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भीष्म पर्व · अध्याय 88

भीम द्वारा धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध

आठवें दिन भीष्म पाञ्चालों, सोमकों और सृञ्जयों को तपाते हैं और केवल भीम उनके सामने टिकते हैं। भीम भीष्म के सारथि को मारकर सुनाभ का सिर काट डालते हैं, और जब दुर्योधन के सात और भाई उन पर टूट पड़ते हैं तो वे एक-एक करके अपराजित, कुण्डधार, पण्डितक, विशालाक्ष, महोदर, आदित्यकेतु और बह्वाशी को मार गिराते हैं। सञ्जय धृतराष्ट्र को विदुर की अनसुनी चेतावनियों की याद दिलाते हैं; दुर्योधन भीष्म से शिकायत करता है कि वे तटस्थ खड़े रहते हैं और उसके भाई मरते जा रहे हैं, और भीष्म आँसू भरकर याद दिलाते हैं कि उन्होंने, द्रोण, विदुर और गान्धारी ने यह सब पहले ही कहा था, तथा उसे स्वर्ग को लक्ष्य मानकर युद्ध करते रहने को कहते हैं।

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.88.1)

भीष्मं तु समरे क्रुद्धं प्रतपन्तं समन्ततः । न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं तपन्तमिव भास्करम् ॥

bhīṣmaṃ tu samare kruddhaṃ pratapantaṃ samantataḥ | na śekuḥ pāṇḍavā draṣṭuṃ tapantamiva bhāskaram

जब भीष्म युद्ध में क्रोधित होकर चारों ओर (शत्रुओं को) तपा रहे थे, तब पाण्डव तपते सूर्य के समान उनकी ओर देख भी न सके।

श्लोक 2 (6.88.2)

ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् । अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं मर्दयन्तं शितैः शरैः ॥

tataḥ sarvāṇi sainyāni dharmaputrasya śāsanāt | abhyadravanta gāṅgeyaṃ mardayantaṃ śitaiḥ śaraiḥ

तब धर्मपुत्र की आज्ञा से सारी सेनाएँ पैने बाणों से उन्हें रौंदते हुए गङ्गापुत्र पर टूट पड़ीं।

श्लोक 3 (6.88.3)

स तु भीष्मो रणश्लाघी सोमकान्सहसृञ्जयान् । पाञ्चालांश्च महेष्वासान्पातयामास सायकैः ॥

sa tu bhīṣmo raṇaślāghī somakānsahasṛñjayān | pāñcālāṃśca maheṣvāsānpātayāmāsa sāyakaiḥ

किन्तु युद्ध में गौरव पाने वाले भीष्म ने सृञ्जयों सहित सोमकों को और महाधनुर्धर पाञ्चालों को बाणों से मार गिराया।

श्लोक 4 (6.88.4)

ते वध्यमाना भीष्मेण पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । भीष्ममेवाभ्ययुस्तूर्णं त्यक्त्वा मृत्युकृतं भयम् ॥

te vadhyamānā bhīṣmeṇa pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | bhīṣmamevābhyayustūrṇaṃ tyaktvā mṛtyukṛtaṃ bhayam

भीष्म द्वारा मारे जाते हुए भी पाञ्चाल, पाण्डवों के साथ, मृत्यु का भय त्यागकर शीघ्र भीष्म पर ही चढ़ आए।

श्लोक 5 (6.88.5)

स तेषां रथिनां वीरो भीष्मः शान्तनवो युधि । चिच्छेद सहसा राजन्बाहूनथ शिरांसि च ॥

sa teṣāṃ rathināṃ vīro bhīṣmaḥ śāntanavo yudhi | ciccheda sahasā rājanbāhūnatha śirāṃsi ca

हे राजन्, वीर शान्तनुनन्दन भीष्म ने युद्ध में उन रथियों की भुजाएँ और सिर सहसा काट डाले।

श्लोक 6 (6.88.6)

विरथान्रथिनश्चक्रे पिता देवव्रतस्तव । पतितान्युत्तमाङ्गानि हयेभ्यो हयसादिनाम् ॥

virathānrathinaścakre pitā devavratastava | patitānyuttamāṅgāni hayebhyo hayasādinām

आपके पितृतुल्य देवव्रत ने रथियों को रथहीन कर दिया; घुड़सवारों के सिर घोड़ों से गिर पड़े।

श्लोक 7 (6.88.7)

निर्मनुष्यांश्च मातङ्गाञ्शयानान्पर्वतोपमान् । अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमाथितान् ॥

nirmanuṣyāṃśca mātaṅgāñśayānānparvatopamān | apaśyāma mahārāja bhīṣmāstreṇa pramāthitān

हे महाराज, हमने भीष्म के अस्त्र से कुचले गए, सवारों से रहित, पर्वतों के समान पड़े हाथियों को देखा।

श्लोक 8 (6.88.8)

न तत्रासीत्पुमान्कश्चित्पाण्डवानां विशांपते । अन्यत्र रथिनां श्रेष्ठाद्भीमसेनान्महाबलात् ॥

na tatrāsītpumānkaścitpāṇḍavānāṃ viśāṃpate | anyatra rathināṃ śreṣṭhādbhīmasenānmahābalāt

हे प्रजानाथ, पाण्डवों की ओर से वहाँ (उनके सामने टिकने वाला) कोई पुरुष न था, सिवाय रथियों में श्रेष्ठ महाबली भीमसेन के।

श्लोक 9 (6.88.9)

स हि भीष्मं समासाद्य छादयामास सायकैः । ततो निष्टानको घोरो भीष्मभीमसमागमे ॥

sa hi bhīṣmaṃ samāsādya chādayāmāsa sāyakaiḥ | tato niṣṭānako ghoro bhīṣmabhīmasamāgame

उन्होंने भीष्म के पास पहुँचकर उन्हें बाणों से ढक दिया। तब भीष्म और भीम के भिड़ने पर

श्लोक 10 (6.88.10)

बभूव सर्वसैन्यानां घोररूपो भयानकः । तथैव पाण्डवा हृष्टाः सिंहनादमथानदन् ॥

babhūva sarvasainyānāṃ ghorarūpo bhayānakaḥ | tathaiva pāṇḍavā hṛṣṭāḥ siṃhanādamathānadan

सब सेनाओं में भयानक और डरावना कोलाहल मच गया; और पाण्डव हर्षित होकर सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 11 (6.88.11)

ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः । भीष्मं जुगोप समरे वर्तमाने जनक्षये ॥

tato duryodhano rājā sodaryaiḥ parivāritaḥ | bhīṣmaṃ jugopa samare vartamāne janakṣaye

तब राजा दुर्योधन ने अपने सगे भाइयों से घिरे रहकर, उस जनसंहार के बीच, युद्ध में भीष्म की रक्षा की।

श्लोक 12 (6.88.12)

भीमस्तु सारथिं हत्वा भीष्मस्य रथिनां वरः । प्रद्रुताश्वे रथे तस्मिन्द्रवमाणे समन्ततः ॥

bhīmastu sārathiṃ hatvā bhīṣmasya rathināṃ varaḥ | pradrutāśve rathe tasmindravamāṇe samantataḥ

किन्तु रथियों में श्रेष्ठ भीम ने भीष्म के सारथि को मार डाला; और जब घोड़ों के भाग खड़े होने से वह रथ चारों ओर दौड़ने लगा,

श्लोक 13 (6.88.13)

सुनाभस्य शरेणाशु शिरश्चिच्छेद भारत । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद्भुवि ॥

sunābhasya śareṇāśu śiraściccheda bhārata | kṣurapreṇa sutīkṣṇena sa hato nyapatadbhuvi

तब हे भारत, उन्होंने बाण से, अत्यन्त तीक्ष्ण क्षुरप्र से, तुरन्त सुनाभ का सिर काट डाला; वह मरकर धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 14 (6.88.14)

हते तस्मिन्महाराज तव पुत्रे महारथे । नामृष्यन्त रणे शूराः सोदराः सप्त संयुगे ॥

hate tasminmahārāja tava putre mahārathe | nāmṛṣyanta raṇe śūrāḥ sodarāḥ sapta saṃyuge

हे महाराज, आपके उस महारथी पुत्र के मारे जाने पर उसके सात शूरवीर सगे भाई रण में यह सह न सके —

श्लोक 15 (6.88.15)

आदित्यकेतुर्बह्वाशी कुण्डधारो महोदरः । अपराजितः पण्डितको विशालाक्षः सुदुर्जयः ॥

ādityaketurbahvāśī kuṇḍadhāro mahodaraḥ | aparājitaḥ paṇḍitako viśālākṣaḥ sudurjayaḥ

आदित्यकेतु, बह्वाशी, कुण्डधार, महोदर, अपराजित, पण्डितक और दुर्जय विशालाक्ष।

श्लोक 16 (6.88.16)

पाण्डवं चित्रसन्नाहा विचित्रकवचध्वजाः । अभ्यद्रवन्त संग्रामे योद्धुकामारिमर्दनाः ॥

pāṇḍavaṃ citrasannāhā vicitrakavacadhvajāḥ | abhyadravanta saṃgrāme yoddhukāmārimardanāḥ

रंग-बिरंगे कवच, विचित्र वर्म और ध्वजाओं वाले वे शत्रुमर्दन युद्ध की इच्छा से रण में पाण्डुपुत्र (भीम) पर टूट पड़े।

श्लोक 17 (6.88.17)

महोदरस्तु समरे भीमं विव्याध पत्रिभिः । नवभिर्वज्रसंकाशैर्नमुचिं वृत्रहा यथा ॥

mahodarastu samare bhīmaṃ vivyādha patribhiḥ | navabhirvajrasaṃkāśairnamuciṃ vṛtrahā yathā

महोदर ने युद्ध में वज्र के समान नौ बाणों से भीम को वैसे बींधा जैसे वृत्रहन्ता इन्द्र ने नमुचि को।

श्लोक 18 (6.88.18)

आदित्यकेतुः सप्तत्या बह्वाशी चापि पञ्चभिः । नवत्या कुण्डधारश्च विशालाक्षश्च पञ्चभिः ॥

ādityaketuḥ saptatyā bahvāśī cāpi pañcabhiḥ | navatyā kuṇḍadhāraśca viśālākṣaśca pañcabhiḥ

आदित्यकेतु ने सत्तर, बह्वाशी ने पाँच, कुण्डधार ने नब्बे और विशालाक्ष ने पाँच बाणों से उन्हें बींधा।

श्लोक 19 (6.88.19)

अपराजितो महाराज पराजिष्णुर्महारथम् । शरैर्बहुभिरानर्च्छद्भीमसेनं महाबलम् ॥

aparājito mahārāja parājiṣṇurmahāratham | śarairbahubhirānarcchadbhīmasenaṃ mahābalam

हे महाराज, विजय के इच्छुक अपराजित ने महाबली महारथी भीमसेन को बहुत-से बाणों से घायल किया।

श्लोक 20 (6.88.20)

रणे पण्डितकश्चैनं त्रिभिर्बाणैः समार्पयत् । स तं न ममृषे भीमः शत्रुभिर्वधमाहवे ॥

raṇe paṇḍitakaścainaṃ tribhirbāṇaiḥ samārpayat | sa taṃ na mamṛṣe bhīmaḥ śatrubhirvadhamāhave

और पण्डितक ने रण में उन्हें तीन बाण मारे। भीम युद्ध में शत्रुओं के इस प्रहार को सह न सके।

श्लोक 21 (6.88.21)

धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः । शिरश्चिच्छेद समरे शरेणानतपर्वणा ॥

dhanuḥ prapīḍya vāmena kareṇāmitrakarśanaḥ | śiraściccheda samare śareṇānataparvaṇā

शत्रुओं को सताने वाले भीम ने बाएँ हाथ से धनुष दबाकर, झुकी गाँठों वाले बाण से युद्ध में (अपराजित का) सिर काट डाला।

श्लोक 22 (6.88.22)

अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संयुगे । पराजितस्य भीमेन कृत्तं गामपतच्छिरः ॥

aparājitasya sunasaṃ tava putrasya saṃyuge | parājitasya bhīmena kṛttaṃ gāmapatacchiraḥ

भीम द्वारा युद्ध में पराजित आपके पुत्र अपराजित का सुन्दर नासिका वाला सिर कटकर धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 23 (6.88.23)

अथापरेण भल्लेन कुण्डधारं महारथम् । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय सर्वलोकस्य पश्यतः ॥

athāpareṇa bhallena kuṇḍadhāraṃ mahāratham | prāhiṇonmṛtyulokāya sarvalokasya paśyataḥ

फिर दूसरे भल्ल बाण से उन्होंने सारे संसार के देखते-देखते महारथी कुण्डधार को मृत्युलोक भेज दिया।

श्लोक 24 (6.88.24)

ततः पुनरमेयात्मा प्रसंधाय शिलीमुखम् । प्रेषयामास समरे पण्डितं प्रति भारत ॥

tataḥ punarameyātmā prasaṃdhāya śilīmukham | preṣayāmāsa samare paṇḍitaṃ prati bhārata

हे भारत, तब अपार आत्मबल वाले भीम ने फिर एक बाण चढ़ाकर युद्ध में पण्डितक की ओर छोड़ा।

श्लोक 25 (6.88.25)

स शरः पण्डितं हत्वा विवेश धरणीतलम् । यथा नरं निहत्याशु भुजगः कालचोदितः ॥

sa śaraḥ paṇḍitaṃ hatvā viveśa dharaṇītalam | yathā naraṃ nihatyāśu bhujagaḥ kālacoditaḥ

वह बाण पण्डितक को मारकर धरती में समा गया, जैसे कालप्रेरित सर्प किसी मनुष्य को शीघ्र डसकर धरती में घुस जाता है।

श्लोक 26 (6.88.26)

विशालाक्षशिरश्छित्त्वा पातयामास भूतले । त्रिभिः शरैरदीनात्मा स्मरन्क्लेशं पुरातनम् ॥

viśālākṣaśiraśchittvā pātayāmāsa bhūtale | tribhiḥ śarairadīnātmā smarankleśaṃ purātanam

पुराने क्लेशों को याद करते हुए उस अदम्य वीर ने तीन बाणों से विशालाक्ष का सिर काटकर धरती पर गिरा दिया।

श्लोक 27 (6.88.27)

महोदरं महेष्वासं नाराचेन स्तनान्तरे । विव्याध समरे राजन्स हतो न्यपतद्भुवि ॥

mahodaraṃ maheṣvāsaṃ nārācena stanāntare | vivyādha samare rājansa hato nyapatadbhuvi

हे राजन्, उन्होंने युद्ध में महाधनुर्धर महोदर की छाती के बीच नाराच मारा; वह मरकर धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 28 (6.88.28)

आदित्यकेतोः केतुं च च्छित्त्वा बाणेन संयुगे । भल्लेन भृशतीक्ष्णेन शिरश्चिच्छेद भारत ॥

ādityaketoḥ ketuṃ ca cchittvā bāṇena saṃyuge | bhallena bhṛśatīkṣṇena śiraściccheda bhārata

हे भारत, युद्ध में बाण से आदित्यकेतु का ध्वज काटकर उन्होंने अत्यन्त तीक्ष्ण भल्ल से उसका सिर काट डाला।

श्लोक 29 (6.88.29)

बह्वाशिनं ततो भीमः शरेणानतपर्वणा । प्रेषयामास संक्रुद्धो यमस्य सदनं प्रति ॥

bahvāśinaṃ tato bhīmaḥ śareṇānataparvaṇā | preṣayāmāsa saṃkruddho yamasya sadanaṃ prati

फिर क्रोधित भीम ने झुकी गाँठों वाले बाण से बह्वाशी को यमराज के घर भेज दिया।

श्लोक 30 (6.88.30)

प्रदुद्रुवुस्ततस्तेऽन्ये पुत्रास्तव विशांपते । मन्यमाना हि तत्सत्यं सभायां तस्य भाषितम् ॥

pradudruvustataste'nye putrāstava viśāṃpate | manyamānā hi tatsatyaṃ sabhāyāṃ tasya bhāṣitam

हे प्रजानाथ, तब आपके दूसरे पुत्र भाग खड़े हुए, यह मानते हुए कि सभा में कही गई उनकी बात सच्ची थी।

श्लोक 31 (6.88.31)

ततो दुर्योधनो राजा भ्रातृव्यसनकर्शितः । अब्रवीत्तावकान्योधान्भीमोऽयं वध्यतामिति ॥

tato duryodhano rājā bhrātṛvyasanakarśitaḥ | abravīttāvakānyodhānbhīmo'yaṃ vadhyatāmiti

तब भाइयों पर आई विपत्ति से दुःखी राजा दुर्योधन ने आपके योद्धाओं से कहा — "इस भीम को मार डालो!"

श्लोक 32 (6.88.32)

एवमेते महेष्वासाः पुत्रास्तव विशांपते । भ्रातॄन्संदृश्य निहतान्प्रस्मरंस्ते हि तद्वचः ॥

evamete maheṣvāsāḥ putrāstava viśāṃpate | bhrātṝnsaṃdṛśya nihatānprasmaraṃste hi tadvacaḥ

हे प्रजानाथ, इस प्रकार आपके ये महाधनुर्धर पुत्र अपने भाइयों को मरा देखकर वह वचन याद करने लगे

श्लोक 33 (6.88.33)

यदुक्तवान्महाप्राज्ञः क्षत्ता हितमनामयम् । तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दिव्यदर्शिनः ॥

yaduktavānmahāprājñaḥ kṣattā hitamanāmayam | tadidaṃ samanuprāptaṃ vacanaṃ divyadarśinaḥ

जो परम बुद्धिमान् क्षत्ता (विदुर) ने हितकारी और कल्याणकारी रूप में कहा था। दिव्यदृष्टि वाले का वह वचन अब सामने आ गया है।

श्लोक 34 (6.88.34)

लोभमोहसमाविष्टः पुत्रप्रीत्या जनाधिप । न बुध्यसे पुरा यत्तत्तथ्यमुक्तं वचो महत् ॥

lobhamohasamāviṣṭaḥ putraprītyā janādhipa | na budhyase purā yattattathyamuktaṃ vaco mahat

हे जनाधिप, लोभ और मोह से घिरे हुए आपने पुत्रप्रेम के कारण पहले कही गई उस सच्ची और महत्त्वपूर्ण बात को नहीं समझा।

श्लोक 35 (6.88.35)

तथैव च वधार्थाय पुत्राणां पाण्डवो बली । नूनं जातो महाबाहुर्यथा हन्ति स्म कौरवान् ॥

tathaiva ca vadhārthāya putrāṇāṃ pāṇḍavo balī | nūnaṃ jāto mahābāhuryathā hanti sma kauravān

निश्चय ही वह बलवान् महाबाहु पाण्डुपुत्र आपके पुत्रों के वध के लिए ही जन्मा है, जिस प्रकार वह कौरवों को मार रहा है।

श्लोक 36 (6.88.36)

ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममासाद्य संयुगे । दुःखेन महताऽऽविष्टो विललाप सुदुःखितः ॥

tato duryodhano rājā bhīṣmamāsādya saṃyuge | duḥkhena mahatā''viṣṭo vilalāpa suduḥkhitaḥ

तब बड़े दुःख से घिरा राजा दुर्योधन युद्ध में भीष्म के पास जाकर अत्यन्त दुखी होकर विलाप करने लगा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 37 (6.88.37)

निहता भ्रातरः शूरा भीमसेनेन मे युधि । यतमानास्तथान्येऽपि हन्यन्ते सर्वसैनिकाः ॥

nihatā bhrātaraḥ śūrā bhīmasenena me yudhi | yatamānāstathānye'pi hanyante sarvasainikāḥ

"भीमसेन ने युद्ध में मेरे शूरवीर भाइयों को मार डाला है, और दूसरे सब सैनिक भी प्रयत्न करते हुए मारे जा रहे हैं।

श्लोक 38 (6.88.38)

भवांश्च मध्यस्थतया नित्यमस्मानुपेक्षते । सोऽहं कुपथमारूढः पश्य दैवमिदं मम ॥

bhavāṃśca madhyasthatayā nityamasmānupekṣate | so'haṃ kupathamārūḍhaḥ paśya daivamidaṃ mama

और आप तटस्थ रहकर सदा हमारी उपेक्षा करते हैं। मैं कुमार्ग पर चढ़ बैठा हूँ — मेरा यह दुर्भाग्य देखिए!"

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (6.88.39)

एतच्छ्रुत्वा वचः क्रूरं पिता देवव्रतस्तव । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत्साश्रुलोचनः ॥

etacchrutvā vacaḥ krūraṃ pitā devavratastava | duryodhanamidaṃ vākyamabravītsāśrulocanaḥ

ये कठोर वचन सुनकर आपके पितृतुल्य देवव्रत ने आँखों में आँसू भरकर दुर्योधन से यह कहा —

भीष्म उवाच

श्लोक 40 (6.88.40)

उक्तमेतन्मया पूर्वं द्रोणेन विदुरेण च । गान्धार्या च यशस्विन्या तत्त्वं तात न बुद्धवान् ॥

uktametanmayā pūrvaṃ droṇena vidureṇa ca | gāndhāryā ca yaśasvinyā tattvaṃ tāta na buddhavān

"यह बात मैंने, द्रोण ने, विदुर ने और यशस्विनी गान्धारी ने पहले ही कही थी; पर पुत्र, तुमने उसे नहीं समझा।

श्लोक 41 (6.88.41)

समयश्च मया पूर्वं कृतो वै शत्रुकर्शन । नाहं युधि नियोक्तव्यो नाप्याचार्यः कथंचन ॥

samayaśca mayā pūrvaṃ kṛto vai śatrukarśana | nāhaṃ yudhi niyoktavyo nāpyācāryaḥ kathaṃcana

हे शत्रुसूदन, मैंने पहले ही यह शर्त रखी थी कि न मुझे और न आचार्य (द्रोण) को किसी प्रकार उनके विरुद्ध युद्ध में झोंका जाए।

श्लोक 42 (6.88.42)

यं यं हि धार्तराष्ट्राणां भीमो द्रक्ष्यति संयुगे । हनिष्यति रणे नित्यं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

yaṃ yaṃ hi dhārtarāṣṭrāṇāṃ bhīmo drakṣyati saṃyuge | haniṣyati raṇe nityaṃ satyametadbravīmi te

धृतराष्ट्र के पुत्रों में से जिस-जिस को भीम युद्ध में देखेगा, उसे वह रण में अवश्य मार डालेगा — यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।

श्लोक 43 (6.88.43)

स त्वं राजन्स्थिरो भूत्वा रणे कृत्वा दृढां मतिम् । योधयस्व रणे पार्थान्स्वर्गं कृत्वा परायणम् ॥

sa tvaṃ rājansthiro bhūtvā raṇe kṛtvā dṛḍhāṃ matim | yodhayasva raṇe pārthānsvargaṃ kṛtvā parāyaṇam

इसलिए हे राजन्, तुम स्थिर होकर, रण के लिए दृढ़ निश्चय करके, स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानकर पाण्डवों से युद्ध करो।

श्लोक 44 (6.88.44)

न शक्याः पाण्डवा जेतुं सेन्द्रैरपि सुरासुरैः । तस्माद्युद्धे स्थिरां कृत्वा मतिं युद्ध्यस्व भारत ॥

na śakyāḥ pāṇḍavā jetuṃ sendrairapi surāsuraiḥ | tasmādyuddhe sthirāṃ kṛtvā matiṃ yuddhyasva bhārata

पाण्डवों को इन्द्रसहित देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। इसलिए हे भारत, युद्ध के लिए मन को स्थिर करके लड़ो।"

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