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भीष्म पर्व · अध्याय 77

धृष्टद्युम्न का प्रमोहनास्त्र

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि यह विनाश उनके अपने दोष का फल है, फिर छठे दिन का वर्णन आगे बढ़ाते हैं। भीम रथ छोड़कर गदा लिये दुर्योधन के भाइयों के बीच घुस जाते हैं; धृष्टद्युम्न सूना रथ देखकर अपने मित्र को छोड़ने से इनकार करता है, घायल भीम को बचाता है और प्रमोहन अस्त्र से कौरव राजकुमारों को मोहित कर देता है। द्रोण द्रुपद को पीछे हटाकर प्रज्ञास्त्र से उस अस्त्र का प्रभाव मिटा देते हैं, और युधिष्ठिर अभिमन्यु के नेतृत्व में बारह रथियों को भीम के पीछे भेजते हैं; फिर द्रोण धृष्टद्युम्न का धनुष, घोड़े और सारथि नष्ट करके पाण्डव-सेना को तितर-बितर कर देते हैं।

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.77.1)

आत्मदोषात्त्वया राजन्प्राप्तं व्यसनमीदृशम् । न हि दुर्योधनस्तानि पश्यते भरतर्षभ ॥

ātmadoṣāttvayā rājanprāptaṃ vyasanamīdṛśam | na hi duryodhanastāni paśyate bharatarṣabha

हे राजन्, अपने ही दोष से आप इस विपत्ति में पड़े हैं। हे भरतश्रेष्ठ, दुर्योधन उन बातों को नहीं देखता

श्लोक 2 (6.77.2)

यानि त्वं पश्यसे राजन्धर्मसंकरकारणात् । तव दोषात्पुरा वृत्तं द्यूतमेतद्विशांपते ॥

yāni tvaṃ paśyase rājandharmasaṃkarakāraṇāt | tava doṣātpurā vṛttaṃ dyūtametadviśāṃpate

जिन्हें आप, हे राजन्, धर्म-संकर का कारण समझकर देखते हैं। हे प्रजापालक, आपके ही दोष से पहले वह द्यूत हुआ था;

श्लोक 3 (6.77.3)

तव दोषेण युद्धं च प्रवृत्तं सह पाण्डवैः । त्वमेवाद्य फलं भुङ्क्ष्व कृत्वा किल्बिषमात्मना ॥

tava doṣeṇa yuddhaṃ ca pravṛttaṃ saha pāṇḍavaiḥ | tvamevādya phalaṃ bhuṅkṣva kṛtvā kilbiṣamātmanā

और आपके ही दोष से पाण्डवों के साथ यह युद्ध छिड़ा है। पाप आपने स्वयं किया है, अब उसका फल भी आप ही भोगिए।

श्लोक 4 (6.77.4)

आत्मना हि कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते । इह वा प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्तं यथातथम् ॥

ātmanā hi kṛtaṃ karma ātmanaivopabhujyate | iha vā pretya vā rājaṃstvayā prāptaṃ yathātatham

क्योंकि अपना किया हुआ कर्म अपने को ही भोगना पड़ता है, चाहे इस लोक में हो या मरने के बाद। हे राजन्, आपको ठीक वैसा ही मिला है जैसा आपने किया।

श्लोक 5 (6.77.5)

तस्माद्राजन्स्थिरो भूत्वा प्राप्येदं व्यसनं महत् । शृणु युद्धं यथा वृत्तं शंसतो मे नराधिप ॥

tasmādrājansthiro bhūtvā prāpyedaṃ vyasanaṃ mahat | śṛṇu yuddhaṃ yathā vṛttaṃ śaṃsato me narādhipa

इसलिए हे राजन्, इस महान संकट के आ पड़ने पर धैर्य धारण कीजिए और हे नरेश, मुझसे सुनिए कि युद्ध किस प्रकार हुआ।

श्लोक 6 (6.77.6)

भीमसेनः सुनिशितैर्बाणैर्भित्त्वा महाचमूम् । आससाद ततो वीरः सर्वान्दुर्योधनानुजान् ॥

bhīmasenaḥ suniśitairbāṇairbhittvā mahācamūm | āsasāda tato vīraḥ sarvānduryodhanānujān

भीमसेन ने तीखे बाणों से विशाल सेना को चीर डाला और तब उस वीर ने दुर्योधन के सभी छोटे भाइयों को जा घेरा —

श्लोक 7 (6.77.7)

दुःशासनं दुर्विषहं दुःसहं दुर्मदं जयम् । जयत्सेनं विकर्णं च चित्रसेनं सुदर्शनम् ॥

duḥśāsanaṃ durviṣahaṃ duḥsahaṃ durmadaṃ jayam | jayatsenaṃ vikarṇaṃ ca citrasenaṃ sudarśanam

दुःशासन, दुर्विषह, दुःसह, दुर्मद, जय, जयत्सेन, विकर्ण, चित्रसेन, सुदर्शन,

श्लोक 8 (6.77.8)

चारुचित्रं सुवर्माणं दुष्कर्णं कर्णमेव च । एतांश्चान्यांश्च सुबहून्समीपस्थान्महारथान् ॥

cārucitraṃ suvarmāṇaṃ duṣkarṇaṃ karṇameva ca | etāṃścānyāṃśca subahūnsamīpasthānmahārathān

चारुचित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण और कर्ण, तथा पास खड़े इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से महारथियों को।

श्लोक 9 (6.77.9)

धार्तराष्ट्रान्सुसंक्रुद्धान्दृष्ट्वा भीमो महारथः । भीष्मेण समरे गुप्तां प्रविवेश महाचमूम् ॥

dhārtarāṣṭrānsusaṃkruddhāndṛṣṭvā bhīmo mahārathaḥ | bhīṣmeṇa samare guptāṃ praviveśa mahācamūm

धृतराष्ट्र के पुत्रों को अत्यन्त क्रोध में भरा देखकर महारथी भीम उस विशाल सेना में घुस गए जिसकी रक्षा युद्ध में भीष्म कर रहे थे।

श्लोक 10 (6.77.10)

अथालोक्य प्रविष्टं तमूचुस्ते सर्व एव तु । जीवग्राहं निगृह्णीमो वयमेनं नराधिपाः ॥

athālokya praviṣṭaṃ tamūcuste sarva eva tu | jīvagrāhaṃ nigṛhṇīmo vayamenaṃ narādhipāḥ

उन्हें भीतर आया देखकर वे सब बोले — 'हम राजा लोग इसे जीवित ही पकड़ लेंगे।'

श्लोक 11 (6.77.11)

स तैः परिवृतः पार्थो भ्रातृभिः कृतनिश्चयैः । प्रजासंहरणे सूर्यः क्रूरैरिव महाग्रहैः ॥

sa taiḥ parivṛtaḥ pārtho bhrātṛbhiḥ kṛtaniścayaiḥ | prajāsaṃharaṇe sūryaḥ krūrairiva mahāgrahaiḥ

दृढ़ निश्चय किए हुए उन भाइयों से घिरे हुए पृथापुत्र ऐसे लगते थे जैसे प्रलय के समय क्रूर महाग्रहों से घिरा सूर्य।

श्लोक 12 (6.77.12)

संप्राप्य मध्यं सैन्यस्य न भीः पाण्डवमाविशत् । यथा देवासुरे युद्धे महेन्द्रं प्राप्य दानवान् ॥

saṃprāpya madhyaṃ sainyasya na bhīḥ pāṇḍavamāviśat | yathā devāsure yuddhe mahendraṃ prāpya dānavān

सेना के बीच पहुँच जाने पर भी पाण्डुपुत्र के मन में कोई भय नहीं आया, जैसे देवासुर-संग्राम में दानवों के बीच पहुँचे महेन्द्र को भय नहीं हुआ था।

श्लोक 13 (6.77.13)

ततः शतसहस्राणि रथिनां सर्वशः प्रभो । उद्यतानि शरैस्तीव्रैस्तमेकं परिवव्रिरे ॥

tataḥ śatasahasrāṇi rathināṃ sarvaśaḥ prabho | udyatāni śaraistīvraistamekaṃ parivavrire

तब हे प्रभो, लाखों रथियों ने तीखे बाण ताने हुए उस अकेले वीर को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 14 (6.77.14)

स तेषां प्रवरान्योधान्हस्त्यश्वरथसादिनः । जघान समरे शूरो धार्तराष्ट्रानचिन्तयन् ॥

sa teṣāṃ pravarānyodhānhastyaśvarathasādinaḥ | jaghāna samare śūro dhārtarāṣṭrānacintayan

उस शूरवीर ने धृतराष्ट्र-पुत्रों की परवाह न करते हुए युद्ध में उनके हाथी, घोड़े और रथ पर सवार श्रेष्ठ योद्धाओं को मार गिराया।

श्लोक 15 (6.77.15)

तेषां व्यवसितं ज्ञात्वा भीमसेनो जिघृक्षताम् । समस्तानां वधे राजन्मतिं चक्रे महामनाः ॥

teṣāṃ vyavasitaṃ jñātvā bhīmaseno jighṛkṣatām | samastānāṃ vadhe rājanmatiṃ cakre mahāmanāḥ

हे राजन्, यह जानकर कि वे उन्हें पकड़ने पर तुले हैं, महामना भीमसेन ने उन सबको मार डालने का निश्चय किया।

श्लोक 16 (6.77.16)

ततो रथं समुत्सृज्य गदामादाय पाण्डवः । उवाच सारथिं भीमः स्थीयतामिति भारत ॥

tato rathaṃ samutsṛjya gadāmādāya pāṇḍavaḥ | uvāca sārathiṃ bhīmaḥ sthīyatāmiti bhārata

तब पाण्डुपुत्र भीम ने रथ छोड़कर गदा उठा ली और हे भारत, सारथि से कहा — 'यहीं ठहरो,

श्लोक 17 (6.77.17)

यावदेतान्हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान्सहानुगान् । इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु प्रविश्य महतीं चमूम् । जघान धार्तराष्ट्राणां तद्बलौघमहार्णवम् ॥

yāvadetānhaniṣyāmi dhārtarāṣṭrānsahānugān | ityuktvā bhīmasenastu praviśya mahatīṃ camūm | jaghāna dhārtarāṣṭrāṇāṃ tadbalaughamahārṇavam

जब तक मैं इन धृतराष्ट्र-पुत्रों को उनके अनुचरों सहित मार डालता हूँ।' यह कहकर भीमसेन विशाल सेना में घुस गए और धृतराष्ट्र-पुत्रों की उस सागर-सी विशाल सेना का संहार करने लगे।

श्लोक 18 (6.77.18)

गदया भीमसेनेन ताडिता वारणोत्तमाः । भिन्नकुम्भा महाकाया भिन्नपृष्ठास्तथैवच ॥

gadayā bhīmasenena tāḍitā vāraṇottamāḥ | bhinnakumbhā mahākāyā bhinnapṛṣṭhāstathaivaca

भीमसेन की गदा की चोट खाकर बड़े-बड़े शरीरवाले श्रेष्ठ हाथी, जिनके कुम्भस्थल फट गए थे और पीठें टूट गई थीं,

श्लोक 19 (6.77.19)

भिन्नगात्राः सहारोहैः शेरते पर्वता इव । रथाश्च भग्नास्तिलशः सयोधाः शतशो रणे ॥

bhinnagātrāḥ sahārohaiḥ śerate parvatā iva | rathāśca bhagnāstilaśaḥ sayodhāḥ śataśo raṇe

अंग-अंग टूट जाने से अपने सवारों सहित पर्वतों की भाँति धरती पर पड़े थे। सैकड़ों रथ भी अपने योद्धाओं सहित रणभूमि में चूर-चूर होकर पड़े थे,

श्लोक 20 (6.77.20)

अश्वाश्च सादिनश्चैव पादातैः सह भारत । तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् ॥

aśvāśca sādinaścaiva pādātaiḥ saha bhārata | tatrādbhutamapaśyāma bhīmasenasya vikramam

और हे भारत, पैदल सैनिकों के साथ घोड़े और घुड़सवार भी। वहाँ हमने भीमसेन का अद्भुत पराक्रम देखा,

श्लोक 21 (6.77.21)

यदेकः समरे राजन्बहुभिः समयोधयत् । अन्तकाले प्रजाः सर्वा दण्डपाणिरिवान्तकः ॥

yadekaḥ samare rājanbahubhiḥ samayodhayat | antakāle prajāḥ sarvā daṇḍapāṇirivāntakaḥ

कि हे राजन्, वे अकेले ही युद्ध में बहुतों से लड़ रहे थे, जैसे प्रलयकाल में दण्डधारी यमराज समस्त प्राणियों से।

श्लोक 22 (6.77.22)

भीमसेने प्रविष्टे तु धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः । द्रोणमुत्सृज्य तरसा ययौ यत्र वृकोदरः ॥

bhīmasene praviṣṭe tu dhṛṣṭadyumno'pi pārṣataḥ | droṇamutsṛjya tarasā yayau yatra vṛkodaraḥ

भीमसेन के भीतर घुस जाने पर पृषतवंशी धृष्टद्युम्न भी द्रोण को छोड़कर तेज़ी से वहाँ गए जहाँ वृकोदर थे।

श्लोक 23 (6.77.23)

विदार्य महतीं सेनां तावकानां नरर्षभः । आससाद रथं शून्यं भीमसेनस्य संयुगे ॥

vidārya mahatīṃ senāṃ tāvakānāṃ nararṣabhaḥ | āsasāda rathaṃ śūnyaṃ bhīmasenasya saṃyuge

आपके सैनिकों की विशाल सेना को चीरते हुए वह नरश्रेष्ठ युद्धभूमि में भीमसेन के सूने रथ के पास जा पहुँचा।

श्लोक 24 (6.77.24)

दृष्ट्वा विशोकं समरे भीमसेनस्य सारथिम् । धृष्टद्युम्नो महाराज दुर्मना गतचेतनः ॥

dṛṣṭvā viśokaṃ samare bhīmasenasya sārathim | dhṛṣṭadyumno mahārāja durmanā gatacetanaḥ

हे महाराज, युद्ध में भीमसेन के सारथि विशोक को देखकर धृष्टद्युम्न का मन उदास हो गया और वह सुध-बुध खो बैठा।

श्लोक 25 (6.77.25)

अपृच्छद्बाष्पसंरुद्धो निःश्वसन्वाचमीरयन् । मम प्राणैः प्रियतमः क्व भीम इति दुःखितः ॥

apṛcchadbāṣpasaṃruddho niḥśvasanvācamīrayan | mama prāṇaiḥ priyatamaḥ kva bhīma iti duḥkhitaḥ

आँसुओं से गला रुँध जाने पर, लम्बी साँसें लेते हुए, वह किसी तरह शब्द निकालकर दुःख से पूछने लगा — 'मेरे प्राणों से भी प्यारे भीम कहाँ हैं?'

श्लोक 26 (6.77.26)

विशोकस्तमुवाचेदं धृष्टद्युम्नं कृताञ्जलिः । संस्थाप्य मामिह बली पाण्डवेयः पराक्रमी ॥

viśokastamuvācedaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ kṛtāñjaliḥ | saṃsthāpya māmiha balī pāṇḍaveyaḥ parākramī

विशोक ने हाथ जोड़कर धृष्टद्युम्न से कहा — 'बलवान और पराक्रमी पाण्डुपुत्र मुझे यहाँ खड़ा करके

विशोक उवाच

श्लोक 27 (6.77.27)

प्रविष्टो धार्तराष्ट्राणामेतद्बलमहार्णवम् । मामुक्त्वा पुरुषव्याघ्रः प्रीतियुक्तमिदं वचः ॥

praviṣṭo dhārtarāṣṭrāṇāmetadbalamahārṇavam | māmuktvā puruṣavyāghraḥ prītiyuktamidaṃ vacaḥ

धृतराष्ट्र-पुत्रों की इस सागर-सी विशाल सेना में घुस गए हैं। उस पुरुषसिंह ने मुझसे प्रेमपूर्वक यह वचन कहा था —

श्लोक 28 (6.77.28)

प्रतिपालय मां सूत नियम्याश्वान्मुहूर्तकम् । यावदेतान्निहन्म्यद्य य इमे मद्वधोद्यताः । अभ्यधावद्गदापाणिस्तद्बलं स महाबलः ॥

pratipālaya māṃ sūta niyamyāśvānmuhūrtakam | yāvadetānnihanmyadya ya ime madvadhodyatāḥ | abhyadhāvadgadāpāṇistadbalaṃ sa mahābalaḥ

"सूत, घोड़ों को रोककर क्षण भर मेरी प्रतीक्षा करो, जब तक मैं आज इन लोगों को मार डालता हूँ जो मुझे मारने पर तुले हैं।" फिर वे महाबली हाथ में गदा लेकर उस सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 29 (6.77.29)

ततो दृष्ट्वा प्रधावन्तं गदाहस्तं महाबलम् । सर्वेषामेव सैन्यानां संहर्षः समजायत ॥

tato dṛṣṭvā pradhāvantaṃ gadāhastaṃ mahābalam | sarveṣāmeva sainyānāṃ saṃharṣaḥ samajāyata

उस महाबली को हाथ में गदा लिये दौड़ते देखकर सारी सेनाओं में खलबली मच गई।

श्लोक 30 (6.77.30)

तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । भित्त्वा राजन्महाव्यूहं प्रविवेश सखा तव ॥

tasminsutumule yuddhe vartamāne bhayānake | bhittvā rājanmahāvyūhaṃ praviveśa sakhā tava

हे राजन्, इस घमासान और भयानक युद्ध में आपके मित्र महाव्यूह को तोड़कर भीतर चले गए हैं।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 31 (6.77.31)

विशोकस्य वचः श्रुत्वा धृष्टद्युम्नोऽथ पार्षतः । प्रत्युवाच ततः सूतं रणमध्ये महाबलः ॥

viśokasya vacaḥ śrutvā dhṛṣṭadyumno'tha pārṣataḥ | pratyuvāca tataḥ sūtaṃ raṇamadhye mahābalaḥ

विशोक की बात सुनकर महाबली पार्षत धृष्टद्युम्न ने रणभूमि के बीच उस सारथि को उत्तर दिया —

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 32 (6.77.32)

न हि मे जीवितेनापि विद्यतेऽद्य प्रयोजनम् । भीमसेनं रणे हित्वा स्नेहमुत्सृज्य पाण्डवैः ॥

na hi me jīvitenāpi vidyate'dya prayojanam | bhīmasenaṃ raṇe hitvā snehamutsṛjya pāṇḍavaiḥ

'यदि मैं युद्ध में भीमसेन को छोड़ दूँ और पाण्डवों के प्रति स्नेह त्याग दूँ, तो आज मुझे जीवन से भी कोई प्रयोजन नहीं।

श्लोक 33 (6.77.33)

यदि यामि विना भीमं किं मां क्षत्रं वदिष्यति । एकायनगते भीमे मयि चावस्थिते युधि ॥

yadi yāmi vinā bhīmaṃ kiṃ māṃ kṣatraṃ vadiṣyati | ekāyanagate bhīme mayi cāvasthite yudhi

यदि मैं भीम के बिना लौट जाऊँ तो क्षत्रिय-समाज मुझे क्या कहेगा, जब भीम अकेले संकट के मार्ग पर चले गए और मैं युद्ध में पीछे खड़ा रहा?

श्लोक 34 (6.77.34)

तस्य न स्वस्ति कुर्वन्ति देवाः शक्रपुरोगमाः । यः सहायान्परित्यज्य स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहम् ॥

tasya na svasti kurvanti devāḥ śakrapurogamāḥ | yaḥ sahāyānparityajya svastimānāvrajedgṛham

जो अपने साथियों को छोड़कर सकुशल घर लौट आता है, इन्द्र आदि देवता उसका कल्याण नहीं करते।

श्लोक 35 (6.77.35)

रौरवे नरके मज्जेदप्लवे दुस्तरे नृभिः । मम भीमः सखा चैव संबन्धी च महाबलः । भक्तोऽस्मान्भक्तिमांश्चाहं तमप्यरिनिषूदनम् ॥

raurave narake majjedaplave dustare nṛbhiḥ | mama bhīmaḥ sakhā caiva saṃbandhī ca mahābalaḥ | bhakto'smānbhaktimāṃścāhaṃ tamapyariniṣūdanam

वह रौरव नरक में डूबता है, जहाँ कोई नाव नहीं और जिसे मनुष्य पार नहीं कर सकते। महाबली भीम मेरे मित्र भी हैं और सम्बन्धी भी; वे हमारे प्रति निष्ठावान हैं और मैं भी उन शत्रुनाशक के प्रति निष्ठा रखता हूँ।

श्लोक 36 (6.77.36)

सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र यातो वृकोदरः । निघ्नन्तं मां रिपून्पश्य दानवानिव वासवम् ॥

so'haṃ tatra gamiṣyāmi yatra yāto vṛkodaraḥ | nighnantaṃ māṃ ripūnpaśya dānavāniva vāsavam

इसलिए मैं वहीं जाऊँगा जहाँ वृकोदर गए हैं। देखना, मैं शत्रुओं को वैसे ही मारूँगा जैसे इन्द्र दानवों को मारते हैं।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 37 (6.77.37)

एवमुक्त्वा ततो वीरो ययौ मध्येन वाहिनीम् । भीमसेनस्य मार्गेषु गदाप्रमथितैर्गजैः ॥

evamuktvā tato vīro yayau madhyena vāhinīm | bhīmasenasya mārgeṣu gadāpramathitairgajaiḥ

यह कहकर वह वीर सेना के बीच से होकर भीमसेन के उस मार्ग पर चल पड़ा जहाँ उनकी गदा से कुचले हुए हाथी पड़े थे।

श्लोक 38 (6.77.38)

स ददर्श तदा भीमं दहन्तं रिपुवाहिनीम् । वातो वृक्षानिव बलात्प्रभञ्जन्तं रणे रिपून् ॥

sa dadarśa tadā bhīmaṃ dahantaṃ ripuvāhinīm | vāto vṛkṣāniva balātprabhañjantaṃ raṇe ripūn

तब उसने भीम को देखा, जो शत्रु-सेना को भस्म किए दे रहे थे और जैसे आँधी पेड़ों को उखाड़ फेंकती है वैसे ही बलपूर्वक युद्ध में शत्रुओं को रौंद रहे थे।

श्लोक 39 (6.77.39)

ते वध्यमानाः समरे रथिनः सादिनस्तथा । पादाता दन्तिनश्चैव चक्रुरार्तस्वरं महत् ॥

te vadhyamānāḥ samare rathinaḥ sādinastathā | pādātā dantinaścaiva cakrurārtasvaraṃ mahat

युद्ध में मारे जाते हुए रथी, घुड़सवार, पैदल और हाथी बड़े ज़ोर से आर्तनाद करने लगे।

श्लोक 40 (6.77.40)

हाहाकारश्च संजज्ञे तव सैन्यस्य मारिष । वध्यतो भीमसेनेन कृतिना चित्रयोधिना ॥

hāhākāraśca saṃjajñe tava sainyasya māriṣa | vadhyato bhīmasenena kṛtinā citrayodhinā

हे मान्यवर, कुशल और विचित्र रीति से युद्ध करनेवाले भीमसेन द्वारा मारी जाती हुई आपकी सेना में हाहाकार मच गया।

श्लोक 41 (6.77.41)

ततः कृतास्त्रास्ते सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । अभीताः समवर्तन्त शस्त्रवृष्ट्या परंतप ॥

tataḥ kṛtāstrāste sarve parivārya vṛkodaram | abhītāḥ samavartanta śastravṛṣṭyā paraṃtapa

हे परन्तप, तब उन सभी अस्त्र-विशारदों ने वृकोदर को घेर लिया और निर्भय होकर शस्त्रों की वर्षा करते हुए उन पर टूट पड़े।

श्लोक 42 (6.77.42)

अभिद्रुतं शस्त्रभृतां वरिष्ठं । समन्ततः पाण्डवं लोकवीरः । सैन्येन घोरेण सुसंहितेन । दृष्ट्वा बली पार्षतो भीमसेनम् ॥

abhidrutaṃ śastrabhṛtāṃ variṣṭhaṃ | samantataḥ pāṇḍavaṃ lokavīraḥ | sainyena ghoreṇa susaṃhitena | dṛṣṭvā balī pārṣato bhīmasenam

शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र भीमसेन को भयंकर और सघन सेना द्वारा चारों ओर से घिरा देखकर लोकविख्यात वीर, बलवान पार्षत

श्लोक 43 (6.77.43)

अथोपगच्छच्छरविक्षताङ्गं । पदातिनं क्रोधविषं वमन्तम् । आश्वासयन्पार्षतो भीमसेनं । गदाहस्तं कालमिवान्तकाले ॥

athopagacchaccharavikṣatāṅgaṃ | padātinaṃ krodhaviṣaṃ vamantam | āśvāsayanpārṣato bhīmasenaṃ | gadāhastaṃ kālamivāntakāle

उन भीमसेन के पास पहुँचा जो पैदल खड़े थे, जिनका शरीर बाणों से क्षत-विक्षत था, जो क्रोध का विष उगल रहे थे और गदा हाथ में लिये प्रलयकाल के काल के समान दिखते थे; उसने उन्हें ढाढ़स बँधाया।

श्लोक 44 (6.77.44)

विशल्यमेनं च चकार तूर्ण- । मारोपयच्चात्मरथे महात्मा । भृशं परिष्वज्य च भीमसेन- । माश्वासयामास स शत्रुमध्ये ॥

viśalyamenaṃ ca cakāra tūrṇa- | māropayaccātmarathe mahātmā | bhṛśaṃ pariṣvajya ca bhīmasena- | māśvāsayāmāsa sa śatrumadhye

उस महात्मा ने तुरन्त उनके शरीर से बाण निकाल दिए, उन्हें अपने रथ पर चढ़ा लिया और शत्रुओं के बीच ही भीमसेन को कसकर गले लगाकर ढाढ़स बँधाया।

श्लोक 45 (6.77.45)

तथा तस्मिन्वर्तमानेऽतिवेगं । भ्रातॄनथोपेत्य तवापि पुत्रः । तस्मिन्विमर्दे तव संप्रवृत्ते । दृष्ट्वा रणे वाक्यमिदं बभाषे ॥

tathā tasminvartamāne'tivegaṃ | bhrātṝnathopetya tavāpi putraḥ | tasminvimarde tava saṃpravṛtte | dṛṣṭvā raṇe vākyamidaṃ babhāṣe

जब यह सब बड़े वेग से हो रहा था, तब आपका पुत्र अपने भाइयों के पास आया और आपकी सेना के उस घमासान संघर्ष के बीच यह देखकर उसने रणभूमि में यह वचन कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 46 (6.77.46)

अयं दुरात्मा द्रुपदस्य पुत्रः । समागतो भीमसेनेन सार्धम् ॥

ayaṃ durātmā drupadasya putraḥ | samāgato bhīmasenena sārdham

'यह दुष्ट द्रुपदपुत्र भीमसेन से आ मिला है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (6.77.47)

तं याम सर्वे महता बलेन । मा वो रिपुः प्रार्थयतामनीकम् । श्रुत्वा तु वाक्यं तममृष्यमाणा । ज्येष्ठाज्ञया नोदिता धार्तराष्ट्राः ॥

taṃ yāma sarve mahatā balena | mā vo ripuḥ prārthayatāmanīkam | śrutvā tu vākyaṃ tamamṛṣyamāṇā | jyeṣṭhājñayā noditā dhārtarāṣṭrāḥ

चलो, हम सब बड़ी सेना लेकर उस पर चढ़ाई करें; शत्रु तुम्हारी सेना पर आक्रमण न कर पाए।' यह वचन सुनकर, शत्रु को सहन न कर पाते हुए, बड़े भाई की आज्ञा से प्रेरित धृतराष्ट्र-पुत्र

श्लोक 48 (6.77.48)

वधाय निष्पेतुरुदायुधास्ते । युगक्षये केतवो यद्वदुग्राः । प्रगृह्य चास्त्राणि धनूंषि वीरा । ज्यां नेमिघोषैः प्रविकम्पयन्तः ॥

vadhāya niṣpeturudāyudhāste | yugakṣaye ketavo yadvadugrāḥ | pragṛhya cāstrāṇi dhanūṃṣi vīrā | jyāṃ nemighoṣaiḥ pravikampayantaḥ

हथियार उठाए उसका वध करने के लिए ऐसे झपटे जैसे युग के अन्त में भयंकर धूमकेतु। अस्त्र और धनुष लेकर, रथ के पहियों की घरघराहट के बीच प्रत्यंचाओं को कँपाते हुए उन वीरों ने

श्लोक 49 (6.77.49)

शरैरवर्षन्द्रुपदस्य पुत्रं । यथाम्बुदा भूधरं वारिजालैः । निहत्य तांश्चापि शरैः सुतीक्ष्णै- । र्न विव्यथे समरे चित्रयोधी ॥

śarairavarṣandrupadasya putraṃ | yathāmbudā bhūdharaṃ vārijālaiḥ | nihatya tāṃścāpi śaraiḥ sutīkṣṇai- | rna vivyathe samare citrayodhī

द्रुपदपुत्र पर बाणों की ऐसी वर्षा की जैसे बादल जलधाराओं से पर्वत पर बरसते हैं। किन्तु विचित्र रीति से लड़नेवाला वह वीर अत्यन्त तीखे बाणों से उन्हें भी घायल करता हुआ युद्ध में तनिक भी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 50 (6.77.50)

समभ्युदीर्णांश्च तवात्मजांस्तथा । निशाम्य वीरानभितः स्थितान्रणे । जिघांसुरुग्रं द्रुपदात्मजो युवा । प्रमोहनास्त्रं युयुजे महारथः । क्रुद्धो भृशं तव पुत्रेषु राज- । न्दैत्येषु यद्वत्समरे महेन्द्रः ॥

samabhyudīrṇāṃśca tavātmajāṃstathā | niśāmya vīrānabhitaḥ sthitānraṇe | jighāṃsurugraṃ drupadātmajo yuvā | pramohanāstraṃ yuyuje mahārathaḥ | kruddho bhṛśaṃ tava putreṣu rāja- | ndaityeṣu yadvatsamare mahendraḥ

आपके पुत्रों और उन दूसरे वीरों को आगे बढ़ते और युद्ध में चारों ओर खड़े देखकर, हे राजन्, आपके पुत्रों पर अत्यन्त क्रुद्ध, उनके वध के इच्छुक, उग्र युवा महारथी द्रुपदपुत्र ने प्रमोहन (मोहित करनेवाले) अस्त्र का प्रयोग किया, जैसे युद्ध में महेन्द्र ने दैत्यों पर किया था।

श्लोक 51 (6.77.51)

स वै ततोऽस्त्रं सुमहाप्रभावं । प्रमोहनं द्रोणदत्तं महात्मा । प्रयोजयामास उदारकर्मा । तस्मिन्रणे तव सैन्यस्य राजन् ॥

sa vai tato'straṃ sumahāprabhāvaṃ | pramohanaṃ droṇadattaṃ mahātmā | prayojayāmāsa udārakarmā | tasminraṇe tava sainyasya rājan

तब उदार कर्मोंवाले उस महात्मा ने, हे राजन्, उस युद्ध में आपकी सेना पर द्रोण द्वारा दिया हुआ अत्यन्त प्रभावशाली प्रमोहन अस्त्र चलाया।

श्लोक 52 (6.77.52)

ततो व्यमुह्यन्त रणे नृवीराः । प्रमोहनास्त्राहतबुद्धिसत्त्वाः । प्रदुद्रुवुः कुरवश्चैव सर्वे । सवाजिनागाः सरथाः समन्तात् । परीतकालानिव नष्टसंज्ञा- । न्मोहोपेतांस्तव पुत्रान्निशम्य ॥

tato vyamuhyanta raṇe nṛvīrāḥ | pramohanāstrāhatabuddhisattvāḥ | pradudruvuḥ kuravaścaiva sarve | savājināgāḥ sarathāḥ samantāt | parītakālāniva naṣṭasaṃjñā- | nmohopetāṃstava putrānniśamya

तब प्रमोहन अस्त्र से बुद्धि और साहस नष्ट हो जाने के कारण वे नरवीर युद्ध में मोहित हो गए। और आपके पुत्रों को मृत्यु के मुख में पड़े लोगों की भाँति अचेत और मोहग्रस्त देखकर सारे कौरव घोड़ों, हाथियों और रथों सहित चारों ओर भाग खड़े हुए।

श्लोक 53 (6.77.53)

एतस्मिन्नेव काले तु भीमः प्रहरतां वरः । विश्रम्य च तदा राजन्पीत्वाऽमृतरसं जलम् ॥

etasminneva kāle tu bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | viśramya ca tadā rājanpītvā'mṛtarasaṃ jalam

उसी समय योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम ने, हे राजन्, थोड़ी देर विश्राम किया और अमृत के समान मीठा जल पिया;

श्लोक 54 (6.77.54)

पुनः सन्नह्य संक्रुद्धो योधयामास संयुगे । धृष्टद्युम्नेन सहितः कालयामास भारत ॥

punaḥ sannahya saṃkruddho yodhayāmāsa saṃyuge | dhṛṣṭadyumnena sahitaḥ kālayāmāsa bhārata

फिर कवच आदि से सज्जित होकर, क्रोध में भरे हुए, वे पुनः युद्ध करने लगे और हे भारत, धृष्टद्युम्न के साथ मिलकर शत्रुओं को खदेड़ने लगे।

श्लोक 55 (6.77.55)

एतस्मिन्नन्तरे राजन्द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । द्रुपदं त्रिभिरासाद्य शरैर्विव्याध दारुणैः ॥

etasminnantare rājandroṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | drupadaṃ tribhirāsādya śarairvivyādha dāruṇaiḥ

इसी बीच, हे राजन्, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने द्रुपद पर चढ़ाई करके तीन भयंकर बाणों से उन्हें बींध डाला।

श्लोक 56 (6.77.56)

सोऽतिविद्धस्ततो राजन्रणे द्रोणेन पार्थिवः । अपायाद्द्रुपदो राजन्पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥

so'tividdhastato rājanraṇe droṇena pārthivaḥ | apāyāddrupado rājanpūrvavairamanusmaran

हे राजन्, युद्ध में द्रोण द्वारा बुरी तरह घायल होकर राजा द्रुपद पुराने वैर को याद करते हुए वहाँ से हट गए।

श्लोक 57 (6.77.57)

जित्वा तु द्रुपदं द्रोणः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् । तस्य शङ्खस्वनं श्रुत्वा वित्रेसुः सर्वसोमकाः ॥

jitvā tu drupadaṃ droṇaḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān | tasya śaṅkhasvanaṃ śrutvā vitresuḥ sarvasomakāḥ

द्रुपद को जीतकर प्रतापी द्रोण ने शंख बजाया, जिसकी ध्वनि सुनकर सारे सोमक काँप उठे।

श्लोक 58 (6.77.58)

अथ शुश्राव तेजस्वी द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । प्रमोहनास्त्रेण रणे मोहितानात्मजांस्तव ॥

atha śuśrāva tejasvī droṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | pramohanāstreṇa raṇe mohitānātmajāṃstava

तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तेजस्वी द्रोण ने सुना कि युद्ध में प्रमोहन अस्त्र से आपके पुत्र मोहित कर दिए गए हैं।

श्लोक 59 (6.77.59)

ततो द्रोणो महाराज त्वरितोऽभ्याययौ रणात् । तत्रापश्यन्महेष्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् ॥

tato droṇo mahārāja tvarito'bhyāyayau raṇāt | tatrāpaśyanmaheṣvāso bhāradvājaḥ pratāpavān

तब हे महाराज, द्रोण शीघ्रता से उस रणस्थल से चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन महाधनुर्धर प्रतापी भरद्वाजपुत्र ने देखा कि

श्लोक 60 (6.77.60)

धृष्टद्युम्नं च भीमं च विचरन्तौ महारणे । मोहाविष्टांश्च ते पुत्रानपश्यत्स महारथः ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ ca bhīmaṃ ca vicarantau mahāraṇe | mohāviṣṭāṃśca te putrānapaśyatsa mahārathaḥ

धृष्टद्युम्न और भीम उस महासंग्राम में विचर रहे हैं; और उस महारथी ने आपके पुत्रों को मोह में पड़ा देखा।

श्लोक 61 (6.77.61)

ततः प्रज्ञास्त्रमादाय मोहनास्त्रं व्यनाशयत् । ततः प्रत्यागतप्राणास्तव पुत्रा महारथाः ॥

tataḥ prajñāstramādāya mohanāstraṃ vyanāśayat | tataḥ pratyāgataprāṇāstava putrā mahārathāḥ

तब उन्होंने प्रज्ञास्त्र लेकर मोहनास्त्र को नष्ट कर दिया। तब आपके महारथी पुत्रों के प्राण लौट आए

श्लोक 62 (6.77.62)

पुनर्युद्धाय समरे प्रत्युद्याता जिगीषवः । ततो युधिष्ठिरः प्राह समाहूय स्वसैनिकान् ॥

punaryuddhāya samare pratyudyātā jigīṣavaḥ | tato yudhiṣṭhiraḥ prāha samāhūya svasainikān

और विजय की इच्छा से वे फिर युद्ध के लिए निकल पड़े। तब युधिष्ठिर ने अपने सैनिकों को बुलाकर कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 63 (6.77.63)

गच्छन्तु पदवीं शक्त्या भीमपार्षतयोर्युधि । सौभद्रप्रमुखा वीरा रथा द्वादश दंशिताः ॥

gacchantu padavīṃ śaktyā bhīmapārṣatayoryudhi | saubhadrapramukhā vīrā rathā dvādaśa daṃśitāḥ

'सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) के नेतृत्व में कवचधारी बारह रथी वीर युद्ध में पूरी शक्ति से भीम और पार्षत (धृष्टद्युम्न) के मार्ग पर जाएँ

श्लोक 64 (6.77.64)

प्रवृत्तिमधिगच्छन्तु न हि शुद्ध्यति मे मनः । प्रवृत्तिर्भीमसेनस्य पार्षतस्य च संयुगे ॥

pravṛttimadhigacchantu na hi śuddhyati me manaḥ | pravṛttirbhīmasenasya pārṣatasya ca saṃyuge

और उनका समाचार लाएँ, क्योंकि मेरा मन शान्त नहीं है। युद्ध में भीमसेन और पार्षत का समाचार

श्लोक 65 (6.77.65)

विज्ञेया समरे शीघ्रं प्रविशध्वं रथार्णवम् । गच्छन्तु परया शक्त्या भवन्त इति मे मतिः ॥

vijñeyā samare śīghraṃ praviśadhvaṃ rathārṇavam | gacchantu parayā śaktyā bhavanta iti me matiḥ

शीघ्र पता लगना चाहिए। उस रथ-सागर में प्रवेश करो। तुम सब पूरी शक्ति से जाओ — यही मेरा विचार है।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 66 (6.77.66)

त एवं समनुज्ञाताः शूरा विक्रान्तयोधिनः । बाढमित्येवमुक्त्वा तु सर्वे पुरुषमानिनः । मध्यंदिनगते सूर्ये प्रययुः सर्व एव हि ॥

ta evaṃ samanujñātāḥ śūrā vikrāntayodhinaḥ | bāḍhamityevamuktvā tu sarve puruṣamāninaḥ | madhyaṃdinagate sūrye prayayuḥ sarva eva hi

इस प्रकार आज्ञा पाकर पराक्रम से लड़नेवाले, अपने पौरुष पर गर्व करनेवाले उन सभी शूरवीरों ने 'बहुत अच्छा' कहा और दोपहर के समय वे सब के सब चल पड़े।

श्लोक 67 (6.77.67)

केकया द्रौपदेयाश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । अभिमन्युं पुरस्कृत्य महत्या सेनया वृताः ॥

kekayā draupadeyāśca dhṛṣṭaketuśca vīryavān | abhimanyuṃ puraskṛtya mahatyā senayā vṛtāḥ

केकय राजकुमार, द्रौपदी के पुत्र और पराक्रमी धृष्टकेतु, अभिमन्यु को आगे करके, विशाल सेना से घिरे हुए,

श्लोक 68 (6.77.68)

ते कृत्वा समरे व्यूहं सूचीमुखमरिन्दमम् । बिभिदुर्धार्तराष्ट्राणां तद्रथानीकमाहवे ॥

te kṛtvā samare vyūhaṃ sūcīmukhamarindamam | bibhidurdhārtarāṣṭrāṇāṃ tadrathānīkamāhave

युद्ध में शत्रुओं का दमन करनेवाला सूचीमुख (सुई की नोक जैसा) व्यूह बनाकर धृतराष्ट्र-पुत्रों की उस रथसेना को रणभूमि में भेद गए।

श्लोक 69 (6.77.69)

तान्प्रयातान्महेष्वासानभिमन्युपुरोगमान् । भीमसेनभयाविष्टा धृष्टद्युम्नविमोहिता ॥

tānprayātānmaheṣvāsānabhimanyupurogamān | bhīmasenabhayāviṣṭā dhṛṣṭadyumnavimohitā

हे जनेश्वर, अभिमन्यु के नेतृत्व में बढ़ते हुए उन महाधनुर्धरों को आपकी सेना, जो भीमसेन के भय से ग्रस्त और धृष्टद्युम्न द्वारा मोहित थी,

श्लोक 70 (6.77.70)

न संवारयितुं शक्ता तव सेना जनाधिप । मदमूर्च्छान्वितात्मा वै प्रमदेवाध्वनि स्थिता ॥

na saṃvārayituṃ śaktā tava senā janādhipa | madamūrcchānvitātmā vai pramadevādhvani sthitā

रोक नहीं सकी; वह मद और मूर्च्छा से घिरी, मार्ग में खड़ी किसी मतवाली स्त्री के समान हो गई थी।

श्लोक 71 (6.77.71)

तेऽभिजाता महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः । परीप्सन्तोऽभ्यधावन्त धृष्टद्युम्नवृकोदरौ ॥

te'bhijātā maheṣvāsāḥ suvarṇavikṛtadhvajāḥ | parīpsanto'bhyadhāvanta dhṛṣṭadyumnavṛkodarau

सोने से अलंकृत ध्वजाओंवाले वे कुलीन महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न और वृकोदर की रक्षा करने की इच्छा से आगे दौड़े।

श्लोक 72 (6.77.72)

तौ च दृष्ट्वा महेष्वासावभिमन्युपुरोगमान् । बभूवतुर्मुदायुक्तौ निघ्नन्तौ तव वाहिनीम् ॥

tau ca dṛṣṭvā maheṣvāsāvabhimanyupurogamān | babhūvaturmudāyuktau nighnantau tava vāhinīm

अभिमन्यु के नेतृत्व में आए उन वीरों को देखकर वे दोनों महाधनुर्धर आपकी सेना का संहार करते हुए आनन्दित हो उठे।

श्लोक 73 (6.77.73)

द्रोणमिष्वस्त्रकुशलं सर्वविद्यासु पारगम् । दृष्ट्वा तु सहसायान्तं पाञ्चाल्यो गुरुमात्मनः । नाशंसत वधं वीरः पुत्राणां तव पार्षतः ॥

droṇamiṣvastrakuśalaṃ sarvavidyāsu pāragam | dṛṣṭvā tu sahasāyāntaṃ pāñcālyo gurumātmanaḥ | nāśaṃsata vadhaṃ vīraḥ putrāṇāṃ tava pārṣataḥ

किन्तु बाण और अस्त्रों में निपुण, सब विद्याओं के पारंगत अपने गुरु द्रोण को सहसा आते देखकर वीर पार्षत ने आपके पुत्रों के वध का विचार छोड़ दिया।

श्लोक 74 (6.77.74)

ततो रथं समारोप्य कैकेयस्य वृकोदरम् । अभ्यधावत्सुसंक्रुद्धो द्रोणमिष्वस्त्रपारगम् ॥

tato rathaṃ samāropya kaikeyasya vṛkodaram | abhyadhāvatsusaṃkruddho droṇamiṣvastrapāragam

तब उसने वृकोदर को केकय राजकुमार के रथ पर बिठा दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर बाण और अस्त्रों के पारंगत द्रोण पर धावा बोल दिया।

श्लोक 75 (6.77.75)

तस्याभिपततस्तूर्णं भारद्वाजः प्रतापवान् । क्रुद्धश्चिच्छेद बाणेन धनुः शत्रुनिबर्हणः ॥

tasyābhipatatastūrṇaṃ bhāradvājaḥ pratāpavān | kruddhaściccheda bāṇena dhanuḥ śatrunibarhaṇaḥ

उसे झपटकर आते देख शत्रुनाशक प्रतापी भरद्वाजपुत्र ने क्रोध में भरकर एक बाण से उसका धनुष काट डाला,

श्लोक 76 (6.77.76)

अन्यांश्च शतशो बाणान्प्रेषयामास पार्षते । दुर्योधनहितार्थाय भर्तृपिण्डमनुस्मरन् ॥

anyāṃśca śataśo bāṇānpreṣayāmāsa pārṣate | duryodhanahitārthāya bhartṛpiṇḍamanusmaran

और अपने स्वामी के अन्न का स्मरण करते हुए दुर्योधन के हित के लिए पार्षत पर सैकड़ों अन्य बाण छोड़े।

श्लोक 77 (6.77.77)

अथान्यद्धनुरादाय पार्षतः परवीरहा । द्रोणं विव्याध विंशत्या रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥

athānyaddhanurādāya pārṣataḥ paravīrahā | droṇaṃ vivyādha viṃśatyā rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ

शत्रुवीरों का संहार करनेवाले पार्षत ने दूसरा धनुष लेकर शिला पर तेज़ किए हुए, सोने के पंखवाले बीस बाणों से द्रोण को बींध दिया।

श्लोक 78 (6.77.78)

तस्य द्रोणः पुनश्चापं चिच्छेदामित्रकर्शनः । हयांश्च चतुरस्तूर्णं चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥

tasya droṇaḥ punaścāpaṃ cicchedāmitrakarśanaḥ | hayāṃśca caturastūrṇaṃ caturbhiḥ sāyakottamaiḥ

शत्रुओं को पीड़ा देनेवाले द्रोण ने फिर उसका धनुष काट डाला और चार उत्तम बाणों से तुरन्त

श्लोक 79 (6.77.79)

वैवस्वतक्षयं घोरं प्रेषयामास भारत । सारथिं चास्य भल्लेन प्रेषयामास भारत ॥

vaivasvatakṣayaṃ ghoraṃ preṣayāmāsa bhārata | sārathiṃ cāsya bhallena preṣayāmāsa bhārata

हे भारत, उसके चारों घोड़ों को यमराज के भयानक लोक में भेज दिया; और हे भारत, एक भल्ल से उसके सारथि को भी वहीं भेज दिया।

श्लोक 80 (6.77.80)

हताश्वात्स रथात्तूर्णमवप्लुत्य महारथः । आरुरोह महाबाहुरभिमन्योर्महारथम् ॥

hatāśvātsa rathāttūrṇamavaplutya mahārathaḥ | āruroha mahābāhurabhimanyormahāratham

घोड़ों के मारे जाने पर वह महाबाहु महारथी तुरन्त रथ से कूद पड़ा और अभिमन्यु के विशाल रथ पर चढ़ गया।

श्लोक 81 (6.77.81)

ततः सरथनागाश्वा समकम्पत वाहिनी । पश्यतो भीमसेनस्य पार्षतस्य च पश्यतः ॥

tataḥ sarathanāgāśvā samakampata vāhinī | paśyato bhīmasenasya pārṣatasya ca paśyataḥ

तब भीमसेन और पार्षत के देखते-देखते रथों, हाथियों और घोड़ों सहित वह सारी सेना काँप उठी।

श्लोक 82 (6.77.82)

तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा द्रोणेनामिततेजसा । नाशक्नुवन्वारयितुं समस्तास्ते महारथाः ॥

tatprabhagnaṃ balaṃ dṛṣṭvā droṇenāmitatejasā | nāśaknuvanvārayituṃ samastāste mahārathāḥ

अपार तेजस्वी द्रोण द्वारा उस सेना को छिन्न-भिन्न होते देखकर वे सब महारथी मिलकर भी उसे रोक नहीं सके।

श्लोक 83 (6.77.83)

वध्यमानं तु तत्सैन्यं द्रोणेन निशितैः शरैः । व्यभ्रमत्तत्रतत्रैव क्षोभ्यमाण इवार्णवः ॥

vadhyamānaṃ tu tatsainyaṃ droṇena niśitaiḥ śaraiḥ | vyabhramattatratatraiva kṣobhyamāṇa ivārṇavaḥ

द्रोण के तीखे बाणों से मारी जाती हुई वह सेना क्षुब्ध समुद्र की भाँति इधर-उधर चक्कर काटने लगी।

श्लोक 84 (6.77.84)

तथा दृष्ट्वा च तत्सैन्यं जहृषे तावकं बलम् । दृष्ट्वाचार्यं सुसंक्रुद्धं तपन्तं रिपुवाहिनीम् । तुष्टुवुः सर्वतो योधाः साधुसाध्विति भारत ॥

tathā dṛṣṭvā ca tatsainyaṃ jahṛṣe tāvakaṃ balam | dṛṣṭvācāryaṃ susaṃkruddhaṃ tapantaṃ ripuvāhinīm | tuṣṭuvuḥ sarvato yodhāḥ sādhusādhviti bhārata

उस सेना की यह दशा देखकर आपकी सेना हर्षित हो उठी; और हे भारत, आचार्य को अत्यन्त क्रोध में शत्रु-सेना को संतप्त करते देखकर चारों ओर के योद्धा 'साधु! साधु!' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे।

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