भीष्म पर्व · अध्याय 89
धृतराष्ट्र का विलाप और मध्याह्न का संहार
युद्ध के आठवें दिन धृतराष्ट्र विलाप करते हैं कि उनके पुत्र दिन-प्रतिदिन भीम के हाथों मारे जा रहे हैं, और इसका दोष दुर्योधन को देते हैं, जिसने विदुर, भीष्म, द्रोण और गान्धारी की सलाह नहीं सुनी। सञ्जय बताते हैं कि मध्याह्न में युधिष्ठिर की आज्ञा से पाण्डव-सेना तीन भागों में बँटकर आगे बढ़ी और उसका अधिकांश भीष्म पर टूट पड़ा: द्रोण ने सृञ्जयों और सोमकों का संहार किया, भीम ने गजसेना को, नकुल-सहदेव ने अश्वसेना को नष्ट किया और अर्जुन ने राजाओं का वध किया, यहाँ तक कि रणभूमि गिरे हुए योद्धाओं और साज-सामान से वसन्त में फूलों से ढकी धरती-सी दिखने लगी। दोनों सेनाओं की भारी हानि हुई।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.89.1)
दृष्ट्वा मे निहतान्पुत्रान्बहूनेकेन सञ्जय । भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव किमकुर्वत संयुगे ॥
dṛṣṭvā me nihatānputrānbahūnekena sañjaya | bhīṣmo droṇaḥ kṛpaścaiva kimakurvata saṃyuge
"सञ्जय! एक ही व्यक्ति के हाथों मेरे बहुत-से पुत्रों को मारा गया देखकर भीष्म, द्रोण और कृप ने युद्ध में क्या किया?
श्लोक 2 (6.89.2)
अहन्यहनि मे पुत्राः क्षयं गच्छन्ति सञ्जय । मन्येऽहं सर्वथा पुत्रान्दैवेनोपहतान्भृशम् ॥
ahanyahani me putrāḥ kṣayaṃ gacchanti sañjaya | manye'haṃ sarvathā putrāndaivenopahatānbhṛśam
सञ्जय! दिन-प्रतिदिन मेरे पुत्र विनाश को प्राप्त हो रहे हैं। मैं समझता हूँ कि दैव ने मेरे पुत्रों को सब प्रकार से बुरी तरह मार दिया है,
श्लोक 3 (6.89.3)
यत्र मे तनयाः सर्वे जीयन्ते न जयन्त्युत । यत्र भीष्मस्य द्रोणस्य कृपस्य च महात्मनः ॥
yatra me tanayāḥ sarve jīyante na jayantyuta | yatra bhīṣmasya droṇasya kṛpasya ca mahātmanaḥ
क्योंकि मेरे सभी पुत्र हारते ही जा रहे हैं, जीत नहीं पाते, जबकि वहाँ भीष्म, द्रोण और महात्मा कृप हैं,
श्लोक 4 (6.89.4)
सौमदत्तेश्च वीरस्य भगदत्तस्य चोभयोः । अश्वत्थाम्नस्तथा तात शूराणामनिवर्तिनाम् ॥
saumadatteśca vīrasya bhagadattasya cobhayoḥ | aśvatthāmnastathā tāta śūrāṇāmanivartinām
और वीर सोमदत्तपुत्र (भूरिश्रवा) और भगदत्त, ये दोनों, तथा हे तात, अश्वत्थामा भी, जो कभी पीठ न दिखाने वाले शूरवीर हैं;
श्लोक 5 (6.89.5)
अन्येषां चैव शूराणां मध्यगास्तनया मम । यदहन्यन्त संग्रामे किमन्यद्भागधेयतः ॥
anyeṣāṃ caiva śūrāṇāṃ madhyagāstanayā mama | yadahanyanta saṃgrāme kimanyadbhāgadheyataḥ
उनके और दूसरे शूरवीरों के बीच रहते हुए भी मेरे पुत्र संग्राम में मारे गए; यह भाग्य के सिवा और क्या है?
श्लोक 6 (6.89.6)
न हि दुर्योधनो मन्दः पुरा प्रोक्तमबुध्यत । वार्यमाणो मया तात भीष्मेण विदुरेण च ॥
na hi duryodhano mandaḥ purā proktamabudhyata | vāryamāṇo mayā tāta bhīṣmeṇa vidureṇa ca
मन्दबुद्धि दुर्योधन ने पहले कही गई बात पर ध्यान नहीं दिया, यद्यपि हे तात, मैंने, भीष्म ने और विदुर ने उसे रोका था,
श्लोक 7 (6.89.7)
गान्धार्या चैव दुर्मेधाः सततं हितकाम्यया । नाबुध्यत पुरा मोहात्तस्य प्राप्तमिदं फलम् ॥
gāndhāryā caiva durmedhāḥ satataṃ hitakāmyayā | nābudhyata purā mohāttasya prāptamidaṃ phalam
और गान्धारी ने भी सदा उसके हित की कामना से उसे रोका था। उस दुर्बुद्धि ने मोहवश तब यह बात नहीं समझी; उसी का यह फल मिला है
श्लोक 8 (6.89.8)
यद्भीमसेनः समरे पुत्रान्मम विचेतसः । अहन्यहनि संक्रुद्धो नयते यमसादनम् ॥
yadbhīmasenaḥ samare putrānmama vicetasaḥ | ahanyahani saṃkruddho nayate yamasādanam
कि भीमसेन क्रोध में भरकर दिन-प्रतिदिन युद्ध में मेरे हतबुद्धि पुत्रों को यमलोक भेज रहा है।
श्लोक 9 (6.89.9)
इदं तत्समनुप्राप्तं क्षत्तुर्वचनमुत्तमम् । न बुद्धवानस्मि विभो प्रोच्यमानमिदं तदा ॥
idaṃ tatsamanuprāptaṃ kṣatturvacanamuttamam | na buddhavānasmi vibho procyamānamidaṃ tadā
क्षत्ता (विदुर) की वह उत्तम बात आज सामने आ गई है। हे प्रभो, उस समय कही जाने पर भी मैंने उसे नहीं समझा था:
श्लोक 10 (6.89.10)
निवारय सुतं द्यूतात्पाण्डवान्मा द्रुहेति च । सुहृदां हितकामानां ब्रुवतां तत्तदेव च ॥
nivāraya sutaṃ dyūtātpāṇḍavānmā druheti ca | suhṛdāṃ hitakāmānāṃ bruvatāṃ tattadeva ca
'अपने पुत्र को जुए से रोको और पाण्डवों से द्रोह मत करो।' मेरा हित चाहने वाले सुहृद् भी बार-बार मुझसे यही बात कहते रहे।
श्लोक 11 (6.89.11)
न शृणोमि पुरा वाक्यं मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् । तदिदं समनुप्राप्तं वचनं साधु भाषितम् ॥
na śṛṇomi purā vākyaṃ martyaḥ pathyamivauṣadham | tadidaṃ samanuprāptaṃ vacanaṃ sādhu bhāṣitam
जैसे मरणासन्न मनुष्य पथ्य औषधि नहीं लेता, वैसे ही मैंने तब उनकी बात नहीं सुनी। अब वही भली-भाँति कही गई बात सच होकर सामने आ गई है।
श्लोक 12 (6.89.12)
विदुरद्रोणभीष्माणां तथाऽन्येषां हितैषिणाम् । अकृत्वा वचनं पथ्यं क्षयं गच्छन्ति कौरवाः ॥
viduradroṇabhīṣmāṇāṃ tathā'nyeṣāṃ hitaiṣiṇām | akṛtvā vacanaṃ pathyaṃ kṣayaṃ gacchanti kauravāḥ
विदुर, द्रोण, भीष्म तथा अन्य हितैषियों की पथ्य सलाह पर न चलने के कारण कौरव विनाश को प्राप्त हो रहे हैं।
श्लोक 13 (6.89.13)
तदेतत्समतिक्रान्तं पूर्वमेव हि सञ्जय । तस्मान्मे वद तत्त्वेन यथा युद्धमवर्तत ॥
tadetatsamatikrāntaṃ pūrvameva hi sañjaya | tasmānme vada tattvena yathā yuddhamavartata
किन्तु सञ्जय, वह सब तो पहले ही बीत चुका है। इसलिए मुझे ठीक-ठीक बताओ कि युद्ध किस प्रकार हुआ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 14 (6.89.14)
मध्याह्ने सुमहारौद्रः संग्रामः समपद्यत । लोकक्षयकरो राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥
madhyāhne sumahāraudraḥ saṃgrāmaḥ samapadyata | lokakṣayakaro rājaṃstanme nigadataḥ śṛṇu
राजन्! मध्याह्न के समय लोकों का विनाश करने वाला अत्यन्त भयंकर संग्राम छिड़ गया। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिए।
श्लोक 15 (6.89.15)
ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् । संरब्धान्यभ्यवर्तन्त भीष्ममेव जिघांसया ॥
tataḥ sarvāṇi sainyāni dharmaputrasya śāsanāt | saṃrabdhānyabhyavartanta bhīṣmameva jighāṃsayā
तब धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) की आज्ञा से सारी सेनाएँ क्रोध में भरकर केवल भीष्म को मार डालने की इच्छा से आगे बढ़ीं।
श्लोक 16 (6.89.16)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः । युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca sātyakiśca mahārathaḥ | yuktānīkā mahārāja bhīṣmameva samabhyayuḥ
महाराज! धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और महारथी सात्यकि अपनी-अपनी सेनाओं को साथ लेकर सीधे भीष्म पर ही चढ़ आए।
श्लोक 17 (6.89.17)
विराटो द्रुपदश्चैव सहिताः सर्वसोमकैः । अभ्यद्रवन्त संग्रामे भीष्ममेव महारथम् ॥
virāṭo drupadaścaiva sahitāḥ sarvasomakaiḥ | abhyadravanta saṃgrāme bhīṣmameva mahāratham
विराट और द्रुपद समस्त सोमकों के साथ संग्राम में महारथी भीष्म पर ही चढ़ दौड़े।
श्लोक 18 (6.89.18)
केकया धृष्टकेतुश्च कुन्तिभोजश्च दंशितः । युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ॥
kekayā dhṛṣṭaketuśca kuntibhojaśca daṃśitaḥ | yuktānīkā mahārāja bhīṣmameva samabhyayuḥ
महाराज! केकय, धृष्टकेतु और कवचधारी कुन्तिभोज भी अपनी सेनाओं को साथ लेकर सीधे भीष्म पर ही चढ़ आए।
श्लोक 19 (6.89.19)
अर्जुनो द्रौपदश्चैव चेकितानश्च संयुगे । दुर्योधनसमादिष्टान्राज्ञः सर्वान्समभ्ययुः ॥
arjuno draupadaścaiva cekitānaśca saṃyuge | duryodhanasamādiṣṭānrājñaḥ sarvānsamabhyayuḥ
अर्जुन, द्रुपदपुत्र और चेकितान ने युद्ध में दुर्योधन द्वारा आगे भेजे गए सब राजाओं पर आक्रमण किया।
श्लोक 20 (6.89.20)
अभिमन्युस्तथा शूरो हैडिम्बश्च महारथः । भीमसेनश्च संक्रुद्धस्तेऽभ्यधावन्त कौरवान् ॥
abhimanyustathā śūro haiḍimbaśca mahārathaḥ | bhīmasenaśca saṃkruddhaste'bhyadhāvanta kauravān
वीर अभिमन्यु, हिडिम्बा का महारथी पुत्र (घटोत्कच) और क्रोध से भरे भीमसेन, ये कौरवों पर टूट पड़े।
श्लोक 21 (6.89.21)
त्रिधाभूतैरवध्यन्त पाण्डवैः कौरवा युधि । तथैव कौरवै राजन्नवध्यन्त परे रणे ॥
tridhābhūtairavadhyanta pāṇḍavaiḥ kauravā yudhi | tathaiva kauravai rājannavadhyanta pare raṇe
इस प्रकार तीन भागों में बँटे पाण्डव युद्ध में कौरवों को मारने लगे; और राजन्, उसी प्रकार कौरव भी रण में शत्रुओं को मारने लगे।
श्लोक 22 (6.89.22)
द्रोणस्तु रथिनां श्रेष्ठः सोमकान्सृञ्जयैः सह । अभ्यधावत संक्रुद्धः प्रेषयिष्यन्यमक्षयम् ॥
droṇastu rathināṃ śreṣṭhaḥ somakānsṛñjayaiḥ saha | abhyadhāvata saṃkruddhaḥ preṣayiṣyanyamakṣayam
रथियों में श्रेष्ठ द्रोण क्रोध में भरकर सृञ्जयों सहित सोमकों पर उन्हें यमलोक भेजने के लिए टूट पड़े।
श्लोक 23 (6.89.23)
तत्राक्रन्दो महानासीत्सृञ्जयानां महात्मानाम् । वध्यतां समरे राजन्भारद्वाजेन धन्विना ॥
tatrākrando mahānāsītsṛñjayānāṃ mahātmānām | vadhyatāṃ samare rājanbhāradvājena dhanvinā
राजन्! भरद्वाजपुत्र धनुर्धर द्रोण द्वारा संग्राम में मारे जा रहे महामना सृञ्जयों का वहाँ भारी आर्तनाद होने लगा।
श्लोक 24 (6.89.24)
द्रोणेन निहतास्तत्र क्षत्रिया बहवो रणे । विचेष्टन्तो व्यदृश्यन्त व्याधिक्लिष्टा नरा इव ॥
droṇena nihatāstatra kṣatriyā bahavo raṇe | viceṣṭanto vyadṛśyanta vyādhikliṣṭā narā iva
वहाँ रण में द्रोण द्वारा मारे गए बहुत-से क्षत्रिय रोग से पीड़ित मनुष्यों की भाँति छटपटाते दिखाई देते थे।
श्लोक 25 (6.89.25)
कूजतां क्रन्दतां चैव स्तनतां चैव भारत । अनिशं शुश्रुवे शब्दः क्षुत्क्लिष्टानां नृणामिव ॥
kūjatāṃ krandatāṃ caiva stanatāṃ caiva bhārata | aniśaṃ śuśruve śabdaḥ kṣutkliṣṭānāṃ nṛṇāmiva
हे भारत! कराहते, चीखते और आर्तनाद करते उन योद्धाओं का शब्द भूख से पीड़ित मनुष्यों के समान निरन्तर सुनाई देता था।
श्लोक 26 (6.89.26)
तथैव कौरवेयाणां भीमसेनो महाबलः । चकार कदनं घोरं क्रुद्धः काल इवापरः ॥
tathaiva kauraveyāṇāṃ bhīmaseno mahābalaḥ | cakāra kadanaṃ ghoraṃ kruddhaḥ kāla ivāparaḥ
उसी प्रकार महाबली भीमसेन ने क्रोध में भरकर दूसरे काल के समान कौरवों का भयंकर संहार किया।
श्लोक 27 (6.89.27)
वध्यतां तत्र सैन्यानामन्योन्येन महारणे । प्रावर्तत नदी घोरा रुधिरौघप्रवाहिनी ॥
vadhyatāṃ tatra sainyānāmanyonyena mahāraṇe | prāvartata nadī ghorā rudhiraughapravāhinī
उस महायुद्ध में जब सेनाएँ एक-दूसरे का संहार कर रही थीं, तब रक्त की धारा बहाने वाली एक भयंकर नदी बह चली।
श्लोक 28 (6.89.28)
स संग्रामो महाराज घोररूपोऽभवन्महान् । कुरूणां पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥
sa saṃgrāmo mahārāja ghorarūpo'bhavanmahān | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yamarāṣṭravivardhanaḥ
महाराज! कौरवों और पाण्डवों का वह महासंग्राम अत्यन्त भयंकर रूप ले बैठा, जो यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला था।
श्लोक 29 (6.89.29)
ततो भीमो रणे क्रुद्धो रभसश्च विशेषतः । गजानीकं समासाद्य प्रेषयामास मृत्यवे ॥
tato bhīmo raṇe kruddho rabhasaśca viśeṣataḥ | gajānīkaṃ samāsādya preṣayāmāsa mṛtyave
तब रण में क्रुद्ध और विशेष रूप से वेगवान भीम ने गजसेना पर आक्रमण करके उसे मृत्यु के पास भेज दिया।
श्लोक 30 (6.89.30)
तत्र भारत भीमेन नाराचाभिहता गजाः । पेतुर्नेदुश्च सेदुश्च दिशश्च परिबभ्रमुः ॥
tatra bhārata bhīmena nārācābhihatā gajāḥ | peturneduśca seduśca diśaśca paribabhramuḥ
हे भारत! वहाँ भीम के नाराचों से आहत हाथी गिर पड़े, चिंघाड़ने लगे, शिथिल होकर बैठ गए और सब दिशाओं में भटकने लगे।
श्लोक 31 (6.89.31)
छिन्नहस्ता महानागाश्छिन्नगात्राश्च मारिष । क्रौञ्चवद्व्यनदन्भीताः पृथिवीमधिशेरते ॥
chinnahastā mahānāgāśchinnagātrāśca māriṣa | krauñcavadvyanadanbhītāḥ pṛthivīmadhiśerate
हे मान्यवर! सूँड़ें और अंग कट जाने पर बड़े-बड़े हाथी भयभीत होकर क्रौञ्च पक्षियों की भाँति चीखते हुए धरती पर लेट गए।
श्लोक 32 (6.89.32)
नकुलः सहदेवश्च हयानीकमभिद्रुतौ । ते हयाः काञ्चनापीडा रुक्मभाण्डपरिच्छदाः ॥
nakulaḥ sahadevaśca hayānīkamabhidrutau | te hayāḥ kāñcanāpīḍā rukmabhāṇḍaparicchadāḥ
नकुल और सहदेव ने अश्वसेना पर धावा बोला। सोने की कलगियों और स्वर्णमय साज-सज्जा वाले वे घोड़े
श्लोक 33 (6.89.33)
वध्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः । पतद्भिस्तुरगै राजन्समास्तीर्यत मेदिनी ॥
vadhyamānā vyadṛśyanta śataśo'tha sahasraśaḥ | patadbhisturagai rājansamāstīryata medinī
सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में मारे जाते दिखाई दिए। राजन्! गिरते हुए घोड़ों से धरती पट गई।
श्लोक 34 (6.89.34)
निर्जिह्वैश्च श्वसद्भिश्च कूजद्भिश्च गतासुभिः । हयैर्बभौ नरश्रेष्ठ नानारूपधरैर्धरा ॥
nirjihvaiśca śvasadbhiśca kūjadbhiśca gatāsubhiḥ | hayairbabhau naraśreṣṭha nānārūpadharairdharā
हे नरश्रेष्ठ! जीभ बाहर निकाले, हाँफते, कराहते और प्राणहीन घोड़ों से वह धरती अनेक रूपों वाली-सी दिखने लगी।
श्लोक 35 (6.89.35)
अर्जुनेन हतैः सङ्ख्ये तथा भारत राजभिः । प्रबभौ वसुधा घोरा तत्रतत्र विशांपते ॥
arjunena hataiḥ saṅkhye tathā bhārata rājabhiḥ | prababhau vasudhā ghorā tatratatra viśāṃpate
हे भारत! इसी प्रकार अर्जुन द्वारा युद्ध में मारे गए राजाओं से, हे प्रजानाथ, वह भूमि जहाँ-तहाँ भयंकर दिखाई देने लगी।
श्लोक 36 (6.89.36)
रथैर्भग्नैर्ध्वजैश्छिन्नैर्निकृत्तैश्च महायुधैः । चामरैर्व्यजनैश्चैव च्छत्रैश्च सुमहाप्रभैः ॥
rathairbhagnairdhvajaiśchinnairnikṛttaiśca mahāyudhaiḥ | cāmarairvyajanaiścaiva cchatraiśca sumahāprabhaiḥ
टूटे हुए रथों, कटी हुई ध्वजाओं और खण्डित बड़े-बड़े आयुधों से, चँवरों, पंखों और अत्यन्त प्रभा वाले छत्रों से,
श्लोक 37 (6.89.37)
हारैर्निष्कैः सकेयूरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । उष्णीषैरपविद्धैश्च पताकाभिश्च सर्वशः ॥
hārairniṣkaiḥ sakeyūraiḥ śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | uṣṇīṣairapaviddhaiśca patākābhiśca sarvaśaḥ
हारों, निष्कों (सोने के कण्ठहारों) और बाजूबंदों से, कुण्डलों सहित सिरों से, इधर-उधर गिरी पगड़ियों और सब ओर पड़ी पताकाओं से,
श्लोक 38 (6.89.38)
अनुकर्षैः शुभै राजन्योक्त्रैश्चैव सरश्मिभिः । संकीर्णा वसुधा भाति वसन्ते कुसुमैरिव ॥
anukarṣaiḥ śubhai rājanyoktraiścaiva saraśmibhiḥ | saṃkīrṇā vasudhā bhāti vasante kusumairiva
राजन्! सुन्दर अनुकर्षों (रथ के निचले काष्ठ), जुए की रस्सियों और लगामों से भरी हुई वह भूमि वसन्त में फूलों से ढकी धरती के समान शोभा पा रही थी।
श्लोक 39 (6.89.39)
एवमेष क्षयो वृत्तः पाण्डूनामपि भारत । क्रुद्धे शान्तनवे भीष्मे द्रोणे च रथसत्तमे ॥
evameṣa kṣayo vṛttaḥ pāṇḍūnāmapi bhārata | kruddhe śāntanave bhīṣme droṇe ca rathasattame
हे भारत! इस प्रकार जब शान्तनुनन्दन भीष्म और रथियों में श्रेष्ठ द्रोण क्रुद्ध थे, तब पाण्डवों का भी यह संहार हुआ,
श्लोक 40 (6.89.40)
अश्वत्थाम्नि कृपे चैव तथैव कृतवर्मणि । तथेतरेषु क्रुद्धेषु तावकानामपि क्षयः ॥
aśvatthāmni kṛpe caiva tathaiva kṛtavarmaṇi | tathetareṣu kruddheṣu tāvakānāmapi kṣayaḥ
तथा अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा भी क्रुद्ध थे; और जब दूसरे पक्ष के योद्धा क्रुद्ध हुए, तब आपके सैनिकों का भी विनाश हुआ।