भीष्म पर्व · अध्याय 82
द्रोण द्वारा शङ्ख का वध
सातवें दिन जब भीष्म अर्जुन की ओर बढ़ते हैं, तब दुर्योधन सुशर्मा और अन्य राजाओं को पितामह की रक्षा करने को कहता है। आगे के द्वन्द्व-युद्धों में द्रोण विराट के पुत्र शङ्ख को मार डालते हैं और विराट भाग जाते हैं; अश्वत्थामा शिखण्डी का रथ, ढाल और तलवार नष्ट कर उसे सात्यकि के रथ पर शरण लेने को विवश करता है; सात्यकि ऐन्द्र अस्त्र से अलम्बुष की माया भस्म कर उसे भगा देते हैं। धृष्टद्युम्न दुर्योधन के घोड़े मार गिराता है और शकुनि उसे बचा ले जाता है, तथा भीम कृतवर्मा को बाणों से छलनी कर कौरव-सेना पर काल के समान टूट पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.82.1)
प्रवृत्तमात्रे संग्रामे निवृत्ते च सुशर्मणि । भग्नेषु चापि वीरेषु पाण्डवेन महात्मना ॥
pravṛttamātre saṃgrāme nivṛtte ca suśarmaṇi | bhagneṣu cāpi vīreṣu pāṇḍavena mahātmanā
जब युद्ध आरम्भ ही हुआ था, सुशर्मा पीछे हट चुका था और महात्मा पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने वीरों को तोड़ दिया था,
श्लोक 2 (6.82.2)
क्षुभ्यमाणे बले तूर्णं सागरप्रतिमे तव । प्रत्युद्याते च गाङ्गेये त्वरितं विजयं प्रति ॥
kṣubhyamāṇe bale tūrṇaṃ sāgarapratime tava | pratyudyāte ca gāṅgeye tvaritaṃ vijayaṃ prati
जब आपकी समुद्र-सी विशाल सेना शीघ्र ही क्षुब्ध हो उठी थी और गङ्गापुत्र (भीष्म) तेज़ी से विजय (अर्जुन) का सामना करने निकल पड़े थे,
श्लोक 3 (6.82.3)
दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा रणे पार्थस्य विक्रमम् । त्वरमाणः समभ्येत्य सर्वांस्तानब्रवीन्नृपान् ॥
dṛṣṭvā duryodhano rājā raṇe pārthasya vikramam | tvaramāṇaḥ samabhyetya sarvāṃstānabravīnnṛpān
तब राजा दुर्योधन ने रण में पार्थ का पराक्रम देखकर, शीघ्रता से पास आकर उन सब राजाओं से कहा,
श्लोक 4 (6.82.4)
तेषां तु प्रमुखे शूरं सुशर्माणं महाबलम् । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य भृशं संहर्षयन्निव ॥
teṣāṃ tu pramukhe śūraṃ suśarmāṇaṃ mahābalam | madhye sarvasya sainyasya bhṛśaṃ saṃharṣayanniva
और उनके अग्रणी, महाबली वीर सुशर्मा से भी, सारी सेना के बीच, मानो उन्हें भरपूर उत्साह से भरते हुए:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 5 (6.82.5)
एष भीष्मः शान्तनवो योद्धुकामो धनञ्जयम् । सर्वात्मना कुरुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥
eṣa bhīṣmaḥ śāntanavo yoddhukāmo dhanañjayam | sarvātmanā kuruśreṣṭhastyaktvā jīvitamātmanaḥ
"ये कुरुश्रेष्ठ शान्तनुपुत्र भीष्म अपने प्राणों का मोह छोड़कर पूरे मन से धनञ्जय से युद्ध करना चाहते हैं।
श्लोक 6 (6.82.6)
तं प्रयान्तं रणे वीरं सर्वसैन्येन भारतम् । संयत्ताः समरे सर्वे पालयध्वं पितामहम् ॥
taṃ prayāntaṃ raṇe vīraṃ sarvasainyena bhāratam | saṃyattāḥ samare sarve pālayadhvaṃ pitāmaham
जब वे भरतवंशी वीर सारी सेना के साथ रण में आगे बढ़ें, तब तुम सब युद्ध में सन्नद्ध रहकर पितामह की रक्षा करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (6.82.7)
बाढमित्येवमुक्त्वा तु तान्यनीकानि सर्वशः । नरेन्द्राणां महाराज समाजग्मुः पितामहम् ॥
bāḍhamityevamuktvā tu tānyanīkāni sarvaśaḥ | narendrāṇāṃ mahārāja samājagmuḥ pitāmaham
"ऐसा ही हो" कहकर, हे महाराज, उन राजाओं की सारी सेनाएँ एक साथ पितामह के पास जा पहुँचीं।
श्लोक 8 (6.82.8)
ततः प्रयातः सहसा भीष्मः शान्तनवोऽर्जुनम् । रणे भारतमायान्तमाससाद महाबलः ॥
tataḥ prayātaḥ sahasā bhīṣmaḥ śāntanavo'rjunam | raṇe bhāratamāyāntamāsasāda mahābalaḥ
तब महाबली शान्तनुपुत्र भीष्म सहसा आगे बढ़े और रण में आते हुए भरतवंशी अर्जुन से जा भिड़े,
श्लोक 9 (6.82.9)
महाश्वेताश्वयुक्तेन भीमवानरकेतुना । महता मेघनादेन रथेनातिविराजता ॥
mahāśvetāśvayuktena bhīmavānaraketunā | mahatā meghanādena rathenātivirājatā
जो बड़े-बड़े श्वेत घोड़ों से जुते, भयानक वानर-ध्वज वाले, महामेघ के समान गरजते और अत्यन्त शोभायमान रथ पर सवार थे।
श्लोक 10 (6.82.10)
समरे सर्वसैन्यानामुपयातं धनञ्जयम् । अभवत्तुमुलो नादो भयाद्दृष्ट्वा किरीटिनम् ॥
samare sarvasainyānāmupayātaṃ dhanañjayam | abhavattumulo nādo bhayāddṛṣṭvā kirīṭinam
जब धनञ्जय युद्ध में सब सेनाओं के सामने आ पहुँचे, तब किरीटधारी को देखकर भय से भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 11 (6.82.11)
अभीशुहस्तं कृष्णं च दृष्ट्वादित्यमिवापरम् । मध्यंदिनगतं सङ्ख्ये न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ॥
abhīśuhastaṃ kṛṣṇaṃ ca dṛṣṭvādityamivāparam | madhyaṃdinagataṃ saṅkhye na śekuḥ prativīkṣitum
और हाथ में रासें लिए कृष्ण को, मानो मध्याह्न में स्थित दूसरा सूर्य हों, देखकर वे युद्ध में उनकी ओर आँख उठाकर देख भी न सके।
श्लोक 12 (6.82.12)
तथा शान्तनवं भीष्मं श्वेताश्वं श्वेतकार्मुकम् । न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं श्वेतं ग्रहमिवोदितम् ॥
tathā śāntanavaṃ bhīṣmaṃ śvetāśvaṃ śvetakārmukam | na śekuḥ pāṇḍavā draṣṭuṃ śvetaṃ grahamivoditam
उसी प्रकार श्वेत घोड़ों और श्वेत धनुष वाले शान्तनुपुत्र भीष्म को, जो उदित हुए श्वेत ग्रह के समान थे, पाण्डव देख न सके।
श्लोक 13 (6.82.13)
स सर्वतः परिवृतस्त्रिगर्तैः सुमहात्मभिः । भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च तथाऽन्यैश्च महारथैः ॥
sa sarvataḥ parivṛtastrigartaiḥ sumahātmabhiḥ | bhrātṛbhiḥ saha putraiśca tathā'nyaiśca mahārathaiḥ
वे चारों ओर से महामनस्वी त्रिगर्तों से, भाइयों और पुत्रों सहित, तथा अन्य महारथियों से भी घिरे हुए थे।
श्लोक 14 (6.82.14)
भारद्वाजस्तु समरे मत्स्यं विव्याध पत्रिणा । ध्वजं चास्य शरेणाजौ धनुश्चैकेन चिच्छिदे ॥
bhāradvājastu samare matsyaṃ vivyādha patriṇā | dhvajaṃ cāsya śareṇājau dhanuścaikena cicchide
इधर भरद्वाजपुत्र (द्रोण) ने युद्ध में मत्स्यराज (विराट) को एक पंखदार बाण से बींधा, और एक बाण से उसका ध्वज तथा एक और से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 15 (6.82.15)
तदपास्य धनुश्छिन्नं विराटो वाहिनीपतिः । अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं दृढम् ॥
tadapāsya dhanuśchinnaṃ virāṭo vāhinīpatiḥ | anyadādatta vegena dhanurbhārasahaṃ dṛḍham
टूटे धनुष को फेंककर सेनापति विराट ने तुरन्त दूसरा दृढ़ धनुष उठा लिया, जो भारी खिंचाव सह सकता था,
श्लोक 16 (6.82.16)
शरांश्चाशीविषाकाराञ्ज्वलितान्पन्नगानिव । द्रोणं त्रिभिश्च विव्याध चतुर्भिश्चास्य वाजिनः ॥
śarāṃścāśīviṣākārāñjvalitānpannagāniva | droṇaṃ tribhiśca vivyādha caturbhiścāsya vājinaḥ
और विषधर सर्पों जैसे, जलते हुए नागों के समान बाण भी। उसने तीन बाणों से द्रोण को और चार से उनके घोड़ों को बींधा,
श्लोक 17 (6.82.17)
ध्वजमेकेन विव्याध सारथिं चास्य पञ्चभिः । धनुरेकेषुणाऽविध्यत्तत्राक्रुध्यद्द्विजर्षभः ॥
dhvajamekena vivyādha sārathiṃ cāsya pañcabhiḥ | dhanurekeṣuṇā'vidhyattatrākrudhyaddvijarṣabhaḥ
एक से उनके ध्वज को और पाँच से उनके सारथि को बींधा, और एक ही बाण से उनके धनुष पर प्रहार किया। इस पर द्विजश्रेष्ठ द्रोण क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 18 (6.82.18)
तस्य द्रोणोऽवधीदश्वाञ्शरैः सन्नतपर्वभिः । अष्टाभिर्भरतश्रेष्ठ सूतमेकेन पत्रिणा ॥
tasya droṇo'vadhīdaśvāñśaraiḥ sannataparvabhiḥ | aṣṭābhirbharataśreṣṭha sūtamekena patriṇā
हे भरतश्रेष्ठ, द्रोण ने झुकी गाँठों वाले आठ बाणों से उसके घोड़ों को और एक पंखदार बाण से उसके सारथि को मार डाला।
श्लोक 19 (6.82.19)
स हताश्वादवप्लुत्य स्यन्दनाद्धतसारथिः । आरुरोह रथं तूर्णं पुत्रस्य रथिनां वरः ॥
sa hatāśvādavaplutya syandanāddhatasārathiḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ putrasya rathināṃ varaḥ
घोड़ों और सारथि के मारे जाने पर रथियों में श्रेष्ठ विराट अपने रथ से कूद पड़े और शीघ्र ही अपने पुत्र के रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 20 (6.82.20)
ततस्तु तौ पितापुत्रौ भारद्वाजं रथे स्थितौ । महता शरवर्षेण वारयामासतुर्बलात् ॥
tatastu tau pitāputrau bhāradvājaṃ rathe sthitau | mahatā śaravarṣeṇa vārayāmāsaturbalāt
तब वे पिता-पुत्र उस रथ पर साथ खड़े होकर बाणों की भारी वर्षा से भरद्वाजपुत्र को बलपूर्वक रोकने लगे।
श्लोक 21 (6.82.21)
भारद्वाजस्ततः क्रुद्धः शरमाशीविषोपमम् । चिक्षेप समरे तूर्णं शङ्खं प्रति जनेश्वरः ॥
bhāradvājastataḥ kruddhaḥ śaramāśīviṣopamam | cikṣepa samare tūrṇaṃ śaṅkhaṃ prati janeśvaraḥ
तब नरश्रेष्ठ भरद्वाजपुत्र ने क्रुद्ध होकर युद्ध में विषधर सर्प के समान एक बाण तुरन्त शङ्ख पर छोड़ा।
श्लोक 22 (6.82.22)
स तस्य हृदयं भित्त्वा पीत्वा शोणितमाहवे । जगाम धरणीं बाणो लोहितार्द्रवरच्छदः ॥
sa tasya hṛdayaṃ bhittvā pītvā śoṇitamāhave | jagāma dharaṇīṃ bāṇo lohitārdravaracchadaḥ
वह बाण युद्ध में उसका हृदय भेदकर और रक्त पीकर, रक्त से भीगे सुन्दर पंखों सहित धरती में जा धँसा।
श्लोक 23 (6.82.23)
स पपात रणे तूर्णं भारद्वाजशराहतः । धनुस्त्यक्त्वा शरांश्चैव पितुरेव समीपतः ॥
sa papāta raṇe tūrṇaṃ bhāradvājaśarāhataḥ | dhanustyaktvā śarāṃścaiva pitureva samīpataḥ
भरद्वाजपुत्र के बाण से आहत होकर वह धनुष और बाण छोड़ता हुआ तुरन्त रणभूमि में अपने पिता के पास ही गिर पड़ा।
श्लोक 24 (6.82.24)
हतं तमात्मजं दृष्ट्वा विराटः प्राद्रवद्भयात् । उत्सृज्य समरे द्रोणं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥
hataṃ tamātmajaṃ dṛṣṭvā virāṭaḥ prādravadbhayāt | utsṛjya samare droṇaṃ vyāttānanamivāntakam
अपने पुत्र को मारा गया देखकर विराट भय से भाग खड़े हुए और मुँह फैलाए काल के समान द्रोण को युद्ध में छोड़ गए।
श्लोक 25 (6.82.25)
भारद्वाजस्ततस्तूर्णं पाण्डवानां महाचमूम् । दारयामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥
bhāradvājastatastūrṇaṃ pāṇḍavānāṃ mahācamūm | dārayāmāsa samare śataśo'tha sahasraśaḥ
तब भरद्वाजपुत्र ने युद्ध में पाण्डवों की विशाल सेना को सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में तुरन्त चीर डाला।
श्लोक 26 (6.82.26)
शिखण्डी तु महाराज द्रौणिमासाद्य संयुगे । आजघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचैस्त्रिभिराशुगैः ॥
śikhaṇḍī tu mahārāja drauṇimāsādya saṃyuge | ājaghāna bhruvormadhye nārācaistribhirāśugaiḥ
हे महाराज, शिखण्डी ने युद्ध में द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) से भिड़कर तीन शीघ्रगामी नाराचों से उसकी भौंहों के बीच प्रहार किया।
श्लोक 27 (6.82.27)
स बभौ रथशार्दूलो ललाटे संस्थितैस्त्रिभिः । शिखरैः काञ्चनमयैर्मेरुस्त्रिभिरिवोच्छ्रितैः ॥
sa babhau rathaśārdūlo lalāṭe saṃsthitaistribhiḥ | śikharaiḥ kāñcanamayairmerustribhirivocchritaiḥ
ललाट में धँसे उन तीन बाणों से रथियों में सिंह के समान वह वीर तीन ऊँचे स्वर्णिम शिखरों वाले मेरु पर्वत-सा शोभित हुआ।
श्लोक 28 (6.82.28)
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धो निमेषार्धाच्छिखण्डिनः । ध्वजं सूतमथो राजंस्तुरगानायुधानि च ॥
aśvatthāmā tataḥ kruddho nimeṣārdhācchikhaṇḍinaḥ | dhvajaṃ sūtamatho rājaṃsturagānāyudhāni ca
तब क्रुद्ध अश्वत्थामा ने, हे राजन्, आधे निमेष में ही शिखण्डी के ध्वज, सारथि, घोड़ों और आयुधों को
श्लोक 29 (6.82.29)
शरैर्बहुभिराच्छिद्य पातयामास संयुगे । स हताश्वादवप्लुत्य रथाद्वै रथिनां वरः ॥
śarairbahubhirācchidya pātayāmāsa saṃyuge | sa hatāśvādavaplutya rathādvai rathināṃ varaḥ
अनेक बाणों से काटकर युद्ध में गिरा दिया। घोड़ों के मारे जाने पर रथियों में श्रेष्ठ वह वीर रथ से कूद पड़ा,
श्लोक 30 (6.82.30)
खड्गमादाय सुशितं विमलं च शरावरम् । श्येनवद्व्यचरत्क्रुद्धः शिखण्डी शत्रुतापनः ॥
khaḍgamādāya suśitaṃ vimalaṃ ca śarāvaram | śyenavadvyacaratkruddhaḥ śikhaṇḍī śatrutāpanaḥ
और शत्रुओं को सन्तप्त करने वाला शिखण्डी तीखी तलवार और निर्मल ढाल लेकर क्रोध में बाज़ की तरह विचरने लगा।
श्लोक 31 (6.82.31)
सखड्गस्य महाराज चरतस्तस्य संयुगे । नान्तरं ददृशे द्रौणिस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sakhaḍgasya mahārāja caratastasya saṃyuge | nāntaraṃ dadṛśe drauṇistadadbhutamivābhavat
हे महाराज, तलवार लिए युद्ध में विचरते उस शिखण्डी में द्रोणपुत्र को कोई चूक दिखाई न दी; यह अद्भुत-सी बात थी।
श्लोक 32 (6.82.32)
ततः शरसहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । प्रेषयामास समरे द्रौणिः परमकोपनः ॥
tataḥ śarasahasrāṇi bahūni bharatarṣabha | preṣayāmāsa samare drauṇiḥ paramakopanaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तब अत्यन्त क्रोधी द्रोणपुत्र ने युद्ध में उस पर हज़ारों बाण छोड़े।
श्लोक 33 (6.82.33)
तामापतन्तीं समरे शरवृष्टिं सुदारुणाम् । असिना तीक्ष्णधारेण चिच्छेद बलिनां वरः ॥
tāmāpatantīṃ samare śaravṛṣṭiṃ sudāruṇām | asinā tīkṣṇadhāreṇa ciccheda balināṃ varaḥ
युद्ध में अपने ऊपर गिरती उस भयंकर बाण-वर्षा को बलवानों में श्रेष्ठ शिखण्डी ने अपनी तीखी धार वाली तलवार से काट डाला।
श्लोक 34 (6.82.34)
ततोऽस्य विमलं द्रौणिः शतचन्द्रं मनोरमम् । चर्माच्छिनदसिं चास्य खण्डयामास संयुगे ॥
tato'sya vimalaṃ drauṇiḥ śatacandraṃ manoramam | carmācchinadasiṃ cāsya khaṇḍayāmāsa saṃyuge
तब द्रोणपुत्र ने सौ चन्द्र-चिह्नों से सजी उसकी निर्मल और मनोहर ढाल काट डाली और युद्ध में उसकी तलवार के भी टुकड़े कर दिए,
श्लोक 35 (6.82.35)
शितैस्तु बहुशो राजंस्तं च विव्याध पत्रिभिः । शिखण्डी तु ततः खड्गं खण्डितं तेन सायकैः ॥
śitaistu bahuśo rājaṃstaṃ ca vivyādha patribhiḥ | śikhaṇḍī tu tataḥ khaḍgaṃ khaṇḍitaṃ tena sāyakaiḥ
और हे राजन्, तीखे पंखदार बाणों से उसे बार-बार बींधा। तब शिखण्डी ने उसके बाणों से टूटी हुई तलवार को
श्लोक 36 (6.82.36)
आविध्य व्यसृजत्तूर्णं ज्वलन्तमिव पन्नगम् । तमापतन्तं सहसा कालानलसमप्रभम् ॥
āvidhya vyasṛjattūrṇaṃ jvalantamiva pannagam | tamāpatantaṃ sahasā kālānalasamaprabham
घुमाकर जलते हुए सर्प की भाँति तुरन्त फेंक दिया। प्रलयकाल की अग्नि के समान चमकती उस तलवार को सहसा आती देख
श्लोक 37 (6.82.37)
चिच्छेद समरे द्रौणिर्दर्शयन्पाणिलाघवम् । शिखण्डिनं च विव्याध शरैर्बहुभिरायसैः ॥
ciccheda samare drauṇirdarśayanpāṇilāghavam | śikhaṇḍinaṃ ca vivyādha śarairbahubhirāyasaiḥ
द्रोणपुत्र ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए युद्ध में उसे काट गिराया और शिखण्डी को लोहे के अनेक बाणों से बींध दिया।
श्लोक 38 (6.82.38)
शिखण्डी तु भृशं राजंस्ताड्यमानः शितैः शरैः । आरुरोह रथं तूर्णं माधवस्य महात्मनः ॥
śikhaṇḍī tu bhṛśaṃ rājaṃstāḍyamānaḥ śitaiḥ śaraiḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ mādhavasya mahātmanaḥ
हे राजन्, तीखे बाणों से बुरी तरह आहत शिखण्डी शीघ्र ही महात्मा माधव (सात्यकि) के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 39 (6.82.39)
सात्यकिश्चापि संक्रुद्धो राक्षसं क्रूरमाहवे । अलम्बुसं शरैस्तीक्ष्णैर्विव्याध बलिनां वरः ॥
sātyakiścāpi saṃkruddho rākṣasaṃ krūramāhave | alambusaṃ śaraistīkṣṇairvivyādha balināṃ varaḥ
बलवानों में श्रेष्ठ सात्यकि ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध में क्रूर राक्षस अलम्बुष को तीखे बाणों से बींधा।
श्लोक 40 (6.82.40)
राक्षसेन्द्रस्ततस्तस्य धनुश्चिच्छेद भारत । अर्धचन्द्रेण समरे तं च विव्याध सायकैः ॥
rākṣasendrastatastasya dhanuściccheda bhārata | ardhacandreṇa samare taṃ ca vivyādha sāyakaiḥ
हे भारत, तब राक्षसराज ने युद्ध में अर्धचन्द्राकार बाण से उसका धनुष काट डाला और उसे बाणों से बींध दिया;
श्लोक 41 (6.82.41)
मायां च राक्षसीं कृत्वा शरवर्षैरवाकिरत् । तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयस्य पराक्रमम् ॥
māyāṃ ca rākṣasīṃ kṛtvā śaravarṣairavākirat | tatrādbhutamapaśyāma śaineyasya parākramam
और राक्षसी माया रचकर उसे बाणों की वर्षा से ढक दिया। तब हमने वहाँ शिनि के पौत्र (सात्यकि) का अद्भुत पराक्रम देखा;
श्लोक 42 (6.82.42)
असंभ्रमस्तु समरे वध्यमानः शितैः शरैः । ऐन्द्रमस्त्रं च वार्ष्णेयो योजयामास भारत ॥
asaṃbhramastu samare vadhyamānaḥ śitaiḥ śaraiḥ | aindramastraṃ ca vārṣṇeyo yojayāmāsa bhārata
तीखे बाणों की मार खाते हुए भी वह वृष्णिवंशी वीर युद्ध में घबराया नहीं, और हे भारत, उसने ऐन्द्र अस्त्र का सन्धान किया,
श्लोक 43 (6.82.43)
विजयाद्यदनुप्राप्तं माधवेन यशस्विना । तदस्त्रं भस्मसात्कृत्वा मायां तां राक्षसीं तदा ॥
vijayādyadanuprāptaṃ mādhavena yaśasvinā | tadastraṃ bhasmasātkṛtvā māyāṃ tāṃ rākṣasīṃ tadā
जो यशस्वी माधव को विजय (अर्जुन) से प्राप्त हुआ था। उस अस्त्र से उस राक्षसी माया को भस्म करके
श्लोक 44 (6.82.44)
अलम्बुसं शरैरन्यैरभ्याकिरत सर्वतः । पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकः ॥
alambusaṃ śarairanyairabhyākirata sarvataḥ | parvataṃ vāridhārābhiḥ prāvṛṣīva balāhakaḥ
उसने अलम्बुष को और बाणों से चारों ओर से ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत को जलधाराओं से ढक देता है।
श्लोक 45 (6.82.45)
तत्तथा पीडितं तेन माधवेन यशस्विना । प्रदुद्राव भयाद्रक्षस्त्यक्त्वा सात्यकिमाहवे ॥
tattathā pīḍitaṃ tena mādhavena yaśasvinā | pradudrāva bhayādrakṣastyaktvā sātyakimāhave
यशस्वी माधव से इस प्रकार पीड़ित होकर वह राक्षस भय के मारे सात्यकि को युद्ध में छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 46 (6.82.46)
तमजेयं मघवता जित्वा भारत सात्यकिः । शैनेयः प्राणदज्जित्वा योधानां तव पश्यताम् ॥
tamajeyaṃ maghavatā jitvā bhārata sātyakiḥ | śaineyaḥ prāṇadajjitvā yodhānāṃ tava paśyatām
हे भारत, जिसे इन्द्र भी नहीं जीत सकते थे, उसे जीतकर शिनि के पौत्र सात्यकि ने आपके योद्धाओं के देखते-देखते विजय का गर्जन किया।
श्लोक 47 (6.82.47)
न्यहनत्तावकांश्चापि सात्यकिः सत्यविक्रमः । निशितैर्बहुभिर्बाणैस्तेऽद्रवन्त भयार्दिताः ॥
nyahanattāvakāṃścāpi sātyakiḥ satyavikramaḥ | niśitairbahubhirbāṇaiste'dravanta bhayārditāḥ
सत्यपराक्रमी सात्यकि ने अनेक तीखे बाणों से आपके सैनिकों का भी संहार किया, और वे भय से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 48 (6.82.48)
एतस्मिन्नेव काले तु द्रुपदस्यात्मजो बली । धृष्टद्युम्नो महाराज पुत्रं तव जनेश्वरम् ॥
etasminneva kāle tu drupadasyātmajo balī | dhṛṣṭadyumno mahārāja putraṃ tava janeśvaram
उसी समय, हे महाराज, द्रुपद के बलवान पुत्र धृष्टद्युम्न ने आपके पुत्र, राजा दुर्योधन को
श्लोक 49 (6.82.49)
छादयामास समरे शरैः सन्नतपर्वभिः । स च्छाद्यमानो विशिखैर्धृष्टद्युम्नेन भारत ॥
chādayāmāsa samare śaraiḥ sannataparvabhiḥ | sa cchādyamāno viśikhairdhṛṣṭadyumnena bhārata
युद्ध में झुकी गाँठों वाले बाणों से ढक दिया। हे भारत, धृष्टद्युम्न के बाणों से ढका जाकर भी
श्लोक 50 (6.82.50)
विव्यथे न च राजेन्द्र तव पुत्रो जनेश्वर । धृष्टद्युम्नं च समरे तूर्णं विव्याध पत्रिभिः ॥
vivyathe na ca rājendra tava putro janeśvara | dhṛṣṭadyumnaṃ ca samare tūrṇaṃ vivyādha patribhiḥ
हे राजेन्द्र, हे जनेश्वर, आपका पुत्र विचलित नहीं हुआ, और उसने युद्ध में तुरन्त धृष्टद्युम्न को पंखदार बाणों से बींध दिया,
श्लोक 51 (6.82.51)
षष्ट्या च त्रिंशता चैव तदद्भुतमिवाभवत् । तस्य सेनापतिः क्रुद्धो धनुश्चिच्छेद मारिष ॥
ṣaṣṭyā ca triṃśatā caiva tadadbhutamivābhavat | tasya senāpatiḥ kruddho dhanuściccheda māriṣa
साठ और फिर तीस बाणों से; यह अद्भुत-सी बात थी। हे मान्यवर, तब क्रुद्ध सेनापति (धृष्टद्युम्न) ने उसका धनुष काट डाला,
श्लोक 52 (6.82.52)
हयांश्च चतुरः शीघ्रं निजघान महाबलः । शरैश्चैनं सुनिशितैः क्षिप्रं विव्याध सप्तभिः ॥
hayāṃśca caturaḥ śīghraṃ nijaghāna mahābalaḥ | śaraiścainaṃ suniśitaiḥ kṣipraṃ vivyādha saptabhiḥ
और उस महाबली ने तुरन्त उसके चारों घोड़े मार डाले तथा शीघ्र ही सात अत्यन्त तीखे बाणों से उसे बींध दिया।
श्लोक 53 (6.82.53)
स हताश्वान्महाबाहुरवप्लुत्य रथाद्बली । पदातिरसिमुद्यम्य प्राद्रवत्पार्षतं प्रति ॥
sa hatāśvānmahābāhuravaplutya rathādbalī | padātirasimudyamya prādravatpārṣataṃ prati
घोड़ों के मारे जाने पर वह महाबाहु बलवान राजा रथ से कूद पड़ा और पैदल ही तलवार उठाकर पृषतवंशी धृष्टद्युम्न की ओर दौड़ा।
श्लोक 54 (6.82.54)
शकुनिस्तं समभ्येत्य राजगृद्धी महाबलः । राजानं सर्वलोकस्य रथमारोपयत्स्वकम् ॥
śakunistaṃ samabhyetya rājagṛddhī mahābalaḥ | rājānaṃ sarvalokasya rathamāropayatsvakam
राजा के हित में लगे महाबली शकुनि ने पास आकर उस सारे जगत के राजा को अपने रथ पर चढ़ा लिया।
श्लोक 55 (6.82.55)
ततो नृपं पराजित्य पार्षतः परवीरहा । न्यहनत्तावकं सैन्यं वज्रपाणिरिवासुरान् ॥
tato nṛpaṃ parājitya pārṣataḥ paravīrahā | nyahanattāvakaṃ sainyaṃ vajrapāṇirivāsurān
राजा को पराजित करके शत्रुवीरों का संहारक पृषतवंशी धृष्टद्युम्न आपकी सेना का वैसे ही संहार करने लगा जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों का करते हैं।
श्लोक 56 (6.82.56)
कृतवर्मा रणे भीमं शरैरार्च्छन्महारथः । प्रच्छादयामास च तं महामेघो रविं यथा ॥
kṛtavarmā raṇe bhīmaṃ śarairārcchanmahārathaḥ | pracchādayāmāsa ca taṃ mahāmegho raviṃ yathā
महारथी कृतवर्मा ने युद्ध में भीम पर बाणों से प्रहार किया और उन्हें वैसे ही ढक दिया जैसे महामेघ सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 57 (6.82.57)
ततः प्रहस्य समरे भीमसेनः परंतपः । प्रेषयामास संक्रुद्धः सायकान्कृतवर्मणे ॥
tataḥ prahasya samare bhīmasenaḥ paraṃtapaḥ | preṣayāmāsa saṃkruddhaḥ sāyakānkṛtavarmaṇe
तब शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले भीमसेन ने युद्ध में हँसकर क्रोधपूर्वक कृतवर्मा पर बाण छोड़े।
श्लोक 58 (6.82.58)
तैरर्द्यमानोऽतिरथः सात्वतः शस्त्रकोविदः । नाकम्पत महाराज भीमं चार्च्छच्छितैः शरैः ॥
tairardyamāno'tirathaḥ sātvataḥ śastrakovidaḥ | nākampata mahārāja bhīmaṃ cārcchacchitaiḥ śaraiḥ
उन बाणों से पीड़ित होकर भी शस्त्रविद्या में निपुण अतिरथी सात्वत (कृतवर्मा) काँपा नहीं, हे महाराज, और उसने तीखे बाणों से भीम पर प्रहार किया।
श्लोक 59 (6.82.59)
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा भीमसेनो महारथः । सारथिं पातयामास सध्वजं सुपरिष्कृतम् ॥
tasyāśvāṃścaturo hatvā bhīmaseno mahārathaḥ | sārathiṃ pātayāmāsa sadhvajaṃ supariṣkṛtam
महारथी भीमसेन ने उसके चारों घोड़े मार डाले और उसके सारथि को सुसज्जित ध्वज सहित गिरा दिया।
श्लोक 60 (6.82.60)
शरैर्बहुविधैश्चैनमाचिनोत्परवीरहा । शकलीकृतसर्वाङ्गः श्वावित्तु शललैर्यथा ॥
śarairbahuvidhaiścainamācinotparavīrahā | śakalīkṛtasarvāṅgaḥ śvāvittu śalalairyathā
शत्रुवीरों के संहारक भीम ने उसे अनेक प्रकार के बाणों से भर दिया; उसके सारे अंग बिंध गए और वह काँटों से भरी साही-सा दिखने लगा।
श्लोक 61 (6.82.61)
हताश्वश्च ततस्तूर्णं सुबलस्य रथं ययौ । स्यालस्य ते महाराज तव पुत्रस्य पश्यतः ॥
hatāśvaśca tatastūrṇaṃ subalasya rathaṃ yayau | syālasya te mahārāja tava putrasya paśyataḥ
घोड़ों के मारे जाने पर वह तुरन्त सुबलपुत्र, आपके साले, के रथ पर चला गया, हे महाराज, आपके पुत्र के देखते-देखते।
श्लोक 62 (6.82.62)
भीमसेनोऽपि संक्रुद्धस्तव सैन्यमुपाद्रवत् । निजघान च संक्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥
bhīmaseno'pi saṃkruddhastava sainyamupādravat | nijaghāna ca saṃkruddho daṇḍapāṇirivāntakaḥ
भीमसेन ने भी क्रुद्ध होकर आपकी सेना पर धावा बोला और रोष में भरकर दण्डधारी यमराज के समान उसका संहार करने लगे।