भीष्म पर्व · अध्याय 86
भीष्म का युधिष्ठिर पर आक्रमण; सातवें दिन का अन्त
सातवें दिन के अन्त में भीष्म युधिष्ठिर पर टूट पड़ते हैं, उनके घोड़े मार डालते हैं और उन्हें नकुल के रथ पर जाने को विवश कर देते हैं; फिर युधिष्ठिर द्वारा भेजे गए राजाओं को वे हिरणों के बीच सिंह की भाँति मारते हैं, और शिखण्डी को उसके स्त्री-जन्म के कारण छोड़ देते हैं। धृष्टद्युम्न और सात्यकि कौरव-सेना को पीड़ित करते हैं, तब अवन्ति के विन्द और अनुविन्द धृष्टद्युम्न के घोड़े मार डालते हैं; युद्ध सूर्यास्त तक चलता है और रणभूमि गीदड़ों और मांसभक्षियों से भरी रक्त की नदी बन जाती है। दोनों सेनाएँ अपने शिविरों में लौटकर घाव सँभालती हैं और गीत-संगीत तथा विश्राम में रात बिताती हैं, जिसमें कोई युद्ध की बात नहीं करता।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.86.1)
विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं यशस्विनम् । रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तव ॥
virathaṃ taṃ samāsādya citrasenaṃ yaśasvinam | rathamāropayāmāsa vikarṇastanayastava
रथहीन हुए यशस्वी चित्रसेन के पास पहुँचकर आपके पुत्र विकर्ण ने उसे अपने रथ पर चढ़ा लिया।
श्लोक 2 (6.86.2)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भृशम् । भीष्मः शान्तनवस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥
tasmiṃstathā vartamāne tumule saṃkule bhṛśam | bhīṣmaḥ śāntanavastūrṇaṃ yudhiṣṭhiramupādravat
जब वह भीषण और अत्यन्त घमासान युद्ध इस प्रकार चल रहा था, तब शान्तनुनन्दन भीष्म तेज़ी से युधिष्ठिर पर टूट पड़े।
श्लोक 3 (6.86.3)
ततः सरथनागाश्वाः समकम्पन्त सृञ्जयाः । मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम् ॥
tataḥ sarathanāgāśvāḥ samakampanta sṛñjayāḥ | mṛtyorāsyamanuprāptaṃ menire ca yudhiṣṭhiram
तब रथों, हाथियों और घोड़ों सहित सृञ्जय काँप उठे और उन्होंने मान लिया कि युधिष्ठिर मृत्यु के मुख में जा पहुँचे हैं।
श्लोक 4 (6.86.4)
युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो यमाभ्यां सहितः प्रभुः । महेष्वासं नरव्याघ्रं भीष्मं शान्तनवं ययौ ॥
yudhiṣṭhiro'pi kauravyo yamābhyāṃ sahitaḥ prabhuḥ | maheṣvāsaṃ naravyāghraṃ bhīṣmaṃ śāntanavaṃ yayau
किन्तु कुरुवंशी प्रभु युधिष्ठिर भी नकुल-सहदेव को साथ लेकर उस महाधनुर्धर, नरश्रेष्ठ शान्तनुनन्दन भीष्म की ओर बढ़े।
श्लोक 5 (6.86.5)
ततः शरसहस्राणि प्रमुञ्चन्पाण्डवो युधि । भीष्मं संछादयामास यथा मेघो दिवाकरम् ॥
tataḥ śarasahasrāṇi pramuñcanpāṇḍavo yudhi | bhīṣmaṃ saṃchādayāmāsa yathā megho divākaram
युद्ध में हज़ारों बाण छोड़ते हुए पाण्डुपुत्र ने भीष्म को वैसे ढक दिया जैसे मेघ सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 6 (6.86.6)
तेन सम्यक्प्रणीतानि शरजालानि मारिष । प्रतिजग्राह गाङ्गेयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tena samyakpraṇītāni śarajālāni māriṣa | pratijagrāha gāṅgeyaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
हे मान्यवर, उनके द्वारा भली-भाँति छोड़े गए बाणों के जालों को गङ्गापुत्र ने सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में रोक दिया।
श्लोक 7 (6.86.7)
तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष । आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव ॥
tathaiva śarajālāni bhīṣmeṇāstāni māriṣa | ākāśe samadṛśyanta khagamānāṃ vrajā iva
हे मान्यवर, उसी प्रकार भीष्म के छोड़े हुए बाणों के जाल आकाश में पक्षियों के झुंडों के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 8 (6.86.8)
निमेषार्धेन कौन्तेयं भीष्मः शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भारत ॥
nimeṣārdhena kaunteyaṃ bhīṣmaḥ śāntanavo yudhi | adṛśyaṃ samare cakre śarajālena bhārata
हे भारत, शान्तनुनन्दन भीष्म ने आधे पल में ही युद्ध में अपने बाणजाल से कुन्तीपुत्र को अदृश्य कर दिया।
श्लोक 9 (6.86.9)
ततो युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्य महात्मनः । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā kauravyasya mahātmanaḥ | nārācaṃ preṣayāmāsa kruddha āśīviṣopamam
तब क्रोधित राजा युधिष्ठिर ने उन महात्मा कुरुवंशी पर विषैले सर्प के समान एक नाराच (लोहे का बाण) छोड़ा।
श्लोक 10 (6.86.10)
असंप्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः । चिच्छेद समरे राजन्भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम् ॥
asaṃprāptaṃ tatastaṃ tu kṣurapreṇa mahārathaḥ | ciccheda samare rājanbhīṣmastasya dhanuścyutam
हे राजन्, युधिष्ठिर के धनुष से छूटा वह बाण पहुँचे, उससे पहले ही महारथी भीष्म ने क्षुरप्र बाण से उसे रण में काट डाला।
श्लोक 11 (6.86.11)
तं तु च्छित्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसंमितम् । निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान्काञ्चनभूषणान् ॥
taṃ tu cchitvā raṇe bhīṣmo nārācaṃ kālasaṃmitam | nijaghne kauravendrasya hayānkāñcanabhūṣaṇān
रण में काल के समान उस नाराच को काटकर भीष्म ने कुरुराज (युधिष्ठिर) के सुवर्ण-भूषित घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 12 (6.86.12)
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । आरुरोह रथं तूर्णं नकुलस्य महात्मनः ॥
hatāśvaṃ tu rathaṃ tyaktvā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ nakulasya mahātmanaḥ
घोड़ों के मारे जाने पर उस रथ को छोड़कर धर्मपुत्र युधिष्ठिर तुरन्त महात्मा नकुल के रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 13 (6.86.13)
यमावपि हि संक्रुद्धः समासाद्य रणे तदा । शरैः संछादयामास भीष्मः परपुरंजयः ॥
yamāvapi hi saṃkruddhaḥ samāsādya raṇe tadā | śaraiḥ saṃchādayāmāsa bhīṣmaḥ parapuraṃjayaḥ
तब शत्रुनगरों को जीतने वाले भीष्म ने क्रोध में भरकर रण में नकुल-सहदेव पर भी आक्रमण किया और उन्हें बाणों से ढक दिया।
श्लोक 14 (6.86.14)
तौ तु दृष्ट्वा महाराज भीष्मबाणप्रपीडितौ । जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य वधकाङ्क्षया ॥
tau tu dṛṣṭvā mahārāja bhīṣmabāṇaprapīḍitau | jagāma paramāṃ cintāṃ bhīṣmasya vadhakāṅkṣayā
हे महाराज, उन दोनों को भीष्म के बाणों से पीड़ित देखकर युधिष्ठिर भीष्म के वध की इच्छा से गहरी चिन्ता में पड़ गए।
श्लोक 15 (6.86.15)
ततो युधिष्ठिरो वश्यान्राज्ञस्तान्समचोदयत् । भीष्मं शान्तनवं सर्वे निहतेति सुहृद्गणान् ॥
tato yudhiṣṭhiro vaśyānrājñastānsamacodayat | bhīṣmaṃ śāntanavaṃ sarve nihateti suhṛdgaṇān
तब युधिष्ठिर ने अपने अधीन उन राजाओं, अपने मित्रों को प्रेरित किया — "तुम सब मिलकर शान्तनुनन्दन भीष्म को मार डालो।"
श्लोक 16 (6.86.16)
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् । महता रथवंशेन परिवव्रुः पितामहम् ॥
tataste pārthivāḥ sarve śrutvā pārthasya bhāṣitam | mahatā rathavaṃśena parivavruḥ pitāmaham
पार्थ की बात सुनकर वे सब राजा रथों के विशाल समूह के साथ पितामह को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 17 (6.86.17)
स समन्तात्परिवृतः पिता देवव्रतस्तव । चिक्रीड धनुषा राजन्पातयानो महारथान् ॥
sa samantātparivṛtaḥ pitā devavratastava | cikrīḍa dhanuṣā rājanpātayāno mahārathān
हे राजन्, चारों ओर से घिरे हुए आपके पितृतुल्य देवव्रत अपने धनुष से मानो खेलते हुए महारथियों को गिराने लगे।
श्लोक 18 (6.86.18)
तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि । मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने ॥
taṃ carantaṃ raṇe pārthā dadṛśuḥ kauravaṃ yudhi | mṛgamadhyaṃ praviśyeva yathā siṃhaśiśuṃ vane
पाण्डवों ने रण में विचरते उन कुरुवंशी को वैसे देखा जैसे वन में हिरणों के झुंड के बीच घुसा हुआ सिंह का शावक।
श्लोक 19 (6.86.19)
तर्जयानं रणे वीरांस्त्रासयानं च सायकैः । दृष्ट्वा त्रेसुर्महाराज सिंहं मृगगणा इव ॥
tarjayānaṃ raṇe vīrāṃstrāsayānaṃ ca sāyakaiḥ | dṛṣṭvā tresurmahārāja siṃhaṃ mṛgagaṇā iva
हे महाराज, उन्हें रण में वीरों को ललकारते और बाणों से डराते देखकर वे वैसे ही काँप उठे जैसे सिंह को देखकर मृगों के झुंड।
श्लोक 20 (6.86.20)
रणे भारत सिंहस्य ददृशुः क्षत्रिया गतिम् । अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्षं दिधक्षतः ॥
raṇe bhārata siṃhasya dadṛśuḥ kṣatriyā gatim | agnervāyusahāyasya yathā kakṣaṃ didhakṣataḥ
हे भारत, क्षत्रियों ने रण में उस सिंह की गति को वायु की सहायता पाकर सूखे झाड़-झंखाड़ को जलाने को उद्यत अग्नि के समान देखा।
श्लोक 21 (6.86.21)
शिरांसि रथिनां भीष्मः पातयामास संयुगे । तालेभ्यः परिपक्वानि फलानि कुशलो नरः ॥
śirāṃsi rathināṃ bhīṣmaḥ pātayāmāsa saṃyuge | tālebhyaḥ paripakvāni phalāni kuśalo naraḥ
जैसे कुशल मनुष्य ताड़ के पेड़ों से पके फल गिराता है, वैसे ही भीष्म युद्ध में रथियों के सिर गिराने लगे।
श्लोक 22 (6.86.22)
पतद्भिश्च महाराज शिरोभिर्धरणीतले । बभूव तुमुलः शब्दः पततामश्मनामिव ॥
patadbhiśca mahārāja śirobhirdharaṇītale | babhūva tumulaḥ śabdaḥ patatāmaśmanāmiva
हे महाराज, धरती पर गिरते सिरों से गिरते पत्थरों के समान भारी शब्द होने लगा।
श्लोक 23 (6.86.23)
तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद्व्यतिकरो महान् ॥
tasminsutumule yuddhe vartamāne bhayānake | sarveṣāmeva sainyānāmāsīdvyatikaro mahān
जब वह अत्यन्त घमासान और भयानक युद्ध चल रहा था, तब सभी सेनाओं में भारी उथल-पुथल मच गई।
श्लोक 24 (6.86.24)
भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् । एकमेकं समाहूय युद्धायैवावतस्थिरे ॥
bhinneṣu teṣu vyūheṣu kṣatriyā itaretaram | ekamekaṃ samāhūya yuddhāyaivāvatasthire
व्यूह टूट जाने पर क्षत्रिय एक-एक को ललकारकर केवल युद्ध के लिए ही डट गए।
श्लोक 25 (6.86.25)
शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
śikhaṇḍī tu samāsādya bharatānāṃ pitāmaham | abhidudrāva vegena tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
किन्तु शिखण्डी भरतवंशियों के पितामह के पास पहुँचकर वेग से उन पर झपटा और बोला — "ठहरो, ठहरो!"
श्लोक 26 (6.86.26)
अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे । प्रययौ सृञ्जयान्क्रुद्धः स्त्रीत्वं तस्य विचिन्तयन् ॥
anādṛtya tato bhīṣmastaṃ śikhaṇḍinamāhave | prayayau sṛñjayānkruddhaḥ strītvaṃ tasya vicintayan
भीष्म ने उसके स्त्रीत्व का विचार करके रण में शिखण्डी की उपेक्षा की और क्रोधपूर्वक सृञ्जयों की ओर बढ़ गए।
श्लोक 27 (6.86.27)
सृंजयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे । सिंहनादांश्च विविधांश्चक्रुः शङ्खविमिश्रितान् ॥
sṛṃjayāstu tato dṛṣṭvā hṛṣṭaṃ bhīṣmaṃ mahāraṇe | siṃhanādāṃśca vividhāṃścakruḥ śaṅkhavimiśritān
महायुद्ध में भीष्म को हर्ष से भरा देखकर सृञ्जयों ने शङ्खनाद से मिले हुए तरह-तरह के सिंहनाद किए।
श्लोक 28 (6.86.28)
ततः प्रववृते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् । पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ vyatiṣaktarathadvipam | paścimāṃ diśamāsādya sthite savitari prabho
हे प्रभो, जब सूर्य पश्चिम दिशा में पहुँच चुका था, तब ऐसा युद्ध छिड़ा जिसमें रथ और हाथी आपस में उलझ गए।
श्लोक 29 (6.86.29)
धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च महारथः । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभिः ॥
dhṛṣṭadyumno'tha pāñcālyaḥ sātyakiśca mahārathaḥ | pīḍayantau bhṛśaṃ sainyaṃ śaktitomaravṛṣṭibhiḥ
पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्न और महारथी सात्यकि शक्तियों और तोमरों की वर्षा से सेना को बुरी तरह पीड़ित करते हुए
श्लोक 30 (6.86.30)
शस्त्रैश्च बहुभी राजञ्जघ्नतुस्तावकान्रणे । ते हन्यमानाः समरे तावका भरतर्षभ ॥
śastraiśca bahubhī rājañjaghnatustāvakānraṇe | te hanyamānāḥ samare tāvakā bharatarṣabha
हे राजन्, अनेक शस्त्रों से रण में आपके सैनिकों को मारने लगे। हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध में मारे जाते हुए भी आपके सैनिक
श्लोक 31 (6.86.31)
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति स्म संयुगम् । यथोत्साहं तु समरे निजघ्नुस्तावका रणे ॥
āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā na tyajanti sma saṃyugam | yathotsāhaṃ tu samare nijaghnustāvakā raṇe
युद्ध में आर्योचित संकल्प करके रणभूमि नहीं छोड़ते थे; आपके योद्धा अपनी शक्ति भर रण में प्रहार करते रहे।
श्लोक 32 (6.86.32)
तत्राक्रन्दो महानासीत्तावकानां महात्मनाम् । वध्यतां समरे राजन्पार्षतेन महात्मना ॥
tatrākrando mahānāsīttāvakānāṃ mahātmanām | vadhyatāṃ samare rājanpārṣatena mahātmanā
हे राजन्, वहाँ महात्मा पार्षत (धृष्टद्युम्न) द्वारा युद्ध में मारे जाते हुए आपके महामना योद्धाओं का बड़ा आर्तनाद उठा।
श्लोक 33 (6.86.33)
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं प्रत्युपस्थितौ ॥
taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ tāvakānāṃ mahārathau | vindānuvindāvāvantyau pārṣataṃ pratyupasthitau
आपके सैनिकों का वह भयानक आर्तनाद सुनकर अवन्ति के दोनों महारथी विन्द और अनुविन्द पार्षत के सामने आ डटे।
श्लोक 34 (6.86.34)
तौ तस्य तुरगान्हत्वा त्वरमाणौ महारथौ । छादयामासतुरुभौ शरवर्षेण पार्षतम् ॥
tau tasya turagānhatvā tvaramāṇau mahārathau | chādayāmāsaturubhau śaravarṣeṇa pārṣatam
उन दोनों महारथियों ने शीघ्रता से उसके घोड़े मार डाले और दोनों ने मिलकर पार्षत को बाणवर्षा से ढक दिया।
श्लोक 35 (6.86.35)
अवप्लुत्याथ पाञ्चाल्यो रथात्तूर्णं महाबलः । आरुरोह रथं तूर्णं सात्यकेस्तु महात्मनः ॥
avaplutyātha pāñcālyo rathāttūrṇaṃ mahābalaḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ sātyakestu mahātmanaḥ
महाबली पाञ्चालराजकुमार तुरन्त रथ से कूद पड़ा और शीघ्र ही महात्मा सात्यकि के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 36 (6.86.36)
ततो युधिष्ठिरो राजा महत्या सेनया वृतः । आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात्स परंतपौ ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā mahatyā senayā vṛtaḥ | āvantyau samare kruddhāvabhyayātsa paraṃtapau
तब विशाल सेना से घिरे राजा युधिष्ठिर ने युद्ध में क्रोधित, शत्रुओं को तपाने वाले उन दोनों अवन्तिवीरों पर धावा किया।
श्लोक 37 (6.86.37)
तथैव तव पुत्रोऽपि सर्वोद्योगेन मारिष । विन्दानुविन्दौ समरे परिवार्यावतस्थिवान् ॥
tathaiva tava putro'pi sarvodyogena māriṣa | vindānuvindau samare parivāryāvatasthivān
हे मान्यवर, उसी प्रकार आपका पुत्र भी पूरे उद्योग के साथ युद्ध में विन्द और अनुविन्द को घेरकर (उनकी रक्षा में) डटा रहा।
श्लोक 38 (6.86.38)
अर्जुनश्चापि संक्रुद्धः क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः । अयोधयत संग्रामे वज्रपाणिरिवासुरान् ॥
arjunaścāpi saṃkruddhaḥ kṣatriyānkṣatriyarṣabhaḥ | ayodhayata saṃgrāme vajrapāṇirivāsurān
क्षत्रियश्रेष्ठ अर्जुन भी क्रोध में भरकर युद्ध में क्षत्रियों से वैसे लड़ने लगे जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों से।
श्लोक 39 (6.86.39)
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत्तव । व्यधमत्सर्वपाञ्चालांस्तूलराशिमिवानलः ॥
droṇastu samare kruddhaḥ putrasya priyakṛttava | vyadhamatsarvapāñcālāṃstūlarāśimivānalaḥ
आपके पुत्र का प्रिय करने वाले द्रोण ने युद्ध में क्रोधित होकर सब पाञ्चालों को वैसे नष्ट कर डाला जैसे अग्नि रुई के ढेर को।
श्लोक 40 (6.86.40)
दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशांपते । परिवार्य रणे भीष्मं युयुधुः पाण्डवैः सह ॥
duryodhanapurogāstu putrāstava viśāṃpate | parivārya raṇe bhīṣmaṃ yuyudhuḥ pāṇḍavaiḥ saha
हे प्रजानाथ, दुर्योधन को आगे करके आपके पुत्र रण में भीष्म को घेरकर पाण्डवों से लड़ने लगे।
श्लोक 41 (6.86.41)
ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे । अब्रवीत्तावकान्सर्वांस्त्वरध्वमिति भारत ॥
tato duryodhano rājā lohitāyati bhāskare | abravīttāvakānsarvāṃstvaradhvamiti bhārata
हे भारत, तब सूर्य के लाल होने पर राजा दुर्योधन ने आपके सब योद्धाओं से कहा — "शीघ्रता करो।"
श्लोक 42 (6.86.42)
युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम् । अस्तं गिरिमथारूढे अप्रकाशति भास्करे ॥
yudhyatāṃ tu tathā teṣāṃ kurvatāṃ karma duṣkaram | astaṃ girimathārūḍhe aprakāśati bhāskare
इस प्रकार वे दुष्कर पराक्रम करते हुए लड़ ही रहे थे, और सूर्य प्रकाशहीन होकर अस्ताचल पर जा चढ़ा था,
श्लोक 43 (6.86.43)
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी । गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन क्षणदामुखे ॥
prāvartata nadī ghorā śoṇitaughataraṅgiṇī | gomāyugaṇasaṃkīrṇā kṣaṇena kṣaṇadāmukhe
तभी रात्रि के आरम्भ में क्षणभर में रक्त की बाढ़ की लहरों वाली, गीदड़ों के झुंडों से भरी एक भयानक नदी बह चली।
श्लोक 44 (6.86.44)
शिवाभिरशिवाभिश्च रुवद्भिर्भैरवं रवम् । घोरमायोधनं जज्ञे भूतसङ्घैः समाकुलम् ॥
śivābhiraśivābhiśca ruvadbhirbhairavaṃ ravam | ghoramāyodhanaṃ jajñe bhūtasaṅghaiḥ samākulam
भयानक स्वर में चिल्लाती अमङ्गल गीदड़ियों से वह रणभूमि भयावह हो उठी और भूतों के समूहों से भर गई।
श्लोक 45 (6.86.45)
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथान्ये पिशिताशिनः । समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥
rākṣasāśca piśācāśca tathānye piśitāśinaḥ | samantato vyadṛśyanta śataśo'tha sahasraśaḥ
राक्षस, पिशाच और अन्य मांसभक्षी प्राणी चारों ओर सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में दिखाई देने लगे।
श्लोक 46 (6.86.46)
अर्जुनोऽथ सुशर्मादीन्राज्ञस्तान्सपदानुगान् । विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति ॥
arjuno'tha suśarmādīnrājñastānsapadānugān | vijitya pṛtanāmadhye yayau svaśibiraṃ prati
तब अर्जुन सुशर्मा आदि उन राजाओं को उनके अनुचरों सहित सेना के बीच पराजित करके अपने शिविर की ओर चले गए।
श्लोक 47 (6.86.47)
युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तथा । ययौ स्वशिबिरं राजा निशायां सेनया वृतः ॥
yudhiṣṭhiro'pi kauravyo bhrātṛbhyāṃ sahitastathā | yayau svaśibiraṃ rājā niśāyāṃ senayā vṛtaḥ
कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर भी अपने दोनों भाइयों के साथ, सेना से घिरे हुए, रात होने पर अपने शिविर को चले गए।
श्लोक 48 (6.86.48)
भीमसेनोऽपि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान्रथान् । अवजित्य ततः सङ्ख्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति ॥
bhīmaseno'pi rājendra duryodhanamukhānrathān | avajitya tataḥ saṅkhye yayau svaśibiraṃ prati
हे राजेन्द्र, भीमसेन भी दुर्योधन आदि रथियों को युद्ध में पराजित करके अपने शिविर की ओर चले गए।
श्लोक 49 (6.86.49)
दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे । भीष्मं शान्तनवं तूर्णं प्रयातः शिबिरं प्रति ॥
duryodhano'pi nṛpatiḥ parivārya mahāraṇe | bhīṣmaṃ śāntanavaṃ tūrṇaṃ prayātaḥ śibiraṃ prati
राजा दुर्योधन भी महायुद्ध में शान्तनुनन्दन भीष्म को घेरे हुए शीघ्र शिविर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 50 (6.86.50)
द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्मा च सात्वतः । परिवार्य चमूं सर्वां प्रययुः शिबिरं प्रति ॥
droṇo drauṇiḥ kṛpaḥ śalyaḥ kṛtavarmā ca sātvataḥ | parivārya camūṃ sarvāṃ prayayuḥ śibiraṃ prati
द्रोण, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), कृप, शल्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा सारी सेना को घेरकर शिविर की ओर चले।
श्लोक 51 (6.86.51)
तथैव सात्यकी राजन्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । परिवार्य रणे योधान्ययतुः शिबिरं प्रति ॥
tathaiva sātyakī rājandhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | parivārya raṇe yodhānyayatuḥ śibiraṃ prati
हे राजन्, इसी प्रकार सात्यकि और पार्षत धृष्टद्युम्न भी रण में योद्धाओं को साथ घेरकर शिविर की ओर गए।
श्लोक 52 (6.86.52)
एवमेते महाराज तावकाः पाण्डवैः सह । पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतप ॥
evamete mahārāja tāvakāḥ pāṇḍavaiḥ saha | paryavartanta sahitā niśākāle paraṃtapa
हे परन्तप महाराज, इस प्रकार आपके ये योद्धा और पाण्डव रात होने पर एक साथ लौट गए।
श्लोक 53 (6.86.53)
ततः स्वशिबिरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा । न्यवसन्त महाराज पूजयन्तः परस्परम् ॥
tataḥ svaśibiraṃ gatvā pāṇḍavāḥ kuravastathā | nyavasanta mahārāja pūjayantaḥ parasparam
हे महाराज, अपने-अपने शिविर में पहुँचकर पाण्डव और कौरव एक-दूसरे का सम्मान करते हुए वहाँ ठहरे।
श्लोक 54 (6.86.54)
रक्षां कृत्वा ततः शूरा न्यस्य गुल्मान्यथाविधि । अपनीय च शल्यानि स्नात्वा च विविधैर्जलैः ॥
rakṣāṃ kṛtvā tataḥ śūrā nyasya gulmānyathāvidhi | apanīya ca śalyāni snātvā ca vividhairjalaiḥ
उन शूरवीरों ने रक्षा का प्रबन्ध किया, विधिपूर्वक चौकियाँ बिठाईं, शरीर से बाणों की नोकें निकालीं और नाना प्रकार के जलों से स्नान किया;
श्लोक 55 (6.86.55)
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे स्तूयमानाश्च बन्दिभिः । गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विनः ॥
kṛtasvastyayanāḥ sarve stūyamānāśca bandibhiḥ | gītavāditraśabdena vyakrīḍanta yaśasvinaḥ
फिर सबके लिए स्वस्तिवाचन हुआ, वन्दीजन उनकी स्तुति करने लगे और वे यशस्वी वीर गीत-वाद्य की ध्वनि के बीच आमोद करने लगे।
श्लोक 56 (6.86.56)
मुहूर्तादिव तत्सर्वमभवत्स्वर्गसन्निभम् । न हि युद्धकथां कांचित्तत्राकुर्वन्महारथाः ॥
muhūrtādiva tatsarvamabhavatsvargasannibham | na hi yuddhakathāṃ kāṃcittatrākurvanmahārathāḥ
मानो क्षणभर में वह सब स्वर्ग के समान हो गया, क्योंकि वहाँ महारथियों ने युद्ध की कोई चर्चा ही नहीं की।
श्लोक 57 (6.86.57)
ते प्रसुप्ते बले तत्र परिश्रान्तजने नृप । हस्त्यश्वबहुले रात्रौ प्रेक्षणीये बभूवतुः ॥
te prasupte bale tatra pariśrāntajane nṛpa | hastyaśvabahule rātrau prekṣaṇīye babhūvatuḥ
हे नरेश, वहाँ रात में जब सेना सो गई और सैनिक थककर चूर थे, तब हाथी-घोड़ों से भरी वे दोनों सेनाएँ देखने योग्य लग रही थीं।