भीष्म पर्व · अध्याय 106
चाबुक लेकर भीष्म पर श्रीकृष्ण का धावा
नौवें दिन भीष्म पाण्डव सेना को ऐसा तितर-बितर करते हैं कि वह सब ओर भाग खड़ी होती है; तब श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म-वध की उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाकर रथ आगे बढ़ाते हैं। अनिच्छुक अर्जुन भीष्म के धनुष तो काटते हैं, पर नरमी से लड़ते हैं; इस पर श्रीकृष्ण केवल चाबुक लिये रथ से कूदकर भीष्म की ओर दौड़ते हैं, और भीष्म उनके हाथों मृत्यु का स्वागत करते हैं। अर्जुन दसवें पग पर श्रीकृष्ण को रोककर स्वयं पितामह को मारने की शपथ लेते हैं; भीष्म सूर्यास्त तक पाण्डवों को रौंदते रहते हैं, और फिर थकी हुई सेनाएँ युद्ध से लौटने लगती हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.106.1)
ततः पिता तव क्रुद्धो निशितैः सायकोत्तमैः । आजघान रणे पार्थान्सहसेनान्समन्ततः ॥
tataḥ pitā tava kruddho niśitaiḥ sāyakottamaiḥ | ājaghāna raṇe pārthānsahasenānsamantataḥ
तब आपके पिता ने क्रोध में भरकर युद्धभूमि में चारों ओर से पार्थों और उनकी सेनाओं पर तीखे, उत्तम बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 2 (6.106.2)
भीमं द्वादशभिर्विद्ध्वा सात्यकिं नवभिः शरैः । नकुलं च त्रिभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ॥
bhīmaṃ dvādaśabhirviddhvā sātyakiṃ navabhiḥ śaraiḥ | nakulaṃ ca tribhirviddhvā sahadevaṃ ca saptabhiḥ
उन्होंने भीम को बारह और सात्यकि को नौ बाणों से बींधा; नकुल को तीन और सहदेव को सात बाणों से बींधा;
श्लोक 3 (6.106.3)
युधिष्ठिरं द्वादशभिर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् । धृष्टद्युम्नं ततो विद्ध्वा ननाद सुमहाबलः ॥
yudhiṣṭhiraṃ dvādaśabhirbāhvorurasi cārpayat | dhṛṣṭadyumnaṃ tato viddhvā nanāda sumahābalaḥ
युधिष्ठिर की भुजाओं और छाती में बारह बाण धँसा दिए; फिर धृष्टद्युम्न को बींधकर वे महाबली जोर से गरज उठे।
श्लोक 4 (6.106.4)
तं द्वादशाख्यैर्नकुलो माधवश्च त्रिभिः शरैः । धृष्टद्युम्नश्च सप्तत्या भीमसेनश्च सप्तभिः । युधिष्ठिरो द्वादशभिः प्रत्यविध्यत्पितामहम् ॥
taṃ dvādaśākhyairnakulo mādhavaśca tribhiḥ śaraiḥ | dhṛṣṭadyumnaśca saptatyā bhīmasenaśca saptabhiḥ | yudhiṣṭhiro dvādaśabhiḥ pratyavidhyatpitāmaham
बदले में नकुल ने पितामह को बारह बाणों से, सात्यकि (माधव) ने तीन से, धृष्टद्युम्न ने सत्तर से, भीमसेन ने सात से और युधिष्ठिर ने बारह बाणों से बींधा।
श्लोक 5 (6.106.5)
द्रोणस्तु सात्यकिं विद्ध्वा भीमसेनमविध्यत । एकैकं पञ्चभिर्बाणैर्यमदण्डोपमैः शितैः ॥
droṇastu sātyakiṃ viddhvā bhīmasenamavidhyata | ekaikaṃ pañcabhirbāṇairyamadaṇḍopamaiḥ śitaiḥ
द्रोण ने सात्यकि को और फिर भीमसेन को यमदण्ड के समान पाँच-पाँच तीखे बाणों से बींधा।
श्लोक 6 (6.106.6)
तौ च तं प्रत्यविध्येतां त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । तोत्रैरिव महानागं द्रोणं ब्राह्मणपुङ्गवम् ॥
tau ca taṃ pratyavidhyetāṃ tribhistribhirajihmagaiḥ | totrairiva mahānāgaṃ droṇaṃ brāhmaṇapuṅgavam
उन दोनों ने भी बदले में ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोण को तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से वैसे ही बींधा, जैसे अंकुशों से किसी बड़े हाथी को कोंचा जाता है।
श्लोक 7 (6.106.7)
सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः । अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः । संग्रामे नाजहुर्भीष्मं वध्यमानाः शितैः शरैः ॥
sauvīrāḥ kitavāḥ prācyāḥ pratīcyodīcyamālavāḥ | abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ | saṃgrāme nājahurbhīṣmaṃ vadhyamānāḥ śitaiḥ śaraiḥ
सौवीर, कितव, पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी योद्धा, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति — ये सब तीखे बाणों से मारे जाते हुए भी युद्ध में भीष्म का साथ नहीं छोड़ रहे थे।
श्लोक 8 (6.106.8)
तथैवान्ये महीपाला नानादेशसमागताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त विविधायुधपाणयः । तथैव पाण्डवा राजन्परिवव्रुः पितामहम् ॥
tathaivānye mahīpālā nānādeśasamāgatāḥ | pāṇḍavānabhyavartanta vividhāyudhapāṇayaḥ | tathaiva pāṇḍavā rājanparivavruḥ pitāmaham
इसी प्रकार अनेक देशों से आए हुए दूसरे राजा भाँति-भाँति के शस्त्र हाथों में लिये पाण्डवों पर चढ़ आए; और हे राजन्, उसी प्रकार पाण्डवों ने पितामह को घेर लिया।
श्लोक 9 (6.106.9)
स समन्तात्परिवृतो रथौघैरपराजितः । गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः प्रजज्वाल दहन्परान् ॥
sa samantātparivṛto rathaughairaparājitaḥ | gahane'gnirivotsṛṣṭaḥ prajajvāla dahanparān
रथों के समूहों से चारों ओर से घिरे हुए वे अपराजित वीर, घने वन में छोड़ी गई आग की तरह शत्रुओं को जलाते हुए धधक उठे।
श्लोक 10 (6.106.10)
रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगजेन्धनः । शरस्फुलिङ्गो भीष्माग्निर्ददाह क्षत्रियर्षभान् ॥
rathāgnyagāraścāpārcirasiśaktigajendhanaḥ | śarasphuliṅgo bhīṣmāgnirdadāha kṣatriyarṣabhān
भीष्मरूपी अग्नि ने, जिसका रथ ही अग्निशाला था, धनुष ही ज्वाला था, तलवारें, शक्तियाँ और हाथी ही ईंधन थे और बाण ही चिनगारियाँ थे, श्रेष्ठ क्षत्रियों को जला डाला।
श्लोक 11 (6.106.11)
यथा हि सुमहानग्निः कक्षे चरति सानिलः । तथा भीष्मो महाराज दिव्यमस्त्रमुदीरयन् ॥
yathā hi sumahānagniḥ kakṣe carati sānilaḥ | tathā bhīṣmo mahārāja divyamastramudīrayan
हे महाराज, जैसे वायु के साथ कोई बड़ी आग सूखे झाड़-झंखाड़ में फैलती चली जाती है, वैसे ही भीष्म दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हुए
श्लोक 12 (6.106.12)
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्गार्ध्रपक्षैः सुतेजनैः । कर्णिनालीकनाराचैश्छादयामास तद्बलम् ॥
suvarṇapuṅkhairiṣubhirgārdhrapakṣaiḥ sutejanaiḥ | karṇinālīkanārācaiśchādayāmāsa tadbalam
सोने के पुंखों और गिद्ध के पंखों वाले तीखे बाणों से तथा कर्णी, नालीक और नाराच बाणों से उस सेना को ढकने लगे।
श्लोक 13 (6.106.13)
अपातयद्ध्वजांश्चैव रथिनश्च शितैः शरैः । मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् ॥
apātayaddhvajāṃścaiva rathinaśca śitaiḥ śaraiḥ | muṇḍatālavanānīva cakāra sa rathavrajān
उन्होंने तीखे बाणों से ध्वजाओं और रथियों को गिरा दिया और रथों की पंक्तियों को ऐसा कर दिया, मानो ताड़ के वन की चोटियाँ काट दी गई हों।
श्लोक 14 (6.106.14)
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संयुगे । अकरोत्स महाबाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
nirmanuṣyānrathānrājangajānaśvāṃśca saṃyuge | akarotsa mahābāhuḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
हे राजन्, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उन महाबाहु ने उस युद्ध में रथों, हाथियों और घोड़ों को उनके सवारों से रहित कर दिया।
श्लोक 15 (6.106.15)
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । निशम्य सर्वभूतानि समकम्पन्त भारत ॥
tasya jyātalanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | niśamya sarvabhūtāni samakampanta bhārata
हे भारत, वज्र की कड़क जैसी उनकी प्रत्यंचा की टंकार सुनकर सब प्राणी काँप उठे।
श्लोक 16 (6.106.16)
अमोघा ह्यपतन्बाणाः पितुस्ते भरतर्षभ । नासज्जन्त तनुत्रेषु भीष्मचापच्युताः शराः ॥
amoghā hyapatanbāṇāḥ pituste bharatarṣabha | nāsajjanta tanutreṣu bhīṣmacāpacyutāḥ śarāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, आपके पिता के बाण अचूक होकर गिर रहे थे; भीष्म के धनुष से छूटे बाण कवचों में अटकते नहीं थे, उन्हें भेदकर निकल जाते थे।
श्लोक 17 (6.106.17)
हतवीरान्रथान्राजन्संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः । अपश्याम महाराज ह्रियमाणान्रणाजिरे ॥
hatavīrānrathānrājansaṃyuktāñjavanairhayaiḥ | apaśyāma mahārāja hriyamāṇānraṇājire
हे राजन्, हे महाराज, हमने देखा कि जिन रथों के वीर मारे जा चुके थे, वे वेगवान घोड़ों से जुते हुए रणभूमि में इधर-उधर घसीटे जा रहे थे।
श्लोक 18 (6.106.18)
चेदिकाशिकरूषाणां सहस्राणि चतुर्दश । महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः । अपरावर्तिनः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः ॥
cedikāśikarūṣāṇāṃ sahasrāṇi caturdaśa | mahārathāḥ samākhyātāḥ kulaputrāstanutyajaḥ | aparāvartinaḥ sarve suvarṇavikṛtadhvajāḥ
चेदि, काशी और करूष देशों के चौदह हजार प्रसिद्ध महारथी, जो कुलीन थे, प्राण देने को तैयार रहते थे, कभी पीठ नहीं दिखाते थे और जिनकी ध्वजाएँ सोने से सजी थीं,
श्लोक 19 (6.106.19)
संग्रामे भीष्ममासाद्य व्यादितास्यमिवान्तकम् । निमग्नाः परलोकाय सवाजिरथकुञ्जराः ॥
saṃgrāme bhīṣmamāsādya vyāditāsyamivāntakam | nimagnāḥ paralokāya savājirathakuñjarāḥ
युद्ध में मुँह फैलाए काल के समान भीष्म से भिड़कर अपने घोड़ों, रथों और हाथियों सहित परलोक में डूब गए।
श्लोक 20 (6.106.20)
भग्नाक्षोपस्करान्कांश्चिद्भग्नचक्रांश्च भारत । अपश्याम महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ॥
bhagnākṣopaskarānkāṃścidbhagnacakrāṃśca bhārata | apaśyāma mahārāja śataśo'tha sahasraśaḥ
हे भारत, हे महाराज, हमने सैकड़ों और हजारों रथ देखे, जिनमें किसी के धुरे और साज-सामान टूट गए थे और किसी के पहिये टूट गए थे।
श्लोक 21 (6.106.21)
सवरूथै रथैर्भग्नै रथिभिश्च निपातितैः । शरैः सुकवचैश्छिन्नैः पट्टसैश्च विशांपते ॥
savarūthai rathairbhagnai rathibhiśca nipātitaiḥ | śaraiḥ sukavacaiśchinnaiḥ paṭṭasaiśca viśāṃpate
हे प्रजानाथ, आवरणों सहित टूटे रथों, गिराए गए रथियों, बाणों, कटे हुए उत्तम कवचों और पट्टिशों से,
श्लोक 22 (6.106.22)
गदाभिर्भिण्डिपालैश्च निशितैश्च शिलीमुखैः । अनुकर्षैरुपासङ्गैश्चक्रैर्भग्नैश्च मारिष ॥
gadābhirbhiṇḍipālaiśca niśitaiśca śilīmukhaiḥ | anukarṣairupāsaṅgaiścakrairbhagnaiśca māriṣa
हे मान्यवर, गदाओं, भिन्दिपालों और तीखे बाणों से, अनुकर्षों, तरकशों और टूटे पहियों से,
श्लोक 23 (6.106.23)
बाहुभिः कार्मुकैः खड्गैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । तलत्रैरङ्गुलित्रैश्च ध्वजैश्च विनिपातितैः । चापैश्च बहुधा च्छिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी ॥
bāhubhiḥ kārmukaiḥ khaḍgaiḥ śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | talatrairaṅgulitraiśca dhvajaiśca vinipātitaiḥ | cāpaiśca bahudhā cchinnaiḥ samāstīryata medinī
भुजाओं, धनुषों और तलवारों से, कुण्डलों सहित सिरों से, हस्तत्राणों और अंगुलित्राणों से, गिरी हुई ध्वजाओं से तथा अनेक टुकड़ों में टूटे धनुषों से धरती पट गई।
श्लोक 24 (6.106.24)
गजारोहा गजान्राजन्हयांश्च हयसादिनः । अभिपेतुर्द्रुतं तत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥
gajārohā gajānrājanhayāṃśca hayasādinaḥ | abhipeturdrutaṃ tatra śataśo'tha sahasraśaḥ
हे राजन्, हाथीसवार हाथियों पर और घुड़सवार घोड़ों पर सैकड़ों-हजारों की संख्या में तेजी से टूट पड़े।
श्लोक 25 (6.106.25)
यतमानाश्च ते वीरा द्रवमाणान्महारथान् । नाशक्नुवन्वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् ॥
yatamānāśca te vīrā dravamāṇānmahārathān | nāśaknuvanvārayituṃ bhīṣmabāṇaprapīḍitān
वे वीर प्रयत्न करके भी भीष्म के बाणों से पीड़ित होकर भागते हुए महारथियों को रोक न सके।
श्लोक 26 (6.106.26)
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः । अभज्यत महाराज न च द्वौ समधावताम् ॥
mahendrasamavīryeṇa vadhyamānā mahācamūḥ | abhajyata mahārāja na ca dvau samadhāvatām
हे महाराज, महेन्द्र के समान पराक्रमी भीष्म की मार खाकर वह विशाल सेना तितर-बितर हो गई; दो आदमी भी साथ मिलकर नहीं भागे।
श्लोक 27 (6.106.27)
आविद्धरथनागाश्वं पतितध्वजसंकुलम् । अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् ॥
āviddharathanāgāśvaṃ patitadhvajasaṃkulam | anīkaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ hāhābhūtamacetanam
जिसके रथ, हाथी और घोड़े बिंध गए थे और जो गिरी हुई ध्वजाओं से भरी थी, वह पाण्डुपुत्रों की सेना हाहाकार करती हुई चेतनाशून्य-सी हो गई।
श्लोक 28 (6.106.28)
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा । प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात्कृतः ॥
jaghānātra pitā putraṃ putraśca pitaraṃ tathā | priyaṃ sakhāyaṃ cākrande sakhā daivabalātkṛtaḥ
उस कोलाहल में पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मार डाला, और दैव के बल से विवश होकर मित्र ने अपने प्रिय मित्र को मार डाला।
श्लोक 29 (6.106.29)
विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः । प्रकीर्य केशान्धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ॥
vimucya kavacānanye pāṇḍuputrasya sainikāḥ | prakīrya keśāndhāvantaḥ pratyadṛśyanta sarvaśaḥ
पाण्डुपुत्र के दूसरे सैनिक अपने कवच उतार फेंककर बाल बिखेरे सब ओर भागते दिखाई दिए।
श्लोक 30 (6.106.30)
तद्गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथकूबरम् । ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा ॥
tadgokulamivodbhrāntamudbhrāntarathakūbaram | dadṛśe pāṇḍuputrasya sainyamārtasvaraṃ tadā
उस समय पाण्डुपुत्र की सेना बिदककर भागते गायों के झुंड जैसी दिखाई दी; उसके रथों के जुए इधर-उधर भटक रहे थे और वह आर्तनाद कर रही थी।
श्लोक 31 (6.106.31)
प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः । उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम् ॥
prabhajyamānaṃ sainyaṃ tu dṛṣṭvā yādavanandanaḥ | uvāca pārthaṃ bībhatsuṃ nigṛhya rathamuttamam
सेना को टूटते देखकर यादवनन्दन श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को रोका और पार्थ बीभत्सु (अर्जुन) से कहा —
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 32 (6.106.32)
अयं स कालः संप्राप्तः पार्थ यः काङ्क्षितस्तव । प्रहरास्मै नरव्याघ्र भीष्मायाहवशोभिने ॥
ayaṃ sa kālaḥ saṃprāptaḥ pārtha yaḥ kāṅkṣitastava | praharāsmai naravyāghra bhīṣmāyāhavaśobhine
पार्थ, यही वह समय आ पहुँचा है जिसकी तुम्हें प्रतीक्षा थी। हे नरश्रेष्ठ, युद्ध में शोभा पाने वाले इन भीष्म पर प्रहार करो।
श्लोक 33 (6.106.33)
यत्पुरा कथितं वीर त्वया राज्ञां समागमे । विराटनगरे तात सञ्जयस्य समीपतः ॥
yatpurā kathitaṃ vīra tvayā rājñāṃ samāgame | virāṭanagare tāta sañjayasya samīpataḥ
हे वीर, हे तात, तुमने पहले विराटनगर में राजाओं की सभा में संजय के सामने जो कहा था —
श्लोक 34 (6.106.34)
भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । सानुबन्धान्हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति सङ्गरे ॥
bhīṣmadroṇamukhānsarvāndhārtarāṣṭrasya sainikān | sānubandhānhaniṣyāmi ye māṃ yotsyanti saṅgare
"भीष्म और द्रोण आदि दुर्योधन के जितने सैनिक युद्ध में मुझसे लड़ेंगे, उन सबको मैं उनके अनुयायियों सहित मार डालूँगा" —
श्लोक 35 (6.106.35)
इति तत्कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिन्दम । क्षत्रधर्ममनुस्मृत्य युध्यस्व विगतज्वरः ॥
iti tatkuru kaunteya satyaṃ vākyamarindama | kṣatradharmamanusmṛtya yudhyasva vigatajvaraḥ
हे शत्रुदमन कुन्तीपुत्र, अपने उस वचन को सत्य कर दिखाओ। क्षत्रियधर्म का स्मरण करके निश्चिन्त होकर युद्ध करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 36 (6.106.36)
इत्युक्तो वासुदेवेन तिर्यग्दृष्टिरधोमुखः । अकाम इव बीभत्सुरिदं वचनमब्रवीत् ॥
ityukto vāsudevena tiryagdṛṣṭiradhomukhaḥ | akāma iva bībhatsuridaṃ vacanamabravīt
वासुदेव के ऐसा कहने पर बीभत्सु (अर्जुन) ने तिरछी दृष्टि करके और मुँह नीचा किए, मानो अनिच्छा से, यह वचन कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 37 (6.106.37)
अवध्यानां वधं कृत्वा राज्यं वा नरकोत्तरम् । दुःखानि वनवासे वा किं नु मे सुकृतं भवेत् ॥
avadhyānāṃ vadhaṃ kṛtvā rājyaṃ vā narakottaram | duḥkhāni vanavāse vā kiṃ nu me sukṛtaṃ bhavet
जो वध के योग्य नहीं हैं उनका वध करके पाया हुआ राज्य, जिसका परिणाम नरक है, अथवा वनवास के कष्ट — इनमें से मेरे लिए कौन-सा पुण्यकर्म होगा?
श्लोक 38 (6.106.38)
चोदयाश्वान्यतो भीष्मः करिष्ये वचनं तव । पातयिष्यामि दुर्धर्षं भीष्मं कुरुपितामहम् ॥
codayāśvānyato bhīṣmaḥ kariṣye vacanaṃ tava | pātayiṣyāmi durdharṣaṃ bhīṣmaṃ kurupitāmaham
जहाँ भीष्म हैं, वहीं घोड़ों को हाँकिए। मैं आपका कहा करूँगा और कुरुकुल के दुर्जय पितामह भीष्म को गिरा दूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 39 (6.106.39)
स चाश्वान्रजतप्रख्यांश्चोदयामास माधवः । यतो भीष्मस्ततो राजन्दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव ॥
sa cāśvānrajataprakhyāṃścodayāmāsa mādhavaḥ | yato bhīṣmastato rājanduṣprekṣyo raśmivāniva
हे राजन्, तब माधव ने चाँदी जैसे उजले घोड़ों को उधर हाँका जहाँ सूर्य के समान कठिनाई से देखे जा सकने वाले भीष्म खड़े थे।
श्लोक 40 (6.106.40)
ततस्तत्पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत् । दृष्ट्वा पार्थं महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे ॥
tatastatpunarāvṛttaṃ yudhiṣṭhirabalaṃ mahat | dṛṣṭvā pārthaṃ mahābāhuṃ bhīṣmāyodyatamāhave
तब महाबाहु पार्थ को युद्ध में भीष्म से लड़ने को उद्यत देखकर युधिष्ठिर की वह विशाल सेना फिर लौट आई।
श्लोक 41 (6.106.41)
ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठः सिंहवद्विनदन्मुहुः । धनंजयरथं शीघ्रं शरवर्षैरवाकिरत् ॥
tato bhīṣmaḥ kuruśreṣṭhaḥ siṃhavadvinadanmuhuḥ | dhanaṃjayarathaṃ śīghraṃ śaravarṣairavākirat
तब कुरुश्रेष्ठ भीष्म ने सिंह की भाँति बार-बार गरजते हुए शीघ्र ही धनंजय के रथ को बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 42 (6.106.42)
क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः । शरवर्षेण महता न प्राज्ञायत भारत ॥
kṣaṇena sa rathastasya sahayaḥ sahasārathiḥ | śaravarṣeṇa mahatā na prājñāyata bhārata
हे भारत, क्षण भर में ही उनका रथ घोड़ों और सारथि सहित बाणों की उस भारी वर्षा में दिखाई देना बंद हो गया।
श्लोक 43 (6.106.43)
वासुदेवस्त्वसंभ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्वरः । चोदयामास तानश्वान्विनुन्नान्भीष्मसायकैः ॥
vāsudevastvasaṃbhrānto dhairyamāsthāya satvaraḥ | codayāmāsa tānaśvānvinunnānbhīṣmasāyakaiḥ
परन्तु वासुदेव ने बिना घबराए धैर्य धारण करके भीष्म के बाणों से बिंधे उन घोड़ों को शीघ्रता से आगे हाँका।
श्लोक 44 (6.106.44)
ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् । पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा शितैः शरैः ॥
tataḥ pārtho dhanurgṛhya divyaṃ jaladaniḥsvanam | pātayāmāsa bhīṣmasya dhanuśchittvā śitaiḥ śaraiḥ
तब पार्थ ने मेघ के समान गर्जना करने वाला अपना दिव्य धनुष उठाया और तीखे बाणों से भीष्म का धनुष काटकर गिरा दिया।
श्लोक 45 (6.106.45)
स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद्धनुः । निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ॥
sa cchinnadhanvā kauravyaḥ punaranyanmahaddhanuḥ | nimeṣāntaramātreṇa sajyaṃ cakre pitā tava
धनुष कट जाने पर आपके पिता कुरुवंशी भीष्म ने पलक झपकते ही दूसरा विशाल धनुष चढ़ा लिया।
श्लोक 46 (6.106.46)
चकर्ष च ततो दोर्भ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् । अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः । तस्य तत्पूजयामास लाघवं शन्तनोः सुतः ॥
cakarṣa ca tato dorbhyāṃ dhanurjaladaniḥsvanam | athāsya tadapi kruddhaściccheda dhanurarjunaḥ | tasya tatpūjayāmāsa lāghavaṃ śantanoḥ sutaḥ
उन्होंने मेघ के समान गर्जना करने वाले उस धनुष को दोनों भुजाओं से खींचा; परन्तु अर्जुन ने क्रोध में भरकर उसे भी काट डाला। शान्तनुनन्दन भीष्म ने उनकी उस फुर्ती की प्रशंसा की।
श्लोक 47 (6.106.47)
गाङ्गेयस्त्वब्रवीत्पार्थं धन्विश्रेष्ठमरिंदम । साधुसाधु महाबाहो साधु कुन्तीसुतेति च ॥
gāṅgeyastvabravītpārthaṃ dhanviśreṣṭhamariṃdama | sādhusādhu mahābāho sādhu kuntīsuteti ca
हे शत्रुदमन, गंगानन्दन भीष्म ने धनुर्धरों में श्रेष्ठ पार्थ से कहा — "शाबाश, शाबाश, महाबाहु! शाबाश, कुन्तीपुत्र!"
श्लोक 48 (6.106.48)
समाभाष्यैवमपरं प्रगृह्य रुचिरं धनुः । मुमोच समरे भीष्मः शरान्पार्थरथं प्रति ॥
samābhāṣyaivamaparaṃ pragṛhya ruciraṃ dhanuḥ | mumoca samare bhīṣmaḥ śarānpārtharathaṃ prati
इस प्रकार उनसे कहकर भीष्म ने दूसरा सुन्दर धनुष उठाया और युद्ध में पार्थ के रथ पर बाण छोड़ने लगे।
श्लोक 49 (6.106.49)
अदर्शयद्वासुदेवो हययाने परं बलम् । मोघान्कुर्वञ्शरांस्तस्य मण्डलानि निदर्शयन् ॥
adarśayadvāsudevo hayayāne paraṃ balam | moghānkurvañśarāṃstasya maṇḍalāni nidarśayan
वासुदेव ने रथ को मण्डलाकार घुमाकर भीष्म के बाणों को व्यर्थ करते हुए घोड़े हाँकने की अपनी परम कुशलता दिखाई।
श्लोक 50 (6.106.50)
शुशुभाते नरव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ । गोवृषाविव संरब्धौ विषाणोल्लिखिताङ्कितौ ॥
śuśubhāte naravyāghrau tau bhīṣmaśaravikṣatau | govṛṣāviva saṃrabdhau viṣāṇollikhitāṅkitau
भीष्म के बाणों से घायल वे दोनों नरश्रेष्ठ सींगों की खरोंचों से चिह्नित दो क्रुद्ध साँड़ों के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 51 (6.106.51)
वासुदेवस्तु संप्रेक्ष्य पार्थस्य मृदुयुद्धताम् । भीष्मं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि ॥
vāsudevastu saṃprekṣya pārthasya mṛduyuddhatām | bhīṣmaṃ ca śaravarṣāṇi sṛjantamaniśaṃ yudhi
परन्तु वासुदेव ने देखा कि पार्थ नरमी से युद्ध कर रहे हैं और भीष्म युद्ध में लगातार बाणों की वर्षा कर रहे हैं,
श्लोक 52 (6.106.52)
प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनयोः । वरान्वरान्विनिघ्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् ॥
pratapantamivādityaṃ madhyamāsādya senayoḥ | varānvarānvinighnantaṃ pāṇḍuputrasya sainikān
दोनों सेनाओं के बीच पहुँचकर सूर्य की भाँति तप रहे हैं और पाण्डुपुत्र के चुन-चुनकर श्रेष्ठ सैनिकों को मार रहे हैं,
श्लोक 53 (6.106.53)
युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे बले । नामृष्यत महाबाहुर्माधवः परवीरहा ॥
yugāntamiva kurvāṇaṃ bhīṣmaṃ yaudhiṣṭhire bale | nāmṛṣyata mahābāhurmādhavaḥ paravīrahā
और युधिष्ठिर की सेना में मानो प्रलय-सा मचा रहे हैं — यह देखकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले महाबाहु माधव इसे सहन न कर सके।
श्लोक 54 (6.106.54)
उत्सृज्य रजतप्रख्यान्हयान्पार्थस्य मारिष । वासुदेवस्ततो योगी प्रचस्कन्द महारथात् ॥
utsṛjya rajataprakhyānhayānpārthasya māriṣa | vāsudevastato yogī pracaskanda mahārathāt
हे मान्यवर, तब योगेश्वर वासुदेव पार्थ के चाँदी जैसे उजले घोड़ों की रास छोड़कर उस विशाल रथ से कूद पड़े।
श्लोक 55 (6.106.55)
अभिदुद्राव भीष्मं स भुजप्रहरणो बली । प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवद्विनदन्मुहुः ॥
abhidudrāva bhīṣmaṃ sa bhujapraharaṇo balī | pratodapāṇistejasvī siṃhavadvinadanmuhuḥ
वे बलवान और तेजस्वी, केवल भुजाओं को ही शस्त्र बनाए, हाथ में चाबुक लिये, सिंह की भाँति बार-बार गरजते हुए भीष्म की ओर दौड़े।
श्लोक 56 (6.106.56)
दारयन्निव पद्भ्यां स जगतीं जगदीश्वरः । क्रोधताम्रेक्षणः कृष्णो जिघांसुरमितद्युतिः ॥
dārayanniva padbhyāṃ sa jagatīṃ jagadīśvaraḥ | krodhatāmrekṣaṇaḥ kṛṣṇo jighāṃsuramitadyutiḥ
जगत् के स्वामी, अपार तेज वाले श्रीकृष्ण की आँखें क्रोध से ताँबे जैसी लाल हो गई थीं; वे वध करने को उतावले थे और मानो अपने पैरों से धरती को फाड़ रहे थे,
श्लोक 57 (6.106.57)
ग्रसन्निव च तेजांसि तावकानां महाहवे । दृष्ट्वा माधवमाक्रन्दे भीष्मायोद्यतमन्तिके ॥
grasanniva ca tejāṃsi tāvakānāṃ mahāhave | dṛṣṭvā mādhavamākrande bhīṣmāyodyatamantike
और मानो उस महायुद्ध में आपके योद्धाओं के तेज को निगल रहे थे। रणभूमि में माधव को भीष्म पर झपटते हुए निकट देखकर
श्लोक 58 (6.106.58)
हतो भीष्मो हतो भीष्म इति तत्रस्म सैनिकाः । क्रोशन्तः प्राद्रवन्सर्वे वासुदेवभयातुराः ॥
hato bhīṣmo hato bhīṣma iti tatrasma sainikāḥ | krośantaḥ prādravansarve vāsudevabhayāturāḥ
वहाँ के सब सैनिक "भीष्म मारे गए, भीष्म मारे गए" चिल्लाते हुए वासुदेव के भय से व्याकुल होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 59 (6.106.59)
पीतकौशेयसंवीतो मणिश्यामो जनार्दनः । शुशुभे विद्रवन्भीष्मं विद्युन्माली यथाम्बुदः ॥
pītakauśeyasaṃvīto maṇiśyāmo janārdanaḥ | śuśubhe vidravanbhīṣmaṃ vidyunmālī yathāmbudaḥ
पीला रेशमी वस्त्र पहने, नीलमणि के समान श्यामवर्ण जनार्दन भीष्म की ओर दौड़ते हुए बिजली की माला पहने बादल के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 60 (6.106.60)
स सिंह इव मातङ्गं यूथर्षभ इवर्षभम् । अभिदुद्राव वेगेन विनदन्यादवर्षभः ॥
sa siṃha iva mātaṅgaṃ yūtharṣabha ivarṣabham | abhidudrāva vegena vinadanyādavarṣabhaḥ
जैसे सिंह हाथी पर और झुंड का सरदार साँड़ दूसरे साँड़ पर झपटता है, वैसे ही यादवश्रेष्ठ गरजते हुए वेग से उन पर झपटे।
श्लोक 61 (6.106.61)
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य पुण्डरीकाक्षमाहवे । असंभ्रमं रणे भीष्मो विचकर्ष महद्धनुः । उवाच चैव गोविन्दमसंभ्रान्तेन चेतसा ॥
tamāpatantaṃ saṃprekṣya puṇḍarīkākṣamāhave | asaṃbhramaṃ raṇe bhīṣmo vicakarṣa mahaddhanuḥ | uvāca caiva govindamasaṃbhrāntena cetasā
कमलनयन श्रीकृष्ण को युद्ध में अपनी ओर आते देखकर भीष्म ने बिना घबराए अपना विशाल धनुष खींचा और शान्त चित्त से गोविन्द से कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 62 (6.106.62)
एह्येहि पुण्डरीकाक्ष देवदेव नमोऽस्तु ते । मामद्य सात्वतश्रेष्ठ पातयस्व महाहवे ॥
ehyehi puṇḍarīkākṣa devadeva namo'stu te | māmadya sātvataśreṣṭha pātayasva mahāhave
आइए, आइए, हे कमलनयन! हे देवाधिदेव, आपको नमस्कार है। हे सात्वतश्रेष्ठ, आज इस महायुद्ध में मुझे मार गिराइए।
श्लोक 63 (6.106.63)
त्वया हि देव संग्रामे हतस्यापि ममानघ । श्रेय एव परं कृष्ण लोके भवति सर्वतः ॥
tvayā hi deva saṃgrāme hatasyāpi mamānagha | śreya eva paraṃ kṛṣṇa loke bhavati sarvataḥ
क्योंकि हे देव, हे निष्पाप कृष्ण, युद्ध में आपके हाथों मारे जाने पर भी संसार में हर प्रकार से मेरा परम कल्याण ही होगा।
श्लोक 64 (6.106.64)
संभावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संयुगे । प्रहरस्व यथेष्टं वै दासोऽस्मि तव चानघ ॥
saṃbhāvito'smi govinda trailokyenādya saṃyuge | praharasva yatheṣṭaṃ vai dāso'smi tava cānagha
हे गोविन्द, आज इस युद्ध में तीनों लोकों ने मुझे सम्मान दिया है। हे निष्पाप, जैसे चाहें प्रहार कीजिए; मैं आपका दास हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 65 (6.106.65)
अन्वगेव ततः पार्थः समभिद्रुत्य केशवम् । निजग्राह महाबाहुर्बाहुभ्यां परिगृह्य वै ॥
anvageva tataḥ pārthaḥ samabhidrutya keśavam | nijagrāha mahābāhurbāhubhyāṃ parigṛhya vai
तब महाबाहु पार्थ ने पीछे-पीछे दौड़कर केशव को जा पकड़ा और दोनों भुजाओं में भरकर उन्हें थाम लिया।
श्लोक 66 (6.106.66)
निगृह्यमाणः पार्थेन कृष्णो राजीवलोचनः । जगामैवैनमादाय वेगेन पुरुषोत्तमः ॥
nigṛhyamāṇaḥ pārthena kṛṣṇo rājīvalocanaḥ | jagāmaivainamādāya vegena puruṣottamaḥ
पार्थ के पकड़ लेने पर भी कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उन्हें साथ घसीटते हुए वेग से आगे बढ़ते ही गए।
श्लोक 67 (6.106.67)
पार्थस्तु विष्टभ्य बलाच्चरणौ परवीरहा । निजग्राह हृषीकेशं कथंचिद्दशमे पदे ॥
pārthastu viṣṭabhya balāccaraṇau paravīrahā | nijagrāha hṛṣīkeśaṃ kathaṃciddaśame pade
परन्तु शत्रुवीरों का संहार करने वाले पार्थ ने बलपूर्वक अपने पैर जमाकर किसी प्रकार दसवें पग पर हृषीकेश को रोक लिया।
श्लोक 68 (6.106.68)
तत एवमुवाचार्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणम् । निःश्वसन्तं यथा नागमर्जुनः प्रणयात्सखा ॥
tata evamuvācārtaḥ krodhaparyākulekṣaṇam | niḥśvasantaṃ yathā nāgamarjunaḥ praṇayātsakhā
तब उनके स्नेही सखा अर्जुन ने व्यथित होकर, सर्प की भाँति फुफकारते हुए और क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 69 (6.106.69)
निवर्तस्व महाबाहो नानृतं कर्तुमर्हसि । यत्त्वया कथितं पूर्वं न योत्स्यामीति केशव ॥
nivartasva mahābāho nānṛtaṃ kartumarhasi | yattvayā kathitaṃ pūrvaṃ na yotsyāmīti keśava
हे महाबाहु, लौट चलिए; आपको अपनी बात झूठी नहीं करनी चाहिए। केशव, आपने पहले ही कहा था कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा।"
श्लोक 70 (6.106.70)
मिथ्यावादीति लोकास्त्वां कथयिष्यन्ति माधव । ममैष भारः सर्वो हि हनिष्यामि पितामहम् ॥
mithyāvādīti lokāstvāṃ kathayiṣyanti mādhava | mamaiṣa bhāraḥ sarvo hi haniṣyāmi pitāmaham
माधव, लोग आपको मिथ्यावादी कहेंगे। यह सारा भार मेरा है; पितामह को मैं मारूँगा।
श्लोक 71 (6.106.71)
शपे केशव शस्त्रेण सत्येन सुकृतेन च । अन्तं यथा गमिष्यामि शत्रूणां शत्रुसूदन ॥
śape keśava śastreṇa satyena sukṛtena ca | antaṃ yathā gamiṣyāmi śatrūṇāṃ śatrusūdana
हे शत्रुसूदन केशव, मैं अपने शस्त्र की, सत्य की और अपने पुण्यकर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं शत्रुओं का अन्त कर दूँगा।
श्लोक 72 (6.106.72)
अद्यैव पश्य दुर्धर्षं पात्यमानं महारथम् । तारापतिमिवापूर्णमन्तकाले यदृच्छया ॥
adyaiva paśya durdharṣaṃ pātyamānaṃ mahāratham | tārāpatimivāpūrṇamantakāle yadṛcchayā
आज ही देखिए, उस दुर्जय महारथी को मैं ऐसे गिरा दूँगा जैसे अपनी अवधि पूरी होने पर क्षीण चन्द्रमा अपने-आप अस्त हो जाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 73 (6.106.73)
माधवस्तु वचः श्रुत्वा फल्गुनस्य महात्मनः । अभवत्परमप्रीतो दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् । न किंचिदुक्त्वा सक्रोध आरुरोह रथं पुनः ॥
mādhavastu vacaḥ śrutvā phalgunasya mahātmanaḥ | abhavatparamaprīto dṛṣṭvā pārthasya vikramam | na kiṃciduktvā sakrodha āruroha rathaṃ punaḥ
महात्मा फाल्गुन (अर्जुन) के ये वचन सुनकर और पार्थ का पराक्रम देखकर माधव मन में अत्यन्त प्रसन्न हुए; फिर भी बिना कुछ कहे, क्रोध में भरे हुए ही, वे पुनः रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 74 (6.106.74)
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ भीष्मः शान्तनवः पुनः । ववर्ष शरवर्षेण मेघो वृष्ट्या यथाऽचलौ ॥
tau rathasthau naravyāghrau bhīṣmaḥ śāntanavaḥ punaḥ | vavarṣa śaravarṣeṇa megho vṛṣṭyā yathā'calau
शान्तनुनन्दन भीष्म ने रथ पर बैठे उन दोनों नरश्रेष्ठों पर फिर से बाणों की ऐसी वर्षा की, जैसे बादल दो पर्वतों पर जल बरसाता है।
श्लोक 75 (6.106.75)
प्राणानादत्त योधानां पिता देवव्रतस्तव । गभस्तिभिरिवादित्यस्तेजांसि शिशिरात्यये ॥
prāṇānādatta yodhānāṃ pitā devavratastava | gabhastibhirivādityastejāṃsi śiśirātyaye
आपके पिता देवव्रत योद्धाओं के प्राण वैसे ही हरने लगे, जैसे शिशिर ऋतु के अन्त में सूर्य अपनी किरणों से सबका तेज खींच लेता है।
श्लोक 76 (6.106.76)
यथा कुरूणां सैन्यानि बभञ्जुर्युधि पाण्डवाः । तथा पाण्डवसैन्यानि बभञ्ज युधि ते पिता ॥
yathā kurūṇāṃ sainyāni babhañjuryudhi pāṇḍavāḥ | tathā pāṇḍavasainyāni babhañja yudhi te pitā
जिस प्रकार पाण्डवों ने युद्ध में कौरवों की सेनाओं को तोड़ा था, उसी प्रकार आपके पिता ने युद्ध में पाण्डवों की सेनाओं को तोड़ डाला।
श्लोक 77 (6.106.77)
हतविद्रुतसैन्यास्तु निरुत्साहा विचेतसः । निरीक्षितुं न शेकुस्ते भीष्ममप्रतिमं रणे ॥
hatavidrutasainyāstu nirutsāhā vicetasaḥ | nirīkṣituṃ na śekuste bhīṣmamapratimaṃ raṇe
जिनकी सेनाएँ मारी जा चुकी थीं और भाग खड़ी हुई थीं, वे उत्साहहीन और हतचेत होकर युद्ध में अनुपम भीष्म की ओर देख भी न सके,
श्लोक 78 (6.106.78)
मध्यं गतमिवादित्यं प्रतपन्तं स्वतेजसा । ते वध्यमाना भीष्मेण शतशोऽथ सहस्रशः ॥
madhyaṃ gatamivādityaṃ pratapantaṃ svatejasā | te vadhyamānā bhīṣmeṇa śataśo'tha sahasraśaḥ
जो दोपहर के सूर्य की भाँति अपने तेज से तप रहे थे। भीष्म के हाथों सैकड़ों और हजारों की संख्या में मारे जाते हुए
श्लोक 79 (6.106.79)
कुर्वाणं समरे कर्माण्यतिमानुषविक्रमम् । वीक्षांचक्रुर्महाराज पाण्डवा भयपीडिताः ॥
kurvāṇaṃ samare karmāṇyatimānuṣavikramam | vīkṣāṃcakrurmahārāja pāṇḍavā bhayapīḍitāḥ
हे महाराज, भय से पीड़ित पाण्डव युद्ध में अलौकिक पराक्रम के कर्म करते हुए उन भीष्म को बस देखते ही रह गए।
श्लोक 80 (6.106.80)
तथा पाण्डवसैन्यानि द्राव्यमाणानि भारत । त्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः पङ्कगता इव । पिपीलिका इव क्षुण्णा दुर्बला बलिना रणे ॥
tathā pāṇḍavasainyāni drāvyamāṇāni bhārata | trātāraṃ nādhyagacchanta gāvaḥ paṅkagatā iva | pipīlikā iva kṣuṇṇā durbalā balinā raṇe
हे भारत, इस प्रकार खदेड़ी जाती हुई पाण्डवों की सेनाओं को कोई रक्षक न मिला; वे दलदल में फँसी गायों की तरह और युद्ध में बलवान द्वारा कुचली गई दुर्बल चींटियों की तरह असहाय हो गईं।
श्लोक 81 (6.106.81)
तथैव योधा राजेन्द्र भीष्मेणामित्रघातिना । समरे मृदिताः सर्वे पाण्डवाः सह सृञ्जयैः ॥
tathaiva yodhā rājendra bhīṣmeṇāmitraghātinā | samare mṛditāḥ sarve pāṇḍavāḥ saha sṛñjayaiḥ
हे राजेन्द्र, इसी प्रकार शत्रुघाती भीष्म ने युद्ध में सृंजयों सहित पाण्डवों के सब योद्धाओं को रौंद डाला।
श्लोक 82 (6.106.82)
महारथं भारत दुष्प्रकम्पं । शरौघिणं प्रतपन्तं नरेन्द्रान् । भीष्मं न शेकुः प्रतिवीक्षितुं ते । शरार्चिषं सूर्यमिवातपन्तम् ॥
mahārathaṃ bhārata duṣprakampaṃ | śaraughiṇaṃ pratapantaṃ narendrān | bhīṣmaṃ na śekuḥ prativīkṣituṃ te | śarārciṣaṃ sūryamivātapantam
हे भारत, वे उन अडिग महारथी भीष्म की ओर देख भी न सके, जो बाणों की बाढ़ बहाते हुए राजाओं को तपा रहे थे और बाणरूपी किरणों से तपते सूर्य के समान जान पड़ते थे।
श्लोक 83 (6.106.83)
विमृद्नतस्तस्य तु पाण्डुसेना- । मस्तं जगामाथ सहस्ररश्मिः । ततो हि भीष्मः सबलान्ससैन्या- । न्न्यवारयत्पाण्डुसुताञ्शरौघैः ॥
vimṛdnatastasya tu pāṇḍusenā- | mastaṃ jagāmātha sahasraraśmiḥ | tato hi bhīṣmaḥ sabalānsasainyā- | nnyavārayatpāṇḍusutāñśaraughaiḥ
जब वे पाण्डवों की सेना को इस प्रकार रौंद रहे थे, तभी सहस्ररश्मि सूर्य अस्त हो गए; और तब भीष्म ने अपने बाणों की बाढ़ से बल और सेना सहित पाण्डुपुत्रों को रोक दिया।
श्लोक 84 (6.106.84)
ततो बलानां श्रमकर्शितानां । मनोऽवहारं प्रति संबभूव ॥
tato balānāṃ śramakarśitānāṃ | mano'vahāraṃ prati saṃbabhūva
तब थकान से चूर हुई सेनाओं का मन युद्ध से लौटने की ओर हो गया।