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भीष्म पर्व · अध्याय 91

घटोत्कच का दुर्योधन पर आक्रमण

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि इरावान् के मारे जाने पर पाण्डवों ने क्या किया। सञ्जय बताते हैं कि घटोत्कच की गर्जना से पृथ्वी काँप उठी और कौरव-सेना भयभीत हो गई; दुर्योधन उसका सामना करने निकला, उसके पीछे वङ्गराज दस हज़ार हाथियों के साथ चला, और राक्षसों ने हाथियों की सेना को काट डाला। दुर्योधन ने पलटकर चार प्रमुख राक्षसों को मार गिराया; तब घटोत्कच उस पर झपटा, छल के जुए, सभा में द्रौपदी के अपमान और जयद्रथ द्वारा उसे पकड़े जाने की याद दिलाकर उसने उसी दिन अपने पिताओं का ऋण चुकाने की प्रतिज्ञा की और दुर्योधन को बाणों की भारी वर्षा से ढक दिया।

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धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.91.1)

इरावन्तं तु निहतं दृष्ट्वा पार्था महारथाः । संग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

irāvantaṃ tu nihataṃ dṛṣṭvā pārthā mahārathāḥ | saṃgrāme kimakurvanta tanmamācakṣva sañjaya

जब महारथी पार्थों ने इरावान् को मारा गया देखा, तब उन्होंने युद्ध में क्या किया? सञ्जय, यह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (6.91.2)

इरावन्तं तु निहतं संग्रामे वीक्ष्य राक्षसः । व्यनदत्सुमहानादं भैमसेनिर्घटोत्कचः ॥

irāvantaṃ tu nihataṃ saṃgrāme vīkṣya rākṣasaḥ | vyanadatsumahānādaṃ bhaimasenirghaṭotkacaḥ

युद्ध में इरावान् को मारा गया देखकर भीमसेन का पुत्र राक्षस घटोत्कच बड़े ज़ोर से गरज उठा।

श्लोक 3 (6.91.3)

नदतस्तस्य शब्देन पृथिवी सागराम्बरा । सपर्वतवना राजंश्चचाल सुभृशं तदा ॥

nadatastasya śabdena pṛthivī sāgarāmbarā | saparvatavanā rājaṃścacāla subhṛśaṃ tadā

हे राजन्, उसके गर्जन के शब्द से समुद्रों से घिरी पृथ्वी अपने पर्वतों और वनों सहित बुरी तरह काँप उठी।

श्लोक 4 (6.91.4)

अन्तरिक्षं दिशश्चैव सर्वाश्च प्रदिशस्तथा । चेलुश्च सहसा तत्र तेन नादेन नादिताः ॥

antarikṣaṃ diśaścaiva sarvāśca pradiśastathā | celuśca sahasā tatra tena nādena nāditāḥ

आकाश, दिशाएँ और सारी उपदिशाएँ भी उस नाद से गूँजकर सहसा काँप उठीं।

श्लोक 5 (6.91.5)

तं श्रुत्वा सुमहानादं तव सैन्यस्य भारत । ऊरुस्तम्भः समभवद्वेपथुः स्वेद एव च ॥

taṃ śrutvā sumahānādaṃ tava sainyasya bhārata | ūrustambhaḥ samabhavadvepathuḥ sveda eva ca

हे भारत, उस भीषण नाद को सुनकर आपकी सेना की जाँघें जकड़ गईं, शरीर काँपने लगे और पसीना छूट गया।

श्लोक 6 (6.91.6)

सर्व एव महाराज तावका दीनचेतसः । सर्वतः समचेष्टन्त सिंहभीता गजा इव ॥

sarva eva mahārāja tāvakā dīnacetasaḥ | sarvataḥ samaceṣṭanta siṃhabhītā gajā iva

हे महाराज, आपके सभी सैनिक दीन-मन हो गए; वे सिंह से डरे हाथियों की भाँति चारों ओर छटपटाने लगे।

श्लोक 7 (6.91.7)

नर्दित्वा सुमहानादं निर्घातमिव राक्षसः । ज्वलितं शूलमुद्यम्य रूपं कृत्वा विभीषणम् ॥

narditvā sumahānādaṃ nirghātamiva rākṣasaḥ | jvalitaṃ śūlamudyamya rūpaṃ kṛtvā vibhīṣaṇam

वज्रपात के समान भीषण नाद करके उस राक्षस ने अपना प्रज्वलित शूल उठाया और भयंकर रूप धारण कर लिया।

श्लोक 8 (6.91.8)

नानारूपप्रहरणैर्वृतो राक्षसपुङ्गवैः । आजघान सुसंक्रुद्धः कालान्तकयमोपमः ॥

nānārūpapraharaṇairvṛto rākṣasapuṅgavaiḥ | ājaghāna susaṃkruddhaḥ kālāntakayamopamaḥ

अनेक प्रकार के आयुध लिये श्रेष्ठ राक्षसों से घिरा वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर प्रलयकाल के संहारक यम के समान प्रहार करने लगा।

श्लोक 9 (6.91.9)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् । स्वबलं च भयात्तस्य प्रायशो विमुखीकृतम् ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya saṃkruddhaṃ bhīmadarśanam | svabalaṃ ca bhayāttasya prāyaśo vimukhīkṛtam

उस क्रुद्ध और भयानक रूप वाले राक्षस को आते देखकर, और अपनी सेना को उसके भय से अधिकतर पीठ फेरते देखकर,

श्लोक 10 (6.91.10)

ततो दुर्योधनो राजा घटोत्कचमुपाद्रवत् । प्रगृह्य विपुलं चापं सिंहवद्विनदन्मुहुः ॥

tato duryodhano rājā ghaṭotkacamupādravat | pragṛhya vipulaṃ cāpaṃ siṃhavadvinadanmuhuḥ

राजा दुर्योधन अपना विशाल धनुष लेकर बार-बार सिंह की भाँति गरजता हुआ घटोत्कच की ओर दौड़ा।

श्लोक 11 (6.91.11)

पृष्ठतोऽनुययौ चैनं स्रवद्भिः पर्वतोपमैः । कुञ्जरैर्दशसाहस्रैर्वङ्गानामधिपः स्वयम् ॥

pṛṣṭhato'nuyayau cainaṃ sravadbhiḥ parvatopamaiḥ | kuñjarairdaśasāhasrairvaṅgānāmadhipaḥ svayam

उसके पीछे स्वयं वङ्गदेश का राजा दस हज़ार पर्वताकार हाथियों के साथ चला, जिनसे मद बह रहा था।

श्लोक 12 (6.91.12)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य गजानीकेन संवृतम् । पुत्रं तव महाराज चुकोप स निशाचरः । ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya gajānīkena saṃvṛtam | putraṃ tava mahārāja cukopa sa niśācaraḥ | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam

हे महाराज, आपके पुत्र को हाथियों की सेना से घिरा हुआ आते देखकर वह निशाचर कुपित हो उठा। तब रोंगटे खड़े कर देने वाला घमासान युद्ध छिड़ गया

श्लोक 13 (6.91.13)

राक्षसानां च राजेन्द्र दुर्योधनबलस्य च । गजानीकं च संप्रेक्ष्य मेघबृन्दमिवोदितम् ॥

rākṣasānāṃ ca rājendra duryodhanabalasya ca | gajānīkaṃ ca saṃprekṣya meghabṛndamivoditam

हे राजेन्द्र, राक्षसों और दुर्योधन की सेना के बीच। मेघों के समूह की भाँति उमड़ती हाथियों की सेना को देखकर

श्लोक 14 (6.91.14)

अभ्यधावन्त संक्रुद्धा राक्षसाः शस्त्रपाणयः । नदन्तो विविधान्नादान्मेघा इव सविद्युतः ॥

abhyadhāvanta saṃkruddhā rākṣasāḥ śastrapāṇayaḥ | nadanto vividhānnādānmeghā iva savidyutaḥ

हाथों में शस्त्र लिये राक्षस क्रोध से भरकर उस पर टूट पड़े; वे बिजली से भरे मेघों की भाँति तरह-तरह के नाद कर रहे थे,

श्लोक 15 (6.91.15)

शरशक्त्यृष्टिनाराचैर्निघ्नन्तो गजयोधिनः । भिण्डिपालैस्तथा शूलैर्मुद्गरैः सपरश्वथैः ॥

śaraśaktyṛṣṭinārācairnighnanto gajayodhinaḥ | bhiṇḍipālaistathā śūlairmudgaraiḥ saparaśvathaiḥ

बाणों, शक्तियों, ऋष्टियों और नाराचों से हाथी-सवारों को मारते हुए; और भिन्दिपालों, शूलों, मुद्गरों और फरसों से,

श्लोक 16 (6.91.16)

पर्वताग्रैश्च वृक्षैश्च निजघ्नुस्ते महागजान् । भिन्नकुम्भान्विरुधिरान्भिन्नगात्रांश्च वारणान् ॥

parvatāgraiśca vṛkṣaiśca nijaghnuste mahāgajān | bhinnakumbhānvirudhirānbhinnagātrāṃśca vāraṇān

तथा पर्वत-शिखरों और वृक्षों से उन्होंने बड़े-बड़े हाथियों को मार गिराया। फटे गण्डस्थलों वाले, रक्त से लथपथ, क्षत-विक्षत शरीर वाले हाथियों को

श्लोक 17 (6.91.17)

अपश्याम महाराज वध्यमानान्निशाचरैः । तेषु प्रक्षीयमाणेषु भग्नेषु गजयोधिषु ॥

apaśyāma mahārāja vadhyamānānniśācaraiḥ | teṣu prakṣīyamāṇeṣu bhagneṣu gajayodhiṣu

हे महाराज, हमने निशाचरों के हाथों मारे जाते देखा। जब हाथी-सवार नष्ट और छिन्न-भिन्न होने लगे,

श्लोक 18 (6.91.18)

दुर्योधनो महाराज राक्षसान्समुपाद्रवत् । अमर्षवशमापन्नस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥

duryodhano mahārāja rākṣasānsamupādravat | amarṣavaśamāpannastyaktvā jīvitamātmanaḥ

तब हे महाराज, क्रोध के वश में होकर और अपने प्राणों का मोह छोड़कर दुर्योधन राक्षसों पर टूट पड़ा।

श्लोक 19 (6.91.19)

मुमोच निशितान्बाणान्राक्षसेषु परंतप । जघान च महेष्वासः प्रधानांस्तत्र राक्षसान् ॥

mumoca niśitānbāṇānrākṣaseṣu paraṃtapa | jaghāna ca maheṣvāsaḥ pradhānāṃstatra rākṣasān

हे परन्तप, उसने राक्षसों पर पैने बाण छोड़े और उस महान् धनुर्धर ने वहाँ प्रमुख राक्षसों को मार डाला।

श्लोक 20 (6.91.20)

संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव । वेगवन्तं महारौद्रं विद्युज्जिह्वं प्रमाथिनम् ॥

saṃkruddho bharataśreṣṭha putro duryodhanastava | vegavantaṃ mahāraudraṃ vidyujjihvaṃ pramāthinam

हे भरतश्रेष्ठ, आपके पुत्र दुर्योधन ने क्रुद्ध होकर वेगवान्, महारौद्र, विद्युज्जिह्व और प्रमाथी,

श्लोक 21 (6.91.21)

शरैश्चतुर्भिश्चतुरो निजघान महाबलः । ततः पुनरमेयात्मा शरवर्षं दुरासदम् ॥

śaraiścaturbhiścaturo nijaghāna mahābalaḥ | tataḥ punarameyātmā śaravarṣaṃ durāsadam

इन चारों को उस महाबली ने चार बाणों से मार डाला। फिर उस अपार साहस वाले ने बाणों की दुर्जय वर्षा

श्लोक 22 (6.91.22)

मुमोच भरतश्रेष्ठो निशाचरबलं प्रति । तत्तु दृष्ट्वा महत्कर्म पुत्रस्य तव मारिष ॥

mumoca bharataśreṣṭho niśācarabalaṃ prati | tattu dṛṣṭvā mahatkarma putrasya tava māriṣa

निशाचरों की सेना पर की, उस भरतश्रेष्ठ ने। हे आर्य, आपके पुत्र का वह महान् पराक्रम देखकर

श्लोक 23 (6.91.23)

क्रोधेनाभिप्रजज्वाल भैमसेनिर्महाबलः । स विष्फार्य महच्चापमिन्द्राशनिसमप्रभम् ॥

krodhenābhiprajajvāla bhaimasenirmahābalaḥ | sa viṣphārya mahaccāpamindrāśanisamaprabham

भीमसेन का महाबली पुत्र क्रोध से जल उठा। इन्द्र के वज्र के समान चमकते अपने विशाल धनुष को तानकर

श्लोक 24 (6.91.24)

अभिदुद्राव वेगेन दुर्योधनमरिन्दमम् । तमापतन्तमुद्वीक्ष्य कालसृष्टमिवान्तकम् ॥

abhidudrāva vegena duryodhanamarindamam | tamāpatantamudvīkṣya kālasṛṣṭamivāntakam

वह शत्रुदमन दुर्योधन की ओर वेग से दौड़ा। काल के भेजे मृत्यु के समान उसे आते देखकर भी

श्लोक 25 (6.91.25)

न विव्यथे महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव । अथैनमब्रवीत्क्रुद्धः क्रूरः संरक्तलोचनः ॥

na vivyathe mahārāja putro duryodhanastava | athainamabravītkruddhaḥ krūraḥ saṃraktalocanaḥ

हे महाराज, आपका पुत्र दुर्योधन विचलित नहीं हुआ। तब क्रोध से लाल आँखों वाले उस क्रूर राक्षस ने कुपित होकर उससे कहा:

घटोत्कच उवाच

श्लोक 26 (6.91.26)

अद्यानृण्यं गमिष्यामि पितॄणां मातुरेव च । ये त्वया सुनृशंसेन दीर्घकालं प्रवासिताः ॥

adyānṛṇyaṃ gamiṣyāmi pitṝṇāṃ mātureva ca | ye tvayā sunṛśaṃsena dīrghakālaṃ pravāsitāḥ

"आज मैं अपने पिताओं और माता के ऋण से उऋण हो जाऊँगा, जिन्हें तुझ अत्यन्त क्रूर ने इतने लम्बे समय तक वनवास में भटकाया।

श्लोक 27 (6.91.27)

यच्च ते पाण्डवा राजंश्छलद्यूते पराजिताः । यच्चैव द्रौपदी कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला ॥

yacca te pāṇḍavā rājaṃśchaladyūte parājitāḥ | yaccaiva draupadī kṛṣṇā ekavastrā rajasvalā

हे राजन्, तूने छल के जुए में पाण्डवों को हराया; और द्रौपदी कृष्णा को, जो एक ही वस्त्र में थी और रजस्वला थी,

श्लोक 28 (6.91.28)

सभामानीय दुर्बुद्धे बहुधा क्लेशिता त्वया । तव च प्रियकामेन आश्रमस्था दुरात्मना ॥

sabhāmānīya durbuddhe bahudhā kleśitā tvayā | tava ca priyakāmena āśramasthā durātmanā

हे दुर्बुद्धि, तूने सभा में लाकर अनेक प्रकार से अपमानित किया। और तुझे प्रसन्न करने की इच्छा से, जब वह आश्रम में रहती थी, उस दुष्टात्मा

श्लोक 29 (6.91.29)

सैन्धवेन परामृष्टा परिभूय पितॄन्मम । एतेषामपमानानामन्येषां च कुलाधम ॥

saindhavena parāmṛṣṭā paribhūya pitṝnmama | eteṣāmapamānānāmanyeṣāṃ ca kulādhama

सैन्धव (जयद्रथ) ने मेरे पिताओं का तिरस्कार करके उस पर हाथ डाला। हे कुलकलंक, इन अपमानों का और दूसरे अपमानों का भी

सञ्जय उवाच

श्लोक 30 (6.91.30)

अन्तमद्य गमिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् । एवमुक्त्वा तु हैडिम्बो महद्विष्फार्य कार्मुकम् ॥

antamadya gamiṣyāmi yadi notsṛjase raṇam | evamuktvā tu haiḍimbo mahadviṣphārya kārmukam

मैं आज बदला चुका दूँगा, यदि तू रणभूमि छोड़कर नहीं भागता।" ऐसा कहकर हिडिम्बा के पुत्र ने अपना विशाल धनुष ताना,

श्लोक 31 (6.91.31)

संदश्य दशनैरोष्ठं सृक्किणी परिसंलिहन् । शरवर्षेण महता दुर्योधनमवाकिरत् । पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकः ॥

saṃdaśya daśanairoṣṭhaṃ sṛkkiṇī parisaṃlihan | śaravarṣeṇa mahatā duryodhanamavākirat | parvataṃ vāridhārābhiḥ prāvṛṣīva balāhakaḥ

और दाँतों से होंठ चबाते तथा मुँह के कोने चाटते हुए उसने बाणों की भारी वर्षा से दुर्योधन को ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु में मेघ जलधाराओं से पर्वत को ढक देता है।

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