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भीष्म पर्व · अध्याय 79

भीम द्वारा दुर्योधन का पराभव; द्रौपदी-पुत्रों का युद्ध

छठे दिन जब सूर्य लाल होने लगता है, दुर्योधन भीम पर टूट पड़ता है; भीम कौरवों के पुराने अपराध गिनाकर उसका धनुष, घोड़े, छत्र और नाग-चिह्न वाली ध्वजा काट डालते हैं और उसे मूर्च्छित कर देते हैं; जयद्रथ उसकी रक्षा करता है और कृप उसे अपने रथ पर ले जाते हैं। अभिमन्यु धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों को खदेड़कर विकर्ण को गिरा देता है, द्रौपदी के पुत्र कौरव राजकुमारों से भिड़ते हैं और केकय भाई भी युद्ध में कूद पड़ते हैं। संध्या को भीष्म पाञ्चाल सेना का संहार कर सेना लौटा लेते हैं; धृष्टद्युम्न और भीम कौरव टुकड़ियों को नष्ट करते हैं, और युधिष्ठिर, अर्जुन तथा कृष्ण शिविर लौट जाते हैं।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.79.1)

ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे । संग्रामरभसो भीमं हन्तुकामोऽभ्यधावत ॥

tato duryodhano rājā lohitāyati bhāskare | saṃgrāmarabhaso bhīmaṃ hantukāmo'bhyadhāvata

तब, जब सूर्य लाल होने लगा, युद्ध के लिए उतावला राजा दुर्योधन भीम को मार डालने की इच्छा से उन पर झपटा।

श्लोक 2 (6.79.2)

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य नृवीरं दृढवैरिणम् । भीमसेनः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥

tamāyāntamabhiprekṣya nṛvīraṃ dṛḍhavairiṇam | bhīmasenaḥ susaṃkruddha idaṃ vacanamabravīt

उस नरवीर, अपने पक्के शत्रु को आते देखकर अत्यन्त क्रोधित भीमसेन ने यह बात कही—

भीमसेन उवाच

श्लोक 3 (6.79.3)

अयं स कालः संप्राप्तो वर्षपूगाभिवाञ्छितः । अद्य त्वां निहनिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ॥

ayaṃ sa kālaḥ saṃprāpto varṣapūgābhivāñchitaḥ | adya tvāṃ nihaniṣyāmi yadi notsṛjase raṇam

"जिस घड़ी की मैं बरसों से प्रतीक्षा कर रहा था, वह आ पहुँची है। यदि तुम रण छोड़कर नहीं भागे, तो आज मैं तुम्हें मार डालूँगा।

श्लोक 4 (6.79.4)

अद्य कुन्त्याः परिक्लेशं वनवासं च कृत्स्नशः । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं प्रणेष्यामि हते त्वयि ॥

adya kuntyāḥ parikleśaṃ vanavāsaṃ ca kṛtsnaśaḥ | draupadyāśca parikleśaṃ praṇeṣyāmi hate tvayi

आज तुम्हारे मारे जाने पर मैं कुन्ती का कष्ट, हमारा पूरा वनवास और द्रौपदी का क्लेश भी मिटा दूँगा।

श्लोक 5 (6.79.5)

यत्पुरा मत्सरीभूत्वा पाण्डवानवमन्यसे । तस्य पापस्य गान्धारे पश्य व्यसनमागतम् ॥

yatpurā matsarībhūtvā pāṇḍavānavamanyase | tasya pāpasya gāndhāre paśya vyasanamāgatam

तुमने पहले ईर्ष्या से भरकर पाण्डवों का अपमान किया था; हे गान्धारी-पुत्र, अब उस पाप का फल, अपने ऊपर आई इस विपत्ति को देखो।

श्लोक 6 (6.79.6)

कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च यत्पुरा । अचिन्त्य पाण्डवान्कामाद्यथेष्टं कृतवानसि ॥

karṇasya matamāsthāya saubalasya ca yatpurā | acintya pāṇḍavānkāmādyatheṣṭaṃ kṛtavānasi

कर्ण और सौबल (शकुनि) की सलाह मानकर तुमने पहले पाण्डवों की कोई परवाह न करते हुए मनमानी की।

श्लोक 7 (6.79.7)

याचमानं च यन्मोहाद्दाशार्हमवमन्यसे । उलूकस्य समादेशं यद्ददासि च हृष्टवत् ॥

yācamānaṃ ca yanmohāddāśārhamavamanyase | ulūkasya samādeśaṃ yaddadāsi ca hṛṣṭavat

मोहवश तुमने याचना करने आए दाशार्ह (कृष्ण) का अपमान किया और प्रसन्न होकर उलूक के हाथ अपना सन्देश भेजा।

श्लोक 8 (6.79.8)

तेन त्वां निहनिष्यामि सानुबन्धं सबान्धवम् । शमीकरिष्ये तत्पापं यत्पुरा कृतवानसि ॥

tena tvāṃ nihaniṣyāmi sānubandhaṃ sabāndhavam | śamīkariṣye tatpāpaṃ yatpurā kṛtavānasi

इसी कारण मैं तुम्हें तुम्हारे अनुयायियों और बन्धु-बान्धवों सहित मार डालूँगा और तुम्हारे पहले किए उस पाप का हिसाब चुका दूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (6.79.9)

एवमुक्त्वा धनुर्घोरं विकृष्योद्भ्राम्य चासकृत् । समाधत्त शरान्घोरान्महाशनिसमप्रभान् ॥

evamuktvā dhanurghoraṃ vikṛṣyodbhrāmya cāsakṛt | samādhatta śarānghorānmahāśanisamaprabhān

यह कहकर उन्होंने अपना भयंकर धनुष खींचा, उसे बार-बार घुमाया और बड़े वज्र के समान चमकते भयानक बाण चढ़ाए।

श्लोक 10 (6.79.10)

षड्विंशत्तरसा क्रुद्धो मुमोचाशु सुयोधने । ज्वलिताग्निशिखाकारान्वज्रकल्पानजिह्मगान् ॥

ṣaḍviṃśattarasā kruddho mumocāśu suyodhane | jvalitāgniśikhākārānvajrakalpānajihmagān

क्रोध में भरकर उन्होंने तुरन्त छब्बीस बाण वेग से सुयोधन पर छोड़े—सीधे जाने वाले, वज्र के समान और धधकती अग्नि की लपटों जैसे।

श्लोक 11 (6.79.11)

ततोऽस्य कार्मुकं द्वाभ्यां सूतं द्वाभ्यां च विव्यधे । चतुर्भिरश्वाञ्जवनाननयद्यमसादनम् ॥

tato'sya kārmukaṃ dvābhyāṃ sūtaṃ dvābhyāṃ ca vivyadhe | caturbhiraśvāñjavanānanayadyamasādanam

फिर दो बाणों से उसके धनुष को और दो से उसके सारथि को बींध दिया, और चार से उसके वेगवान घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 12 (6.79.12)

द्वाभ्यां च सुविकृष्टाभ्यां शराभ्यामरिमर्दनः । छत्रं चिच्छेद समरे राज्ञस्तस्य नरोत्तम ॥

dvābhyāṃ ca suvikṛṣṭābhyāṃ śarābhyāmarimardanaḥ | chatraṃ ciccheda samare rājñastasya narottama

हे नरश्रेष्ठ, उस शत्रुमर्दन ने पूरी तरह खींचे दो बाणों से युद्ध में उस राजा का छत्र काट गिराया।

श्लोक 13 (6.79.13)

षड्भिश्च तस्य चिच्छेद ज्वलन्तं ध्वजमुत्तमम् । छित्त्वा तं च ननादोच्चैस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥

ṣaḍbhiśca tasya ciccheda jvalantaṃ dhvajamuttamam | chittvā taṃ ca nanādoccaistava putrasya paśyataḥ

छह बाणों से उन्होंने उसकी चमचमाती उत्तम ध्वजा काट दी और उसे काटकर आपके पुत्र के देखते-देखते ज़ोर से गर्जना की।

श्लोक 14 (6.79.14)

रथाच्च स ध्वजः श्रीमान्नानारत्नविभूषितात् । पपात सहसा भूमौ विद्युज्जलधरादिव ॥

rathācca sa dhvajaḥ śrīmānnānāratnavibhūṣitāt | papāta sahasā bhūmau vidyujjaladharādiva

अनेक रत्नों से सजे रथ से वह शोभायुक्त ध्वजा सहसा भूमि पर गिर पड़ी, जैसे बादल से बिजली गिरती है।

श्लोक 15 (6.79.15)

ज्वलन्तं सूर्यसंकाशं नागं मणिमयं शुभम् । ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥

jvalantaṃ sūryasaṃkāśaṃ nāgaṃ maṇimayaṃ śubham | dhvajaṃ kurupateśchinnaṃ dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ

सब राजाओं ने कुरुराज की उस कटी हुई ध्वजा को देखा—सूर्य के समान दमकता, मणियों से बना सुन्दर नाग।

श्लोक 16 (6.79.16)

अथैनं दशभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम् । आजघान रणे वीरं स्मयन्निव महारथः ॥

athainaṃ daśabhirbāṇaistotrairiva mahādvipam | ājaghāna raṇe vīraṃ smayanniva mahārathaḥ

तब उस महारथी ने मानो मुस्कराते हुए रण में उस वीर पर दस बाण ऐसे मारे, जैसे बड़े हाथी को अंकुशों से मारा जाता है।

श्लोक 17 (6.79.17)

स गाढविद्धो व्यथितो भीमसेनेन संयुगे । निषसाद रथोपस्थे मूर्च्छाभिहतचेतनः ॥

sa gāḍhaviddho vyathito bhīmasenena saṃyuge | niṣasāda rathopasthe mūrcchābhihatacetanaḥ

भीमसेन के बाणों से गहरा बिंधकर और पीड़ित होकर वह युद्ध में मूर्च्छा से अचेत हो रथ के पिछले भाग में बैठ गया।

श्लोक 18 (6.79.18)

ततः स राजा सिन्धूनां रथश्रेष्ठो महाबलः । दुर्योधनस्य जग्राह पार्ष्णिं स्वपुरुषैर्वृतः ॥

tataḥ sa rājā sindhūnāṃ rathaśreṣṭho mahābalaḥ | duryodhanasya jagrāha pārṣṇiṃ svapuruṣairvṛtaḥ

तब रथियों में श्रेष्ठ, महाबली सिन्धुराज (जयद्रथ) ने अपने सैनिकों से घिरकर दुर्योधन के पार्श्व की रक्षा सँभाल ली।

श्लोक 19 (6.79.19)

कृपश्च रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रमचेतनम् । आरोपयद्रथं राजन्दुर्योधनममर्षणम् ॥

kṛpaśca rathināṃ śreṣṭhastava putramacetanam | āropayadrathaṃ rājanduryodhanamamarṣaṇam

और हे राजन्, रथियों में श्रेष्ठ कृप ने आपके अचेत पड़े असहनशील पुत्र दुर्योधन को अपने रथ पर चढ़ा लिया।

श्लोक 20 (6.79.20)

परिवार्य ततो भीमं जेतुकामो जयद्रथः । रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद्दिशः ॥

parivārya tato bhīmaṃ jetukāmo jayadrathaḥ | rathairanekasāhasrairbhīmasyāvārayaddiśaḥ

तब विजय की इच्छा से जयद्रथ ने कई हज़ार रथों से भीम को घेरकर उनकी सब दिशाएँ रोक दीं।

श्लोक 21 (6.79.21)

धृष्टकेतुस्ततो राजन्नभिमन्युश्च वीर्यवान् । केकया द्रौपदेयाश्च तव पुत्रानयोधयन् ॥

dhṛṣṭaketustato rājannabhimanyuśca vīryavān | kekayā draupadeyāśca tava putrānayodhayan

हे राजन्, तब धृष्टकेतु, पराक्रमी अभिमन्यु, केकय और द्रौपदी के पुत्र आपके पुत्रों से युद्ध करने लगे।

श्लोक 22 (6.79.22)

चित्रसेनः सुचित्रश्च चित्राङ्गश्चित्रदर्शनः । चारुचित्रः सुचारुश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ॥

citrasenaḥ sucitraśca citrāṅgaścitradarśanaḥ | cārucitraḥ sucāruśca tathā nandopanandakau

चित्रसेन, सुचित्र, चित्राङ्ग, चित्रदर्शन, चारुचित्र, सुचारु तथा नन्द और उपनन्दक—

श्लोक 23 (6.79.23)

अष्टावेते महेष्वासाः सुकुमारा यशस्विनः । अभिमन्युरथं राजन्समन्तात्पर्यवारयन् ॥

aṣṭāvete maheṣvāsāḥ sukumārā yaśasvinaḥ | abhimanyurathaṃ rājansamantātparyavārayan

हे राजन्, इन आठ यशस्वी, सुकुमार महाधनुर्धरों ने अभिमन्यु के रथ को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 24 (6.79.24)

आजघान ततस्तूर्णमभिमन्युर्महामनाः । एकैकं पञ्चभिर्बाणैः शितैः सन्नतपर्वभिः ॥

ājaghāna tatastūrṇamabhimanyurmahāmanāḥ | ekaikaṃ pañcabhirbāṇaiḥ śitaiḥ sannataparvabhiḥ

तब उदारचित्त अभिमन्यु ने तुरन्त उनमें से प्रत्येक पर झुकी गाँठों वाले पाँच-पाँच पैने बाण मारे—

श्लोक 25 (6.79.25)

वज्रमृत्युप्रतीकाशैर्विचित्रायुधनिःसृतैः । अमृष्यमाणास्ते सर्वे सौभद्रं रथसत्तमम् ॥

vajramṛtyupratīkāśairvicitrāyudhaniḥsṛtaiḥ | amṛṣyamāṇāste sarve saubhadraṃ rathasattamam

वज्र और मृत्यु के समान बाण, जो उसके अद्भुत धनुष से छूटे थे। यह सहन न कर सकने के कारण वे सब रथियों में श्रेष्ठ सौभद्र पर

श्लोक 26 (6.79.26)

ववृषुर्मार्गणैस्तीक्ष्णैर्गिरिं मेरुमिवाम्बुदाः । स पीड्यमानः समरे कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥

vavṛṣurmārgaṇaistīkṣṇairgiriṃ merumivāmbudāḥ | sa pīḍyamānaḥ samare kṛtāstro yuddhadurmadaḥ

पैने बाणों की वैसी ही वर्षा करने लगे जैसे बादल मेरु पर्वत पर बरसते हैं। युद्ध में पीड़ित होकर भी अस्त्रविद्या में निपुण, रणदुर्मद

श्लोक 27 (6.79.27)

अभिमन्युर्महाराज तावकान्समकम्पयत् । यथा देवासुरे युद्धे वज्रपाणिर्महासुरान् ॥

abhimanyurmahārāja tāvakānsamakampayat | yathā devāsure yuddhe vajrapāṇirmahāsurān

हे महाराज, अभिमन्यु ने आपके योद्धाओं को वैसे ही कँपा दिया जैसे देवासुर-संग्राम में वज्रधारी इन्द्र ने बड़े-बड़े असुरों को कँपाया था।

श्लोक 28 (6.79.28)

विकर्णस्य ततो भल्लान्प्रेषयामास भारत । चतुर्दश रथश्रेष्ठो घोरानाशीविषोपमान् ॥

vikarṇasya tato bhallānpreṣayāmāsa bhārata | caturdaśa rathaśreṣṭho ghorānāśīviṣopamān

हे भारत, तब उस श्रेष्ठ रथी ने विकर्ण पर विषैले सर्पों जैसे भयंकर चौदह भल्ल बाण चलाए।

श्लोक 29 (6.79.29)

स तैर्विकर्णस्य रथात्पातयामास वीर्यवान् । ध्वजं सूतं हयांश्चैव नृत्यमान इवाहवे ॥

sa tairvikarṇasya rathātpātayāmāsa vīryavān | dhvajaṃ sūtaṃ hayāṃścaiva nṛtyamāna ivāhave

उन बाणों से उस पराक्रमी ने मानो रण में नाचते हुए विकर्ण के रथ से उसकी ध्वजा, सारथि और घोड़ों को गिरा दिया।

श्लोक 30 (6.79.30)

पुनश्चान्याञ्शरान्पीतानकुण्ठाग्राञ्शिलाशितान् । प्रेषयामास संक्रुद्धो विकर्णाय महाबलः ॥

punaścānyāñśarānpītānakuṇṭhāgrāñśilāśitān | preṣayāmāsa saṃkruddho vikarṇāya mahābalaḥ

फिर उस महाबली ने क्रोध में भरकर विकर्ण पर और बाण चलाए—तेल पिलाए, कुण्ठित न होने वाली नोकों वाले, पत्थर पर तेज़ किए हुए।

श्लोक 31 (6.79.31)

ते विकर्णं समासाद्य कङ्कबर्हिणवाससः । भित्त्वा देहं गता भूमिं ज्वलन्त इव पन्नगाः ॥

te vikarṇaṃ samāsādya kaṅkabarhiṇavāsasaḥ | bhittvā dehaṃ gatā bhūmiṃ jvalanta iva pannagāḥ

कंक और मोर के पंखों वाले वे बाण विकर्ण तक पहुँचे और उसका शरीर भेदकर धधकते सर्पों की भाँति धरती में घुस गए।

श्लोक 32 (6.79.32)

ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले । विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ॥

te śarā hemapuṅkhāgrā vyadṛśyanta mahītale | vikarṇarudhiraklinnā vamanta iva śoṇitam

सोने के पंख और नोकों वाले वे बाण, विकर्ण के रक्त से भीगे, भूमि पर पड़े ऐसे दिखते थे मानो रक्त उगल रहे हों।

श्लोक 33 (6.79.33)

विकर्णं वीक्ष्य निर्भिन्नं तस्यैवान्ये सहोदराः । अभ्यद्रवन्त समरे सौभद्रप्रमुखान्रथान् ॥

vikarṇaṃ vīkṣya nirbhinnaṃ tasyaivānye sahodarāḥ | abhyadravanta samare saubhadrapramukhānrathān

विकर्ण को बिंधा देखकर उसके दूसरे सगे भाई युद्ध में सौभद्र के नेतृत्व वाले रथियों पर टूट पड़े।

श्लोक 34 (6.79.34)

अभियात्वा तथैवान्यान्रथांस्तान्सूर्यवर्चसः । अविध्यन्समरेऽन्योन्यं संरम्भाद्युद्धदुर्मदाः ॥

abhiyātvā tathaivānyānrathāṃstānsūryavarcasaḥ | avidhyansamare'nyonyaṃ saṃrambhādyuddhadurmadāḥ

इसी प्रकार सूर्य के समान तेजस्वी उन दूसरे रथियों पर आक्रमण करके वे रणदुर्मद योद्धा आवेश में एक-दूसरे को बींधने लगे।

श्लोक 35 (6.79.35)

दुर्मुखः श्रुतकर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । ध्वजमेकेन चिच्छेद सारथिं चास्य सप्तभिः ॥

durmukhaḥ śrutakarmāṇaṃ viddhvā saptabhirāśugaiḥ | dhvajamekena ciccheda sārathiṃ cāsya saptabhiḥ

दुर्मुख ने सात शीघ्रगामी बाणों से श्रुतकर्मा को बींधा, एक से उसकी ध्वजा काट दी और सात से उसके सारथि को मारा।

श्लोक 36 (6.79.36)

अश्वाञ्जाम्बूनदैर्जालैः प्रच्छन्नान्वातरंहसः । जघान षड्भिरासाद्य सारथिं चाभ्यपातयत् ॥

aśvāñjāmbūnadairjālaiḥ pracchannānvātaraṃhasaḥ | jaghāna ṣaḍbhirāsādya sārathiṃ cābhyapātayat

पास पहुँचकर उसने छह बाणों से सोने की जालियों से ढके, वायु के समान वेगवान उसके घोड़ों को मार डाला और सारथि को गिरा दिया।

श्लोक 37 (6.79.37)

स हताश्वे रथे तिष्ठञ्श्रुतकर्मा महारथः । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धो महोल्कां ज्वलितामिव ॥

sa hatāśve rathe tiṣṭhañśrutakarmā mahārathaḥ | śaktiṃ cikṣepa saṃkruddho maholkāṃ jvalitāmiva

घोड़ों के मारे जाने पर भी रथ पर खड़े महारथी श्रुतकर्मा ने क्रोध में भरकर एक जलती हुई बड़ी उल्का जैसी शक्ति फेंकी।

श्लोक 38 (6.79.38)

सा दुर्मुखस्य विमलं वर्म भित्त्वा यशस्विनः । विदार्य प्राविशद्भूमिं दीप्यमाना स्वतेजसा ॥

sā durmukhasya vimalaṃ varma bhittvā yaśasvinaḥ | vidārya prāviśadbhūmiṃ dīpyamānā svatejasā

उसने यशस्वी दुर्मुख का चमकता कवच भेद डाला और उसे चीरती हुई अपने तेज से दमकती धरती में समा गई।

श्लोक 39 (6.79.39)

दुर्मुखो विह्वलस्तत्र निषसाद रणे विभो । विसंज्ञं प्रेक्ष्य ते सर्वे भ्रातरः पर्यवारयन् ॥

durmukho vihvalastatra niṣasāda raṇe vibho | visaṃjñaṃ prekṣya te sarve bhrātaraḥ paryavārayan

हे प्रभो, दुर्मुख व्याकुल होकर वहीं रण में बैठ गया; उसे अचेत देखकर उसके सब भाइयों ने उसे घेर लिया।

श्लोक 40 (6.79.40)

तं दृष्ट्वा विरथं तत्र सुतसोमो महारथः । पश्यतां सर्वसैन्यानां रथमारोपयत्स्वकम् ॥

taṃ dṛṣṭvā virathaṃ tatra sutasomo mahārathaḥ | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ rathamāropayatsvakam

श्रुतकर्मा को रथहीन देखकर महारथी सुतसोम ने सारी सेनाओं के देखते-देखते उसे अपने रथ पर चढ़ा लिया।

श्लोक 41 (6.79.41)

श्रुतकीर्तिस्तथा वीरो जयत्सेनं सुतं तव । अभ्ययात्समरे राजन्हन्तुकामो यशस्विनम् ॥

śrutakīrtistathā vīro jayatsenaṃ sutaṃ tava | abhyayātsamare rājanhantukāmo yaśasvinam

हे राजन्, वैसे ही वीर श्रुतकीर्ति आपके यशस्वी पुत्र जयत्सेन को मारने की इच्छा से रण में उस पर चढ़ आया।

श्लोक 42 (6.79.42)

तस्य विक्षिपतश्चापं श्रुतकीर्तेर्महास्वनम् । चिच्छेद समरे तूर्णं जयत्सेनः सुतस्तव ॥

tasya vikṣipataścāpaṃ śrutakīrtermahāsvanam | ciccheda samare tūrṇaṃ jayatsenaḥ sutastava

जब श्रुतकीर्ति अपना भारी टंकार वाला धनुष खींच रहा था, तभी आपके पुत्र जयत्सेन ने रण में तुरन्त उसे काट डाला

श्लोक 43 (6.79.43)

क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन प्रहसन्निव भारत । तं दृष्ट्वा च्छिन्नधन्वानं शतानीकः सहोदरम् ॥

kṣurapreṇa sutīkṣṇena prahasanniva bhārata | taṃ dṛṣṭvā cchinnadhanvānaṃ śatānīkaḥ sahodaram

हे भारत, मानो हँसते हुए, एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से। अपने भाई का धनुष कटा देखकर शतानीक

श्लोक 44 (6.79.44)

अभ्यपद्यत तेजस्वी सिंहवन्निनदन्मुहुः । शतानीकस्तु समरे दृढं विस्पार्य कार्मुकम् ॥

abhyapadyata tejasvī siṃhavanninadanmuhuḥ | śatānīkastu samare dṛḍhaṃ vispārya kārmukam

तेजस्वी, बार-बार सिंह की तरह गरजता हुआ आ पहुँचा। शतानीक ने रण में अपने दृढ़ धनुष को खींचकर

श्लोक 45 (6.79.45)

विव्याध दशभिस्तूर्णं जयत्सेनं शिलीमुखैः । ननाद सुमहानादं प्रभिन्न इव वारणः ॥

vivyādha daśabhistūrṇaṃ jayatsenaṃ śilīmukhaiḥ | nanāda sumahānādaṃ prabhinna iva vāraṇaḥ

तुरन्त दस बाणों से जयत्सेन को बींध दिया और मदमस्त हाथी की तरह ज़ोर से गर्जना की।

श्लोक 46 (6.79.46)

अथान्येन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना । शतानीको जयत्सेनं विव्याध हृदये भृशम् ॥

athānyena sutīkṣṇena sarvāvaraṇabhedinā | śatānīko jayatsenaṃ vivyādha hṛdaye bhṛśam

फिर हर कवच को भेदने वाले एक और अत्यन्त तीखे बाण से शतानीक ने जयत्सेन की छाती में गहरा प्रहार किया।

श्लोक 47 (6.79.47)

तथा तस्मिन्वर्तमाने दुष्कर्णो भ्रातुरन्तिके । मुमोचास्मै शितान्बाणांस्तीक्ष्णानाशीविषोपमान् । चिच्छेद समरे चापं नाकुलेः क्रोधमूर्च्छितः ॥

tathā tasminvartamāne duṣkarṇo bhrāturantike | mumocāsmai śitānbāṇāṃstīkṣṇānāśīviṣopamān | ciccheda samare cāpaṃ nākuleḥ krodhamūrcchitaḥ

जब यह हो रहा था, तब अपने भाई के पास खड़े दुष्कर्ण ने उस पर विषैले सर्पों जैसे पैने, तीखे बाण छोड़े और क्रोध से उन्मत्त होकर रण में नकुल-पुत्र का धनुष काट डाला।

श्लोक 48 (6.79.48)

अथान्यद्धनुरादाय भारसाहमनुत्तमम् । समादत्त शरान्घोराञ्शतानीको महाबलः ॥

athānyaddhanurādāya bhārasāhamanuttamam | samādatta śarānghorāñśatānīko mahābalaḥ

तब महाबली शतानीक ने भारी खिंचाव सह सकने वाला एक और उत्तम धनुष लेकर उस पर भयंकर बाण चढ़ाए।

श्लोक 49 (6.79.49)

तिष्ठतिष्ठेति चामन्त्र्य दुष्कर्णं भ्रातुरग्रतः । मुमोचास्मै शितान्बाणाञ्ज्वलितान्पन्नगानिव ॥

tiṣṭhatiṣṭheti cāmantrya duṣkarṇaṃ bhrāturagrataḥ | mumocāsmai śitānbāṇāñjvalitānpannagāniva

"ठहर, ठहर!" कहकर उसने भाई के सामने ही दुष्कर्ण को ललकारा और उस पर धधकते सर्पों जैसे पैने बाण छोड़े।

श्लोक 50 (6.79.50)

ततोऽस्य धनुरेकेन द्वाभ्यां सूतं च मारिष । चिच्छेद समरे तूर्णं तं च विव्याध सप्तभिः ॥

tato'sya dhanurekena dvābhyāṃ sūtaṃ ca māriṣa | ciccheda samare tūrṇaṃ taṃ ca vivyādha saptabhiḥ

हे मान्यवर, फिर उसने एक बाण से रण में तुरन्त उसका धनुष काटा, दो से उसके सारथि को मारा और सात से स्वयं उसे बींध दिया।

श्लोक 51 (6.79.51)

अश्वान्मनोजवांस्तस्य कर्बुरान्वातरंहसः । जघान निशितैस्तूर्णं सर्वान्द्वादशभिः शरैः ॥

aśvānmanojavāṃstasya karburānvātaraṃhasaḥ | jaghāna niśitaistūrṇaṃ sarvāndvādaśabhiḥ śaraiḥ

बारह पैने बाणों से उसने तुरन्त उसके सारे घोड़े मार डाले, जो चितकबरे, मन के समान तेज़ और वायु के समान वेगवान थे।

श्लोक 52 (6.79.52)

अथापरेण भल्लेन सुयुक्तेनाशुपातिना । दुष्कर्णं नाकुलिः क्रुद्धो विव्याध हृदये भृशम् ॥

athāpareṇa bhallena suyuktenāśupātinā | duṣkarṇaṃ nākuliḥ kruddho vivyādha hṛdaye bhṛśam

फिर क्रोधित नकुल-पुत्र ने भली-भाँति चढ़ाए, तेज़ी से गिरने वाले एक और भल्ल बाण से दुष्कर्ण की छाती में गहरा वार किया।

श्लोक 53 (6.79.53)

स पपात ततो भूमौ वज्राहत इव द्रुमः । दुष्कर्णं व्यथितं दृष्ट्वा पञ्च राजन्महारथाः ॥

sa papāta tato bhūmau vajrāhata iva drumaḥ | duṣkarṇaṃ vyathitaṃ dṛṣṭvā pañca rājanmahārathāḥ

वह वज्र के मारे वृक्ष की भाँति भूमि पर गिर पड़ा। हे राजन्, दुष्कर्ण को घायल देखकर पाँच महारथी

श्लोक 54 (6.79.54)

जिघांसन्तः शतानीकं सर्वतः पर्यवारयन् । छाद्यमानं शरव्रातैः शतानीकं यशस्विनम् ॥

jighāṃsantaḥ śatānīkaṃ sarvataḥ paryavārayan | chādyamānaṃ śaravrātaiḥ śatānīkaṃ yaśasvinam

शतानीक को मार डालने की इच्छा से उसे चारों ओर से घेरने लगे। जब यशस्वी शतानीक बाणों के समूहों से ढका जा रहा था,

श्लोक 55 (6.79.55)

अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः केकयाः पञ्च सोदराः । तानभ्यापततः प्रेक्ष्य तव पुत्रा महारथाः ॥

abhyadhāvanta saṃkruddhāḥ kekayāḥ pañca sodarāḥ | tānabhyāpatataḥ prekṣya tava putrā mahārathāḥ

तब पाँचों केकय भाई क्रोध में भरकर दौड़ पड़े। उन्हें आक्रमण करते देख आपके महारथी पुत्र

श्लोक 56 (6.79.56)

प्रत्युद्ययुर्महाराज गजानिव महागजाः । दुर्मुखो दुर्जयश्चैव तथा दुर्मर्षणो युवा ॥

pratyudyayurmahārāja gajāniva mahāgajāḥ | durmukho durjayaścaiva tathā durmarṣaṇo yuvā

हे महाराज, उनका सामना करने ऐसे बढ़े जैसे बड़े हाथी हाथियों पर बढ़ते हैं—दुर्मुख, दुर्जय, तरुण दुर्मर्षण,

श्लोक 57 (6.79.57)

शत्रुंजयः शत्रुसहः सर्वे क्रुद्धा यशस्विनः । प्रत्युद्याता महाराज केकयान्भ्रातरः समम् ॥

śatruṃjayaḥ śatrusahaḥ sarve kruddhā yaśasvinaḥ | pratyudyātā mahārāja kekayānbhrātaraḥ samam

शत्रुंजय और शत्रुसह—ये सभी क्रोधित और यशस्वी भाई, हे महाराज, एक साथ केकयों पर चढ़ गए,

श्लोक 58 (6.79.58)

रथैर्नगरसंकाशैर्हयैर्युक्तैर्मनोजवैः । नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलङ्कृतैः ॥

rathairnagarasaṃkāśairhayairyuktairmanojavaiḥ | nānāvarṇavicitrābhiḥ patākābhiralaṅkṛtaiḥ

नगरों के समान विशाल रथों पर, जिनमें मन के समान वेगवान घोड़े जुते थे और जो अनेक रंगों की विचित्र पताकाओं से सजे थे।

श्लोक 59 (6.79.59)

शरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजाः । विविशुस्ते परं सैन्यं सिंहा इव वनाद्वनम् ॥

śaracāpadharā vīrā vicitrakavacadhvajāḥ | viviśuste paraṃ sainyaṃ siṃhā iva vanādvanam

बाण और धनुष धारण किए, विचित्र कवचों और ध्वजाओं वाले वे वीर शत्रु-सेना में ऐसे घुस गए जैसे सिंह एक वन से दूसरे वन में जाते हैं।

श्लोक 60 (6.79.60)

तेषां सुतुमुलं युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् । अवर्तत महारौद्रं निघ्नतामितरेतरम् ॥

teṣāṃ sutumulaṃ yuddhaṃ vyatiṣaktarathadvipam | avartata mahāraudraṃ nighnatāmitaretaram

तब उनमें अत्यन्त भीषण और भयंकर युद्ध छिड़ गया; रथ और हाथी आपस में उलझ गए और वे एक-दूसरे का वध करने लगे—

श्लोक 61 (6.79.61)

अन्योन्यागस्कृतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् । मुहूर्तास्तमिते सूर्ये चक्रुर्युद्धं सुदारुणम् ॥

anyonyāgaskṛtāṃ rājanyamarāṣṭravivardhanam | muhūrtāstamite sūrye cakruryuddhaṃ sudāruṇam

हे राजन्, एक-दूसरे का अपराध करने वाले वे योद्धा यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला युद्ध करने लगे। सूर्यास्त के कुछ ही देर बाद उन्होंने अत्यन्त दारुण संग्राम किया।

श्लोक 62 (6.79.62)

रथिनः सादिनश्चाथ व्यकीर्यन्त सहस्रशः । ततः शान्तनवः क्रुद्धः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

rathinaḥ sādinaścātha vyakīryanta sahasraśaḥ | tataḥ śāntanavaḥ kruddhaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

हज़ारों रथी और घुड़सवार बिखर गए। तब शान्तनु-पुत्र ने क्रोध में भरकर झुकी गाँठों वाले बाणों से

श्लोक 63 (6.79.63)

नाशयामास सेनां तां भीष्मस्तेषां महात्मनाम् । पञ्चालानां च सैन्यानि शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥

nāśayāmāsa senāṃ tāṃ bhīṣmasteṣāṃ mahātmanām | pañcālānāṃ ca sainyāni śarairninye yamakṣayam

भीष्म ने उन महात्माओं की उस सेना का नाश कर दिया और अपने बाणों से पाञ्चालों की सेनाओं को यमलोक भेज दिया।

श्लोक 64 (6.79.64)

एवं भित्त्वा महेष्वासः पाण्डवानामनीकिनीम् । कृत्वाऽवहारं सैन्यानां ययौ स्वशिबिरं नृप ॥

evaṃ bhittvā maheṣvāsaḥ pāṇḍavānāmanīkinīm | kṛtvā'vahāraṃ sainyānāṃ yayau svaśibiraṃ nṛpa

हे नरेश, इस प्रकार पाण्डवों की सेना को छिन्न-भिन्न करके वह महाधनुर्धर अपनी सेनाओं को लौटाकर अपने शिविर को चले गए।

श्लोक 65 (6.79.65)

नाशयामासतुर्वीरौ धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । कौरवाणामनीकानि शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

nāśayāmāsaturvīrau dhṛṣṭadyumnavṛkodarau | kauravāṇāmanīkāni śaraiḥ sannataparvabhiḥ

दोनों वीर धृष्टद्युम्न और वृकोदर ने झुकी गाँठों वाले बाणों से कौरवों की टुकड़ियों का नाश कर दिया।

श्लोक 66 (6.79.66)

धर्मराजोऽपि संप्रेक्ष्य धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय प्रहृष्टः शिबिरं ययौ ॥

dharmarājo'pi saṃprekṣya dhṛṣṭadyumnavṛkodarau | mūrdhni caitāvupāghrāya prahṛṣṭaḥ śibiraṃ yayau

धर्मराज युधिष्ठिर भी धृष्टद्युम्न और वृकोदर को देखकर, दोनों का सिर सूँघकर प्रसन्न मन से शिविर को चले गए।

श्लोक 67 (6.79.67)

अर्जुनो वासुदेवश्च कौरवाणामनीकिनीम् । हत्वा विद्राव्य च शरैः शिबिरायैव जग्मतुः ॥

arjuno vāsudevaśca kauravāṇāmanīkinīm | hatvā vidrāvya ca śaraiḥ śibirāyaiva jagmatuḥ

अर्जुन और वासुदेव भी अपने बाणों से कौरव सेना का संहार करके और उसे भगाकर शिविर को लौट गए।

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