भीष्म पर्व · अध्याय 107
युधिष्ठिर का भीष्म से उनके वध का उपाय पूछना
नौवें दिन की सन्ध्या को, भीष्म द्वारा अपनी सेना के छिन्न-भिन्न हो जाने पर, युधिष्ठिर निराश होकर वन चले जाने की बात करते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें सान्त्वना देते हैं और स्वयं भीष्म को मारने का प्रस्ताव रखते हैं, यद्यपि अर्जुन इसकी प्रतिज्ञा कर चुके हैं; युधिष्ठिर श्रीकृष्ण की युद्ध न करने की प्रतिज्ञा तुड़वाना नहीं चाहते, और सुझाते हैं कि भीष्म से ही उनकी पराजय का उपाय पूछा जाए। पाण्डव और श्रीकृष्ण बिना शस्त्रों के भीष्म के पास जाते हैं; भीष्म बताते हैं कि वे किसी स्त्री से या पहले स्त्री रह चुके व्यक्ति से युद्ध नहीं करेंगे, इसलिए अर्जुन शिखण्डी को आगे करके उन पर आक्रमण करें। अपने पालनहार पितामह को मारने के विचार से अर्जुन दुखी होते हैं, पर श्रीकृष्ण उन्हें क्षत्रिय-धर्म का स्मरण कराते हैं, और पाण्डव इसी उपाय का निश्चय करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.107.1)
युध्यतामेव तेषां तु भास्करेऽस्तमुपागते । सन्ध्या समभवद्धोरा नापश्याम ततो रणम् ॥
yudhyatāmeva teṣāṃ tu bhāskare'stamupāgate | sandhyā samabhavaddhorā nāpaśyāma tato raṇam
वे युद्ध कर ही रहे थे कि सूर्य अस्त हो गया। भयंकर सन्ध्या घिर आई और उसके बाद हमें युद्ध दिखाई देना बन्द हो गया।
श्लोक 2 (6.107.2)
ततो युधिष्ठिरो राजा सन्ध्यां संदृश्य भारत । वध्यमानं च भीष्मेण त्यक्तास्त्रं भयविह्वलम् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā sandhyāṃ saṃdṛśya bhārata | vadhyamānaṃ ca bhīṣmeṇa tyaktāstraṃ bhayavihvalam
तब, हे भारत, राजा युधिष्ठिर ने देखा कि सन्ध्या हो गई है, और उनकी सेना भीष्म के हाथों मारी जा रही है, अस्त्र-शस्त्र छोड़ चुकी है और भय से व्याकुल है;
श्लोक 3 (6.107.3)
स्वसैन्यं च परावृत्तं पलायनपरायणम् । भीष्मं च युधि संरब्धं पीडयन्तं महारथम् ॥
svasainyaṃ ca parāvṛttaṃ palāyanaparāyaṇam | bhīṣmaṃ ca yudhi saṃrabdhaṃ pīḍayantaṃ mahāratham
उनकी अपनी सेना पीठ फेरकर केवल भागने में लगी है, और महारथी भीष्म क्रोध में भरकर युद्ध में उसे पीड़ित कर रहे हैं;
श्लोक 4 (6.107.4)
सोमकांश्च जितान्दृष्ट्वा निरुत्साहान्महारथान् । निशामुखं च संप्रेक्ष्य घोररूपं भयानकम् । चिन्तयित्वा ततो राज्ञामपहारमकारयत् ॥
somakāṃśca jitāndṛṣṭvā nirutsāhānmahārathān | niśāmukhaṃ ca saṃprekṣya ghorarūpaṃ bhayānakam | cintayitvā tato rājñāmapahāramakārayat
सोमकों को पराजित और उनके महारथियों को हतोत्साह देखकर, तथा भयंकर और डरावनी रात्रि का आगमन देखकर, उन्होंने विचार किया और राजाओं को युद्ध से लौटा लिया।
श्लोक 5 (6.107.5)
ततोऽपहारं सैन्यानां चक्रे राजा युधिष्ठिरः । तथैव तव सैन्यानामपहारो ह्यभूत्तदा ॥
tato'pahāraṃ sainyānāṃ cakre rājā yudhiṣṭhiraḥ | tathaiva tava sainyānāmapahāro hyabhūttadā
इस प्रकार राजा युधिष्ठिर ने अपनी सेनाओं को लौटा लिया, और उसी प्रकार उस समय आपकी सेनाएँ भी लौट गईं।
श्लोक 6 (6.107.6)
ततोऽपहारं सैन्यानां कृत्वा तत्र महारथाः । न्यविशन्त कुरुश्रेष्ठ संग्रामे क्षतविक्षताः ॥
tato'pahāraṃ sainyānāṃ kṛtvā tatra mahārathāḥ | nyaviśanta kuruśreṣṭha saṃgrāme kṣatavikṣatāḥ
हे कुरुश्रेष्ठ, सेनाओं को लौटाकर वे महारथी, जो युद्ध में घायल और क्षत-विक्षत हो चुके थे, अपने-अपने शिविरों में जा ठहरे।
श्लोक 7 (6.107.7)
भीष्मस्य समरे कर्म चिन्तयानास्तु पाण्डवाः । नालभन्त तदा शान्तिं भीष्मबाणप्रपीडिताः ॥
bhīṣmasya samare karma cintayānāstu pāṇḍavāḥ | nālabhanta tadā śāntiṃ bhīṣmabāṇaprapīḍitāḥ
पाण्डव युद्ध में भीष्म के पराक्रम पर विचार करते रहे; भीष्म के बाणों से पीड़ित होने के कारण उस समय उन्हें शान्ति नहीं मिली।
श्लोक 8 (6.107.8)
भीष्मोऽपि समरे जित्वा पाण्डवान्सह सृञ्जयान् । पूज्यमानस्तव सुतैर्वन्द्यमानश्च भारत ॥
bhīṣmo'pi samare jitvā pāṇḍavānsaha sṛñjayān | pūjyamānastava sutairvandyamānaśca bhārata
हे भारत, भीष्म भी युद्ध में सृञ्जयों सहित पाण्डवों को जीतकर, आपके पुत्रों द्वारा पूजित और वन्दित होते हुए,
श्लोक 9 (6.107.9)
न्यविशत्कुरुभिः सार्धं हृष्टरूपैः समन्ततः । ततो रात्रिः समभवत्सर्वभूतप्रमोहिनी ॥
nyaviśatkurubhiḥ sārdhaṃ hṛṣṭarūpaiḥ samantataḥ | tato rātriḥ samabhavatsarvabhūtapramohinī
चारों ओर से प्रसन्न कुरुओं के साथ अपने शिविर में गए। तब समस्त प्राणियों को मोहित करने वाली रात्रि आ गई।
श्लोक 10 (6.107.10)
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा वृष्णिभिः सह । सृञ्जयाश्च दुराधर्षा मन्त्राय समुपाविशन् ॥
tasminrātrimukhe ghore pāṇḍavā vṛṣṇibhiḥ saha | sṛñjayāśca durādharṣā mantrāya samupāviśan
उस भयंकर रात्रि के आरम्भ में पाण्डव, वृष्णियों और दुर्धर्ष सृञ्जयों के साथ, मन्त्रणा करने बैठे।
श्लोक 11 (6.107.11)
आत्मनिःश्रेयसं सर्वे प्राप्तकालं महाबलाः । मन्त्रयामासुरव्यग्रा मन्त्रनिश्चयकोविदाः ॥
ātmaniḥśreyasaṃ sarve prāptakālaṃ mahābalāḥ | mantrayāmāsuravyagrā mantraniścayakovidāḥ
मन्त्रणा द्वारा निश्चय करने में कुशल वे सभी महाबली शान्त चित्त से विचार करने लगे कि उनके लिए क्या कल्याणकारी है और इस समय क्या करना उचित है।
श्लोक 12 (6.107.12)
ततो युधिष्ठिरो राजा मन्त्रयित्वा चिरं नृप । वासुदेवं समुद्वीक्ष्य वचनं चेदमाददे ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā mantrayitvā ciraṃ nṛpa | vāsudevaṃ samudvīkṣya vacanaṃ cedamādade
हे नरेश, तब राजा युधिष्ठिर ने बहुत देर तक विचार करने के बाद वासुदेव की ओर देखकर यह बात कही:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (6.107.13)
कृष्ण पश्य महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् । गजं नलवनानीव विमृद्नन्तं बलं मम ॥
kṛṣṇa paśya mahātmānaṃ bhīṣmaṃ bhīmaparākramam | gajaṃ nalavanānīva vimṛdnantaṃ balaṃ mama
कृष्ण, भयानक पराक्रम वाले महात्मा भीष्म को देखिए; जैसे हाथी नरकुलों के वन को रौंद डालता है, वैसे ही वे मेरी सेना को रौंद रहे हैं।
श्लोक 14 (6.107.14)
न चैवैनं महात्मानमुत्सहामो निरीक्षितुम् । लेलिह्यमानं सैन्येषु प्रवृद्धमिव पावकम् ॥
na caivainaṃ mahātmānamutsahāmo nirīkṣitum | lelihyamānaṃ sainyeṣu pravṛddhamiva pāvakam
हम उन महात्मा की ओर देखने का साहस भी नहीं कर पाते; वे भड़की हुई आग के समान हमारी सेनाओं को चाटते जा रहे हैं।
श्लोक 15 (6.107.15)
यथा घोरो महानागस्तक्षको वै विषोल्बणः । तथा भीष्मो रणे क्रुद्धस्तीक्ष्णशस्त्रः प्रतापवान् ॥
yathā ghoro mahānāgastakṣako vai viṣolbaṇaḥ | tathā bhīṣmo raṇe kruddhastīkṣṇaśastraḥ pratāpavān
जैसे भयंकर महानाग तक्षक तीव्र विष से भरा होता है, वैसे ही युद्ध में क्रुद्ध भीष्म तीखे शस्त्रों वाले और प्रतापी हैं।
श्लोक 16 (6.107.16)
गृहीतचापः समरे प्रमुञ्चन्निशिताञ्छरान् । शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च देवराट् ॥
gṛhītacāpaḥ samare pramuñcanniśitāñcharān | śakyo jetuṃ yamaḥ kruddho vajrapāṇiśca devarāṭ
जब वे युद्ध में धनुष उठाकर तीखे बाण छोड़ते हैं, तब क्रुद्ध यमराज को जीता जा सकता है, वज्रधारी देवराज इन्द्र को भी,
श्लोक 17 (6.107.17)
वरुणः पाशभृच्चापि सगदो वा धनेश्वरः । न तु भीष्मः सुसंक्रुद्धः शक्यो जेतुं महाहवे ॥
varuṇaḥ pāśabhṛccāpi sagado vā dhaneśvaraḥ | na tu bhīṣmaḥ susaṃkruddhaḥ śakyo jetuṃ mahāhave
पाशधारी वरुण को भी, अथवा गदाधारी धनपति कुबेर को भी; परन्तु अत्यन्त क्रुद्ध भीष्म को महायुद्ध में नहीं जीता जा सकता।
श्लोक 18 (6.107.18)
सोऽहमेवं गते कृष्ण निमग्नः शोकसागरे । आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद्भीष्ममासाद्य संयुगे ॥
so'hamevaṃ gate kṛṣṇa nimagnaḥ śokasāgare | ātmano buddhidaurbalyādbhīṣmamāsādya saṃyuge
कृष्ण, स्थिति ऐसी हो जाने पर मैं शोक के सागर में डूब गया हूँ, क्योंकि अपनी बुद्धि की दुर्बलता से मैं युद्ध में भीष्म से जा भिड़ा।
श्लोक 19 (6.107.19)
वनं यास्यामि दुर्धर्ष श्रेयो वै तत्र मे गतम् । न युद्धं रोचते कृष्ण हन्ति भीष्मो हि नः सदा ॥
vanaṃ yāsyāmi durdharṣa śreyo vai tatra me gatam | na yuddhaṃ rocate kṛṣṇa hanti bhīṣmo hi naḥ sadā
हे दुर्धर्ष, मैं वन को चला जाऊँगा; मेरा कल्याण वहीं है। कृष्ण, मुझे युद्ध अच्छा नहीं लगता, क्योंकि भीष्म सदा हमारा संहार करते रहते हैं।
श्लोक 20 (6.107.20)
यथा प्रज्वलितं वह्निं पतङ्गः समभिद्रवन् । एकतो मृत्युमभ्येति तथाऽहं भीष्ममेयिवान् ॥
yathā prajvalitaṃ vahniṃ pataṅgaḥ samabhidravan | ekato mṛtyumabhyeti tathā'haṃ bhīṣmameyivān
जैसे पतंगा जलती हुई आग पर टूट पड़ता है और केवल मृत्यु को प्राप्त होता है, वैसे ही मैं भीष्म से जा भिड़ा हूँ।
श्लोक 21 (6.107.21)
क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी । भ्रातरश्चैव मे शूराः सायकैर्भृशपीडिताः ॥
kṣayaṃ nīto'smi vārṣṇeya rājyahetoḥ parākramī | bhrātaraścaiva me śūrāḥ sāyakairbhṛśapīḍitāḥ
हे वार्ष्णेय, राज्य के लिए पराक्रम दिखाते हुए मैं विनाश तक पहुँचा दिया गया हूँ, और मेरे वीर भाई भी बाणों से अत्यन्त पीड़ित हैं।
श्लोक 22 (6.107.22)
मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद्राज्यभ्रष्टा वनं गताः । परिक्लिष्टा तथा कृष्णा मत्कृते मधुसूदन ॥
matkṛte bhrātṛsauhārdādrājyabhraṣṭā vanaṃ gatāḥ | parikliṣṭā tathā kṛṣṇā matkṛte madhusūdana
हे मधुसूदन, मेरे कारण, भ्रातृ-प्रेम से, वे राज्य से वंचित होकर वन में गए; और मेरे ही कारण कृष्णा (द्रौपदी) ने भी क्लेश सहा।
श्लोक 23 (6.107.23)
जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् । जीवितस्याद्य शेषेण चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥
jīvitaṃ bahu manye'haṃ jīvitaṃ hyadya durlabham | jīvitasyādya śeṣeṇa cariṣye dharmamuttamam
मैं जीवन को बहुत मूल्यवान मानता हूँ, और आज जीवन दुर्लभ हो गया है। अपने जीवन के शेष भाग में मैं उत्तम धर्म का आचरण करूँगा।
श्लोक 24 (6.107.24)
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सह केशव । स्वधर्मस्याविरोधेन हितं व्याहर केशव ॥
yadi te'hamanugrāhyo bhrātṛbhiḥ saha keśava | svadharmasyāvirodhena hitaṃ vyāhara keśava
हे केशव, यदि मैं अपने भाइयों सहित आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो हे केशव, मेरे स्वधर्म के विरुद्ध न जाने वाला जो हितकर उपाय हो, वह बताइए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (6.107.25)
एवं श्रुत्वा वचस्तस्य कारुण्याद्बहुविस्तरम् । प्रत्युवाच ततः कृष्णः सान्त्वयानो युधिष्ठिरम् ॥
evaṃ śrutvā vacastasya kāruṇyādbahuvistaram | pratyuvāca tataḥ kṛṣṇaḥ sāntvayāno yudhiṣṭhiram
उनके ये विस्तृत वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने करुणावश युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए उत्तर दिया:
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 26 (6.107.26)
धर्मपुत्र विषादं त्वं मा कृथाः सत्यसंगर । यस्य ते भ्रातरः शूरा दुर्जयाः शत्रुसूदनाः ॥
dharmaputra viṣādaṃ tvaṃ mā kṛthāḥ satyasaṃgara | yasya te bhrātaraḥ śūrā durjayāḥ śatrusūdanāḥ
हे सत्यप्रतिज्ञ धर्मपुत्र, आप विषाद न करें; आपके भाई तो शूरवीर, दुर्जय और शत्रुओं का संहार करने वाले हैं:
श्लोक 27 (6.107.27)
अर्जुनो भीमसेनश्च वाय्वग्निसमतेजसौ । माद्रीपुत्रौ च विक्रान्तौ त्रिदशानामिवेश्वरौ ॥
arjuno bhīmasenaśca vāyvagnisamatejasau | mādrīputrau ca vikrāntau tridaśānāmiveśvarau
अर्जुन और भीमसेन, जिनका तेज वायु और अग्नि के समान है, और माद्री के दोनों पराक्रमी पुत्र, जो देवताओं के अधिपतियों के समान हैं।
श्लोक 28 (6.107.28)
मां वा नियुङ्क्ष्व सौहार्दाद्योत्स्ये भीष्मेण पाण्डव । त्वत्प्रयुक्तो महाराज किं न कुर्यां महाहवे ॥
māṃ vā niyuṅkṣva sauhārdādyotsye bhīṣmeṇa pāṇḍava | tvatprayukto mahārāja kiṃ na kuryāṃ mahāhave
अथवा, हे पाण्डुनन्दन, सौहार्दवश आप मुझे नियुक्त कीजिए, मैं भीष्म से युद्ध करूँगा। हे महाराज, आपकी प्रेरणा पाकर मैं महायुद्ध में क्या नहीं कर सकता?
श्लोक 29 (6.107.29)
हनिष्यामि रणे भीष्ममाहूय पुरुषर्षभम् । पश्यतां धार्तराष्ट्राणां यदि नेच्छति फल्गुनः ॥
haniṣyāmi raṇe bhīṣmamāhūya puruṣarṣabham | paśyatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ yadi necchati phalgunaḥ
यदि फाल्गुन (अर्जुन) ऐसा नहीं करना चाहते, तो मैं धृतराष्ट्र के पुत्रों के देखते-देखते उस पुरुषश्रेष्ठ भीष्म को ललकारकर युद्ध में मार डालूँगा।
श्लोक 30 (6.107.30)
यदि भीष्मे हते वीरे जयं पश्यसि पाण्डव । हन्तास्म्येकरथेनाद्य कुरुवृद्धं पितामहम् ॥
yadi bhīṣme hate vīre jayaṃ paśyasi pāṇḍava | hantāsmyekarathenādya kuruvṛddhaṃ pitāmaham
हे पाण्डुनन्दन, यदि आप वीर भीष्म के मारे जाने में ही विजय देखते हैं, तो मैं आज अकेले एक रथ से कुरुवंश के वृद्ध पितामह को मार डालूँगा।
श्लोक 31 (6.107.31)
पश्य मे विक्रमं राजन्महेन्द्रस्येव संयुगे । विमुञ्चन्तं महास्त्राणि पातयिष्यामि तं रथात् ॥
paśya me vikramaṃ rājanmahendrasyeva saṃyuge | vimuñcantaṃ mahāstrāṇi pātayiṣyāmi taṃ rathāt
हे राजन्, युद्ध में महेन्द्र के समान मेरा पराक्रम देखिए; बड़े-बड़े अस्त्र छोड़ते हुए उन्हें मैं रथ से गिरा दूँगा।
श्लोक 32 (6.107.32)
यः शत्रुः पाण्डुपुत्राणां मच्छत्रुः स न संशयः । मदर्था भवदर्था ये ये मदीयास्तवैव ते ॥
yaḥ śatruḥ pāṇḍuputrāṇāṃ macchatruḥ sa na saṃśayaḥ | madarthā bhavadarthā ye ye madīyāstavaiva te
जो पाण्डुपुत्रों का शत्रु है, वह मेरा शत्रु है, इसमें सन्देह नहीं। जो मेरे लिए हैं वे आपके लिए हैं, और जो मेरे हैं वे आपके ही हैं।
श्लोक 33 (6.107.33)
तव भ्राता मम सखा संबन्धी शिष्य एव च । मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फल्गुनार्थे महीपते ॥
tava bhrātā mama sakhā saṃbandhī śiṣya eva ca | māṃsānyutkṛtya dāsyāmi phalgunārthe mahīpate
हे पृथ्वीपति, आपका भाई मेरा सखा, सम्बन्धी और शिष्य भी है। फाल्गुन के लिए मैं अपना मांस काटकर भी दे दूँगा।
श्लोक 34 (6.107.34)
एष चापि नरव्याघ्रो मत्कृते जीवितं त्यजेत् । एष नः समयस्तात तारयेम परस्परम् ॥
eṣa cāpi naravyāghro matkṛte jīvitaṃ tyajet | eṣa naḥ samayastāta tārayema parasparam
और यह पुरुषसिंह भी मेरे लिए अपने प्राण त्याग देगा। हे तात, हमारा यही नियम है कि हम एक-दूसरे को संकट से पार लगाएँगे।
श्लोक 35 (6.107.35)
स मां नियुङ्क्ष्व राजेन्द्र यावत्सज्जो भवाम्यहम् । प्रतिज्ञातमुपप्लाव्ये यत्तत्पार्थेन पूर्वतः ॥
sa māṃ niyuṅkṣva rājendra yāvatsajjo bhavāmyaham | pratijñātamupaplāvye yattatpārthena pūrvataḥ
इसलिए, हे राजेन्द्र, जब तक मैं तैयार हूँ, मुझे नियुक्त कीजिए। पहले उपप्लव्य में पार्थ ने जो प्रतिज्ञा की थी,
श्लोक 36 (6.107.36)
पातयिष्यामि गाङ्गेयमित्युलूकस्य संनिधौ । परिरक्ष्यमिदं तावद्वचः पार्थस्य धीमतः ॥
pātayiṣyāmi gāṅgeyamityulūkasya saṃnidhau | parirakṣyamidaṃ tāvadvacaḥ pārthasya dhīmataḥ
उलूक के सामने कि 'मैं गंगानन्दन को गिराऊँगा', बुद्धिमान पार्थ के उस वचन की तब तक रक्षा होनी चाहिए।
श्लोक 37 (6.107.37)
अनुज्ञातेन पार्थेन मया कार्यं न संशयः । अथवा फल्गुनस्यैष भारः परिमितो रणे ॥
anujñātena pārthena mayā kāryaṃ na saṃśayaḥ | athavā phalgunasyaiṣa bhāraḥ parimito raṇe
पार्थ की अनुमति मिलने पर मैं यह काम करूँगा, इसमें सन्देह नहीं। अथवा, फाल्गुन के लिए युद्ध में यह भार उनकी सामर्थ्य के भीतर ही है;
श्लोक 38 (6.107.38)
स हनिष्यति संग्रामे भीष्मं परपुरंजयम् । अशक्यमपि कुर्याद्धि रणे पार्थः समुद्यतः ॥
sa haniṣyati saṃgrāme bhīṣmaṃ parapuraṃjayam | aśakyamapi kuryāddhi raṇe pārthaḥ samudyataḥ
वे युद्ध में शत्रुनगरों को जीतने वाले भीष्म को मार डालेंगे। युद्ध में उद्यत होने पर पार्थ असम्भव कार्य भी कर सकते हैं।
श्लोक 39 (6.107.39)
त्रिदशान्वा समुद्युक्तान्सहितान्दैत्यदानवैः । निहन्यादर्जुनः सङ्ख्ये किमु भीष्मं नराधिप ॥
tridaśānvā samudyuktānsahitāndaityadānavaiḥ | nihanyādarjunaḥ saṅkhye kimu bhīṣmaṃ narādhipa
हे नराधिप, युद्ध के लिए तैयार देवताओं को, दैत्यों और दानवों सहित भी, अर्जुन रण में मार सकते हैं; फिर भीष्म की तो बात ही क्या!
श्लोक 40 (6.107.40)
विपरीतो महावीर्यो गतसत्त्वोऽल्पजीवनः । भीष्मः शान्तनवो नूनं कर्तव्यं नावबुध्यते ॥
viparīto mahāvīryo gatasattvo'lpajīvanaḥ | bhīṣmaḥ śāntanavo nūnaṃ kartavyaṃ nāvabudhyate
महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म निश्चय ही विपरीत आचरण करने लगे हैं; उनकी बुद्धि नष्ट हो गई है, उनका जीवन थोड़ा ही शेष है, और वे नहीं समझते कि उन्हें क्या करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 41 (6.107.41)
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । सर्वे ह्येते न पर्याप्तास्तव वेगविधारणे ॥
evametanmahābāho yathā vadasi mādhava | sarve hyete na paryāptāstava vegavidhāraṇe
हे महाबाहु माधव, जैसा आप कहते हैं, बात वैसी ही है। ये सब मिलकर भी आपके वेग को रोकने में समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 42 (6.107.42)
नियतं समवाप्स्यामि सर्वमेतद्यथेप्सितम् । यस्य मे पुरुषव्याघ्र भवान्पक्षे व्यवस्थितः ॥
niyataṃ samavāpsyāmi sarvametadyathepsitam | yasya me puruṣavyāghra bhavānpakṣe vyavasthitaḥ
हे पुरुषसिंह, जिसके पक्ष में आप स्वयं खड़े हैं, वह मैं निश्चय ही अपनी सारी अभिलाषा प्राप्त कर लूँगा।
श्लोक 43 (6.107.43)
सेन्द्रानपि रणे देवाञ्जयेयं जयतां वर । त्वया नाथेन गोविन्द किमु भीष्मं महारथम् ॥
sendrānapi raṇe devāñjayeyaṃ jayatāṃ vara | tvayā nāthena govinda kimu bhīṣmaṃ mahāratham
हे विजेताओं में श्रेष्ठ गोविन्द, आप जैसे रक्षक के रहते मैं युद्ध में इन्द्र सहित देवताओं को भी जीत सकता हूँ; फिर महारथी भीष्म की तो बात ही क्या!
श्लोक 44 (6.107.44)
न तु त्वामनृतं कर्तुमुत्सहे स्वात्मगौरवात् । अयुध्यमानः साहाय्यं यथोक्तं कुरु माधव ॥
na tu tvāmanṛtaṃ kartumutsahe svātmagauravāt | ayudhyamānaḥ sāhāyyaṃ yathoktaṃ kuru mādhava
परन्तु अपने आत्मगौरव के कारण मैं आपको असत्यवादी बनाने का साहस नहीं कर सकता। हे माधव, जैसा आपने कहा था, बिना युद्ध किए ही हमारी सहायता कीजिए।
श्लोक 45 (6.107.45)
समयस्तु कृतः कश्चिन्मम भीष्मेण संयुगे । मन्त्रयिष्ये तवार्थाय न तु योत्स्ये कथंचन ॥
samayastu kṛtaḥ kaścinmama bhīṣmeṇa saṃyuge | mantrayiṣye tavārthāya na tu yotsye kathaṃcana
भीष्म ने युद्ध के विषय में मुझसे एक समझौता किया था: 'मैं तुम्हारे हित के लिए परामर्श दूँगा, परन्तु तुम्हारी ओर से कभी युद्ध नहीं करूँगा;
श्लोक 46 (6.107.46)
दुर्योधनार्थं योत्स्यामि सत्यमेतदिति प्रभो । स हि राज्यस्य मे दाता मन्त्रस्यैव च माधव ॥
duryodhanārthaṃ yotsyāmi satyametaditi prabho | sa hi rājyasya me dātā mantrasyaiva ca mādhava
दुर्योधन के लिए मैं युद्ध करूँगा, यह सत्य है।' हे प्रभो, इसलिए वे ही मुझे राज्य भी दे सकते हैं और परामर्श भी, हे माधव।
श्लोक 47 (6.107.47)
तस्माद्देवव्रतं भूयो वधोपायार्थमात्मनः । भवता सहिताः सर्वे प्रयाम मधुसूदन ॥
tasmāddevavrataṃ bhūyo vadhopāyārthamātmanaḥ | bhavatā sahitāḥ sarve prayāma madhusūdana
इसलिए, हे मधुसूदन, हम सब आपके साथ फिर देवव्रत के पास उनके ही वध का उपाय जानने के लिए चलें।
श्लोक 48 (6.107.48)
तद्वयं सहिता गत्वा भीष्ममाशु नरोत्तमम् । रुचिते तव पृच्छामि मन्त्रं वार्ष्णेय माचिरम् ॥
tadvayaṃ sahitā gatvā bhīṣmamāśu narottamam | rucite tava pṛcchāmi mantraṃ vārṣṇeya māciram
अतः हे वार्ष्णेय, यदि आपको उचित लगे, तो हम सब मिलकर शीघ्र ही नरश्रेष्ठ भीष्म के पास चलें, और मैं बिना विलम्ब उनसे परामर्श पूछूँ।
श्लोक 49 (6.107.49)
स वक्ष्यति हितं वाक्यं सत्यमस्माज्जनार्दन । यथा च वक्ष्यते कृष्ण तथा कर्तास्मि संयुगे ॥
sa vakṣyati hitaṃ vākyaṃ satyamasmājjanārdana | yathā ca vakṣyate kṛṣṇa tathā kartāsmi saṃyuge
हे जनार्दन, वे हमें हितकारी और सत्य वचन बताएँगे; और हे कृष्ण, वे जैसा कहेंगे, युद्ध में मैं वैसा ही करूँगा।
श्लोक 50 (6.107.50)
स नो जयस्य दाता स्यान्मन्त्रस्य च दृढव्रतः । बालाः पित्रा विहीनाश्च तेन संवर्धिता वयम् ॥
sa no jayasya dātā syānmantrasya ca dṛḍhavrataḥ | bālāḥ pitrā vihīnāśca tena saṃvardhitā vayam
दृढव्रती भीष्म ही हमें विजय और परामर्श देने वाले होंगे। हम पिता से वंचित बालक थे, और उन्होंने ही हमें पाल-पोसकर बड़ा किया।
श्लोक 51 (6.107.51)
तं चेत्पितामहं वृद्धं हन्तुमिच्छामि माधव । पितुः पितरमिष्टं च धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ॥
taṃ cetpitāmahaṃ vṛddhaṃ hantumicchāmi mādhava | pituḥ pitaramiṣṭaṃ ca dhigastu kṣatrajīvikām
फिर भी, हे माधव, मैं उन्हीं वृद्ध पितामह को, अपने पिता के प्रिय पिता को, मारना चाहता हूँ। धिक्कार है क्षत्रिय की इस जीविका को!
सञ्जय उवाच
श्लोक 52 (6.107.52)
ततोऽब्रवीन्महाराज वार्ष्णेयः कुरुनन्दनम् । रोचते मे महाप्राज्ञ राजेन्द्र तव भाषितम् ॥
tato'bravīnmahārāja vārṣṇeyaḥ kurunandanam | rocate me mahāprājña rājendra tava bhāṣitam
हे महाराज, तब वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण) ने कुरुनन्दन युधिष्ठिर से कहा, 'हे महाप्राज्ञ राजेन्द्र, आपकी बात मुझे अच्छी लगी।'
वासुदेव उवाच
श्लोक 53 (6.107.53)
देवव्रतः कृती भीष्मः प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् । गम्यतां स्ववधोपायं प्रष्टुं सागरगासुतम् ॥
devavrataḥ kṛtī bhīṣmaḥ prekṣitenāpi nirdahet | gamyatāṃ svavadhopāyaṃ praṣṭuṃ sāgaragāsutam
देवव्रत भीष्म सिद्ध पुरुष हैं; वे केवल दृष्टि डालकर भी भस्म कर सकते हैं। समुद्रगामिनी गंगा के उस पुत्र से उनके ही वध का उपाय पूछने के लिए चलना चाहिए।
श्लोक 54 (6.107.54)
वक्तुमर्हति सत्यं स त्वया पृष्टो विशेषतः । ते वयं तत्र गच्छामः प्रष्टुं कुरुपितामहम् ॥
vaktumarhati satyaṃ sa tvayā pṛṣṭo viśeṣataḥ | te vayaṃ tatra gacchāmaḥ praṣṭuṃ kurupitāmaham
विशेषकर जब आप पूछेंगे, तो वे अवश्य सत्य ही बताएँगे। अतः हम कुरुपितामह से पूछने के लिए वहाँ चलें।
श्लोक 55 (6.107.55)
गत्वा शान्तनवं वृद्धं मन्त्रं पृच्छाम भारत । स नो दास्यति मन्त्रं यं तेन योत्स्यामहे परान् ॥
gatvā śāntanavaṃ vṛddhaṃ mantraṃ pṛcchāma bhārata | sa no dāsyati mantraṃ yaṃ tena yotsyāmahe parān
हे भारत, हम वृद्ध शान्तनुनन्दन के पास जाकर उनसे परामर्श पूछें। वे हमें जो उपाय बताएँगे, उसी के सहारे हम शत्रुओं से युद्ध करेंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (6.107.56)
एवमामन्त्र्य ते वीराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । जग्मुस्ते सहिताः सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥
evamāmantrya te vīrāḥ pāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | jagmuste sahitāḥ sarve vāsudevaśca vīryavān
हे पाण्डु के अग्रज, इस प्रकार मन्त्रणा करके वे वीर पाण्डव सब एक साथ चले, और उनके साथ पराक्रमी वासुदेव भी,
श्लोक 57 (6.107.57)
विमुक्तशस्त्रकवचा भीष्मस्य सदनं प्रति । प्रविश्य च तदा भीष्मं शिरोभिः प्रणिपेदिरे ॥
vimuktaśastrakavacā bhīṣmasya sadanaṃ prati | praviśya ca tadā bhīṣmaṃ śirobhiḥ praṇipedire
अपने शस्त्र और कवच उतारकर भीष्म के निवास की ओर गए, और भीतर प्रवेश करके उन्होंने भीष्म के सामने सिर झुकाकर प्रणाम किया।
श्लोक 58 (6.107.58)
पूजयन्तो महाराज पाण्डवा भरतर्षभम् । प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्मं शरणमभ्ययुः ॥
pūjayanto mahārāja pāṇḍavā bharatarṣabham | praṇamya śirasā cainaṃ bhīṣmaṃ śaraṇamabhyayuḥ
हे महाराज, भरतश्रेष्ठ भीष्म का सम्मान करते हुए पाण्डवों ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी शरण में आए।
श्लोक 59 (6.107.59)
तानुवाच महाबाहुर्भीष्मः कुरुपितामहः । स्वागतं तव वार्ष्णेय स्वागतं ते धनञ्जय ॥
tānuvāca mahābāhurbhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ | svāgataṃ tava vārṣṇeya svāgataṃ te dhanañjaya
महाबाहु कुरुपितामह भीष्म ने उनसे कहा, 'वार्ष्णेय, तुम्हारा स्वागत है; धनञ्जय, तुम्हारा स्वागत है।'
भीष्म उवाच
श्लोक 60 (6.107.60)
स्वागतं धर्मपुत्राय भीमाय यमयोस्तथा । किं वा कार्यं करोम्यद्य युष्माकं प्रीतिवर्धनं ॥
svāgataṃ dharmaputrāya bhīmāya yamayostathā | kiṃ vā kāryaṃ karomyadya yuṣmākaṃ prītivardhanaṃ
धर्मपुत्र का, भीम का और दोनों यमजों का स्वागत है। बताओ, आज मैं तुम्हारी प्रसन्नता बढ़ाने के लिए क्या करूँ?
सञ्जय उवाच
श्लोक 61 (6.107.61)
युद्धादन्यत्र हे वत्साः प्रीयन्तां मा विशङ्कथ । सर्वात्मनापि कर्तास्मि यदपि स्यात्सुदुष्करम् । तथा ब्रुवाणं गाङ्गेयं प्रीतियुक्तं पुनःपुनः ॥
yuddhādanyatra he vatsāḥ prīyantāṃ mā viśaṅkatha | sarvātmanāpi kartāsmi yadapi syātsuduṣkaram | tathā bruvāṇaṃ gāṅgeyaṃ prītiyuktaṃ punaḥpunaḥ
'हे वत्सो, युद्ध को छोड़कर जो चाहो कहो; प्रसन्न रहो, कोई शंका मत करो। वह कितना भी कठिन हो, मैं पूरे मन से करूँगा।' गंगानन्दन के बार-बार इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहने पर,
श्लोक 62 (6.107.62)
उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्तमिदं वचः । कथं जयेम सर्वज्ञ कथं राज्यं लभेमहि ॥
uvāca rājā dīnātmā prītiyuktamidaṃ vacaḥ | kathaṃ jayema sarvajña kathaṃ rājyaṃ labhemahi
दुखी मन से राजा युधिष्ठिर ने प्रेमपूर्वक यह वचन कहा: 'हे सर्वज्ञ, हम कैसे विजयी हों? हम राज्य कैसे प्राप्त करें?'
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 63 (6.107.63)
प्रजानां संशयो न स्यात्कथं तन्मे वद प्रभो । भवान्हि नो वधोपायं ब्रवीतु स्वयमात्मनः ॥
prajānāṃ saṃśayo na syātkathaṃ tanme vada prabho | bhavānhi no vadhopāyaṃ bravītu svayamātmanaḥ
और प्रजा पर संकट कैसे न आए? हे प्रभो, यह मुझे बताइए। आप स्वयं ही हमें अपने वध का उपाय बताइए।
श्लोक 64 (6.107.64)
भवन्तं समरे वीर विषहेम कथं वयम् । न हि ते सूक्ष्ममप्यस्ति रन्ध्रं कुरुपितामह ॥
bhavantaṃ samare vīra viṣahema kathaṃ vayam | na hi te sūkṣmamapyasti randhraṃ kurupitāmaha
हे वीर, युद्ध में हम आपका सामना कैसे करें? हे कुरुपितामह, आपमें तनिक भी छिद्र नहीं है।
श्लोक 65 (6.107.65)
मण्डलेनैव धनुषा दृश्यसे संयुगे सदा । आददानं संदधानं विकर्षन्तं धनुर्न च ॥
maṇḍalenaiva dhanuṣā dṛśyase saṃyuge sadā | ādadānaṃ saṃdadhānaṃ vikarṣantaṃ dhanurna ca
युद्ध में आप सदा मण्डलाकार खिंचे धनुष के साथ ही दिखाई देते हैं; हम आपको बाण उठाते, चढ़ाते या धनुष खींचते हुए नहीं देख पाते,
श्लोक 66 (6.107.66)
पश्यामस्त्वां महाबाहो रथे सूर्यमिवापरम् । रथाश्वनरनागानां हन्तारं परवीरहन् ॥
paśyāmastvāṃ mahābāho rathe sūryamivāparam | rathāśvanaranāgānāṃ hantāraṃ paravīrahan
परन्तु हे महाबाहु, हे शत्रुवीरों के संहारक, हम आपको रथ पर दूसरे सूर्य के समान, रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों का संहार करते हुए देखते हैं।
श्लोक 67 (6.107.67)
कोऽथवोत्सहते जेतुं त्वां पुमान्भरतर्षभ । वर्षता शरवर्षाणि महान्ति पुरुषर्षभ ॥
ko'thavotsahate jetuṃ tvāṃ pumānbharatarṣabha | varṣatā śaravarṣāṇi mahānti puruṣarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, हे पुरुषश्रेष्ठ, जब आप बाणों की भारी वर्षा करते हैं, तब कौन पुरुष आपको जीतने का साहस कर सकता है?
श्लोक 68 (6.107.68)
क्षयं नीता हि पृतना संयुगे महती मम । यथा युधि जयेम त्वां यथा राज्यं भृशं मम ॥
kṣayaṃ nītā hi pṛtanā saṃyuge mahatī mama | yathā yudhi jayema tvāṃ yathā rājyaṃ bhṛśaṃ mama
युद्ध में मेरी विशाल सेना नष्ट हो चुकी है। बताइए, युद्ध में हम आपको कैसे जीतें, राज्य निश्चित रूप से मेरा कैसे हो,
श्लोक 69 (6.107.69)
मम सैन्यस्य च क्षेमं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
mama sainyasya ca kṣemaṃ tanme brūhi pitāmaha
और मेरी सेना का कल्याण कैसे हो; हे पितामह, यह मुझे बताइए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 70 (6.107.70)
ततोऽब्रवीच्छान्तनवः पाण्डवान्पाण्डुपूर्वज ॥
tato'bravīcchāntanavaḥ pāṇḍavānpāṇḍupūrvaja
हे पाण्डु के अग्रज, तब शान्तनुनन्दन ने पाण्डवों से कहा:
भीष्म उवाच
श्लोक 71 (6.107.71)
न कथंचन कौन्तेय मयि जीवति संयुगे । जयो भवति सर्वज्ञ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
na kathaṃcana kaunteya mayi jīvati saṃyuge | jayo bhavati sarvajña satyametadbravīmi te
हे कुन्तीनन्दन, हे सर्वज्ञ, जब तक मैं युद्ध में जीवित हूँ, तब तक किसी प्रकार भी तुम्हारी विजय नहीं हो सकती; यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।
श्लोक 72 (6.107.72)
निर्जिते मयि युद्धेन रणे जेष्यथ पाण्डवाः । क्षिप्रं मयि प्रहरत यदीच्छथ रणे जयम् ॥
nirjite mayi yuddhena raṇe jeṣyatha pāṇḍavāḥ | kṣipraṃ mayi praharata yadīcchatha raṇe jayam
युद्ध में मेरे पराजित हो जाने पर ही तुम पाण्डव रण में विजयी होगे। यदि रण में विजय चाहते हो, तो शीघ्र मुझ पर प्रहार करो।
श्लोक 73 (6.107.73)
अनुजानामि वः पार्थाः प्रहरध्वं यथासुखम् । एवं हि सुकृतं मन्ये भवतां विदितो ह्यहम् । हते मयि हतं सर्वं तस्मादेवं विधीयताम् ॥
anujānāmi vaḥ pārthāḥ praharadhvaṃ yathāsukham | evaṃ hi sukṛtaṃ manye bhavatāṃ vidito hyaham | hate mayi hataṃ sarvaṃ tasmādevaṃ vidhīyatām
हे पार्थो, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ; जैसे चाहो, मुझ पर प्रहार करो। तुम मुझे जान गए हो, इसलिए मैं इसी को उचित मानता हूँ; मेरे मारे जाने पर सब मारे गए समझो। इसलिए ऐसा ही करो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 74 (6.107.74)
ब्रूहि तस्मादुपायं नो यथा युद्धे जयेमहि । भवन्तं समरे क्रुद्धं दण्डहस्तमिवान्तकम् ॥
brūhi tasmādupāyaṃ no yathā yuddhe jayemahi | bhavantaṃ samare kruddhaṃ daṇḍahastamivāntakam
तो हमें वह उपाय बताइए जिससे हम युद्ध में आपको जीत सकें, जब आप रण में दण्डधारी यमराज के समान क्रोध में भरे होते हैं।
श्लोक 75 (6.107.75)
शक्यो वज्रधरो जेतुं वरुणोऽथ यमस्तथा । न भवान्समरे शक्यः सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥
śakyo vajradharo jetuṃ varuṇo'tha yamastathā | na bhavānsamare śakyaḥ sendrairapi surāsuraiḥ
वज्रधारी इन्द्र को जीता जा सकता है, वरुण और यम को भी; परन्तु इन्द्र सहित देवता और असुर भी युद्ध में आपको नहीं जीत सकते।
भीष्म उवाच
श्लोक 76 (6.107.76)
सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव ॥
satyametanmahābāho yathā vadasi pāṇḍava
हे महाबाहु पाण्डुनन्दन, जैसा तुम कहते हो, यह सत्य है।
श्लोक 77 (6.107.77)
नाहं जेतुं रणे शक्यः सेन्द्रैरपि सुरासुरैः । आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुकः । ततो मां न्यस्तशस्त्रं तु एते हन्युर्महारथाः ॥
nāhaṃ jetuṃ raṇe śakyaḥ sendrairapi surāsuraiḥ | āttaśastro raṇe yatto gṛhītavarakārmukaḥ | tato māṃ nyastaśastraṃ tu ete hanyurmahārathāḥ
जब तक मैं युद्ध में शस्त्र धारण किए, सावधान होकर, श्रेष्ठ धनुष हाथ में लिए रहता हूँ, तब तक इन्द्र सहित देवता और असुर भी मुझे रण में नहीं जीत सकते। परन्तु शस्त्र रख देने पर ये महारथी मुझे मार सकते हैं।
श्लोक 78 (6.107.78)
निक्षिप्तशस्त्रे पतिते विमुक्तकवचध्वजे । द्रवमाणे च भीते च तवास्मीति च वादिनि ॥
nikṣiptaśastre patite vimuktakavacadhvaje | dravamāṇe ca bhīte ca tavāsmīti ca vādini
जिसने शस्त्र डाल दिए हों, जो गिर पड़ा हो, जिसका कवच और ध्वज नष्ट हो गया हो, जो भाग रहा हो, डरा हुआ हो, अथवा 'मैं आपका हूँ' कहता हो;
श्लोक 79 (6.107.79)
स्त्रीजिते स्त्रीप्रधाने च स्त्रीप्रधायिनि धर्मज । स्त्रियां स्त्रीनामधेये च विकले चैकपुत्रिणि । अप्रसूते च षण्डे च न युद्धं रोचते मम ॥
strījite strīpradhāne ca strīpradhāyini dharmaja | striyāṃ strīnāmadheye ca vikale caikaputriṇi | aprasūte ca ṣaṇḍe ca na yuddhaṃ rocate mama
हे धर्मपुत्र, जो स्त्री से जीता गया हो, जिस पर स्त्री का प्रभुत्व हो, जो स्त्री को आगे रखता हो, जो स्त्री हो, जिसका नाम स्त्री का हो, जो विकलांग हो, जिसका एक ही पुत्र हो, जिसकी कोई सन्तान न हुई हो, अथवा जो नपुंसक हो, उससे युद्ध करना मुझे अच्छा नहीं लगता।
श्लोक 80 (6.107.80)
इमं मे शृणु राजेन्द्र संकल्पं पूर्वचिन्तितम् । असंकल्पध्वजं दृष्ट्वा न युध्येयं कदाचन ॥
imaṃ me śṛṇu rājendra saṃkalpaṃ pūrvacintitam | asaṃkalpadhvajaṃ dṛṣṭvā na yudhyeyaṃ kadācana
हे राजेन्द्र, मेरा यह पहले से सोचा हुआ संकल्प भी सुनो: अशुभ ध्वज वाले को देखकर मैं कभी युद्ध नहीं करूँगा।
श्लोक 81 (6.107.81)
य एष द्रौपदो राजंस्तव सैन्ये महारथः । शिखण्डी समरामर्षी शूरश्च समितिंजयः ॥
ya eṣa draupado rājaṃstava sainye mahārathaḥ | śikhaṇḍī samarāmarṣī śūraśca samitiṃjayaḥ
हे राजन्, तुम्हारी सेना में जो यह द्रुपदपुत्र महारथी शिखण्डी है, जो युद्ध के लिए अधीर, शूरवीर और संग्राम में विजयी है,
श्लोक 82 (6.107.82)
यथाऽभवच्च स्त्रीपूर्वं पश्चात्पुंस्त्वं समागतः । जानन्ति च भवन्तोऽपि सर्वमेतद्यथातथम् ॥
yathā'bhavacca strīpūrvaṃ paścātpuṃstvaṃ samāgataḥ | jānanti ca bhavanto'pi sarvametadyathātatham
वह पहले स्त्री के रूप में था और बाद में पुरुष बना; यह सब जैसा हुआ था, तुम लोग भी भली-भाँति जानते हो।
श्लोक 83 (6.107.83)
अर्जुनः समरे शूरः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । मामेव विशिखैस्तीक्ष्णैरभिद्रवतु दंशितः ॥
arjunaḥ samare śūraḥ puraskṛtya śikhaṇḍinam | māmeva viśikhaistīkṣṇairabhidravatu daṃśitaḥ
शूरवीर अर्जुन कवच धारण करके, युद्ध में शिखण्डी को आगे रखकर, तीखे बाणों से केवल मुझ पर ही धावा करें।
श्लोक 84 (6.107.84)
असंकल्पध्वजे तस्मिन्स्त्रीपूर्वे च विशेषतः । न प्रहर्तुमभीप्सामि गृहीतेषु कथंचन ॥
asaṃkalpadhvaje tasminstrīpūrve ca viśeṣataḥ | na prahartumabhīpsāmi gṛhīteṣu kathaṃcana
उस अशुभ ध्वज वाले पर, और विशेषकर जो पहले स्त्री रहा हो, उस पर मैं हाथ में बाण लिए होने पर भी किसी प्रकार प्रहार नहीं करना चाहूँगा।
श्लोक 85 (6.107.85)
तदन्तरं समासाद्य पाण्डवो मां धनञ्जयः । शरैर्घातयतु क्षिप्रं समन्ताद्भरतर्षभ ॥
tadantaraṃ samāsādya pāṇḍavo māṃ dhanañjayaḥ | śarairghātayatu kṣipraṃ samantādbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, उसी अवसर का लाभ उठाकर पाण्डुनन्दन धनञ्जय चारों ओर से बाण मारकर शीघ्र मुझे गिरा दें।
श्लोक 86 (6.107.86)
न तं पश्यामि लोकेषु मां हन्याद्यः समुद्यतम् । ऋते कृष्णान्महाभागात्पाण्डवाद्वा धनञ्जयात् ॥
na taṃ paśyāmi lokeṣu māṃ hanyādyaḥ samudyatam | ṛte kṛṣṇānmahābhāgātpāṇḍavādvā dhanañjayāt
जब मैं युद्ध के लिए उद्यत रहूँ, तब मुझे मार सकने वाला संसार में मैं किसी को नहीं देखता, सिवाय महाभाग श्रीकृष्ण के या पाण्डुनन्दन धनञ्जय के।
श्लोक 87 (6.107.87)
पार्षतं तु पुरोधाय क्लीबमद्य ममाग्रतः । आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुकः । मां पातयतु बीभत्सुरेवं तव जयो ध्रुवम् ॥
pārṣataṃ tu purodhāya klībamadya mamāgrataḥ | āttaśastro raṇe yatto gṛhītavarakārmukaḥ | māṃ pātayatu bībhatsurevaṃ tava jayo dhruvam
अतः आज बीभत्सु (अर्जुन) उस नपुंसक पार्षत (शिखण्डी) को मेरे सामने आगे करके, शस्त्र लिए, युद्ध में सावधान और श्रेष्ठ धनुष धारण किए हुए, मुझे गिरा दें। इस प्रकार तुम्हारी विजय निश्चित है।
श्लोक 88 (6.107.88)
एतत्कुरुष्व कौन्तेय यथोक्तं मम सुव्रत । ततो जेष्यसि संग्रामे धार्तराष्ट्रान्समागतान् ॥
etatkuruṣva kaunteya yathoktaṃ mama suvrata | tato jeṣyasi saṃgrāme dhārtarāṣṭrānsamāgatān
हे सुव्रत कुन्तीनन्दन, जैसा मैंने कहा है, वैसा ही करो। तब तुम युद्ध में एकत्र हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों को जीत लोगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 89 (6.107.89)
तेऽनुज्ञातास्ततः पार्था जग्मुः स्वशिबिरं प्रति । अभिवाद्य महात्मानं भीष्मं कुरुपितामहम् ॥
te'nujñātāstataḥ pārthā jagmuḥ svaśibiraṃ prati | abhivādya mahātmānaṃ bhīṣmaṃ kurupitāmaham
अनुमति पाकर पार्थगण महात्मा कुरुपितामह भीष्म को प्रणाम करके अपने शिविर को लौट गए।
श्लोक 90 (6.107.90)
तथोक्तवति गाङ्गेये परलोकाय दीक्षिते । अर्जुनो दुःखसंतप्तः सव्रीडमिदमब्रवीत् ॥
tathoktavati gāṅgeye paralokāya dīkṣite | arjuno duḥkhasaṃtaptaḥ savrīḍamidamabravīt
परलोक-यात्रा की दीक्षा लिए हुए गंगानन्दन के ऐसा कहने पर अर्जुन दुःख से संतप्त और लज्जित होकर यह बोले:
अर्जुन उवाच
श्लोक 91 (6.107.91)
गुरुणा कुरुवृद्धेन कृतप्रज्ञेन धीमता । पितामहेन संग्रामे कथं योद्धास्मि माधव ॥
guruṇā kuruvṛddhena kṛtaprajñena dhīmatā | pitāmahena saṃgrāme kathaṃ yoddhāsmi mādhava
हे माधव, जो मेरे गुरु हैं, कुरुवंश के वृद्ध हैं, परिपक्व बुद्धि वाले और विद्वान् हैं, उन पितामह से मैं युद्ध में कैसे लड़ूँगा?
श्लोक 92 (6.107.92)
क्रीडता हि मया बाल्ये वासुदेव महामनाः । पांसुरूषितगात्रेण महात्मा परुषीकृतः ॥
krīḍatā hi mayā bālye vāsudeva mahāmanāḥ | pāṃsurūṣitagātreṇa mahātmā paruṣīkṛtaḥ
हे वासुदेव, बचपन में खेलते समय धूल से सने शरीर से मैं उन उदारचित्त महात्मा को मैला कर दिया करता था।
श्लोक 93 (6.107.93)
यस्याहमधिरुह्याङ्कं बालः किल गदाग्रज । तातेत्यवोचं पितरं पितुः पाण्डोर्महात्मनः ॥
yasyāhamadhiruhyāṅkaṃ bālaḥ kila gadāgraja | tātetyavocaṃ pitaraṃ pituḥ pāṇḍormahātmanaḥ
हे गदाग्रज, बालक के रूप में उनकी गोद में चढ़कर मैं उन्हें, जो मेरे पिता महात्मा पाण्डु के पिता थे, 'तात' (पिता) कहकर पुकारता था।
श्लोक 94 (6.107.94)
नाहं तातस्तव पितुस्तातोऽस्मि तव भारत । इति मामब्रवीद्बाल्ये यः स वध्यः कथं मया ॥
nāhaṃ tātastava pitustāto'smi tava bhārata | iti māmabravīdbālye yaḥ sa vadhyaḥ kathaṃ mayā
'हे भारत, मैं तुम्हारा पिता नहीं, तुम्हारे पिता का पिता हूँ', ऐसा वे मुझसे बचपन में कहा करते थे। उनका वध मैं कैसे करूँ?
श्लोक 95 (6.107.95)
कामं वध्यतु सैन्यं मे नाहं योत्स्ये महात्मना । जयो वास्तु वधो वा मे कथं वा कृष्ण मन्यसे ॥
kāmaṃ vadhyatu sainyaṃ me nāhaṃ yotsye mahātmanā | jayo vāstu vadho vā me kathaṃ vā kṛṣṇa manyase
चाहे मेरी सेना मारी जाए, मैं उन महात्मा से युद्ध नहीं करूँगा। मेरी विजय हो या मेरा वध, हे कृष्ण, आप क्या सोचते हैं?
श्लोक 96 (6.107.96)
कथमस्माद्विधः कृष्ण जानन्धर्मं सनातनम् । न्यस्तशस्त्रे च वृद्धे च प्रहरेद्धि पितामहे ॥
kathamasmādvidhaḥ kṛṣṇa jānandharmaṃ sanātanam | nyastaśastre ca vṛddhe ca prahareddhi pitāmahe
हे कृष्ण, सनातन धर्म को जानने वाला मुझ जैसा व्यक्ति शस्त्र रख चुके वृद्ध पितामह पर कैसे प्रहार कर सकता है?
श्रीवासुदेव उवाच
श्लोक 97 (6.107.97)
प्रतिज्ञाय वधं जिष्णो पुरा भीष्मस्य संयुगे । क्षत्रधर्मे स्थितः पार्थ कथं नैनं हनिष्यसि ॥
pratijñāya vadhaṃ jiṣṇo purā bhīṣmasya saṃyuge | kṣatradharme sthitaḥ pārtha kathaṃ nainaṃ haniṣyasi
हे जिष्णु, तुमने पहले युद्ध में भीष्म के वध की प्रतिज्ञा की थी। हे पार्थ, क्षत्रिय-धर्म पर स्थित रहते हुए तुम उन्हें कैसे नहीं मारोगे?
श्लोक 98 (6.107.98)
पातयैनं रथात्पार्थ क्षत्रियं युद्धदुर्मदम् । नाहत्वा युधि गाङ्गेयं विजयस्ते भविष्यति ॥
pātayainaṃ rathātpārtha kṣatriyaṃ yuddhadurmadam | nāhatvā yudhi gāṅgeyaṃ vijayaste bhaviṣyati
हे पार्थ, युद्ध के लिए उत्सुक उस क्षत्रिय को रथ से गिरा दो। गंगानन्दन को युद्ध में मारे बिना तुम्हारी विजय नहीं होगी।
श्लोक 99 (6.107.99)
दृष्टमेतत्पुरा देवैर्भविष्यत्यवशस्य ते । यद्दृष्टं हि पुरा पार्थ तत्तथा न तदन्यथा ॥
dṛṣṭametatpurā devairbhaviṣyatyavaśasya te | yaddṛṣṭaṃ hi purā pārtha tattathā na tadanyathā
देवताओं ने यह पहले ही देख लिया था; तुम चाहो या न चाहो, यह होकर रहेगा। हे पार्थ, जो पहले देखा जा चुका है, वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं।
श्लोक 100 (6.107.100)
न हि भीष्मं दुराधर्षं व्यात्ताननमिवान्तकम् । त्वदन्यः शक्नुयाद्योद्धुमपि वज्रधरः स्वयम् ॥
na hi bhīṣmaṃ durādharṣaṃ vyāttānanamivāntakam | tvadanyaḥ śaknuyādyoddhumapi vajradharaḥ svayam
मुँह फैलाए हुए यमराज के समान दुर्धर्ष भीष्म से तुम्हारे अतिरिक्त कोई युद्ध नहीं कर सकता, स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी नहीं।
श्लोक 101 (6.107.101)
जहि भीष्मं स्थिरो भूत्वा शृणु चेदं वचो मम । यथोवाच पुरा शक्रं महाबुद्धिर्बृहस्पतिः ॥
jahi bhīṣmaṃ sthiro bhūtvā śṛṇu cedaṃ vaco mama | yathovāca purā śakraṃ mahābuddhirbṛhaspatiḥ
दृढ़ होकर भीष्म को मारो, और मेरा यह वचन सुनो, जो पूर्वकाल में महाबुद्धिमान् बृहस्पति ने इन्द्र से कहा था:
श्लोक 102 (6.107.102)
ज्यायांसमपि चेद्वृद्धं गुणैरपि समन्वितम् । आततायिनमायान्तं हन्याद्घातकमात्मनः ॥
jyāyāṃsamapi cedvṛddhaṃ guṇairapi samanvitam | ātatāyinamāyāntaṃ hanyādghātakamātmanaḥ
'बड़ा, वृद्ध और गुणों से युक्त व्यक्ति भी यदि आततायी बनकर अपने प्राण लेने आ रहा हो, तो उसे मार डालना चाहिए।'
श्लोक 103 (6.107.103)
शाश्वतोऽयं स्थितो धर्मः क्षत्रियाणां धनञ्जय । योद्धव्यं रक्षितव्यं च यष्टव्यं चानसूयुभिः ॥
śāśvato'yaṃ sthito dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ dhanañjaya | yoddhavyaṃ rakṣitavyaṃ ca yaṣṭavyaṃ cānasūyubhiḥ
हे धनञ्जय, क्षत्रियों का यह सनातन और स्थिर धर्म है कि वे ईर्ष्या से रहित होकर युद्ध करें, प्रजा की रक्षा करें और यज्ञ करें।
अर्जुन उवाच
श्लोक 104 (6.107.104)
शिखण्डी निधनं कृष्ण भीष्मस्य भविता ध्रुवम् । दृष्ट्वैव हि सदा भीष्मः पाञ्चाल्यं विनिवर्तते ॥
śikhaṇḍī nidhanaṃ kṛṣṇa bhīṣmasya bhavitā dhruvam | dṛṣṭvaiva hi sadā bhīṣmaḥ pāñcālyaṃ vinivartate
हे कृष्ण, शिखण्डी ही निश्चय भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगा, क्योंकि भीष्म पाञ्चालराजकुमार को देखते ही सदा लौट जाते हैं।
श्लोक 105 (6.107.105)
ते वयं प्रमुखे तस्य पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । गाङ्गेयं पातयिष्याम उपायेनेति मे मतिः ॥
te vayaṃ pramukhe tasya puraskṛtya śikhaṇḍinam | gāṅgeyaṃ pātayiṣyāma upāyeneti me matiḥ
अतः हम उनके सामने शिखण्डी को आगे करके इस उपाय से गंगानन्दन को गिरा देंगे; यही मेरा विचार है।
श्लोक 106 (6.107.106)
अहमन्यान्महेष्वासान्वारयिष्यामि सायकैः । शिखण्ड्यपि युधां श्रेष्ठं भीष्ममेवाभियोधयेत् ॥
ahamanyānmaheṣvāsānvārayiṣyāmi sāyakaiḥ | śikhaṇḍyapi yudhāṃ śreṣṭhaṃ bhīṣmamevābhiyodhayet
मैं अन्य महाधनुर्धरों को अपने बाणों से रोकूँगा, और शिखण्डी योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म से ही युद्ध करे।
श्लोक 107 (6.107.107)
श्रुतं हि कुरुमुख्यस्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । कन्या ह्येषा पुरा भूत्वा पुरुषः समपद्यत ॥
śrutaṃ hi kurumukhyasya nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam | kanyā hyeṣā purā bhūtvā puruṣaḥ samapadyata
हमने कुरुश्रेष्ठ भीष्म से सुना है: 'मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा।' क्योंकि यह पहले कन्या होकर बाद में पुरुष बना।
सञ्जय उवाच
श्लोक 108 (6.107.108)
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा भीष्मस्य वधसंयुतम् । जहृषुर्हृष्टरोमाणः सकृष्णाः पाण्डवास्तदा ॥
arjunasya vacaḥ śrutvā bhīṣmasya vadhasaṃyutam | jahṛṣurhṛṣṭaromāṇaḥ sakṛṣṇāḥ pāṇḍavāstadā
अर्जुन के भीष्म-वध से सम्बन्धित वचन सुनकर श्रीकृष्ण सहित पाण्डव हर्षित हो उठे; आनन्द से उनके रोंगटे खड़े हो गए।
श्लोक 109 (6.107.109)
इत्येवं निश्चयं कृत्वा पाण्डवाः सहमाधवाः । अनुमान्य महात्मानं प्रययुर्हृष्टमानसाः । शयनानि यथा स्वानि भेजिरे पुरुषर्षभाः ॥
ityevaṃ niścayaṃ kṛtvā pāṇḍavāḥ sahamādhavāḥ | anumānya mahātmānaṃ prayayurhṛṣṭamānasāḥ | śayanāni yathā svāni bhejire puruṣarṣabhāḥ
इस प्रकार निश्चय करके माधव सहित पाण्डव उन महात्मा की अनुमति लेकर प्रसन्न मन से चल पड़े, और वे पुरुषश्रेष्ठ अपनी-अपनी शय्याओं पर जा लेटे।