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भीष्म पर्व · अध्याय 105

शकुनि की घुड़सेना का विनाश; शल्य का युधिष्ठिर पर आक्रमण

भीष्म को पाण्डवों से घिरा देखकर दुर्योधन दुःशासन से सारी सेना लेकर उनकी रक्षा करने को कहता है, और शकुनि तथा दुर्योधन युधिष्ठिर और नकुल-सहदेव को रोकने के लिए घुड़सवारों की बड़ी टुकड़ियाँ भेजते हैं। उनके धावे से धरती काँप उठती है और सूर्य ढक जाता है, पर युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव उस वेग को तोड़कर घुड़सवारों को काट डालते हैं और पाण्डव विजय के शंख बजाते हैं। तब दुर्योधन शल्य से युधिष्ठिर को रोकने की विनती करता है; शल्य और तीनों पाण्डव एक-दूसरे पर बाण बरसाते हैं, भीम अपने भाई की सहायता को आते हैं, भीष्म और द्रोण बड़ी सेना लेकर आ पहुँचते हैं, और सूर्य के पश्चिम की ओर ढलते समय भयंकर युद्ध छिड़ जाता है।

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.105.1)

दृष्ट्वा भीष्मं रणे क्रुद्धं पाण्डवैरभिसंवृतम् । यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम् ॥

dṛṣṭvā bhīṣmaṃ raṇe kruddhaṃ pāṇḍavairabhisaṃvṛtam | yathā meghairmahārāja tapānte divi bhāskaram

महाराज, युद्ध में क्रुद्ध भीष्म को पाण्डवों से ऐसे घिरा देखकर जैसे ग्रीष्म के अन्त में आकाश में सूर्य बादलों से घिर जाता है,

श्लोक 2 (6.105.2)

दुर्योधनो महाराज दुःशासनमभाषत । एष शूरो महेष्वासो भीष्मः शूरनिषूदनः ॥

duryodhano mahārāja duḥśāsanamabhāṣata | eṣa śūro maheṣvāso bhīṣmaḥ śūraniṣūdanaḥ

महाराज, दुर्योधन ने दुःशासन से कहा — "ये शूरवीरों का संहार करने वाले शूर महाधनुर्धर भीष्म

दुर्योधन उवाच

श्लोक 3 (6.105.3)

छादितः पाण्डवैः शूरैः समन्ताद्भरतर्षभ । तस्य कार्यं त्वया वीर रक्षणं सुमहात्मनः ॥

chāditaḥ pāṇḍavaiḥ śūraiḥ samantādbharatarṣabha | tasya kāryaṃ tvayā vīra rakṣaṇaṃ sumahātmanaḥ

शूर पाण्डवों द्वारा चारों ओर से ढक लिए गए हैं, हे भरतश्रेष्ठ। वीर, उन महात्मा की रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है।

श्लोक 4 (6.105.4)

रक्ष्यमाणो हि समरे भीष्मोऽस्माकं पितामहः । निहन्यात्समरे यत्तान्पाञ्चालान्पाण्डवैः सह ॥

rakṣyamāṇo hi samare bhīṣmo'smākaṃ pitāmahaḥ | nihanyātsamare yattānpāñcālānpāṇḍavaiḥ saha

क्योंकि युद्ध में सुरक्षित रहने पर हमारे पितामह भीष्म रणभूमि में जूझते पाञ्चालों को पाण्डवों सहित मार डालेंगे।

श्लोक 5 (6.105.5)

तत्र कार्यतमं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् । गोप्ता ह्येष महेष्वासो भीष्मोऽस्माकं महाव्रतः ॥

tatra kāryatamaṃ manye bhīṣmasyaivābhirakṣaṇam | goptā hyeṣa maheṣvāso bhīṣmo'smākaṃ mahāvrataḥ

इसलिए मैं भीष्म की ही रक्षा को सबसे आवश्यक कार्य मानता हूँ, क्योंकि महान व्रत वाले ये महाधनुर्धर भीष्म ही हमारे रक्षक हैं।

श्लोक 6 (6.105.6)

स भवान्सर्वसैन्येन परिवार्य पितामहम् । समरे कर्म कुर्वाणं दुष्करं परिरक्षतु ॥

sa bhavānsarvasainyena parivārya pitāmaham | samare karma kurvāṇaṃ duṣkaraṃ parirakṣatu

अतः तुम सारी सेना के साथ पितामह को घेरकर युद्ध में दुष्कर कर्म करते हुए उनकी रक्षा करो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (6.105.7)

स एवमुक्तः समरे पुत्रो दुःशासनस्तव । परिवार्य स्थितो भीष्मं सैन्येन महता वृतः ॥

sa evamuktaḥ samare putro duḥśāsanastava | parivārya sthito bhīṣmaṃ sainyena mahatā vṛtaḥ

ऐसा कहे जाने पर आपका पुत्र दुःशासन बड़ी सेना से घिरा हुआ युद्ध में भीष्म को घेरकर खड़ा हो गया।

श्लोक 8 (6.105.8)

ततः शतसहस्राणां हयानां सुबलात्मजः । विमलप्रासहस्तानामृष्टितोमरधारिणाम् ॥

tataḥ śatasahasrāṇāṃ hayānāṃ subalātmajaḥ | vimalaprāsahastānāmṛṣṭitomaradhāriṇām

तब सुबलपुत्र शकुनि ने एक लाख घोड़ों की सेना लेकर, जिनके सवार चमकते भाले, ऋष्टि और तोमर धारण किए हुए थे,

श्लोक 9 (6.105.9)

दर्पितानां सुवेगानां बलस्थानां पताकिनाम् । शिक्षितैर्युद्धकुशलैरुपेतानां नरोत्तमैः ॥

darpitānāṃ suvegānāṃ balasthānāṃ patākinām | śikṣitairyuddhakuśalairupetānāṃ narottamaiḥ

जो घोड़े दर्प से भरे, वेगवान, बलवान और पताकाओं वाले थे, और युद्धकुशल, प्रशिक्षित श्रेष्ठ योद्धा जिन पर सवार थे,

श्लोक 10 (6.105.10)

नकुलं सहदेवं च धर्मराजं च पाण्डवम् । न्यवारयन्नरश्रेष्ठान्परिवार्य समन्ततः ॥

nakulaṃ sahadevaṃ ca dharmarājaṃ ca pāṇḍavam | nyavārayannaraśreṣṭhānparivārya samantataḥ

नकुल, सहदेव और पाण्डुपुत्र धर्मराज — इन श्रेष्ठ पुरुषों को चारों ओर से घेरकर रोक लिया।

श्लोक 11 (6.105.11)

ततो दुर्योधनो राजा शूराणां हयसादिनाम् । अयुतं प्रेषयामास पाण्डवानां निवारणे ॥

tato duryodhano rājā śūrāṇāṃ hayasādinām | ayutaṃ preṣayāmāsa pāṇḍavānāṃ nivāraṇe

तब राजा दुर्योधन ने पाण्डवों को रोकने के लिए दस हज़ार शूर घुड़सवार भेजे।

श्लोक 12 (6.105.12)

तैः प्रविष्टैर्महावेगैर्गरुत्मद्भिरिवाहवे । खुराहता धरा राजंश्चकम्पे च ननाद च ॥

taiḥ praviṣṭairmahāvegairgarutmadbhirivāhave | khurāhatā dharā rājaṃścakampe ca nanāda ca

राजन्, जब वे गरुड़ों के समान बड़े वेग से युद्ध में घुसे, तब उनके खुरों की चोट से धरती काँप उठी और गूँजने लगी।

श्लोक 13 (6.105.13)

खुरशब्दश्च सुमहान्वाजिनां शुश्रुवे तदा । महावंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ॥

khuraśabdaśca sumahānvājināṃ śuśruve tadā | mahāvaṃśavanasyeva dahyamānasya parvate

उस समय घोड़ों के खुरों का ऐसा भारी शब्द सुनाई दिया जैसे पर्वत पर जलते हुए बाँस के विशाल वन का होता है।

श्लोक 14 (6.105.14)

उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्धूतं महद्रजः । दिवाकररथं प्राप्य च्छादयामास भास्करम् ॥

utpatadbhiśca taistatra samuddhūtaṃ mahadrajaḥ | divākararathaṃ prāpya cchādayāmāsa bhāskaram

उनके उछलने से उठी धूल का विशाल बादल सूर्य के रथ तक पहुँचकर सूर्य को ढक बैठा।

श्लोक 15 (6.105.15)

वेगवद्भिर्हयैस्तैस्तु क्षोभिता पाण्डवी चमूः । निपतद्भिर्महावेगैर्हंसैरिव महत्सरः ॥

vegavadbhirhayaistaistu kṣobhitā pāṇḍavī camūḥ | nipatadbhirmahāvegairhaṃsairiva mahatsaraḥ

उन वेगवान घोड़ों ने पाण्डव-सेना को ऐसे क्षुब्ध कर दिया जैसे बड़े वेग से उतरते हंस किसी विशाल सरोवर को मथ डालते हैं।

श्लोक 16 (6.105.16)

हेषतां चैव शब्देन न प्राज्ञायत किंचन । अन्तर्दधे महाञ्शब्दस्तेन शब्देन मोहितः ॥

heṣatāṃ caiva śabdena na prājñāyata kiṃcana | antardadhe mahāñśabdastena śabdena mohitaḥ

उनकी हिनहिनाहट के शब्द में और कुछ भी पहचाना नहीं जा रहा था; उस शब्द से दबकर हर दूसरा बड़ा शब्द विलीन हो गया।

श्लोक 17 (6.105.17)

ततो युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । प्रत्यघ्नंस्तरसा वेगं समरे हयसादिनाम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā mādrīputrau ca pāṇḍavau | pratyaghnaṃstarasā vegaṃ samare hayasādinām

तब राजा युधिष्ठिर और माद्री के दोनों पुत्र पाण्डवों ने युद्ध में घुड़सवारों के उस वेग को बलपूर्वक रोक दिया,

श्लोक 18 (6.105.18)

उद्वृत्तस्य महाराज प्रावृट्कालेऽतिपूर्यतः । पौर्णमास्यामम्बुवेगं यथा वेला महोदधेः ॥

udvṛttasya mahārāja prāvṛṭkāle'tipūryataḥ | paurṇamāsyāmambuvegaṃ yathā velā mahodadheḥ

महाराज, जैसे वर्षा ऋतु में उमड़ते और पूर्णिमा को उफनते महासागर के जल-वेग को तट रोक लेता है।

श्लोक 19 (6.105.19)

ततस्ते रथिनो राजञ्शरैः सन्नतपर्वभिः । न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि शरेण हयसादिनाम् ॥

tataste rathino rājañśaraiḥ sannataparvabhiḥ | nyakṛntannuttamāṅgāni śareṇa hayasādinām

राजन्, तब उन रथियों ने झुकी गाँठों वाले बाणों से घुड़सवारों के सिर काट डाले।

श्लोक 20 (6.105.20)

ते निपेतुर्महाराज निहता दृढधन्विभिः । नागैरिव महानागा यथावद्गिरिगह्वरे ॥

te nipeturmahārāja nihatā dṛḍhadhanvibhiḥ | nāgairiva mahānāgā yathāvadgirigahvare

महाराज, उन दृढ़ धनुर्धरों के हाथों मारे गए वे ऐसे गिरे जैसे पर्वत की गुफा में हाथियों द्वारा मारे गए बड़े-बड़े हाथी।

श्लोक 21 (6.105.21)

तेऽपि प्रासैः सुनिशितैः शरैः सन्नतपर्वभिः । न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि विचरन्तो दिशो दश ॥

te'pi prāsaiḥ suniśitaiḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | nyakṛntannuttamāṅgāni vicaranto diśo daśa

वे घुड़सवार भी दसों दिशाओं में घूमते हुए अत्यन्त तीखे भालों और झुकी गाँठों वाले बाणों से सिर काटने लगे।

श्लोक 22 (6.105.22)

अभ्याहता हयारोहा ऋष्टिभिर्भरतर्षभ । अत्यजन्नुत्तमाङ्गानि फलानीव महाद्रुमाः ॥

abhyāhatā hayārohā ṛṣṭibhirbharatarṣabha | atyajannuttamāṅgāni phalānīva mahādrumāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, तलवारों की मार खाकर घुड़सवारों ने अपने सिर ऐसे गिरा दिए जैसे बड़े वृक्ष अपने फल गिरा देते हैं।

श्लोक 23 (6.105.23)

ससादिनो हया राजंस्तत्रतत्र निषूदिताः । पतिताः पात्यमानाश्च प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ॥

sasādino hayā rājaṃstatratatra niṣūditāḥ | patitāḥ pātyamānāśca pratyadṛśyanta sarvaśaḥ

राजन्, सवारों सहित घोड़े जहाँ-तहाँ मारे गए; गिरे हुए और गिराए जाते वे सब ओर दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 24 (6.105.24)

वध्यमाना हयाश्चैव प्राद्रवन्त भयार्दिताः । यथा सिंहं समासाद्य मृगाः प्राणपरायणाः ॥

vadhyamānā hayāścaiva prādravanta bhayārditāḥ | yathā siṃhaṃ samāsādya mṛgāḥ prāṇaparāyaṇāḥ

मारे जाते हुए घोड़े भय से व्याकुल होकर ऐसे भागे जैसे सिंह के सामने पड़कर प्राण बचाने को भागते मृग।

श्लोक 25 (6.105.25)

पाण्डवाश्च महाराज जित्वा शत्रून्महामृधे । दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च ताडयामासुराहवे ॥

pāṇḍavāśca mahārāja jitvā śatrūnmahāmṛdhe | dadhmuḥ śaṅkhāṃśca bherīśca tāḍayāmāsurāhave

महाराज, पाण्डवों ने उस महासंग्राम में शत्रुओं को जीतकर रणभूमि में शंख बजाए और नगाड़े पीटे।

श्लोक 26 (6.105.26)

ततो दुर्योधनो दीनो दृष्ट्वा सैन्यं पराजितम् । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठ मद्रराजमिदं वचः ॥

tato duryodhano dīno dṛṣṭvā sainyaṃ parājitam | abravīdbharataśreṣṭha madrarājamidaṃ vacaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, तब अपनी सेना को पराजित देखकर उदास दुर्योधन ने मद्रराज शल्य से यह बात कही —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 27 (6.105.27)

एष पाण्डुसुतो ज्येष्ठो यमाभ्यां सहितो रणे । पश्यतां वो महाबाहो सेनां द्रावयति प्रभो ॥

eṣa pāṇḍusuto jyeṣṭho yamābhyāṃ sahito raṇe | paśyatāṃ vo mahābāho senāṃ drāvayati prabho

"हे महाबाहु प्रभो, यह पाण्डु का ज्येष्ठ पुत्र नकुल-सहदेव के साथ युद्ध में आप सबके देखते-देखते हमारी सेना को भगा रहा है।

श्लोक 28 (6.105.28)

तं वारय महाबाहो वेलेव मकरालयम् । त्वं हि संश्रूयसेऽत्यर्थमसह्यबलविक्रमः ॥

taṃ vāraya mahābāho veleva makarālayam | tvaṃ hi saṃśrūyase'tyarthamasahyabalavikramaḥ

हे महाबाहो, जैसे तट समुद्र को रोकता है वैसे ही आप उसे रोकिए, क्योंकि आप असह्य बल और पराक्रम वाले के रूप में अत्यन्त विख्यात हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 29 (6.105.29)

पुत्रस्य तव तद्वाक्यं श्रुत्वा शल्यः प्रतापवान् । स ययौ रथवंशेन यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

putrasya tava tadvākyaṃ śrutvā śalyaḥ pratāpavān | sa yayau rathavaṃśena yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

आपके पुत्र की यह बात सुनकर प्रतापी शल्य रथों की पंक्ति के साथ वहाँ गए जहाँ राजा युधिष्ठिर थे।

श्लोक 30 (6.105.30)

तदापतद्वै सहसा शल्यस्य सुमहद्बलम् । महौघवेगं समरे वारयामास पाण्डवः ॥

tadāpatadvai sahasā śalyasya sumahadbalam | mahaughavegaṃ samare vārayāmāsa pāṇḍavaḥ

महाप्रवाह के वेग के समान सहसा आती हुई शल्य की उस विशाल सेना को पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने युद्ध में रोक दिया।

श्लोक 31 (6.105.31)

मद्रराजं च समरे धर्मराजो महारथः । दशभिः सायकैस्तूर्णमाजघान स्तनान्तरे । नकुलः सहदेवश्च तं सप्तभिरजिह्मगैः ॥

madrarājaṃ ca samare dharmarājo mahārathaḥ | daśabhiḥ sāyakaistūrṇamājaghāna stanāntare | nakulaḥ sahadevaśca taṃ saptabhirajihmagaiḥ

महारथी धर्मराज ने युद्ध में तुरंत दस बाणों से मद्रराज की छाती पर प्रहार किया, और नकुल तथा सहदेव ने सात सीधे जाने वाले बाणों से उन्हें मारा।

श्लोक 32 (6.105.32)

मद्रराजोऽपि तान्सर्वानाजघान त्रिभिस्त्रिभिः । युधिष्ठिरं पुनः षष्ट्या विव्याध निशितैः शरैः ॥

madrarājo'pi tānsarvānājaghāna tribhistribhiḥ | yudhiṣṭhiraṃ punaḥ ṣaṣṭyā vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

मद्रराज ने भी उन सबको तीन-तीन बाण मारे और युधिष्ठिर को फिर साठ तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 33 (6.105.33)

माद्रीपुत्रौ च संभ्रान्तौ द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत् । ततो भीमो महाबाहुर्दृष्ट्वा राजानमाहवे ॥

mādrīputrau ca saṃbhrāntau dvābhyāṃ dvābhyāmatāḍayat | tato bhīmo mahābāhurdṛṣṭvā rājānamāhave

उन्होंने घबराए हुए माद्रीपुत्रों को भी दो-दो बाण मारे। तब महाबाहु भीम ने युद्ध में राजा युधिष्ठिर को

श्लोक 34 (6.105.34)

मद्रराजवशं प्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा । अभ्यपद्यत संग्रामे युधिष्ठिरममित्रजित् ॥

madrarājavaśaṃ prāptaṃ mṛtyorāsyagataṃ yathā | abhyapadyata saṃgrāme yudhiṣṭhiramamitrajit

मद्रराज के वश में पड़ा, मानो मृत्यु के मुख में गया हुआ देखकर, शत्रुविजयी भीम संग्राम में युधिष्ठिर के पास आ पहुँचे।

श्लोक 35 (6.105.35)

आपतन्नेव भीमस्तु मद्रराजमताडयत् । सर्वपारशवैस्तीक्ष्णैर्नाराचैर्मर्मभेदिभिः ॥

āpatanneva bhīmastu madrarājamatāḍayat | sarvapāraśavaistīkṣṇairnārācairmarmabhedibhiḥ

आते-आते ही भीम ने पूरी तरह लोहे के बने, मर्मस्थलों को भेदने वाले तीखे नाराचों से मद्रराज पर प्रहार किया।

श्लोक 36 (6.105.36)

ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्येन महता वृतौ । राजानमभ्यपद्येतामञ्जसा शरवर्षिणौ ॥

tato bhīṣmaśca droṇaśca sainyena mahatā vṛtau | rājānamabhyapadyetāmañjasā śaravarṣiṇau

तब बड़ी सेना से घिरे भीष्म और द्रोण बाणों की वर्षा करते हुए शीघ्र ही राजा के पास आ पहुँचे।

श्लोक 37 (6.105.37)

ततो युद्धं महाघोरं प्रावर्तत सुदारुणम् । अपरां दिशमास्थाय द्योतमाने दिवाकरे ॥

tato yuddhaṃ mahāghoraṃ prāvartata sudāruṇam | aparāṃ diśamāsthāya dyotamāne divākare

तब पश्चिम दिशा की ओर ढलते, चमकते सूर्य के रहते एक अत्यन्त भयानक और दारुण युद्ध होने लगा।

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