भीष्म पर्व · अध्याय 92
घटोत्कच का कौरव महारथियों से युद्ध
दुर्योधन घटोत्कच की बाण-वर्षा को सह लेता है और पच्चीस नाराचों से उसे घायल कर देता है। राक्षस उसे मारने के लिए पर्वतों को चीर देने वाली महाशक्ति उठाता है, पर वङ्गराज अपने हाथी को बीच में ले आता है और वह शक्ति हाथी के प्राण ले लेती है; कमज़ोर पड़ने पर भी दुर्योधन डटा रहता है और बाण चलाता है, और घटोत्कच उससे बचकर गरज उठता है। उसकी गर्जना सुनकर भीष्म द्रोण तथा अन्य महारथियों को राजा की रक्षा के लिए भेजते हैं। अविचल घटोत्कच उन सबसे भिड़ जाता है: वह द्रोण का धनुष और सोमदत्त की ध्वजा काट देता है, बाह्लीक, कृप, चित्रसेन, विकर्ण, भूरिश्रवा, बृहद्बल और शल्य को घायल करता है, विविंशति और अश्वत्थामा के सारथियों को गिरा देता है, जयद्रथ की ध्वजा और धनुष काट डालता है और अवन्तीराज के घोड़ों को मार देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.92.1)
ततस्तद्बाणवर्षं तु दुःसहं दानवैरपि । दधार युधि राजेन्द्रो यथा वर्षं महाद्विपः ॥
tatastadbāṇavarṣaṃ tu duḥsahaṃ dānavairapi | dadhāra yudhi rājendro yathā varṣaṃ mahādvipaḥ
तब राजराज (दुर्योधन) ने युद्ध में वह बाण-वर्षा, जिसे दानव भी कठिनाई से सह पाते, वैसे ही सह ली जैसे कोई बड़ा हाथी वर्षा की बौछार सहता है।
श्लोक 2 (6.92.2)
ततः क्रोधसमाविष्टो निःश्वसन्निव पन्नगः । संशयं परमं प्राप्तः पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥
tataḥ krodhasamāviṣṭo niḥśvasanniva pannagaḥ | saṃśayaṃ paramaṃ prāptaḥ putraste bharatarṣabha
तब हे भरतश्रेष्ठ, घोर संकट में पड़े आपके पुत्र ने क्रोध से भरकर साँप की भाँति फुफकारते हुए
श्लोक 3 (6.92.3)
मुमोच निशितांस्तीक्ष्णान्नाराचान्पञ्चविंशतिम् । तेऽपतन्सहसा राजंस्तस्मिन्राक्षसपुङ्गवे ॥
mumoca niśitāṃstīkṣṇānnārācānpañcaviṃśatim | te'patansahasā rājaṃstasminrākṣasapuṅgave
पच्चीस पैने, तीखे नाराच छोड़े। हे राजन्, वे सहसा उस श्रेष्ठ राक्षस पर जा गिरे,
श्लोक 4 (6.92.4)
आशीविषा इव क्रुद्धाः पर्वते गन्धमादने । स तैर्विद्धः स्रवन्रक्तं प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥
āśīviṣā iva kruddhāḥ parvate gandhamādane | sa tairviddhaḥ sravanraktaṃ prabhinna iva kuñjaraḥ
जैसे गन्धमादन पर्वत पर क्रुद्ध विषधर सर्प गिरते हैं। उनसे बिंधकर, मदमस्त हाथी की भाँति रक्त बहाते हुए
श्लोक 5 (6.92.5)
दध्रे मतिं विनाशाय राज्ञः स पिशिताशनः । जग्राह च महाशक्तिं गिरीणामपि दारिणीम् ॥
dadhre matiṃ vināśāya rājñaḥ sa piśitāśanaḥ | jagrāha ca mahāśaktiṃ girīṇāmapi dāriṇīm
उस मांसभक्षी ने राजा के विनाश का निश्चय किया और पर्वतों को भी चीर देने वाली एक महाशक्ति उठा ली,
श्लोक 6 (6.92.6)
संप्रदीप्तां महोल्काभामशनिं ज्वलितामिव । तमागच्छन्महाबाहुर्जिघांसुस्तनयं तव ॥
saṃpradīptāṃ maholkābhāmaśaniṃ jvalitāmiva | tamāgacchanmahābāhurjighāṃsustanayaṃ tava
जो धधकती हुई, बड़ी उल्का-सी चमकीली और जलते वज्र के समान थी; और वह महाबाहु आपके पुत्र को मारने की इच्छा से उसकी ओर बढ़ा।
श्लोक 7 (6.92.7)
तामुद्यतामभिप्रेक्ष्य वङ्गानामधिपस्त्वरन् । कुञ्जरं गिरिसंकाशं राक्षसं प्रत्यचोदयत् ॥
tāmudyatāmabhiprekṣya vaṅgānāmadhipastvaran | kuñjaraṃ girisaṃkāśaṃ rākṣasaṃ pratyacodayat
उस शक्ति को उठी हुई देखकर वङ्गराज ने तुरन्त अपने पर्वताकार हाथी को राक्षस की ओर बढ़ा दिया।
श्लोक 8 (6.92.8)
स नागप्रवरेणाजौ बलिना शीघ्रगामिना । यतो दुर्योधनरथस्तं मार्गं प्रत्यषेधयत् ॥
sa nāgapravareṇājau balinā śīghragāminā | yato duryodhanarathastaṃ mārgaṃ pratyaṣedhayat
उस बलवान्, तेज़ चलने वाले श्रेष्ठ हाथी से उसने युद्ध में वह मार्ग रोक दिया जिधर दुर्योधन का रथ था।
श्लोक 9 (6.92.9)
पन्थानं वारयामास कुञ्जरेण सुतस्य ते । मार्गमावारितं दृष्ट्वा राज्ञा वङ्गेन धीमता ॥
panthānaṃ vārayāmāsa kuñjareṇa sutasya te | mārgamāvāritaṃ dṛṣṭvā rājñā vaṅgena dhīmatā
उसने अपने हाथी से आपके पुत्र तक पहुँचने का रास्ता रोक दिया। बुद्धिमान् वङ्गराज द्वारा मार्ग रुका देखकर
श्लोक 10 (6.92.10)
घटोत्कचो महाराज क्रोधसंरक्तलोचनः । उद्यतां तां महाशक्तिं तस्मिंश्चिक्षेप वारणे ॥
ghaṭotkaco mahārāja krodhasaṃraktalocanaḥ | udyatāṃ tāṃ mahāśaktiṃ tasmiṃścikṣepa vāraṇe
हे महाराज, क्रोध से लाल आँखों वाले घटोत्कच ने वह उठी हुई महाशक्ति उस हाथी पर फेंक दी।
श्लोक 11 (6.92.11)
स तयाऽभिहतो राजंस्तेन बाहुप्रमुक्तया । संजातरुधिरोत्पीडः पपात च ममार च ॥
sa tayā'bhihato rājaṃstena bāhupramuktayā | saṃjātarudhirotpīḍaḥ papāta ca mamāra ca
हे राजन्, उसकी भुजा से छूटी उस शक्ति की चोट से हाथी के शरीर से रक्त की धारा फूट पड़ी; वह गिरा और मर गया।
श्लोक 12 (6.92.12)
पतत्यथ गजे चापि वङ्गानामीश्वरो बली । जवेन समभिद्रुत्य जगाम धरणीतलम् ॥
patatyatha gaje cāpi vaṅgānāmīśvaro balī | javena samabhidrutya jagāma dharaṇītalam
हाथी के गिरते ही बलवान् वङ्गराज फुर्ती से कूदकर धरती पर आ गया।
श्लोक 13 (6.92.13)
दुर्योधनोऽपि संप्रेक्ष्य पतितं वरवारणम् । प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा जगाम परमां व्यथाम् ॥
duryodhano'pi saṃprekṣya patitaṃ varavāraṇam | prabhagnaṃ ca balaṃ dṛṣṭvā jagāma paramāṃ vyathām
दुर्योधन भी उस श्रेष्ठ हाथी को गिरा हुआ और अपनी सेना को छिन्न-भिन्न देखकर बहुत व्यथित हुआ।
श्लोक 14 (6.92.14)
अशक्तः प्रतियोद्धुं वै दृष्ट्वा तस्य पराक्रमम् । क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य आत्मनश्चातिमानिताम् । प्राप्तेऽपक्रमणे राजा तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥
aśaktaḥ pratiyoddhuṃ vai dṛṣṭvā tasya parākramam | kṣatradharmaṃ puraskṛtya ātmanaścātimānitām | prāpte'pakramaṇe rājā tasthau giririvācalaḥ
राक्षस का पराक्रम देखकर वह उससे लड़ पाने में असमर्थ था, फिर भी क्षत्रिय-धर्म और अपने स्वाभिमान को आगे रखकर, पीछे हटने का अवसर आने पर भी राजा पर्वत की भाँति अचल खड़ा रहा।
श्लोक 15 (6.92.15)
संधाय च शितं बाणं कालाग्निसमतेजसम् । मुमोच परमक्रुद्धस्तस्मिन्घोरे निशाचरे ॥
saṃdhāya ca śitaṃ bāṇaṃ kālāgnisamatejasam | mumoca paramakruddhastasminghore niśācare
प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी एक पैना बाण चढ़ाकर उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस भयंकर निशाचर पर छोड़ा।
श्लोक 16 (6.92.16)
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य बाणमिन्द्राशनिप्रभम् । लाघवान्मोचयामास महात्मा वै घटोत्कचः ॥
tamāpatantaṃ saṃprekṣya bāṇamindrāśaniprabham | lāghavānmocayāmāsa mahātmā vai ghaṭotkacaḥ
इन्द्र के वज्र के समान चमकते उस बाण को आते देखकर महात्मा घटोत्कच फुर्ती से उससे बच निकला।
श्लोक 17 (6.92.17)
भूयश्च निननादोग्रं क्रोधसंरक्तलोचनः । त्रासयामास सैन्यानि युगान्ते जलदो यथा ॥
bhūyaśca ninanādograṃ krodhasaṃraktalocanaḥ | trāsayāmāsa sainyāni yugānte jalado yathā
फिर क्रोध से लाल आँखें किये वह भीषण गर्जना करने लगा और प्रलयकाल के मेघ की भाँति सेनाओं को भयभीत करने लगा।
श्लोक 18 (6.92.18)
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तस्य भीमस्य रक्षसः । आचार्यमुपसंगम्य भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥
taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ tasya bhīmasya rakṣasaḥ | ācāryamupasaṃgamya bhīṣmaḥ śāntanavo'bravīt
उस भयानक राक्षस की वह घोर गर्जना सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्म आचार्य (द्रोण) के पास जाकर बोले:
भीष्म उवाच
श्लोक 19 (6.92.19)
यथैव निनदो घोरः श्रूयते राक्षसेरितः । हैडिम्बो युध्यते नूनं राज्ञा दुर्योधनेन च ॥
yathaiva ninado ghoraḥ śrūyate rākṣaseritaḥ | haiḍimbo yudhyate nūnaṃ rājñā duryodhanena ca
"राक्षस की जैसी घोर गर्जना सुनाई दे रही है, उससे निश्चय है कि हिडिम्बा का पुत्र राजा दुर्योधन से लड़ रहा है।
श्लोक 20 (6.92.20)
नैष शक्यो हि संग्रामे जेतुं भूतेन केनचित् । तत्र गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षितुम् ॥
naiṣa śakyo hi saṃgrāme jetuṃ bhūtena kenacit | tatra gacchata bhadraṃ vo rājānaṃ parirakṣitum
युद्ध में कोई भी प्राणी उसे नहीं जीत सकता। तुम्हारा कल्याण हो, राजा की रक्षा के लिए वहाँ जाओ।
श्लोक 21 (6.92.21)
अभिद्रुत्य महाबाहुं राक्षसेन प्रपीडितम् । एतद्धि परमं कृत्यं सर्वेषां नः परंतपाः ॥
abhidrutya mahābāhuṃ rākṣasena prapīḍitam | etaddhi paramaṃ kṛtyaṃ sarveṣāṃ naḥ paraṃtapāḥ
राक्षस से पीड़ित उस महाबाहु राजा के पास दौड़ो; हे परन्तपो, हम सबका यही सबसे बड़ा कर्तव्य है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 22 (6.92.22)
पितामहवचः श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः । उत्तमं जवमास्थाय प्रययुर्यत्र कौरवः ॥
pitāmahavacaḥ śrutvā tvaramāṇā mahārathāḥ | uttamaṃ javamāsthāya prayayuryatra kauravaḥ
पितामह के वचन सुनकर वे महारथी शीघ्रता करते हुए पूरे वेग से वहाँ चल पड़े जहाँ कौरवराज था:
श्लोक 23 (6.92.23)
द्रोणश्च सोमदत्तश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । कृपो भूरिश्रवाः शल्य आवन्त्यः स बृहद्बलः ॥
droṇaśca somadattaśca bāhlīko'tha jayadrathaḥ | kṛpo bhūriśravāḥ śalya āvantyaḥ sa bṛhadbalaḥ
द्रोण और सोमदत्त, बाह्लीक और जयद्रथ, कृप, भूरिश्रवा, शल्य, अवन्तीराज और बृहद्बल,
श्लोक 24 (6.92.24)
अश्वत्थामा विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः । रथाश्चानेकसाहस्रा ये तेषामनुयायिनः ॥
aśvatthāmā vikarṇaśca citraseno viviṃśatiḥ | rathāścānekasāhasrā ye teṣāmanuyāyinaḥ
अश्वत्थामा और विकर्ण, चित्रसेन और विविंशति, तथा उनके पीछे चलने वाले कई सहस्र रथ,
श्लोक 25 (6.92.25)
अभिद्रुतं परीप्सन्तः पुत्रं दुर्योधनं तव । तदनीकमनाधृष्यं पालितं तु महारथैः ॥
abhidrutaṃ parīpsantaḥ putraṃ duryodhanaṃ tava | tadanīkamanādhṛṣyaṃ pālitaṃ tu mahārathaiḥ
जो सब आक्रान्त आपके पुत्र दुर्योधन को बचाना चाहते थे। महारथियों से रक्षित उस अजेय सेना को
श्लोक 26 (6.92.26)
आततायिनमायान्तं प्रेक्ष्य राक्षससत्तमः । नाकम्पत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः ॥
ātatāyinamāyāntaṃ prekṣya rākṣasasattamaḥ | nākampata mahābāhurmaināka iva parvataḥ
शस्त्र उठाए आक्रमण करते आते देखकर भी वह महाबाहु श्रेष्ठ राक्षस मैनाक पर्वत की भाँति तनिक भी नहीं काँपा।
श्लोक 27 (6.92.27)
प्रगृह्य विपुलं चापं ज्ञातिभिः परिवारितः । शूलमुद्गरहस्तैश्च नानाप्रहरणैरपि ॥
pragṛhya vipulaṃ cāpaṃ jñātibhiḥ parivāritaḥ | śūlamudgarahastaiśca nānāpraharaṇairapi
वह अपना विशाल धनुष थामे अपने बन्धु-बान्धवों से घिरा खड़ा था, जिनके हाथों में शूल, मुद्गर और अनेक प्रकार के आयुध थे।
श्लोक 28 (6.92.28)
ततः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । राक्षसानां च मुख्यस्य दुर्योधनबलस्य च ॥
tataḥ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | rākṣasānāṃ ca mukhyasya duryodhanabalasya ca
तब राक्षसों के उस प्रमुख और दुर्योधन की सेना के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला घमासान युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 29 (6.92.29)
धनुषां कूजतां शब्दः सर्वतस्तुमुलो रणे । अश्रूयत महाराज वंशानां दह्यतामिव ॥
dhanuṣāṃ kūjatāṃ śabdaḥ sarvatastumulo raṇe | aśrūyata mahārāja vaṃśānāṃ dahyatāmiva
हे महाराज, रणभूमि में चारों ओर टंकारते धनुषों का ऐसा घोर शब्द सुनाई देता था मानो बाँस जल रहे हों।
श्लोक 30 (6.92.30)
शस्त्राणां पात्यमानानां कवचेषु शरीरिणाम् । शब्दः समभवद्राजन्गिरीणामिव भिद्यताम् ॥
śastrāṇāṃ pātyamānānāṃ kavaceṣu śarīriṇām | śabdaḥ samabhavadrājangirīṇāmiva bhidyatām
हे राजन्, योद्धाओं के कवचों पर गिरते शस्त्रों का शब्द ऐसा था मानो पर्वत फट रहे हों।
श्लोक 31 (6.92.31)
वीरबाहुविसृष्टानां तोमराणां विशांपते । रूपमासीद्वियत्स्थानां सर्पाणामिव सर्पताम् ॥
vīrabāhuvisṛṣṭānāṃ tomarāṇāṃ viśāṃpate | rūpamāsīdviyatsthānāṃ sarpāṇāmiva sarpatām
हे प्रजानाथ, वीरों की भुजाओं से फेंके गए तोमर आकाश में ऐसे दिखते थे मानो सर्प सरक रहे हों।
श्लोक 32 (6.92.32)
ततः परमसंक्रुद्धो विष्फार्य सुमहद्धनुः । राक्षसेन्द्रो महाबाहुर्विनदन्भैरवं रवम् ॥
tataḥ paramasaṃkruddho viṣphārya sumahaddhanuḥ | rākṣasendro mahābāhurvinadanbhairavaṃ ravam
तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस महाबाहु राक्षसराज ने अपना विशाल धनुष ताना और भयंकर गर्जना करते हुए
श्लोक 33 (6.92.33)
आचार्यस्यार्धचन्द्रेण क्रुद्धश्चिच्छेद कार्मुकम् । सोमदत्तस्य भल्लेन ध्वजं चोन्मथ्य चानदत् ॥
ācāryasyārdhacandreṇa kruddhaściccheda kārmukam | somadattasya bhallena dhvajaṃ conmathya cānadat
क्रोध में अर्धचन्द्र बाण से आचार्य का धनुष काट डाला, भल्ल से सोमदत्त की ध्वजा गिरा दी और गरज उठा।
श्लोक 34 (6.92.34)
बाह्लीकं च त्रिभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । कृपमेकेन विव्याध चित्रसेनं त्रिभिः शरैः ॥
bāhlīkaṃ ca tribhirbāṇaiḥ pratyavidhyatstanāntare | kṛpamekena vivyādha citrasenaṃ tribhiḥ śaraiḥ
उसने तीन बाणों से बाह्लीक की छाती बेध दी, एक बाण से कृप को घायल किया और तीन बाणों से चित्रसेन को।
श्लोक 35 (6.92.35)
पूर्णायतविसृष्टेन सम्यक्प्रणिहितेन च । जत्रुदेशे समासाद्य विकर्णं समताडयत् ॥
pūrṇāyatavisṛṣṭena samyakpraṇihitena ca | jatrudeśe samāsādya vikarṇaṃ samatāḍayat
कान तक खींचकर, ठीक निशाना साधकर छोड़े गए बाण से उसने विकर्ण की हँसली पर प्रहार किया;
श्लोक 36 (6.92.36)
न्यषीदत्स्वरथोपस्थे शोणितेन परिप्लुतः । ततः पुनरमेयात्मा नाराचान्दश पञ्च च ॥
nyaṣīdatsvarathopasthe śoṇitena pariplutaḥ | tataḥ punarameyātmā nārācāndaśa pañca ca
वह रक्त से लथपथ होकर अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया। फिर उस अपार साहसी ने क्रुद्ध होकर पन्द्रह नाराच
श्लोक 37 (6.92.37)
भूरिश्रवसि संक्रुद्धः प्राहिणोद्भरतर्षभ । ते वर्म भित्त्वा तस्याशु विविशुर्धरणीतलम् ॥
bhūriśravasi saṃkruddhaḥ prāhiṇodbharatarṣabha | te varma bhittvā tasyāśu viviśurdharaṇītalam
हे भरतश्रेष्ठ, भूरिश्रवा पर छोड़े; वे शीघ्र ही उसका कवच भेदकर धरती में समा गए।
श्लोक 38 (6.92.38)
विविंशतेश्च द्रौणेश्च यन्तारौ समताडयत् । तौ पेततू रथोपस्थे रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् ॥
viviṃśateśca drauṇeśca yantārau samatāḍayat | tau petatū rathopasthe raśmīnutsṛjya vājinām
उसने विविंशति और द्रोणपुत्र के सारथियों पर प्रहार किया; वे घोड़ों की लगाम छोड़कर रथों में गिर पड़े।
श्लोक 39 (6.92.39)
सिन्धुराज्ञोऽर्धचन्द्रेण वाराहं स्वर्णभूषितम् । उन्ममाथ महाराज द्वितीयेनाच्छिनद्धनुः ॥
sindhurājño'rdhacandreṇa vārāhaṃ svarṇabhūṣitam | unmamātha mahārāja dvitīyenācchinaddhanuḥ
हे महाराज, उसने एक अर्धचन्द्र बाण से सिन्धुराज की स्वर्ण-भूषित वराह-चिह्न वाली ध्वजा गिरा दी और दूसरे से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 40 (6.92.40)
चतुर्भिरथ नाराचैरावन्त्यस्य महात्मनः । जघान चतुरो वाहान्क्रोधसंरक्तलोचनः ॥
caturbhiratha nārācairāvantyasya mahātmanaḥ | jaghāna caturo vāhānkrodhasaṃraktalocanaḥ
क्रोध से लाल आँखें किये उसने चार नाराचों से महात्मा अवन्तीराज के चारों घोड़े मार डाले।
श्लोक 41 (6.92.41)
पूर्णायतविसृष्टेन पीतेन निशितेन च । निर्बिभेद महाराज राजपुत्रं बृहद्बलम् ॥
pūrṇāyatavisṛṣṭena pītena niśitena ca | nirbibheda mahārāja rājaputraṃ bṛhadbalam
हे महाराज, कान तक खींचकर छोड़े गए एक पैने, पानीदार बाण से उसने राजकुमार बृहद्बल को बेध दिया;
श्लोक 42 (6.92.42)
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । भृशं क्रोधेन चाविष्टो रथस्थो राक्षसाधिपः ॥
sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | bhṛśaṃ krodhena cāviṣṭo rathastho rākṣasādhipaḥ
गहरा घाव खाकर पीड़ित वह रथ के भीतर बैठ गया। तब अत्यन्त क्रोध से भरे, रथ पर खड़े राक्षसराज ने
श्लोक 43 (6.92.43)
चिक्षेप निशितांस्तीक्ष्णाञ्छरानाशीविषोपमान् । बिभिदुस्ते महाराज शल्यं युद्धविशारदम् ॥
cikṣepa niśitāṃstīkṣṇāñcharānāśīviṣopamān | bibhiduste mahārāja śalyaṃ yuddhaviśāradam
विषधर सर्पों जैसे पैने, तीखे बाण छोड़े; हे महाराज, उन्होंने युद्धकुशल शल्य को बेध डाला।