भीष्म पर्व · अध्याय 85
युधिष्ठिर द्वारा शिखण्डी को उलाहना; भीम द्वारा चित्रसेन के रथ का विनाश
त्रिगर्त राजकुमारों से घिरे अर्जुन उनके धनुष काटकर उन्हें और उनके बत्तीस पृष्ठरक्षकों को मार डालते हैं और दुर्योधन तथा जयद्रथ को पीछे छोड़ भीष्म की ओर बढ़ते हैं। भीष्म द्वारा शिखण्डी के अस्त्र कटे देखकर युधिष्ठिर उसे उलाहना देते हैं कि उसने भीष्म-वध की प्रतिज्ञा पूरी नहीं की; आहत शिखण्डी आगे बढ़कर शल्य के अस्त्र को रोकता है और वारुणास्त्र से उसका उत्तर देता है। भीष्म युधिष्ठिर का धनुष और ध्वज काट देते हैं, और पैदल गदा लिए भीम जयद्रथ के घोड़े मारकर चित्रसेन का रथ चूर कर देते हैं; चित्रसेन कूदकर बच निकलता है और कौरव उसके शौर्य की प्रशंसा करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.85.1)
स ताड्यमानस्तु शरैर्धनंजयः । पदाहतो नाग इव श्वसन्बली । बाणांश्च बाणेन महारथानां । चिच्छेद चापानि रणे प्रसह्य ॥
sa tāḍyamānastu śarairdhanaṃjayaḥ | padāhato nāga iva śvasanbalī | bāṇāṃśca bāṇena mahārathānāṃ | ciccheda cāpāni raṇe prasahya
बाणों से आहत बलवान् धनंजय पैर से कुचले गए नाग की भाँति फुफकारते हुए, रण में उन महारथियों के बाणों और धनुषों को अपने बाणों से बलपूर्वक काटने लगे।
श्लोक 2 (6.85.2)
संछिद्य चापानि च तानि राज्ञां । तेषां रणे वीर्यवतां क्षणेन । विव्याध बाणैर्युगपन्महात्मा । निःशेषतां तेष्वथ मन्यमानः ॥
saṃchidya cāpāni ca tāni rājñāṃ | teṣāṃ raṇe vīryavatāṃ kṣaṇena | vivyādha bāṇairyugapanmahātmā | niḥśeṣatāṃ teṣvatha manyamānaḥ
रण में क्षण भर में उन पराक्रमी राजाओं के धनुष काटकर उस महात्मा ने उन्हें निःशेष करने का निश्चय करके एक साथ सब पर बाण बरसाए।
श्लोक 3 (6.85.3)
निपेतुराजौ रुधिरप्रदिग्धा- । स्ते ताडिताः शक्रसुतेन राजन् । विभिन्नगात्राः पतितोत्तमाङ्गा । गतासवश्छिन्नतनुत्रकायाः ॥
nipeturājau rudhirapradigdhā- | ste tāḍitāḥ śakrasutena rājan | vibhinnagātrāḥ patitottamāṅgā | gatāsavaśchinnatanutrakāyāḥ
हे राजन्, इन्द्रपुत्र के प्रहार से वे रक्त से लथपथ होकर रणभूमि में गिर पड़े; उनके अंग छिन्न-भिन्न थे, सिर कटकर गिर गए थे, प्राण निकल गए थे और कवच तथा शरीर कट चुके थे।
श्लोक 4 (6.85.4)
महीं गताः पार्थबलाभिभूता । विचित्ररूपा युगपद्विनेशुः । दृष्ट्वा हतांस्तान्युधि राजपुत्रां- । स्त्रिगर्तराजः प्रययौ रथेन ॥
mahīṃ gatāḥ pārthabalābhibhūtā | vicitrarūpā yugapadvineśuḥ | dṛṣṭvā hatāṃstānyudhi rājaputrāṃ- | strigartarājaḥ prayayau rathena
पार्थ के बल से पराजित होकर वे भूमि पर गिरे और विचित्र रूपों में एक साथ नष्ट हो गए। युद्ध में उन राजकुमारों को मारा गया देखकर त्रिगर्तराज रथ पर चढ़कर आगे बढ़ा।
श्लोक 5 (6.85.5)
तेषां रथानामथ पृष्ठगोपा । द्वात्रिंशदन्येऽभ्यपतन्त पार्थम् । तथैव ते तं परिवार्य पार्थं । विकृष्य चापानि महारवाणि ॥
teṣāṃ rathānāmatha pṛṣṭhagopā | dvātriṃśadanye'bhyapatanta pārtham | tathaiva te taṃ parivārya pārthaṃ | vikṛṣya cāpāni mahāravāṇi
तब उन रथों के बत्तीस अन्य पृष्ठरक्षक पार्थ पर टूट पड़े। उसी प्रकार पार्थ को घेरकर और भारी टंकार करने वाले धनुष खींचकर
श्लोक 6 (6.85.6)
अवीवृषन्बाणमहौघवृष्ट्या । यथा गिरिं तोयधरा जलौघैः । संपीड्यमानस्तु शरौघवृष्ट्या । धनंजयस्तान्युधि जातरोषः ॥
avīvṛṣanbāṇamahaughavṛṣṭyā | yathā giriṃ toyadharā jalaughaiḥ | saṃpīḍyamānastu śaraughavṛṣṭyā | dhanaṃjayastānyudhi jātaroṣaḥ
उन्होंने उन पर बाणों की भारी झड़ी लगा दी, जैसे बादल पर्वत पर जल की धाराएँ बरसाते हैं। बाणों की उस वर्षा से पीड़ित होकर धनंजय युद्ध में क्रोध से भर उठे,
श्लोक 7 (6.85.7)
षष्ट्या शरैः संयति तैलधौतै- । र्जघान तानप्यथ पृष्ठगोपान् । रथांश्च तानवजित्य सङ्ख्ये । धनञ्जयः प्रीतमना यशस्वी ॥
ṣaṣṭyā śaraiḥ saṃyati tailadhautai- | rjaghāna tānapyatha pṛṣṭhagopān | rathāṃśca tānavajitya saṅkhye | dhanañjayaḥ prītamanā yaśasvī
और उन्होंने तेल से धुले साठ बाणों से उन पृष्ठरक्षकों को भी रण में मार डाला। युद्ध में उन रथियों को जीतकर यशस्वी धनंजय प्रसन्नचित्त होकर
श्लोक 8 (6.85.8)
अथात्वरद्भीष्मवधाय जिष्णु- । र्बलानि राजन्समरे निहत्य । त्रिगर्तराजो निहतान्समीक्ष्य । महात्मना तानथ बन्धुवर्गान् ॥
athātvaradbhīṣmavadhāya jiṣṇu- | rbalāni rājansamare nihatya | trigartarājo nihatānsamīkṣya | mahātmanā tānatha bandhuvargān
हे राजन्, वे जिष्णु रण में सेनाओं का संहार करके भीष्म के वध के लिए शीघ्रता से आगे बढ़े। त्रिगर्तराज ने अपने बन्धु-बान्धवों को उस महात्मा द्वारा मारा गया देखा
श्लोक 9 (6.85.9)
रणे पुरस्कृत्य नराधिपांस्तान् । जगाम पार्थं त्वरितो वधाय । अभिद्रुतं चास्त्रभृतां वरिष्ठं । धनंजयं वीक्ष्य शिखण्डिमुख्याः ॥
raṇe puraskṛtya narādhipāṃstān | jagāma pārthaṃ tvarito vadhāya | abhidrutaṃ cāstrabhṛtāṃ variṣṭhaṃ | dhanaṃjayaṃ vīkṣya śikhaṇḍimukhyāḥ
और उन नरेशों को आगे करके पार्थ को मारने के लिए शीघ्रता से उनकी ओर बढ़ा। अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ धनंजय पर आक्रमण होता देख शिखण्डी आदि प्रमुख वीर
श्लोक 10 (6.85.10)
अभ्युद्ययुस्ते शितशस्त्रहस्ता । रिरक्षिषन्तो रथमर्जुनस्य । पार्थोऽपि तानापततः समीक्ष्य । त्रिगर्तराज्ञा सहितान्नृवीरान् ॥
abhyudyayuste śitaśastrahastā | rirakṣiṣanto rathamarjunasya | pārtho'pi tānāpatataḥ samīkṣya | trigartarājñā sahitānnṛvīrān
हाथों में तीखे शस्त्र लिए अर्जुन के रथ की रक्षा करने के लिए आगे बढ़ आए। पार्थ ने भी त्रिगर्तराज के साथ आते हुए उन वीरों को देखा
श्लोक 11 (6.85.11)
विध्वंसयित्वा समरे धनुष्मान् । गाण्डीवमुक्तैर्निशितैः पृषत्कैः । भीष्मं यियासुर्युधि संददर्श । दुर्योधनं सैन्धवादींश्च राज्ञः ॥
vidhvaṃsayitvā samare dhanuṣmān | gāṇḍīvamuktairniśitaiḥ pṛṣatkaiḥ | bhīṣmaṃ yiyāsuryudhi saṃdadarśa | duryodhanaṃ saindhavādīṃśca rājñaḥ
और उस धनुर्धर ने गाण्डीव से छूटे तीखे बाणों से रण में उन्हें ध्वस्त कर दिया। भीष्म तक पहुँचने की इच्छा से उन्होंने युद्ध में दुर्योधन और सिन्धुराज आदि राजाओं को सामने देखा।
श्लोक 12 (6.85.12)
आवारयिष्णूनभिसंप्रयाय । मुहूर्तमायोध्य बलेन वीरः । उत्सृज्य राजानमनन्तवीर्यो । जयद्रथादींश्च नृपान्महौजाः । ययौ ततो भीमबलो मनस्वी । गाङ्गेयमाजौ शरचापपाणिः ॥
āvārayiṣṇūnabhisaṃprayāya | muhūrtamāyodhya balena vīraḥ | utsṛjya rājānamanantavīryo | jayadrathādīṃśca nṛpānmahaujāḥ | yayau tato bhīmabalo manasvī | gāṅgeyamājau śaracāpapāṇiḥ
अपना मार्ग रोकने वालों पर चढ़ाई करके उस वीर ने कुछ देर उनसे बलपूर्वक युद्ध किया; फिर अनन्त पराक्रमी, महातेजस्वी, भयानक बल वाले और मनस्वी अर्जुन राजा दुर्योधन तथा जयद्रथ आदि नरेशों को छोड़कर, हाथ में धनुष-बाण लिए युद्ध में गंगापुत्र भीष्म की ओर बढ़े।
श्लोक 13 (6.85.13)
भीष्मोऽपि दृष्ट्वा समरे कृतास्त्रान् । स पाण्डवानां रथिनोऽभ्युदारान् । विहाय संग्राममुखे धनंजयं । जवेन पार्थं पुनराजगाम ॥
bhīṣmo'pi dṛṣṭvā samare kṛtāstrān | sa pāṇḍavānāṃ rathino'bhyudārān | vihāya saṃgrāmamukhe dhanaṃjayaṃ | javena pārthaṃ punarājagāma
भीष्म भी युद्ध में पाण्डवों के अस्त्रकुशल, उदार रथियों को देखकर, संग्राम के मुहाने पर धनंजय को छोड़कर वेग से फिर पृथापुत्र की ओर लौट आए।
श्लोक 14 (6.85.14)
युधिष्ठिरश्चोग्रबलो महात्मा । समाययौ त्वरितो जातकोपः । मद्राधिपं समभित्यज्य सङ्ख्ये । स्वभागमाप्तं तमनन्तकीर्तिः । सार्धं स माद्रीसुतभीमसेनै- । र्भीष्मं ययौ शान्तनवं रणाय ॥
yudhiṣṭhiraścograbalo mahātmā | samāyayau tvarito jātakopaḥ | madrādhipaṃ samabhityajya saṅkhye | svabhāgamāptaṃ tamanantakīrtiḥ | sārdhaṃ sa mādrīsutabhīmasenai- | rbhīṣmaṃ yayau śāntanavaṃ raṇāya
उग्र बल वाले महात्मा युधिष्ठिर क्रोध से भरकर तेज़ी से आ पहुँचे। युद्ध में अपने हिस्से में आए प्रतिद्वन्द्वी मद्रराज को छोड़कर वे अनन्त कीर्ति वाले युधिष्ठिर माद्रीपुत्रों और भीमसेन के साथ शान्तनुनन्दन भीष्म से युद्ध करने चले।
श्लोक 15 (6.85.15)
तैः संप्रयुक्तैः स महारथाग्र्यै- । र्गङ्गासुतः समरे चित्रयोधी । न विव्यधे शान्तनवो महात्मा । समागतैः पाण्डुसुतैः समस्तैः ॥
taiḥ saṃprayuktaiḥ sa mahārathāgryai- | rgaṅgāsutaḥ samare citrayodhī | na vivyadhe śāntanavo mahātmā | samāgataiḥ pāṇḍusutaiḥ samastaiḥ
उन श्रेष्ठ महारथियों के आक्रमण करने पर भी विचित्र रीति से युद्ध करने वाले गंगापुत्र महात्मा शान्तनुनन्दन भीष्म, एकत्र हुए सब पाण्डुपुत्रों से युद्ध में घायल नहीं हुए।
श्लोक 16 (6.85.16)
अथैत्य राजा युधि सत्यसन्धो । जयद्रथोऽत्युग्रबलो मनस्वी । चिच्छेद चापानि महारथानां । प्रसह्य तेषां धनुषा वरेण ॥
athaitya rājā yudhi satyasandho | jayadratho'tyugrabalo manasvī | ciccheda cāpāni mahārathānāṃ | prasahya teṣāṃ dhanuṣā vareṇa
तब युद्ध में सत्यप्रतिज्ञ, अत्यन्त उग्र बल वाले और मनस्वी राजा जयद्रथ ने आकर अपने श्रेष्ठ धनुष से उन महारथियों के धनुष बलपूर्वक काट डाले।
श्लोक 17 (6.85.17)
युधिष्ठिरं भीमसेनं यमौ च । पार्थं कृष्णं युधि संजातकोपः । दुर्योधनः क्रोधविषो महात्मा । जघान बाणैरनलप्रकाशैः ॥
yudhiṣṭhiraṃ bhīmasenaṃ yamau ca | pārthaṃ kṛṣṇaṃ yudhi saṃjātakopaḥ | duryodhanaḥ krodhaviṣo mahātmā | jaghāna bāṇairanalaprakāśaiḥ
युद्ध में क्रोध से भरे, विष के समान क्रोध वाले महात्मा दुर्योधन ने युधिष्ठिर, भीमसेन, दोनों माद्रीपुत्रों, पार्थ और कृष्ण पर अग्नि के समान दमकते बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 18 (6.85.18)
कृपेण शल्येन शलेन चैव । तथा विभो चित्रसेनेन चाजौ । विद्धाः शरैस्तेऽतिविवृद्धकोपै- । र्देवा यथा दैत्यगणैः समेतैः ॥
kṛpeṇa śalyena śalena caiva | tathā vibho citrasenena cājau | viddhāḥ śaraiste'tivivṛddhakopai- | rdevā yathā daityagaṇaiḥ sametaiḥ
हे प्रभो, अत्यन्त बढ़े हुए क्रोध वाले कृप, शल्य, शल और चित्रसेन ने युद्ध में उन्हें बाणों से बेध डाला; वे ऐसे लगे जैसे एकत्र हुए दैत्यगणों से पीड़ित देवता।
श्लोक 19 (6.85.19)
छिन्नायुधं शान्तनवेन राजा । शिखण्डिनं प्रेक्ष्य च जातकोपः । अजातशत्रुः समरे महात्मा । शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम् ॥
chinnāyudhaṃ śāntanavena rājā | śikhaṇḍinaṃ prekṣya ca jātakopaḥ | ajātaśatruḥ samare mahātmā | śikhaṇḍinaṃ kruddha uvāca vākyam
शान्तनुनन्दन द्वारा शिखण्डी के अस्त्र-शस्त्र कटे देखकर अजातशत्रु महात्मा राजा युधिष्ठिर क्रोध से भर गए और युद्ध में शिखण्डी से क्रुद्ध होकर बोले:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (6.85.20)
उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा- । महं हनिष्यामि महाव्रतं तम् । भीष्मं शरौघैर्विमलार्कवर्णैः । सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा ॥
uktvā tathā tvaṃ pituragrato mā- | mahaṃ haniṣyāmi mahāvrataṃ tam | bhīṣmaṃ śaraughairvimalārkavarṇaiḥ | satyaṃ vadāmīti kṛtā pratijñā
"तुमने अपने पिता के सामने मुझसे कहा था, 'मैं निर्मल सूर्य के समान चमकने वाले बाणों की बौछार से उन महाव्रती भीष्म को मारूँगा, मैं सत्य कहता हूँ।' यही तुम्हारी प्रतिज्ञा थी।
श्लोक 21 (6.85.21)
त्वया च नैनां सफलां करोषि । देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे । मिथ्याप्रतिज्ञो भव मात्र वीर । रक्षस्व धर्मं स्वकुलं यशश्च ॥
tvayā ca naināṃ saphalāṃ karoṣi | devavrataṃ yanna nihaṃsi yuddhe | mithyāpratijño bhava mātra vīra | rakṣasva dharmaṃ svakulaṃ yaśaśca
पर तुम उसे सफल नहीं कर रहे, क्योंकि युद्ध में देवव्रत को नहीं मार रहे। हे वीर, यहाँ अपनी प्रतिज्ञा झूठी मत होने दो; अपने धर्म, कुल और यश की रक्षा करो।
श्लोक 22 (6.85.22)
प्रेक्षस्व भीष्मं युधि भीमवेगं । सर्वांस्तपन्तं मम सैन्यसङ्घान् । शरौघजालैरतितिग्मवेगैः । कालं यथा कालकृतं क्षणेन ॥
prekṣasva bhīṣmaṃ yudhi bhīmavegaṃ | sarvāṃstapantaṃ mama sainyasaṅghān | śaraughajālairatitigmavegaiḥ | kālaṃ yathā kālakṛtaṃ kṣaṇena
युद्ध में भयानक वेग वाले भीष्म को देखो, जो अत्यन्त तीव्र वेग वाले बाणों के जाल से क्षण भर में मेरी सेना के सारे समूहों को ऐसे तपा रहे हैं, मानो काल द्वारा भेजा गया स्वयं काल हो।
श्लोक 23 (6.85.23)
निकृत्तचापः समरेऽनपेक्षः । पराजितः शान्तनवेन चाजौ । विहाय बन्धूनथ सोदरांश्च । क्व यास्यसे नानुरूपं तवेदम् ॥
nikṛttacāpaḥ samare'napekṣaḥ | parājitaḥ śāntanavena cājau | vihāya bandhūnatha sodarāṃśca | kva yāsyase nānurūpaṃ tavedam
धनुष कट जाने पर युद्ध से विमुख होकर, शान्तनुनन्दन से रण में पराजित होकर, अपने बन्धुओं और सगे भाइयों को छोड़कर तुम कहाँ जाओगे? यह तुम्हारे योग्य नहीं है।
श्लोक 24 (6.85.24)
दृष्ट्वा हि भीष्मं तमनन्तवीर्यं । भग्नं च सैन्यं द्रवमाणमेवम् । भीतोऽसि नूनं द्रुपदस्य पुत्र । तथा हि ते मुखवर्णोऽप्रहृष्टः ॥
dṛṣṭvā hi bhīṣmaṃ tamanantavīryaṃ | bhagnaṃ ca sainyaṃ dravamāṇamevam | bhīto'si nūnaṃ drupadasya putra | tathā hi te mukhavarṇo'prahṛṣṭaḥ
हे द्रुपदपुत्र, अनन्त पराक्रमी भीष्म को और हमारी सेना को इस प्रकार टूटकर भागते देखकर निश्चय ही तुम डर गए हो, क्योंकि तुम्हारे मुख का रंग फीका पड़ गया है।
श्लोक 25 (6.85.25)
अज्ञायमाने च धनंजये तु । महाहवे संप्रसक्ते नृवीरे । कथं हि भीष्मात्प्रथितः पृथिव्यां । भयं त्वमद्य प्रकरोषि वीर ॥
ajñāyamāne ca dhanaṃjaye tu | mahāhave saṃprasakte nṛvīre | kathaṃ hi bhīṣmātprathitaḥ pṛthivyāṃ | bhayaṃ tvamadya prakaroṣi vīra
और जब नरवीर धनंजय कहीं पीछे महायुद्ध में उलझे हुए हैं, तब हे वीर, पृथ्वी पर विख्यात होकर भी तुम आज भीष्म से भय क्यों दिखा रहे हो?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 26 (6.85.26)
स धर्मराजस्य वचो निशम्य । रूक्षाक्षरं विप्रलापानुबद्धम् । प्रत्यादेशं मन्यमानो महात्मा । प्रतत्वरे भीष्मवधाय राजन् ॥
sa dharmarājasya vaco niśamya | rūkṣākṣaraṃ vipralāpānubaddham | pratyādeśaṃ manyamāno mahātmā | pratatvare bhīṣmavadhāya rājan
धर्मराज के कठोर अक्षरों वाले और उलाहनों से भरे वचन सुनकर महात्मा शिखण्डी ने उन्हें फटकार समझा और, हे राजन्, भीष्म के वध के लिए उतावले होकर बढ़े।
श्लोक 27 (6.85.27)
तमापतन्तं महता जवेन । शिखण्डिनं भीष्ममभिद्रवन्तम् । निवारयामास हि शल्य एन- । मस्त्रेण घोरेण सुदुर्जयेन ॥
tamāpatantaṃ mahatā javena | śikhaṇḍinaṃ bhīṣmamabhidravantam | nivārayāmāsa hi śalya ena- | mastreṇa ghoreṇa sudurjayena
बड़े वेग से भीष्म की ओर झपटते हुए शिखण्डी को शल्य ने एक भयंकर और अत्यन्त दुर्जय अस्त्र से रोक दिया।
श्लोक 28 (6.85.28)
स चापि दृष्ट्वा समुदीर्यमाण- । मस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रभावम् । नासौ व्यमुह्यद्द्रुपदस्य पुत्रो । राजन्महेन्द्रप्रतिमप्रभावः । तस्थौ च तत्रैव महाधनुष्मान् । शरैस्तदस्त्रं प्रतिबाधमानः ॥
sa cāpi dṛṣṭvā samudīryamāṇa- | mastraṃ yugāntāgnisamaprabhāvam | nāsau vyamuhyaddrupadasya putro | rājanmahendrapratimaprabhāvaḥ | tasthau ca tatraiva mahādhanuṣmān | śaraistadastraṃ pratibādhamānaḥ
परन्तु युगान्त की अग्नि के समान प्रभाव वाले उस अस्त्र को छूटते देखकर भी, हे राजन्, महेन्द्र के समान प्रभावशाली द्रुपदपुत्र मोहित नहीं हुआ। वह महाधनुर्धर वहीं डटा रहा और अपने बाणों से उस अस्त्र को रोकता रहा।
श्लोक 29 (6.85.29)
अथाददे वारुणमन्यदस्त्रं । शिखण्ड्यथोग्रं प्रतिघातमस्य । तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं । खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च ॥
athādade vāruṇamanyadastraṃ | śikhaṇḍyathograṃ pratighātamasya | tadastramastreṇa vidāryamāṇaṃ | khasthāḥ surā dadṛśuḥ pārthivāśca
तब शिखण्डी ने उसका प्रतिकार करने के लिए एक दूसरा उग्र वारुणास्त्र उठाया। आकाश में स्थित देवताओं और राजाओं ने उस अस्त्र को दूसरे अस्त्र से विदीर्ण होते देखा।
श्लोक 30 (6.85.30)
भीष्मस्तु राजन्समरे महात्मा । धनुश्च चित्रं ध्वजमेव चापि । छित्त्वाऽनदत्पाण्डुसुतस्य वीरो । युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥
bhīṣmastu rājansamare mahātmā | dhanuśca citraṃ dhvajameva cāpi | chittvā'nadatpāṇḍusutasya vīro | yudhiṣṭhirasyājamīḍhasya rājñaḥ
हे राजन्, वीर महात्मा भीष्म ने युद्ध में अजमीढवंशी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर का विचित्र धनुष और ध्वज काटकर सिंहनाद किया।
श्लोक 31 (6.85.31)
ततः समुत्सृज्य धनुः सबाणं । युधिष्ठिरं वीक्ष्य भयाभिभूतम् । गदां प्रगृह्याभिपपात सङ्ख्ये । जयद्रथं भीमसेनः पदातिः ॥
tataḥ samutsṛjya dhanuḥ sabāṇaṃ | yudhiṣṭhiraṃ vīkṣya bhayābhibhūtam | gadāṃ pragṛhyābhipapāta saṅkhye | jayadrathaṃ bhīmasenaḥ padātiḥ
तब युधिष्ठिर को भय से घिरा देखकर भीमसेन ने बाणों सहित धनुष छोड़ दिया और गदा उठाकर पैदल ही युद्ध में जयद्रथ पर टूट पड़े।
श्लोक 32 (6.85.32)
तमापतन्तं सहसा जवेन । जयद्रथः सगदं भीमसेनम् । विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः । शितैः शरैः पञ्चशतैः समन्तात् ॥
tamāpatantaṃ sahasā javena | jayadrathaḥ sagadaṃ bhīmasenam | vivyādha ghorairyamadaṇḍakalpaiḥ | śitaiḥ śaraiḥ pañcaśataiḥ samantāt
गदा लिए भीमसेन को अचानक वेग से अपनी ओर आते देखकर जयद्रथ ने यमदण्ड के समान भयंकर पाँच सौ तीखे बाणों से उन्हें चारों ओर से बेध दिया।
श्लोक 33 (6.85.33)
अचिन्तयित्वा स शरांस्तरस्वी । वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः । जघान वाहान्समरे समन्तात् । सुसंमतान्सिन्धुराजस्य सङ्ख्ये ॥
acintayitvā sa śarāṃstarasvī | vṛkodaraḥ krodhaparītacetāḥ | jaghāna vāhānsamare samantāt | susaṃmatānsindhurājasya saṅkhye
उन बाणों की परवाह न करके, क्रोध से भरे चित्त वाले वेगशाली वृकोदर ने युद्ध में सिन्धुराज के सब ओर जुते उत्तम घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 34 (6.85.34)
ततोऽभिवीक्ष्याप्रतिमप्रभाव- । स्तवात्मजस्त्वरमाणो रथेन । अभ्याययौ भीमसेनं निहन्तुं । समुद्यतास्त्रः सुरराजकल्पः ॥
tato'bhivīkṣyāpratimaprabhāva- | stavātmajastvaramāṇo rathena | abhyāyayau bhīmasenaṃ nihantuṃ | samudyatāstraḥ surarājakalpaḥ
तब यह देखकर अनुपम प्रभाव वाला आपका पुत्र देवराज इन्द्र के समान अस्त्र उठाए, भीमसेन को मारने के लिए रथ पर तेज़ी से आ पहुँचा।
श्लोक 35 (6.85.35)
जयद्रथो भग्नवाहं रथं तं । त्यक्त्वा ययौ यत्र राजा कुरूणाम् । भयेन भीमस्य समूढचेताः । ससौबलस्तत्र युद्धस्य भीतः ॥
jayadratho bhagnavāhaṃ rathaṃ taṃ | tyaktvā yayau yatra rājā kurūṇām | bhayena bhīmasya samūḍhacetāḥ | sasaubalastatra yuddhasya bhītaḥ
भीम के भय से व्याकुल चित्त वाला जयद्रथ घोड़े मारे गए उस रथ को छोड़कर, वहाँ के युद्ध से डरकर, सुबलपुत्र शकुनि के साथ वहाँ चला गया जहाँ कुरुराज थे।
श्लोक 36 (6.85.36)
भीमोऽप्यथैनं सहसा विनद्य । प्रत्युद्ययौ गदया तर्जयानः । समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां । दृष्ट्वा गदां ते कुरवः समन्तात् ॥
bhīmo'pyathainaṃ sahasā vinadya | pratyudyayau gadayā tarjayānaḥ | samudyatāṃ tāṃ yamadaṇḍakalpāṃ | dṛṣṭvā gadāṃ te kuravaḥ samantāt
भीम भी सहसा गर्जना करके गदा से धमकाते हुए उसका सामना करने बढ़े। यमदण्ड के समान उठी हुई उस गदा को देखकर चारों ओर के कौरव,
श्लोक 37 (6.85.37)
विहाय सर्वे तव पुत्रमुग्रं । पातं गदायाः परिहर्तुकामाः । अपक्रान्तास्तुमुले संप्रमर्दे । सुदारुणे भारत मोहनीये ॥
vihāya sarve tava putramugraṃ | pātaṃ gadāyāḥ parihartukāmāḥ | apakrāntāstumule saṃpramarde | sudāruṇe bhārata mohanīye
हे भारत, गदा के प्रहार से बचने की इच्छा से सब आपके उग्र पुत्र को छोड़कर उस भीषण, अत्यन्त भयंकर और मोह में डालने वाले संघर्ष से हट गए।
श्लोक 38 (6.85.38)
अमूढचेतास्त्वथ चित्रसेनो । महागदामापतन्तीं निरीक्ष्य । रथं समुत्सृज्य पदातिराजौ । प्रगृह्य खड्गं विमलं च चर्म । अवप्लुतः सिंह इवाचलाग्रा- । ज्जगाम चान्यं भुवि भूमिदेशम् ॥
amūḍhacetāstvatha citraseno | mahāgadāmāpatantīṃ nirīkṣya | rathaṃ samutsṛjya padātirājau | pragṛhya khaḍgaṃ vimalaṃ ca carma | avaplutaḥ siṃha ivācalāgrā- | jjagāma cānyaṃ bhuvi bhūmideśam
किन्तु चित्रसेन का चित्त विचलित नहीं हुआ; उस विशाल गदा को अपनी ओर आते देखकर वह रथ छोड़कर, चमकती तलवार और ढाल लेकर, पर्वत-शिखर से सिंह की भाँति कूदा और पैदल ही रणभूमि में दूसरे स्थान पर चला गया।
श्लोक 39 (6.85.39)
गदापि सा प्राप्य रथं सुचित्रं । साश्वं ससूतं विनिहत्य सङ्ख्ये । जगाम भूमिं ज्वलिता महोल्का । भ्रष्टाऽम्बराद्गामिव संपतन्ती ॥
gadāpi sā prāpya rathaṃ sucitraṃ | sāśvaṃ sasūtaṃ vinihatya saṅkhye | jagāma bhūmiṃ jvalitā maholkā | bhraṣṭā'mbarādgāmiva saṃpatantī
वह गदा उस सुन्दर रथ पर गिरी और युद्ध में घोड़ों तथा सारथि सहित उसे नष्ट करके, आकाश से धरती पर गिरती जलती हुई महान् उल्का के समान भूमि पर जा गिरी।
श्लोक 40 (6.85.40)
आश्चर्यभूतं सुमहत्त्वदीया । दृष्ट्वैव तद्भारत संप्रहृष्टाः । सर्वे विनेदुः सहिताः समन्ता- । त्पुपूजिरे तव पुत्रस्य शौर्यम् ॥
āścaryabhūtaṃ sumahattvadīyā | dṛṣṭvaiva tadbhārata saṃprahṛṣṭāḥ | sarve vineduḥ sahitāḥ samantā- | tpupūjire tava putrasya śauryam
हे भारत, उस महान् आश्चर्य को देखकर आपके योद्धा अत्यन्त प्रसन्न हुए; सबने चारों ओर से एक साथ गर्जना की और आपके पुत्र के शौर्य की प्रशंसा की।