भीष्म पर्व · अध्याय 83
भगदत्त से घटोत्कच की पराजय; माद्रीपुत्रों द्वारा शल्य की हार
धृतराष्ट्र शिकायत करते हैं कि सञ्जय सदा पाण्डवों की ही विजय सुनाता है; सञ्जय उत्तर देता है कि कौरव यथाशक्ति लड़ रहे हैं और यह विनाश राजा के अपने ही दोष का फल है, फिर सातवें दिन का वर्णन आगे बढ़ाता है। युधामन्यु अवन्ती के भाइयों विन्द और अनुविन्द को परास्त करता है; हाथी पर सवार भगदत्त पाण्डवों को भगा देते हैं, घटोत्कच के घोड़े मारकर उसकी शक्ति काट देते हैं और उसे भागने पर विवश कर देते हैं। शल्य नकुल को रथहीन कर देते हैं, पर सहदेव उन्हें ऐसा गहरा घायल करते हैं कि वे मूर्च्छित हो जाते हैं और सारथि उन्हें रणभूमि से ले जाता है, तब माद्रीपुत्र कौरव-सेना पर टूट पड़ते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.83.1)
बहूनि हि विचित्राणि द्वैरथानि स्म सञ्जय । पाण्डूनां मामकैः सार्धमश्रौषं तव जल्पतः ॥
bahūni hi vicitrāṇi dvairathāni sma sañjaya | pāṇḍūnāṃ māmakaiḥ sārdhamaśrauṣaṃ tava jalpataḥ
सञ्जय, मैंने तुम्हारे मुख से पाण्डवों और मेरे योद्धाओं के बीच हुए अनेक विचित्र द्वन्द्व-युद्धों का वर्णन सुना है।
श्लोक 2 (6.83.2)
न चैव मामकं किंचिद्धृष्टं शंससि सञ्जय । नित्यं पाण्डुसुतान्हृष्टानभग्नान्संप्रशंससि ॥
na caiva māmakaṃ kiṃciddhṛṣṭaṃ śaṃsasi sañjaya | nityaṃ pāṇḍusutānhṛṣṭānabhagnānsaṃpraśaṃsasi
पर सञ्जय, तुम मेरे किसी भी योद्धा को हर्षित (विजयी) नहीं बताते; सदा पाण्डुपुत्रों को ही प्रसन्न और अटूट बताकर उनकी प्रशंसा करते हो।
श्लोक 3 (6.83.3)
जीयमानान्विमनसो मामकान्विगतौजसः । वदसे संयुगे सूत दिष्टमेतन्न संशयः ॥
jīyamānānvimanaso māmakānvigataujasaḥ | vadase saṃyuge sūta diṣṭametanna saṃśayaḥ
हे सूत, तुम मेरे योद्धाओं को युद्ध में हारते हुए, उदास और तेजहीन बताते हो। निःसन्देह यह दैव का ही विधान है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (6.83.4)
यथाशक्ति यथोत्साहं युद्धे चेष्टन्ति तावकाः । दर्शयानाः परं शक्त्या पौरुषं पुरुषर्षभ ॥
yathāśakti yathotsāhaṃ yuddhe ceṣṭanti tāvakāḥ | darśayānāḥ paraṃ śaktyā pauruṣaṃ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके योद्धा युद्ध में अपनी पूरी शक्ति और उत्साह से जूझते हैं और यथाशक्ति उत्तम पौरुष दिखाते हैं।
श्लोक 5 (6.83.5)
गङ्गायाः सुरनद्या वै स्वादुभूतं यथोदकम् । महोदधिसमभ्याशे लवणत्वं निगच्छति ॥
gaṅgāyāḥ suranadyā vai svādubhūtaṃ yathodakam | mahodadhisamabhyāśe lavaṇatvaṃ nigacchati
परन्तु जैसे देवनदी गङ्गा का मीठा जल महासागर के निकट पहुँचकर खारा हो जाता है,
श्लोक 6 (6.83.6)
तथा तत्पौरुषं राजंस्तावकानां परंतप । प्राप्य पाण्डुसुतान्वीरान्व्यर्थं भवति संयुगे ॥
tathā tatpauruṣaṃ rājaṃstāvakānāṃ paraṃtapa | prāpya pāṇḍusutānvīrānvyarthaṃ bhavati saṃyuge
वैसे ही, हे परन्तप राजन्, आपके योद्धाओं का पौरुष युद्ध में वीर पाण्डुपुत्रों से टकराकर व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 7 (6.83.7)
घटमानान्यथाशक्ति कुर्वाणान्कर्म दुष्करम् । न दोषेण कुरुश्रेष्ठ कौरवान्गन्तुमर्हसि ॥
ghaṭamānānyathāśakti kurvāṇānkarma duṣkaram | na doṣeṇa kuruśreṣṭha kauravāngantumarhasi
हे कुरुश्रेष्ठ, कौरव यथाशक्ति प्रयत्न कर रहे हैं और दुष्कर कर्म कर रहे हैं; आपको उन्हें दोष नहीं देना चाहिए।
श्लोक 8 (6.83.8)
तवापराधात्सुमहान्सपुत्रस्य विशांपते । पृथिव्याः प्रक्षयो घोरो यमराष्ट्रविवर्धनः ॥
tavāparādhātsumahānsaputrasya viśāṃpate | pṛthivyāḥ prakṣayo ghoro yamarāṣṭravivardhanaḥ
हे प्रजानाथ, आपके और आपके पुत्र के अपराध से ही पृथ्वी का यह महान और भयंकर विनाश हो रहा है, जो यमराज के राज्य को बढ़ा रहा है।
श्लोक 9 (6.83.9)
आत्मदोषात्समुत्पन्नं शोचितुं नार्हसे नृप । न हि रक्षन्ति राजानः सर्वथाऽत्रापि जीवितम् ॥
ātmadoṣātsamutpannaṃ śocituṃ nārhase nṛpa | na hi rakṣanti rājānaḥ sarvathā'trāpi jīvitam
हे नरेश, जो आपके अपने दोष से उपजा है, उस पर शोक करना आपको उचित नहीं। राजा लोग यहाँ किसी भी प्रकार अपने प्राणों तक को बचाकर नहीं रखते।
श्लोक 10 (6.83.10)
युद्धे सुकृतिनां लोकानिच्छन्तो वसुधाधिपाः । चमूं विगाह्य युद्ध्यन्ते नित्यं स्वर्गपरायणाः ॥
yuddhe sukṛtināṃ lokānicchanto vasudhādhipāḥ | camūṃ vigāhya yuddhyante nityaṃ svargaparāyaṇāḥ
युद्ध के द्वारा पुण्यात्माओं के लोक पाने की इच्छा से पृथ्वीपति शत्रु-सेना में घुसकर लड़ते हैं, सदा स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानकर।
श्लोक 11 (6.83.11)
पूर्वाह्णे तु महाराज प्रावर्तत जनक्षयः । तं त्वमेकमना भूत्वा शृणु देवासुरोपमम् ॥
pūrvāhṇe tu mahārāja prāvartata janakṣayaḥ | taṃ tvamekamanā bhūtvā śṛṇu devāsuropamam
हे महाराज, पूर्वाह्न में भारी जनसंहार आरम्भ हुआ। देवासुर-संग्राम के समान उस युद्ध का वृत्तान्त आप एकाग्र मन से सुनिए।
श्लोक 12 (6.83.12)
आवन्त्यौ तु महेष्वासौ महासेनौ महाबलौ । युधामन्युमभिप्रेक्ष्य समेयातां रणोत्कटौ ॥
āvantyau tu maheṣvāsau mahāsenau mahābalau | yudhāmanyumabhiprekṣya sameyātāṃ raṇotkaṭau
अवन्ती के दोनों राजकुमार, जो महाधनुर्धर, विशाल सेनाओं वाले, महाबली और रण में प्रचण्ड थे, युधामन्यु को देखकर एक साथ उससे जा भिड़े।
श्लोक 13 (6.83.13)
तेषां प्रववृते युद्धं सुमहद्रोमहर्षणम् । युधामन्युः सुसंक्रुद्धो भ्रातरौ देवरूपिणौ ॥
teṣāṃ pravavṛte yuddhaṃ sumahadromaharṣaṇam | yudhāmanyuḥ susaṃkruddho bhrātarau devarūpiṇau
तब उनके बीच अत्यन्त रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया। अत्यन्त क्रुद्ध युधामन्यु ने देवताओं-से रूपवान उन दोनों भाइयों को
श्लोक 14 (6.83.14)
विव्याध निशितैस्तूर्णं शरैः सन्नतपर्वभिः । तावेनं प्रत्यविध्येतां समरे चित्रयोधिनौ ॥
vivyādha niśitaistūrṇaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | tāvenaṃ pratyavidhyetāṃ samare citrayodhinau
झुकी गाँठों वाले तीखे बाणों से तुरन्त बींध दिया, और विचित्र ढंग से युद्ध करने वाले उन दोनों ने भी युद्ध में उसे पलटकर बींधा।
श्लोक 15 (6.83.15)
युध्यतां हि तथा राजन्विशेषो न व्यदृश्यत । यततां शत्रुनाशाय कृतप्रतिकृतैषिणाम् ॥
yudhyatāṃ hi tathā rājanviśeṣo na vyadṛśyata | yatatāṃ śatrunāśāya kṛtapratikṛtaiṣiṇām
हे राजन्, इस प्रकार शत्रु के विनाश के लिए यत्न करते और प्रहार का प्रत्युत्तर देने को आतुर उन योद्धाओं के युद्ध में कोई अन्तर न दिखाई दिया।
श्लोक 16 (6.83.16)
युधामन्युस्ततो राजन्ननुविन्दस्य सायकैः । चतुर्भिश्चतुरो वाहाननयद्यमसादनम् ॥
yudhāmanyustato rājannanuvindasya sāyakaiḥ | caturbhiścaturo vāhānanayadyamasādanam
तब हे राजन्, युधामन्यु ने चार बाणों से अनुविन्द के चारों घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया,
श्लोक 17 (6.83.17)
भल्लाभ्यां च सुतीक्ष्णाभ्यां धनुः केतुं च मारिष । चिच्छेद समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
bhallābhyāṃ ca sutīkṣṇābhyāṃ dhanuḥ ketuṃ ca māriṣa | ciccheda samare rājaṃstadadbhutamivābhavat
और हे मान्यवर, दो अत्यन्त तीखे भल्लों से युद्ध में उसका धनुष और ध्वज काट डाला; हे राजन्, यह अद्भुत-सा था।
श्लोक 18 (6.83.18)
त्यक्त्वाऽनुविन्दोऽथ रथं विन्दस्य रथमास्थितः । धनुर्गृहीत्वा परमं भारसाधनमुत्तमम् ॥
tyaktvā'nuvindo'tha rathaṃ vindasya rathamāsthitaḥ | dhanurgṛhītvā paramaṃ bhārasādhanamuttamam
तब अनुविन्द अपना रथ छोड़कर विन्द के रथ पर जा बैठा और भारी खिंचाव सहने में समर्थ एक उत्तम, श्रेष्ठ धनुष उठा लिया।
श्लोक 19 (6.83.19)
तावेकस्थौ रणे वीरावावन्त्यौ रथिनां वरौ । शरान्मुमुचतुस्तूर्णं युधामन्यौ महात्मनि ॥
tāvekasthau raṇe vīrāvāvantyau rathināṃ varau | śarānmumucatustūrṇaṃ yudhāmanyau mahātmani
युद्ध में एक ही रथ पर खड़े अवन्ती के वे दोनों वीर, रथियों में श्रेष्ठ, महात्मा युधामन्यु पर तुरन्त बाण छोड़ने लगे।
श्लोक 20 (6.83.20)
ताभ्यां मुक्ता महावेगाः शराः काञ्चनभूषणाः । दिवाकरपथं प्राप्य च्छादयामासुरम्बरम् ॥
tābhyāṃ muktā mahāvegāḥ śarāḥ kāñcanabhūṣaṇāḥ | divākarapathaṃ prāpya cchādayāmāsurambaram
उनके छोड़े हुए स्वर्णभूषित वेगवान बाण सूर्य के मार्ग तक पहुँचकर आकाश पर छा गए।
श्लोक 21 (6.83.21)
युधामन्यू रणे क्रुद्धो भ्रातरौ तौ महारथौ । ववर्ष शरवर्षेण सारथिं चाप्यपातयत् ॥
yudhāmanyū raṇe kruddho bhrātarau tau mahārathau | vavarṣa śaravarṣeṇa sārathiṃ cāpyapātayat
युद्ध में क्रुद्ध युधामन्यु ने उन दोनों महारथी भाइयों पर बाणों की वर्षा की और उनके सारथि को भी गिरा दिया।
श्लोक 22 (6.83.22)
तस्मिंस्तु पतिते भूमौ गतसत्त्वे तु सारथौ । रथः प्रदुद्राव दिशः समुद्भ्रान्तहयस्ततः ॥
tasmiṃstu patite bhūmau gatasattve tu sārathau | rathaḥ pradudrāva diśaḥ samudbhrāntahayastataḥ
जब वह सारथि प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ा, तब घबराए घोड़ों वाला वह रथ दिशाओं में इधर-उधर भाग चला।
श्लोक 23 (6.83.23)
तौ स जित्वा महाराज यज्ञसेनसुतः प्रभुः । पौरुषं ख्यापयंस्तूर्णं व्यधमत्तव वाहिनीम् ॥
tau sa jitvā mahārāja yajñasenasutaḥ prabhuḥ | pauruṣaṃ khyāpayaṃstūrṇaṃ vyadhamattava vāhinīm
हे महाराज, उन दोनों को जीतकर यज्ञसेन के प्रभावशाली पुत्र ने अपना पौरुष प्रकट करते हुए शीघ्र ही आपकी सेना को तितर-बितर कर दिया।
श्लोक 24 (6.83.24)
सा वध्यमाना समरे धार्तराष्ट्री महाचमूः । वेगान्बहुविधांश्चक्रे विषं पीत्वेव मानवः ॥
sā vadhyamānā samare dhārtarāṣṭrī mahācamūḥ | vegānbahuvidhāṃścakre viṣaṃ pītveva mānavaḥ
युद्ध में मार खाती धृतराष्ट्रपुत्र की वह विशाल सेना विष पिए मनुष्य की भाँति अनेक प्रकार से छटपटाने लगी।
श्लोक 25 (6.83.25)
हैडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भगदत्तं समाद्रवत् । रथेनादित्यवर्णेन सध्वजेन महाबलः ॥
haiḍimbo rākṣasendrastu bhagadattaṃ samādravat | rathenādityavarṇena sadhvajena mahābalaḥ
हिडिम्बा का पुत्र, राक्षसराज महाबली घटोत्कच सूर्य के समान वर्ण वाले, ध्वजयुक्त रथ पर सवार होकर भगदत्त पर टूट पड़ा।
श्लोक 26 (6.83.26)
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा नागराजं समास्थितः । यथा वज्रधरः पूर्वं संग्रामे तारकामये ॥
tataḥ prāgjyotiṣo rājā nāgarājaṃ samāsthitaḥ | yathā vajradharaḥ pūrvaṃ saṃgrāme tārakāmaye
तब प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भगदत्त अपने गजराज पर सवार होकर उसका सामना करने आए, जैसे पूर्वकाल में तारकामय संग्राम में वज्रधारी इन्द्र आए थे।
श्लोक 27 (6.83.27)
तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च समागताः । विशेषं न स्म विविदुर्हैडिम्बभगदत्तयोः ॥
tatra devāḥ sagandharvā ṛṣayaśca samāgatāḥ | viśeṣaṃ na sma vividurhaiḍimbabhagadattayoḥ
वहाँ गन्धर्वों सहित देवता और ऋषि भी आ जुटे, पर वे घटोत्कच और भगदत्त में कोई अन्तर न कर सके।
श्लोक 28 (6.83.28)
यथा सुरपतिः शक्रस्त्रासयामास दानवान् । तथैव समरे राजा द्रावयामास पाण्डवान् ॥
yathā surapatiḥ śakrastrāsayāmāsa dānavān | tathaiva samare rājā drāvayāmāsa pāṇḍavān
जैसे देवराज इन्द्र ने दानवों को भयभीत किया था, वैसे ही राजा भगदत्त ने युद्ध में पाण्डवों को खदेड़ दिया।
श्लोक 29 (6.83.29)
तेन विद्राव्यमाणास्ते पाण्डवाः सर्वतो दिशम् । त्रातारं नाभ्यगच्छन्तः स्वेष्वनीकेषु भारत ॥
tena vidrāvyamāṇāste pāṇḍavāḥ sarvato diśam | trātāraṃ nābhyagacchantaḥ sveṣvanīkeṣu bhārata
हे भारत, उनके द्वारा सब दिशाओं में खदेड़े गए पाण्डवों को अपनी ही सेनाओं में कोई रक्षक न मिला।
श्लोक 30 (6.83.30)
भैमसेनिं रथस्थं तु तत्रापश्याम भारत । शेषा विमनसो भूत्वा प्राद्रवन्त महारथाः ॥
bhaimaseniṃ rathasthaṃ tu tatrāpaśyāma bhārata | śeṣā vimanaso bhūtvā prādravanta mahārathāḥ
हे भारत, वहाँ हमने केवल भीमपुत्र घटोत्कच को रथ पर डटा देखा; शेष महारथी उदास होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 31 (6.83.31)
निवृत्तेषु तु पाण्डूनां पुनः सैन्येषु भारत । आसीन्निष्ठानको घोरस्तव सैन्यस्य संयुगे ॥
nivṛtteṣu tu pāṇḍūnāṃ punaḥ sainyeṣu bhārata | āsīnniṣṭhānako ghorastava sainyasya saṃyuge
हे भारत, जब पाण्डवों की सेनाएँ फिर लौट आईं, तब युद्ध में आपकी सेना में भयंकर कोलाहल मच गया।
श्लोक 32 (6.83.32)
घटोत्कचस्ततो राजन्भगदत्तं महारणे । शरैः प्रच्छादयामास मेरुं गिरिमिवाम्बुदः ॥
ghaṭotkacastato rājanbhagadattaṃ mahāraṇe | śaraiḥ pracchādayāmāsa meruṃ girimivāmbudaḥ
हे राजन्, तब घटोत्कच ने उस महासमर में भगदत्त को बाणों से ढक दिया, जैसे बादल मेरु पर्वत को ढक लेता है।
श्लोक 33 (6.83.33)
निहत्य ताञ्शरान्राजा राक्षसस्य धनुश्च्युतान् । भैमसेनिं रणे तूर्णं सर्वमर्मस्वताडयत् ॥
nihatya tāñśarānrājā rākṣasasya dhanuścyutān | bhaimaseniṃ raṇe tūrṇaṃ sarvamarmasvatāḍayat
राजा भगदत्त ने राक्षस के धनुष से छूटे उन बाणों को नष्ट कर दिया और युद्ध में तुरन्त भीमपुत्र के सब मर्मस्थलों पर प्रहार किया।
श्लोक 34 (6.83.34)
स ताड्यमानो बहुभिः शरैः सन्नतपर्वभिः । न विव्यथे राक्षसेन्द्रो भिद्यमान इवाचलः ॥
sa tāḍyamāno bahubhiḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | na vivyathe rākṣasendro bhidyamāna ivācalaḥ
झुकी गाँठों वाले अनेक बाणों से आहत होकर भी वह राक्षसराज विदीर्ण होते पर्वत के समान विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 35 (6.83.35)
तस्य प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरांश्च चतुर्दश । प्रेषयामास समरे तांश्चिच्छेद स राक्षसः ॥
tasya prāgjyotiṣaḥ kruddhastomarāṃśca caturdaśa | preṣayāmāsa samare tāṃściccheda sa rākṣasaḥ
तब क्रुद्ध प्राग्ज्योतिषनरेश ने युद्ध में उस पर चौदह तोमर चलाए, और उस राक्षस ने उन्हें काट डाला।
श्लोक 36 (6.83.36)
स तांश्छित्त्वा महाबाहुस्तोमरान्निशितैः शरैः । भगदत्तं च विव्याध सप्तत्या कङ्कपत्रिभिः ॥
sa tāṃśchittvā mahābāhustomarānniśitaiḥ śaraiḥ | bhagadattaṃ ca vivyādha saptatyā kaṅkapatribhiḥ
तीखे बाणों से उन तोमरों को काटकर उस महाबाहु ने कंक-पंखों वाले सत्तर बाणों से भगदत्त को बींध दिया।
श्लोक 37 (6.83.37)
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा प्रहसन्निव भारत । तस्याश्वांश्चतुरः सङ्ख्ये पातयामास सायकैः ॥
tataḥ prāgjyotiṣo rājā prahasanniva bhārata | tasyāśvāṃścaturaḥ saṅkhye pātayāmāsa sāyakaiḥ
हे भारत, तब प्राग्ज्योतिषनरेश ने मानो हँसते हुए युद्ध में बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया।
श्लोक 38 (6.83.38)
स हताश्वे रथे तिष्ठन्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् । शक्तिं चिक्षेप वेगेन प्राग्ज्योतिषगजं प्रति ॥
sa hatāśve rathe tiṣṭhanrākṣasendraḥ pratāpavān | śaktiṃ cikṣepa vegena prāgjyotiṣagajaṃ prati
घोड़ों के मारे जाने पर भी रथ पर डटे प्रतापी राक्षसराज ने बड़े वेग से प्राग्ज्योतिषनरेश के हाथी पर शक्ति चलाई।
श्लोक 39 (6.83.39)
तामापतन्तीं सहसा हेमदण्डां सुवेगिनीम् । त्रिधा चिच्छेद नृपतिः सा व्यकीर्यत मेदिनीम् ॥
tāmāpatantīṃ sahasā hemadaṇḍāṃ suveginīm | tridhā ciccheda nṛpatiḥ sā vyakīryata medinīm
स्वर्णदण्ड वाली उस अत्यन्त वेगवती शक्ति को सहसा आती देख राजा ने उसके तीन टुकड़े कर दिए, और वह बिखरकर धरती पर गिर पड़ी।
श्लोक 40 (6.83.40)
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा हैडिम्बः प्राद्रवद्भयात् । यथेन्द्रस्य रणात्पूर्वं नमुचिर्दैत्यसत्तमः ॥
śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā haiḍimbaḥ prādravadbhayāt | yathendrasya raṇātpūrvaṃ namucirdaityasattamaḥ
अपनी शक्ति को नष्ट हुआ देखकर हिडिम्बापुत्र भय से भाग खड़ा हुआ, जैसे पूर्वकाल में दैत्यश्रेष्ठ नमुचि इन्द्र के साथ युद्ध से भागा था।
श्लोक 41 (6.83.41)
तं विजित्य रणे शूरं विक्रान्तं ख्यातपौरुषम् । अजय्यं समरे वीरं यमेन वरुणेन च ॥
taṃ vijitya raṇe śūraṃ vikrāntaṃ khyātapauruṣam | ajayyaṃ samare vīraṃ yamena varuṇena ca
उस शूरवीर, पराक्रमी और प्रसिद्ध पौरुष वाले योद्धा को, जिसे युद्ध में यम और वरुण भी नहीं जीत सकते थे, जीतकर
श्लोक 42 (6.83.42)
पाण्डवीं समरे सेनां संममर्द स कुञ्जरः । यथा वनगजो राजन्मृद्नंश्चरति पद्मिनीम् ॥
pāṇḍavīṃ samare senāṃ saṃmamarda sa kuñjaraḥ | yathā vanagajo rājanmṛdnaṃścarati padminīm
उन्होंने अपने हाथी के साथ युद्ध में पाण्डव-सेना को वैसे ही रौंद डाला, जैसे हे राजन्, जंगली हाथी कमल-सरोवर को रौंदता हुआ विचरता है।
श्लोक 43 (6.83.43)
मद्रेश्वरस्तु समरे यमाभ्यां समसञ्जत । स्वस्त्रीयौ छादयांचक्रे शरौघैः पाण्डुनन्दनौ ॥
madreśvarastu samare yamābhyāṃ samasañjata | svastrīyau chādayāṃcakre śaraughaiḥ pāṇḍunandanau
मद्रराज शल्य युद्ध में नकुल-सहदेव से भिड़ गए और अपने भानजों, पाण्डु को आनन्द देने वाले उन दोनों को बाणों की बौछार से ढक दिया।
श्लोक 44 (6.83.44)
सहदेवस्तु समरे मातुलं दृश्य संगतम् । अवारयच्छरौघेण मेघो यद्वद्दिवाकरम् ॥
sahadevastu samare mātulaṃ dṛśya saṃgatam | avārayaccharaugheṇa megho yadvaddivākaram
सहदेव ने युद्ध में मामा को सामने आया देखकर बाणों की बौछार से उन्हें वैसे ही रोक दिया जैसे बादल सूर्य को रोक लेता है।
श्लोक 45 (6.83.45)
छाद्यमानः शरौघेण हृष्टरूपतरोऽभवत् । तयोश्चाप्यभवत्प्रीतिरतुला मातृकारणात् ॥
chādyamānaḥ śaraugheṇa hṛṣṭarūpataro'bhavat | tayoścāpyabhavatprītiratulā mātṛkāraṇāt
बाणों की बौछार से ढके जाकर शल्य और भी प्रसन्न हो उठे, और माता के नाते उन दोनों के मन में भी उनके प्रति अपार प्रेम उमड़ आया।
श्लोक 46 (6.83.46)
ततः प्रहस्य समरे नकुलस्य महारथः । ध्वजं चिच्छेद बाणेन धनुश्चैकेन मारिष ॥
tataḥ prahasya samare nakulasya mahārathaḥ | dhvajaṃ ciccheda bāṇena dhanuścaikena māriṣa
तब उस महारथी ने युद्ध में हँसते हुए, हे मान्यवर, एक बाण से नकुल का ध्वज और एक से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 47 (6.83.47)
अथैनं छिन्नधन्वानं छादयामास भारत । निजघान रणे तं तु सूतं चास्य न्यपातयत् ॥
athainaṃ chinnadhanvānaṃ chādayāmāsa bhārata | nijaghāna raṇe taṃ tu sūtaṃ cāsya nyapātayat
हे भारत, फिर धनुष कट जाने पर उसने नकुल को बाणों से ढक दिया, युद्ध में उस पर प्रहार किया और उसके सारथि को गिरा दिया।
श्लोक 48 (6.83.48)
ततः प्रसह्य समरे नकुलस्य महारथः । अश्वांश्च चतुरो राजंश्चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥
tataḥ prasahya samare nakulasya mahārathaḥ | aśvāṃśca caturo rājaṃścaturbhiḥ sāyakottamaiḥ
तब उस महारथी ने युद्ध में बलपूर्वक आक्रमण करते हुए, हे राजन्, चार उत्तम बाणों से नकुल के चारों घोड़ों को
श्लोक 49 (6.83.49)
प्रेषयामास समरे यमस्य सदनं प्रति । हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य महारथः ॥
preṣayāmāsa samare yamasya sadanaṃ prati | hatāśvāttu rathāttūrṇamavaplutya mahārathaḥ
युद्ध में यमलोक भेज दिया। घोड़ों के मारे जाने पर वह महारथी तुरन्त रथ से कूद पड़ा
श्लोक 50 (6.83.50)
आरुरोह ततो यानं भ्रातुरेव यशस्विनः । एकस्थौ तु रणे शूरौ दृढे विक्षिप्य कार्मुके ॥
āruroha tato yānaṃ bhrātureva yaśasvinaḥ | ekasthau tu raṇe śūrau dṛḍhe vikṣipya kārmuke
और अपने यशस्वी भाई के रथ पर चढ़ गया। एक ही रथ पर खड़े उन दोनों वीरों ने युद्ध में अपने दृढ़ धनुष खींचकर
श्लोक 51 (6.83.51)
मद्रराजरथं तूर्णं च्छादयामासतुः क्षणात् । स च्छाद्यमानो बहुभिः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
madrarājarathaṃ tūrṇaṃ cchādayāmāsatuḥ kṣaṇāt | sa cchādyamāno bahubhiḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ
क्षण भर में मद्रराज के रथ को बाणों से ढक दिया। झुकी गाँठों वाले अनेक बाणों से
श्लोक 52 (6.83.52)
स्वस्त्रीयाभ्यां नरव्याघ्रो नाकम्पत यथाऽचलः । प्रहसन्निव तां चापि शस्त्रवृष्टिं जघान ह ॥
svastrīyābhyāṃ naravyāghro nākampata yathā'calaḥ | prahasanniva tāṃ cāpi śastravṛṣṭiṃ jaghāna ha
अपने भानजों द्वारा ढके जाने पर भी वह नरश्रेष्ठ पर्वत के समान अडिग रहा, और मानो हँसते हुए उसने उस शस्त्र-वर्षा को नष्ट कर दिया।
श्लोक 53 (6.83.53)
सहदेवस्ततः क्रुद्धः शरमुद्गृह्य वीर्यवान् । मद्रराजमभिप्रेक्ष्य प्रेषयामास भारत ॥
sahadevastataḥ kruddhaḥ śaramudgṛhya vīryavān | madrarājamabhiprekṣya preṣayāmāsa bhārata
हे भारत, तब पराक्रमी सहदेव ने क्रुद्ध होकर एक बाण उठाया और मद्रराज को लक्ष्य करके छोड़ दिया।
श्लोक 54 (6.83.54)
स शरः प्रेषितस्तेन गरुडानिलवेगवान् । मद्रराजं विनिर्भिद्य निपपात महीतले ॥
sa śaraḥ preṣitastena garuḍānilavegavān | madrarājaṃ vinirbhidya nipapāta mahītale
उनके द्वारा छोड़ा गया वह बाण, जिसका वेग गरुड़ और वायु के समान था, मद्रराज को भेदकर पृथ्वी पर जा गिरा।
श्लोक 55 (6.83.55)
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थे महारथः । निषसाद महाराज कश्मलं च जगाम ह ॥
sa gāḍhaviddho vyathito rathopasthe mahārathaḥ | niṣasāda mahārāja kaśmalaṃ ca jagāma ha
गहरे घाव से व्यथित वह महारथी, हे महाराज, रथ की बैठक में बैठ गया और मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 56 (6.83.56)
तं विसंज्ञं निपतितं सूतः संप्रेक्ष्य संयुगे । अपोवाह रथेनाजौ यमाभ्यामभिपीडितम् ॥
taṃ visaṃjñaṃ nipatitaṃ sūtaḥ saṃprekṣya saṃyuge | apovāha rathenājau yamābhyāmabhipīḍitam
उन्हें अचेत होकर गिरा और नकुल-सहदेव से पीड़ित देखकर सारथि उन्हें रथ पर युद्धभूमि से दूर ले गया।
श्लोक 57 (6.83.57)
दृष्ट्वा मद्रेश्वररथं धार्तराष्ट्राः पराङ्मुखम् । सर्वे विमनसो भूत्वा नेदमस्तीत्यचिन्तयन् ॥
dṛṣṭvā madreśvararathaṃ dhārtarāṣṭrāḥ parāṅmukham | sarve vimanaso bhūtvā nedamastītyacintayan
मद्रराज के रथ को युद्ध से विमुख देखकर धृतराष्ट्र के सभी पुत्र उदास हो गए और सोचने लगे कि अब सब समाप्त हो गया।
श्लोक 58 (6.83.58)
निर्जित्य मातुलं सङ्ख्ये माद्रीपुत्रौ महारथौ । दध्मतुर्मुदितौ शङ्खौ सिंहनादं च नेदतुः ॥
nirjitya mātulaṃ saṅkhye mādrīputrau mahārathau | dadhmaturmuditau śaṅkhau siṃhanādaṃ ca nedatuḥ
युद्ध में मामा को परास्त करके माद्री के दोनों महारथी पुत्रों ने प्रसन्न होकर शंख बजाए और सिंहनाद किया।
श्लोक 59 (6.83.59)
अभिदुद्रुवतुर्हृष्टौ तव सैन्यं विशांपते । यथा दैत्यचमूं राजन्निन्द्रोपेन्द्राविवामरौ ॥
abhidudruvaturhṛṣṭau tava sainyaṃ viśāṃpate | yathā daityacamūṃ rājannindropendrāvivāmarau
हे प्रजानाथ, वे दोनों हर्षित होकर आपकी सेना पर वैसे ही टूट पड़े, जैसे हे राजन्, अमर इन्द्र और उपेन्द्र दैत्यों की सेना पर टूट पड़े थे।