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भीष्म पर्व · अध्याय 81

भीष्म का मण्डल-व्यूह; अर्जुन द्वारा राजाओं का पराभव

भीष्म चिन्ता में डूबे दुर्योधन को उन महान योद्धाओं के नाम गिनाकर ढाढ़स बँधाते हैं जो उसके लिए प्राण देने को तैयार हैं, पर साथ ही चेताते हैं कि कृष्ण जिनके सहायक हैं, उन पाण्डवों को देवता भी नहीं जीत सकते; फिर वे उसे बाणों के घाव भरने वाली औषधि देते हैं। सातवें दिन की सुबह भीष्म मण्डल-व्यूह रचते हैं और युधिष्ठिर उत्तर में वज्र-व्यूह बनाते हैं, और योद्धा जोड़ियों में भिड़ जाते हैं। जब हज़ारों राजा अर्जुन को घेरकर उन्हें और कृष्ण को बाणों से ढक देते हैं, तब अर्जुन ऐन्द्र अस्त्र चलाकर सबको बींध डालते हैं, और टूटी हुई कौरव सेना शरण के लिए भीष्म की ओर भागती है।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.81.1)

अथात्मजं तव पुनर्गाङ्गेयो ध्यानमास्थितम् । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठः सम्प्रहर्षकरं वचः ॥

athātmajaṃ tava punargāṅgeyo dhyānamāsthitam | abravīdbharataśreṣṭhaḥ sampraharṣakaraṃ vacaḥ

तब भरतश्रेष्ठ गङ्गापुत्र ने चिन्ता में डूबे आपके पुत्र से फिर ऐसी बात कही जिससे उसका मन हर्ष से भर गया—

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (6.81.2)

अहं द्रोणश्च शल्यश्च कृतवर्मा च सात्वतः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ सैन्धवः ॥

ahaṃ droṇaśca śalyaśca kṛtavarmā ca sātvataḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca somadatto'tha saindhavaḥ

"मैं, द्रोण, शल्य, सात्वतवंशी कृतवर्मा, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त और सैन्धव (जयद्रथ);

श्लोक 3 (6.81.3)

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ बाह्लिकः सह बाह्लिकैः । त्रिगर्तराजश्च बली मागधश्च सुदुर्जयः ॥

vindānuvindāvāvantyau bāhlikaḥ saha bāhlikaiḥ | trigartarājaśca balī māgadhaśca sudurjayaḥ

अवन्ति के विन्द और अनुविन्द, बाह्लिकों के साथ बाह्लिक, बलवान त्रिगर्तराज और अत्यन्त दुर्जय मगधराज;

श्लोक 4 (6.81.4)

बृहद्बलश्च कौसल्यश्चित्रसेनो विविंशतिः । रथाश्च बहुसाहस्राः शोभमाना महाध्वजाः ॥

bṛhadbalaśca kausalyaścitraseno viviṃśatiḥ | rathāśca bahusāhasrāḥ śobhamānā mahādhvajāḥ

कोसल के बृहद्बल, चित्रसेन और विविंशति; तथा बड़ी-बड़ी ध्वजाओं से शोभित कई हज़ार रथ;

श्लोक 5 (6.81.5)

देशजाश्च हया राजन्स्वारूढा हयसादिभिः । गजेन्द्राश्च मदोद्वृत्ताः प्रभिन्नकरटामुखाः ॥

deśajāśca hayā rājansvārūḍhā hayasādibhiḥ | gajendrāśca madodvṛttāḥ prabhinnakaraṭāmukhāḥ

हे राजन्, अपने-अपने देशों में उत्पन्न उत्तम घोड़े, जिन पर कुशल घुड़सवार भली-भाँति सवार हैं; मद से उन्मत्त, फूटे हुए गण्डस्थलों वाले गजराज;

श्लोक 6 (6.81.6)

पदाताश्च तथा शूरा नानाप्रहरणायुधाः । नानादेशसमुत्पन्नास्त्वदर्थे योद्धुमुद्यताः ॥

padātāśca tathā śūrā nānāpraharaṇāyudhāḥ | nānādeśasamutpannāstvadarthe yoddhumudyatāḥ

और अनेक प्रकार के शस्त्र धारण किए, अनेक देशों में जन्मे वीर पैदल सैनिक भी, जो तुम्हारे लिए लड़ने को तैयार हैं—

श्लोक 7 (6.81.7)

एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः । देवानपि रणे जेतुं समर्था इति मे मतिः ॥

ete cānye ca bahavastvadarthe tyaktajīvitāḥ | devānapi raṇe jetuṃ samarthā iti me matiḥ

ये और दूसरे बहुत-से योद्धा, जिन्होंने तुम्हारे लिए अपने प्राणों का मोह छोड़ दिया है, युद्ध में देवताओं को भी जीत सकते हैं—ऐसा मेरा विश्वास है।

श्लोक 8 (6.81.8)

अवश्यं तु मया राजंस्तव वाच्यं हितं सदा । अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः । वासुदेवसहायाश्च महेन्द्रसमविक्रमाः ॥

avaśyaṃ tu mayā rājaṃstava vācyaṃ hitaṃ sadā | aśakyāḥ pāṇḍavā jetuṃ devairapi savāsavaiḥ | vāsudevasahāyāśca mahendrasamavikramāḥ

फिर भी, हे राजन्, तुम्हारे हित की बात तुमसे कहना मेरा सदा का कर्तव्य है: इन्द्र सहित देवता भी पाण्डवों को नहीं जीत सकते, क्योंकि वासुदेव उनके सहायक हैं और उनका पराक्रम महेन्द्र के समान है।

श्लोक 9 (6.81.9)

सर्वथाहं तु राजेन्द्र करिष्ये वचनं तव । पाण्डवान्वा रणे जेष्ये मां वा जेष्यन्ति पाण्डवाः ॥

sarvathāhaṃ tu rājendra kariṣye vacanaṃ tava | pāṇḍavānvā raṇe jeṣye māṃ vā jeṣyanti pāṇḍavāḥ

फिर भी, हे राजेन्द्र, मैं हर प्रकार से तुम्हारी बात पूरी करूँगा: या तो मैं युद्ध में पाण्डवों को जीत लूँगा, या पाण्डव मुझे जीत लेंगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (6.81.10)

एवमुक्त्वा ददौ चास्मै विशल्यकरणीं शुभाम् । ओषधीं वीर्यसम्पन्नां विशल्यश्चाभवत्तदा ॥

evamuktvā dadau cāsmai viśalyakaraṇīṃ śubhām | oṣadhīṃ vīryasampannāṃ viśalyaścābhavattadā

यह कहकर उन्होंने उसे बाणों के घाव मिटाने वाली एक उत्तम, शक्तिशाली औषधि दी, और तब दुर्योधन के घाव भर गए।

श्लोक 11 (6.81.11)

ततः प्रभाते विमले स्वेनानीकेन वीर्यवान् । अव्यूहत स्वयं व्यूहं भीष्मो व्यूहविशारदः ॥

tataḥ prabhāte vimale svenānīkena vīryavān | avyūhata svayaṃ vyūhaṃ bhīṣmo vyūhaviśāradaḥ

फिर निर्मल प्रभात में व्यूह-रचना में निपुण पराक्रमी भीष्म ने अपनी सेना से स्वयं एक व्यूह रचा—

श्लोक 12 (6.81.12)

मण्डलं मनुजश्रेष्ठ नानाशस्त्रसमाकुलम् । सम्पूर्णं योधमुख्यैश्च तथा दन्तिपदातिभिः ॥

maṇḍalaṃ manujaśreṣṭha nānāśastrasamākulam | sampūrṇaṃ yodhamukhyaiśca tathā dantipadātibhiḥ

हे मनुजश्रेष्ठ, वह मण्डल-व्यूह था, अनेक प्रकार के शस्त्रों से भरा हुआ, प्रमुख योद्धाओं, हाथियों और पैदलों से परिपूर्ण,

श्लोक 13 (6.81.13)

रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात्परिवारितम् । अश्ववृन्दैर्महद्भिश्च ऋष्टितोमरधारिभिः ॥

rathairanekasāhasraiḥ samantātparivāritam | aśvavṛndairmahadbhiśca ṛṣṭitomaradhāribhiḥ

जो चारों ओर से कई हज़ार रथों और ऋष्टि तथा तोमर धारण करने वाले घुड़सवारों के बड़े-बड़े दलों से घिरा था।

श्लोक 14 (6.81.14)

नागे नागे रथाः सप्त सप्त चाश्वा रथे रथे । अन्वश्वं दश धानुष्का धानुष्के सप्त चर्मिणः ॥

nāge nāge rathāḥ sapta sapta cāśvā rathe rathe | anvaśvaṃ daśa dhānuṣkā dhānuṣke sapta carmiṇaḥ

हर हाथी के साथ सात रथ थे और हर रथ के साथ सात घुड़सवार; हर घुड़सवार के पीछे दस धनुर्धर, और हर धनुर्धर के साथ सात ढालधारी।

श्लोक 15 (6.81.15)

एवंव्यूहं महाराज तव सैन्यं महारथैः । स्थितं रणाय महते भीष्मेण युधि पालितम् ॥

evaṃvyūhaṃ mahārāja tava sainyaṃ mahārathaiḥ | sthitaṃ raṇāya mahate bhīṣmeṇa yudhi pālitam

हे महाराज, इस प्रकार व्यूह में सजी, महारथियों से युक्त आपकी सेना भीष्म द्वारा रक्षित होकर महान युद्ध के लिए डट गई।

श्लोक 16 (6.81.16)

दशाश्वानां सहस्राणि दन्तिनां च तथैव च । रथानामयुतं चापि पुत्राश्च तव दंशिताः । चित्रसेनादयः शूरा अभ्यरक्षन्पितामहम् ॥

daśāśvānāṃ sahasrāṇi dantināṃ ca tathaiva ca | rathānāmayutaṃ cāpi putrāśca tava daṃśitāḥ | citrasenādayaḥ śūrā abhyarakṣanpitāmaham

दस हज़ार घोड़े, उतने ही हाथी और दस हज़ार रथ, तथा कवचधारी आपके पुत्र—चित्रसेन आदि वीर—पितामह की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 17 (6.81.17)

रक्ष्यमाणश्च तैः शूरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते । संनद्धाः समदृश्यन्त राजानश्च महाबलाः ॥

rakṣyamāṇaśca taiḥ śūrairgopyamānāśca tena te | saṃnaddhāḥ samadṛśyanta rājānaśca mahābalāḥ

उन वीरों से रक्षित भीष्म और उनसे सुरक्षित महाबली राजा कवच आदि धारण किए तैयार दिखाई दिए।

श्लोक 18 (6.81.18)

दुर्योधनस्तु समरे दंशितो रथमास्थितः । व्यभ्राजत श्रिया जुष्टो यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ॥

duryodhanastu samare daṃśito rathamāsthitaḥ | vyabhrājata śriyā juṣṭo yathā śakrastriviṣṭape

रणभूमि में कवच पहने, रथ पर आरूढ़ दुर्योधन श्री से सम्पन्न होकर स्वर्ग में इन्द्र की भाँति शोभा पा रहा था।

श्लोक 19 (6.81.19)

ततः शब्दो महानासीत्पुत्राणां तव भारत । रथघोषश्च तुमुलो वादित्राणां च निस्वनः ॥

tataḥ śabdo mahānāsītputrāṇāṃ tava bhārata | rathaghoṣaśca tumulo vāditrāṇāṃ ca nisvanaḥ

हे भारत, तब आपके पुत्रों की ओर से बड़ा कोलाहल उठा; रथों की भीषण घरघराहट और बाजों का नाद गूँजने लगा।

श्लोक 20 (6.81.20)

भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूढः प्रत्यङ्मुखो युधि । मण्डलः सुमहाव्यूहो दुर्भेद्योऽमित्रघातिनाम् । सर्वतः शुशुभे राजन्रणेऽरीणां दुरासदः ॥

bhīṣmeṇa dhārtarāṣṭrāṇāṃ vyūḍhaḥ pratyaṅmukho yudhi | maṇḍalaḥ sumahāvyūho durbhedyo'mitraghātinām | sarvataḥ śuśubhe rājanraṇe'rīṇāṃ durāsadaḥ

हे राजन्, भीष्म द्वारा युद्ध के लिए पश्चिम की ओर मुख करके रचा गया धृतराष्ट्र-पुत्रों का वह विशाल मण्डल-व्यूह, जिसे शत्रुघाती वीर भी नहीं भेद सकते थे, रण में शत्रुओं के लिए दुर्गम होकर चारों ओर से शोभा पा रहा था।

श्लोक 21 (6.81.21)

मण्डलं तु समालोक्य व्यूहं परमदारुणम् । स्वयं युधिष्ठिरो राजा व्यूहं वज्रमथाकरोत् ॥

maṇḍalaṃ tu samālokya vyūhaṃ paramadāruṇam | svayaṃ yudhiṣṭhiro rājā vyūhaṃ vajramathākarot

उस अत्यन्त भयंकर मण्डल-व्यूह को देखकर राजा युधिष्ठिर ने स्वयं वज्र-व्यूह की रचना की।

श्लोक 22 (6.81.22)

तथा व्यूढेष्वनीकेषु यथास्थानमवस्थिताः । रथिनः सादिनश्चैव सिंहनादमथानदन् ॥

tathā vyūḍheṣvanīkeṣu yathāsthānamavasthitāḥ | rathinaḥ sādinaścaiva siṃhanādamathānadan

इस प्रकार सेनाओं के व्यूह में सज जाने पर अपने-अपने स्थान पर डटे रथी और घुड़सवार सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 23 (6.81.23)

बिभित्सवस्ततो व्यूहं निर्ययुर्युद्धकाङ्क्षिणः । इतरेतरतः शूराः सहसैन्याः प्रहारिणः ॥

bibhitsavastato vyūhaṃ niryayuryuddhakāṅkṣiṇaḥ | itaretarataḥ śūrāḥ sahasainyāḥ prahāriṇaḥ

फिर व्यूह तोड़ने की इच्छा से युद्ध के अभिलाषी शूरवीर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ प्रहार करते हुए एक-दूसरे पर चढ़ दौड़े।

श्लोक 24 (6.81.24)

भारद्वाजो ययौ मत्स्यं द्रौणिश्चापि शिखण्डिनम् । स्वयं दुर्योधनो राजा पार्षतं समुपाद्रवत् ॥

bhāradvājo yayau matsyaṃ drauṇiścāpi śikhaṇḍinam | svayaṃ duryodhano rājā pārṣataṃ samupādravat

भरद्वाज-पुत्र (द्रोण) मत्स्यराज पर चढ़े, द्रोण-पुत्र शिखण्डी पर, और राजा दुर्योधन स्वयं पार्षत (धृष्टद्युम्न) पर टूट पड़ा।

श्लोक 25 (6.81.25)

नकुलः सहदेवश्च राजन्मद्रेशमीयतुः । विन्दानुविन्दावावन्त्याविरावन्तमभिद्रुतौ ॥

nakulaḥ sahadevaśca rājanmadreśamīyatuḥ | vindānuvindāvāvantyāvirāvantamabhidrutau

हे राजन्, नकुल और सहदेव मद्रराज पर चढ़े; अवन्ति के विन्द और अनुविन्द इरावान पर टूट पड़े।

श्लोक 26 (6.81.26)

सर्वे नृपास्तु समरे धनञ्जयमयोधयन् । भीमसेनो रणे यत्तो हार्दिक्यं समवारयत् ॥

sarve nṛpāstu samare dhanañjayamayodhayan | bhīmaseno raṇe yatto hārdikyaṃ samavārayat

सब राजा युद्ध में धनञ्जय से लड़ने लगे; और युद्ध में सावधान भीमसेन ने हार्दिक्य (कृतवर्मा) को रोक लिया।

श्लोक 27 (6.81.27)

चित्रसेनं विकर्णं च तथा दुर्मर्षणं विभो । आर्जुनिः समरे राजंस्तव पुत्रानयोधयत् ॥

citrasenaṃ vikarṇaṃ ca tathā durmarṣaṇaṃ vibho | ārjuniḥ samare rājaṃstava putrānayodhayat

हे प्रभो, हे राजन्, अर्जुन-पुत्र (अभिमन्यु) ने युद्ध में आपके पुत्रों चित्रसेन, विकर्ण और दुर्मर्षण से लोहा लिया।

श्लोक 28 (6.81.28)

प्राग्ज्योतिषं महेष्वासं हैडिम्बो राक्षसोत्तमः । अभिदुद्राव वेगेन मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥

prāgjyotiṣaṃ maheṣvāsaṃ haiḍimbo rākṣasottamaḥ | abhidudrāva vegena matto mattamiva dvipam

राक्षसश्रेष्ठ हैडिम्ब (घटोत्कच) प्राग्ज्योतिष के महाधनुर्धर (भगदत्त) पर वेग से ऐसे झपटा जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी पर झपटता है।

श्लोक 29 (6.81.29)

अलम्बुसस्ततो राजन्सात्यकिं युद्धदुर्मदम् । ससैन्यं समरे क्रुद्धो राक्षसः समभिद्रवत् ॥

alambusastato rājansātyakiṃ yuddhadurmadam | sasainyaṃ samare kruddho rākṣasaḥ samabhidravat

हे राजन्, तब क्रोध में भरा राक्षस अलम्बुस युद्ध में रणदुर्मद सात्यकि और उसकी सेना पर टूट पड़ा।

श्लोक 30 (6.81.30)

भूरिश्रवा रणे यत्तो धृष्टकेतुमयोधयत् । श्रुतायुषं तु राजानं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

bhūriśravā raṇe yatto dhṛṣṭaketumayodhayat | śrutāyuṣaṃ tu rājānaṃ dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

युद्ध में सावधान भूरिश्रवा धृष्टकेतु से लड़ा, और धर्मपुत्र युधिष्ठिर राजा श्रुतायु से।

श्लोक 31 (6.81.31)

चेकितानस्तु समरे कृपमेवान्वयोधयत् । शेषाः प्रतिययुर्यत्ता भीममेव महारथम् ॥

cekitānastu samare kṛpamevānvayodhayat | śeṣāḥ pratiyayuryattā bhīmameva mahāratham

चेकितान युद्ध में कृप से ही भिड़ा; बाकी सब योद्धा सावधान होकर महारथी भीम पर ही चढ़ गए।

श्लोक 32 (6.81.32)

ततो राजसहस्राणि परिवव्रुर्धनञ्जयम् । शक्तितोमरनाराचगदापरिघपाणयः ॥

tato rājasahasrāṇi parivavrurdhanañjayam | śaktitomaranārācagadāparighapāṇayaḥ

तब हज़ारों राजाओं ने हाथों में शक्ति, तोमर, नाराच, गदा और परिघ लिए धनञ्जय को घेर लिया।

श्लोक 33 (6.81.33)

अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धो वार्ष्णेयमिदमब्रवीत् । पश्य माधव सैन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संयुगे । व्यूढानि व्यूहविदुषा गाङ्गेयेन महात्मना ॥

arjuno'tha bhṛśaṃ kruddho vārṣṇeyamidamabravīt | paśya mādhava sainyāni dhārtarāṣṭrasya saṃyuge | vyūḍhāni vyūhaviduṣā gāṅgeyena mahātmanā

तब अत्यन्त क्रोधित अर्जुन ने वार्ष्णेय (कृष्ण) से यह कहा: "हे माधव, युद्धभूमि में दुर्योधन की इन सेनाओं को देखो, जिन्हें व्यूह-रचना के ज्ञाता महात्मा गङ्गापुत्र ने व्यूह में सजाया है।

अर्जुन उवाच

श्लोक 34 (6.81.34)

युद्धाभिकामाञ्शूरांश्च पश्य माधव दंशितान् । त्रिगर्तराजं सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ॥

yuddhābhikāmāñśūrāṃśca paśya mādhava daṃśitān | trigartarājaṃ sahitaṃ bhrātṛbhiḥ paśya keśava

हे माधव, युद्ध के इच्छुक, कवचधारी इन शूरवीरों को देखो; हे केशव, अपने भाइयों के साथ खड़े त्रिगर्तराज को देखो।

श्लोक 35 (6.81.35)

अद्यैतान्पातयिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन । य इमे मां यदुश्रेष्ठ योद्धुकामा रणाजिरे ॥

adyaitānpātayiṣyāmi paśyataste janārdana | ya ime māṃ yaduśreṣṭha yoddhukāmā raṇājire

हे जनार्दन, हे यदुश्रेष्ठ, जो ये लोग रणभूमि में मुझसे लड़ना चाहते हैं, उन्हें आज मैं तुम्हारी आँखों के सामने मार गिराऊँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 36 (6.81.36)

एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो धनुर्ज्यामवमृज्य च । ववर्ष शरवर्षाणि नराधिपगणान्प्रति ॥

evamuktvā tu kaunteyo dhanurjyāmavamṛjya ca | vavarṣa śaravarṣāṇi narādhipagaṇānprati

यह कहकर कुन्तीपुत्र ने अपने धनुष की डोरी को पोंछा और राजाओं के समूहों पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 37 (6.81.37)

तेऽपि तं परमेष्वासाः शरवर्षैरपूरयन् । तडागमिव धाराभिर्यथा प्रावृषि तोयदा ॥

te'pi taṃ parameṣvāsāḥ śaravarṣairapūrayan | taḍāgamiva dhārābhiryathā prāvṛṣi toyadā

उन महाधनुर्धरों ने भी उन्हें बाणों की वर्षा से ऐसे भर दिया जैसे वर्षा ऋतु में बादल अपनी धाराओं से तालाब को भर देते हैं।

श्लोक 38 (6.81.38)

हाहाकारो महानासीत्तव सैन्ये विशां पते । छाद्यमानौ भृशं कृष्णौ शरैर्दृष्ट्वा महारणे ॥

hāhākāro mahānāsīttava sainye viśāṃ pate | chādyamānau bhṛśaṃ kṛṣṇau śarairdṛṣṭvā mahāraṇe

हे प्रजानाथ, उस महायुद्ध में दोनों कृष्णों (अर्जुन और कृष्ण) को बाणों से बुरी तरह ढका देखकर आपकी सेना में बड़ा हाहाकार मच गया।

श्लोक 39 (6.81.39)

देवा देवर्षयश्चैव गन्धर्वाश्च महोरगाः । विस्मयं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णौ तथागतौ ॥

devā devarṣayaścaiva gandharvāśca mahoragāḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmurdṛṣṭvā kṛṣṇau tathāgatau

दोनों कृष्णों को उस दशा में देखकर देवता, देवर्षि, गन्धर्व और बड़े-बड़े नाग अत्यन्त विस्मित हो गए।

श्लोक 40 (6.81.40)

ततः क्रुद्धोऽर्जुनो राजन्नैन्द्रमस्त्रमुदीरयत् । तत्राद्भुतमपश्याम विजयस्य पराक्रमम् ॥

tataḥ kruddho'rjuno rājannaindramastramudīrayat | tatrādbhutamapaśyāma vijayasya parākramam

हे राजन्, तब क्रोधित अर्जुन ने ऐन्द्र अस्त्र का प्रयोग किया; वहाँ हमने विजय (अर्जुन) का अद्भुत पराक्रम देखा—

श्लोक 41 (6.81.41)

शस्त्रवृष्टिं परैर्मुक्तां शरौघैर्यदवारयत् । न च तत्राप्यनिर्भिन्नः कश्चिदासीद्विशां पते ॥

śastravṛṣṭiṃ parairmuktāṃ śaraughairyadavārayat | na ca tatrāpyanirbhinnaḥ kaścidāsīdviśāṃ pate

उन्होंने शत्रुओं द्वारा छोड़ी गई शस्त्रों की वर्षा को अपने बाण-समूहों से रोक दिया, और हे प्रजानाथ, वहाँ कोई भी ऐसा न बचा जो उनके बाणों से बिंधा न हो।

श्लोक 42 (6.81.42)

तेषां राजसहस्राणां हयानां दन्तिनां तथा । द्वाभ्यां त्रिभिः शरैश्चान्यान्पार्थो विव्याध मारिष ॥

teṣāṃ rājasahasrāṇāṃ hayānāṃ dantināṃ tathā | dvābhyāṃ tribhiḥ śaraiścānyānpārtho vivyādha māriṣa

हे मान्यवर, उन हज़ारों राजाओं को तथा घोड़ों और हाथियों को भी पार्थ ने दो-दो, तीन-तीन बाणों से बींध डाला।

श्लोक 43 (6.81.43)

ते हन्यमानाः पार्थेन भीष्मं शान्तनवं ययुः । अगाधे मज्जमानानां भीष्मस्त्राताभवत्तदा ॥

te hanyamānāḥ pārthena bhīṣmaṃ śāntanavaṃ yayuḥ | agādhe majjamānānāṃ bhīṣmastrātābhavattadā

पार्थ की मार खाकर वे शान्तनु-पुत्र भीष्म के पास गए; तब अथाह जल में डूबते हुए उन लोगों के रक्षक भीष्म बने।

श्लोक 44 (6.81.44)

आपतद्भिस्तु तैस्तत्र प्रभग्नं तावकं बलम् । सञ्चुक्षुभे महाराज वातैरिव महार्णवः ॥

āpatadbhistu taistatra prabhagnaṃ tāvakaṃ balam | sañcukṣubhe mahārāja vātairiva mahārṇavaḥ

हे महाराज, उनके वहाँ आ पड़ने से आपकी टूटी हुई सेना वैसे ही क्षुब्ध हो उठी जैसे आँधी से महासागर।

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