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भीष्म पर्व · अध्याय 87

आठवाँ दिन: कूर्मव्यूह और शृङ्गाटक व्यूह

आठवें दिन प्रातः दोनों सेनाएँ फिर निकल पड़ती हैं। भीष्म कौरवों को समुद्र-से विशाल कूर्मव्यूह में सजाते हैं, जिसमें द्रोण, भगदत्त, बृहद्बल, त्रिगर्तराज, अश्वत्थामा, दुर्योधन और कृप क्रम से एक-दूसरे के पीछे चलते हैं; युधिष्ठिर के कहने पर धृष्टद्युम्न उत्तर में शृङ्गाटक व्यूह रचता है, जिसके सींगों पर भीम और सात्यकि तथा मध्य में अर्जुन हैं। योद्धाओं के एक-दूसरे को अपलक घूरने के बाद बाणों, शक्तियों, गदाओं और तलवारों से युद्ध छिड़ जाता है; हाथियों के दाँतों से आग निकलती है, और भीष्म पाण्डवों पर टूट पड़ते हैं जबकि धृष्टद्युम्न पाण्डव-रथों को उनके विरुद्ध ले जाता है।

अध्याय 86अध्याय-सूचीअध्याय 88

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.87.1)

परिणाम्य निशां तां तु सुखसुप्ता जनेश्वराः । कुरवः पाण्डवाश्चैव पुनर्युद्धाय निर्ययुः ॥

pariṇāmya niśāṃ tāṃ tu sukhasuptā janeśvarāḥ | kuravaḥ pāṇḍavāścaiva punaryuddhāya niryayuḥ

वह रात बीतने पर सुख से सोए हुए नरेश — कौरव और पाण्डव दोनों — फिर युद्ध के लिए निकल पड़े।

श्लोक 2 (6.87.2)

ततः शब्दो महानासीत्सेनयोरुभयोर्नृप । निर्गच्छमानयोः सङ्ख्ये यथा सागरयोरिव ॥

tataḥ śabdo mahānāsītsenayorubhayornṛpa | nirgacchamānayoḥ saṅkhye yathā sāgarayoriva

हे राजन्, तब युद्ध के लिए निकलती हुई दोनों सेनाओं का ऐसा महान् कोलाहल हुआ मानो दो समुद्र गरज रहे हों।

श्लोक 3 (6.87.3)

ततो दुर्योधनो राजा चित्रसेनो विविंशतिः । भीष्मश्च रथिनां श्रेष्ठो भारद्वाजश्च वै द्विजः ॥

tato duryodhano rājā citraseno viviṃśatiḥ | bhīṣmaśca rathināṃ śreṣṭho bhāradvājaśca vai dvijaḥ

तब राजा दुर्योधन, चित्रसेन, विविंशति, रथियों में श्रेष्ठ भीष्म और ब्राह्मण भरद्वाजपुत्र (द्रोण) —

श्लोक 4 (6.87.4)

एकीभूताः सुसंयत्ताः कौरवाणां महाचमूम् । व्यूहाय विदधू राजन्पाण्डवान्प्रतिदंशितान् ॥

ekībhūtāḥ susaṃyattāḥ kauravāṇāṃ mahācamūm | vyūhāya vidadhū rājanpāṇḍavānpratidaṃśitān

हे राजन्, इन सबने एकजुट और पूरी तरह सन्नद्ध होकर कवचधारी पाण्डवों के विरुद्ध कौरवों की विशाल सेना का व्यूह रचा।

श्लोक 5 (6.87.5)

कूर्मव्यूहं ततः कृत्वा पिता तव विशांपते । सागरप्रतिमं घोरं वाहनोर्मितरङ्गिणम् ॥

kūrmavyūhaṃ tataḥ kṛtvā pitā tava viśāṃpate | sāgarapratimaṃ ghoraṃ vāhanormitaraṅgiṇam

हे प्रजानाथ, तब आपके पितृतुल्य (भीष्म) ने समुद्र के समान भयंकर कूर्मव्यूह बनाया, जिसमें वाहन ही लहरों की तरह उमड़ रहे थे।

श्लोक 6 (6.87.6)

अग्रतः सर्वसैन्यानां भीष्मः शान्तनवो ययौ । मालवैर्दाक्षिणात्यैश्च आवन्त्यैश्च समन्वितः ॥

agrataḥ sarvasainyānāṃ bhīṣmaḥ śāntanavo yayau | mālavairdākṣiṇātyaiśca āvantyaiśca samanvitaḥ

सारी सेना के आगे-आगे शान्तनुनन्दन भीष्म चले; उनके साथ मालव, दाक्षिणात्य और आवन्त्य योद्धा थे।

श्लोक 7 (6.87.7)

ततोऽनन्तरमेवासीद्भारद्वाजः प्रतापवान् । पुलिन्दैः पारदैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः ॥

tato'nantaramevāsīdbhāradvājaḥ pratāpavān | pulindaiḥ pāradaiścaiva tathā kṣudrakamālavaiḥ

उनके ठीक पीछे प्रतापी भरद्वाजपुत्र (द्रोण) थे, जिनके साथ पुलिन्द, पारद तथा क्षुद्रक-मालव थे।

श्लोक 8 (6.87.8)

द्रोणादनन्तरं यत्तो भगदत्तः प्रतापवान् । मगधैश्च कलिङ्गैश्च पिशाचैश्च विशांपते ॥

droṇādanantaraṃ yatto bhagadattaḥ pratāpavān | magadhaiśca kaliṅgaiśca piśācaiśca viśāṃpate

हे प्रजानाथ, द्रोण के पीछे युद्ध को उद्यत प्रतापी भगदत्त थे; उनके साथ मगध, कलिङ्ग और पिशाच थे।

श्लोक 9 (6.87.9)

प्राग्ज्योतिषादनु नृपः कौसल्योऽथ बृहद्बलः । मेकलैः कुरुविन्दैश्च त्रैपुरैश्च समन्वितः ॥

prāgjyotiṣādanu nṛpaḥ kausalyo'tha bṛhadbalaḥ | mekalaiḥ kuruvindaiśca traipuraiśca samanvitaḥ

प्राग्ज्योतिषनरेश के पीछे कोसलराज बृहद्बल थे, जिनके साथ मेकल, कुरुविन्द और त्रैपुर थे।

श्लोक 10 (6.87.10)

बृहद्बलादनु नृपस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः । काम्भोजैर्बहुभिः सार्धं यवनैश्च सहस्रशः ॥

bṛhadbalādanu nṛpastrigartaḥ prasthalādhipaḥ | kāmbhojairbahubhiḥ sārdhaṃ yavanaiśca sahasraśaḥ

बृहद्बल के पीछे प्रस्थल के अधिपति त्रिगर्तराज थे; उनके साथ बहुत-से काम्बोज और हज़ारों यवन थे।

श्लोक 11 (6.87.11)

द्रौणिस्तु रभसः शूरस्त्रैगर्तादनु भारत । प्रययौ सिंहनादेन नादयानो धरातलम् ॥

drauṇistu rabhasaḥ śūrastraigartādanu bhārata | prayayau siṃhanādena nādayāno dharātalam

हे भारत, त्रिगर्तराज के पीछे वेगशाली शूरवीर द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) अपने सिंहनाद से धरती को गुँजाते हुए चले।

श्लोक 12 (6.87.12)

तथा सर्वेण सैन्येन राजा दुर्योधनस्तदा । द्रौणेरनन्तरं प्रायात्सोदर्यैः परिवारितः ॥

tathā sarveṇa sainyena rājā duryodhanastadā | drauṇeranantaraṃ prāyātsodaryaiḥ parivāritaḥ

द्रोणपुत्र के पीछे राजा दुर्योधन अपनी पूरी सेना के साथ, अपने सगे भाइयों से घिरा हुआ चला।

श्लोक 13 (6.87.13)

दुर्योधनादनु ततः कृपः शारद्वतो ययौ । एवमेष महाव्यूहः प्रययौ सागरोपमः ॥

duryodhanādanu tataḥ kṛpaḥ śāradvato yayau | evameṣa mahāvyūhaḥ prayayau sāgaropamaḥ

दुर्योधन के पीछे शरद्वान् के पुत्र कृप चले। इस प्रकार वह समुद्र-सा विशाल व्यूह आगे बढ़ा।

श्लोक 14 (6.87.14)

रेजुस्तत्र पताकाश्च श्वेतच्छत्राणि भारत । अङ्गदान्यत्र चित्राणि महार्हाणि धनूंषि च ॥

rejustatra patākāśca śvetacchatrāṇi bhārata | aṅgadānyatra citrāṇi mahārhāṇi dhanūṃṣi ca

हे भारत, वहाँ पताकाएँ और श्वेत छत्र, रंग-बिरंगे बाजूबन्द और बहुमूल्य धनुष चमक रहे थे।

श्लोक 15 (6.87.15)

तं तु दृष्ट्वा महाव्यूहं तावकानां महारथः । युधिष्ठिरोऽब्रवीत्तूर्णं पार्षतं पृतनापतिम् ॥

taṃ tu dṛṣṭvā mahāvyūhaṃ tāvakānāṃ mahārathaḥ | yudhiṣṭhiro'bravīttūrṇaṃ pārṣataṃ pṛtanāpatim

आपके सैनिकों का वह विशाल व्यूह देखकर महारथी युधिष्ठिर ने तुरन्त सेनापति पार्षत (धृष्टद्युम्न) से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 16 (6.87.16)

पश्य व्यूहं महेष्वास निर्मितं सागरोपमम् । प्रतिव्यूहं रणे शूर कुरु क्षिप्रं महारथ ॥

paśya vyūhaṃ maheṣvāsa nirmitaṃ sāgaropamam | prativyūhaṃ raṇe śūra kuru kṣipraṃ mahāratha

"हे महाधनुर्धर, समुद्र के समान रचे गए इस व्यूह को देखो। हे शूर महारथी, रण में शीघ्र ही इसका प्रतिव्यूह बनाओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (6.87.17)

ततः स पार्षतः क्रूरो व्यूहं चक्रे सुदारुणम् । शृङ्गाटकं महाराज परव्यूहविनाशनम् ॥

tataḥ sa pārṣataḥ krūro vyūhaṃ cakre sudāruṇam | śṛṅgāṭakaṃ mahārāja paravyūhavināśanam

हे महाराज, तब उस उग्र पार्षत ने शत्रुव्यूह का नाश करने वाला अत्यन्त भयानक शृङ्गाटक (सींगों वाला) व्यूह बनाया।

श्लोक 18 (6.87.18)

शृङ्गाभ्यां भीमसेनश्च सात्यकिश्च महारथः । रथैरनेकसाहस्रैस्तथा हयपदातिभिः ॥

śṛṅgābhyāṃ bhīmasenaśca sātyakiśca mahārathaḥ | rathairanekasāhasraistathā hayapadātibhiḥ

उसके दोनों सींगों पर भीमसेन और महारथी सात्यकि अनेक सहस्र रथों तथा घुड़सवारों और पैदलों के साथ थे।

श्लोक 19 (6.87.19)

नाभावभून्नरश्रेष्ठः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । मध्ये युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

nābhāvabhūnnaraśreṣṭhaḥ śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ | madhye yudhiṣṭhiro rājā mādrīputrau ca pāṇḍavau

उसकी नाभि में श्वेत अश्वों वाले नरश्रेष्ठ (अर्जुन) थे, जिनके सारथि श्रीकृष्ण हैं; बीच में राजा युधिष्ठिर और माद्री के दोनों पाण्डुपुत्र थे।

श्लोक 20 (6.87.20)

अथेतरे महेष्वासाः सहसैन्या नराधिपाः । व्यूहं तं पूरयामासुर्व्यूहशास्त्रविशारदाः ॥

athetare maheṣvāsāḥ sahasainyā narādhipāḥ | vyūhaṃ taṃ pūrayāmāsurvyūhaśāstraviśāradāḥ

अन्य महाधनुर्धर राजा, जो व्यूहशास्त्र में निपुण थे, अपनी-अपनी सेनाओं के साथ उस व्यूह को भरने लगे।

श्लोक 21 (6.87.21)

अभिमन्युस्ततः पश्चाद् विराटश्च महारथः । द्रौपदेयाश्च संहृष्टा राक्षसश्च घटोत्कचः ॥

abhimanyustataḥ paścād virāṭaśca mahārathaḥ | draupadeyāśca saṃhṛṣṭā rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ

उनके पीछे अभिमन्यु और महारथी विराट, हर्ष से भरे द्रौपदी के पुत्र और राक्षस घटोत्कच थे।

श्लोक 22 (6.87.22)

एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः । अतिष्ठन्समरे शूरा योद्धुकामा जयैषिणः ॥

evametaṃ mahāvyūhaṃ vyūhya bhārata pāṇḍavāḥ | atiṣṭhansamare śūrā yoddhukāmā jayaiṣiṇaḥ

हे भारत, इस प्रकार यह विशाल व्यूह रचकर पाण्डव वीर युद्ध की इच्छा और विजय की कामना से रणभूमि में डट गए।

श्लोक 23 (6.87.23)

भेरीशब्दैश्च विमलैर्विमिश्रैः शङ्खनिःस्वनैः । क्ष्वेडितास्फोटितोत्क्रुष्टैर्नादिताः सर्वतो दिशः ॥

bherīśabdaiśca vimalairvimiśraiḥ śaṅkhaniḥsvanaiḥ | kṣveḍitāsphoṭitotkruṣṭairnāditāḥ sarvato diśaḥ

भेरियों के स्पष्ट नाद, उनमें मिली शङ्खध्वनि और योद्धाओं की गर्जना, ताल ठोकने और ललकारों से सभी दिशाएँ गूँज उठीं।

श्लोक 24 (6.87.24)

ततः शूराः समासाद्य समरे ते परस्परम् । नेत्रैरनिमिषै राजन्नवैक्षन्त परस्परम् ॥

tataḥ śūrāḥ samāsādya samare te parasparam | netrairanimiṣai rājannavaikṣanta parasparam

हे राजन्, तब वे शूरवीर रणभूमि में आमने-सामने आकर अपलक नेत्रों से एक-दूसरे को देखने लगे।

श्लोक 25 (6.87.25)

मनोभिस्ते मनुष्येन्द्र युद्धं योधाः प्रचक्रिरे । पुनराहूय तेऽन्योन्यं शरीरैरपि चक्रिरे ॥

manobhiste manuṣyendra yuddhaṃ yodhāḥ pracakrire | punarāhūya te'nyonyaṃ śarīrairapi cakrire

हे नरेन्द्र, योद्धा मन ही मन युद्ध कर चुके थे; फिर एक-दूसरे को ललकारकर उन्होंने शरीरों से भी युद्ध किया।

श्लोक 26 (6.87.26)

ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् । तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca nighnatāmitaretaram

तब आपके और शत्रुपक्ष के योद्धाओं के बीच, जो एक-दूसरे को मार रहे थे, घोर रूप वाला भयावह युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 27 (6.87.27)

नाराचा निशिताः सङ्ख्ये संपतन्ति स्म भारत । व्यात्तानना भयकरा उरगा इव सङ्घशः ॥

nārācā niśitāḥ saṅkhye saṃpatanti sma bhārata | vyāttānanā bhayakarā uragā iva saṅghaśaḥ

हे भारत, युद्ध में पैने नाराच झुंड के झुंड ऐसे गिर रहे थे मानो मुँह फैलाए भयंकर सर्प हों।

श्लोक 28 (6.87.28)

निष्पेतुर्विमलाः शक्त्यस्तैलधौताः सुतेजनाः । अम्बुदेभ्यो यथा राजन्भ्राजमानाः शतह्रदाः ॥

niṣpeturvimalāḥ śaktyastailadhautāḥ sutejanāḥ | ambudebhyo yathā rājanbhrājamānāḥ śatahradāḥ

हे राजन्, तेल से धुली, अत्यन्त तीक्ष्ण और चमचमाती शक्तियाँ ऐसे निकल रही थीं जैसे बादलों से चमकती बिजलियाँ।

श्लोक 29 (6.87.29)

गदाश्च विमलैः पट्टैः पिनद्धाः स्वर्णभूषिताः । पतन्त्यस्तत्र दृश्यन्ते गिरिशृङ्गोपमाः शुभाः ॥

gadāśca vimalaiḥ paṭṭaiḥ pinaddhāḥ svarṇabhūṣitāḥ | patantyastatra dṛśyante giriśṛṅgopamāḥ śubhāḥ

चमकीली पट्टियों से मढ़ी, सोने से सजी सुन्दर गदाएँ पर्वतशिखरों के समान वहाँ गिरती दिखाई दे रही थीं।

श्लोक 30 (6.87.30)

निस्त्रिंशाश्च व्यदृश्यन्त विमलाम्बरसन्निभाः । आर्षभाणि च चर्माणि शतचन्द्राणि भारत ॥

nistriṃśāśca vyadṛśyanta vimalāmbarasannibhāḥ | ārṣabhāṇi ca carmāṇi śatacandrāṇi bhārata

तलवारें निर्मल आकाश के समान दिखाई दे रही थीं, और हे भारत, बैल के चमड़े की सौ चन्द्रचिह्नों वाली ढालें

श्लोक 31 (6.87.31)

अशोभन्त रणे राजन्पात्यमानानि सर्वशः । तेऽन्योन्यं समरे सेने युध्यमाने नराधिप ॥

aśobhanta raṇe rājanpātyamānāni sarvaśaḥ | te'nyonyaṃ samare sene yudhyamāne narādhipa

हे राजन्, रण में सब ओर गिराई जाती हुई शोभा पा रही थीं। हे नराधिप, युद्ध में परस्पर लड़ती वे दोनों सेनाएँ

श्लोक 32 (6.87.32)

अशोभेतां यथा देवदैत्यसेने समुद्यते । अभ्यद्रवन्त समरे तेऽन्योन्यं वै समन्ततः ॥

aśobhetāṃ yathā devadaityasene samudyate | abhyadravanta samare te'nyonyaṃ vai samantataḥ

युद्ध को उद्यत देवताओं और दैत्यों की सेनाओं के समान शोभित हुईं। वे युद्ध में चारों ओर से एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

श्लोक 33 (6.87.33)

रथास्तु रथिभिस्तूर्णं प्रेषिताः परमाहवे । युगैर्युगानि संश्लिष्य युयुधुः पार्थिवर्षभाः ॥

rathāstu rathibhistūrṇaṃ preṣitāḥ paramāhave | yugairyugāni saṃśliṣya yuyudhuḥ pārthivarṣabhāḥ

उस महायुद्ध में रथियों द्वारा तेज़ी से हाँके गए रथ जुए से जुआ भिड़ा गए और श्रेष्ठ राजा युद्ध करते रहे।

श्लोक 34 (6.87.34)

दन्तिनां युध्यमानानां संघर्षात्पावकोऽभवत् । दन्तेषु भरतश्रेष्ठ सधूमः सर्वतो दिशम् ॥

dantināṃ yudhyamānānāṃ saṃgharṣātpāvako'bhavat | danteṣu bharataśreṣṭha sadhūmaḥ sarvato diśam

हे भरतश्रेष्ठ, लड़ते हुए दन्तैल हाथियों की टक्कर से उनके दाँतों पर सब ओर धुएँ सहित आग उठने लगी।

श्लोक 35 (6.87.35)

प्रासैरभिहताः केचिद्गजयोधाः समन्ततः । पतमानाः स्म दृश्यन्ते गिरिशृङ्गान्नगा इव ॥

prāsairabhihatāḥ kecidgajayodhāḥ samantataḥ | patamānāḥ sma dṛśyante giriśṛṅgānnagā iva

कुछ गजारोही योद्धा चारों ओर से प्रासों की चोट खाकर पर्वतशिखर से गिरते वृक्षों की भाँति गिरते दिखाई दिए।

श्लोक 36 (6.87.36)

पादाताश्चाप्यदृश्यन्त निघ्नन्तोऽथ परस्परम् । चित्ररूपधराः शूरा नखरप्रासयोधिनः ॥

pādātāścāpyadṛśyanta nighnanto'tha parasparam | citrarūpadharāḥ śūrā nakharaprāsayodhinaḥ

पैदल सैनिक भी एक-दूसरे को मारते दिखाई दिए — अद्भुत रूप धारण किए वे शूर नखर और प्रास से लड़ रहे थे।

श्लोक 37 (6.87.37)

अन्योन्यं ते समासाद्य कुरुपाण्डवसैनिकाः । अस्त्रैर्नानाविधैर्घोरै रणे निन्युर्यमक्षयम् ॥

anyonyaṃ te samāsādya kurupāṇḍavasainikāḥ | astrairnānāvidhairghorai raṇe ninyuryamakṣayam

कौरव और पाण्डव सैनिकों ने एक-दूसरे से भिड़कर नाना प्रकार के भयंकर अस्त्रों से रण में एक-दूसरे को यमलोक भेज दिया।

श्लोक 38 (6.87.38)

ततः शान्तनवो भीष्मो रथघोषेण नादयन् । अभ्यागमद्रणे पार्थान्धनुःशब्देन मोहयन् ॥

tataḥ śāntanavo bhīṣmo rathaghoṣeṇa nādayan | abhyāgamadraṇe pārthāndhanuḥśabdena mohayan

तब शान्तनुनन्दन भीष्म रथ की घरघराहट से रणभूमि को गुँजाते और धनुष की टंकार से पाण्डवों को मोहित करते हुए युद्ध में उन पर चढ़ आए।

श्लोक 39 (6.87.39)

पाण्डवानां रथाश्चापि नदन्तो भैरवं स्वनम् । अभ्यद्रवन्त संयत्ता धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥

pāṇḍavānāṃ rathāścāpi nadanto bhairavaṃ svanam | abhyadravanta saṃyattā dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ

पाण्डवों के रथ भी भयंकर गर्जना करते हुए, धृष्टद्युम्न को आगे करके, सन्नद्ध होकर आगे बढ़े।

श्लोक 40 (6.87.40)

ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां च भारत । नराश्वरथनागानां व्यतिषक्तं परस्परम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tava teṣāṃ ca bhārata | narāśvarathanāgānāṃ vyatiṣaktaṃ parasparam

हे भारत, तब आपके और उनके योद्धाओं के बीच ऐसा युद्ध छिड़ा जिसमें मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी आपस में गुँथ गए।

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