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भीष्म पर्व · अध्याय 104

अर्जुन द्वारा त्रिगर्तों का संहार; सात्यकि और भीष्म की शक्तियों का आदान-प्रदान

अर्जुन सुशर्मा के अनुचरों का ऐसा संहार करते हैं कि त्रिगर्त-सेना टूटकर भाग जाती है; तब दुर्योधन भीष्म को आगे करके सुशर्मा को बचाने के लिए सारी सेना लेकर अर्जुन पर टूट पड़ता है, और पाण्डव भीष्म को घेरने बढ़ते हैं। मध्याह्न में दोनों सेनाएँ गुँथ जाती हैं: सात्यकि कृतवर्मा को घायल करते हैं, द्रोण द्रुपद को रणभूमि से हटा देते हैं, अभिमन्यु चित्रसेन को रथहीन कर देते हैं और भीम बाह्लीक को घोड़ों, सारथि और रथ से वंचित कर देते हैं। फिर सात्यकि भीष्म पर आक्रमण करते हैं; वे भीष्म की लोहे की शक्ति से बच निकलते हैं, भीष्म सात्यकि की शक्ति के दो टुकड़े कर उन्हें घायल कर देते हैं, और पाण्डव सात्यकि की रक्षा के लिए भीष्म को घेर लेते हैं।

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.104.1)

अर्जुनस्तान्नरव्याघ्रः सुशर्मानुचरान्नृपान् । अनयत्प्रेतराजस्य सदनं सायकैः शितैः ॥

arjunastānnaravyāghraḥ suśarmānucarānnṛpān | anayatpretarājasya sadanaṃ sāyakaiḥ śitaiḥ

पुरुषसिंह अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से सुशर्मा के अनुयायी राजाओं को प्रेतराज यम के घर पहुँचा दिया।

श्लोक 2 (6.104.2)

सुशर्मापि ततो बाणैः पार्थं विव्याध संयुगे । वासुदेवं च सप्तत्या पार्थं च नवभिः पुनः ॥

suśarmāpi tato bāṇaiḥ pārthaṃ vivyādha saṃyuge | vāsudevaṃ ca saptatyā pārthaṃ ca navabhiḥ punaḥ

तब सुशर्मा ने भी युद्ध में पार्थ को बाणों से बींधा — वासुदेव को सत्तर और पार्थ को फिर नौ बाणों से।

श्लोक 3 (6.104.3)

तं निवार्य शरौघेण शक्रसूनुर्महारथः । सुशर्मणो रणे योधान्प्राहिणोद्यमसादनम् ॥

taṃ nivārya śaraugheṇa śakrasūnurmahārathaḥ | suśarmaṇo raṇe yodhānprāhiṇodyamasādanam

इन्द्रपुत्र महारथी अर्जुन ने बाणों की बौछार से उसे रोककर युद्ध में सुशर्मा के योद्धाओं को यमलोक भेज दिया।

श्लोक 4 (6.104.4)

ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये । व्यद्रवन्त रणे राजन्भये जाते महारथाः ॥

te vadhyamānāḥ pārthena kāleneva yugakṣaye | vyadravanta raṇe rājanbhaye jāte mahārathāḥ

राजन्, युगान्त में काल के समान पार्थ के हाथों मारे जाते वे महारथी भयभीत होकर रणभूमि से भागने लगे।

श्लोक 5 (6.104.5)

उत्सृज्य तुरगान्केचिद्रथान्केचिच्च मारिष । गजानन्ये समुत्सृज्य प्राद्रवन्त दिशो दश ॥

utsṛjya turagānkecidrathānkecicca māriṣa | gajānanye samutsṛjya prādravanta diśo daśa

आर्य, कुछ अपने घोड़े छोड़कर, कुछ रथ छोड़कर, और दूसरे हाथियों को छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 6 (6.104.6)

अपरे तु तदादाय वाजिनागरथान्रणे । त्वरया परया युक्ताः प्राद्रवन्त विशांपते ॥

apare tu tadādāya vājināgarathānraṇe | tvarayā parayā yuktāḥ prādravanta viśāṃpate

हे प्रजानाथ, दूसरे अपने घोड़े, हाथी और रथ साथ लेकर बड़ी उतावली से रणभूमि से भाग खड़े हुए।

श्लोक 7 (6.104.7)

पादाताश्चापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे । निरपेक्षा व्यधावन्त तेनतेन स्म भारत ॥

pādātāścāpi śastrāṇi samutsṛjya mahāraṇe | nirapekṣā vyadhāvanta tenatena sma bhārata

हे भारत, पैदल सैनिक भी उस महासमर में हथियार फेंककर बेपरवाह होकर इधर-उधर भागने लगे।

श्लोक 8 (6.104.8)

वार्यमाणाः सुबहुशस्त्रैगर्तेन सुशर्मणा । तथान्यैः पार्थिवश्रेष्ठैर्न व्यतिष्ठन्त संयुगे ॥

vāryamāṇāḥ subahuśastraigartena suśarmaṇā | tathānyaiḥ pārthivaśreṣṭhairna vyatiṣṭhanta saṃyuge

त्रिगर्तराज सुशर्मा और दूसरे श्रेष्ठ राजाओं के बार-बार रोकने पर भी वे युद्ध में नहीं ठहरे।

श्लोक 9 (6.104.9)

तद्बलं प्रद्रुतं दृष्ट्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव । पुरस्कृत्य रणे भीष्मं सर्वसैन्यपुरस्कृतः ॥

tadbalaṃ pradrutaṃ dṛṣṭvā putro duryodhanastava | puraskṛtya raṇe bhīṣmaṃ sarvasainyapuraskṛtaḥ

उस सेना को भागते देखकर आपके पुत्र दुर्योधन ने युद्ध में भीष्म को आगे किया और सारी सेना को आगे रखकर

श्लोक 10 (6.104.10)

सर्वोद्योगेन महता धनञ्जयमुपाद्रवत् । त्रिगर्ताधिपतेरर्थे जीवितस्य विशांपते ॥

sarvodyogena mahatā dhanañjayamupādravat | trigartādhipaterarthe jīvitasya viśāṃpate

हे प्रजानाथ, त्रिगर्तराज के प्राण बचाने के लिए पूरे उद्योग से धनञ्जय पर धावा बोल दिया।

श्लोक 11 (6.104.11)

स एकः समरे तस्थौ किरन्बहुविधाञ्शरान् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः शेषा हि प्रद्रुता नराः ॥

sa ekaḥ samare tasthau kiranbahuvidhāñśarān | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ śeṣā hi pradrutā narāḥ

अपने सब भाइयों के साथ केवल वही अनेक प्रकार के बाण बरसाता हुआ युद्ध में डटा रहा; शेष लोग भाग चुके थे।

श्लोक 12 (6.104.12)

तथैव पाण्डवा राजन्सर्वोद्योगेन दंशिताः । प्रययुः फल्गुनार्थाय यत्र भीष्मो व्यतिष्ठत ॥

tathaiva pāṇḍavā rājansarvodyogena daṃśitāḥ | prayayuḥ phalgunārthāya yatra bhīṣmo vyatiṣṭhata

राजन्, इसी प्रकार पाण्डव भी कवच धारण कर पूरे उद्योग से फाल्गुन (अर्जुन) के लिए वहाँ पहुँचे जहाँ भीष्म खड़े थे।

श्लोक 13 (6.104.13)

ज्ञायमाना रणे वीर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः । हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः ॥

jñāyamānā raṇe vīryaṃ ghoraṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ | hāhākārakṛtotsāhā bhīṣmaṃ jagmuḥ samantataḥ

गाण्डीवधारी अर्जुन के भयंकर पराक्रम को जानते हुए वे हाहाकार से उत्साहित होकर चारों ओर से भीष्म पर चढ़ आए।

श्लोक 14 (6.104.14)

ततस्तालध्वजः शूरः पाण्डवानां वरूथिनीम् । छादयामास समरे शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

tatastāladhvajaḥ śūraḥ pāṇḍavānāṃ varūthinīm | chādayāmāsa samare śaraiḥ sannataparvabhiḥ

तब ताड़ के चिह्न वाली ध्वजा वाले वीर भीष्म ने युद्ध में झुकी गाँठों वाले बाणों से पाण्डवों की सेना को ढक दिया।

श्लोक 15 (6.104.15)

एकीभूतास्ततः सर्वे कुरवः सह पाण्डवैः । अयुध्यन्त महाराज मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥

ekībhūtāstataḥ sarve kuravaḥ saha pāṇḍavaiḥ | ayudhyanta mahārāja madhyaṃ prāpte divākare

महाराज, जब सूर्य आकाश के मध्य में पहुँचा, तब सारे कौरव और पाण्डव एक-दूसरे में गुँथकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 16 (6.104.16)

सात्यकिः कृतवर्माणं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः । अतिष्ठदाहवे शूरः किरन्बाणान्सहस्रशः ॥

sātyakiḥ kṛtavarmāṇaṃ viddhvā pañcabhirāśugaiḥ | atiṣṭhadāhave śūraḥ kiranbāṇānsahasraśaḥ

सात्यकि कृतवर्मा को पाँच शीघ्रगामी बाणों से बींधकर हज़ारों बाण बरसाते हुए वीरतापूर्वक युद्ध में डटे रहे।

श्लोक 17 (6.104.17)

तथैव द्रुपदो राजा द्रोणं विद्ध्वा शितैः शरैः । पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं चास्य पञ्चभिः ॥

tathaiva drupado rājā droṇaṃ viddhvā śitaiḥ śaraiḥ | punarvivyādha saptatyā sārathiṃ cāsya pañcabhiḥ

इसी प्रकार राजा द्रुपद ने द्रोण को तीखे बाणों से बींधा, फिर सत्तर बाणों से बींधा और उनके सारथि को पाँच बाणों से।

श्लोक 18 (6.104.18)

भीमसेनस्तु राजानं बाह्लीकं प्रपितामहम् । विद्ध्वा नदन्महानादं शार्दूल इव कानने ॥

bhīmasenastu rājānaṃ bāhlīkaṃ prapitāmaham | viddhvā nadanmahānādaṃ śārdūla iva kānane

भीमसेन अपने प्रपितामह राजा बाह्लीक को बींधकर वन में बाघ की भाँति ज़ोर से गरज उठे।

श्लोक 19 (6.104.19)

आर्जुनिश्चित्रसेनेन विद्धो बहुभिराशुगैः । अतिष्ठदाहवे शूरः किरन्बाणान्सहस्रशः । चित्रसेनं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध समरे भृशम् ॥

ārjuniścitrasenena viddho bahubhirāśugaiḥ | atiṣṭhadāhave śūraḥ kiranbāṇānsahasraśaḥ | citrasenaṃ tribhirbāṇairvivyādha samare bhṛśam

चित्रसेन के बहुत-से शीघ्रगामी बाणों से बिंधकर भी अर्जुनपुत्र अभिमन्यु हज़ारों बाण बरसाते हुए वीरतापूर्वक युद्ध में डटा रहा और उसने चित्रसेन को तीन बाणों से गहरा बींध दिया।

श्लोक 20 (6.104.20)

समागतौ तौ तु रणे महामात्रौ व्यरोचताम् । यथा दिवि महाघोरौ राजन्बुधशनैश्चरौ ॥

samāgatau tau tu raṇe mahāmātrau vyarocatām | yathā divi mahāghorau rājanbudhaśanaiścarau

राजन्, युद्ध में भिड़े वे दोनों श्रेष्ठ योद्धा आकाश में बुध और शनि नामक दो भयंकर ग्रहों के समान शोभा पा रहे थे।

श्लोक 21 (6.104.21)

तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं च नवभिः शरैः । ननाद बलवान्नादं सौभद्रः परवीरहा ॥

tasyāśvāṃścaturo hatvā sūtaṃ ca navabhiḥ śaraiḥ | nanāda balavānnādaṃ saubhadraḥ paravīrahā

शत्रुवीरों के संहारक बलवान सुभद्रानन्दन ने उसके चारों घोड़ों को और नौ बाणों से उसके सारथि को मारकर बड़ी गर्जना की।

श्लोक 22 (6.104.22)

हताश्वात्तु रथात्तूर्णं सोऽवप्लुत्य महारथः । आरुरोह रथं तूर्णं दुर्मुखस्य विशांपते ॥

hatāśvāttu rathāttūrṇaṃ so'vaplutya mahārathaḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ durmukhasya viśāṃpate

हे प्रजानाथ, वह महारथी घोड़ों के मारे जाने पर उस रथ से तुरंत कूदकर शीघ्रता से दुर्मुख के रथ पर चढ़ गया।

श्लोक 23 (6.104.23)

द्रोणश्च द्रुपदं भित्त्वा शरैः सन्नतपर्वभिः । सारथिं चास्य विव्याध त्वरमाणः पराक्रमी ॥

droṇaśca drupadaṃ bhittvā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | sārathiṃ cāsya vivyādha tvaramāṇaḥ parākramī

द्रोण ने झुकी गाँठों वाले बाणों से द्रुपद को बींध डाला और फुर्ती दिखाते हुए उस पराक्रमी ने उनके सारथि को भी बींध दिया।

श्लोक 24 (6.104.24)

पीड्यमानस्ततो राजा द्रुपदो वाहिनीमुखे । अपायाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥

pīḍyamānastato rājā drupado vāhinīmukhe | apāyājjavanairaśvaiḥ pūrvavairamanusmaran

सेना के मुहाने पर पीड़ित होकर राजा द्रुपद पुराने वैर को याद करते हुए अपने वेगवान घोड़ों के सहारे वहाँ से हट गए।

श्लोक 25 (6.104.25)

भीमसेनस्तु राजानं मुहूर्तादिव बाह्लिकम् । व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

bhīmasenastu rājānaṃ muhūrtādiva bāhlikam | vyaśvasūtarathaṃ cakre sarvasainyasya paśyataḥ

भीमसेन ने मानो पल भर में सारी सेना के देखते-देखते राजा बाह्लीक को घोड़ों, सारथि और रथ से हीन कर दिया।

श्लोक 26 (6.104.26)

ससंभ्रमो महाराज संशयं परमं गतः ॥

sasaṃbhramo mahārāja saṃśayaṃ paramaṃ gataḥ

महाराज, घबराए हुए और बड़े संकट में पड़े हुए

श्लोक 27 (6.104.27)

अवप्लुत्य ततो वाहाद्बाह्लीकः पुरुषोत्तमः । आरुरोह रथं तूर्णं लक्ष्मणस्य महारणे ॥

avaplutya tato vāhādbāhlīkaḥ puruṣottamaḥ | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ lakṣmaṇasya mahāraṇe

पुरुषश्रेष्ठ बाह्लीक अपने वाहन से कूदकर उस महासमर में तुरंत लक्ष्मण के रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 28 (6.104.28)

सात्यकिः कृतवर्माणं वारयित्वा महारणे । शरैर्बहुविधै राजन्नाससाद पितामहम् ॥

sātyakiḥ kṛtavarmāṇaṃ vārayitvā mahāraṇe | śarairbahuvidhai rājannāsasāda pitāmaham

राजन्, सात्यकि उस महासमर में कृतवर्मा को रोककर अनेक प्रकार के बाणों के साथ पितामह भीष्म पर जा चढ़े।

श्लोक 29 (6.104.29)

स विद्ध्वा भारतं षष्ट्या निशितै रोमवाहिभिः । नृत्यन्निव रथोपस्थे विधुन्वानो महद्धनुः ॥

sa viddhvā bhārataṃ ṣaṣṭyā niśitai romavāhibhiḥ | nṛtyanniva rathopasthe vidhunvāno mahaddhanuḥ

भरतवंशी भीष्म को पंखदार साठ तीखे बाणों से बींधकर वे अपने विशाल धनुष को हिलाते हुए रथ की बैठक पर मानो नाचने लगे।

श्लोक 30 (6.104.30)

तस्यायसीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः । हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम् ॥

tasyāyasīṃ mahāśaktiṃ cikṣepātha pitāmahaḥ | hemacitrāṃ mahāvegāṃ nāgakanyopamāṃ śubhām

तब पितामह ने उन पर सोने से चित्रित, अत्यन्त वेगवती, नागकन्या के समान सुन्दर एक विशाल लोहे की शक्ति चलाई।

श्लोक 31 (6.104.31)

तामापतन्तीं सहसा मृत्युकल्पां सुदुर्जयाम् । व्यंसयामास वार्ष्णेयो लाघवेन महायशाः ॥

tāmāpatantīṃ sahasā mṛtyukalpāṃ sudurjayām | vyaṃsayāmāsa vārṣṇeyo lāghavena mahāyaśāḥ

मृत्यु के समान दुर्जय उस शक्ति को सहसा अपनी ओर आते देख महायशस्वी वार्ष्णेय (सात्यकि) ने फुर्ती से उसे विफल कर दिया।

श्लोक 32 (6.104.32)

अनासाद्य तु वार्ष्णेयं शक्तिः परमदारुणा । न्यपतद्धरणीपृष्ठे महोल्केव महाप्रभा ॥

anāsādya tu vārṣṇeyaṃ śaktiḥ paramadāruṇā | nyapataddharaṇīpṛṣṭhe maholkeva mahāprabhā

वार्ष्णेय तक न पहुँचकर वह अत्यन्त भयंकर शक्ति एक बड़ी दीप्तिमती उल्का के समान धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 33 (6.104.33)

वार्ष्णेयस्तु ततो राजन्स्वां शक्तिं कनकप्रभाम् । वेगवद्गृह्य चिक्षेप पितामहरथं प्रति ॥

vārṣṇeyastu tato rājansvāṃ śaktiṃ kanakaprabhām | vegavadgṛhya cikṣepa pitāmaharathaṃ prati

राजन्, तब वार्ष्णेय ने अपनी सोने-सी चमकती शक्ति उठाकर वेग से पितामह के रथ की ओर चला दी।

श्लोक 34 (6.104.34)

वार्ष्णेयभुजवेगेन प्रणुन्ना सा महाहवे । अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रिर्यथा नरम् ॥

vārṣṇeyabhujavegena praṇunnā sā mahāhave | abhidudrāva vegena kālarātriryathā naram

वार्ष्णेय की भुजाओं के वेग से छूटी वह शक्ति महासमर में उनकी ओर ऐसे लपकी जैसे कालरात्रि मनुष्य की ओर झपटती है।

श्लोक 35 (6.104.35)

तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारतः । क्षुरप्राभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यां सा व्यशीर्यत मेदिनीम् ॥

tāmāpatantīṃ sahasā dvidhā ciccheda bhārataḥ | kṣuraprābhyāṃ sutīkṣṇābhyāṃ sā vyaśīryata medinīm

उस शक्ति को सहसा आते देख भरतवंशी भीष्म ने दो अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाणों से उसके दो टुकड़े कर दिए और वह बिखरकर धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 36 (6.104.36)

छित्त्वा शक्तिं तु गाङ्गेयः सात्यकिं नवभिः शरैः । आजघानोरसि क्रुद्धः प्रहसञ्छत्रुकर्शनः ॥

chittvā śaktiṃ tu gāṅgeyaḥ sātyakiṃ navabhiḥ śaraiḥ | ājaghānorasi kruddhaḥ prahasañchatrukarśanaḥ

शक्ति को काटकर शत्रुओं को सताने वाले गंगानन्दन ने क्रोध में हँसते हुए सात्यकि की छाती में नौ बाण मारे।

श्लोक 37 (6.104.37)

ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । परिवब्रू रणे भीष्मं माधवत्राणकारणात् ॥

tataḥ sarathanāgāśvāḥ pāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | parivabrū raṇe bhīṣmaṃ mādhavatrāṇakāraṇāt

हे पाण्डु के बड़े भाई, तब पाण्डवों ने माधव (सात्यकि) की रक्षा के लिए रथों, हाथियों और घोड़ों सहित युद्ध में भीष्म को घेर लिया।

श्लोक 38 (6.104.38)

ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । पाण्डवानां कुरूणां च समरे विजयैषिणाम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca samare vijayaiṣiṇām

तब विजय चाहने वाले पाण्डवों और कौरवों के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला घमासान युद्ध छिड़ गया।

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