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भीष्म पर्व · अध्याय 95

भगदत्त का घटोत्कच और पाण्डवों से युद्ध

घटोत्कच से हारकर दुःखी दुर्योधन भीष्म के पास जाकर उनसे उस राक्षस को मरवाने की प्रार्थना करता है। भीष्म उसे अपनी रक्षा करने और केवल राजाओं से लड़ने की सलाह देते हैं तथा प्राग्ज्योतिष-नरेश भगदत्त को घटोत्कच के विरुद्ध भेजते हैं। अपने हाथी सुप्रतीक पर सवार भगदत्त पाण्डव-योद्धाओं को तितर-बितर कर देता है, घटोत्कच का शूल काट गिराता है (यद्यपि राक्षस उसकी महाशक्ति को घुटने पर रखकर तोड़ डालता है), और भीम, अभिमन्यु, केकयों, क्षत्रदेव तथा द्रौपदी के पुत्रों को घायल कर भीम को रथहीन कर देता है। अर्जुन के आ पहुँचने पर युद्ध फैल जाता है, और भीम श्रीकृष्ण तथा अर्जुन को इरावान् के वध का समाचार सुनाते हैं।

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.95.1)

तस्मिन्महति संक्रन्दे राजा दुर्योधनस्तदा । पराजयं राक्षसेन नामृष्यत परंतपः । गाङ्गेयमुपसंगम्य विनयेनाभिवाद्य च ॥

tasminmahati saṃkrande rājā duryodhanastadā | parājayaṃ rākṣasena nāmṛṣyata paraṃtapaḥ | gāṅgeyamupasaṃgamya vinayenābhivādya ca

उस महान कोलाहल में शत्रुओं को तपाने वाला राजा दुर्योधन राक्षस के हाथों हुई अपनी पराजय सहन न कर सका; वह गङ्गापुत्र (भीष्म) के पास गया और विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया,

श्लोक 2 (6.95.2)

तस्य सर्वं यथावृत्तमाख्यातुमुपचक्रमे । घटोत्कचस्य विजयमात्मनश्च पराजयम् ॥

tasya sarvaṃ yathāvṛttamākhyātumupacakrame | ghaṭotkacasya vijayamātmanaśca parājayam

और जो कुछ घटा था, घटोत्कच की विजय और अपनी पराजय, वह सब उन्हें बताने लगा।

श्लोक 3 (6.95.3)

कथयामास दुर्धर्षो विनिःश्वस्य पुनःपुनः । अब्रवीच्च तदा राजन्भीष्मं कुरुपितामहम् ॥

kathayāmāsa durdharṣo viniḥśvasya punaḥpunaḥ | abravīcca tadā rājanbhīṣmaṃ kurupitāmaham

बार-बार लम्बी साँसें लेते हुए उस दुर्धर्ष वीर ने सब कह सुनाया, और फिर, हे राजन्, कुरुकुल के पितामह भीष्म से कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 4 (6.95.4)

भवन्तं समुपाश्रित्य द्रोणं चैव पितामह । पाण्डवैर्विग्रहो घोरः समारब्धो मया प्रभो ॥

bhavantaṃ samupāśritya droṇaṃ caiva pitāmaha | pāṇḍavairvigraho ghoraḥ samārabdho mayā prabho

'हे पितामह, आपका और द्रोण का भरोसा करके ही मैंने पाण्डवों से यह भयंकर युद्ध छेड़ा है, प्रभो।

श्लोक 5 (6.95.5)

एकादश समाख्याता अक्षौहिण्यश्च या मम । निदेशे तव तिष्ठन्ति मया सार्धं परंतप ॥

ekādaśa samākhyātā akṣauhiṇyaśca yā mama | nideśe tava tiṣṭhanti mayā sārdhaṃ paraṃtapa

मेरी जो ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ गिनी जाती हैं, वे मेरे साथ आपकी आज्ञा में खड़ी हैं, हे परन्तप।

श्लोक 6 (6.95.6)

सोऽहं भरतशार्दूल भीमसेनपुरोगमैः । घटोत्कचं समाश्रित्य पाण्डवैर्युधि निर्जितः ॥

so'haṃ bharataśārdūla bhīmasenapurogamaiḥ | ghaṭotkacaṃ samāśritya pāṇḍavairyudhi nirjitaḥ

फिर भी, हे भरतश्रेष्ठ, घटोत्कच का सहारा लेने वाले भीमसेन आदि पाण्डवों ने मुझे युद्ध में हरा दिया।

श्लोक 7 (6.95.7)

तन्मे दहति गात्राणि शुष्कवृक्षमिवानलः । तदिच्छामि महाभाग त्वत्प्रसादात्परंतप ॥

tanme dahati gātrāṇi śuṣkavṛkṣamivānalaḥ | tadicchāmi mahābhāga tvatprasādātparaṃtapa

यह बात मेरे अंगों को वैसे ही जला रही है जैसे सूखे वृक्ष को आग। इसलिए, हे महाभाग परन्तप, आपकी कृपा से मैं चाहता हूँ

श्लोक 8 (6.95.8)

राक्षसापशदं हन्तुं स्वयमेव पितामह । त्वां समाश्रित्य दुर्धर्षं तन्मे कर्तुं त्वमर्हसि ॥

rākṣasāpaśadaṃ hantuṃ svayameva pitāmaha | tvāṃ samāśritya durdharṣaṃ tanme kartuṃ tvamarhasi

कि हे पितामह, आप जैसे दुर्जय का आश्रय लेकर मैं स्वयं उस नीच राक्षस का वध करूँ। आप मेरा यह कार्य पूरा करें।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (6.95.9)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञो भरतसत्तम । दुर्योधनमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ rājño bharatasattama | duryodhanamidaṃ vākyaṃ bhīṣmaḥ śāntanavo'bravīt

हे भरतश्रेष्ठ, राजा के ये वचन सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्म ने दुर्योधन से यह कहा:

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (6.95.10)

शृणु राजन्मम वचो यत्त्वां वक्ष्यामि कौरव । यथा त्वया महाराज वर्तितव्यं परंतप ॥

śṛṇu rājanmama vaco yattvāṃ vakṣyāmi kaurava | yathā tvayā mahārāja vartitavyaṃ paraṃtapa

'हे राजन्, हे कौरव, मैं तुमसे जो कहूँगा उसे सुनो; हे महाराज परन्तप, तुम्हें किस प्रकार आचरण करना चाहिए।

श्लोक 11 (6.95.11)

आत्मा रक्ष्यस्त्वया तात सर्वावस्थास्वरिन्दम । धर्मराजेन संग्रामस्त्वया कार्यः सदाऽनघ ॥

ātmā rakṣyastvayā tāta sarvāvasthāsvarindama | dharmarājena saṃgrāmastvayā kāryaḥ sadā'nagha

हे तात, हे शत्रुदमन, हर स्थिति में तुम्हें अपनी रक्षा करनी चाहिए। हे निष्पाप, तुम्हें सदा धर्मराज (युधिष्ठिर) के साथ युद्ध करना चाहिए,

श्लोक 12 (6.95.12)

अर्जुनेन यमाभ्यां वा भीमसेनेन वा पुनः । अन्यैर्वा पृथिवीपालै राजा राजानमृच्छति ॥

arjunena yamābhyāṃ vā bhīmasenena vā punaḥ | anyairvā pṛthivīpālai rājā rājānamṛcchati

या अर्जुन से, या दोनों जुड़वाँ भाइयों (नकुल-सहदेव) से, या फिर भीमसेन से, अथवा अन्य राजाओं से; राजा राजा से ही भिड़ता है।

श्लोक 13 (6.95.13)

न तु कार्यस्त्वया राजन्हैडिम्बेन दुरात्मना । अहं द्रोणः कृपो द्रौणिः कृतवर्मा च सात्वतः । शल्यश्च वृषसेनश्च विकर्णश्च महारथः ॥

na tu kāryastvayā rājanhaiḍimbena durātmanā | ahaṃ droṇaḥ kṛpo drauṇiḥ kṛtavarmā ca sātvataḥ | śalyaśca vṛṣasenaśca vikarṇaśca mahārathaḥ

परन्तु हे राजन्, दुष्टात्मा हिडिम्बापुत्र से तुम्हें युद्ध नहीं करना चाहिए। मैं, द्रोण, कृप, द्रोणपुत्र, सात्वतवंशी कृतवर्मा, शल्य, वृषसेन और महारथी विकर्ण,

श्लोक 14 (6.95.14)

शेषाश्च भ्रातरस्त्वन्ये दुःशासनपुरोगमाः । त्वदर्थे प्रतियोत्स्यामो राक्षसं तं महाबलम् ॥

śeṣāśca bhrātarastvanye duḥśāsanapurogamāḥ | tvadarthe pratiyotsyāmo rākṣasaṃ taṃ mahābalam

तथा दुःशासन आदि तुम्हारे शेष भाई, हम सब तुम्हारे लिए उस महाबली राक्षस से लड़ेंगे।

श्लोक 15 (6.95.15)

रौद्रे तस्मिन्राक्षसेन्द्रे यदि ते हृच्छयो महान् । अयमागच्छतु रणं तस्य युद्धाय दुर्मतेः ॥

raudre tasminrākṣasendre yadi te hṛcchayo mahān | ayamāgacchatu raṇaṃ tasya yuddhāya durmateḥ

यदि उस भयंकर राक्षसराज के कारण तुम्हारे हृदय में बड़ी पीड़ा है, तो उस दुर्बुद्धि से युद्ध करने के लिए यह रणभूमि में जाए:

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (6.95.16)

भगदत्तो महीपालः पुरन्दरसमो युधि । एतावदुक्त्वा राजानं भगदत्तमथाब्रवीत् ॥

bhagadatto mahīpālaḥ purandarasamo yudhi | etāvaduktvā rājānaṃ bhagadattamathābravīt

युद्ध में पुरन्दर (इन्द्र) के समान राजा भगदत्त।' राजा से इतना कहकर, वाणी में निपुण भीष्म ने फिर भगदत्त से

श्लोक 17 (6.95.17)

समक्षं पार्थिवेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः । गच्छ शीघ्रं महाराज हैडिम्बं युद्धदुर्मदम् ॥

samakṣaṃ pārthivendrasya vākyaṃ vākyaviśāradaḥ | gaccha śīghraṃ mahārāja haiḍimbaṃ yuddhadurmadam

राजाओं के स्वामी (दुर्योधन) के सामने यह वाक्य कहा: 'हे महाराज, शीघ्र जाओ, और रणोन्मत्त हिडिम्बापुत्र को

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (6.95.18)

वारयस्व रणे यत्तो मिषतां सर्वधन्विनाम् । राक्षसं क्रूरकर्माणं यथेन्द्रस्तारकं पुरा ॥

vārayasva raṇe yatto miṣatāṃ sarvadhanvinām | rākṣasaṃ krūrakarmāṇaṃ yathendrastārakaṃ purā

सब धनुर्धरों के देखते-देखते सावधान होकर रण में रोक दो, उस क्रूरकर्मा राक्षस को, जैसे प्राचीन काल में इन्द्र ने तारक को रोका था।

श्लोक 19 (6.95.19)

तव दिव्यानि चास्त्राणि विक्रमश्च परंतप । समागमश्च बहुभिः पुराऽभूदमरैः सह ॥

tava divyāni cāstrāṇi vikramaśca paraṃtapa | samāgamaśca bahubhiḥ purā'bhūdamaraiḥ saha

हे परन्तप, तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र और पराक्रम है, और पूर्वकाल में तुम अनेक देवताओं से भिड़ चुके हो।

श्लोक 20 (6.95.20)

त्वं तस्य नृपशार्दूल प्रतियोद्धा महाहवे । स्वबलेनावृतो गच्छ जहि राक्षसपुङ्गवम् ॥

tvaṃ tasya nṛpaśārdūla pratiyoddhā mahāhave | svabalenāvṛto gaccha jahi rākṣasapuṅgavam

हे नृपश्रेष्ठ, इस महासमर में तुम ही उसका सामना कर सकते हो। अपनी सेना से घिरकर जाओ और उस राक्षसश्रेष्ठ को मार डालो।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 21 (6.95.21)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं भीष्मस्य पृतनापतेः । प्रययौ सिंहनादेन परानभिमुखो द्रुतम् ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ bhīṣmasya pṛtanāpateḥ | prayayau siṃhanādena parānabhimukho drutam

सेनापति भीष्म के ये वचन सुनकर वह सिंहनाद करता हुआ शीघ्रता से शत्रुओं के सामने चल पड़ा।

श्लोक 22 (6.95.22)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य गर्जन्तमिव तोयदम् । अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धाः पाण्डवानां महारथाः ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya garjantamiva toyadam | abhyavartanta saṃkruddhāḥ pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ

गरजते मेघ के समान उसे आते देख पाण्डवों के महारथी क्रोध में भरकर उसके सामने आ डटे:

श्लोक 23 (6.95.23)

भीमसेनोऽभिमन्युश्च राक्षसश्च घटोत्कचः । द्रौपदेयाः सत्यधृतिः क्षत्रदेवश्च भारत ॥

bhīmaseno'bhimanyuśca rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | draupadeyāḥ satyadhṛtiḥ kṣatradevaśca bhārata

भीमसेन, अभिमन्यु, राक्षस घटोत्कच, द्रौपदी के पुत्र, सत्यधृति और क्षत्रदेव, हे भारत,

श्लोक 24 (6.95.24)

चेदिपो वसुदानश्च दशार्णाधिपतिस्तथा । सुप्रतीकेन तांश्चापि भगदत्तोऽप्युपाद्रवत् ॥

cedipo vasudānaśca daśārṇādhipatistathā | supratīkena tāṃścāpi bhagadatto'pyupādravat

चेदिराज, वसुदान और दशार्णराज। भगदत्त ने भी सुप्रतीक हाथी पर सवार होकर उन पर धावा बोला।

श्लोक 25 (6.95.25)

ततः समभवद्युद्धं घोररूपं भयानकम् । पाण्डूनां भगदत्तेन यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥

tataḥ samabhavadyuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayānakam | pāṇḍūnāṃ bhagadattena yamarāṣṭravivardhanam

तब पाण्डवों और भगदत्त के बीच भयंकर रूप वाला, डरावना युद्ध छिड़ गया, जो यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला था।

श्लोक 26 (6.95.26)

प्रयुक्ता रथिभिर्बाणा भीमवेगाः सुतेजनाः । ते निपेतुर्महाराज नागेषु च रथेषु च ॥

prayuktā rathibhirbāṇā bhīmavegāḥ sutejanāḥ | te nipeturmahārāja nāgeṣu ca ratheṣu ca

रथियों द्वारा छोड़े गए भयंकर वेग वाले, तीखी नोक वाले बाण, हे महाराज, हाथियों और रथों पर गिरने लगे।

श्लोक 27 (6.95.27)

प्रभिन्नाश्च महानागा विनीता हस्तिसादिभिः । परस्परं समासाद्य संनिपेतुरभीतवत् ॥

prabhinnāśca mahānāgā vinītā hastisādibhiḥ | parasparaṃ samāsādya saṃnipeturabhītavat

मदमस्त विशाल हाथी, जिन्हें महावत चला रहे थे, एक-दूसरे से भिड़कर निर्भय-से टकराने लगे।

श्लोक 28 (6.95.28)

मदान्धा रोषसंरब्धा विषाणाग्रैर्महाहवे । बिभिदुर्दन्तमुसलैः समासाद्य परस्परम् ॥

madāndhā roṣasaṃrabdhā viṣāṇāgrairmahāhave | bibhidurdantamusalaiḥ samāsādya parasparam

मद से अन्धे और रोष से भरे वे हाथी उस महासमर में एक-दूसरे के पास पहुँचकर अपने मूसल-जैसे दाँतों की नोकों से परस्पर विदीर्ण करने लगे।

श्लोक 29 (6.95.29)

हयाश्च चामरापीडाः प्रासपाणिभिरास्थिताः । चोदिताः सादिभिः क्षिप्रं निजघ्नुरितरेतरम् ॥

hayāśca cāmarāpīḍāḥ prāsapāṇibhirāsthitāḥ | coditāḥ sādibhiḥ kṣipraṃ nijaghnuritaretaram

चँवर की कलगी वाले घोड़े, जिन पर हाथ में प्रास लिए सवार बैठे थे, घुड़सवारों द्वारा तेज़ी से हाँके जाकर एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 30 (6.95.30)

पादाताश्च पदात्योघैस्ताडिताः शक्तितोमरैः । न्यपतन्त तदा भूमौ शतशोऽथ सहस्रशः ॥

pādātāśca padātyoghaistāḍitāḥ śaktitomaraiḥ | nyapatanta tadā bhūmau śataśo'tha sahasraśaḥ

पैदल सैनिक, पैदलों के झुंडों द्वारा शक्तियों और तोमरों से मारे जाकर, सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में धरती पर गिरने लगे।

श्लोक 31 (6.95.31)

रथिनश्च रथांश्चित्रान्कर्णिनालीकतोमरैः । निहत्य समरे वीरान्सिंहनादान्विनेदिरे ॥

rathinaśca rathāṃścitrānkarṇinālīkatomaraiḥ | nihatya samare vīrānsiṃhanādānvinedire

और रथी योद्धा कर्णी, नालीक और तोमरों से युद्ध में सुन्दर रथों पर सवार वीरों को मारकर सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 32 (6.95.32)

तस्मिंस्तथा वर्तमाने संग्रामे रोमहर्षणे । भगदत्तो महेष्वासो भीमसेनमथाद्रवत् ॥

tasmiṃstathā vartamāne saṃgrāme romaharṣaṇe | bhagadatto maheṣvāso bhīmasenamathādravat

जब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध इस प्रकार चल रहा था, तब महाधनुर्धर भगदत्त ने भीमसेन पर धावा बोला

श्लोक 33 (6.95.33)

कुञ्जरेण प्रभिन्नेन सप्तधा स्रवता मदम् । पर्वतेन यथा तोयं स्रवमाणेन सर्वशः ॥

kuñjareṇa prabhinnena saptadhā sravatā madam | parvatena yathā toyaṃ sravamāṇena sarvaśaḥ

मद से उन्मत्त ऐसे हाथी पर, जिसके सात स्थानों से मद बह रहा था, मानो कोई पर्वत चारों ओर से जल बहा रहा हो,

श्लोक 34 (6.95.34)

किरञ्छरसहस्राणि सुप्रतीकशिरोगतः । ऐरावतस्थो मघवान्वारिधारा इवानघ ॥

kirañcharasahasrāṇi supratīkaśirogataḥ | airāvatastho maghavānvāridhārā ivānagha

सुप्रतीक के मस्तक पर बैठा वह हज़ारों बाण बरसाता हुआ ऐसा लगता था, हे निष्पाप, जैसे ऐरावत पर बैठे इन्द्र जलधाराएँ बरसा रहे हों।

श्लोक 35 (6.95.35)

स भीमं शरधाराभिस्ताडयामास पार्थिवः । पर्वतं वारिधाराभिस्तपान्ते जलदो यथा ॥

sa bhīmaṃ śaradhārābhistāḍayāmāsa pārthivaḥ | parvataṃ vāridhārābhistapānte jalado yathā

उस राजा ने बाणों की धाराओं से भीम पर प्रहार किया, जैसे ग्रीष्म ऋतु के अन्त में मेघ जलधाराओं से पर्वत पर प्रहार करता है।

श्लोक 36 (6.95.36)

भीमसेनस्तु संक्रुद्धः पादरक्षान्परःशतान् । निजघान महेष्वासः संरब्धः शरवृष्टिभिः ॥

bhīmasenastu saṃkruddhaḥ pādarakṣānparaḥśatān | nijaghāna maheṣvāsaḥ saṃrabdhaḥ śaravṛṣṭibhiḥ

किन्तु क्रुद्ध और आवेश में भरे महाधनुर्धर भीमसेन ने बाणों की वर्षा से उसके सौ से अधिक पादरक्षकों को मार डाला।

श्लोक 37 (6.95.37)

तान्दृष्ट्वा निहतान्क्रुद्धो भगदत्तः प्रतापवान् । चोदयामास नागेन्द्रं भीमसेनरथं प्रति ॥

tāndṛṣṭvā nihatānkruddho bhagadattaḥ pratāpavān | codayāmāsa nāgendraṃ bhīmasenarathaṃ prati

उन्हें मारा गया देख प्रतापी भगदत्त ने क्रोध में भरकर उस गजराज को भीमसेन के रथ की ओर हाँका।

श्लोक 38 (6.95.38)

स नागः प्रेषितस्तेन बाणो ज्याचोदितो यथा । अभ्यधावत वेगेन भीमसेनमरिन्दमम् ॥

sa nāgaḥ preṣitastena bāṇo jyācodito yathā | abhyadhāvata vegena bhīmasenamarindamam

धनुष की डोरी से छूटे बाण की भाँति उसके द्वारा प्रेरित वह हाथी वेग से शत्रुदमन भीमसेन की ओर दौड़ा।

श्लोक 39 (6.95.39)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य पाण्डवानां महारथाः । अभ्यवर्तन्त वेगेन भीमसेनपुरोगमाः ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ | abhyavartanta vegena bhīmasenapurogamāḥ

उसे आते देख भीमसेन आदि पाण्डवों के महारथी वेग से उसके सामने आ डटे:

श्लोक 40 (6.95.40)

केकयाश्चाभिमन्युश्च द्रौपदेयाश्च सर्वशः । दशार्णाधिपतिः शूरः क्षत्रदेवश्च मारिष ॥

kekayāścābhimanyuśca draupadeyāśca sarvaśaḥ | daśārṇādhipatiḥ śūraḥ kṣatradevaśca māriṣa

केकय, अभिमन्यु, द्रौपदी के सभी पुत्र, शूरवीर दशार्णराज और क्षत्रदेव, हे आर्य,

श्लोक 41 (6.95.41)

चेदिपो धृष्टकेतुश्च संरब्धाः सर्व एव ते । उत्तमास्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महाबलाः ॥

cedipo dhṛṣṭaketuśca saṃrabdhāḥ sarva eva te | uttamāstrāṇi divyāni darśayanto mahābalāḥ

चेदिराज धृष्टकेतु, ये सब महाबली योद्धा क्रोध में भरकर उत्तम दिव्य अस्त्रों का प्रदर्शन करते हुए

श्लोक 42 (6.95.42)

तमेकं कुञ्जरं क्रुद्धाः समन्तात्पर्यवारयन् । स विद्धो बहुभिर्बाणैर्व्यरोचत महाद्विपः ॥

tamekaṃ kuñjaraṃ kruddhāḥ samantātparyavārayan | sa viddho bahubhirbāṇairvyarocata mahādvipaḥ

क्रोधपूर्वक उस अकेले हाथी को चारों ओर से घेर लिया। बहुत-से बाणों से बिंधा वह महान गज ऐसा शोभित हुआ

श्लोक 43 (6.95.43)

संजातरुधिरोत्पीडो धातुचित्र इवाद्रिराट् । दशार्णाधिपतिश्चाऽपि गजं भूमिधरोपमम् ॥

saṃjātarudhirotpīḍo dhātucitra ivādrirāṭ | daśārṇādhipatiścā'pi gajaṃ bhūmidharopamam

जिसके शरीर से रक्त की धाराएँ फूट रही थीं, मानो गेरू आदि धातुओं से चित्रित पर्वतराज हो। और दशार्णराज भी पर्वत के समान विशाल हाथी पर

श्लोक 44 (6.95.44)

समास्थितोऽभिदुद्राव भगदत्तस्य वारणम् । तमापतन्तं समरे गजं गजपतिः स च ॥

samāsthito'bhidudrāva bhagadattasya vāraṇam | tamāpatantaṃ samare gajaṃ gajapatiḥ sa ca

सवार होकर भगदत्त के हाथी पर टूट पड़ा। रण में उस आते हुए हाथी को गजराज सुप्रतीक ने भी

श्लोक 45 (6.95.45)

दधार सुप्रतीकोऽपि वेलेव मकरालयम् । वारितं प्रेक्ष्य नागेन्द्रं दशार्णस्य महात्मनः ॥

dadhāra supratīko'pi veleva makarālayam | vāritaṃ prekṣya nāgendraṃ daśārṇasya mahātmanaḥ

वैसे ही रोक लिया जैसे तट मगरों के घर समुद्र को रोकता है। महात्मा दशार्णराज के गजराज को रुका हुआ देखकर

श्लोक 46 (6.95.46)

साधुसाध्विति सैन्यानि त्वदीयान्यभ्यपूजयन् । ततः प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरान्वै चतुर्दश ॥

sādhusādhviti sainyāni tvadīyānyabhyapūjayan | tataḥ prāgjyotiṣaḥ kruddhastomarānvai caturdaśa

आपकी सेनाएँ 'साधु, साधु' कहकर सराहना करने लगीं। तब क्रुद्ध प्राग्ज्योतिष-नरेश ने चौदह तोमर

श्लोक 47 (6.95.47)

प्राहिणोत्तस्य नागस्य प्रमुखे नृपसत्तम । तस्य कुम्भपरित्राणं शातकुम्भपरिष्कृतम् ॥

prāhiṇottasya nāgasya pramukhe nṛpasattama | tasya kumbhaparitrāṇaṃ śātakumbhapariṣkṛtam

उस हाथी के अग्रभाग पर छोड़े, हे नृपश्रेष्ठ। उसके गण्डस्थल के स्वर्ण-जटित कवच को

श्लोक 48 (6.95.48)

विदार्य प्राविशन्क्षिप्रं वल्मीकमिव पन्नगाः । स गाढविद्धो व्यथितो नागो भरतसत्तम ॥

vidārya prāviśankṣipraṃ valmīkamiva pannagāḥ | sa gāḍhaviddho vyathito nāgo bharatasattama

चीरकर वे तोमर तेज़ी से भीतर ऐसे घुस गए जैसे साँप बाँबी में घुसते हैं। गहरे घाव से पीड़ित वह हाथी, हे भरतश्रेष्ठ,

श्लोक 49 (6.95.49)

उपावृत्तमदः क्षिप्रमभ्यवर्तत वेगिनः । स प्रदुद्राव वेगेन प्रणदन्भैरवं रवम् ॥

upāvṛttamadaḥ kṣipramabhyavartata veginaḥ | sa pradudrāva vegena praṇadanbhairavaṃ ravam

मद उतर जाने पर तेज़ी से लौट पड़ा, और भयंकर चिंघाड़ करता हुआ वेग से भागा,

श्लोक 50 (6.95.50)

संमर्दमानः स्वबलं वायुर्वृक्षानिवौजसा । तस्मिन्पराजिते नागे पाण्डवानां महारथाः ॥

saṃmardamānaḥ svabalaṃ vāyurvṛkṣānivaujasā | tasminparājite nāge pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ

और अपनी ही सेना को ऐसे रौंदने लगा जैसे वायु अपने वेग से वृक्षों को। उस हाथी के पराजित होने पर पाण्डवों के महारथी

श्लोक 51 (6.95.51)

सिंहनादं विनद्योच्चैर्युद्धायैवावतस्थिरे । ततो भीमं पुरस्कृत्य भगदत्तमुपाद्रवन् ॥

siṃhanādaṃ vinadyoccairyuddhāyaivāvatasthire | tato bhīmaṃ puraskṛtya bhagadattamupādravan

ज़ोर से सिंहनाद करके युद्ध के लिए डट गए। फिर भीम को आगे करके वे भगदत्त पर टूट पड़े,

श्लोक 52 (6.95.52)

किरन्तो विविधान्बाणाञ्शस्त्राणि विविधानि च । तेषामापततां राजन्संक्रुद्धानाममर्षिणाम् ॥

kiranto vividhānbāṇāñśastrāṇi vividhāni ca | teṣāmāpatatāṃ rājansaṃkruddhānāmamarṣiṇām

नाना प्रकार के बाण और विविध शस्त्र बरसाते हुए। हे राजन्, जब वे क्रुद्ध और असहिष्णु योद्धा आक्रमण कर रहे थे,

श्लोक 53 (6.95.53)

श्रुत्वा स निनदं घोरममर्षाद्गतसाध्वसः । भगदत्तो महेष्वासः स्वनागं प्रत्यचोदयत् ॥

śrutvā sa ninadaṃ ghoramamarṣādgatasādhvasaḥ | bhagadatto maheṣvāsaḥ svanāgaṃ pratyacodayat

तब उनका घोर नाद सुनकर महाधनुर्धर भगदत्त ने क्रोधवश भय को त्यागकर अपने हाथी को आगे बढ़ाया।

श्लोक 54 (6.95.54)

अङ्कुशाङ्गुष्ठनुदितः स गजप्रवरो युधि । तस्मिन्क्षणे समभवत्सांवर्तक इवानलः ॥

aṅkuśāṅguṣṭhanuditaḥ sa gajapravaro yudhi | tasminkṣaṇe samabhavatsāṃvartaka ivānalaḥ

अंकुश और पैर के अँगूठे से प्रेरित वह श्रेष्ठ गज उस क्षण युद्ध में प्रलयकाल की संवर्तक अग्नि के समान हो गया।

श्लोक 55 (6.95.55)

रथसङ्घांस्तथा नागान्हयांश्च हयसादिनः । पादातांश्च सुसंक्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

rathasaṅghāṃstathā nāgānhayāṃśca hayasādinaḥ | pādātāṃśca susaṃkruddhaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

रथों के समूहों, हाथियों, घोड़ों और घुड़सवारों तथा सैकड़ों-हज़ारों पैदल सैनिकों को अत्यन्त क्रोध में भरकर

श्लोक 56 (6.95.56)

अमृद्नात्समरे नागः संप्रधावंस्ततस्ततः । तेन संलोड्यमानं तु पाण्डवानां बलं महत् ॥

amṛdnātsamare nāgaḥ saṃpradhāvaṃstatastataḥ | tena saṃloḍyamānaṃ tu pāṇḍavānāṃ balaṃ mahat

वह हाथी रण में इधर-उधर दौड़ता हुआ रौंदने लगा। उसके द्वारा मथी जाती पाण्डवों की वह विशाल सेना

श्लोक 57 (6.95.57)

संचुकोच महाराज चर्मेवाग्नौ समाहितम् । भग्नं तु स्वबलं दृष्ट्वा भगदत्तेन धीमता ॥

saṃcukoca mahārāja carmevāgnau samāhitam | bhagnaṃ tu svabalaṃ dṛṣṭvā bhagadattena dhīmatā

हे महाराज, आग पर रखे चमड़े की भाँति सिकुड़ गई। बुद्धिमान भगदत्त द्वारा अपनी सेना को छिन्न-भिन्न हुआ देखकर

श्लोक 58 (6.95.58)

घटोत्कचोऽथ संक्रुद्धो भगदत्तमुपाद्रवत् । विकटः परुषो राजन्दीप्तास्यो दीप्तलोचनः ॥

ghaṭotkaco'tha saṃkruddho bhagadattamupādravat | vikaṭaḥ paruṣo rājandīptāsyo dīptalocanaḥ

घटोत्कच क्रोध में भरकर भगदत्त पर टूट पड़ा। हे राजन्, वह विकराल और कठोर था, उसका मुख और नेत्र दहक रहे थे।

श्लोक 59 (6.95.59)

रूपं विभीषणं कृत्वा रोषेण प्रज्वलन्निव । जग्राह विमलं शूलं गिरीणामपि दारणम् ॥

rūpaṃ vibhīṣaṇaṃ kṛtvā roṣeṇa prajvalanniva | jagrāha vimalaṃ śūlaṃ girīṇāmapi dāraṇam

भयानक रूप धारण कर, मानो क्रोध से जलता हुआ, उसने पर्वतों को भी चीर देने वाला एक चमचमाता शूल उठाया,

श्लोक 60 (6.95.60)

नागं जिघांसुः सहसा चिक्षेप च महाबलः । स विस्फुलिङ्गमालाभिः समन्तात्परिवेष्टितम् ॥

nāgaṃ jighāṃsuḥ sahasā cikṣepa ca mahābalaḥ | sa visphuliṅgamālābhiḥ samantātpariveṣṭitam

और हाथी को मार डालने की इच्छा से उस महाबली ने सहसा उसे फेंका; वह शूल चारों ओर से चिनगारियों की मालाओं से घिरा था।

श्लोक 61 (6.95.61)

तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा प्राग्ज्योतिषो नृपः । चिक्षेप रुचिरं तीक्ष्णमर्धचन्द्रं सुदारुणम् ॥

tamāpatantaṃ sahasā dṛṣṭvā prāgjyotiṣo nṛpaḥ | cikṣepa ruciraṃ tīkṣṇamardhacandraṃ sudāruṇam

उसे सहसा आते देख प्राग्ज्योतिष-नरेश ने एक सुन्दर, तीखा और अत्यन्त भयंकर अर्धचन्द्र बाण छोड़ा,

श्लोक 62 (6.95.62)

चिच्छेद तन्महच्छूलं तेन बाणेन वेगवान् । उत्पपात द्विधा च्छिन्नं शूलं हेमपरिष्कृतम् ॥

ciccheda tanmahacchūlaṃ tena bāṇena vegavān | utpapāta dvidhā cchinnaṃ śūlaṃ hemapariṣkṛtam

और उस वेगवान् राजा ने उस बाण से वह विशाल शूल काट डाला। दो टुकड़े होकर वह स्वर्ण-जटित शूल ऊपर उछला,

श्लोक 63 (6.95.63)

महाशनिर्यथा भ्रष्टा शक्रमुक्ता नभोगता । शूलं निपतितं दृष्ट्वा द्विधा कृत्तं च पार्थिवः ॥

mahāśaniryathā bhraṣṭā śakramuktā nabhogatā | śūlaṃ nipatitaṃ dṛṣṭvā dvidhā kṛttaṃ ca pārthivaḥ

जैसे इन्द्र का छोड़ा हुआ महान वज्र आकाश से गिरता है। शूल को दो टुकड़े होकर गिरा देख उस राजा ने

श्लोक 64 (6.95.64)

रुक्मदण्डां महाशक्तिं जग्राहाग्निशिखोपमाम् । चिक्षेप तां राक्षसस्य तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

rukmadaṇḍāṃ mahāśaktiṃ jagrāhāgniśikhopamām | cikṣepa tāṃ rākṣasasya tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

अग्निशिखा के समान, सोने के दण्ड वाली एक महाशक्ति उठाई और 'ठहर, ठहर' कहते हुए उसे राक्षस पर फेंक दिया।

श्लोक 65 (6.95.65)

तामापतन्तीं संप्रेक्ष्य वियत्स्थामशनीमिव । उत्पत्य राक्षसस्तूर्णं जग्राह च ननाद च ॥

tāmāpatantīṃ saṃprekṣya viyatsthāmaśanīmiva | utpatya rākṣasastūrṇaṃ jagrāha ca nanāda ca

आकाश में वज्र के समान उसे आते देख राक्षस ने तुरन्त उछलकर उसे पकड़ लिया और गर्जना की।

श्लोक 66 (6.95.66)

बभञ्ज चैनां त्वरितो जानुन्यारोप्य भारत । पश्यतः पार्थिवेन्द्रस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥

babhañja caināṃ tvarito jānunyāropya bhārata | paśyataḥ pārthivendrasya tadadbhutamivābhavat

और हे भारत, उसने राजा के देखते-देखते उसे शीघ्र ही घुटने पर रखकर तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी बात हुई।

श्लोक 67 (6.95.67)

तदवेक्ष्य कृतं कर्म राक्षसेन बलीयसा । दिवि देवाः सगन्धर्वा मुनयश्चापि विस्मिताः ॥

tadavekṣya kṛtaṃ karma rākṣasena balīyasā | divi devāḥ sagandharvā munayaścāpi vismitāḥ

उस बलवान राक्षस का यह कर्म देखकर स्वर्ग में गन्धर्वों सहित देवता और मुनि भी विस्मित हो गए।

श्लोक 68 (6.95.68)

पाण्डवाश्च महाराज भीमसेनपुरोगमाः । साधुसाध्विति नादेन पृथिवीमन्वनादयन् ॥

pāṇḍavāśca mahārāja bhīmasenapurogamāḥ | sādhusādhviti nādena pṛthivīmanvanādayan

और हे महाराज, भीमसेन आदि पाण्डवों ने 'साधु, साधु' के नाद से पृथ्वी को गुँजा दिया।

श्लोक 69 (6.95.69)

तं तु श्रुत्वा महानादं प्रहृष्टानां महात्मनाम् । नामृष्यत महेष्वासो भगदत्तः प्रतापवान् ॥

taṃ tu śrutvā mahānādaṃ prahṛṣṭānāṃ mahātmanām | nāmṛṣyata maheṣvāso bhagadattaḥ pratāpavān

हर्ष से भरे उन महात्माओं का वह महानाद सुनकर प्रतापी महाधनुर्धर भगदत्त उसे सहन न कर सका।

श्लोक 70 (6.95.70)

स विष्फार्य महच्चापमिन्द्राशनिसमप्रभम् । अभिदुद्राव वेगेन पाण्डवानां महारथान् ॥

sa viṣphārya mahaccāpamindrāśanisamaprabham | abhidudrāva vegena pāṇḍavānāṃ mahārathān

इन्द्र के वज्र के समान चमकते अपने विशाल धनुष को तानकर वह पाण्डवों के महारथियों पर वेग से टूट पड़ा,

श्लोक 71 (6.95.71)

विसृजन्विमलांस्तीक्ष्णान्नाराचाञ्ज्वलनप्रभान् । भीममेकेन विव्याध राक्षसं नवभिः शरैः ॥

visṛjanvimalāṃstīkṣṇānnārācāñjvalanaprabhān | bhīmamekena vivyādha rākṣasaṃ navabhiḥ śaraiḥ

अग्नि के समान दीप्त, निर्मल और तीखे नाराच बाण छोड़ते हुए। उसने भीम को एक बाण से और राक्षस को नौ बाणों से बींधा,

श्लोक 72 (6.95.72)

अभिमन्युं त्रिभिश्चैव केकयान्पञ्च पञ्चभिः । पूर्णायतविसृष्टेन शरेणानतपर्वणा ॥

abhimanyuṃ tribhiścaiva kekayānpañca pañcabhiḥ | pūrṇāyatavisṛṣṭena śareṇānataparvaṇā

अभिमन्यु को तीन बाणों से, और पाँचों केकयों को पाँच बाणों से। पूरी तरह खींचे गए धनुष से छोड़े गए, झुकी गाँठों वाले एक बाण से

श्लोक 73 (6.95.73)

बिभेद दक्षिणं बाहुं क्षत्रदेवस्य चाहवे । पपात सहसा तस्य सशरं धनुरुत्तमम् ॥

bibheda dakṣiṇaṃ bāhuṃ kṣatradevasya cāhave | papāta sahasā tasya saśaraṃ dhanuruttamam

उसने युद्ध में क्षत्रदेव की दाहिनी भुजा बींध दी, और उसका उत्तम धनुष बाण सहित सहसा गिर पड़ा।

श्लोक 74 (6.95.74)

द्रौपदेयांस्ततः पञ्च पञ्चभिः समताडयत् । भीमसेनस्य च क्रोधान्निजघान तुरंगमान् ॥

draupadeyāṃstataḥ pañca pañcabhiḥ samatāḍayat | bhīmasenasya ca krodhānnijaghāna turaṃgamān

फिर उसने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को पाँच बाणों से मारा, और क्रोध में भीमसेन के घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 75 (6.95.75)

ध्वजं केसरिणं चास्य चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः । निर्बिभेद त्रिभिश्चान्यैः सारथिं चास्य पत्रिभिः ॥

dhvajaṃ kesariṇaṃ cāsya ciccheda viśikhaistribhiḥ | nirbibheda tribhiścānyaiḥ sārathiṃ cāsya patribhiḥ

तीन बाणों से उसने उनका सिंहचिह्न वाला ध्वज काट गिराया, और तीन अन्य पंखयुक्त बाणों से उनके सारथि को बींध दिया।

श्लोक 76 (6.95.76)

स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । विशोको भरतश्रेष्ठ भगदत्तेन संयुगे ॥

sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | viśoko bharataśreṣṭha bhagadattena saṃyuge

हे भरतश्रेष्ठ, रण में भगदत्त द्वारा गहरा घाव खाकर पीड़ित विशोक रथ की बैठक में बैठ गया।

श्लोक 77 (6.95.77)

ततो भीमो महाबाहुर्विरथो रथिनां वरः । गदां प्रगृह्य वेगेन प्रचस्कन्द रथोत्तमात् ॥

tato bhīmo mahābāhurviratho rathināṃ varaḥ | gadāṃ pragṛhya vegena pracaskanda rathottamāt

तब रथहीन हुए, रथियों में श्रेष्ठ महाबाहु भीम ने गदा उठाई और वेग से अपने उत्तम रथ से कूद पड़े।

श्लोक 78 (6.95.78)

तमुद्यतगदं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् । तावकानां भयं घोरं समपद्यत भारत ॥

tamudyatagadaṃ dṛṣṭvā saśṛṅgamiva parvatam | tāvakānāṃ bhayaṃ ghoraṃ samapadyata bhārata

शिखरयुक्त पर्वत के समान गदा उठाए उन्हें देखकर, हे भारत, आपके योद्धाओं में घोर भय छा गया।

श्लोक 79 (6.95.79)

एतस्मिन्नेव काले तु पाण्डवः कृष्णसारथिः । आजगाम महाराज निघ्नञ्शत्रून्समन्ततः ॥

etasminneva kāle tu pāṇḍavaḥ kṛṣṇasārathiḥ | ājagāma mahārāja nighnañśatrūnsamantataḥ

उसी समय, हे महाराज, श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं वे पाण्डुपुत्र (अर्जुन) चारों ओर शत्रुओं का संहार करते हुए वहाँ आ पहुँचे,

श्लोक 80 (6.95.80)

यत्र तौ पुरुषव्याघ्रौ पितापुत्रौ महाबलौ । प्राग्ज्योतिषेण संयुक्तौ भीमसेनघटोत्कचौ ॥

yatra tau puruṣavyāghrau pitāputrau mahābalau | prāgjyotiṣeṇa saṃyuktau bhīmasenaghaṭotkacau

जहाँ वे दोनों पुरुषसिंह, महाबली पिता-पुत्र भीमसेन और घटोत्कच, प्राग्ज्योतिष-नरेश से जूझ रहे थे।

श्लोक 81 (6.95.81)

दृष्ट्वा च पाण्डवो भ्रातॄन्युध्यमानान्महारथान् । त्वरितो भरतश्रेष्ठ तत्रायुध्यत्किरञ्छरान् ॥

dṛṣṭvā ca pāṇḍavo bhrātṝnyudhyamānānmahārathān | tvarito bharataśreṣṭha tatrāyudhyatkirañcharān

अपने महारथी भाइयों को युद्ध करते देख, हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डुपुत्र (अर्जुन) शीघ्रता से बाण बरसाते हुए वहाँ युद्ध करने लगे।

श्लोक 82 (6.95.82)

ततो दुर्योधनो राजा त्वरमाणो महारथः । सेनामचोदयत्क्षिप्रं रथनागाश्वसंकुलाम् ॥

tato duryodhano rājā tvaramāṇo mahārathaḥ | senāmacodayatkṣipraṃ rathanāgāśvasaṃkulām

तब महारथी राजा दुर्योधन ने शीघ्रता से रथों, हाथियों और घोड़ों से भरी अपनी सेना को आगे बढ़ाया।

श्लोक 83 (6.95.83)

तामापतन्तीं सहसा कौरवाणां महाचमूम् । अभिदुद्राव वेगेन पाण्डवः श्वेतवाहनः ॥

tāmāpatantīṃ sahasā kauravāṇāṃ mahācamūm | abhidudrāva vegena pāṇḍavaḥ śvetavāhanaḥ

कौरवों की उस विशाल सेना को सहसा आते देख श्वेत घोड़ों वाले पाण्डुपुत्र (अर्जुन) वेग से उस पर टूट पड़े।

श्लोक 84 (6.95.84)

भगदत्तश्च समरे तेन नागेन भारत । विमृद्नन्पाण्डवबलं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥

bhagadattaśca samare tena nāgena bhārata | vimṛdnanpāṇḍavabalaṃ yudhiṣṭhiramupādravat

और हे भारत, भगदत्त उस हाथी से पाण्डव-सेना को रौंदता हुआ युधिष्ठिर पर टूट पड़ा।

श्लोक 85 (6.95.85)

तदासीत्सुमहद्युद्धं भगदत्तस्य मारिष । पाञ्चालैः पाण्डवेयैश्च केकयैश्चोद्यतायुधैः ॥

tadāsītsumahadyuddhaṃ bhagadattasya māriṣa | pāñcālaiḥ pāṇḍaveyaiśca kekayaiścodyatāyudhaiḥ

हे आर्य, तब भगदत्त का पाञ्चालों, पाण्डव-योद्धाओं और शस्त्र उठाए केकयों के साथ अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ।

श्लोक 86 (6.95.86)

भीमसेनोऽपि समरे तावुभौ केशवार्जुनौ । अश्रावयद्यथावृत्तमिरावद्वधमुत्तमम् ॥

bhīmaseno'pi samare tāvubhau keśavārjunau | aśrāvayadyathāvṛttamirāvadvadhamuttamam

और भीमसेन ने भी युद्धभूमि में केशव और अर्जुन दोनों को जो कुछ हुआ था, इरावान् के वध का वह बड़ा प्रसंग, कह सुनाया।

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