भीष्म पर्व · अध्याय 96
इरावान् के लिए अर्जुन का शोक और भीम द्वारा सात कौरवों का वध
अपने पुत्र इरावान् के मारे जाने का समाचार सुनकर अर्जुन कृष्ण से विलाप करते हैं कि धन के लिए किया जा रहा यह बन्धु-संहार वही है जिसे विदुर ने पहले ही देख लिया था; वे पाँच गाँव माँगकर सन्धि चाहने वाले युधिष्ठिर की सराहना करते हैं, फिर भी युद्ध जारी रखने का निश्चय कर कृष्ण से रथ कौरव-सेना की ओर ले चलने को कहते हैं। अपराह्न के युद्ध में भीम द्रोण के बाणों के बीच भी दुर्योधन के सात भाइयों को मार डालते हैं, और अभिमन्यु राजा अम्बष्ठ को रथहीन कर उसकी फेंकी तलवार को निष्फल कर देते हैं। युद्ध भयंकर हाथापाई में बदल जाता है; मृतकों, उनके शस्त्रों और आभूषणों से पटी रणभूमि का विस्तार से वर्णन होता है, और अन्त में रात्रि होने पर दोनों सेनाएँ अपने-अपने शिविरों को लौट जाती हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.96.1)
पुत्रं विनिहतं श्रुत्वा इरावन्तं धनञ्जयः । दुःखेन महताऽऽविष्टो निःश्वसन्पन्नगो यथा ॥
putraṃ vinihataṃ śrutvā irāvantaṃ dhanañjayaḥ | duḥkhena mahatā''viṣṭo niḥśvasanpannago yathā
अपने पुत्र इरावान् के मारे जाने का समाचार सुनकर धनञ्जय गहरे दुःख में डूब गए और सर्प की भाँति लम्बी साँसें लेने लगे।
श्लोक 2 (6.96.2)
अब्रवीत्समरे राजन्वासुदेवमिदं वचः । इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्टवान्पुरा ॥
abravītsamare rājanvāsudevamidaṃ vacaḥ | idaṃ nūnaṃ mahāprājño viduro dṛṣṭavānpurā
तब, हे राजन्, रणभूमि में उन्होंने वासुदेव से ये वचन कहे: "निश्चय ही महाप्राज्ञ विदुर ने यह बहुत पहले ही देख लिया था,
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (6.96.3)
कुरूणां पाण्डवानां च क्षयं घोरं महामतिः । स ततो निवारितवान्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥
kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca kṣayaṃ ghoraṃ mahāmatiḥ | sa tato nivāritavāndhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram
कुरुओं और पाण्डवों का यह भयानक विनाश, उन महामति ने; इसीलिए उन्होंने जनेश्वर धृतराष्ट्र को रोकने का प्रयत्न किया था।
श्लोक 4 (6.96.4)
अन्ये च बहवो वीराः संग्रामे मधुसूदन । निहताः कौरवैः सङ्ख्ये तथाऽस्माभिश्च कौरवाः ॥
anye ca bahavo vīrāḥ saṃgrāme madhusūdana | nihatāḥ kauravaiḥ saṅkhye tathā'smābhiśca kauravāḥ
हे मधुसूदन, संग्राम में बहुत-से अन्य वीर कौरवों के हाथों मारे गए हैं, और उसी प्रकार हमारे हाथों कौरव भी।
श्लोक 5 (6.96.5)
अर्थहेतोर्नरश्रेष्ठ क्रियते कर्म कुत्सितम् । धिगर्थान्यत्कृते ह्येवं क्रियते ज्ञातिसंक्षयः ॥
arthahetornaraśreṣṭha kriyate karma kutsitam | dhigarthānyatkṛte hyevaṃ kriyate jñātisaṃkṣayaḥ
हे नरश्रेष्ठ, धन के लिए ही यह निन्दनीय कर्म किया जा रहा है। धिक्कार है उस धन को, जिसके लिए इस प्रकार अपने ही बन्धुओं का संहार किया जाता है!
श्लोक 6 (6.96.6)
अधनस्य मृतं श्रेयो न च ज्ञातिवधाद्धनम् । किं नु प्राप्स्यामहे कृष्ण हत्वा ज्ञातीन्समागतान् ॥
adhanasya mṛtaṃ śreyo na ca jñātivadhāddhanam | kiṃ nu prāpsyāmahe kṛṣṇa hatvā jñātīnsamāgatān
निर्धन व्यक्ति के लिए मर जाना श्रेष्ठ है, पर बन्धुओं के वध से पाया हुआ धन श्रेष्ठ नहीं। हे कृष्ण, यहाँ एकत्र हुए अपने ही स्वजनों को मारकर हम क्या पा लेंगे?
श्लोक 7 (6.96.7)
दुर्योधनापराधेन शकुनेः सौबलस्य च । क्षत्रिया निधनं यान्ति कर्णदुर्मन्त्रितेन च ॥
duryodhanāparādhena śakuneḥ saubalasya ca | kṣatriyā nidhanaṃ yānti karṇadurmantritena ca
दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि के अपराध से तथा कर्ण की कुमन्त्रणा से क्षत्रिय मृत्यु के मुख में जा रहे हैं।
श्लोक 8 (6.96.8)
इदानीं च विजानामि सुकृतं मधुसूदन । कृतं राज्ञा महाबाहो याचता स्म सुयोधनम् ॥
idānīṃ ca vijānāmi sukṛtaṃ madhusūdana | kṛtaṃ rājñā mahābāho yācatā sma suyodhanam
हे महाबाहु मधुसूदन, अब मैं समझता हूँ कि राजा (युधिष्ठिर) ने कितना उचित किया था, जब उन्होंने सुयोधन से माँगा था
श्लोक 9 (6.96.9)
राज्यार्धं पञ्च वा ग्रामान्नाकार्षीत्स च दुर्मतिः । दृष्ट्वा हि क्षत्रियाञ्शूराञ्शयानान्धरणीतले ॥
rājyārdhaṃ pañca vā grāmānnākārṣītsa ca durmatiḥ | dṛṣṭvā hi kṣatriyāñśūrāñśayānāndharaṇītale
आधा राज्य या केवल पाँच गाँव; पर उस दुर्बुद्धि ने वह भी नहीं दिया। इन शूरवीर क्षत्रियों को धरती पर पड़े देखकर
श्लोक 10 (6.96.10)
निन्दामि भृशमात्मानं धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् । अशक्तमिति मामेते ज्ञास्यन्ते क्षत्रिया रणे ॥
nindāmi bhṛśamātmānaṃ dhigastu kṣatrajīvikām | aśaktamiti māmete jñāsyante kṣatriyā raṇe
मैं अपनी घोर निन्दा करता हूँ। धिक्कार है क्षत्रिय की इस जीविका को! फिर भी ये क्षत्रिय रण में मुझे असमर्थ समझेंगे।
श्लोक 11 (6.96.11)
एतदर्थं मया युद्धं रोचितं मधुसूदन । संचोदय हयाञ्शीघ्रं धार्तराष्ट्रचमूं प्रति ॥
etadarthaṃ mayā yuddhaṃ rocitaṃ madhusūdana | saṃcodaya hayāñśīghraṃ dhārtarāṣṭracamūṃ prati
इसीलिए, हे मधुसूदन, मैंने युद्ध करना स्वीकार किया है। घोड़ों को शीघ्र धृतराष्ट्रपुत्रों की सेना की ओर हाँकिए।
श्लोक 12 (6.96.12)
प्रतरिष्ये महापारं भुजाभ्यां समरोदधिम् । नायं क्लीबायितुं कालो विद्यते माधव क्वचित् ॥
pratariṣye mahāpāraṃ bhujābhyāṃ samarodadhim | nāyaṃ klībāyituṃ kālo vidyate mādhava kvacit
मैं अपनी दोनों भुजाओं से इस युद्ध-सागर को पार करूँगा, जिसका दूसरा तट बहुत दूर है। हे माधव, यह किसी भी प्रकार नपुंसकों-सा आचरण करने का समय नहीं है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 13 (6.96.13)
एवमुक्तस्तु पार्थेन केशवः परवीरहा । चोदयामास तानश्वान्पाण्डुरान्वातरंहसः ॥
evamuktastu pārthena keśavaḥ paravīrahā | codayāmāsa tānaśvānpāṇḍurānvātaraṃhasaḥ
पार्थ के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव ने वायु के समान वेगवान् उन श्वेत घोड़ों को हाँक दिया।
श्लोक 14 (6.96.14)
अथ शब्दो महानासीत्तव सैन्यस्य भारत । मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ॥
atha śabdo mahānāsīttava sainyasya bhārata | mārutoddhūtavegasya sāgarasyeva parvaṇi
तब, हे भारत, आपकी सेना में ऐसा महान् कोलाहल उठा, जैसा पर्व के दिन वायु से उछाले गए समुद्र का होता है।
श्लोक 15 (6.96.15)
अपराह्णे महाराज संग्रामः समपद्यत । पर्जन्यसमनिर्घोषो भीष्मस्य सह पाण्डवैः ॥
aparāhṇe mahārāja saṃgrāmaḥ samapadyata | parjanyasamanirghoṣo bhīṣmasya saha pāṇḍavaiḥ
हे महाराज, अपराह्न में भीष्म और पाण्डवों के बीच संग्राम छिड़ गया, जिसका घोष मेघों की गर्जना के समान था।
श्लोक 16 (6.96.16)
ततो राजंस्तव सुता भीमसेनमुपाद्रवन् । परिवार्य रणे द्रोणं वसवो वासवं यथा ॥
tato rājaṃstava sutā bhīmasenamupādravan | parivārya raṇe droṇaṃ vasavo vāsavaṃ yathā
तब, हे राजन्, आपके पुत्र रण में द्रोण को वैसे ही घेरकर, जैसे वसुगण इन्द्र को घेरते हैं, भीमसेन पर टूट पड़े।
श्लोक 17 (6.96.17)
ततः शान्तनवो भीष्मः कृपश्च रथिनां वरः । भगदत्तः सुशर्मा च धनंजयमुपाद्रवन् ॥
tataḥ śāntanavo bhīṣmaḥ kṛpaśca rathināṃ varaḥ | bhagadattaḥ suśarmā ca dhanaṃjayamupādravan
तब शान्तनुपुत्र भीष्म, रथियों में श्रेष्ठ कृप, भगदत्त और सुशर्मा धनञ्जय पर झपटे।
श्लोक 18 (6.96.18)
हार्दिक्यो बाह्लिकश्चैव सात्यकिं समभिद्रुतौ । अम्बष्ठकस्तु नृपतिरभिमन्युमवस्थितः ॥
hārdikyo bāhlikaścaiva sātyakiṃ samabhidrutau | ambaṣṭhakastu nṛpatirabhimanyumavasthitaḥ
हार्दिक्य (कृतवर्मा) और बाह्लिक ने सात्यकि पर धावा बोला, तथा राजा अम्बष्ठक अभिमन्यु के सामने डट गया।
श्लोक 19 (6.96.19)
शेषास्त्वन्ये महाराज शेषानेव महारथान् । ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥
śeṣāstvanye mahārāja śeṣāneva mahārathān | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham
हे महाराज, शेष योद्धा शेष महारथियों से भिड़ गए। तब घोर रूप वाला भयावह युद्ध आरम्भ हुआ।
श्लोक 20 (6.96.20)
भीमसेनस्तु संप्रेक्ष्य पुत्रांस्तव विशांपते । प्रजज्वाल रणे क्रुद्धो हविषा हव्यवाडिव ॥
bhīmasenastu saṃprekṣya putrāṃstava viśāṃpate | prajajvāla raṇe kruddho haviṣā havyavāḍiva
हे प्रजानाथ, आपके पुत्रों को देखकर भीमसेन रणभूमि में क्रोध से ऐसे प्रज्वलित हो उठे, जैसे आहुति पाकर अग्नि धधक उठती है।
श्लोक 21 (6.96.21)
पुत्रास्तु तव कौन्तेयं छादयांचक्रिरे शरैः । प्रावृषीव महाराज जलदा इव पर्वतम् ॥
putrāstu tava kaunteyaṃ chādayāṃcakrire śaraiḥ | prāvṛṣīva mahārāja jaladā iva parvatam
हे महाराज, आपके पुत्रों ने कुन्तीपुत्र को बाणों से ऐसे ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत को ढक लेते हैं।
श्लोक 22 (6.96.22)
स च्छाद्यमानो बहुधा पुत्रैस्तव विशांपते । सृक्विणी संलिहन्वीरः शार्दूल इव दर्पितः ॥
sa cchādyamāno bahudhā putraistava viśāṃpate | sṛkviṇī saṃlihanvīraḥ śārdūla iva darpitaḥ
हे प्रजानाथ, आपके पुत्रों द्वारा बार-बार ढके जाते हुए वे वीर गर्वीले बाघ की भाँति अपने होंठों के कोने चाटने लगे।
श्लोक 23 (6.96.23)
व्यूढोरस्कस्ततो भीमः पोथयामास पार्थिवम् । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन सुमुक्तेन महारणे ॥
vyūḍhoraskastato bhīmaḥ pothayāmāsa pārthivam | kṣurapreṇa sutīkṣṇena sumuktena mahāraṇe
तब चौड़ी छाती वाले भीम ने उस महासंग्राम में भली-भाँति छोड़े गए अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से एक राजकुमार को मार गिराया;
श्लोक 24 (6.96.24)
ताडयामास संक्रुद्धः सोऽभवद्व्यथितेन्द्रियः । अपरेण तु भल्लेन पीतेन निशितेन तु । अपातयत्कुण्डलितं सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥
tāḍayāmāsa saṃkruddhaḥ so'bhavadvyathitendriyaḥ | apareṇa tu bhallena pītena niśitena tu | apātayatkuṇḍalitaṃ siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā
क्रोध में भरकर उन्होंने उस पर ऐसा प्रहार किया कि उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गईं। फिर एक दूसरे पीले, तीखे भल्ल से उन्होंने कुण्डली (आपके एक और पुत्र) को ऐसे गिरा दिया, जैसे सिंह किसी छोटे मृग को गिरा देता है।
श्लोक 25 (6.96.25)
ततः सुनिशितान्बाणान्भीमसेनः शिलाशितान् । स सप्त संदधे हन्तुं पुत्रांस्ते भरतर्षभ ॥
tataḥ suniśitānbāṇānbhīmasenaḥ śilāśitān | sa sapta saṃdadhe hantuṃ putrāṃste bharatarṣabha
तब भीमसेन ने शिला पर तेज़ किए हुए अत्यन्त तीखे बाण उठाए, और हे भरतश्रेष्ठ, आपके पुत्रों को मारने के लिए उनमें से सात बाण धनुष पर चढ़ाए।
श्लोक 26 (6.96.26)
प्रेषिता भीमसेनेन शरास्ते दृढधन्वना । अपातयन्त पुत्रांस्ते रथेभ्यः सुमहारथान् ॥
preṣitā bhīmasenena śarāste dṛḍhadhanvanā | apātayanta putrāṃste rathebhyaḥ sumahārathān
दृढ़ धनुष वाले भीमसेन के छोड़े हुए उन बाणों ने आपके महारथी पुत्रों को उनके रथों से गिरा दिया:
श्लोक 27 (6.96.27)
अनाधृष्टिं कुण्डभेदिं विराजं दीप्तलोचनम् । दीर्घबाहुं सुबाहुं च तथैव मकरध्वजम् ॥
anādhṛṣṭiṃ kuṇḍabhediṃ virājaṃ dīptalocanam | dīrghabāhuṃ subāhuṃ ca tathaiva makaradhvajam
अनाधृष्टि, कुण्डभेदी, विराज, दीप्तलोचन, दीर्घबाहु, सुबाहु और मकरध्वज।
श्लोक 28 (6.96.28)
प्रपतन्तिस्म वीरास्ते विरेजुर्भरतर्षभ । वसन्ते पुष्पशबलाः किंशुकाः पतिता इव ॥
prapatantisma vīrāste virejurbharatarṣabha | vasante puṣpaśabalāḥ kiṃśukāḥ patitā iva
हे भरतश्रेष्ठ, गिरते हुए वे वीर ऐसे शोभा पा रहे थे, जैसे वसन्त में फूलों से रंग-बिरंगे किंशुक के वृक्ष गिर पड़े हों।
श्लोक 29 (6.96.29)
ततः प्रदुद्रुवुः शेषास्तव पुत्रा महाहवे । तं कालमिव मन्यन्तो भीमसेनं महाबलम् ॥
tataḥ pradudruvuḥ śeṣāstava putrā mahāhave | taṃ kālamiva manyanto bhīmasenaṃ mahābalam
तब आपके शेष पुत्र महाबली भीमसेन को साक्षात् काल समझकर उस महायुद्ध से भाग खड़े हुए।
श्लोक 30 (6.96.30)
द्रोणस्तु समरे वीरं निर्दहन्तं सुतांस्तव । यथाद्रिं वारिधाराभिः समन्ताद्व्यकिरच्छरैः ॥
droṇastu samare vīraṃ nirdahantaṃ sutāṃstava | yathādriṃ vāridhārābhiḥ samantādvyakiraccharaiḥ
किन्तु द्रोण ने रण में आपके पुत्रों को भस्म करते उस वीर पर चारों ओर से बाणों की ऐसी वर्षा की, जैसे बादल जलधाराओं से पर्वत पर बरसते हैं।
श्लोक 31 (6.96.31)
तत्राद्भुतमपश्याम कुन्तीपुत्रस्य पौरुषम् । द्रोणेन वार्यमाणोऽपि निजघ्ने यत्सुतांस्तव ॥
tatrādbhutamapaśyāma kuntīputrasya pauruṣam | droṇena vāryamāṇo'pi nijaghne yatsutāṃstava
वहाँ हमने कुन्तीपुत्र का अद्भुत पौरुष देखा: द्रोण के रोकते रहने पर भी उन्होंने आपके पुत्रों का वध कर डाला।
श्लोक 32 (6.96.32)
यथा गोवृषभो वर्षं संधारयति खात्पतत् । भीमस्तथा द्रोणमुक्तं शरवर्षमदीधरत् ॥
yathā govṛṣabho varṣaṃ saṃdhārayati khātpatat | bhīmastathā droṇamuktaṃ śaravarṣamadīdharat
जैसे साँड़ आकाश से गिरती वर्षा को सह लेता है, वैसे ही भीम ने द्रोण के छोड़े हुए बाणों की वर्षा सह ली।
श्लोक 33 (6.96.33)
अद्भुतं च महाराज तत्र चक्रे वृकोदरः । यत्पुत्रांस्तेऽवधीत्सङ्ख्ये द्रोणं चैव न्यवारयत् ॥
adbhutaṃ ca mahārāja tatra cakre vṛkodaraḥ | yatputrāṃste'vadhītsaṅkhye droṇaṃ caiva nyavārayat
हे महाराज, वृकोदर ने वहाँ एक अद्भुत कार्य किया: उन्होंने युद्ध में आपके पुत्रों को मारा और द्रोण को भी रोके रखा।
श्लोक 34 (6.96.34)
पुत्रेषु तव वीरेषु चिक्रीडार्जुनपूर्वजः । मृगेष्विव महाराज चरन्व्याघ्रो महाबलः ॥
putreṣu tava vīreṣu cikrīḍārjunapūrvajaḥ | mṛgeṣviva mahārāja caranvyāghro mahābalaḥ
हे महाराज, आपके वीर पुत्रों के बीच अर्जुन के बड़े भाई ऐसे क्रीड़ा कर रहे थे, जैसे मृगों के बीच विचरता हुआ कोई महाबली व्याघ्र।
श्लोक 35 (6.96.35)
यथा हि पशुमध्यस्थो द्रावयेत पशून्वृकः । वृकोदरस्तव सुतांस्तथा व्यद्रावयद्रणे ॥
yathā hi paśumadhyastho drāvayeta paśūnvṛkaḥ | vṛkodarastava sutāṃstathā vyadrāvayadraṇe
जैसे पशुओं के झुंड के बीच खड़ा भेड़िया पशुओं को भगा देता है, वैसे ही वृकोदर ने रण में आपके पुत्रों को खदेड़ दिया।
श्लोक 36 (6.96.36)
गाङ्गेयो भगदत्तश्च गौतमश्च महारथाः । पाण्डवं रभसं युद्धे वारयामासुरर्जुनम् ॥
gāṅgeyo bhagadattaśca gautamaśca mahārathāḥ | pāṇḍavaṃ rabhasaṃ yuddhe vārayāmāsurarjunam
गाङ्गेय (भीष्म), भगदत्त और गौतम (कृप), इन महारथियों ने युद्ध में वेगवान् पाण्डुपुत्र अर्जुन को रोक लिया।
श्लोक 37 (6.96.37)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां सोऽतिरथो रणे । प्रवीरांस्तव सैन्येषु प्रेषयामास मृत्यवे ॥
astrairastrāṇi saṃvārya teṣāṃ so'tiratho raṇe | pravīrāṃstava sainyeṣu preṣayāmāsa mṛtyave
अपने अस्त्रों से उनके अस्त्रों को रोककर उस अतिरथी ने आपकी सेनाओं के प्रमुख वीरों को मृत्यु के पास भेज दिया।
श्लोक 38 (6.96.38)
अभिमन्युस्तु राजानमम्बष्ठं लोकविश्रुतम् । विरथं रथिनां श्रेष्ठं कारयामास सायकैः ॥
abhimanyustu rājānamambaṣṭhaṃ lokaviśrutam | virathaṃ rathināṃ śreṣṭhaṃ kārayāmāsa sāyakaiḥ
अभिमन्यु ने अपने बाणों से लोकविख्यात, रथियों में श्रेष्ठ राजा अम्बष्ठ को रथहीन कर दिया।
श्लोक 39 (6.96.39)
विरथो वध्यमानस्तु सौभद्रेण यशस्विना । अवप्लुत्य रथात्तूर्णमम्बष्ठो वसुधाधिपः ॥
viratho vadhyamānastu saubhadreṇa yaśasvinā | avaplutya rathāttūrṇamambaṣṭho vasudhādhipaḥ
रथहीन होकर यशस्वी सुभद्रानन्दन के प्रहार सहते हुए पृथ्वीपति अम्बष्ठ तुरन्त रथ से कूद पड़ा,
श्लोक 40 (6.96.40)
असिं चिक्षेप समरे सौभद्रस्य महात्मनः । आरुरोह रथं चैव हार्दिक्यस्य महाबलः ॥
asiṃ cikṣepa samare saubhadrasya mahātmanaḥ | āruroha rathaṃ caiva hārdikyasya mahābalaḥ
और उसने रण में महात्मा सौभद्र पर अपनी तलवार फेंकी, फिर वह महाबली हार्दिक्य के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 41 (6.96.41)
आपतन्तं तु निस्त्रिंशं युद्धमार्गविशारदः । लाघवाद्व्यंसयामास सौभद्रः परवीरहा ॥
āpatantaṃ tu nistriṃśaṃ yuddhamārgaviśāradaḥ | lāghavādvyaṃsayāmāsa saubhadraḥ paravīrahā
किन्तु युद्ध की रीतियों में निपुण, शत्रुवीरों का संहार करने वाले सौभद्र ने अपनी फुर्ती से उस आती हुई तलवार को निष्फल कर दिया।
श्लोक 42 (6.96.42)
व्यंसितं वीक्ष्य निस्त्रिंशं सौभद्रेण रणे तदा । साधुसाध्विति सैन्यानां प्रणादोऽभूद्विशांपते ॥
vyaṃsitaṃ vīkṣya nistriṃśaṃ saubhadreṇa raṇe tadā | sādhusādhviti sainyānāṃ praṇādo'bhūdviśāṃpate
हे प्रजानाथ, रण में सौभद्र द्वारा तलवार को निष्फल किया गया देखकर सेनाओं में "साधु, साधु!" का महान् घोष उठा।
श्लोक 43 (6.96.43)
धृष्टद्युम्नमुखास्त्वन्ये तव सैन्यमयोधयन् । तथैव तावकाः सर्वे पाण्डुसैन्यमयोधयन् ॥
dhṛṣṭadyumnamukhāstvanye tava sainyamayodhayan | tathaiva tāvakāḥ sarve pāṇḍusainyamayodhayan
धृष्टद्युम्न आदि अन्य योद्धा आपकी सेना से लड़ रहे थे, और उसी प्रकार आपके सब योद्धा पाण्डवों की सेना से लड़ रहे थे।
श्लोक 44 (6.96.44)
तत्राक्रन्दो महानासीत्तव तेषां च भारत । निघ्नतां दृढमन्योन्यं कुर्वतां कर्म दुष्करम् ॥
tatrākrando mahānāsīttava teṣāṃ ca bhārata | nighnatāṃ dṛḍhamanyonyaṃ kurvatāṃ karma duṣkaram
हे भारत, वहाँ आपके और उनके योद्धाओं का बड़ा आर्तनाद उठा, जो एक-दूसरे पर कसकर प्रहार करते हुए दुष्कर कर्म कर रहे थे।
श्लोक 45 (6.96.45)
अन्योन्यं हि रणे शूराः केशेष्वाक्षिप्य मानिनः । नखदन्तैरयुध्यन्त मुष्टिभिर्जानुभिस्तथा ॥
anyonyaṃ hi raṇe śūrāḥ keśeṣvākṣipya māninaḥ | nakhadantairayudhyanta muṣṭibhirjānubhistathā
स्वाभिमानी शूरवीर रण में एक-दूसरे के केश पकड़कर नखों और दाँतों से, मुक्कों और घुटनों से लड़ने लगे,
श्लोक 46 (6.96.46)
तलैश्चैवाथ निस्त्रिंशैर्बाहुभिश्च सुसंस्थितैः । विवरं प्राप्य चान्योन्यमनयन्यमसादनम् ॥
talaiścaivātha nistriṃśairbāhubhiśca susaṃsthitaiḥ | vivaraṃ prāpya cānyonyamanayanyamasādanam
थप्पड़ों से, तलवारों से और भली-भाँति जमी हुई भुजाओं से; और अवसर पाकर उन्होंने एक-दूसरे को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 47 (6.96.47)
न्यहनच्च पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा । व्याकुलीकृतसंकल्पा युयुधुस्तत्र मानवाः ॥
nyahanacca pitā putraṃ putraśca pitaraṃ tathā | vyākulīkṛtasaṃkalpā yuyudhustatra mānavāḥ
पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मार डाला; बुद्धि भ्रमित हो जाने पर भी मनुष्य वहाँ लड़ते रहे।
श्लोक 48 (6.96.48)
रणे चारूणि चापानि हेमपृष्ठानि मारिष । हतानामपविद्धानि कलापाश्च महाधनाः ॥
raṇe cārūṇi cāpāni hemapṛṣṭhāni māriṣa | hatānāmapaviddhāni kalāpāśca mahādhanāḥ
हे मान्यवर, रणभूमि में मारे गए योद्धाओं के सुनहरी पीठ वाले सुन्दर धनुष और बहुमूल्य तरकस इधर-उधर बिखरे पड़े थे।
श्लोक 49 (6.96.49)
जातरूपमयैः पुङ्खै राजतैर्निशिताः शराः । तैलधौता व्यराजन्त निर्मुक्तभुजगोपमाः ॥
jātarūpamayaiḥ puṅkhai rājatairniśitāḥ śarāḥ | tailadhautā vyarājanta nirmuktabhujagopamāḥ
सोने और चाँदी के पंखों वाले, तेल में धोए हुए तीखे बाण केंचुली छोड़े हुए सर्पों के समान चमक रहे थे।
श्लोक 50 (6.96.50)
खड्गाश्च दान्तत्सरवो जातरूपपरिष्कृताः । चर्माणि चापविद्धानि रुक्मचित्राणि धन्विनां ॥
khaḍgāśca dāntatsaravo jātarūpapariṣkṛtāḥ | carmāṇi cāpaviddhāni rukmacitrāṇi dhanvināṃ
हाथीदाँत की मूठ वाली, सोने से सजी तलवारें और धनुर्धरों की स्वर्ण-चित्रित ढालें इधर-उधर पड़ी थीं।
श्लोक 51 (6.96.51)
सुवर्णविकृताः प्रासाः प्रभग्ना हेमभूषिताः । जातरूपमया यष्ट्यः शक्त्यश्च कनकोज्ज्वलाः ॥
suvarṇavikṛtāḥ prāsāḥ prabhagnā hemabhūṣitāḥ | jātarūpamayā yaṣṭyaḥ śaktyaśca kanakojjvalāḥ
सोने से गढ़े हुए, स्वर्णभूषित टूटे भाले, सोने की बनी लाठियाँ और सुवर्ण से चमचमाती शक्तियाँ पड़ी थीं;
श्लोक 52 (6.96.52)
अवस्कन्दाश्च पतिता मुसलानि गुरूणि च । परिघाः पट्टसाश्चैव भिण्डिपालाश्च मारिष ॥
avaskandāśca patitā musalāni gurūṇi ca | parighāḥ paṭṭasāścaiva bhiṇḍipālāśca māriṣa
हे मान्यवर, गिरे हुए अवस्कन्द, भारी मूसल, परिघ, पट्टिश और भिन्दिपाल पड़े थे;
श्लोक 53 (6.96.53)
पतिता विविधाश्चापाश्चित्रा हेमपरिष्कृताः । कुथा बहुविधाकाराश्चामरा व्यजनानि च ॥
patitā vividhāścāpāścitrā hemapariṣkṛtāḥ | kuthā bahuvidhākārāścāmarā vyajanāni ca
सोने से सजे अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे धनुष गिरे पड़े थे, तथा अनेक आकारों की झूलें, चँवर और पंखे भी।
श्लोक 54 (6.96.54)
नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य पतिता नराः । जीवन्त इव दृश्यन्ते गतसत्त्वा महारथाः ॥
nānāvidhāni śastrāṇi pragṛhya patitā narāḥ | jīvanta iva dṛśyante gatasattvā mahārathāḥ
अनेक प्रकार के शस्त्र थामे हुए गिरे मनुष्य, प्राणहीन हो चुके महारथी, ऐसे दिखते थे मानो जीवित हों।
श्लोक 55 (6.96.55)
गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकाः । गजवाजिरथक्षुण्णाः शेरते स्म नराः क्षितौ ॥
gadāvimathitairgātrairmusalairbhinnamastakāḥ | gajavājirathakṣuṇṇāḥ śerate sma narāḥ kṣitau
गदाओं से कुचले अंगों वाले, मूसलों से फटे सिरों वाले, हाथियों, घोड़ों और रथों से रौंदे गए मनुष्य धरती पर पड़े थे।
श्लोक 56 (6.96.56)
तथैवाश्वनृनागानां शरीरैर्विबभौ तदा । संछन्ना वसुधा राजन्पर्वतैरिव शातितैः ॥
tathaivāśvanṛnāgānāṃ śarīrairvibabhau tadā | saṃchannā vasudhā rājanparvatairiva śātitaiḥ
उसी प्रकार, हे राजन्, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों के शरीरों से ढकी धरती तब ऐसी लगती थी, मानो गिराए गए पर्वतों से पटी हो।
श्लोक 57 (6.96.57)
समरे पतितैश्चैव शक्त्यृष्टिशरतोमरैः । निस्त्रिंशैः पट्टसैः प्रासैरवस्कन्दैः परश्वथैः ॥
samare patitaiścaiva śaktyṛṣṭiśaratomaraiḥ | nistriṃśaiḥ paṭṭasaiḥ prāsairavaskandaiḥ paraśvathaiḥ
युद्ध में गिरी शक्तियों, ऋष्टियों, बाणों और तोमरों से, तलवारों, पट्टिशों, प्रासों, अवस्कन्दों और फरसों से,
श्लोक 58 (6.96.58)
परिघैर्भिण्डिपालैश्च शतघ्नीभिश्च मारिष । शरीरैः शस्त्रनिर्भिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी ॥
parighairbhiṇḍipālaiśca śataghnībhiśca māriṣa | śarīraiḥ śastranirbhinnaiḥ samāstīryata medinī
परिघों, भिन्दिपालों और शतघ्नियों से, हे मान्यवर, तथा शस्त्रों से छिदे हुए शरीरों से धरती पट गई।
श्लोक 59 (6.96.59)
विशब्दैरल्पशब्दैश्च शोणितौघपरिप्लुतैः । गतासुभिरमित्रघ्न विबभौ निचिता मही ॥
viśabdairalpaśabdaiśca śoṇitaughapariplutaiḥ | gatāsubhiramitraghna vibabhau nicitā mahī
हे शत्रुसंहारक, कुछ निःशब्द, कुछ धीमे-धीमे कराहते, रक्त की धाराओं में डूबे प्राणहीन होते शरीरों से भरी धरती विचित्र दिखाई देती थी।
श्लोक 60 (6.96.60)
सतलत्रैः सकेयूरैर्बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः । हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ॥
satalatraiḥ sakeyūrairbāhubhiścandanokṣitaiḥ | hastihastopamaiśchinnairūrubhiśca tarasvinām
अङ्गुलित्राण और केयूर पहने, चन्दन से लिपी भुजाओं से, हाथी की सूँड़ के समान कटी हुई बलवानों की जाँघों से,
श्लोक 61 (6.96.61)
बद्धचूडामणिवरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । पातितैर्ऋषभाक्षाणां बभौ भारत मेदिनी ॥
baddhacūḍāmaṇivaraiḥ śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | pātitairṛṣabhākṣāṇāṃ babhau bhārata medinī
और चूड़ामणि बँधे, कुण्डलों से युक्त, वृषभ-से नेत्रों वाले वीरों के गिराए गए सिरों से, हे भारत, धरती शोभा पा रही थी।
श्लोक 62 (6.96.62)
कवचैः शोणितादिग्धैर्विप्रकीर्णैश्च काञ्चनैः । रराज सुभृशं भूमिः शान्तार्चिर्भिरिवानलैः ॥
kavacaiḥ śoṇitādigdhairviprakīrṇaiśca kāñcanaiḥ | rarāja subhṛśaṃ bhūmiḥ śāntārcirbhirivānalaiḥ
रक्त से सने, इधर-उधर बिखरे सुनहरे कवचों से भूमि ऐसी अत्यन्त चमक रही थी, मानो बुझी लपटों वाली अग्नियाँ पड़ी हों।
श्लोक 63 (6.96.63)
विप्रविद्धैः कलापैश्च पतितैश्च शरासनैः । विप्रकीर्णैः शरैश्चैव रुक्मपुङ्खैः समन्ततः ॥
vipraviddhaiḥ kalāpaiśca patitaiśca śarāsanaiḥ | viprakīrṇaiḥ śaraiścaiva rukmapuṅkhaiḥ samantataḥ
इधर-उधर फेंके गए तरकसों और गिरे हुए धनुषों से, चारों ओर बिखरे सोने के पंखों वाले बाणों से,
श्लोक 64 (6.96.64)
रथैश्च सर्वतो भग्नैः किङ्किणीजालभूषितैः । वाजिभिश्च हतैर्बाणैः स्रस्तजिह्वैः सशोणितैः ॥
rathaiśca sarvato bhagnaiḥ kiṅkiṇījālabhūṣitaiḥ | vājibhiśca hatairbāṇaiḥ srastajihvaiḥ saśoṇitaiḥ
चारों ओर टूटे पड़े, घुँघरुओं की जालियों से सजे रथों से, और बाणों से मारे गए, लटकती जीभों वाले, लहूलुहान घोड़ों से,
श्लोक 65 (6.96.65)
अनुकर्षैः पताकाभिरुपासङ्गैर्ध्वजैरपि । प्रवीराणां महाशङ्खैर्विप्रकीर्णैश्च पाण्डुरैः ॥
anukarṣaiḥ patākābhirupāsaṅgairdhvajairapi | pravīrāṇāṃ mahāśaṅkhairviprakīrṇaiśca pāṇḍuraiḥ
रथों के अनुकर्षों, पताकाओं, उपासङ्गों और ध्वजों से, तथा बिखरे पड़े वीरों के बड़े-बड़े श्वेत शङ्खों से,
श्लोक 66 (6.96.66)
स्रस्तहस्तैश्च मातङ्गैः शयानैर्विबभौ मही । नानारूपैरलंकारैः प्रमदेवाभ्यलङ्कृता ॥
srastahastaiśca mātaṅgaiḥ śayānairvibabhau mahī | nānārūpairalaṃkāraiḥ pramadevābhyalaṅkṛtā
और ढीली सूँड़ों वाले, धरती पर पड़े हाथियों से भूमि ऐसी शोभित हुई, मानो कोई युवती नाना प्रकार के आभूषणों से सजी हो।
श्लोक 67 (6.96.67)
दन्तिभिश्चापरैस्तत्र सप्राणैर्गाढवेदनैः । करैः शब्दं विमुञ्चद्भिः शीकरं च मुहुर्मुहुः ॥
dantibhiścāparaistatra saprāṇairgāḍhavedanaiḥ | karaiḥ śabdaṃ vimuñcadbhiḥ śīkaraṃ ca muhurmuhuḥ
वहाँ दूसरे हाथी, जो अभी जीवित थे और गहरी पीड़ा में थे, अपनी सूँड़ों से चिंघाड़ते और बार-बार फुहार छोड़ते हुए,
श्लोक 68 (6.96.68)
विबभौ तद्रणस्थानं स्यन्दमानैरिवाचलैः । नानारागैः कम्बलैश्च परिस्तोमैश्च दन्तिनाम् ॥
vibabhau tadraṇasthānaṃ syandamānairivācalaiḥ | nānārāgaiḥ kambalaiśca paristomaiśca dantinām
उस रणभूमि को ऐसा बना रहे थे मानो वहाँ जल बहाते पर्वत खड़े हों। नाना रंगों के कम्बलों और हाथियों की झूलों से,
श्लोक 69 (6.96.69)
वैदूर्यमणिदण्डैश्च पतितैरङ्कुशैः शुभैः । घण्टाभिश्च गजेन्द्राणां पतिताभिः समन्ततः ॥
vaidūryamaṇidaṇḍaiśca patitairaṅkuśaiḥ śubhaiḥ | ghaṇṭābhiśca gajendrāṇāṃ patitābhiḥ samantataḥ
वैदूर्य मणि के दण्डों वाले, गिरे हुए सुन्दर अंकुशों से, चारों ओर गिरी हुई गजराजों की घण्टियों से,
श्लोक 70 (6.96.70)
विपाटितविचित्राभिः कुथाभिरङ्कुशैस्तथा । ग्रैवेयैश्चित्ररूपैश्च रुक्मकक्ष्याभिरेव च ॥
vipāṭitavicitrābhiḥ kuthābhiraṅkuśaistathā | graiveyaiścitrarūpaiśca rukmakakṣyābhireva ca
फटी हुई रंग-बिरंगी झूलों और अंकुशों से, विचित्र रूप वाले कण्ठाभरणों और सोने की कमर-पेटियों से,
श्लोक 71 (6.96.71)
यन्त्रैश्च बहुधा च्छिन्नैस्तोमरैश्चापि काञ्चनैः । रराज सुभृशं भूमिस्तत्रतत्र विशांपते । अश्वानां रेणुकपिलै रुक्मच्छन्नैरुरश्छदैः ॥
yantraiśca bahudhā cchinnaistomaraiścāpi kāñcanaiḥ | rarāja subhṛśaṃ bhūmistatratatra viśāṃpate | aśvānāṃ reṇukapilai rukmacchannairuraśchadaiḥ
अनेक प्रकार से टूटे यन्त्रों और सोने के तोमरों से, हे प्रजानाथ, भूमि जहाँ-तहाँ अत्यन्त चमक रही थी। धूल से भूरे, सोने से मढ़े घोड़ों के वक्षस्त्राणों से,
श्लोक 72 (6.96.72)
सादिनां च भुजैश्छिन्नैः पतितैः साङ्गदैस्तथा । प्रासैश्च विमलैस्तीक्ष्णैर्विमलाभिस्तथर्ष्टिभिः ॥
sādināṃ ca bhujaiśchinnaiḥ patitaiḥ sāṅgadaistathā | prāsaiśca vimalaistīkṣṇairvimalābhistatharṣṭibhiḥ
घुड़सवारों की कटी हुई, बाजूबन्द सहित गिरी भुजाओं से, चमकते तीखे प्रासों और निर्मल ऋष्टियों से,
श्लोक 73 (6.96.73)
उष्णीषैश्च तथा चित्रैर्विप्रविद्धैस्ततस्ततः । विचित्रैर्बाणवर्षैश्च जातरूपपरिष्कृतैः ॥
uṣṇīṣaiśca tathā citrairvipraviddhaistatastataḥ | vicitrairbāṇavarṣaiśca jātarūpapariṣkṛtaiḥ
इधर-उधर फेंकी हुई रंग-बिरंगी पगड़ियों से, सोने से सजी बाणों की विचित्र बौछारों से,
श्लोक 74 (6.96.74)
अश्वास्तरपरिस्तोमै राङ्कवैर्मृदितैस्तथा । नरेन्द्रचूडामणिभिर्विचित्रैश्च महाधनैः ॥
aśvāstaraparistomai rāṅkavairmṛditaistathā | narendracūḍāmaṇibhirvicitraiśca mahādhanaiḥ
रौंदे हुए घोड़ों के झूलों और रंकु मृग के चर्म से बने आवरणों से, राजाओं की रंग-बिरंगी बहुमूल्य चूड़ामणियों से,
श्लोक 75 (6.96.75)
छत्रैस्तथापविद्धैश्च चामरैर्व्यजनैरपि । पद्मेन्दुद्युतिभिश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः ॥
chatraistathāpaviddhaiśca cāmarairvyajanairapi | padmendudyutibhiścaiva vadanaiścārukuṇḍalaiḥ
फेंके गए छत्रों, चँवरों और पंखों से, कमल और चन्द्रमा जैसी कान्ति वाले, सुन्दर कुण्डलों से युक्त मुखों से,
श्लोक 76 (6.96.76)
क्लृप्तश्मश्रुभिरत्यर्थं वीराणां समलङ्कृतैः । अपविद्धैर्महाराज सुवर्णोज्ज्वलकुण्डलैः ॥
klṛptaśmaśrubhiratyarthaṃ vīrāṇāṃ samalaṅkṛtaiḥ | apaviddhairmahārāja suvarṇojjvalakuṇḍalaiḥ
सुन्दर ढंग से कटी दाढ़ी वाले, भली-भाँति सजे, इधर-उधर पड़े वीरों के मुखों से, हे महाराज, जिनके कुण्डल सोने से दमक रहे थे,
श्लोक 77 (6.96.77)
ग्रहनक्षत्रशबला द्यौरिवासीद्वसुंधरा । एवमेते महासेने मृदिते तत्र भारत ॥
grahanakṣatraśabalā dyaurivāsīdvasuṃdharā | evamete mahāsene mṛdite tatra bhārata
पृथ्वी ग्रहों और नक्षत्रों से चित्रित आकाश के समान लगने लगी। हे भारत, इस प्रकार ये दोनों विशाल सेनाएँ वहाँ
श्लोक 78 (6.96.78)
परस्परं समासाद्य तव तेषां च संयुगे । तेषु श्रान्तेषु भग्नेषु मृदितेषु च भारत ॥
parasparaṃ samāsādya tava teṣāṃ ca saṃyuge | teṣu śrānteṣu bhagneṣu mṛditeṣu ca bhārata
युद्ध में एक-दूसरे से भिड़कर, आपकी और उनकी, रौंदी गईं। हे भारत, जब वे थकी, टूटी और कुचली हुई थीं,
श्लोक 79 (6.96.79)
रात्रिः समभवत्तत्र नापश्याम ततोऽनुगान् । ततोऽवहारं सैन्यानां प्रचुक्रुः कुरुपाण्डवाः ॥
rātriḥ samabhavattatra nāpaśyāma tato'nugān | tato'vahāraṃ sainyānāṃ pracukruḥ kurupāṇḍavāḥ
तब वहाँ रात्रि हो गई और हम अपने अनुयायियों को भी देख न सके। तब कौरवों और पाण्डवों ने अपनी सेनाओं को लौटाया,
श्लोक 80 (6.96.80)
घोरे निशामुखे रौद्रे वर्तमाने महाभये । अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः । न्यविशन्त निशाकाले गत्वा स्वशिबिरं तदा ॥
ghore niśāmukhe raudre vartamāne mahābhaye | avahāraṃ tataḥ kṛtvā sahitāḥ kurupāṇḍavāḥ | nyaviśanta niśākāle gatvā svaśibiraṃ tadā
उस घोर, भयानक और अत्यन्त भय से भरे सन्ध्याकाल में। इस प्रकार सेनाएँ लौटाकर कौरव और पाण्डव रात्रि के समय अपने-अपने शिविरों में जाकर विश्राम करने लगे।