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भीष्म पर्व · अध्याय 80

भीष्म का दुर्योधन को आश्वासन

छठे दिन के युद्ध के बाद योद्धा अपने शिविरों में विश्राम करते हैं, और सातवें दिन की सुबह भीम के बाणों से अब भी लहूलुहान दुर्योधन भीष्म से शिकायत करता है कि पाण्डवों ने उसकी व्यूह-रचनाएँ तोड़ दीं, और उनसे विजय की याचना करता है। भीष्म हँसकर चेताते हैं कि पाण्डवों के सहायक दुर्जेय हैं, फिर भी वे प्राणों की बाज़ी लगाकर पूरी शक्ति से उनसे लड़ने का वचन देते हैं। आश्वस्त होकर दुर्योधन सेना को कूच का आदेश देता है, और कौरव सेना शोभा के साथ आगे बढ़ती है, जिसके धनुषों की टंकार समुद्र-मन्थन के समान गूँजती है।

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.80.1)

क्षत्रियास्ते महाराज परस्परकृतागसः । जग्मुः स्वशिबिराण्येव रुधिरेण समुक्षिताः ॥

kṣatriyāste mahārāja parasparakṛtāgasaḥ | jagmuḥ svaśibirāṇyeva rudhireṇa samukṣitāḥ

हे महाराज, एक-दूसरे का अपराध करने वाले वे क्षत्रिय रक्त से लथपथ होकर अपने-अपने शिविरों को लौट गए।

श्लोक 2 (6.80.2)

विश्रम्य च यथान्यायं पूजयित्वा परस्परम् । सन्नद्धाः समदृश्यन्त भूयो युद्धचिकीर्षवः ॥

viśramya ca yathānyāyaṃ pūjayitvā parasparam | sannaddhāḥ samadṛśyanta bhūyo yuddhacikīrṣavaḥ

यथोचित विश्राम करके और एक-दूसरे का सत्कार करके वे फिर युद्ध की इच्छा से कवच आदि पहने दिखाई देने लगे।

श्लोक 3 (6.80.3)

ततस्तव सुतो राजंश्चिन्तयाभिपरिप्लुतः । विस्रवच्छोणिताक्ताङ्गः पप्रच्छेदं पितामहम् ॥

tatastava suto rājaṃścintayābhipariplutaḥ | visravacchoṇitāktāṅgaḥ papracchedaṃ pitāmaham

हे राजन्, तब चिन्ता में डूबे आपके पुत्र ने, जिसके अंगों से रक्त बह रहा था, पितामह से यह पूछा—

दुर्योधन उवाच

श्लोक 4 (6.80.4)

सैन्यानि रौद्राणि भयानकानि । व्यूढानि सम्यग्बहुलध्वजानि । विदार्य हत्वा च निपीड्य शूरां- । स्ते पाण्डवा लब्धजयाः प्रहृष्टाः ॥

sainyāni raudrāṇi bhayānakāni | vyūḍhāni samyagbahuladhvajāni | vidārya hatvā ca nipīḍya śūrāṃ- | ste pāṇḍavā labdhajayāḥ prahṛṣṭāḥ

"हमारी भयंकर और डरावनी सेनाएँ, जो भली-भाँति व्यूह में सजी थीं और जिन पर बहुत-सी ध्वजाएँ फहरा रही थीं, पाण्डवों ने छिन्न-भिन्न कर दीं; हमारे शूरवीरों को मारकर और कुचलकर वे विजय पाकर हर्षित हो रहे हैं।

श्लोक 5 (6.80.5)

संमोह्य सर्वान्युधि कीर्तिमन्तो । व्यूहं च तं मकरं मृत्युकल्पम् । प्रविश्य भीमेन रणे हतोऽस्मि । घोरैः शरैर्मृत्युदण्डप्रकाशैः ॥

saṃmohya sarvānyudhi kīrtimanto | vyūhaṃ ca taṃ makaraṃ mṛtyukalpam | praviśya bhīmena raṇe hato'smi | ghoraiḥ śarairmṛtyudaṇḍaprakāśaiḥ

उन यशस्वी वीरों ने युद्ध में सबको मोह में डाल दिया; और जब मैं उनके मृत्यु के समान घातक उस मकर-व्यूह में घुसा, तो भीम ने रण में यमदण्ड जैसे भयानक बाणों से मुझे घायल कर गिरा दिया।

श्लोक 6 (6.80.6)

क्रुद्धं तमुद्वीक्ष्य भयेन राज- । न्संमूर्च्छितो न लभे शान्तिमद्य । इच्छे प्रसादात्तव सत्यसन्ध । प्राप्तुं जयं पाण्डवेयांश्च हन्तुम् ॥

kruddhaṃ tamudvīkṣya bhayena rāja- | nsaṃmūrcchito na labhe śāntimadya | icche prasādāttava satyasandha | prāptuṃ jayaṃ pāṇḍaveyāṃśca hantum

हे राजन्, उन्हें क्रोध में भरा देखकर मैं भय से सुध-बुध खो बैठा हूँ और आज मुझे चैन नहीं मिल रहा। हे सत्यप्रतिज्ञ, आपकी कृपा से मैं विजय पाना और पाण्डवों को मारना चाहता हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (6.80.7)

तेनैवमुक्तः प्रहसन्महात्मा । दुर्योधनं मन्युगतं विदित्वा । तं प्रत्युवाचाविमना मनस्वी । गङ्गासुतः शस्त्रभृतां वरिष्ठः ॥

tenaivamuktaḥ prahasanmahātmā | duryodhanaṃ manyugataṃ viditvā | taṃ pratyuvācāvimanā manasvī | gaṅgāsutaḥ śastrabhṛtāṃ variṣṭhaḥ

यह सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, महात्मा गङ्गापुत्र हँस पड़े; और दुर्योधन को क्रोध के वश में जानकर उस मनस्वी ने शान्त मन से उसे उत्तर दिया—

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (6.80.8)

परेण यत्नेन विगाह्य सेनां । सर्वात्मनाऽहं तव राजपुत्र । इच्छामि दातुं विजयं सुखं च । न चात्मानं छादयेऽहं त्वदर्थे ॥

pareṇa yatnena vigāhya senāṃ | sarvātmanā'haṃ tava rājaputra | icchāmi dātuṃ vijayaṃ sukhaṃ ca | na cātmānaṃ chādaye'haṃ tvadarthe

"हे राजपुत्र, पूरे प्रयत्न से और सम्पूर्ण शक्ति से शत्रु-सेना में घुसकर मैं तुम्हें विजय और सुख देना चाहता हूँ; तुम्हारे लिए मैं अपने आप को बचाकर नहीं रखता।

श्लोक 9 (6.80.9)

एते तु रौद्रा बहवो महारथा । यशस्विनः शूरतमाः कृतास्त्राः । ये पाण्डवानां समरे सहाया । जितक्लमा रोषविषं वमन्ति ॥

ete tu raudrā bahavo mahārathā | yaśasvinaḥ śūratamāḥ kṛtāstrāḥ | ye pāṇḍavānāṃ samare sahāyā | jitaklamā roṣaviṣaṃ vamanti

परन्तु जो बहुत-से महारथी युद्ध में पाण्डवों के सहायक हैं, वे भयंकर, यशस्वी, शूरों में भी शूर और अस्त्रविद्या में निपुण हैं; वे थकान को जीत चुके हैं और अपने क्रोध का विष उगलते हैं।

श्लोक 10 (6.80.10)

केनेह शक्याः सहसा विजेतुं । वीर्योद्धताः कृतवैरास्त्वया च । अहं ह्येतान्प्रतियोत्स्यामि राज- । न्सर्वात्मना जीवितं त्यज्य वीर ॥

keneha śakyāḥ sahasā vijetuṃ | vīryoddhatāḥ kṛtavairāstvayā ca | ahaṃ hyetānpratiyotsyāmi rāja- | nsarvātmanā jīvitaṃ tyajya vīra

पराक्रम से उद्धत और तुम्हारे द्वारा शत्रु बनाए गए उन वीरों को यहाँ शीघ्र कौन जीत सकता है? फिर भी, हे राजन्, हे वीर, मैं प्राणों का मोह छोड़कर पूरी शक्ति से उनसे लड़ूँगा।

श्लोक 11 (6.80.11)

रणे तवार्थाय महानुभाव । न जीवितं रक्षितव्यं ममाद्य । सर्वांस्तवार्थाय सदेवदैत्याँ- । ल्लोकान्दहेयं किमु शत्रुसेनाम् ॥

raṇe tavārthāya mahānubhāva | na jīvitaṃ rakṣitavyaṃ mamādya | sarvāṃstavārthāya sadevadaityām̐- | llokāndaheyaṃ kimu śatrusenām

हे महानुभाव, इस युद्ध में तुम्हारे लिए आज मुझे अपने प्राणों की रक्षा नहीं करनी है। तुम्हारे लिए मैं देवताओं और दैत्यों सहित सारे लोकों को जला सकता हूँ, फिर शत्रु-सेना की तो बात ही क्या।

श्लोक 12 (6.80.12)

तान्पाण्डवान्योधयिष्यामि राजन् । प्रियं च ते सर्वमहं करिष्ये ॥

tānpāṇḍavānyodhayiṣyāmi rājan | priyaṃ ca te sarvamahaṃ kariṣye

हे राजन्, मैं उन पाण्डवों से युद्ध करूँगा और तुम्हारा सब प्रिय कार्य करूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 13 (6.80.13)

श्रुत्वा पितुस्ते वचनं प्रतीतो । दुर्योधनः प्रीतमना बभूव ॥

śrutvā pituste vacanaṃ pratīto | duryodhanaḥ prītamanā babhūva

हे राजन्, आपके पितृतुल्य भीष्म के ये वचन सुनकर दुर्योधन आश्वस्त हुआ और उसका मन प्रसन्न हो गया।

श्लोक 14 (6.80.14)

सर्वाणि सैन्यानि ततः प्रहृष्टो । निर्गच्छतेत्याह नृपांश्च सर्वान् । तदाज्ञया तानि विनिर्ययुर्द्रुतं । गजाश्वपादातरथायुतानि ॥

sarvāṇi sainyāni tataḥ prahṛṣṭo | nirgacchatetyāha nṛpāṃśca sarvān | tadājñayā tāni viniryayurdrutaṃ | gajāśvapādātarathāyutāni

तब उसने हर्षित होकर सारी सेनाओं और सब राजाओं से कहा, "निकल पड़ो!" उसकी आज्ञा से हाथी, घोड़े, पैदल और रथ दस-दस हज़ार की संख्या में तेज़ी से निकल पड़े।

श्लोक 15 (6.80.15)

प्रहर्षयुक्तानि तु तानि राज- । न्महान्ति नानाविधशस्त्रवन्ति । स्थितानि नागाश्वपदातिमन्ति । विरेजुराजौ तव राजन्बलानि ॥

praharṣayuktāni tu tāni rāja- | nmahānti nānāvidhaśastravanti | sthitāni nāgāśvapadātimanti | virejurājau tava rājanbalāni

हे राजन्, हर्ष से भरी, अनेक प्रकार के शस्त्रों से युक्त, हाथियों, घोड़ों और पैदलों वाली आपकी वे विशाल सेनाएँ रणभूमि में खड़ी होकर शोभा पाने लगीं।

श्लोक 16 (6.80.16)

शस्त्रास्त्रविद्भिर्नरवीरयोधै- । रधिष्ठिताः सैन्यगणास्त्वदीयाः । रथौघपादातगजाश्वसङ्घैः । प्रयाद्भिराजौ विधिवत्प्रणुन्नैः ॥

śastrāstravidbhirnaravīrayodhai- | radhiṣṭhitāḥ sainyagaṇāstvadīyāḥ | rathaughapādātagajāśvasaṅghaiḥ | prayādbhirājau vidhivatpraṇunnaiḥ

आपकी सेनाओं का संचालन शस्त्रास्त्रों में कुशल वीर योद्धा कर रहे थे, और रथों, पैदलों, हाथियों तथा घोड़ों के समूह विधिपूर्वक प्रेरित होकर युद्ध में बढ़ रहे थे।

श्लोक 17 (6.80.17)

समुद्धतं वै तरुणार्कवर्णं । रजो बभौ च्छादयत्सूर्यरश्मीन् । रेजुः पताका रथदन्तिसंस्था । वातेरिता भ्राम्यमाणाः समन्तात् ॥

samuddhataṃ vai taruṇārkavarṇaṃ | rajo babhau cchādayatsūryaraśmīn | rejuḥ patākā rathadantisaṃsthā | vāteritā bhrāmyamāṇāḥ samantāt

उनके द्वारा उड़ाई गई धूल, जिसका रंग उगते सूर्य जैसा था, सूर्य की किरणों को ढकती हुई चमक उठी। रथों और हाथियों पर लगी पताकाएँ हवा से चारों ओर लहराती हुई शोभा पाने लगीं,

श्लोक 18 (6.80.18)

नानालिङ्गैः समरे तत्र राजन् । मेघैर्युता विद्युतः खे यथैव । वृन्दैः स्थिताश्चापि सुसंप्रयुक्ता- । श्चकाशिरे दन्तिगणाः समन्तात् ॥

nānāliṅgaiḥ samare tatra rājan | meghairyutā vidyutaḥ khe yathaiva | vṛndaiḥ sthitāścāpi susaṃprayuktā- | ścakāśire dantigaṇāḥ samantāt

हे राजन्, उस युद्ध में अनेक चिह्नों से युक्त वे ऐसी लगती थीं जैसे आकाश में बादलों के साथ बिजलियाँ। और टुकड़ियों में खड़े, भली-भाँति सजाए गए हाथियों के झुंड चारों ओर शोभा पा रहे थे।

श्लोक 19 (6.80.19)

धनूंषि विष्फारयतां नृपाणां । बभूव शब्दस्तुमुलोऽतिघोरः । विमथ्यतो देवमहासुरौघै- । र्यथार्णवस्यादियुगे तदानीम् ॥

dhanūṃṣi viṣphārayatāṃ nṛpāṇāṃ | babhūva śabdastumulo'tighoraḥ | vimathyato devamahāsuraughai- | ryathārṇavasyādiyuge tadānīm

राजाओं के धनुष की टंकार का शब्द ऐसा भीषण और भयंकर था, जैसे आदि युग में देवताओं और बड़े-बड़े असुरों के समूहों द्वारा मथे जाते समय समुद्र का गर्जन हुआ था।

श्लोक 20 (6.80.20)

तदुग्रनागं बहुरूपवर्णं । तवात्मजानां समुदीर्णकोपम् । बभूव सैन्यं रिपुसैन्यहन्तृ । युगान्तमेघौघनिभं तदानीम् ॥

tadugranāgaṃ bahurūpavarṇaṃ | tavātmajānāṃ samudīrṇakopam | babhūva sainyaṃ ripusainyahantṛ | yugāntameghaughanibhaṃ tadānīm

आपके पुत्रों की वह सेना—भयानक हाथियों से युक्त, अनेक रूपों और रंगों वाली, क्रोध से उमड़ती और शत्रु-सेनाओं का संहार करने वाली—उस समय प्रलयकाल के मेघ-समूह जैसी दिखाई देने लगी।

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