भीष्म पर्व · अध्याय 94
घटोत्कच की माया से कौरव-सेना का पलायन
आठवें दिन अपनी सेना को मारा गया देखकर दुर्योधन भीम पर आक्रमण करता है, उनका धनुष काटकर छाती में बाण मारता है, और द्रोण कौरव-योद्धाओं को राजा की रक्षा के लिए भेजते हैं। भीम द्रोण को अचेत कर देते हैं और गदा लेकर रथ से कूदकर दुर्योधन और अश्वत्थामा का सामना करते हैं; अश्वत्थामा अनूप-नरेश नील को घायल कर गिरा देता है और भीम नील को अपने रथ पर उठा ले जाते हैं। घटोत्कच अश्वत्थामा पर टूट पड़ता है, और अपने राक्षसों के मारे जाने पर ऐसी भयानक माया रचता है कि कौरव अपने प्रमुख वीरों को कटा हुआ देखने लगते हैं; सञ्जय और भीष्म के पुकारते रहने पर भी सूर्यास्त के समय सारी सेना शिविर की ओर भाग खड़ी होती है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.94.1)
स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा राजा दुर्योधनः स्वयम् । अभ्यधावत्सुसंक्रुद्धो भीमसेनमरिन्दमम् ॥
svasainyaṃ nihataṃ dṛṣṭvā rājā duryodhanaḥ svayam | abhyadhāvatsusaṃkruddho bhīmasenamarindamam
अपनी सेना को मारा गया देखकर राजा दुर्योधन स्वयं अत्यन्त क्रोध में भरकर शत्रुदमन भीमसेन की ओर दौड़ा।
श्लोक 2 (6.94.2)
प्रगृह्य सुमहच्चापमिन्द्राशनिसमस्वनम् । महता शरवर्षेण पाण्डवं समवाकिरत् ॥
pragṛhya sumahaccāpamindrāśanisamasvanam | mahatā śaravarṣeṇa pāṇḍavaṃ samavākirat
इन्द्र के वज्र के समान टंकार करने वाला विशाल धनुष उठाकर उसने बाणों की भारी वर्षा से पाण्डुपुत्र को ढक दिया।
श्लोक 3 (6.94.3)
अर्धचन्द्रं च संधाय सुतीक्ष्णं लोमवापिनम् । भीमसेनस्य चिच्छेद चापं क्रोधसमन्वितः ॥
ardhacandraṃ ca saṃdhāya sutīkṣṇaṃ lomavāpinam | bhīmasenasya ciccheda cāpaṃ krodhasamanvitaḥ
फिर क्रोध से भरकर उसने अत्यन्त तीक्ष्ण, पंखयुक्त अर्धचन्द्राकार बाण चढ़ाया और भीमसेन का धनुष काट डाला।
श्लोक 4 (6.94.4)
तदन्तरं च संप्रेक्ष्य त्वरमाणो महारथः । प्रसंदधे शितं बाणं गिरीणामपि दारणम् ॥
tadantaraṃ ca saṃprekṣya tvaramāṇo mahārathaḥ | prasaṃdadhe śitaṃ bāṇaṃ girīṇāmapi dāraṇam
उस अवसर को देखकर उस महारथी ने शीघ्रता से एक तीखा बाण चढ़ाया, जो पर्वतों को भी चीर सकता था,
श्लोक 5 (6.94.5)
तेनोरसि महाराज भीमसेनमताडयत् । स गाढविद्धो व्यथितः सृक्विणी परिसंलिहन् ॥
tenorasi mahārāja bhīmasenamatāḍayat | sa gāḍhaviddho vyathitaḥ sṛkviṇī parisaṃlihan
और हे महाराज, उससे भीमसेन की छाती पर प्रहार किया। गहरा घाव खाकर पीड़ा से व्याकुल, होंठों के कोने चाटते हुए
श्लोक 6 (6.94.6)
समाललम्बे तेजस्वी ध्वजं हेमपरिष्कृतम् । तथा विमनसं दृष्ट्वा भीमसेनं घटोत्कचः ॥
samālalambe tejasvī dhvajaṃ hemapariṣkṛtam | tathā vimanasaṃ dṛṣṭvā bhīmasenaṃ ghaṭotkacaḥ
तेजस्वी भीमसेन ने स्वर्ण-जटित ध्वज का सहारा ले लिया। भीमसेन को इस प्रकार उदास देखकर घटोत्कच
श्लोक 7 (6.94.7)
क्रोधेनाभिप्रजज्वाल दिधक्षन्निव पावकः । अभिमन्युमुखाश्चापि पाण्डवानां महारथाः ॥
krodhenābhiprajajvāla didhakṣanniva pāvakaḥ | abhimanyumukhāścāpi pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ
क्रोध से ऐसा भड़क उठा मानो सब कुछ भस्म कर देने को उद्यत अग्नि हो। और अभिमन्यु आदि पाण्डवों के महारथी भी
श्लोक 8 (6.94.8)
समभ्यधावन्क्रोशन्तो राजानं जातसंभ्रमाः । संप्रेक्ष्य तान्संपततः संक्रुद्धाञ्जातसंभ्रमान् ॥
samabhyadhāvankrośanto rājānaṃ jātasaṃbhramāḥ | saṃprekṣya tānsaṃpatataḥ saṃkruddhāñjātasaṃbhramān
घबराहट में चिल्लाते हुए राजा (दुर्योधन) पर टूट पड़े। उन्हें क्रोध और उत्तेजना में झपटते देखकर
श्लोक 9 (6.94.9)
भारद्वाजोऽब्रवीद्वाक्यं तावकानां महारथान् । क्षिप्रं गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षत ॥
bhāradvājo'bravīdvākyaṃ tāvakānāṃ mahārathān | kṣipraṃ gacchata bhadraṃ vo rājānaṃ parirakṣata
भरद्वाजपुत्र (द्रोण) ने आपके महारथियों से यह वचन कहा: 'शीघ्र जाओ, तुम्हारा कल्याण हो! राजा की रक्षा करो,
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (6.94.10)
संशयं परमं प्राप्तं मज्जन्तं व्यसनार्णवे । एते क्रुद्धा महेष्वासाः पाण्डवानां महारथाः ॥
saṃśayaṃ paramaṃ prāptaṃ majjantaṃ vyasanārṇave | ete kruddhā maheṣvāsāḥ pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ
जो घोर संकट में पड़कर विपत्ति के सागर में डूब रहे हैं। ये क्रुद्ध महाधनुर्धर, पाण्डवों के महारथी,
श्लोक 11 (6.94.11)
भीमसेनं पुरस्कृत्य दुर्योधनमुपाद्रवन् । नानाविधानि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥
bhīmasenaṃ puraskṛtya duryodhanamupādravan | nānāvidhāni śastrāṇi visṛjanto mahārathāḥ
भीमसेन को आगे करके दुर्योधन पर टूट पड़े हैं; ये महारथी नाना प्रकार के शस्त्र छोड़ रहे हैं,
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (6.94.12)
नदन्तो भैरवान्नादांस्त्रासयन्तश्च भूमिपान् । तदाऽऽचार्यवचः श्रुत्वा सौमदत्तिपुरोगमाः ॥
nadanto bhairavānnādāṃstrāsayantaśca bhūmipān | tadā''cāryavacaḥ śrutvā saumadattipurogamāḥ
और भयंकर गर्जना करते हुए राजाओं को आतंकित कर रहे हैं।' आचार्य के ये वचन सुनकर सोमदत्तपुत्र (भूरिश्रवा) के नेतृत्व में आपके योद्धा
श्लोक 13 (6.94.13)
तावकाः समवर्तन्त पाण्डवानामनीकिनीम् । कृपो भूरिश्रवाः शल्यो द्रोणपुत्रो विविंशतिः ॥
tāvakāḥ samavartanta pāṇḍavānāmanīkinīm | kṛpo bhūriśravāḥ śalyo droṇaputro viviṃśatiḥ
पाण्डवों की सेना की ओर बढ़े। कृपाचार्य, भूरिश्रवा, शल्य, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), विविंशति,
श्लोक 14 (6.94.14)
चित्रसेनो विकर्णश्च सैन्धवोऽथ बृहद्बलः । आवन्त्यौ च महेष्वासौ कौरवं पर्यवारयन् ॥
citraseno vikarṇaśca saindhavo'tha bṛhadbalaḥ | āvantyau ca maheṣvāsau kauravaṃ paryavārayan
चित्रसेन, विकर्ण, सिन्धुराज (जयद्रथ), बृहद्बल और अवन्ती के दोनों महाधनुर्धर (विन्द और अनुविन्द) कौरव (दुर्योधन) को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 15 (6.94.15)
ते विंशतिपदं गत्वा संप्रहारं प्रचक्रिरे । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च परस्परजिघांसवः ॥
te viṃśatipadaṃ gatvā saṃprahāraṃ pracakrire | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca parasparajighāṃsavaḥ
बीस पग आगे बढ़कर एक-दूसरे को मार डालने के इच्छुक पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र आपस में भिड़ गए।
श्लोक 16 (6.94.16)
एवमुक्त्वा महाबाहुर्महद्विष्फार्य कार्मुकम् । भारद्वाजस्ततो भीमं षड्विंशत्या समार्पयत् ॥
evamuktvā mahābāhurmahadviṣphārya kārmukam | bhāradvājastato bhīmaṃ ṣaḍviṃśatyā samārpayat
ऐसा कहकर महाबाहु भरद्वाजपुत्र (द्रोण) ने अपना विशाल धनुष तानकर भीम को छब्बीस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 17 (6.94.17)
भूयश्चैनं महाबाहुः शरैः शीघ्रमवाकिरत् । पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव वलाहकः ॥
bhūyaścainaṃ mahābāhuḥ śaraiḥ śīghramavākirat | parvataṃ vāridhārābhiḥ prāvṛṣīva valāhakaḥ
फिर उस महाबाहु ने शीघ्रता से उन्हें बाणों से ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत को जलधाराओं से ढक देता है।
श्लोक 18 (6.94.18)
तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीमसेनः शिलीमुखैः । त्वरमाणो महेष्वासः सव्ये पार्श्वे महाबलः ॥
taṃ pratyavidhyaddaśabhirbhīmasenaḥ śilīmukhaiḥ | tvaramāṇo maheṣvāsaḥ savye pārśve mahābalaḥ
महाबली महाधनुर्धर भीमसेन ने शीघ्रता से उनके बाएँ पार्श्व में दस बाण मारकर बदला लिया।
श्लोक 19 (6.94.19)
स गाढविद्धो व्यथितो वयोवृद्धश्च भारत । प्रनष्टसंज्ञः सहसा रथोपस्थ उपाविशत् ॥
sa gāḍhaviddho vyathito vayovṛddhaśca bhārata | pranaṣṭasaṃjñaḥ sahasā rathopastha upāviśat
गहरा घाव खाकर पीड़ित और वयोवृद्ध होने के कारण, हे भारत, वे सहसा अचेत होकर रथ की बैठक में गिर पड़े।
श्लोक 20 (6.94.20)
गुरुं प्रव्यथितं दृष्ट्वा राजा दुर्योधनः स्वयम् । द्रौणायनिश्च संक्रुद्धौ भीमसेनमभिद्रुतौ ॥
guruṃ pravyathitaṃ dṛṣṭvā rājā duryodhanaḥ svayam | drauṇāyaniśca saṃkruddhau bhīmasenamabhidrutau
गुरु को इस प्रकार पीड़ित देखकर राजा दुर्योधन स्वयं और द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), दोनों क्रुद्ध होकर भीमसेन पर टूट पड़े।
श्लोक 21 (6.94.21)
तावापतन्तौ संप्रेक्ष्य कालान्तकयमोपमौ । भीमसेनो महाबाहुर्गदामादाय सत्वरम् ॥
tāvāpatantau saṃprekṣya kālāntakayamopamau | bhīmaseno mahābāhurgadāmādāya satvaram
काल, अन्तक और यम के समान उन दोनों को आते देख महाबाहु भीमसेन ने शीघ्र ही गदा उठा ली,
श्लोक 22 (6.94.22)
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं तस्थौ गिरिरिवाचलः । समुद्यम्य गदां गुर्वीं यमदण्डोपमां रणे ॥
avaplutya rathāttūrṇaṃ tasthau giririvācalaḥ | samudyamya gadāṃ gurvīṃ yamadaṇḍopamāṃ raṇe
और तुरन्त रथ से कूदकर पर्वत की भाँति अचल खड़े हो गए, रण में यमदण्ड के समान अपनी भारी गदा उठाए हुए।
श्लोक 23 (6.94.23)
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् । कौरवो द्रोणपुत्रश्च सहितावभ्यधावताम् ॥
tamudyatagadaṃ dṛṣṭvā kailāsamiva śṛṅgiṇam | kauravo droṇaputraśca sahitāvabhyadhāvatām
उन्हें शिखरों वाले कैलास पर्वत के समान गदा उठाए देखकर कौरव (दुर्योधन) और द्रोणपुत्र एक साथ उन पर झपटे।
श्लोक 24 (6.94.24)
तावापतन्तौ सहितौ त्वरितौ बलिनां वरौ । अभ्यधावत वेगेन त्वरमाणो वृकोदरः ॥
tāvāpatantau sahitau tvaritau balināṃ varau | abhyadhāvata vegena tvaramāṇo vṛkodaraḥ
बलवानों में श्रेष्ठ उन दोनों को एक साथ तेज़ी से आते देख वृकोदर (भीम) भी वेग से उनकी ओर दौड़े।
श्लोक 25 (6.94.25)
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् । समभ्यधावंस्त्वरिताः कौरवाणां महारथाः ॥
tamāpatantaṃ saṃprekṣya saṃkruddhaṃ bhīmadarśanam | samabhyadhāvaṃstvaritāḥ kauravāṇāṃ mahārathāḥ
उन्हें भयानक रूप में क्रुद्ध होकर आते देख कौरवों के महारथी शीघ्रता से उनकी ओर दौड़े।
श्लोक 26 (6.94.26)
भारद्वाजमुखाः सर्वे भीमसेनजिघांसया । नानाविधानि शस्त्राणि भीमस्योरस्यपातयन् ॥
bhāradvājamukhāḥ sarve bhīmasenajighāṃsayā | nānāvidhāni śastrāṇi bhīmasyorasyapātayan
भरद्वाजपुत्र (द्रोण) को आगे करके वे सब भीमसेन को मार डालने की इच्छा से भीम की छाती पर नाना प्रकार के शस्त्र बरसाने लगे।
श्लोक 27 (6.94.27)
सहिताः पाण्डवं सर्वे पीडयन्तः समन्ततः । तं दृष्ट्वा संशयं प्राप्तं पीड्यमानं महारथम् ॥
sahitāḥ pāṇḍavaṃ sarve pīḍayantaḥ samantataḥ | taṃ dṛṣṭvā saṃśayaṃ prāptaṃ pīḍyamānaṃ mahāratham
सब मिलकर चारों ओर से पाण्डुपुत्र को पीड़ित करने लगे। उस महारथी को संकट में पड़ा और पीड़ित होते देखकर
श्लोक 28 (6.94.28)
अभिमन्युप्रभृतयः पाण्डवानां महारथाः । अभ्यधावन्परीप्सन्तः प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥
abhimanyuprabhṛtayaḥ pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ | abhyadhāvanparīpsantaḥ prāṇāṃstyaktvā sudustyajān
अभिमन्यु आदि पाण्डवों के महारथी उन्हें बचाने के लिए, जिन प्राणों को त्यागना अत्यन्त कठिन है उन्हें भी त्यागने को तैयार होकर, दौड़ पड़े।
श्लोक 29 (6.94.29)
अनूपाधिपतिः शूरो भीमस्य दयितः सखा । नीलो नीलाम्बुदप्रख्यः संक्रुद्धो द्रौणिमभ्ययात् ॥
anūpādhipatiḥ śūro bhīmasya dayitaḥ sakhā | nīlo nīlāmbudaprakhyaḥ saṃkruddho drauṇimabhyayāt
अनूप देश का शूरवीर राजा नील, जो भीम का प्रिय मित्र था और जलभरे मेघ के समान श्याम था, क्रोध में भरकर द्रोणपुत्र की ओर बढ़ा।
श्लोक 30 (6.94.30)
स्पर्धते हि महेष्वासो नित्यं द्रोणसुतेन सः । स विष्फार्य महच्चापं द्रौणिं विव्याध पत्रिणा ॥
spardhate hi maheṣvāso nityaṃ droṇasutena saḥ | sa viṣphārya mahaccāpaṃ drauṇiṃ vivyādha patriṇā
क्योंकि वह महाधनुर्धर द्रोणपुत्र से सदा होड़ करता था। उसने अपना विशाल धनुष तानकर एक पंखयुक्त बाण से अश्वत्थामा को बींध दिया,
श्लोक 31 (6.94.31)
यथा शक्रो महाराज पुरा विव्याध दानवम् । विप्रचित्तिं दुराधर्षं देवतानां भयंकरम् ॥
yathā śakro mahārāja purā vivyādha dānavam | vipracittiṃ durādharṣaṃ devatānāṃ bhayaṃkaram
जैसे हे महाराज, प्राचीन काल में इन्द्र ने देवताओं को भयभीत करने वाले दुर्जय दानव विप्रचित्ति को बींधा था,
श्लोक 32 (6.94.32)
येन लोकत्रयं क्रोधात्त्रासितं स्वेन तेजसा । स रुद्रेण जितः पूर्वं निहतो मातरिश्वना । तथा नीलेन निर्भिन्नः सम्यङ्मुक्तेन पत्रिणा ॥
yena lokatrayaṃ krodhāttrāsitaṃ svena tejasā | sa rudreṇa jitaḥ pūrvaṃ nihato mātariśvanā | tathā nīlena nirbhinnaḥ samyaṅmuktena patriṇā
जिसने क्रोध में अपने तेज से तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया था, और जिसे पूर्वकाल में रुद्र ने जीता तथा मातरिश्वा (वायु) ने मारा था। उसी प्रकार नील ने भली-भाँति छोड़े गए बाण से द्रोणपुत्र को बींध डाला।
श्लोक 33 (6.94.33)
संजातरुधिरोत्पीडो द्रौणिः क्रोधसमन्वितः । स विष्फार्य धनुश्चित्रमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥
saṃjātarudhirotpīḍo drauṇiḥ krodhasamanvitaḥ | sa viṣphārya dhanuścitramindrāśanisamasvanam
उसके शरीर से रक्त की धारा बह निकली, और क्रोध से भरे द्रोणपुत्र ने इन्द्र के वज्र के समान टंकार करने वाला अपना विचित्र धनुष ताना,
श्लोक 34 (6.94.34)
दध्रे नीलविनाशाय मतिं मतिमतां वरः । ततः संधाय विमलान्भल्लान्कर्मारमार्जितान् ॥
dadhre nīlavināśāya matiṃ matimatāṃ varaḥ | tataḥ saṃdhāya vimalānbhallānkarmāramārjitān
और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उस वीर ने नील के विनाश का निश्चय किया। फिर लोहार द्वारा चमकाए गए निर्मल भल्ल बाण चढ़ाकर
श्लोक 35 (6.94.35)
जघान चतुरो वाहान्पातयामास च ध्वजम् । सूतं चैकेन भल्लेन रथनीडादपाहरत् । सप्तमेन च भल्लेन नीलं विव्याध वक्षसि ॥
jaghāna caturo vāhānpātayāmāsa ca dhvajam | sūtaṃ caikena bhallena rathanīḍādapāharat | saptamena ca bhallena nīlaṃ vivyādha vakṣasi
उसने नील के चारों घोड़े मार डाले और ध्वज गिरा दिया; एक भल्ल से सारथि को रथ की बैठक से गिरा दिया, और सातवें भल्ल से नील की छाती बींध डाली।
श्लोक 36 (6.94.36)
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । मोहितं वीक्ष्य राजानं नीलमश्मचयोपमम् ॥
sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | mohitaṃ vīkṣya rājānaṃ nīlamaśmacayopamam
गहरा घाव खाकर पीड़ित नील रथ की बैठक में बैठ गया। पत्थरों के ढेर के समान विशाल राजा नील को मूर्च्छित देखकर
श्लोक 37 (6.94.37)
घटोत्कचोऽभिसंक्रुद्धो ज्ञातिभिः परिवारितः । अभिदुद्राव वेगेन द्रौणिमाहवशोभिनम् । तथेतरे चाभ्यधावन्राक्षसा युद्धदुर्मदाः ॥
ghaṭotkaco'bhisaṃkruddho jñātibhiḥ parivāritaḥ | abhidudrāva vegena drauṇimāhavaśobhinam | tathetare cābhyadhāvanrākṣasā yuddhadurmadāḥ
घटोत्कच अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने जाति-बन्धुओं से घिरा हुआ रणशोभी द्रोणपुत्र की ओर वेग से दौड़ा; और दूसरे रणोन्मत्त राक्षस भी झपट पड़े।
श्लोक 38 (6.94.38)
भीमसेनो महाबाहुर्नीलं नीलाञ्जनप्रभम् । आरोप्य स्वरथं वीरो दुर्योधनमपाद्रवत् ॥
bhīmaseno mahābāhurnīlaṃ nīlāñjanaprabham | āropya svarathaṃ vīro duryodhanamapādravat
महाबाहु वीर भीमसेन ने अञ्जन के समान श्याम नील को अपने रथ पर चढ़ाया और दुर्योधन पर धावा बोल दिया।
श्लोक 39 (6.94.39)
घटोत्कचं च संप्रेक्ष्य राक्षसं घोरदर्शनम् । अभ्यधावत तेजस्वी भारद्वाजात्मजस्त्वरन् ॥
ghaṭotkacaṃ ca saṃprekṣya rākṣasaṃ ghoradarśanam | abhyadhāvata tejasvī bhāradvājātmajastvaran
भयानक रूप वाले राक्षस घटोत्कच को देखकर तेजस्वी द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) शीघ्रता से उसकी ओर दौड़ा,
श्लोक 40 (6.94.40)
निजघान च संक्रुद्धो राक्षसान्भीमदर्शनान् । योऽभवन्नग्रतः क्रुद्धा राक्षसस्य पुरःसराः । विमुखांश्चैव तान्दृष्ट्वा द्रौणिचापच्युतैः शरैः ॥
nijaghāna ca saṃkruddho rākṣasānbhīmadarśanān | yo'bhavannagrataḥ kruddhā rākṣasasya puraḥsarāḥ | vimukhāṃścaiva tāndṛṣṭvā drauṇicāpacyutaiḥ śaraiḥ
और क्रोध में भरकर उसने उन भयंकर राक्षसों को मार डाला जो क्रुद्ध होकर उस राक्षस के आगे-आगे चल रहे थे। द्रोणपुत्र के धनुष से छूटे बाणों द्वारा उन्हें विमुख हुआ देखकर
श्लोक 41 (6.94.41)
अक्रुद्ध्यत महाकायो भैमसेनिर्घटोत्कचः । प्रादुश्चक्रे ततो मायां घोररूपां सुदारुणाम् ॥
akruddhyata mahākāyo bhaimasenirghaṭotkacaḥ | prāduścakre tato māyāṃ ghorarūpāṃ sudāruṇām
विशालकाय भीमसेनपुत्र घटोत्कच क्रोध से भर गया। तब उसने अत्यन्त दारुण, भयानक रूप वाली माया प्रकट की,
श्लोक 42 (6.94.42)
मोहयन्समरे द्रौणिं मायावी राक्षसाधिपः । ततस्ते तावकाः सर्वे मायया विमुखीकृताः ॥
mohayansamare drauṇiṃ māyāvī rākṣasādhipaḥ | tataste tāvakāḥ sarve māyayā vimukhīkṛtāḥ
और वह मायावी राक्षसराज रण में द्रोणपुत्र को मोहित करने लगा। तब उस माया से विमुख होकर आपके सभी योद्धा
श्लोक 43 (6.94.43)
अन्योन्यं समपश्यन्त निकृत्ता मेदिनीतले । विचेष्टमानाः कृपणाः शोणितेन परिप्लुताः ॥
anyonyaṃ samapaśyanta nikṛttā medinītale | viceṣṭamānāḥ kṛpaṇāḥ śoṇitena pariplutāḥ
एक-दूसरे को धरती पर कटा हुआ, दयनीय दशा में छटपटाता और रक्त से लथपथ देखने लगे।
श्लोक 44 (6.94.44)
द्रोणं दुर्योधनं शल्यमश्वत्थामानमेव च । प्रायशश्च महेष्वासा ये प्रधानाः स्म कौरवाः ॥
droṇaṃ duryodhanaṃ śalyamaśvatthāmānameva ca | prāyaśaśca maheṣvāsā ye pradhānāḥ sma kauravāḥ
उन्होंने द्रोण, दुर्योधन, शल्य और अश्वत्थामा को, तथा कौरवों के जो प्रमुख महाधनुर्धर थे उनमें से अधिकांश को भी वैसी ही दशा में देखा;
श्लोक 45 (6.94.45)
विध्वस्ता रथिनः सर्वे गजाश्च विनिपातिताः । हयाश्चैव हयारोहाः सन्निकृत्ताः सहस्रशः ॥
vidhvastā rathinaḥ sarve gajāśca vinipātitāḥ | hayāścaiva hayārohāḥ sannikṛttāḥ sahasraśaḥ
सारे रथी ध्वस्त हो गए थे, हाथी मार गिराए गए थे, और हज़ारों घोड़े तथा घुड़सवार कट गए थे।
श्लोक 46 (6.94.46)
तद्दृष्ट्वा तावकं सैन्यं विद्रुतं शिबिरं प्रति । मम प्राक्रोशतो राजंस्तथा देवव्रतस्य च ॥
taddṛṣṭvā tāvakaṃ sainyaṃ vidrutaṃ śibiraṃ prati | mama prākrośato rājaṃstathā devavratasya ca
यह देखकर आपकी सेना शिविर की ओर भाग चली, यद्यपि हे राजन्, मैं और देवव्रत (भीष्म) भी पुकारते रहे:
श्लोक 47 (6.94.47)
युध्यध्वं मा पलायध्वं मायैषा राक्षसी रणे । घटोत्कचप्रमुक्तेति नातिष्ठन्त विमोहिताः ॥
yudhyadhvaṃ mā palāyadhvaṃ māyaiṣā rākṣasī raṇe | ghaṭotkacapramukteti nātiṣṭhanta vimohitāḥ
'लड़ो, भागो मत! रण में यह घटोत्कच द्वारा रची गई राक्षसी माया है!' पर मोहित हुए वे टिके नहीं।
श्लोक 48 (6.94.48)
नैव ते श्रद्दधुर्भीता वदतोरावयोर्वचः । तांश्च प्रद्रवतो दृष्ट्वा जयं प्राप्ताश्च पाण्डवाः ॥
naiva te śraddadhurbhītā vadatorāvayorvacaḥ | tāṃśca pradravato dṛṣṭvā jayaṃ prāptāśca pāṇḍavāḥ
डरे हुए वे हम दोनों के कहे वचनों पर विश्वास नहीं कर सके। उन्हें भागते देख विजय पा चुके पाण्डव
श्लोक 49 (6.94.49)
घटोत्कचेन सहिताः सिंहनादान्प्रचक्रिरे । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः समन्तान्नेदिरे भृशम् ॥
ghaṭotkacena sahitāḥ siṃhanādānpracakrire | śaṅkhadundubhinirghoṣaiḥ samantānnedire bhṛśam
घटोत्कच के साथ मिलकर सिंहनाद करने लगे, और चारों ओर शंखों और दुन्दुभियों के घोष से ज़ोर का नाद होने लगा।
श्लोक 50 (6.94.50)
एवं तव बलं सर्वं हैडिम्बेन महात्मना । सूर्यास्तमनवेलायां प्रभग्नं विद्रुतं दिशः ॥
evaṃ tava balaṃ sarvaṃ haiḍimbena mahātmanā | sūryāstamanavelāyāṃ prabhagnaṃ vidrutaṃ diśaḥ
इस प्रकार सूर्यास्त की वेला में हिडिम्बापुत्र महात्मा (घटोत्कच) ने आपकी सारी सेना को तोड़ दिया और वह दिशाओं में भाग खड़ी हुई।