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भीष्म पर्व · अध्याय 93

घटोत्कच की रक्षा को भीम का आगमन

दुर्योधन की ओर बढ़ते घटोत्कच को कौरव महारथी घेरकर बाणों से ढक देते हैं; घायल होकर वह गरजता हुआ आकाश में उछल जाता है। उसकी गर्जना सुनकर युधिष्ठिर भीम को उसकी सहायता के लिए भेजते हैं, क्योंकि अर्जुन भीष्म से पाञ्चालों की रक्षा में लगे हैं; भीम अभिमन्यु, द्रौपदी-पुत्रों और अन्य पाण्डव योद्धाओं तथा छह हज़ार हाथियों के साथ चल पड़ते हैं। उनके आते ही कौरव घटोत्कच को छोड़कर लौट पड़ते हैं और घमासान युद्ध छिड़ जाता है: धूल इतनी घनी हो जाती है कि पिता पुत्र को नहीं पहचानता, रक्त की नदी बह निकलती है, हाथी हाथियों को दाँतों से बेधते हैं और मनुष्य छाती से छाती भिड़ाकर लड़ते हैं, और अन्त में धृतराष्ट्र-पुत्रों की विशाल सेना पीठ फेरकर भाग जाती है।

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.93.1)

विमुखीकृत्य सर्वांस्तु तावकान्युधि राक्षसः । जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनमुपाद्रवत् ॥

vimukhīkṛtya sarvāṃstu tāvakānyudhi rākṣasaḥ | jighāṃsurbharataśreṣṭha duryodhanamupādravat

हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध में आपके सब योद्धाओं को पीछे हटाकर वह राक्षस दुर्योधन को मारने की इच्छा से उसकी ओर दौड़ा।

श्लोक 2 (6.93.2)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य राजानं प्रति वेगितम् । अभ्यधावञ्जिघांसन्तस्तावका युद्धदुर्मदाः ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya rājānaṃ prati vegitam | abhyadhāvañjighāṃsantastāvakā yuddhadurmadāḥ

उसे राजा की ओर वेग से झपटते देखकर आपके रणोन्मत्त योद्धा उसे मार डालने की इच्छा से उस पर दौड़े।

श्लोक 3 (6.93.3)

तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः । तमेकमभ्यधावन्त नदन्तः सिंहसङ्घवत् ॥

tālamātrāṇi cāpāni vikarṣanto mahārathāḥ | tamekamabhyadhāvanta nadantaḥ siṃhasaṅghavat

ताड़ जितने ऊँचे धनुष खींचते हुए वे महारथी सिंहों के झुण्ड की भाँति गरजते हुए उस अकेले पर टूट पड़े।

श्लोक 4 (6.93.4)

अथैनं शरवर्षेण समन्तात्पर्यवाकिरन् । पर्वतं वारिधाराभिः शरदीव वलाहकाः ॥

athainaṃ śaravarṣeṇa samantātparyavākiran | parvataṃ vāridhārābhiḥ śaradīva valāhakāḥ

तब उन्होंने चारों ओर से उस पर बाणों की ऐसी वर्षा की जैसे शरद् ऋतु के मेघ जलधाराओं से पर्वत को ढक देते हैं।

श्लोक 5 (6.93.5)

स गाढविद्धो व्यथितस्तोत्रार्दित इव द्विपः । उत्पपात तदाऽऽकाशं समन्ताद्वैनतेयवत् ॥

sa gāḍhaviddho vyathitastotrārdita iva dvipaḥ | utpapāta tadā''kāśaṃ samantādvainateyavat

गहरे घावों से पीड़ित, अंकुश से आहत हाथी की भाँति वह विनतानन्दन (गरुड़) के समान चारों ओर मँडराता हुआ आकाश में ऊपर उड़ गया।

श्लोक 6 (6.93.6)

व्यनदत्सुमहानादं जीमूत इव शारदः । दिशः खं विदिशश्चैव नादयन्भैरवस्वनः ॥

vyanadatsumahānādaṃ jīmūta iva śāradaḥ | diśaḥ khaṃ vidiśaścaiva nādayanbhairavasvanaḥ

वह शरद् ऋतु के मेघ की भाँति भीषण गर्जना करने लगा और अपने भयंकर स्वर से दिशाओं, आकाश और विदिशाओं को गुँजाने लगा।

श्लोक 7 (6.93.7)

राक्षसस्य तु तं शब्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । उवाच भरतश्रेष्ठ भीमसेनमरिन्दमम् ॥

rākṣasasya tu taṃ śabdaṃ śrutvā rājā yudhiṣṭhiraḥ | uvāca bharataśreṣṭha bhīmasenamarindamam

हे भरतश्रेष्ठ, राक्षस का वह शब्द सुनकर राजा युधिष्ठिर ने शत्रुदमन भीमसेन से कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 8 (6.93.8)

युध्यते राक्षसो नूनं धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । यथाऽस्य श्रूयते शब्दो नदतो भैरवं स्वनम् ॥

yudhyate rākṣaso nūnaṃ dhārtarāṣṭrairmahārathaiḥ | yathā'sya śrūyate śabdo nadato bhairavaṃ svanam

"राक्षस निश्चय ही धृतराष्ट्र-पुत्रों के महारथियों से लड़ रहा है, क्योंकि उसकी भयंकर गर्जना का शब्द सुनाई दे रहा है।

श्लोक 9 (6.93.9)

अतिभारं च पश्यामि तस्मिन्राक्षसपुङ्गवे । पितामहश्च संक्रुद्धः पाञ्चालान्हन्तुमुद्यतः ॥

atibhāraṃ ca paśyāmi tasminrākṣasapuṅgave | pitāmahaśca saṃkruddhaḥ pāñcālānhantumudyataḥ

मैं देख रहा हूँ कि उस श्रेष्ठ राक्षस पर बहुत भारी बोझ आ पड़ा है। पितामह भी क्रुद्ध होकर पाञ्चालों को मारने पर तुले हैं,

श्लोक 10 (6.93.10)

तेषां च रक्षणार्थाय युध्यते फल्गुनः परैः । एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कार्यद्वयमुपस्थितम् ॥

teṣāṃ ca rakṣaṇārthāya yudhyate phalgunaḥ paraiḥ | etajjñātvā mahābāho kāryadvayamupasthitam

और उनकी रक्षा के लिए फाल्गुन (अर्जुन) शत्रुओं से लड़ रहा है। हे महाबाहु, यह जान लो कि दो काम सामने हैं;

सञ्जय उवाच

श्लोक 11 (6.93.11)

गच्छ रक्षस्व हैडिम्बं संशयं परमं गतम् । भ्रातुर्वचनमाज्ञाय त्वरमाणो वृकोदरः ॥

gaccha rakṣasva haiḍimbaṃ saṃśayaṃ paramaṃ gatam | bhrāturvacanamājñāya tvaramāṇo vṛkodaraḥ

जाओ, घोर संकट में पड़े हिडिम्बा के पुत्र की रक्षा करो।" भाई की बात मानकर वृकोदर (भीम) शीघ्रता से

श्लोक 12 (6.93.12)

प्रययौ सिंहनादेन त्रासयन्सर्वपार्थिवान् । वेगेन महता राजन्पर्वकाले यथोदधिः ॥

prayayau siṃhanādena trāsayansarvapārthivān | vegena mahatā rājanparvakāle yathodadhiḥ

सिंहनाद करता हुआ, सब राजाओं को भयभीत करता हुआ, हे राजन्, पर्व के दिन उमड़ते समुद्र की भाँति बड़े वेग से चल पड़ा।

श्लोक 13 (6.93.13)

तमन्वगात्सत्यधृतिः सौचित्तिर्युद्धदुर्मदः । श्रेणिमान्वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥

tamanvagātsatyadhṛtiḥ saucittiryuddhadurmadaḥ | śreṇimānvasudānaśca putraḥ kāśyasya cābhibhūḥ

उसके पीछे चले सत्यधृति, रणोन्मत्त सौचित्ति, श्रेणिमान्, वसुदान और काशिराज का पुत्र अभिभू;

श्लोक 14 (6.93.14)

अभिमन्युमुखाश्चैव द्रौपदेया महारथाः । क्षत्रदेवश्च विक्रान्तः क्षत्रधर्मा तथैव च ॥

abhimanyumukhāścaiva draupadeyā mahārathāḥ | kṣatradevaśca vikrāntaḥ kṣatradharmā tathaiva ca

अभिमन्यु के नेतृत्व में महारथी द्रौपदी-पुत्र; पराक्रमी क्षत्रदेव और क्षत्रधर्मा भी;

श्लोक 15 (6.93.15)

अनूपाधिपतिश्चैव नीलः स्वबलमास्थितः । महता रथवंशेन हैडिम्बं पर्यवारयन् ॥

anūpādhipatiścaiva nīlaḥ svabalamāsthitaḥ | mahatā rathavaṃśena haiḍimbaṃ paryavārayan

और अपनी सेना के साथ अनूप देश का राजा नील। उन्होंने रथों के विशाल समूह से हिडिम्बा के पुत्र को घेर लिया।

श्लोक 16 (6.93.16)

कुञ्जरैश्च सदा मत्तैः षट्सहस्रैः प्रहारिभिः । अभ्यरक्षन्त सहिता राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ॥

kuñjaraiśca sadā mattaiḥ ṣaṭsahasraiḥ prahāribhiḥ | abhyarakṣanta sahitā rākṣasendraṃ ghaṭotkacam

छह हज़ार सदा मदमत्त, प्रहार-कुशल हाथियों के साथ उन्होंने मिलकर राक्षसराज घटोत्कच की रक्षा की,

श्लोक 17 (6.93.17)

सिंहनादेन महता नेमिघोषेण चैव ह । खुरशब्दनिपातैश्च कम्पयन्तो वसुंधराम् ॥

siṃhanādena mahatā nemighoṣeṇa caiva ha | khuraśabdanipātaiśca kampayanto vasuṃdharām

भारी सिंहनाद, रथ-चक्रों की घरघराहट और खुरों की टाप से पृथ्वी को कँपाते हुए।

श्लोक 18 (6.93.18)

तेषामापततां श्रुत्वा शब्दं तं तावकं बलम् । भीमसेनभयोद्विग्नं विवर्णवदनं तथा ॥

teṣāmāpatatāṃ śrutvā śabdaṃ taṃ tāvakaṃ balam | bhīmasenabhayodvignaṃ vivarṇavadanaṃ tathā

उनके आक्रमण का वह शब्द सुनकर भीमसेन के भय से व्याकुल और फीके मुख वाली आपकी सेना

श्लोक 19 (6.93.19)

परिवृत्य महाराज परित्यज्य घटोत्कचम् । ततः प्रववृते युद्धं तत्र तेषां महात्मनाम् ॥

parivṛtya mahārāja parityajya ghaṭotkacam | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tatra teṣāṃ mahātmanām

हे महाराज, घटोत्कच को छोड़कर लौट पड़ी। तब वहाँ उन महात्मा योद्धाओं के बीच युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 20 (6.93.20)

तावकानां परेषां च संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् । नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥

tāvakānāṃ pareṣāṃ ca saṃgrāmeṣvanivartinām | nānārūpāṇi śastrāṇi visṛjanto mahārathāḥ

आपके और शत्रुओं के, जो संग्राम में कभी पीठ नहीं दिखाते थे। अनेक प्रकार के शस्त्र छोड़ते हुए वे महारथी

श्लोक 21 (6.93.21)

अन्योन्यमभिधावन्तः संप्रहारं प्रचक्रिरे । व्यतिषक्तं महारौद्रं युद्धं भीरुभयावहम् ॥

anyonyamabhidhāvantaḥ saṃprahāraṃ pracakrire | vyatiṣaktaṃ mahāraudraṃ yuddhaṃ bhīrubhayāvaham

एक-दूसरे पर दौड़कर प्रहार करने लगे। वह गुँथा हुआ, अत्यन्त भयंकर युद्ध कायरों को भयभीत करने वाला था।

श्लोक 22 (6.93.22)

हया हयैः समाजग्मुः पादाताश्च पदातिभिः । रथा रथैः समागच्छन्नागा नागैश्च संयुगे । अन्योन्यं समरे राजन्प्रार्थयानाः समभ्ययुः ॥

hayā hayaiḥ samājagmuḥ pādātāśca padātibhiḥ | rathā rathaiḥ samāgacchannāgā nāgaiśca saṃyuge | anyonyaṃ samare rājanprārthayānāḥ samabhyayuḥ

घोड़े घोड़ों से भिड़ गए और पैदल पैदलों से; युद्ध में रथ रथों से और हाथी हाथियों से जा टकराए; हे राजन्, रण में एक-दूसरे को खोजते हुए वे आपस में भिड़ गए।

श्लोक 23 (6.93.23)

सहसा चाभवत्तीव्रं सन्निपातान्महद्रजः । गजाश्वरथपत्तीनां पादनेमिसमुद्धतम् ॥

sahasā cābhavattīvraṃ sannipātānmahadrajaḥ | gajāśvarathapattīnāṃ pādanemisamuddhatam

उस भिड़न्त से हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों के पैरों और पहियों से उठी घनी, भारी धूल सहसा छा गई।

श्लोक 24 (6.93.24)

धूम्रारुणं रजस्तीव्रं रणभूमिं समावृणोत् । नैव स्वे न परे राजन्समजानन्परस्परम् ॥

dhūmrāruṇaṃ rajastīvraṃ raṇabhūmiṃ samāvṛṇot | naiva sve na pare rājansamajānanparasparam

धुएँ जैसी लाल-भूरी वह घनी धूल रणभूमि पर छा गई; हे राजन्, न अपने और न पराये, कोई एक-दूसरे को पहचान नहीं पाता था।

श्लोक 25 (6.93.25)

पिता पुत्रं न जानीते पुत्रो वा पितरं तथा । निर्मर्यादे तथाभूते वैशसे रोमहर्षणे ॥

pitā putraṃ na jānīte putro vā pitaraṃ tathā | nirmaryāde tathābhūte vaiśase romaharṣaṇe

उस मर्यादाहीन, रोंगटे खड़े कर देने वाले संहार में पिता पुत्र को नहीं पहचानता था, न पुत्र पिता को।

श्लोक 26 (6.93.26)

शस्त्राणां भरतश्रेष्ठ मनुष्याणां च गर्जताम् । सुमहानभवच्छब्दः प्रेतानामिव भारत ॥

śastrāṇāṃ bharataśreṣṭha manuṣyāṇāṃ ca garjatām | sumahānabhavacchabdaḥ pretānāmiva bhārata

हे भरतश्रेष्ठ, शस्त्रों का और गरजते मनुष्यों का ऐसा भीषण कोलाहल हुआ, हे भारत, मानो प्रेत चीख रहे हों।

श्लोक 27 (6.93.27)

गजवाजिमनुष्याणां शोणितान्त्रतरङ्गिणी । प्रावर्तत नदी तत्र केशशैवलशाद्वला ॥

gajavājimanuṣyāṇāṃ śoṇitāntrataraṅgiṇī | prāvartata nadī tatra keśaśaivalaśādvalā

वहाँ हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के रक्त और आँतों की लहरों वाली एक नदी बह चली, जिसमें केश ही सेवार और घास थे।

श्लोक 28 (6.93.28)

नराणां चैव कायेभ्यः शिरसां पततां रणे । शुश्रुवे सुमहाञ्छब्दः पततामश्मनामिव ॥

narāṇāṃ caiva kāyebhyaḥ śirasāṃ patatāṃ raṇe | śuśruve sumahāñchabdaḥ patatāmaśmanāmiva

रण में मनुष्यों के धड़ों से गिरते सिरों का ऐसा भारी शब्द सुनाई देता था मानो पत्थर गिर रहे हों।

श्लोक 29 (6.93.29)

विशिरस्कैर्मनुष्यैश्च छिन्नगात्रैश्च वारणैः । अश्वैः संभिन्नदेहैश्च संकीर्णाऽभूद्वसुंधरा ॥

viśiraskairmanuṣyaiśca chinnagātraiśca vāraṇaiḥ | aśvaiḥ saṃbhinnadehaiśca saṃkīrṇā'bhūdvasuṃdharā

धरती बिना सिर के मनुष्यों, कटे अंगों वाले हाथियों और क्षत-विक्षत शरीर वाले घोड़ों से पट गई।

श्लोक 30 (6.93.30)

नानाविधानि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिधावन्तः संप्रहारार्थमुद्यताः ॥

nānāvidhāni śastrāṇi visṛjanto mahārathāḥ | anyonyamabhidhāvantaḥ saṃprahārārthamudyatāḥ

अनेक प्रकार के शस्त्र छोड़ते हुए महारथी प्रहार करने को उद्यत होकर एक-दूसरे पर दौड़ पड़े।

श्लोक 31 (6.93.31)

हया हयान्समासाद्य प्रेषिता हयसादिभिः । समाहत्य रणेऽन्योन्यं निपेतुर्गतजीविताः ॥

hayā hayānsamāsādya preṣitā hayasādibhiḥ | samāhatya raṇe'nyonyaṃ nipeturgatajīvitāḥ

घुड़सवारों द्वारा हाँके गए घोड़े घोड़ों से भिड़कर, रण में आपस में टकराकर प्राणहीन होकर गिर पड़े।

श्लोक 32 (6.93.32)

नरा नरान्समासाद्य क्रोधरक्तेक्षणा भृशम् । उरांस्युरोभिरन्योन्यं समाश्लिष्य निजघ्निरे ॥

narā narānsamāsādya krodharaktekṣaṇā bhṛśam | urāṃsyurobhiranyonyaṃ samāśliṣya nijaghnire

क्रोध से लाल आँखों वाले मनुष्य मनुष्यों से भिड़कर, छाती से छाती सटाकर एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 33 (6.93.33)

प्रेषिताश्च महामात्रैर्वारणाः परवारणैः । अभ्यघ्नन्त विषाणाग्रैर्वारणानेव संयुगे ॥

preṣitāśca mahāmātrairvāraṇāḥ paravāraṇaiḥ | abhyaghnanta viṣāṇāgrairvāraṇāneva saṃyuge

महावतों द्वारा शत्रु के हाथियों की ओर हाँके गए हाथी युद्ध में अपने दाँतों की नोकों से उन हाथियों पर ही प्रहार करने लगे।

श्लोक 34 (6.93.34)

ते जातरुधिरोत्पीडाः पताकाभिरलङ्कृताः । संसक्ताः प्रत्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ॥

te jātarudhirotpīḍāḥ patākābhiralaṅkṛtāḥ | saṃsaktāḥ pratyadṛśyanta meghā iva savidyutaḥ

रक्त की धाराएँ बहाते, पताकाओं से सजे, आपस में गुँथे वे हाथी बिजली से युक्त मेघों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 35 (6.93.35)

केचिद्भिन्ना विषाणाग्रैर्भिन्नकुम्भाश्च तोमरैः । विनदन्तोऽभ्यधावन्त गर्जमाना घना इव ॥

kecidbhinnā viṣāṇāgrairbhinnakumbhāśca tomaraiḥ | vinadanto'bhyadhāvanta garjamānā ghanā iva

कुछ हाथी दाँतों से घायल और कुछ तोमरों से फटे गण्डस्थल वाले, मेघों की भाँति गरजते और चिंघाड़ते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे।

श्लोक 36 (6.93.36)

केचिद्धस्तैर्द्विधाच्छिन्नैश्छिन्नगात्रास्तथाऽपरे । निपेतुस्तुमुले तस्मिंश्छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥

keciddhastairdvidhācchinnaiśchinnagātrāstathā'pare | nipetustumule tasmiṃśchinnapakṣā ivādrayaḥ

कुछ की सूँड़ें दो टुकड़े हो गईं, कुछ के अंग कट गए, और वे उस घमासान में कटे पंखों वाले पर्वतों की भाँति गिर पड़े।

श्लोक 37 (6.93.37)

पार्श्वैस्तु दारितैरन्ये वारणैर्वरवारणाः । मुमुचुः शोणितं भूरि धातूनिव महीधराः ॥

pārśvaistu dāritairanye vāraṇairvaravāraṇāḥ | mumucuḥ śoṇitaṃ bhūri dhātūniva mahīdharāḥ

दूसरे श्रेष्ठ हाथी, जिनकी पसलियाँ हाथियों ने फाड़ दी थीं, बहुत-सा रक्त ऐसे बहाने लगे जैसे पर्वत गेरू आदि धातुएँ बहाते हैं।

श्लोक 38 (6.93.38)

नाराचनिहतास्त्वन्ये तथा विद्धाश्च तोमरैः । विनदन्तोऽभ्यधावन्त विशृङ्गा इव पर्वताः ॥

nārācanihatāstvanye tathā viddhāśca tomaraiḥ | vinadanto'bhyadhāvanta viśṛṅgā iva parvatāḥ

दूसरे, नाराचों की चोट खाकर और तोमरों से बिंधकर, शिखरहीन पर्वतों की भाँति चिंघाड़ते हुए दौड़ने लगे।

श्लोक 39 (6.93.39)

केचित्क्रोधसमाविष्टा मदान्धा निरवग्रहाः । रथान्हयान्पदातींश्च ममृदुः शतशो रणे ॥

kecitkrodhasamāviṣṭā madāndhā niravagrahāḥ | rathānhayānpadātīṃśca mamṛduḥ śataśo raṇe

कुछ हाथी क्रोध से भरे, मद से अन्धे और निरंकुश होकर रण में सैकड़ों रथों, घोड़ों और पैदलों को रौंदने लगे।

श्लोक 40 (6.93.40)

तथा हया हयारोहैस्ताडिताः प्रासतोमरैः । तेन तेनाभ्यवर्तन्त कुर्वन्तो व्याकुला दिशः ॥

tathā hayā hayārohaistāḍitāḥ prāsatomaraiḥ | tena tenābhyavartanta kurvanto vyākulā diśaḥ

इसी प्रकार घुड़सवारों के प्रासों और तोमरों से आहत घोड़े दिशाओं में खलबली मचाते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे।

श्लोक 41 (6.93.41)

रथिनो रथिभिः सार्धं कुलपुत्रास्तनुत्यजः । परां शक्तिं समास्थाय चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥

rathino rathibhiḥ sārdhaṃ kulaputrāstanutyajaḥ | parāṃ śaktiṃ samāsthāya cakruḥ karmāṇyabhītavat

प्राण न्योछावर करने को तत्पर कुलीन रथी रथियों से भिड़कर अपनी पूरी शक्ति लगाते हुए निर्भय-से पराक्रम करने लगे।

श्लोक 42 (6.93.42)

स्वयंवर इवामर्दे प्रजह्रुरितरेतरम् । प्रार्थयाना यशो राजन्स्वर्गं वा युद्धशालिनः ॥

svayaṃvara ivāmarde prajahruritaretaram | prārthayānā yaśo rājansvargaṃ vā yuddhaśālinaḥ

उस संघर्ष में, मानो स्वयंवर हो रहा हो, युद्धप्रिय वीर, हे राजन्, यश या स्वर्ग की कामना से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 43 (6.93.43)

तस्मिंस्तथा वर्तमाने संग्रामे रोमहर्षणे । धार्तराष्ट्रं महत्सैन्यं प्रययौ विमुखीकृतम् ॥

tasmiṃstathā vartamāne saṃgrāme romaharṣaṇe | dhārtarāṣṭraṃ mahatsainyaṃ prayayau vimukhīkṛtam

जब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध इस प्रकार चल रहा था, तब धृतराष्ट्र-पुत्रों की विशाल सेना पीठ फेरकर भाग चली।

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94