भीष्म पर्व · अध्याय 90
इरावान् का वध
जब शकुनि और कृतवर्मा पाण्डवों पर आक्रमण करते हैं, तब नागराज की विधवा पुत्री से उत्पन्न अर्जुन का पुत्र इरावान् उत्तम घोड़ों की सेना लेकर उनका सामना करता है; सञ्जय बताते हैं कि इरावान् कभी इन्द्रलोक में अपने पिता से मिला था और युद्ध में सहायता का वचन दिया था। इरावान् के घुड़सवार और उसकी अपनी तलवार शकुनि के छह भाइयों में से पाँच को मार गिराते हैं; केवल वृषक बच निकलता है। तब दुर्योधन राक्षस आर्श्यशृङ्गि (अलम्बुष) को भेजता है, जिसका शरीर इरावान् के काटते ही फिर उग आता है; जब इरावान् के मातृकुल के नाग उसकी सहायता को आते हैं, तब राक्षस गरुड का रूप धरकर उन्हें खा जाता है और इरावान् का सिर काट देता है। संहार चलता रहता है; अर्जुन को पुत्र की मृत्यु का पता नहीं चलता, और भीष्म तथा द्रोण पाण्डव-सेना में भय फैलाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.90.1)
वर्तमाने तथा रौद्रे राजन्वीरवरक्षये । शकुनिः सौबलः श्रीमान्पाण्डवान्समुपाद्रवत् ॥
vartamāne tathā raudre rājanvīravarakṣaye | śakuniḥ saubalaḥ śrīmānpāṇḍavānsamupādravat
राजन्! जब श्रेष्ठ वीरों का वह भयंकर संहार चल रहा था, तब सुबलपुत्र श्रीमान् शकुनि ने पाण्डवों पर धावा बोला।
श्लोक 2 (6.90.2)
तथैव सात्वतो राजन्हार्दिक्यः परवीरहा । अभ्यद्रवत संग्रामे पाण्डवानां वरूथिनीम् ॥
tathaiva sātvato rājanhārdikyaḥ paravīrahā | abhyadravata saṃgrāme pāṇḍavānāṃ varūthinīm
राजन्! उसी प्रकार शत्रुवीरों का संहार करने वाले सात्वतवंशी हृदिकपुत्र (कृतवर्मा) ने संग्राम में पाण्डवों की सेना पर आक्रमण किया।
श्लोक 3 (6.90.3)
ततः काम्भोजमुख्यानां नदीजानां च वाजिनाम् । आरट्टानां महीजानां सिन्धुजानां च सर्वशः ॥
tataḥ kāmbhojamukhyānāṃ nadījānāṃ ca vājinām | āraṭṭānāṃ mahījānāṃ sindhujānāṃ ca sarvaśaḥ
तब काम्बोज देश के श्रेष्ठ घोड़ों, नदियों के तट पर उत्पन्न घोड़ों, आरट्ट और मही देश के घोड़ों तथा सब प्रकार के सिन्धु देश के घोड़ों,
श्लोक 4 (6.90.4)
वनायुजानां शुभ्राणां तथा पर्वतवासिनाम् । वाजिनां बहुभिः सङ्ख्ये समन्तात्परिवारयन् ॥
vanāyujānāṃ śubhrāṇāṃ tathā parvatavāsinām | vājināṃ bahubhiḥ saṅkhye samantātparivārayan
वनायु देश के श्वेत घोड़ों और पर्वतीय घोड़ों के बहुत-से समूहों से युद्ध में शत्रु को चारों ओर से घेरते हुए,
श्लोक 5 (6.90.5)
ये चापरे तित्तिरिजा जवना वातरंहसः । सुवर्णालङ्कृतैरेतैर्वर्मवद्भिः सुकल्पितैः ॥
ye cāpare tittirijā javanā vātaraṃhasaḥ | suvarṇālaṅkṛtairetairvarmavadbhiḥ sukalpitaiḥ
और तित्तिर देश में उत्पन्न वायु के समान वेगवान दूसरे घोड़ों के साथ; सोने से सजे, कवचधारी और भली-भाँति सुसज्जित इन घोड़ों से,
श्लोक 6 (6.90.6)
हयैर्वातजवैर्मुख्यैः पाण्डवस्य सुतो बली । अभ्यवर्तत तत्सैन्यं हृष्टरूपः परंतपः ॥
hayairvātajavairmukhyaiḥ pāṇḍavasya suto balī | abhyavartata tatsainyaṃ hṛṣṭarūpaḥ paraṃtapaḥ
वायु के समान वेगवान उन श्रेष्ठ घोड़ों के साथ पाण्डुपुत्र (अर्जुन) का बलवान, शत्रुओं को तपाने वाला पुत्र हर्षित होकर उस सेना पर चढ़ आया।
श्लोक 7 (6.90.7)
अर्जुनस्य सुतः श्रीमानिरावान्नाम वीर्यवान् । सुतायां नागराजस्य जातः पार्थेन धीमता ॥
arjunasya sutaḥ śrīmānirāvānnāma vīryavān | sutāyāṃ nāgarājasya jātaḥ pārthena dhīmatā
अर्जुन का यह श्रीमान् और पराक्रमी पुत्र इरावान् नाम का था, जो बुद्धिमान पार्थ से नागराज की पुत्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 8 (6.90.8)
ऐरावतेन सा दत्ता अनपत्या महात्मना । पत्यौ हते सुपर्णेन कृपणा दीनचेतना ॥
airāvatena sā dattā anapatyā mahātmanā | patyau hate suparṇena kṛpaṇā dīnacetanā
महामना ऐरावत ने उसे अर्जुन को सौंपा था। उसका पति सुपर्ण (गरुड) द्वारा मारा जा चुका था; वह निःसन्तान, दीन और उदास थी।
श्लोक 9 (6.90.9)
कार्यार्थं तां च जग्राह पार्थः कामवशानुगाम् । एवमेष समुत्पन्नः परक्षेत्रेऽर्जुनात्मजः ॥
kāryārthaṃ tāṃ ca jagrāha pārthaḥ kāmavaśānugām | evameṣa samutpannaḥ parakṣetre'rjunātmajaḥ
काम के वश में हुई उस स्त्री को पार्थ ने उसका प्रयोजन पूरा करने के लिए ग्रहण किया। इस प्रकार अर्जुन का यह पुत्र दूसरे के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 10 (6.90.10)
स नागलोके संवृद्धो मात्रा च परिरक्षितः । पितृव्येण परित्यक्तः पार्थद्वेषाद्दुरात्मना ॥
sa nāgaloke saṃvṛddho mātrā ca parirakṣitaḥ | pitṛvyeṇa parityaktaḥ pārthadveṣāddurātmanā
वह नागलोक में बड़ा हुआ और माता ने उसकी रक्षा की; उसके दुष्ट चाचा ने पार्थ से द्वेष के कारण उसे त्याग दिया था।
श्लोक 11 (6.90.11)
खमुत्पत्य महाराज नागराट् सत्यविक्रमः । इन्द्रलोकं जगामाशु श्रुत्वा तत्रार्जुनं गतम् ॥
khamutpatya mahārāja nāgarāṭ satyavikramaḥ | indralokaṃ jagāmāśu śrutvā tatrārjunaṃ gatam
महाराज! यह सुनकर कि अर्जुन इन्द्रलोक गए हैं, वह सत्यपराक्रमी नागकुमार आकाश में उड़कर शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचा।
श्लोक 12 (6.90.12)
सोऽभिगम्य महाबाहुः पितरं सत्यविक्रमः । अभ्यवादयदव्यग्रो विनयेन कृताञ्जलिः ॥
so'bhigamya mahābāhuḥ pitaraṃ satyavikramaḥ | abhyavādayadavyagro vinayena kṛtāñjaliḥ
उस सत्यपराक्रमी महाबाहु ने अपने पिता के पास जाकर शान्त भाव से, विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया,
श्लोक 13 (6.90.13)
न्यवेदयत चात्मानमर्जुनस्य महात्मनः । इरावानस्मि भद्रं ते पुत्रश्चाहं तव प्रभो ॥
nyavedayata cātmānamarjunasya mahātmanaḥ | irāvānasmi bhadraṃ te putraścāhaṃ tava prabho
और महात्मा अर्जुन को अपना परिचय दिया: 'आपका कल्याण हो, मैं इरावान् हूँ और प्रभो, मैं आपका पुत्र हूँ।'
श्लोक 14 (6.90.14)
मातुः समागमो यश्च तत्सर्वं प्रत्यवेदयत् । तच्च सर्वं यथावृत्तमनुसस्मार पाण्डवः ॥
mātuḥ samāgamo yaśca tatsarvaṃ pratyavedayat | tacca sarvaṃ yathāvṛttamanusasmāra pāṇḍavaḥ
उसने माता के साथ हुए समागम का सारा वृत्तान्त कह सुनाया, और पाण्डुनन्दन को वह सब ज्यों-का-त्यों स्मरण हो आया।
श्लोक 15 (6.90.15)
परिष्वज्य सुतं चापि आत्मनः सदृशं गुणैः । प्रीतिमाननयत्पार्थो देवराजनिवेशनम् ॥
pariṣvajya sutaṃ cāpi ātmanaḥ sadṛśaṃ guṇaiḥ | prītimānanayatpārtho devarājaniveśanam
गुणों में अपने ही समान उस पुत्र को हृदय से लगाकर पार्थ प्रसन्नतापूर्वक उसे देवराज के भवन में ले गए।
श्लोक 16 (6.90.16)
सोऽर्जुनेन समाज्ञप्तो देवलोके तदा नृप । प्रीतिपूर्वं महाबाहुः स्वकार्यं प्रति भारत ॥
so'rjunena samājñapto devaloke tadā nṛpa | prītipūrvaṃ mahābāhuḥ svakāryaṃ prati bhārata
राजन्! वहाँ देवलोक में, हे भारत, अर्जुन ने प्रेमपूर्वक उस महाबाहु को अपना एक कार्य सौंपा।
श्लोक 17 (6.90.17)
स चापि नरशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमः । अब्रवीच्च तदा पार्थमयमस्मि तवानघ ॥
sa cāpi naraśārdūlaḥ śārdūlasamavikramaḥ | abravīcca tadā pārthamayamasmi tavānagha
तब सिंह के समान पराक्रमी उस नरश्रेष्ठ ने भी पार्थ से कहा: 'हे निष्पाप, मैं आपके सामने उपस्थित हूँ,
इरावानुवाच
श्लोक 18 (6.90.18)
स्थितः प्रेष्यश्च पुत्रश्च सर्वथा त्वं प्रशाधि माम् । कं करोमि च ते कामं कं च कामं त्वमिच्छसि ॥
sthitaḥ preṣyaśca putraśca sarvathā tvaṃ praśādhi mām | kaṃ karomi ca te kāmaṃ kaṃ ca kāmaṃ tvamicchasi
आपके सेवक और पुत्र के रूप में खड़ा हूँ; मुझे हर प्रकार से आज्ञा दीजिए। मैं आपकी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ? आप क्या चाहते हैं?'
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (6.90.19)
परिष्वज्य सुतं प्रेम्णा वासविः प्रत्युवाच तम् । प्रीतिपूर्वं च कार्यं च कार्या प्रीतिश्च मानद ॥
pariṣvajya sutaṃ premṇā vāsaviḥ pratyuvāca tam | prītipūrvaṃ ca kāryaṃ ca kāryā prītiśca mānada
पुत्र को प्रेम से हृदय से लगाकर वासवनन्दन (अर्जुन) ने उसे उत्तर दिया: 'हे मान देने वाले, यह कार्य प्रेमपूर्वक करना है और प्रेम निभाना है:
श्लोक 20 (6.90.20)
युद्धकाले तु साहाय्यं दातव्यं नो भवेदिति । बाढमित्येवमुक्त्वा तु युद्धकाल इहागतः ॥
yuddhakāle tu sāhāyyaṃ dātavyaṃ no bhavediti | bāḍhamityevamuktvā tu yuddhakāla ihāgataḥ
युद्ध के समय तुम्हें हमारी सहायता करनी होगी।' 'ठीक है' कहकर वह युद्ध के समय यहाँ आ पहुँचा है,
श्लोक 21 (6.90.21)
कामवर्णजवैरश्वैः सर्वतः शुशुभे वृतः । ते हयाः काञ्चनापीडा नानावर्णा मनोजवाः ॥
kāmavarṇajavairaśvaiḥ sarvataḥ śuśubhe vṛtaḥ | te hayāḥ kāñcanāpīḍā nānāvarṇā manojavāḥ
और इच्छानुसार रंग और वेग वाले घोड़ों से चारों ओर घिरा हुआ वह शोभा पा रहा था। सोने की कलगियों वाले, अनेक रंगों के, मन के समान वेगवान वे घोड़े
श्लोक 22 (6.90.22)
उत्पेतुः सहसा राजन्हंसा इव महोदधौ । ते त्वदीयान्समासाद्य हयसंघान्मनोजवान् ॥
utpetuḥ sahasā rājanhaṃsā iva mahodadhau | te tvadīyānsamāsādya hayasaṃghānmanojavān
राजन्! महासागर पर हंसों की भाँति सहसा उछल पड़े। आपके मन के समान वेगवान अश्वसमूहों के पास पहुँचकर
श्लोक 23 (6.90.23)
क्रोडैः क्रोडानभिघ्नन्तो घोणाभिश्च परस्परम् । निपेतुः सहसा राजन्सुवेगाभिहता भुवि ॥
kroḍaiḥ kroḍānabhighnanto ghoṇābhiśca parasparam | nipetuḥ sahasā rājansuvegābhihatā bhuvi
वे छाती से छाती और थूथन से थूथन टकराते हुए, राजन्, बड़े वेग की चोट खाकर सहसा धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 24 (6.90.24)
निपतद्भिस्तथा तैश्च हयसङ्घैः परस्परम् । शुश्रुवे दारुणः शब्दः सुपर्णपतने यथा ॥
nipatadbhistathā taiśca hayasaṅghaiḥ parasparam | śuśruve dāruṇaḥ śabdaḥ suparṇapatane yathā
उन अश्वसमूहों के एक-दूसरे पर गिरने से ऐसा भयानक शब्द सुनाई दिया, जैसा गरुड के झपटने पर होता है।
श्लोक 25 (6.90.25)
तथैव तावका राजन्समेत्यान्योन्यमाहवे । परस्परवधं घोरं चक्रुस्ते हयसादिनः ॥
tathaiva tāvakā rājansametyānyonyamāhave | parasparavadhaṃ ghoraṃ cakruste hayasādinaḥ
राजन्! उसी प्रकार आपके घुड़सवार भी युद्ध में शत्रुओं से भिड़कर परस्पर भयंकर संहार करने लगे।
श्लोक 26 (6.90.26)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने संकुले तुमुले भृशम् । उभयोरपि संशान्ता हयसङ्घाः समन्ततः ॥
tasmiṃstathā vartamāne saṃkule tumule bhṛśam | ubhayorapi saṃśāntā hayasaṅghāḥ samantataḥ
जब वह घमासान और तुमुल युद्ध इस प्रकार भीषण रूप से चल रहा था, तब दोनों पक्षों के अश्वसमूह चारों ओर नष्ट हो गए।
श्लोक 27 (6.90.27)
प्रक्षीणसायकाः शूरा निहताश्वाः श्रमातुराः । विलयं समनुप्राप्तास्तक्षमाणाः परस्परम् ॥
prakṣīṇasāyakāḥ śūrā nihatāśvāḥ śramāturāḥ | vilayaṃ samanuprāptāstakṣamāṇāḥ parasparam
बाण समाप्त हो जाने पर, घोड़े मारे जाने पर, थकान से व्याकुल वे शूरवीर एक-दूसरे को काटते हुए नष्ट हो गए।
श्लोक 28 (6.90.28)
ततः क्षीणे हयानीके किंचिच्छेषे च भारत । सौबलस्यानुजाः शूरा निर्गता रणमूर्धनि ॥
tataḥ kṣīṇe hayānīke kiṃciccheṣe ca bhārata | saubalasyānujāḥ śūrā nirgatā raṇamūrdhani
हे भारत! तब जब अश्वसेना क्षीण हो गई और थोड़ी ही बच रही, तब सुबलपुत्र (शकुनि) के शूरवीर छोटे भाई युद्ध के अग्रभाग में निकल आए,
श्लोक 29 (6.90.29)
वायुवेगसमस्पर्शाञ्जवे वायुसमांश्च ते । आरुह्य बलसंपन्नान्वयःस्थांस्तुरगोत्तमान् ॥
vāyuvegasamasparśāñjave vāyusamāṃśca te | āruhya balasaṃpannānvayaḥsthāṃsturagottamān
वे वायु के वेग के समान स्पर्श वाले, वेग में वायु के समान, बलवान और युवा श्रेष्ठ घोड़ों पर सवार थे।
श्लोक 30 (6.90.30)
गजो गवाक्षो वृषकश्चर्मवानार्जवः शुकः । षडेते बलसंपन्ना निर्ययुर्महतो बलात् ॥
gajo gavākṣo vṛṣakaścarmavānārjavaḥ śukaḥ | ṣaḍete balasaṃpannā niryayurmahato balāt
गज, गवाक्ष, वृषक, चर्मवान्, आर्जव और शुक: ये छहों बलवान वीर उस विशाल सेना से बाहर निकले,
श्लोक 31 (6.90.31)
वार्यमाणाः शकुनिना स्वैश्च योधैर्महाबलैः । सन्नद्धा युद्धकुशला रौद्ररूपा महाबलाः ॥
vāryamāṇāḥ śakuninā svaiśca yodhairmahābalaiḥ | sannaddhā yuddhakuśalā raudrarūpā mahābalāḥ
यद्यपि शकुनि और उनके अपने महाबली योद्धाओं ने उन्हें रोका था; वे कवचधारी, युद्धकुशल, भयंकर रूप वाले और महाबली थे।
श्लोक 32 (6.90.32)
तदनीकं महाबाहो भित्त्वा परमदुर्जयम् । बलेन महता युक्ताः स्वर्गाय विजयैषिणः ॥
tadanīkaṃ mahābāho bhittvā paramadurjayam | balena mahatā yuktāḥ svargāya vijayaiṣiṇaḥ
हे महाबाहो! उस अत्यन्त दुर्जय सेना को भेदकर, विशाल सेना के साथ, विजय की इच्छा रखते हुए और स्वर्ग के लिए तत्पर,
श्लोक 33 (6.90.33)
विविशुस्ते तदा हृष्टा गान्धारा युद्धदुर्मदाः । तान्प्रविष्टांस्तदा दृष्ट्वा इरावानपि वीर्यवान् ॥
viviśuste tadā hṛṣṭā gāndhārā yuddhadurmadāḥ | tānpraviṣṭāṃstadā dṛṣṭvā irāvānapi vīryavān
युद्ध में उन्मत्त वे गान्धार वीर हर्षित होकर उसमें घुस गए। उन्हें भीतर घुसा देखकर पराक्रमी इरावान् ने भी
श्लोक 34 (6.90.34)
अब्रवीत्समरे योधान्स्वान्विचित्रहयस्थितान् । यथैते धार्तराष्ट्रस्य योधाः सानुगवाहनाः ॥
abravītsamare yodhānsvānvicitrahayasthitān | yathaite dhārtarāṣṭrasya yodhāḥ sānugavāhanāḥ
युद्ध में विचित्र घोड़ों पर सवार अपने योद्धाओं से कहा: 'ऐसी युक्ति करो कि धृतराष्ट्रपुत्र के ये योद्धा अपने अनुचरों और वाहनों सहित
श्लोक 35 (6.90.35)
हन्यन्ते समरे सर्वे तथा नीतिर्विधीयताम् । बाढमित्येवमुक्त्वा ते सर्वे योधा इरावतः ॥
hanyante samare sarve tathā nītirvidhīyatām | bāḍhamityevamuktvā te sarve yodhā irāvataḥ
युद्ध में सब मारे जाएँ; ऐसी नीति अपनाई जाए।' 'ऐसा ही हो' कहकर इरावान् के सभी योद्धाओं ने
श्लोक 36 (6.90.36)
जघ्नुस्तेषां बलानीकं दुर्जयं समरे परैः । तदनीकमनीकेन समरे वीक्ष्य पातितम् ॥
jaghnusteṣāṃ balānīkaṃ durjayaṃ samare paraiḥ | tadanīkamanīkena samare vīkṣya pātitam
उनकी उस सेना का संहार कर डाला, जिसे शत्रु युद्ध में जीत नहीं पाते थे। अपनी सेना को युद्ध में दूसरी सेना द्वारा गिराई गई देखकर
श्लोक 37 (6.90.37)
अमृष्यमाणास्ते सर्वे सुबलस्यात्मजा रणे । इरावन्तमभिद्रुत्य सर्वतः पर्यवारयन् ॥
amṛṣyamāṇāste sarve subalasyātmajā raṇe | irāvantamabhidrutya sarvataḥ paryavārayan
सुबल के वे सब पुत्र इसे सहन न कर सके और रण में इरावान् पर टूटकर उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 38 (6.90.38)
ताडयन्तः शितैः प्रासैश्चोदयन्तः परस्परम् । ते शूराः पर्यधावन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥
tāḍayantaḥ śitaiḥ prāsaiścodayantaḥ parasparam | te śūrāḥ paryadhāvanta kurvanto mahadākulam
तीखे प्रासों से प्रहार करते और एक-दूसरे को उत्साहित करते हुए वे शूरवीर भारी कोलाहल मचाते हुए चारों ओर दौड़ने लगे।
श्लोक 39 (6.90.39)
इरावानथ निर्भिन्नः प्रासैस्तीक्ष्णैर्महात्मभिः । स्रवता रुधिरेणाक्तस्तोत्रैर्विद्ध इव द्विपः ॥
irāvānatha nirbhinnaḥ prāsaistīkṣṇairmahātmabhiḥ | sravatā rudhireṇāktastotrairviddha iva dvipaḥ
तब उन महामना योद्धाओं के तीखे प्रासों से बिंधा हुआ और बहते रक्त से लथपथ इरावान् अंकुशों से बिंधे हाथी के समान दिखाई देने लगा।
श्लोक 40 (6.90.40)
उरस्यपि च पृष्ठे च पार्श्वयोश्च भृशाहतः । एको बहुभिरत्यर्थं धैर्याद्राजन्न विव्यथे ॥
urasyapi ca pṛṣṭhe ca pārśvayośca bhṛśāhataḥ | eko bahubhiratyarthaṃ dhairyādrājanna vivyathe
राजन्! छाती, पीठ और दोनों पसलियों पर गहरी चोट खाकर भी, अकेले बहुतों से घिरा वह अपने धैर्य के कारण तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 41 (6.90.41)
इरावानपि संक्रुद्धः सर्वास्तान्निशितैः शरैः । मोहयामास समरे विद्ध्वा परपुरंजयः ॥
irāvānapi saṃkruddhaḥ sarvāstānniśitaiḥ śaraiḥ | mohayāmāsa samare viddhvā parapuraṃjayaḥ
शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले इरावान् ने भी क्रोध में भरकर उन सबको तीखे बाणों से बींधकर युद्ध में मूर्छित कर दिया।
श्लोक 42 (6.90.42)
प्रासानुत्कृष्य तरसा स्वशरीरादरिन्दमः । तैरेव ताडयामास सुबलस्यात्मजान्रणे ॥
prāsānutkṛṣya tarasā svaśarīrādarindamaḥ | taireva tāḍayāmāsa subalasyātmajānraṇe
शत्रुदमन इरावान् ने अपने शरीर से प्रासों को वेग से खींचकर उन्हीं से रण में सुबलपुत्रों पर प्रहार किया।
श्लोक 43 (6.90.43)
विकृष्य च शितं खड्गं गृहीत्वा च शरावरम् । पदातिर्द्रुतमागच्छज्जिघांसुः सौबलान्युधि ॥
vikṛṣya ca śitaṃ khaḍgaṃ gṛhītvā ca śarāvaram | padātirdrutamāgacchajjighāṃsuḥ saubalānyudhi
फिर तीखी तलवार खींचकर और ढाल लेकर वह सुबलपुत्रों को मार डालने की इच्छा से पैदल ही तेज़ी से रण में आगे बढ़ा।
श्लोक 44 (6.90.44)
ततः प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुबलात्मजाः । भूयः क्रोधसमाविष्टा इरावन्तमभिद्रुताः ॥
tataḥ pratyāgataprāṇāḥ sarve te subalātmajāḥ | bhūyaḥ krodhasamāviṣṭā irāvantamabhidrutāḥ
तब होश में आने पर सुबल के वे सभी पुत्र फिर से क्रोध में भरकर इरावान् पर टूट पड़े।
श्लोक 45 (6.90.45)
इरावानपि खड्गेन दर्शयन्पाणिलाघवम् । अभ्यवर्तत देवांश्च मानुषांश्चैव संयुगे ॥
irāvānapi khaḍgena darśayanpāṇilāghavam | abhyavartata devāṃśca mānuṣāṃścaiva saṃyuge
इरावान् ने भी तलवार चलाने में अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए युद्ध में देवताओं और मनुष्यों को भी पीछे छोड़ दिया।
श्लोक 46 (6.90.46)
लाघवेनाथ चरतः सर्वे ते सुबलात्मजाः । अन्तरं नाभ्यगच्छन्त चरन्तः शीघ्रगैर्हयैः ॥
lāghavenātha carataḥ sarve te subalātmajāḥ | antaraṃ nābhyagacchanta carantaḥ śīghragairhayaiḥ
उसके फुर्ती से विचरने के कारण सुबल के सब पुत्र शीघ्रगामी घोड़ों पर घूमते हुए भी उस पर वार करने का अवसर न पा सके।
श्लोक 47 (6.90.47)
भूमिष्ठमथ तं सङ्ख्ये ह्यन्तरिक्षादवप्लुतम् । परिवार्य भृशं सर्वे ग्रहीतुमुपचक्रमुः ॥
bhūmiṣṭhamatha taṃ saṅkhye hyantarikṣādavaplutam | parivārya bhṛśaṃ sarve grahītumupacakramuḥ
तब आकाश से कूदकर रणभूमि पर खड़े इरावान् को उन सबने चारों ओर से कसकर घेर लिया और पकड़ने का प्रयत्न करने लगे।
श्लोक 48 (6.90.48)
अथाभ्याशगतानां स खड्गेनामित्रकर्शनः । असिहस्तोऽस्त्रहस्तानां तेषां गात्राण्यकृन्तत ॥
athābhyāśagatānāṃ sa khaḍgenāmitrakarśanaḥ | asihasto'strahastānāṃ teṣāṃ gātrāṇyakṛntata
तब शत्रुओं को सताने वाले उस वीर ने हाथ में तलवार लेकर पास आए हुए उन शस्त्रधारी योद्धाओं के अंगों को तलवार से काट डाला,
श्लोक 49 (6.90.49)
आयुधानि च सर्वेषां बाहूनपि विभूषितान् । अपतन्त निकृत्ताङ्गा मृता भूमौ गतासवः ॥
āyudhāni ca sarveṣāṃ bāhūnapi vibhūṣitān | apatanta nikṛttāṅgā mṛtā bhūmau gatāsavaḥ
उनके आयुधों और आभूषणों से सजी भुजाओं को भी। अंग कट जाने से वे प्राणहीन होकर मरे हुए भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 50 (6.90.50)
वृषकस्तु महाराज बहुधा विपरिक्षतः । अमुच्यत महारौद्रात्तस्माद्वीरावकर्तनात् ॥
vṛṣakastu mahārāja bahudhā viparikṣataḥ | amucyata mahāraudrāttasmādvīrāvakartanāt
महाराज! केवल वृषक ही, जो अनेक स्थानों पर घायल हो गया था, वीरों को काट डालने वाले उस भयंकर संहार से बच निकला।
श्लोक 51 (6.90.51)
तान्सर्वान्पतितान्दृष्ट्वा भीतो दुर्योधनस्ततः । अभ्यधावत संक्रुद्धो राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
tānsarvānpatitāndṛṣṭvā bhīto duryodhanastataḥ | abhyadhāvata saṃkruddho rākṣasaṃ ghoradarśanam
उन सबको गिरा हुआ देखकर दुर्योधन भयभीत हो गया और क्रोध में भरकर भयंकर रूप वाले राक्षस के पास दौड़ा गया,
श्लोक 52 (6.90.52)
आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं मायाविनमरिन्दमम् । वैरिणं भीमसेनस्य पूर्वं बकवधेन वै ॥
ārśyaśṛṅgiṃ maheṣvāsaṃ māyāvinamarindamam | vairiṇaṃ bhīmasenasya pūrvaṃ bakavadhena vai
महाधनुर्धर, मायावी, शत्रुदमन आर्श्यशृङ्गि (अलम्बुष) के पास, जो बक के वध के कारण पहले से भीमसेन का वैरी था:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 53 (6.90.53)
पश्य वीर यथा ह्येष फल्गुनस्य सुतो बली । मायावी विप्रियं कर्तुमकार्षीन्मे बलक्षयम् ॥
paśya vīra yathā hyeṣa phalgunasya suto balī | māyāvī vipriyaṃ kartumakārṣīnme balakṣayam
"वीर! देखो, फाल्गुन के इस बलवान और मायावी पुत्र ने मेरा अप्रिय करने के लिए किस प्रकार मेरी सेना का विनाश कर डाला है।
श्लोक 54 (6.90.54)
त्वं च कामगमस्तात मायास्त्रे च विशारदः । कृतवैरश्च पार्थेन तस्मादेनं रणे जहि ॥
tvaṃ ca kāmagamastāta māyāstre ca viśāradaḥ | kṛtavairaśca pārthena tasmādenaṃ raṇe jahi
तात! तुम इच्छानुसार कहीं भी जा सकते हो और माया-अस्त्र में निपुण हो, तथा पार्थ से तुम्हारा वैर भी है; इसलिए इसे युद्ध में मार डालो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 55 (6.90.55)
बाढमित्येवमुक्त्वा तु राक्षसो घोरदर्शनः । प्रययौ सिंहनादेन यत्रार्जुनसुतो युवा ॥
bāḍhamityevamuktvā tu rākṣaso ghoradarśanaḥ | prayayau siṃhanādena yatrārjunasuto yuvā
"ऐसा ही हो" कहकर वह भयंकर राक्षस सिंहनाद करता हुआ वहाँ गया जहाँ अर्जुन का युवा पुत्र था,
श्लोक 56 (6.90.56)
स योधैर्युद्धकुशलैर्विमलप्रासयोधिभिः । वीरैः प्रहारिभिर्युक्तैः स्वैरनीकैः समावृतः ॥
sa yodhairyuddhakuśalairvimalaprāsayodhibhiḥ | vīraiḥ prahāribhiryuktaiḥ svairanīkaiḥ samāvṛtaḥ
युद्धकुशल, चमकते प्रासों से लड़ने वाले, प्रहार को उद्यत वीर योद्धाओं की अपनी सेना से घिरा हुआ,
श्लोक 57 (6.90.57)
हतशेषैर्महाराज द्विसाहस्रैर्हयोत्तमैः । निहन्तुकामः समरे इरावन्तं महाबलम् ॥
hataśeṣairmahārāja dvisāhasrairhayottamaiḥ | nihantukāmaḥ samare irāvantaṃ mahābalam
और महाराज, संहार से बचे हुए दो हज़ार उत्तम घोड़ों के साथ, युद्ध में महाबली इरावान् को मार डालने की इच्छा से।
श्लोक 58 (6.90.58)
इरावानपि संक्रुद्धस्त्वरमाणः पराक्रमी । हन्तुकामममित्रघ्नो राक्षसं प्रत्यवारयत् ॥
irāvānapi saṃkruddhastvaramāṇaḥ parākramī | hantukāmamamitraghno rākṣasaṃ pratyavārayat
शत्रुओं का संहार करने वाले पराक्रमी इरावान् ने भी क्रोध में भरकर, शीघ्रता से, उसे मारने को उद्यत उस राक्षस को रोक दिया।
श्लोक 59 (6.90.59)
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य राक्षसः सुमहाबलः । त्वरमाणस्ततो मायां प्रयोक्तुमुपचक्रमे ॥
tamāpatantaṃ saṃprekṣya rākṣasaḥ sumahābalaḥ | tvaramāṇastato māyāṃ prayoktumupacakrame
उसे आते देखकर महाबली राक्षस ने तुरन्त अपनी माया का प्रयोग आरम्भ किया।
श्लोक 60 (6.90.60)
तेन मायामयाः सृष्टा हयास्तावन्त एव हि । स्वारूढा राक्षसैर्घोरैः शूलपट्टसधारिभिः ॥
tena māyāmayāḥ sṛṣṭā hayāstāvanta eva hi | svārūḍhā rākṣasairghoraiḥ śūlapaṭṭasadhāribhiḥ
उसने माया से उतने ही घोड़े रच दिए, जिन पर शूल और पट्टिश धारण करने वाले भयंकर राक्षस सवार थे।
श्लोक 61 (6.90.61)
ते संरब्धाः समागम्य द्विसाहस्राः प्रहारिणः । अचिराद्गमयामासुः प्रेतलोकं परस्परम् ॥
te saṃrabdhāḥ samāgamya dvisāhasrāḥ prahāriṇaḥ | acirādgamayāmāsuḥ pretalokaṃ parasparam
क्रोध में भरे वे दो हज़ार प्रहारी आपस में भिड़ गए और शीघ्र ही एक-दूसरे को प्रेतलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 62 (6.90.62)
तस्मिंस्तु निहते सैन्ये तावुभौ युद्धदुर्मदौ । संग्रामे समतिष्ठेतां यथा वै वृत्रवासवौ ॥
tasmiṃstu nihate sainye tāvubhau yuddhadurmadau | saṃgrāme samatiṣṭhetāṃ yathā vai vṛtravāsavau
उस सेना के नष्ट हो जाने पर वे दोनों रणोन्मत्त योद्धा संग्राम में वृत्रासुर और इन्द्र की भाँति आमने-सामने डट गए।
श्लोक 63 (6.90.63)
आद्रवन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसं युद्धदुर्मदम् । इरावानथ संरब्धः प्रत्यधावन्महाबलः ॥
ādravantamabhiprekṣya rākṣasaṃ yuddhadurmadam | irāvānatha saṃrabdhaḥ pratyadhāvanmahābalaḥ
रणोन्मत्त राक्षस को अपनी ओर दौड़ते देखकर महाबली इरावान् भी क्रोध में भरकर उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 64 (6.90.64)
समभ्याशगतस्याजौ तस्य खड्गेन दुर्मदः । चिच्छेद कार्मुकं दीप्तं शरावापं च कञ्चुकम् ॥
samabhyāśagatasyājau tasya khaḍgena durmadaḥ | ciccheda kārmukaṃ dīptaṃ śarāvāpaṃ ca kañcukam
युद्ध में राक्षस के निकट आने पर रणोन्मत्त इरावान् ने तलवार से उसका चमचमाता धनुष, तरकस और कवच काट डाला।
श्लोक 65 (6.90.65)
स निकृत्तं धनुर्दृष्ट्वा खं जवेन समाविशत् । इरावन्तमभिक्रुद्धं मोहयन्निव मायया ॥
sa nikṛttaṃ dhanurdṛṣṭvā khaṃ javena samāviśat | irāvantamabhikruddhaṃ mohayanniva māyayā
अपना धनुष कटा देखकर वह राक्षस मानो क्रुद्ध इरावान् को अपनी माया से मोहित करता हुआ वेग से आकाश में जा पहुँचा।
श्लोक 66 (6.90.66)
ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य इरावानपि राक्षसम् । विमोहयित्वा मायाभिस्तस्य गात्राणि सायकैः ॥
tato'ntarikṣamutpatya irāvānapi rākṣasam | vimohayitvā māyābhistasya gātrāṇi sāyakaiḥ
तब इरावान् ने भी आकाश में उछलकर, अपनी माया से राक्षस को मोहित करके, बाणों से
श्लोक 67 (6.90.67)
चिच्छेद सर्वमर्मज्ञः कामरूपो दुरासदः । तथा स राक्षसश्रेष्ठः शरैः कृत्तः पुनः पुनः ॥
ciccheda sarvamarmajñaḥ kāmarūpo durāsadaḥ | tathā sa rākṣasaśreṣṭhaḥ śaraiḥ kṛttaḥ punaḥ punaḥ
उसके अंग काट डाले; वह सब मर्मस्थानों का ज्ञाता, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला और दुर्जय था। परन्तु वह श्रेष्ठ राक्षस बार-बार बाणों से कटने पर भी
श्लोक 68 (6.90.68)
संबभूव महाराज समवाप च यौवनम् । माया हि सहजा तेषां वयो रूपं च कामजम् ॥
saṃbabhūva mahārāja samavāpa ca yauvanam | māyā hi sahajā teṣāṃ vayo rūpaṃ ca kāmajam
महाराज! फिर से पूर्ण हो जाता और यौवन पा लेता था; क्योंकि माया उनमें जन्मजात होती है और उनकी आयु तथा रूप उनकी इच्छा के अनुसार होते हैं।
श्लोक 69 (6.90.69)
एवं तद्राक्षसस्याङ्गं छिन्नंछिन्नं व्यरोहत । इरावानपि संक्रुद्धो राक्षसं तं महाबलम् ॥
evaṃ tadrākṣasasyāṅgaṃ chinnaṃchinnaṃ vyarohata | irāvānapi saṃkruddho rākṣasaṃ taṃ mahābalam
इस प्रकार उस राक्षस का शरीर बार-बार कटकर फिर उग आता था। तब इरावान् ने भी क्रोध में भरकर उस महाबली राक्षस को
श्लोक 70 (6.90.70)
परश्वथेन तीक्ष्णेन चिच्छेद च पुनः पुनः । स तेन बलिना वीरश्छिद्यमान इव द्रुमः ॥
paraśvathena tīkṣṇena ciccheda ca punaḥ punaḥ | sa tena balinā vīraśchidyamāna iva drumaḥ
तीखे फरसे से बार-बार काटा। उस बलवान वीर के द्वारा वृक्ष की भाँति काटे जाते हुए
श्लोक 71 (6.90.71)
राक्षसो व्यनदद्धोरं स शब्दस्तुमुलोऽभवत् । परश्वथक्षतं रक्षः सुस्राव बहुशोणितम् ॥
rākṣaso vyanadaddhoraṃ sa śabdastumulo'bhavat | paraśvathakṣataṃ rakṣaḥ susrāva bahuśoṇitam
उस राक्षस ने भयंकर गर्जना की और वह शब्द बड़ा तुमुल था। फरसे से घायल वह राक्षस बहुत-सा रक्त बहाने लगा।
श्लोक 72 (6.90.72)
ततश्चुक्रोध बलवांश्चक्रे वेगं च संयुगे । आर्श्यशृङ्गिस्ततो दृष्ट्वा समरे शत्रुमूर्जितम् ॥
tataścukrodha balavāṃścakre vegaṃ ca saṃyuge | ārśyaśṛṅgistato dṛṣṭvā samare śatrumūrjitam
तब वह बलवान राक्षस क्रोध से भर उठा और युद्ध में पूरा वेग दिखाने लगा। अपने शत्रु को रण में इतना प्रबल देखकर आर्श्यशृङ्गि ने
श्लोक 73 (6.90.73)
कृत्वा घोरं महद्रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे । अर्जुनस्य सुतं वीरमिरावन्तं यशस्विनम् ॥
kṛtvā ghoraṃ mahadrūpaṃ grahītumupacakrame | arjunasya sutaṃ vīramirāvantaṃ yaśasvinam
विशाल और भयंकर रूप धारण किया और अर्जुन के वीर तथा यशस्वी पुत्र इरावान् को पकड़ने का प्रयत्न करने लगा,
श्लोक 74 (6.90.74)
संग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् । तां दृष्ट्वा तादृशीं मायां राक्षसस्य दुरात्मनः ॥
saṃgrāmaśiraso madhye sarveṣāṃ tatra paśyatām | tāṃ dṛṣṭvā tādṛśīṃ māyāṃ rākṣasasya durātmanaḥ
युद्ध के अग्रभाग के बीच, वहाँ सबके देखते-देखते। उस दुष्टात्मा राक्षस की ऐसी माया देखकर
श्लोक 75 (6.90.75)
इरावानपि संक्रुद्धो मायां स्रष्टुं प्रचक्रमे । तस्य क्रोधाभिभूतस्य समरेष्वनिवर्तिनः ॥
irāvānapi saṃkruddho māyāṃ sraṣṭuṃ pracakrame | tasya krodhābhibhūtasya samareṣvanivartinaḥ
इरावान् ने भी क्रुद्ध होकर माया रचनी आरम्भ की। युद्धों में कभी पीछे न हटने वाला वह जब क्रोध से भर उठा,
श्लोक 76 (6.90.76)
योऽन्वयो मातृकस्तस्य स एनमभिपेदिवान् । स नागैर्बहुभी राजन्निरावान्संवृतो रणे ॥
yo'nvayo mātṛkastasya sa enamabhipedivān | sa nāgairbahubhī rājannirāvānsaṃvṛto raṇe
तब उसके मातृकुल के नाग उसकी सहायता को आ पहुँचे। राजन्! युद्ध में बहुत-से नागों से घिरे इरावान् ने
श्लोक 77 (6.90.77)
दधार सुमहद्रूपमनन्त इव भोगवान् । ततो बहुविधैर्नागैश्छादयामास राक्षसम् ॥
dadhāra sumahadrūpamananta iva bhogavān | tato bahuvidhairnāgaiśchādayāmāsa rākṣasam
अनेक फनों वाले अनन्त (शेषनाग) के समान विशाल रूप धारण किया और फिर अनेक प्रकार के नागों से उस राक्षस को ढक दिया।
श्लोक 78 (6.90.78)
छाद्यमानस्तु नागैः स ध्यात्वा राक्षसपुङ्गवः । सौपर्णं रूपमास्थाय भक्षयामास पन्नगम् ॥
chādyamānastu nāgaiḥ sa dhyātvā rākṣasapuṅgavaḥ | sauparṇaṃ rūpamāsthāya bhakṣayāmāsa pannagam
नागों से ढके जाने पर उस श्रेष्ठ राक्षस ने विचार करके गरुड का रूप धारण किया और उन सर्पों को खा गया।
श्लोक 79 (6.90.79)
मायया भक्षिते तस्मिन्नन्वये तस्य मातृके । विमोहितमिरावन्तं न्यहनद्राक्षसोऽसिना ॥
māyayā bhakṣite tasminnanvaye tasya mātṛke | vimohitamirāvantaṃ nyahanadrākṣaso'sinā
माया के द्वारा उसके मातृकुल के नागों के खा लिए जाने पर राक्षस ने मोहित हुए इरावान् को तलवार से मार डाला।
श्लोक 80 (6.90.80)
सकुण्डलं समुकुटं पद्मेन्दुसदृशप्रभम् । इरावतः शिरो रक्षः पातयामास भूतले ॥
sakuṇḍalaṃ samukuṭaṃ padmendusadṛśaprabham | irāvataḥ śiro rakṣaḥ pātayāmāsa bhūtale
राक्षस ने कुण्डलों और मुकुट से युक्त, कमल और चन्द्रमा के समान कान्ति वाले इरावान् के सिर को धरती पर गिरा दिया।
श्लोक 81 (6.90.81)
तस्मिंस्तु निहते वीरे राक्षसेनार्जुनात्मजे । विशोकाः समपद्यन्त धार्तराष्ट्राः सराजकाः ॥
tasmiṃstu nihate vīre rākṣasenārjunātmaje | viśokāḥ samapadyanta dhārtarāṣṭrāḥ sarājakāḥ
जब राक्षस ने अर्जुन के उस वीर पुत्र को मार डाला, तब धृतराष्ट्र के पुत्र और उनके पक्ष के राजा शोकरहित हो गए।
श्लोक 82 (6.90.82)
तस्मिन्महति संग्रामे तादृशे भैरवे पुनः । महान्व्यतिकरो घोरः सेनयोः समपद्यत ॥
tasminmahati saṃgrāme tādṛśe bhairave punaḥ | mahānvyatikaro ghoraḥ senayoḥ samapadyata
उस भयानक महासंग्राम में दोनों सेनाओं के बीच फिर बड़ा भयंकर घमासान मच गया।
श्लोक 83 (6.90.83)
गजा हयाः पदाताश्च विमिश्रा दन्तिभिर्हताः । रथाश्वा दन्तिनश्चैव पत्तिभिस्तत्र सूदिताः ॥
gajā hayāḥ padātāśca vimiśrā dantibhirhatāḥ | rathāśvā dantinaścaiva pattibhistatra sūditāḥ
आपस में मिले हुए हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक दन्तैल हाथियों द्वारा मारे गए; और रथ, घोड़े तथा हाथी वहाँ पैदल सैनिकों द्वारा नष्ट किए गए।
श्लोक 84 (6.90.84)
तथा पत्तिरथौघाश्च हयाश्च बहवो रणे । रथिभिर्निहता राजंस्तव तेषां च संकुले ॥
tathā pattirathaughāśca hayāśca bahavo raṇe | rathibhirnihatā rājaṃstava teṣāṃ ca saṃkule
राजन्! उस घमासान में आपके और उनके बहुत-से पैदल सैनिक, रथसमूह और घोड़े रथियों द्वारा मारे गए।
श्लोक 85 (6.90.85)
अजानन्नर्जुनश्चापि निहतं पुत्रमौरसम् । जघान समरे शूरान्राज्ञस्तान्भीष्मरक्षिणः ॥
ajānannarjunaścāpi nihataṃ putramaurasam | jaghāna samare śūrānrājñastānbhīṣmarakṣiṇaḥ
अर्जुन ने भी, यह न जानते हुए कि उसका औरस पुत्र मारा गया है, युद्ध में भीष्म की रक्षा करने वाले उन शूरवीर राजाओं का वध किया।
श्लोक 86 (6.90.86)
तथैव तावका राजन्सृञ्जयाश्च सहस्रशः । जुह्वतः समरे प्राणान्निजघ्नुरितरेतरम् ॥
tathaiva tāvakā rājansṛñjayāśca sahasraśaḥ | juhvataḥ samare prāṇānnijaghnuritaretaram
राजन्! इसी प्रकार आपके योद्धा और हज़ारों सृञ्जय युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देते हुए एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 87 (6.90.87)
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः । बाहुभिः समयुध्यन्त समवेताः परस्परम् ॥
muktakeśā vikavacā virathāśchinnakārmukāḥ | bāhubhiḥ samayudhyanta samavetāḥ parasparam
बाल बिखरे हुए, कवच गिरे हुए, रथ छिने हुए और धनुष कटे हुए, वे आपस में भिड़कर भुजाओं से ही लड़ने लगे।
श्लोक 88 (6.90.88)
तथा मर्मातिगैर्भीष्मो निजघान महारथान् । कम्पयन्समरे सेनां पाण्डवानां परंतपः ॥
tathā marmātigairbhīṣmo nijaghāna mahārathān | kampayansamare senāṃ pāṇḍavānāṃ paraṃtapaḥ
इसी प्रकार शत्रुओं को तपाने वाले भीष्म ने मर्मस्थलों को भेदने वाले बाणों से महारथियों का वध किया और युद्ध में पाण्डव-सेना को कँपा दिया।
श्लोक 89 (6.90.89)
तेन यौधिष्ठिरे सैन्ये बहवो मानवा हताः । दन्तिनः सादिनश्चैव रथिनोऽथ हयास्तथा ॥
tena yaudhiṣṭhire sainye bahavo mānavā hatāḥ | dantinaḥ sādinaścaiva rathino'tha hayāstathā
उनके द्वारा युधिष्ठिर की सेना में बहुत-से योद्धा मारे गए: हाथी और घुड़सवार, रथी और घोड़े भी।
श्लोक 90 (6.90.90)
तत्र भारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यद्भुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ॥
tatra bhārata bhīṣmasya raṇe dṛṣṭvā parākramam | atyadbhutamapaśyāma śakrasyeva parākramam
हे भारत! वहाँ रण में भीष्म का पराक्रम देखकर हमें इन्द्र के समान अत्यन्त अद्भुत पराक्रम दिखाई दिया।
श्लोक 91 (6.90.91)
तथैव भीमसेनस्य पार्षतस्य च भारत । रौद्रमासीद्रणे युद्धं सात्यकस्य च धन्विनः ॥
tathaiva bhīmasenasya pārṣatasya ca bhārata | raudramāsīdraṇe yuddhaṃ sātyakasya ca dhanvinaḥ
हे भारत! इसी प्रकार भीमसेन, पार्षत (धृष्टद्युम्न) और धनुर्धर सात्यकि का युद्ध भी रण में बड़ा भयंकर था।
श्लोक 92 (6.90.92)
दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रान्तं पाण्डवान्भयमाविशत् । एक एव रणे शक्तो निहन्तुं सर्वसैनिकान् ॥
dṛṣṭvā droṇasya vikrāntaṃ pāṇḍavānbhayamāviśat | eka eva raṇe śakto nihantuṃ sarvasainikān
द्रोण का पराक्रम देखकर पाण्डवों के मन में भय समा गया: 'ये अकेले ही रण में सारे सैनिकों को मार डालने में समर्थ हैं;
श्लोक 93 (6.90.93)
किं पुनः पृथिवीशूरैर्योधव्रातैः समावृतः । इत्यब्रुवन्महाराज रणे द्रोणेन पीडिताः ॥
kiṃ punaḥ pṛthivīśūrairyodhavrātaiḥ samāvṛtaḥ | ityabruvanmahārāja raṇe droṇena pīḍitāḥ
फिर पृथ्वी के शूरवीर योद्धाओं के समूहों से घिरे होने पर तो कहना ही क्या!' महाराज, रण में द्रोण से पीड़ित होकर वे ऐसा कहने लगे।
श्लोक 94 (6.90.94)
वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे भरतर्षभ । उभयोः सेनयोः शूरा नामृष्यन्त परस्परम् ॥
vartamāne tathā raudre saṃgrāme bharatarṣabha | ubhayoḥ senayoḥ śūrā nāmṛṣyanta parasparam
हे भरतश्रेष्ठ! जब वह भयंकर संग्राम इस प्रकार चल रहा था, तब दोनों सेनाओं के शूरवीर एक-दूसरे को सहन नहीं कर पा रहे थे।
श्लोक 95 (6.90.95)
आविष्टा इव युध्यन्ते रक्षोभूतैर्महाबलैः । तावकाः पाण्डवेयाश्च संरब्धास्तात धन्विनः ॥
āviṣṭā iva yudhyante rakṣobhūtairmahābalaiḥ | tāvakāḥ pāṇḍaveyāśca saṃrabdhāstāta dhanvinaḥ
तात! आपके और पाण्डवों के धनुर्धर योद्धा क्रोध में भरकर मानो महाबली राक्षसों से आविष्ट होकर लड़ रहे थे।
श्लोक 96 (6.90.96)
न स्म पश्यामहे कंचित्प्राणान्यः परिरक्षति । दैवासुराभे समरे तस्मिन्योधा नराधिप ॥
na sma paśyāmahe kaṃcitprāṇānyaḥ parirakṣati | daivāsurābhe samare tasminyodhā narādhipa
हे नरेश्वर! देवासुर-संग्राम के समान उस युद्ध में हमें एक भी ऐसा योद्धा दिखाई नहीं दिया जो अपने प्राण बचाने का प्रयत्न कर रहा हो।