भीष्म पर्व · अध्याय 84
युधिष्ठिर द्वारा श्रुतायु की पराजय; कृप और चेकितान का खड्गयुद्ध
सातवें दिन दोपहर में युधिष्ठिर श्रुतायु से भिड़ते हैं; घायल होकर वे ऐसे क्रोध से जल उठते हैं कि लोक भयभीत हो जाते हैं, फिर उस क्रोध को रोककर श्रुतायु का धनुष काटते हैं, उसके घोड़े और सारथि मारकर उसे भगा देते हैं, और कौरव सेना पीठ दिखा देती है। चेकितान और कृप रथ, गदा और तलवार से लड़ते-लड़ते दोनों मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं, जिन्हें भीम और शकुनि उठा ले जाते हैं; भूरिश्रवा धृष्टकेतु को रथहीन करते हैं, और अभिमन्यु दुर्योधन के तीन भाइयों को परास्त करके भी छोड़ देते हैं। जब भीष्म उन्हें बचाने आते हैं, तो अर्जुन श्रीकृष्ण से भीष्म के रक्षक राजाओं की ओर रथ बढ़वाते हैं, सुशर्मा को ललकारते हैं और घेरकर बाणों से ढक दिए जाते हैं, और एक रक्तरंजित संग्राम आरम्भ हो जाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.84.1)
ततो युधिष्ठिरो राजा मध्यं प्राप्ते दिवाकरे । श्रुतायुषमभिप्रेक्ष्य प्रेषयामास वाजिनः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā madhyaṃ prāpte divākare | śrutāyuṣamabhiprekṣya preṣayāmāsa vājinaḥ
तब, जब सूर्य आकाश के मध्य में आ पहुँचा, राजा युधिष्ठिर ने श्रुतायु को देखकर अपने घोड़े उसकी ओर दौड़ाए।
श्लोक 2 (6.84.2)
ततस्तु त्वरितो राजञ्श्रुतायुषमरिन्दमम् । निजघ्ने सायकैस्तीक्ष्णैर्नवभिर्नतपर्वभिः ॥
tatastu tvarito rājañśrutāyuṣamarindamam | nijaghne sāyakaistīkṣṇairnavabhirnataparvabhiḥ
हे राजन्, तब उन्होंने तुरन्त शत्रुदमन श्रुतायु पर झुकी गाँठों वाले नौ तीखे बाण चलाकर प्रहार किया।
श्लोक 3 (6.84.3)
स संवार्य रणे राजा प्रेषितान्धर्मसूनुना । शरान्सप्त महेष्वासः कौन्तेयाय समर्पयत् ॥
sa saṃvārya raṇe rājā preṣitāndharmasūnunā | śarānsapta maheṣvāsaḥ kaunteyāya samarpayat
उस महाधनुर्धर राजा ने रणभूमि में धर्मपुत्र के चलाए बाणों को रोक दिया और कुन्तीपुत्र पर सात बाण छोड़े।
श्लोक 4 (6.84.4)
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे । असूनिव विचिन्वन्तो देहे तस्य महात्मनः ॥
te tasya kavacaṃ bhittvā papuḥ śoṇitamāhave | asūniva vicinvanto dehe tasya mahātmanaḥ
वे बाण उनका कवच भेदकर युद्ध में उनका रक्त पीने लगे, मानो उस महात्मा के शरीर में उसके प्राणों को खोज रहे हों।
श्लोक 5 (6.84.5)
पाण्डवस्तु भृशं क्रुद्धो विद्धस्तेन महात्मना । रणे वराहकर्णेन राजानं हृद्यविध्यत ॥
pāṇḍavastu bhṛśaṃ kruddho viddhastena mahātmanā | raṇe varāhakarṇena rājānaṃ hṛdyavidhyata
उस महावीर के बाणों से घायल और अत्यन्त क्रुद्ध पाण्डव ने रण में वराहकर्ण बाण से राजा की छाती बेध दी।
श्लोक 6 (6.84.6)
अथापरेण भल्लेन केतुं तस्य महात्मनः । रथश्रेष्ठो रथात्तूर्णं भूमौ पार्थो न्यपातयत् ॥
athāpareṇa bhallena ketuṃ tasya mahātmanaḥ | rathaśreṣṭho rathāttūrṇaṃ bhūmau pārtho nyapātayat
फिर रथियों में श्रेष्ठ पार्थ ने एक और भल्ल बाण से उस महात्मा की ध्वजा को तुरन्त रथ से काटकर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 7 (6.84.7)
केतुं निपतितं दृष्ट्वा श्रुतायुः स तु पार्थिवः । पाण्डवं विशिखैस्तीक्ष्णै राजन्विव्याध सप्तभिः ॥
ketuṃ nipatitaṃ dṛṣṭvā śrutāyuḥ sa tu pārthivaḥ | pāṇḍavaṃ viśikhaistīkṣṇai rājanvivyādha saptabhiḥ
अपनी ध्वजा गिरी देखकर राजा श्रुतायु ने, हे राजन्, पाण्डव को सात तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 8 (6.84.8)
ततः क्रोधात्प्रजज्वाल धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । यथा युगान्ते भूतानि दिधक्षुरिव पावकः ॥
tataḥ krodhātprajajvāla dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | yathā yugānte bhūtāni didhakṣuriva pāvakaḥ
इस पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्रोध से ऐसे प्रज्वलित हो उठे, जैसे युग के अन्त में सब प्राणियों को भस्म करने को उद्यत अग्नि।
श्लोक 9 (6.84.9)
क्रुद्धं तु पाण्डवं दृष्ट्वा देवगन्धर्वराक्षसाः । प्रविव्यथुर्महाराज व्याकुलं चाप्यभूज्जगत् ॥
kruddhaṃ tu pāṇḍavaṃ dṛṣṭvā devagandharvarākṣasāḥ | pravivyathurmahārāja vyākulaṃ cāpyabhūjjagat
पाण्डव को क्रुद्ध देखकर, हे महाराज, देवता, गन्धर्व और राक्षस काँप उठे और सारा जगत् व्याकुल हो गया।
श्लोक 10 (6.84.10)
सर्वेषां चैव भूतानामिदमासीन्मनोगतम् । त्रींल्लोकानद्य संक्रुद्धो नृपोऽयं धक्ष्यतीति वै ॥
sarveṣāṃ caiva bhūtānāmidamāsīnmanogatam | trīṃllokānadya saṃkruddho nṛpo'yaṃ dhakṣyatīti vai
सभी प्राणियों के मन में यही विचार उठा कि आज यह क्रुद्ध राजा तीनों लोकों को भस्म कर देगा।
श्लोक 11 (6.84.11)
ऋषयश्चैव देवाश्च चक्रुः स्वस्त्ययनं महत् । लोकानां नृप शान्त्यर्थं क्रोधिते पाण्डवे तदा ॥
ṛṣayaścaiva devāśca cakruḥ svastyayanaṃ mahat | lokānāṃ nṛpa śāntyarthaṃ krodhite pāṇḍave tadā
हे राजन्, जब पाण्डव इस प्रकार क्रुद्ध थे, तब ऋषियों और देवताओं ने लोकों की शान्ति के लिए बड़े-बड़े स्वस्तिवाचन किए।
श्लोक 12 (6.84.12)
स च क्रोधसमाविष्टः सृक्विणी परिसंलिहन् । दधारात्मवपुर्घोरं युगान्तादित्यसन्निभम् ॥
sa ca krodhasamāviṣṭaḥ sṛkviṇī parisaṃlihan | dadhārātmavapurghoraṃ yugāntādityasannibham
क्रोध से भरे और अपने होठों के कोने चाटते हुए उन्होंने युगान्त के सूर्य के समान भयंकर रूप धारण कर लिया।
श्लोक 13 (6.84.13)
ततः सैन्यानि सर्वाणि तावकानि विशांपते । निराशान्यभवंस्तत्र जीवितं प्रति भारत ॥
tataḥ sainyāni sarvāṇi tāvakāni viśāṃpate | nirāśānyabhavaṃstatra jīvitaṃ prati bhārata
हे प्रजानाथ, हे भारत, तब वहाँ आपकी सारी सेनाएँ जीवन की आशा छोड़ बैठीं।
श्लोक 14 (6.84.14)
स तु धैर्येण तं कोपं सन्निवार्य महायशाः । श्रुतायुषः प्रचिच्छेद मुष्टिदेशे महाधनुः ॥
sa tu dhairyeṇa taṃ kopaṃ sannivārya mahāyaśāḥ | śrutāyuṣaḥ praciccheda muṣṭideśe mahādhanuḥ
किन्तु उन यशस्वी राजा ने धैर्य से उस क्रोध को रोक लिया और श्रुतायु का विशाल धनुष मूठ के पास से काट डाला।
श्लोक 15 (6.84.15)
अथैनं छिन्नधन्वानं नाराचेन स्तनान्तरे । निर्बिभेद रणे राजा सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥
athainaṃ chinnadhanvānaṃ nārācena stanāntare | nirbibheda raṇe rājā sarvasainyasya paśyataḥ
फिर सारी सेना के देखते-देखते राजा ने धनुष कटे हुए श्रुतायु की छाती के बीच नाराच बाण से बेध दिया।
श्लोक 16 (6.84.16)
सत्वरं च रणे राजंस्तस्य वाहान्महात्मनः । निजघान शरैः क्षिप्रं सूतं च सुमहाबलः ॥
satvaraṃ ca raṇe rājaṃstasya vāhānmahātmanaḥ | nijaghāna śaraiḥ kṣipraṃ sūtaṃ ca sumahābalaḥ
और हे राजन्, उस महाबली ने रण में शीघ्र ही बाणों से उस महात्मा के घोड़ों और सारथि को भी मार डाला।
श्लोक 17 (6.84.17)
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दृष्ट्वा राज्ञोऽस्य पौरुषम् । विप्रदुद्राव वेगेन श्रुतायुः समरे तदा ॥
hatāśvaṃ tu rathaṃ tyaktvā dṛṣṭvā rājño'sya pauruṣam | vipradudrāva vegena śrutāyuḥ samare tadā
राजा का पराक्रम देखकर श्रुतायु घोड़े मरे हुए रथ को छोड़कर उस समय युद्धभूमि से वेग से भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 18 (6.84.18)
तस्मिञ्जिते महेष्वासे धर्मपुत्रेण संयुगे । दुर्योधनबलं राजन्सर्वमासीत्पराङ्मुखम् ॥
tasmiñjite maheṣvāse dharmaputreṇa saṃyuge | duryodhanabalaṃ rājansarvamāsītparāṅmukham
जब धर्मपुत्र ने युद्ध में उस महाधनुर्धर को परास्त कर दिया, तब हे राजन्, दुर्योधन की सारी सेना पीठ दिखाकर भाग चली।
श्लोक 19 (6.84.19)
एवं जित्वा महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । व्यात्ताननो यथा कालस्तव सैन्यं जघान ह ॥
evaṃ jitvā mahārāja dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | vyāttānano yathā kālastava sainyaṃ jaghāna ha
हे महाराज, इस प्रकार विजय पाकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर मुँह फैलाए काल के समान आपकी सेना का संहार करने लगे।
श्लोक 20 (6.84.20)
चेकितानस्तु वार्ष्णेयो गौतमं रथिनां वरम् । प्रेक्षतां सर्वसैन्यानां छादयामास सायकैः ॥
cekitānastu vārṣṇeyo gautamaṃ rathināṃ varam | prekṣatāṃ sarvasainyānāṃ chādayāmāsa sāyakaiḥ
वृष्णिवंशी चेकितान ने सारी सेनाओं के देखते-देखते रथियों में श्रेष्ठ गौतम (कृपाचार्य) को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 21 (6.84.21)
संनिवार्य शरांस्तांस्तु कृपः शारद्वतो युधि । चेकितानं रणे यत्तं राजन्विव्याध पत्रिभिः ॥
saṃnivārya śarāṃstāṃstu kṛpaḥ śāradvato yudhi | cekitānaṃ raṇe yattaṃ rājanvivyādha patribhiḥ
शरद्वान् के पुत्र कृप ने युद्ध में उन बाणों को रोककर, हे राजन्, रण में डटे चेकितान को पंखदार बाणों से बेध दिया।
श्लोक 22 (6.84.22)
अथापरेण भल्लेन धनुश्चिच्छेद मारिष । सारथिं चास्य समरे क्षिप्रहस्तो न्यपातयत् ॥
athāpareṇa bhallena dhanuściccheda māriṣa | sārathiṃ cāsya samare kṣiprahasto nyapātayat
फिर, हे मान्यवर, एक और भल्ल बाण से उन्होंने चेकितान का धनुष काट दिया और फुर्तीले हाथ से युद्ध में उसके सारथि को भी गिरा दिया।
श्लोक 23 (6.84.23)
अश्वांश्चास्यावधीद्राजन्नुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । अवप्लुत्य रथात्तूर्णं गदां जग्राह सात्वतः ॥
aśvāṃścāsyāvadhīdrājannubhau tau pārṣṇisārathī | avaplutya rathāttūrṇaṃ gadāṃ jagrāha sātvataḥ
हे राजन्, उन्होंने उसके घोड़ों को और दोनों पार्श्वरक्षक सारथियों को भी मार डाला। तब वह सात्वत वीर तुरन्त रथ से कूदा और उसने गदा उठा ली।
श्लोक 24 (6.84.24)
स तया वीरघातिन्या गदया गदिनां वरः । गौतमस्य हयान्हत्वा सारथिं च न्यपातयत् ॥
sa tayā vīraghātinyā gadayā gadināṃ varaḥ | gautamasya hayānhatvā sārathiṃ ca nyapātayat
गदाधारियों में श्रेष्ठ उस वीर ने उस वीरघातिनी गदा से गौतम के घोड़ों को मारकर उनके सारथि को गिरा दिया।
श्लोक 25 (6.84.25)
भूमिष्ठो गौतमस्तस्य शरांश्चिक्षेप षोडश । शरास्ते सात्वतं भित्त्वा प्राविशन्धरणीतलम् ॥
bhūmiṣṭho gautamastasya śarāṃścikṣepa ṣoḍaśa | śarāste sātvataṃ bhittvā prāviśandharaṇītalam
भूमि पर खड़े गौतम ने उस पर सोलह बाण चलाए; वे बाण सात्वत को बेधकर धरती में समा गए।
श्लोक 26 (6.84.26)
चेकितानस्ततः क्रुद्धः पुनश्चिक्षेप तां गदाम् । गौतमस्य वधाकाङ्क्षी वृत्रस्येव पुरन्दरः ॥
cekitānastataḥ kruddhaḥ punaścikṣepa tāṃ gadām | gautamasya vadhākāṅkṣī vṛtrasyeva purandaraḥ
तब क्रुद्ध चेकितान ने गौतम के वध की इच्छा से वह गदा फिर फेंकी, जैसे पुरन्दर इन्द्र ने वृत्र पर प्रहार किया था।
श्लोक 27 (6.84.27)
तामापतन्तीं विमलामश्मगर्भां महागदाम् । शरैरनेकसाहस्रैर्वारयामास गौतमः ॥
tāmāpatantīṃ vimalāmaśmagarbhāṃ mahāgadām | śarairanekasāhasrairvārayāmāsa gautamaḥ
पत्थर के भीतरी भाग वाली उस चमकती विशाल गदा को अपनी ओर आते देख गौतम ने हजारों बाणों से उसे रोक दिया।
श्लोक 28 (6.84.28)
चेकितानस्ततः खड्गं क्रोधादुद्धृत्य भारत । लाघवं परमास्थाय गौतमं समुपाद्रवत् ॥
cekitānastataḥ khaḍgaṃ krodhāduddhṛtya bhārata | lāghavaṃ paramāsthāya gautamaṃ samupādravat
हे भारत, तब चेकितान ने क्रोध से तलवार खींच ली और पूरी फुर्ती से गौतम पर टूट पड़ा।
श्लोक 29 (6.84.29)
गौतमोऽपि धनुस्त्यक्त्वा प्रगृह्यासिं सुसंयतः । वेगेन महता राजंश्चेकितानमुपाद्रवत् ॥
gautamo'pi dhanustyaktvā pragṛhyāsiṃ susaṃyataḥ | vegena mahatā rājaṃścekitānamupādravat
हे राजन्, गौतम ने भी धनुष छोड़कर पूरे संयम से तलवार उठा ली और बड़े वेग से चेकितान की ओर दौड़े।
श्लोक 30 (6.84.30)
तावुभौ बलसंपन्नौ निस्त्रिंशवरधारिणौ । निस्त्रिंशाभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यामन्योन्यं संततक्षतुः ॥
tāvubhau balasaṃpannau nistriṃśavaradhāriṇau | nistriṃśābhyāṃ sutīkṣṇābhyāmanyonyaṃ saṃtatakṣatuḥ
बल से सम्पन्न और श्रेष्ठ तलवारें धारण किए वे दोनों अपनी तीखी तलवारों से एक-दूसरे को काटने लगे।
श्लोक 31 (6.84.31)
निस्त्रिंशवेगाभिहतौ ततस्तौ पुरुषर्षभौ । धरणीं समनुप्राप्तौ सर्वभूतनिषेविताम् ॥
nistriṃśavegābhihatau tatastau puruṣarṣabhau | dharaṇīṃ samanuprāptau sarvabhūtaniṣevitām
तलवारों के वेग से आहत वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ तब उस धरती पर गिर पड़े, जिस पर सब प्राणी निवास करते हैं।
श्लोक 32 (6.84.32)
मूर्छयाऽभिपरीताङ्गौ व्यायामेन तु मोहितौ । ततोऽभ्यधावद्वेगेन भीमसेनः सुहृत्तया ॥
mūrchayā'bhiparītāṅgau vyāyāmena tu mohitau | tato'bhyadhāvadvegena bhīmasenaḥ suhṛttayā
उनके अंग मूर्छा से घिर गए थे और थकान से वे अचेत हो गए थे। तब भीमसेन मित्रभाव से वेग से दौड़कर आए,
श्लोक 33 (6.84.33)
चेकितानं तथाभूतं दृष्ट्वा समरदुर्मदः । रथमारोपयच्चैनं सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥
cekitānaṃ tathābhūtaṃ dṛṣṭvā samaradurmadaḥ | rathamāropayaccainaṃ sarvasainyasya paśyataḥ
और चेकितान को उस दशा में देखकर उस रणदुर्मद वीर ने सारी सेना के देखते-देखते उसे अपने रथ पर चढ़ा लिया।
श्लोक 34 (6.84.34)
तथैव शकुनिः शूरः स्यालस्तव विशांपते । आरोपयद्रथं तूर्णं गौतमं रथिनां वरम् ॥
tathaiva śakuniḥ śūraḥ syālastava viśāṃpate | āropayadrathaṃ tūrṇaṃ gautamaṃ rathināṃ varam
उसी प्रकार, हे प्रजानाथ, आपके साले वीर शकुनि ने रथियों में श्रेष्ठ गौतम को तुरन्त अपने रथ पर चढ़ा लिया।
श्लोक 35 (6.84.35)
सौमदत्तिं ततः क्रुद्धो धृष्टकेतुर्महाबलः । नवत्या सायकैः क्षिप्रं राजन्विव्याध वक्षसि ॥
saumadattiṃ tataḥ kruddho dhṛṣṭaketurmahābalaḥ | navatyā sāyakaiḥ kṣipraṃ rājanvivyādha vakṣasi
तब महाबली धृष्टकेतु ने क्रुद्ध होकर, हे राजन्, शीघ्र ही नब्बे बाणों से सोमदत्तपुत्र की छाती बेध दी।
श्लोक 36 (6.84.36)
सौमदत्तिरुरस्थैस्तैर्भृशं बाणैरशोभत । मध्यंदिने महाराज रश्मिभिस्तपनो यथा ॥
saumadattirurasthaistairbhṛśaṃ bāṇairaśobhata | madhyaṃdine mahārāja raśmibhistapano yathā
हे महाराज, छाती में धँसे उन बाणों से सोमदत्तपुत्र मध्याह्न में किरणों से युक्त सूर्य के समान अत्यन्त शोभित हुए।
श्लोक 37 (6.84.37)
भूरिश्रवास्तु समरे धृष्टकेतुं महारथम् । हतसूतहयं चक्रे विरथं सायकोत्तमैः ॥
bhūriśravāstu samare dhṛṣṭaketuṃ mahāratham | hatasūtahayaṃ cakre virathaṃ sāyakottamaiḥ
परन्तु भूरिश्रवा ने युद्ध में अपने उत्तम बाणों से महारथी धृष्टकेतु के सारथि और घोड़ों को मारकर उसे रथहीन कर दिया।
श्लोक 38 (6.84.38)
विरथं तं समालोक्य हताश्वं हतसारथिम् । महता शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे ॥
virathaṃ taṃ samālokya hatāśvaṃ hatasārathim | mahatā śaravarṣeṇa cchādayāmāsa saṃyuge
उसे रथहीन, घोड़ों और सारथि से रहित देखकर भूरिश्रवा ने युद्ध में बाणों की भारी वर्षा से उसे ढक दिया।
श्लोक 39 (6.84.39)
स तु तं रथमुत्सृज्य धृष्टकेतुर्महामनाः । आरुरोह ततो यानं शतानीकस्य मारिष ॥
sa tu taṃ rathamutsṛjya dhṛṣṭaketurmahāmanāḥ | āruroha tato yānaṃ śatānīkasya māriṣa
हे मान्यवर, उदारचित्त धृष्टकेतु उस रथ को छोड़कर शतानीक के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 40 (6.84.40)
चित्रसेनो विकर्णश्च राजन्दुर्मर्षणस्तथा । रथिनो हेमसन्नाहाः सौभद्रमभिदुद्रुवुः ॥
citraseno vikarṇaśca rājandurmarṣaṇastathā | rathino hemasannāhāḥ saubhadramabhidudruvuḥ
हे राजन्, चित्रसेन, विकर्ण और दुर्मर्षण, सोने के कवच पहने ये रथी, सुभद्रापुत्र पर टूट पड़े।
श्लोक 41 (6.84.41)
अभिमन्योस्ततस्तैस्तु घोरं युद्धमवर्तत । शरीरस्य यथा राजन्वातपित्तकफैस्त्रिभिः ॥
abhimanyostatastaistu ghoraṃ yuddhamavartata | śarīrasya yathā rājanvātapittakaphaistribhiḥ
हे राजन्, तब अभिमन्यु और उनके बीच वैसा ही घोर युद्ध छिड़ गया, जैसा शरीर का वात, पित्त और कफ तीनों से होता है।
श्लोक 42 (6.84.42)
विरथांस्तव पुत्रांस्तु कृत्वा राजन्महाहवे । न जघान नरव्याघ्रः स्मरन्भीमवचस्तदा ॥
virathāṃstava putrāṃstu kṛtvā rājanmahāhave | na jaghāna naravyāghraḥ smaranbhīmavacastadā
हे राजन्, उस महायुद्ध में आपके पुत्रों को रथहीन करके भी उस नरव्याघ्र ने भीम के वचन याद करके उन्हें नहीं मारा।
श्लोक 43 (6.84.43)
ततो राज्ञां बहुशतैर्गजाश्वरथयायिभिः । संवृतं समरे भीष्मं देवैरपि दुरासदम् ॥
tato rājñāṃ bahuśatairgajāśvarathayāyibhiḥ | saṃvṛtaṃ samare bhīṣmaṃ devairapi durāsadam
तब युद्धभूमि में हाथियों, घोड़ों और रथों पर सवार सैकड़ों राजाओं से घिरे और देवताओं के लिए भी दुर्जय भीष्म को
श्लोक 44 (6.84.44)
प्रयान्तं शीघ्रमुद्वीक्ष्य परित्रातुं सुतांस्तव । अभिमन्युं समुद्दिश्य बालमेकं महारथम् ॥
prayāntaṃ śīghramudvīkṣya paritrātuṃ sutāṃstava | abhimanyuṃ samuddiśya bālamekaṃ mahāratham
आपके पुत्रों की रक्षा के लिए अकेले बालक महारथी अभिमन्यु को लक्ष्य करके तेज़ी से जाते देखकर
श्लोक 45 (6.84.45)
वासुदेवमुवाचेदं कौन्तेयः श्वेतवाहनः । चोदयाश्वान्हृषीकेश यत्रैते बहुला रथाः ॥
vāsudevamuvācedaṃ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | codayāśvānhṛṣīkeśa yatraite bahulā rathāḥ
श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र ने वासुदेव से कहा, "हे हृषीकेश, जहाँ ये बहुत-से रथ हैं, वहाँ घोड़े हाँकिए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 46 (6.84.46)
एते हि बहवः शूराः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । यथा हन्युर्न नः सेनां तथा माधव चोदय ॥
ete hi bahavaḥ śūrāḥ kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ | yathā hanyurna naḥ senāṃ tathā mādhava codaya
क्योंकि ये बहुत-से वीर अस्त्रविद्या में निपुण और रणदुर्मद हैं। हे माधव, ऐसे हाँकिए कि ये हमारी सेना का नाश न कर सकें।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (6.84.47)
एवमुक्तः स वार्ष्णेयः कौन्तेयेनामितौजसा । रथं श्वेतहयैर्युक्तं प्रेषयामास संयुगे ॥
evamuktaḥ sa vārṣṇeyaḥ kaunteyenāmitaujasā | rathaṃ śvetahayairyuktaṃ preṣayāmāsa saṃyuge
अमित तेजस्वी कुन्तीपुत्र के ऐसा कहने पर वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण ने श्वेत घोड़ों से जुता रथ युद्धभूमि में आगे बढ़ाया।
श्लोक 48 (6.84.48)
निष्ठानको महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष । यदर्जुनो रणे क्रुद्धः संयातस्तावकान्प्रति ॥
niṣṭhānako mahānāsīttava sainyasya māriṣa | yadarjuno raṇe kruddhaḥ saṃyātastāvakānprati
हे मान्यवर, जब अर्जुन क्रुद्ध होकर रण में आपके योद्धाओं की ओर बढ़े, तब आपकी सेना में बड़ा कोलाहल मच गया।
श्लोक 49 (6.84.49)
समासाद्य तु कौन्तेयो राज्ञस्तान्भीष्मरक्षिणः । सुशर्माणमथो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
samāsādya tu kaunteyo rājñastānbhīṣmarakṣiṇaḥ | suśarmāṇamatho rājannidaṃ vacanamabravīt
हे राजन्, भीष्म की रक्षा करने वाले उन राजाओं के पास पहुँचकर कुन्तीपुत्र ने सुशर्मा से ये वचन कहे:
अर्जुन उवाच
श्लोक 50 (6.84.50)
जानामि त्वां युधां श्रेष्ठमत्यन्तं पूर्ववैरिणम् । अनयस्याद्य संप्राप्तं फलं पश्य सुदारुणम् ॥
jānāmi tvāṃ yudhāṃ śreṣṭhamatyantaṃ pūrvavairiṇam | anayasyādya saṃprāptaṃ phalaṃ paśya sudāruṇam
"मैं जानता हूँ कि तुम योद्धाओं में श्रेष्ठ हो और बहुत पुराने शत्रु हो। आज तुम्हें अपनी अनीति का जो अत्यन्त कटु फल मिला है, उसे देखो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 51 (6.84.51)
अद्य ते दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् । एवं संजल्पतस्तस्य बीभत्सोः शत्रुघातिनः ॥
adya te darśayiṣyāmi pūrvapretānpitāmahān | evaṃ saṃjalpatastasya bībhatsoḥ śatrughātinaḥ
आज मैं तुम्हें तुम्हारे पहले ही परलोक जा चुके पितामहों के दर्शन कराऊँगा।" शत्रुघाती बीभत्सु के ऐसा कहने पर भी,
श्लोक 52 (6.84.52)
श्रुत्वापि परुषं वाक्यं सुशर्मा रथयूथपः । न चैनमब्रवीत्किंचिच्छुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥
śrutvāpi paruṣaṃ vākyaṃ suśarmā rathayūthapaḥ | na cainamabravītkiṃcicchubhaṃ vā yadi vā'śubham
और वे कठोर वचन सुनकर भी रथयूथपति सुशर्मा ने उनसे भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा।
श्लोक 53 (6.84.53)
अभिगम्यार्जुनं वीरं राजभिर्बहुभिर्वृतः । पुरस्तात्पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्चैव सर्वतः ॥
abhigamyārjunaṃ vīraṃ rājabhirbahubhirvṛtaḥ | purastātpṛṣṭhataścaiva pārśvataścaiva sarvataḥ
बहुत-से राजाओं से घिरा हुआ वह वीर अर्जुन की ओर बढ़ा और आगे, पीछे, बगल में, सब ओर से
श्लोक 54 (6.84.54)
परिवार्यार्जुनं सङ्ख्ये तव पुत्रैर्महारथः । शरैः संछादयामास मेघैरिव दिवाकरम् ॥
parivāryārjunaṃ saṅkhye tava putrairmahārathaḥ | śaraiḥ saṃchādayāmāsa meghairiva divākaram
उस महारथी ने आपके पुत्रों के साथ युद्ध में अर्जुन को घेरकर उन्हें बाणों से ऐसे ढक दिया, जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं।
श्लोक 55 (6.84.55)
ततः प्रवृत्तः सुमहान्संग्रामः शोणितोदकः । तावकानां च समरे पाण्डवानां च भारत ॥
tataḥ pravṛttaḥ sumahānsaṃgrāmaḥ śoṇitodakaḥ | tāvakānāṃ ca samare pāṇḍavānāṃ ca bhārata
हे भारत, तब आपके और पाण्डवों के योद्धाओं के बीच एक बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया, जिसमें रक्त ही जल बनकर बहने लगा।