भीष्म पर्व · अध्याय 103
नवें दिन का मध्याह्न-संग्राम और रक्त की नदी
नवें दिन दोपहर को भीष्म पाण्डव-सेना का संहार करते हैं; धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, विराट और द्रुपद उन्हें घायल करते हैं, पर वे शिखण्डी को स्त्री मानकर उस पर प्रहार नहीं करते और द्रुपद का धनुष काट देते हैं। दोनों सेनाओं में रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदलों का घमासान युद्ध छिड़ जाता है, और उस संहार का वर्णन यमलोक की ओर बहती रक्त की भयानक नदी के रूप में किया गया है। क्षत्रिय दुर्योधन और धृतराष्ट्र को कोसते हैं; दुर्योधन भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य को युद्ध के लिए उकसाता है, और सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि यह विनाश अपने पुत्र को न रोकने की उनकी ही भूल का फल है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.103.1)
मध्यंदिनो महाराज संग्रामः समपद्यत । लोकक्षयकरो रौद्रो भीष्मस्य सह सोमकैः ॥
madhyaṃdino mahārāja saṃgrāmaḥ samapadyata | lokakṣayakaro raudro bhīṣmasya saha somakaiḥ
महाराज, मध्याह्न के समय भीष्म और सोमकों के बीच लोकों का विनाश करने वाला भयंकर संग्राम छिड़ गया।
श्लोक 2 (6.103.2)
गाङ्गेयो रथिनां श्रेष्ठः पाण्डवानामनीकिनीम् । व्यधमन्निशितैर्बाणैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
gāṅgeyo rathināṃ śreṣṭhaḥ pāṇḍavānāmanīkinīm | vyadhamanniśitairbāṇaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
रथियों में श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्म ने तीखे बाणों से सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में पाण्डवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 3 (6.103.3)
संममर्द च तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव । मर्दयेच्च यथा राजन्सिंहः प्राप्य मृगव्रजम् ॥
saṃmamarda ca tatsainyaṃ pitā devavratastava | mardayecca yathā rājansiṃhaḥ prāpya mṛgavrajam
राजन्, आपके पितातुल्य देवव्रत ने उस सेना को वैसे ही रौंद डाला जैसे सिंह मृगों के झुंड के पास पहुँचकर उन्हें रौंद डालता है।
श्लोक 4 (6.103.4)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च विराटो द्रुपदस्तथा । भीष्ममासाद्य समरे शरैर्जघ्नुर्महारथम् ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca virāṭo drupadastathā | bhīṣmamāsādya samare śarairjaghnurmahāratham
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, विराट और द्रुपद ने युद्ध में महारथी भीष्म के पास पहुँचकर उन पर बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 5 (6.103.5)
धृष्टद्युम्नं ततो विद्ध्वा विराटं च शरैस्त्रिभिः । द्रुपदस्य च नाराचं प्रेषयामास भारत ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tato viddhvā virāṭaṃ ca śaraistribhiḥ | drupadasya ca nārācaṃ preṣayāmāsa bhārata
हे भारत, तब भीष्म ने धृष्टद्युम्न को और तीन बाणों से विराट को बींधकर द्रुपद पर एक नाराच चलाया।
श्लोक 6 (6.103.6)
तेन विद्धा महेष्वासा भीष्मेणामित्रकर्शिना । चुक्रुधुः समरे राजन्पादस्पृष्टा इवोरगाः ॥
tena viddhā maheṣvāsā bhīṣmeṇāmitrakarśinā | cukrudhuḥ samare rājanpādaspṛṣṭā ivoragāḥ
राजन्, शत्रुओं को सताने वाले भीष्म के बाणों से घायल होकर वे महाधनुर्धर युद्ध में ऐसे क्रुद्ध हो उठे जैसे पैर से कुचले गए सर्प।
श्लोक 7 (6.103.7)
शिखण्डी तं च विव्याध भरतानां पितामहम् । स्त्रीमयं मनसा ध्यात्वा नास्मै प्राहरदच्युतः ॥
śikhaṇḍī taṃ ca vivyādha bharatānāṃ pitāmaham | strīmayaṃ manasā dhyātvā nāsmai prāharadacyutaḥ
शिखण्डी ने भरतवंश के पितामह को बींधा, पर अपने व्रत से न डिगने वाले भीष्म ने मन में उसे स्त्री ही मानकर उस पर प्रहार नहीं किया।
श्लोक 8 (6.103.8)
धृष्टद्युम्नस्तु समरे क्रोधेनाग्निरिव ज्वलन् । पितामहं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥
dhṛṣṭadyumnastu samare krodhenāgniriva jvalan | pitāmahaṃ tribhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat
युद्ध में क्रोध से अग्नि के समान धधकते धृष्टद्युम्न ने पितामह की दोनों भुजाओं और छाती में तीन बाण मारे।
श्लोक 9 (6.103.9)
द्रुपदः पञ्चविंशत्या विराटो दशभिः शरैः । शिखण्डी पञ्चविंशत्या भीष्मं विव्याध सायकैः ॥
drupadaḥ pañcaviṃśatyā virāṭo daśabhiḥ śaraiḥ | śikhaṇḍī pañcaviṃśatyā bhīṣmaṃ vivyādha sāyakaiḥ
द्रुपद ने पच्चीस, विराट ने दस और शिखण्डी ने पच्चीस बाणों से भीष्म को बींध डाला।
श्लोक 10 (6.103.10)
सोऽतिविद्धो महाराज शोणितौघपरिप्लुतः । वसन्ते पुष्पशबलो रक्ताशोक इवाबभौ ॥
so'tividdho mahārāja śoṇitaughapariplutaḥ | vasante puṣpaśabalo raktāśoka ivābabhau
महाराज, गहरे घावों से रक्त की धाराओं में नहाए भीष्म वसन्त ऋतु में फूलों से लदे लाल अशोक के वृक्ष के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 11 (6.103.11)
तान्प्रत्यविध्यद्गाङ्गेयस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । द्रुपदस्य च भल्लेन धनुश्चिच्छेद मारिष ॥
tānpratyavidhyadgāṅgeyastribhistribhirajihmagaiḥ | drupadasya ca bhallena dhanuściccheda māriṣa
आर्य, गंगानन्दन ने उनमें से प्रत्येक को बदले में तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से बींधा और एक भल्ल से द्रुपद का धनुष काट डाला।
श्लोक 12 (6.103.12)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय भीष्मं विव्याध पञ्चभिः । सारथिं च त्रिभिर्बाणैः सुशितै रणमूर्धनि ॥
so'nyatkārmukamādāya bhīṣmaṃ vivyādha pañcabhiḥ | sārathiṃ ca tribhirbāṇaiḥ suśitai raṇamūrdhani
द्रुपद ने दूसरा धनुष लेकर युद्ध के अग्रभाग में भीष्म को पाँच और उनके सारथि को तीन तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 13 (6.103.13)
तथा भीमो महाराज द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः । केकया भ्रातरः पञ्च सात्यकिश्चैव सात्वतः ॥
tathā bhīmo mahārāja draupadyāḥ pañca cātmajāḥ | kekayā bhrātaraḥ pañca sātyakiścaiva sātvataḥ
महाराज, तब भीम, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, पाँचों केकय भाई और सात्वतवंशी सात्यकि
श्लोक 14 (6.103.14)
अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं युधिष्ठिरसमाज्ञया । प्रति रक्षणकार्यार्थं धृष्टद्युम्नमुखान्रणे ॥
abhyadravanta gāṅgeyaṃ yudhiṣṭhirasamājñayā | prati rakṣaṇakāryārthaṃ dhṛṣṭadyumnamukhānraṇe
युधिष्ठिर की आज्ञा से धृष्टद्युम्न आदि की रक्षा के लिए रणभूमि में गंगानन्दन पर टूट पड़े।
श्लोक 15 (6.103.15)
तथैव तावकाः सर्वे भीष्मरक्षार्थमुद्यताः । प्रत्युद्ययुः पाण्डुसेनां सहसैन्या नराधिप ॥
tathaiva tāvakāḥ sarve bhīṣmarakṣārthamudyatāḥ | pratyudyayuḥ pāṇḍusenāṃ sahasainyā narādhipa
नरेश्वर, इसी प्रकार आपके सभी योद्धा भीष्म की रक्षा के लिए तत्पर होकर अपनी सेनाओं के साथ पाण्डव-सेना का सामना करने बढ़े।
श्लोक 16 (6.103.16)
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं तव तेषां च संकुलम् । नराश्वरथनागानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥
tatrāsītsumahadyuddhaṃ tava teṣāṃ ca saṃkulam | narāśvarathanāgānāṃ yamarāṣṭravivardhanam
वहाँ आपके और उनके योद्धाओं के बीच मनुष्यों, घोड़ों, रथों और हाथियों का भारी घमासान युद्ध हुआ, जो यमलोक की आबादी बढ़ाने वाला था।
श्लोक 17 (6.103.17)
रथी रथिनमासाद्य प्राहिणोद्यमसादनम् । तथेतरान्समासाद्य नरनागाश्वसादिनः ॥
rathī rathinamāsādya prāhiṇodyamasādanam | tathetarānsamāsādya naranāgāśvasādinaḥ
रथी रथी से भिड़कर उसे यमलोक भेज देता था; और दूसरे योद्धा पैदलों, हाथीसवारों और घुड़सवारों से भिड़कर
श्लोक 18 (6.103.18)
अनयन्परलोकाय शरैः सन्नतपर्वभिः । शरैश्च विविधैर्घोरैस्तत्रतत्र विशांपते ॥
anayanparalokāya śaraiḥ sannataparvabhiḥ | śaraiśca vividhairghoraistatratatra viśāṃpate
हे प्रजानाथ, झुकी गाँठों वाले बाणों तथा अनेक प्रकार के भयंकर बाणों से जहाँ-तहाँ उन्हें परलोक पहुँचा रहे थे।
श्लोक 19 (6.103.19)
रथास्तु रथिभिर्हीना हतसारथयस्तथा । विप्रद्रुताश्वाः समरे दिशो जग्मुः समन्ततः ॥
rathāstu rathibhirhīnā hatasārathayastathā | vipradrutāśvāḥ samare diśo jagmuḥ samantataḥ
जिन रथों के रथी और सारथि मारे जा चुके थे, उनके घोड़े भड़ककर उन्हें युद्धभूमि में चारों ओर दिशाओं में भगा ले गए।
श्लोक 20 (6.103.20)
मृद्नन्तस्ते नरान्राजन्हयांश्च सुबहून्रणे । वातायमाना दृश्यन्ते गन्धर्वनगरोपमाः ॥
mṛdnantaste narānrājanhayāṃśca subahūnraṇe | vātāyamānā dṛśyante gandharvanagaropamāḥ
राजन्, युद्ध में बहुत-से मनुष्यों और घोड़ों को कुचलते हुए वे रथ हवा की तरह दौड़ते, गन्धर्व-नगरों के समान दिखाई देते थे।
श्लोक 21 (6.103.21)
रथिनश्च रथैर्हीना वर्मिणस्तेजसा युताः । कुण्डलोष्णीषिणः सर्वे निष्काङ्गदविभूषणाः ॥
rathinaśca rathairhīnā varmiṇastejasā yutāḥ | kuṇḍaloṣṇīṣiṇaḥ sarve niṣkāṅgadavibhūṣaṇāḥ
रथहीन हुए रथी भी, जो कवचधारी और तेजस्वी थे, सब कुण्डल और पगड़ी पहने तथा स्वर्णहार और बाजूबंदों से सजे थे,
श्लोक 22 (6.103.22)
देवपुत्रसमाः सर्वे शौर्ये शक्रसमा युधि । ऋद्ध्या वैश्रवणं चाति नयेन च बृहस्पतिम् ॥
devaputrasamāḥ sarve śaurye śakrasamā yudhi | ṛddhyā vaiśravaṇaṃ cāti nayena ca bṛhaspatim
जो सब देवपुत्रों के समान थे, युद्ध में पराक्रम में इन्द्र के समान थे, और ऐश्वर्य में कुबेर से तथा नीति में बृहस्पति से भी बढ़कर थे,
श्लोक 23 (6.103.23)
सर्वलोकेश्वराः शूरास्तत्रतत्र विशांपते । विप्रद्रुता व्यदृश्यन्त प्राकृता इव मानवाः ॥
sarvalokeśvarāḥ śūrāstatratatra viśāṃpate | vipradrutā vyadṛśyanta prākṛtā iva mānavāḥ
ऐसे सम्पूर्ण लोकों के स्वामी शूरवीर भी, हे प्रजानाथ, जहाँ-तहाँ साधारण मनुष्यों की भाँति भागते दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 24 (6.103.24)
दन्तिनश्च नरश्रेष्ठ हीनाः परमसादिभिः । मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि निपेतुः सर्वशब्दगाः ॥
dantinaśca naraśreṣṭha hīnāḥ paramasādibhiḥ | mṛdnantaḥ svānyanīkāni nipetuḥ sarvaśabdagāḥ
हे नरश्रेष्ठ, अपने उत्तम सवारों से रहित हाथी अपनी ही सेनाओं को रौंदते हुए हर प्रकार का चीत्कार करते गिर पड़े।
श्लोक 25 (6.103.25)
चर्मभिश्चामरैश्चित्रैः पताकाभिश्च मारिष । छत्रैः सितैर्हेमदण्डैश्चामरैश्च समन्ततः ॥
carmabhiścāmaraiścitraiḥ patākābhiśca māriṣa | chatraiḥ sitairhemadaṇḍaiścāmaraiśca samantataḥ
आर्य, ढालों, रंग-बिरंगे चँवरों, पताकाओं, सोने के डंडों वाले श्वेत छत्रों और चारों ओर लगे चँवरों के
श्लोक 26 (6.103.26)
विशीर्णैर्विप्रधावन्तो दृश्यन्ते स्म दिशो दश । नवमेघप्रतीकाशा जलदोपमनिःस्वनाः ॥
viśīrṇairvipradhāvanto dṛśyante sma diśo daśa | navameghapratīkāśā jaladopamaniḥsvanāḥ
छिन्न-भिन्न हो जाने पर वे हाथी नये बादलों जैसे दिखते और मेघों के समान गर्जना करते हुए दसों दिशाओं में भागते दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 27 (6.103.27)
तथैव दन्तिभिर्हीना गजारोहा विशांपते । प्रधावन्तोऽन्वदृश्यन्त तव तेषां च संकुले ॥
tathaiva dantibhirhīnā gajārohā viśāṃpate | pradhāvanto'nvadṛśyanta tava teṣāṃ ca saṃkule
हे प्रजानाथ, इसी प्रकार आपके और उनके योद्धाओं के उस घमासान में हाथियों से रहित हाथीसवार इधर-उधर दौड़ते दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 28 (6.103.28)
नानादेशसमुत्थांश्च तुरगान्हेमभूषितान् । वातायमानानद्राक्षं शतशोऽथ सहस्रशः ॥
nānādeśasamutthāṃśca turagānhemabhūṣitān | vātāyamānānadrākṣaṃ śataśo'tha sahasraśaḥ
मैंने अनेक देशों में उत्पन्न, सोने से सजे सैकड़ों-हज़ारों घोड़ों को हवा की तरह दौड़ते देखा।
श्लोक 29 (6.103.29)
अश्वारोहान्हतैरश्वैर्गृहीतासीन्समन्ततः । द्रवमाणानपश्याम द्राव्यमाणांश्च संयुगे ॥
aśvārohānhatairaśvairgṛhītāsīnsamantataḥ | dravamāṇānapaśyāma drāvyamāṇāṃśca saṃyuge
हमने देखा कि जिनके घोड़े मारे गए थे, वे घुड़सवार हाथों में तलवारें लिए युद्ध में चारों ओर भाग रहे थे और भगाए जा रहे थे।
श्लोक 30 (6.103.30)
गजो गजं समासाद्य द्रवमाणं महाहवे । ययौ प्रमृद्य तरसा पादातान्वाजिनस्तथा । तथैव च रथान्राजन्प्रममर्द रणे गजः ॥
gajo gajaṃ samāsādya dravamāṇaṃ mahāhave | yayau pramṛdya tarasā pādātānvājinastathā | tathaiva ca rathānrājanpramamarda raṇe gajaḥ
महासमर में कोई हाथी भागते हुए हाथी से भिड़कर वेग से पैदलों और घोड़ों को कुचलता हुआ आगे बढ़ जाता था; और राजन्, इसी प्रकार हाथी युद्ध में रथों को भी रौंद डालता था।
श्लोक 31 (6.103.31)
रथाश्चैव समासाद्य पतितांस्तुरगान्भुवि । व्यमृद्नन्समरे राजंस्तुरगांश्च नरान्रणे ॥
rathāścaiva samāsādya patitāṃsturagānbhuvi | vyamṛdnansamare rājaṃsturagāṃśca narānraṇe
राजन्, रथ भी भूमि पर गिरे घोड़ों के पास पहुँचकर युद्ध में घोड़ों और मनुष्यों को रौंद डालते थे।
श्लोक 32 (6.103.32)
एवं ते बहुधा राजन्प्रत्यमृद्नन्परस्परम् । दृश्यन्ते स्म महाबाहो तत्रतत्र महाबलाः ॥
evaṃ te bahudhā rājanpratyamṛdnanparasparam | dṛśyante sma mahābāho tatratatra mahābalāḥ
राजन्, इस प्रकार वे अनेक प्रकार से एक-दूसरे को रौंद रहे थे; हे महाबाहो, वे महाबली योद्धा जहाँ-तहाँ दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 33 (6.103.33)
तस्मिन्रौद्रे तथा युद्धे वर्तमाने महाभये । प्रावर्तत नदी घोरा शोणितान्त्रतरङ्गिणी ॥
tasminraudre tathā yuddhe vartamāne mahābhaye | prāvartata nadī ghorā śoṇitāntrataraṅgiṇī
उस अत्यन्त भयावह और रौद्र युद्ध के चलते एक भयंकर नदी बह निकली, जिसकी लहरें रक्त और आँतों की थीं,
श्लोक 34 (6.103.34)
अस्थिसङ्घातसंबाधा केशशैवलशाद्वला । रथह्रदा शरावर्ता हयमीना दुरासदा ॥
asthisaṅghātasaṃbādhā keśaśaivalaśādvalā | rathahradā śarāvartā hayamīnā durāsadā
जो हड्डियों के ढेरों से भरी थी, केश जिसकी सेवार और घास थे, रथ जिसके कुण्ड, बाण भँवर और घोड़े मछलियाँ थे, और जिसे पार करना कठिन था;
श्लोक 35 (6.103.35)
शीर्षोपलसमाकीर्णा हस्तिग्राहसमाकुला । कवचोष्णीषफेनौघा धनुर्वेगासिकच्छपा ॥
śīrṣopalasamākīrṇā hastigrāhasamākulā | kavacoṣṇīṣaphenaughā dhanurvegāsikacchapā
सिर जिसमें पत्थरों की तरह बिखरे थे, हाथी जिसके ग्राह थे, कवच और पगड़ियाँ जिसके फेन के ढेर थे, धनुष जिसका प्रवाह और तलवारें जिसके कछुए थे;
श्लोक 36 (6.103.36)
शङ्खनक्रौघसंकीर्णा छत्रकूर्मरथोडुपा । पताकाध्वजवृक्षाढ्या मर्त्यकूलापहारिणी । क्रव्यादहंससंकीर्णा यमराष्ट्रविवर्धनी ॥
śaṅkhanakraughasaṃkīrṇā chatrakūrmarathoḍupā | patākādhvajavṛkṣāḍhyā martyakūlāpahāriṇī | kravyādahaṃsasaṃkīrṇā yamarāṣṭravivardhanī
शंख जिसके नाकों के झुंड थे, छत्र कछुए और रथ डोंगियाँ थीं, पताकाएँ और ध्वज जिसके तटवर्ती वृक्ष थे, जो किनारों की तरह मनुष्यों को बहा ले जाती थी, मांसभक्षी जीव जिसके हंस थे — ऐसी वह नदी यमलोक को भरने वाली थी।
श्लोक 37 (6.103.37)
तां नदीं क्षत्रियाः शूरा रथनागहयप्लवैः । प्रतेरुर्बहवो राजन्भयं त्यक्त्वा महारथाः ॥
tāṃ nadīṃ kṣatriyāḥ śūrā rathanāgahayaplavaiḥ | praterurbahavo rājanbhayaṃ tyaktvā mahārathāḥ
राजन्, बहुत-से शूरवीर क्षत्रिय महारथी भय छोड़कर रथ, हाथी और घोड़ों रूपी नौकाओं से उस नदी को पार कर गए।
श्लोक 38 (6.103.38)
अपोवाह रणे भीरून्कश्मलेनाभिसंवृतान् । यथा वैतरणी प्रेतान्प्रेतराजपुरं प्रति ॥
apovāha raṇe bhīrūnkaśmalenābhisaṃvṛtān | yathā vaitaraṇī pretānpretarājapuraṃ prati
मूर्च्छा से घिरे डरपोकों को वह नदी युद्ध में वैसे ही बहा ले गई जैसे वैतरणी प्रेतों को प्रेतराज यम के नगर की ओर ले जाती है।
श्लोक 39 (6.103.39)
प्राक्रोशन्क्षत्रियास्तत्र दृष्ट्वा तद्वैशसं महत् । दुर्योधनापराधेन गच्छन्ति क्षत्रियाः क्षयम् ॥
prākrośankṣatriyāstatra dṛṣṭvā tadvaiśasaṃ mahat | duryodhanāparādhena gacchanti kṣatriyāḥ kṣayam
उस महान संहार को देखकर वहाँ क्षत्रिय चिल्ला उठे — "दुर्योधन के अपराध से क्षत्रिय विनाश को प्राप्त हो रहे हैं!
क्षत्रिया ऊचुः
श्लोक 40 (6.103.40)
गुणवत्सु कथं द्वेषं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । कृतवान्पाण्डुपुत्रेषु पापात्मा लोभमोहितः ॥
guṇavatsu kathaṃ dveṣaṃ dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | kṛtavānpāṇḍuputreṣu pāpātmā lobhamohitaḥ
"लोभ से मोहित पापात्मा राजा धृतराष्ट्र ने गुणवान पाण्डुपुत्रों से ऐसा द्वेष क्यों किया?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 41 (6.103.41)
एवं बहुविधा वाचः श्रूयन्ते स्म परस्परम् । पाण्डवस्तवसंयुक्ताः पुत्राणां ते सुदारुणाः ॥
evaṃ bahuvidhā vācaḥ śrūyante sma parasparam | pāṇḍavastavasaṃyuktāḥ putrāṇāṃ te sudāruṇāḥ
इस प्रकार की अनेक बातें आपस में सुनाई दे रही थीं, जो पाण्डवों की प्रशंसा से भरी और आपके पुत्रों के लिए अत्यन्त कठोर थीं।
श्लोक 42 (6.103.42)
ता निशम्य ततो वाचः सर्वयोधैरुदाहृताः । आगस्कृत्सर्वलोकस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥
tā niśamya tato vācaḥ sarvayodhairudāhṛtāḥ | āgaskṛtsarvalokasya putro duryodhanastava
सब योद्धाओं द्वारा कही गई उन बातों को सुनकर सारे जगत के अपराधी आपके पुत्र दुर्योधन ने
श्लोक 43 (6.103.43)
भीष्मं द्रोणं कृपं चैव शल्यं चोवाच भारत । युध्यध्वमनहंकाराः किं चिरं कुरुथेति च ॥
bhīṣmaṃ droṇaṃ kṛpaṃ caiva śalyaṃ covāca bhārata | yudhyadhvamanahaṃkārāḥ kiṃ ciraṃ kurutheti ca
हे भारत, भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य से कहा — "अहंकार छोड़कर युद्ध कीजिए! आप लोग विलम्ब क्यों कर रहे हैं?"
श्लोक 44 (6.103.44)
इति दुर्योधनोत्सृष्टाः सर्वे युयुधिरे नृपाः । ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह । अक्षद्यूतकृतं राजन्सुघोरं वैशसं तदा ॥
iti duryodhanotsṛṣṭāḥ sarve yuyudhire nṛpāḥ | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ kurūṇāṃ pāṇḍavaiḥ saha | akṣadyūtakṛtaṃ rājansughoraṃ vaiśasaṃ tadā
दुर्योधन के इस प्रकार उकसाने पर सभी राजा युद्ध करने लगे। राजन्, तब कौरवों का पाण्डवों के साथ वह युद्ध छिड़ा — द्यूतक्रीड़ा से उपजा अत्यन्त भयंकर संहार।
श्लोक 45 (6.103.45)
यत्पुरा न निगृह्णासि वार्यमाणो महात्मभिः । वैचित्रवीर्य तस्येदं फलं पश्य सुदारुणम् ॥
yatpurā na nigṛhṇāsi vāryamāṇo mahātmabhiḥ | vaicitravīrya tasyedaṃ phalaṃ paśya sudāruṇam
हे विचित्रवीर्यनन्दन, महात्माओं के रोकने पर भी आपने पहले जिसे नहीं रोका, अब उसी का यह अत्यन्त भयानक फल देखिए।
श्लोक 46 (6.103.46)
न हि पाण्डुसुता राजन्ससैन्याः सपदानुगाः । रक्षन्ति समरे प्राणान्कौरवा वापि संयुगे ॥
na hi pāṇḍusutā rājansasainyāḥ sapadānugāḥ | rakṣanti samare prāṇānkauravā vāpi saṃyuge
राजन्, न तो सेनाओं और अनुचरों सहित पाण्डुपुत्र और न ही कौरव युद्ध में अपने प्राणों की परवाह कर रहे हैं।
श्लोक 47 (6.103.47)
एतस्मात्कारणाद्धोरो वर्तते स्वजनक्षयः । दैवाद्वा पुरुषव्याघ्र तव चापनयान्नृप ॥
etasmātkāraṇāddhoro vartate svajanakṣayaḥ | daivādvā puruṣavyāghra tava cāpanayānnṛpa
हे पुरुषसिंह, इसी कारण यह स्वजनों का भयानक विनाश हो रहा है — चाहे दैववश, चाहे राजन्, आपकी अपनी अनीति से।