Skip to main content

भीष्म पर्व · अध्याय 78

छठे दिन का अपराह्न-संग्राम

मोह से होश में आकर दुर्योधन फिर भीम पर आक्रमण करता है; भीम अपने रथ पर लौट आते हैं और दोनों एक-दूसरे को घायल करते हैं। जब दुर्योधन के भाई उन्हें पकड़ने के लिए घेरते हैं, तब अभिमन्यु के नेतृत्व में बारह रथी आकर उन्हें खदेड़ देते हैं। अपराह्न में घमासान युद्ध छिड़ जाता है: अभिमन्यु विकर्ण और चित्रसेन से, दुःशासन पाँचों केकयों से और द्रौपदी के पुत्र दुर्योधन से लड़ते हैं, जबकि भीष्म पाण्डव-सेना को खदेड़ते हैं और लाशों से पटी रणभूमि के दाहिने छोर पर अर्जुन का गाण्डीव गरजता है।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.78.1)

ततो दुर्योधनो राजा मोहात्प्रत्यागतस्मृतिः । शरवर्षैः पुनर्भीमं प्रत्यवारयदच्युतम् ॥

tato duryodhano rājā mohātpratyāgatasmṛtiḥ | śaravarṣaiḥ punarbhīmaṃ pratyavārayadacyutam

तब मोह से होश में आकर राजा दुर्योधन ने बाणों की वर्षा करके अविचल भीम को फिर से रोक दिया।

श्लोक 2 (6.78.2)

एकीभूतास्ततश्चैव तव पुत्रा महारथाः । समेत्य समरे भीमं योधयामासुरुद्यताः ॥

ekībhūtāstataścaiva tava putrā mahārathāḥ | sametya samare bhīmaṃ yodhayāmāsurudyatāḥ

तब आपके महारथी पुत्र फिर एकजुट हुए और युद्ध में भीम से भिड़कर दृढ़ता से लड़ने लगे।

श्लोक 3 (6.78.3)

भीमसेनोऽपि समरे संप्राप्य स्वरथं पुनः । समारुह्य महाबाहुर्ययौ येन तवात्मजः ॥

bhīmaseno'pi samare saṃprāpya svarathaṃ punaḥ | samāruhya mahābāhuryayau yena tavātmajaḥ

भीमसेन भी युद्ध में फिर अपने रथ तक पहुँचे और उस पर चढ़कर वह महाबाहु वहाँ गए जहाँ आपका पुत्र था।

श्लोक 4 (6.78.4)

प्रगृह्य च महावेगं परासुकरणं दृढम् । सज्यं शरासनं सङ्ख्ये शरैर्विव्याध ते सुतम् ॥

pragṛhya ca mahāvegaṃ parāsukaraṇaṃ dṛḍham | sajyaṃ śarāsanaṃ saṅkhye śarairvivyādha te sutam

प्रत्यंचा चढ़ा हुआ, अत्यन्त वेगवान, दृढ़ और प्राण हर लेनेवाला धनुष हाथ में लेकर उन्होंने युद्ध में आपके पुत्र को बाणों से बींध डाला।

श्लोक 5 (6.78.5)

ततो दुर्योधनो राजा भीमसेनं महाबलम् । नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं मर्मण्यताडयत् ॥

tato duryodhano rājā bhīmasenaṃ mahābalam | nārācena sutīkṣṇena bhṛśaṃ marmaṇyatāḍayat

तब राजा दुर्योधन ने एक अत्यन्त तीखे नाराच से महाबली भीमसेन के मर्मस्थान पर गहरी चोट की।

श्लोक 6 (6.78.6)

सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तव पुत्रेण धन्विना । क्रोधसंरक्तनयनो वेगेनाक्षिप्य कार्मुकम् ॥

so'tividdho maheṣvāsastava putreṇa dhanvinā | krodhasaṃraktanayano vegenākṣipya kārmukam

आपके धनुर्धर पुत्र द्वारा बुरी तरह घायल होकर उस महाधनुर्धर की आँखें क्रोध से लाल हो गईं, और उसने वेग से धनुष खींचकर

श्लोक 7 (6.78.7)

दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् । स तत्र शुशुभे राजा शिखरैर्गिरिराडिव ॥

duryodhanaṃ tribhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat | sa tatra śuśubhe rājā śikharairgirirāḍiva

तीन बाणों से दुर्योधन की दोनों भुजाओं और छाती पर प्रहार किया। उन बाणों से युक्त राजा वहाँ शिखरों से सुशोभित पर्वतराज की भाँति शोभा पाने लगा।

श्लोक 8 (6.78.8)

तौ दृष्ट्वा समरे क्रुद्धौ विनिघ्नन्तौ परस्परम् । दुर्योधनानुजाः सर्वे शूराः संत्यक्तजीविताः ॥

tau dṛṣṭvā samare kruddhau vinighnantau parasparam | duryodhanānujāḥ sarve śūrāḥ saṃtyaktajīvitāḥ

उन दोनों को युद्ध में क्रोधपूर्वक एक-दूसरे पर प्रहार करते देखकर दुर्योधन के सभी छोटे भाई, जो प्राणों का मोह छोड़ चुके शूरवीर थे,

श्लोक 9 (6.78.9)

संस्मृत्य मन्त्रितं पूर्वं निग्रहे भीमकर्मणः । निश्चयं परमं कृत्वा निग्रहीतुं प्रचक्रमुः ॥

saṃsmṛtya mantritaṃ pūrvaṃ nigrahe bhīmakarmaṇaḥ | niścayaṃ paramaṃ kṛtvā nigrahītuṃ pracakramuḥ

भयंकर कर्म करनेवाले भीम को पकड़ने के लिए पहले की गई मन्त्रणा को याद करके, दृढ़ निश्चय करके उन्हें पकड़ने में जुट गए।

श्लोक 10 (6.78.10)

तानापतत एवाजौ भीमसेनो महाबलः । प्रत्युद्ययौ महाराज गजः प्रतिगजानिव ॥

tānāpatata evājau bhīmaseno mahābalaḥ | pratyudyayau mahārāja gajaḥ pratigajāniva

हे महाराज, युद्ध में उन्हें आक्रमण करते देख महाबली भीमसेन उनका सामना करने के लिए वैसे ही आगे बढ़े जैसे एक हाथी विरोधी हाथियों की ओर बढ़ता है।

श्लोक 11 (6.78.11)

भृशं क्रुद्धश्च तेजस्वी नाराचेन समार्पयत् । चित्रसेनं महाराज तव पुत्रं महायशाः ॥

bhṛśaṃ kruddhaśca tejasvī nārācena samārpayat | citrasenaṃ mahārāja tava putraṃ mahāyaśāḥ

हे महाराज, अत्यन्त क्रुद्ध उस तेजस्वी और महायशस्वी वीर ने आपके पुत्र चित्रसेन को एक नाराच से बींध दिया,

श्लोक 12 (6.78.12)

तथेतरांस्तव सुतांस्ताडयामास भारत । शरैर्बहुविधैः सङ्ख्ये रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः ॥

tathetarāṃstava sutāṃstāḍayāmāsa bhārata | śarairbahuvidhaiḥ saṅkhye rukmapuṅkhaiḥ sutejanaiḥ

और हे भारत, उसी प्रकार उन्होंने युद्ध में सोने के पंखवाले, खूब तेज़ किए हुए नाना प्रकार के बाणों से आपके दूसरे पुत्रों पर भी प्रहार किया।

श्लोक 13 (6.78.13)

ततः संप्रेक्ष्य पुत्रैस्ते भीमसेनं समावृतम् । अभिमन्युप्रभृतयस्ते द्वादश महारथाः ॥

tataḥ saṃprekṣya putraiste bhīmasenaṃ samāvṛtam | abhimanyuprabhṛtayaste dvādaśa mahārathāḥ

तब भीमसेन को आपके पुत्रों से घिरा देखकर अभिमन्यु आदि वे बारह महारथी,

श्लोक 14 (6.78.14)

प्रेषिता धर्मराजेन भीमसेनपदानुगाः । प्रतिजग्मुर्महाराज तव पुत्रान्महाबलान् ॥

preṣitā dharmarājena bhīmasenapadānugāḥ | pratijagmurmahārāja tava putrānmahābalān

जिन्हें धर्मराज ने भीमसेन के पीछे-पीछे जाने के लिए भेजा था, हे महाराज, आपके महाबली पुत्रों का सामना करने चल पड़े।

श्लोक 15 (6.78.15)

दृष्ट्वा रथस्थांस्ताञ्शूरान्सूर्याग्निसमतेजसः । सर्वानेव महेष्वासान्भ्राजमानाञ्श्रिया वृतान् ॥

dṛṣṭvā rathasthāṃstāñśūrānsūryāgnisamatejasaḥ | sarvāneva maheṣvāsānbhrājamānāñśriyā vṛtān

रथों पर बैठे, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, कान्ति से घिरे और जगमगाते उन सभी महाधनुर्धर शूरवीरों को देखकर,

श्लोक 16 (6.78.16)

महाहवे दीप्यमानान्सुवर्णमकुटोज्ज्वलान् । तत्यजुः समरे भीमं तव पुत्रा महाबलाः ॥

mahāhave dīpyamānānsuvarṇamakuṭojjvalān | tatyajuḥ samare bhīmaṃ tava putrā mahābalāḥ

जो उस महासंग्राम में दमक रहे थे और सोने के मुकुटों से उज्ज्वल थे, आपके महाबली पुत्रों ने युद्ध में भीम को छोड़ दिया।

श्लोक 17 (6.78.17)

तान्नामृष्यत कौन्तेयो जीवमाना गता इति । अन्वीय च पुनः सर्वांस्तव पुत्रानपीडयत् ॥

tānnāmṛṣyata kaunteyo jīvamānā gatā iti | anvīya ca punaḥ sarvāṃstava putrānapīḍayat

कुन्तीपुत्र यह सहन न कर सके कि वे जीवित ही बच निकलें; उन्होंने फिर उन सबका पीछा करके आपके पुत्रों को पीड़ित किया।

श्लोक 18 (6.78.18)

अथाभिमन्युः समरे भीमसेनेन संगतः । पार्षतेन च ते सर्वे कैकया द्रौपदीसुताः ॥

athābhimanyuḥ samare bhīmasenena saṃgataḥ | pārṣatena ca te sarve kaikayā draupadīsutāḥ

तब युद्ध में अभिमन्यु भीमसेन और पार्षत (धृष्टद्युम्न) से आ मिले, और उनके साथ सभी कैकय तथा द्रौपदी के पुत्र भी।

श्लोक 19 (6.78.19)

तान्दृष्ट्वा समरे क्रुद्धांस्तव सैन्ये महारथाः । दुर्योधनप्रभृतयः प्रगृहीतशरासनाः । भृशमश्वैः प्रजवितैः प्रययुर्यत्र ते रथाः ॥

tāndṛṣṭvā samare kruddhāṃstava sainye mahārathāḥ | duryodhanaprabhṛtayaḥ pragṛhītaśarāsanāḥ | bhṛśamaśvaiḥ prajavitaiḥ prayayuryatra te rathāḥ

उन्हें युद्ध में क्रोध से भरा देखकर आपकी सेना के दुर्योधन आदि महारथी धनुष उठाकर अत्यन्त वेगवान घोड़ों के सहारे वहाँ जा पहुँचे जहाँ वे रथ थे।

श्लोक 20 (6.78.20)

अपराह्णे महाराज प्रावर्तत महारणः । तावकानां च बलिनां परेषां चैव भारत ॥

aparāhṇe mahārāja prāvartata mahāraṇaḥ | tāvakānāṃ ca balināṃ pareṣāṃ caiva bhārata

हे महाराज, अपराह्न में आपके बलवान योद्धाओं और शत्रुओं के बीच, हे भारत, महान संग्राम छिड़ गया।

श्लोक 21 (6.78.21)

अभिमन्युर्विकर्णस्य हयान्हत्वा महाहवे । अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥

abhimanyurvikarṇasya hayānhatvā mahāhave | athainaṃ pañcaviṃśatyā kṣudrakāṇāṃ samārpayat

उस महायुद्ध में अभिमन्यु ने विकर्ण के घोड़ों को मारकर फिर पच्चीस छोटे बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 22 (6.78.22)

हताश्वं रथमुत्सृज्य विकर्णस्तु महारथः । आरुरोह रथं राजंश्चित्रसेनस्य भारत । योधयामास समरे तदद्भुतमिवाभवत् ॥

hatāśvaṃ rathamutsṛjya vikarṇastu mahārathaḥ | āruroha rathaṃ rājaṃścitrasenasya bhārata | yodhayāmāsa samare tadadbhutamivābhavat

घोड़ों के मारे जाने पर उस रथ को छोड़कर महारथी विकर्ण, हे राजन्, हे भारत, चित्रसेन के रथ पर चढ़ गया और युद्ध करता रहा; यह एक अद्भुत-सा दृश्य था।

श्लोक 23 (6.78.23)

स्थितावेकरथे तौ तु भ्रातरौ कुलवर्धनौ । आर्जुनिः शरजालेन च्छादयामास भारत ॥

sthitāvekarathe tau tu bhrātarau kulavardhanau | ārjuniḥ śarajālena cchādayāmāsa bhārata

हे भारत, जब कुल की वृद्धि करनेवाले वे दोनों भाई एक ही रथ पर खड़े थे, तब अर्जुनपुत्र ने उन्हें बाणों के जाल से ढक दिया।

श्लोक 24 (6.78.24)

चित्रसेनो विकर्णश्च कार्ष्णिं पञ्चभिरायसैः । विव्यधाते न चाकम्पत्कार्ष्णिर्मेरुरिव स्थितः ॥

citraseno vikarṇaśca kārṣṇiṃ pañcabhirāyasaiḥ | vivyadhāte na cākampatkārṣṇirmeruriva sthitaḥ

चित्रसेन और विकर्ण ने कार्ष्णि (अभिमन्यु) को लोहे के पाँच बाणों से बींधा, पर कार्ष्णि विचलित नहीं हुए; वे मेरु पर्वत की भाँति अडिग खड़े रहे।

श्लोक 25 (6.78.25)

दुःशासनस्तु समरे केकयान्पञ्च मारिष । योधयामास राजेन्द्र तदद्भुतमिवाभवत् ॥

duḥśāsanastu samare kekayānpañca māriṣa | yodhayāmāsa rājendra tadadbhutamivābhavat

हे मान्यवर, हे राजेन्द्र, दुःशासन युद्ध में पाँचों केकय भाइयों से लड़ता रहा; यह एक अद्भुत-सा दृश्य था।

श्लोक 26 (6.78.26)

द्रौपदेया रणे क्रुद्धा दुर्योधनमवारयन् । शरैराशीविषाकारैः पुत्रं तव विशांपते ॥

draupadeyā raṇe kruddhā duryodhanamavārayan | śarairāśīviṣākāraiḥ putraṃ tava viśāṃpate

हे प्रजानाथ, द्रौपदी के पुत्रों ने युद्ध में क्रुद्ध होकर विषधर सर्पों जैसे बाणों से आपके पुत्र दुर्योधन को रोक दिया।

श्लोक 27 (6.78.27)

पुत्रोऽपि तव दुर्धर्षो द्रौपद्यास्तनयान्रणे । सायकैर्निशितै राजन्नाजघान पृथक्पृथक् ॥

putro'pi tava durdharṣo draupadyāstanayānraṇe | sāyakairniśitai rājannājaghāna pṛthakpṛthak

हे राजन्, आपके दुर्जय पुत्र ने भी तीखे बाणों से द्रौपदी के पुत्रों में से प्रत्येक को अलग-अलग बींध दिया।

श्लोक 28 (6.78.28)

तैश्चापि विद्धः शुशुभे रुधिरेण समुक्षितः । गिरिः प्रस्रवणैर्यद्वद्गैरिकादिविमिश्रितैः ॥

taiścāpi viddhaḥ śuśubhe rudhireṇa samukṣitaḥ | giriḥ prasravaṇairyadvadgairikādivimiśritaiḥ

उनके बाणों से बिंधा और रक्त से नहाया हुआ वह ऐसा शोभित हुआ जैसे गेरू आदि धातुओं से मिले झरनों वाला पर्वत।

श्लोक 29 (6.78.29)

भीष्मोऽपि समरे राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् । कालयामास बलवान्पालः पशुगणानिव ॥

bhīṣmo'pi samare rājanpāṇḍavānāmanīkinīm | kālayāmāsa balavānpālaḥ paśugaṇāniva

हे राजन्, बलवान भीष्म भी युद्ध में पाण्डवों की सेना को वैसे ही खदेड़ रहे थे जैसे चरवाहा पशुओं के झुंड को हाँकता है।

श्लोक 30 (6.78.30)

ततो गाण्डीवनिर्घोषः प्रादुरासीद्विशांपते । दक्षिणेन वरूथिन्याः पार्थस्यारीन्विनिघ्नतः ॥

tato gāṇḍīvanirghoṣaḥ prādurāsīdviśāṃpate | dakṣiṇena varūthinyāḥ pārthasyārīnvinighnataḥ

हे प्रजानाथ, तब सेना के दाहिने भाग से, जहाँ पार्थ शत्रुओं का संहार कर रहे थे, गाण्डीव की टंकार गूँज उठी।

श्लोक 31 (6.78.31)

उत्तस्थुः समरे तत्र कबन्धानि समन्ततः । कुरूणां चैव सैन्येषु पाण्डवानां च भारत ॥

uttasthuḥ samare tatra kabandhāni samantataḥ | kurūṇāṃ caiva sainyeṣu pāṇḍavānāṃ ca bhārata

हे भारत, वहाँ युद्ध में कौरवों और पाण्डवों दोनों की सेनाओं में चारों ओर सिर कटे धड़ उठ खड़े हुए।

श्लोक 32 (6.78.32)

शोणितोदं शरावर्तं गजद्वीपं हयोर्मिणम् । रथनौभिर्नरव्याघ्राः प्रतेरुः सैन्यसागरम् ॥

śoṇitodaṃ śarāvartaṃ gajadvīpaṃ hayormiṇam | rathanaubhirnaravyāghrāḥ prateruḥ sainyasāgaram

नरश्रेष्ठ वीर रथरूपी नौकाओं से उस सेना-सागर को पार कर रहे थे, जिसमें रक्त ही जल था, बाण भँवर थे, हाथी द्वीप थे और घोड़े लहरें थे।

श्लोक 33 (6.78.33)

छिन्नहस्ता विकवचा विदेहाश्च नरोत्तमाः । दृश्यन्ते पतितास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥

chinnahastā vikavacā videhāśca narottamāḥ | dṛśyante patitāstatra śataśo'tha sahasraśaḥ

वहाँ सैकड़ों और हज़ारों श्रेष्ठ योद्धा गिरे हुए दिखाई दे रहे थे, जिनके हाथ कट गए थे, कवच छिन गए थे और शरीर क्षत-विक्षत हो गए थे।

श्लोक 34 (6.78.34)

निहतैर्मत्तमातङ्गैः शोणितौघपरिप्लुतैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ पर्वतैराचिता यथा ॥

nihatairmattamātaṅgaiḥ śoṇitaughapariplutaiḥ | bhūrbhāti bharataśreṣṭha parvatairācitā yathā

हे भरतश्रेष्ठ, रक्त की धाराओं में डूबे मारे गए मतवाले हाथियों से ढकी पृथ्वी ऐसी लगती थी मानो पहाड़ों से पटी हो।

श्लोक 35 (6.78.35)

तत्राद्भुतमपश्याम तव तेषां च भारत । न तत्रासीत्पुमान्कश्चिद्यो युद्धं नाभिकाङ्क्षति ॥

tatrādbhutamapaśyāma tava teṣāṃ ca bhārata | na tatrāsītpumānkaścidyo yuddhaṃ nābhikāṅkṣati

हे भारत, वहाँ हमने आपके और उनके पक्ष में एक अद्भुत बात देखी — वहाँ एक भी ऐसा पुरुष नहीं था जो युद्ध की इच्छा न रखता हो।

श्लोक 36 (6.78.36)

एवं युयुधिरे वीराः प्रार्थयाना महद्यशः । तावकाः पाण्डवैः सार्धमाकाङ्क्षन्तो जयं युधि ॥

evaṃ yuyudhire vīrāḥ prārthayānā mahadyaśaḥ | tāvakāḥ pāṇḍavaiḥ sārdhamākāṅkṣanto jayaṃ yudhi

इस प्रकार महान यश की कामना करते हुए वीर लड़ते रहे — आपके योद्धा पाण्डवों के साथ, युद्ध में विजय की आकांक्षा लिये।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79