सर्वलोकेश्वरेश्वरः ॥

saṃstūyamānaḥ sūtaiśca māgadhaiśca mahāyaśāḥ | pūjayānaśca tānsarvānsarvalokeśvareśvaraḥ

सूतों और मागधों द्वारा स्तुति पाता हुआ वह महायशस्वी, समस्त लोकेश्वरों का ईश्वर, बदले में उन सबका सम्मान करता चला।

श्लोक 32 (6.97.32)

प्रदीपैः काञ्चनैस्तत्र गन्धतैलावसेचितैः । परिवव्रुर्महाराजं प्रज्वलद्भिः समन्ततः ॥

pradīpaiḥ kāñcanaistatra gandhatailāvasecitaiḥ | parivavrurmahārājaṃ prajvaladbhiḥ samantataḥ

वहाँ सुगन्धित तेल से सींचे गए सोने के दीपक लिए लोग चारों ओर जलती ज्योतियों से उस महाराज को घेरे हुए थे।

श्लोक 33 (6.97.33)

स तैः परिवृतो राजा प्रदीपैः काञ्चनैर्ज्वलन् । शुशुभे चन्द्रमायुक्तो दीप्तैरिव महाग्रहैः ॥

sa taiḥ parivṛto rājā pradīpaiḥ kāñcanairjvalan | śuśubhe candramāyukto dīptairiva mahāgrahaiḥ

उन जलते हुए सोने के दीपकों से घिरा वह राजा ऐसा शोभित हुआ, जैसे दीप्त महाग्रहों से युक्त चन्द्रमा।

श्लोक 34 (6.97.34)

कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणयः । प्रोत्सारयन्तः शनकैस्तं जनं सर्वतो दिशम् ॥

kañcukoṣṇīṣiṇastatra vetrajharjharapāṇayaḥ | protsārayantaḥ śanakaistaṃ janaṃ sarvato diśam

अंगरखे और पगड़ियाँ पहने, हाथों में बेंत और झर्झर लिए कंचुकी धीरे-धीरे चारों ओर से उस भीड़ को हटा रहे थे।

श्लोक 35 (6.97.35)

संप्राप्य तु ततो राजा भीष्मस्य सदनं शुभम् । अवतीर्य हयाच्चापि भीष्मं प्राप्य जनेश्वरः ॥

saṃprāpya tu tato rājā bhīṣmasya sadanaṃ śubham | avatīrya hayāccāpi bhīṣmaṃ prāpya janeśvaraḥ

तब वह राजा, वह जनेश्वर, भीष्म के सुन्दर भवन पर पहुँचा, घोड़े से उतरा और भीष्म के पास गया।

श्लोक 36 (6.97.36)

अभिवाद्य ततो भीष्मं निषण्णः परमासने । काञ्चने सर्वतोभद्रे स्पर्द्ध्यास्तरणसंवृते । उवाच प्राञ्जलिर्भीष्मं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः ॥

abhivādya tato bhīṣmaṃ niṣaṇṇaḥ paramāsane | kāñcane sarvatobhadre sparddhyāstaraṇasaṃvṛte | uvāca prāñjalirbhīṣmaṃ bāṣpakaṇṭho'śrulocanaḥ

भीष्म को प्रणाम करके वह सोने के, सर्वतोभद्र आकार वाले, बहुमूल्य बिछावन से ढके श्रेष्ठ आसन पर बैठ गया; फिर हाथ जोड़कर, रुँधे गले और आँसू भरी आँखों से उसने भीष्म से कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 37 (6.97.37)

त्वां वयं हि समाश्रित्य संयुगे शत्रुसूदन । उत्सहेम रणे जेतुं सेन्द्रानपि सुरासुरान् । किमु पाण्डुसुतान्वीरान्ससुहृद्गणबान्धवान् ॥

tvāṃ vayaṃ hi samāśritya saṃyuge śatrusūdana | utsahema raṇe jetuṃ sendrānapi surāsurān | kimu pāṇḍusutānvīrānsasuhṛdgaṇabāndhavān

"हे शत्रुसूदन, आपका आश्रय लेकर हम युद्ध में इन्द्र सहित देवताओं और असुरों को भी जीतने का साहस कर सकते हैं; फिर मित्रों और बन्धु-बान्धवों सहित वीर पाण्डुपुत्रों की तो बात ही क्या!

श्लोक 38 (6.97.38)

तस्मादर्हसि गाङ्गेय कृपां कर्तुं मयि प्रभो । जहि पाण्डुसुतान्वीरान्महेन्द्र इव दानवान् ॥

tasmādarhasi gāṅgeya kṛpāṃ kartuṃ mayi prabho | jahi pāṇḍusutānvīrānmahendra iva dānavān

इसलिए, हे गङ्गानन्दन, हे प्रभु, आपको मुझ पर कृपा करनी चाहिए। जैसे महेन्द्र ने दानवों का संहार किया था, वैसे ही आप वीर पाण्डुपुत्रों का वध कीजिए।

श्लोक 39 (6.97.39)

पूर्वमुक्तं महाबाहो हनिष्यामि ससोमकान् । पाञ्चालान्केकयैः सार्धं करूषांश्चेति भारत ॥

pūrvamuktaṃ mahābāho haniṣyāmi sasomakān | pāñcālānkekayaiḥ sārdhaṃ karūṣāṃśceti bhārata

हे महाबाहु, आपने पहले कहा था, 'मैं सोमकों सहित पाञ्चालों को, केकयों के साथ, और करूषों को भी मार डालूँगा,' हे भारत।

श्लोक 40 (6.97.40)

त्वद्वचः सत्यमेवास्तु जहि पार्थान्समागतान् । सोमकांश्च महेष्वासान्सत्यवाग्भव भारत ॥

tvadvacaḥ satyamevāstu jahi pārthānsamāgatān | somakāṃśca maheṣvāsānsatyavāgbhava bhārata

आपका वचन सत्य हो: यहाँ एकत्र पार्थों का और महाधनुर्धर सोमकों का वध कीजिए। हे भारत, अपनी बात सच कर दिखाइए।

श्लोक 41 (6.97.41)

दयया यदि वा राजन्द्वेष्यभावान्मम प्रभो । मन्दभाग्यतया वापि मम रक्षसि पाण्डवान् ॥

dayayā yadi vā rājandveṣyabhāvānmama prabho | mandabhāgyatayā vāpi mama rakṣasi pāṇḍavān

हे राजन्, हे प्रभु, चाहे दया के कारण, चाहे मुझसे द्वेष के कारण, अथवा मेरे दुर्भाग्य से, आप पाण्डवों की रक्षा कर रहे हैं।

श्लोक 42 (6.97.42)

अनुजानीहि समरे कर्णमाहवशोभिनम् । स जेष्यति रणे पार्थान्ससुहृद्गणबान्धवान् ॥

anujānīhi samare karṇamāhavaśobhinam | sa jeṣyati raṇe pārthānsasuhṛdgaṇabāndhavān

युद्ध में शोभा पाने वाले कर्ण को रण की अनुमति दीजिए; वह मित्रों और बन्धु-बान्धवों सहित पार्थों को युद्ध में जीत लेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 43 (6.97.43)

स एवमुक्त्वा नृपतिः पुत्रो दुर्योधनस्तव । नोवाच वचनं किंचिद्भीष्मं सत्यपराक्रमम् ॥

sa evamuktvā nṛpatiḥ putro duryodhanastava | novāca vacanaṃ kiṃcidbhīṣmaṃ satyaparākramam

ऐसा कहकर आपका पुत्र राजा दुर्योधन सत्यपराक्रमी भीष्म से और कुछ नहीं बोला।

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