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भीष्म पर्व · अध्याय 108

शिखण्डी की भीष्म को चुनौती

दसवें दिन पाण्डव शिखण्डी को अपने व्यूह के आगे करके निकलते हैं, जिसकी रक्षा भीम और अर्जुन करते हैं, और कौरव भीष्म को आगे करके बढ़ते हैं। अपनी सेना का संहार देखकर क्रुद्ध भीष्म पाण्डवों की पंक्तियों को काटते हैं और शिखण्डी की रथ-सेना को भस्म कर देते हैं। शिखण्डी के बाण मारने पर भीष्म हँसकर कहते हैं कि विधाता ने जिसे स्त्री बनाया, उससे वे नहीं लड़ेंगे; शिखण्डी उन्हें मारने की शपथ लेता है, और अर्जुन उसे उत्साहित करते हुए वचन देते हैं कि वे सब कौरव महारथियों को रोके रखेंगे, जिससे शिखण्डी पितामह को गिरा सके।

अध्याय 107अध्याय-सूचीअध्याय 109

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.108.1)

कथं शिखण्डी गाङ्गेयमभ्यवर्तत संयुगे । पाण्डवाश्च कथं भीष्मं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

kathaṃ śikhaṇḍī gāṅgeyamabhyavartata saṃyuge | pāṇḍavāśca kathaṃ bhīṣmaṃ tanmamācakṣva sañjaya

शिखण्डी ने युद्ध में गंगानन्दन भीष्म पर कैसे धावा किया, और पाण्डवों ने भीष्म का सामना कैसे किया? संजय, यह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (6.108.2)

ततः प्रभाते विमले सूर्यस्योदयनं प्रति । ताड्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेष्वानकेषु च ॥

tataḥ prabhāte vimale sūryasyodayanaṃ prati | tāḍyamānāsu bherīṣu mṛdaṅgeṣvānakeṣu ca

तब निर्मल प्रभात में, सूर्योदय के समय, जब भेरियाँ, मृदंग और नगाड़े बजाए जा रहे थे,

श्लोक 3 (6.108.3)

ध्मायमानेषु शङ्खेषु पाण्डरेषु समन्ततः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य निर्याताः पाण्डवा युधि ॥

dhmāyamāneṣu śaṅkheṣu pāṇḍareṣu samantataḥ | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya niryātāḥ pāṇḍavā yudhi

और चारों ओर श्वेत शंख फूँके जा रहे थे, तब पाण्डव शिखण्डी को आगे करके युद्ध के लिए निकले।

श्लोक 4 (6.108.4)

कृत्वा व्यूहं महाराज सर्वशत्रुनिबर्हणम् । शिखण्डी सर्वसैन्यानामग्र आसीद्विशांपते ॥

kṛtvā vyūhaṃ mahārāja sarvaśatrunibarhaṇam | śikhaṇḍī sarvasainyānāmagra āsīdviśāṃpate

महाराज, सब शत्रुओं का संहार करने वाला व्यूह बनाकर, हे प्रजानाथ, शिखण्डी समस्त सेनाओं के आगे खड़ा हुआ।

श्लोक 5 (6.108.5)

चक्ररक्षौ ततस्तस्य भीमसेनधनंजयौ । पृष्ठतो द्रौपदेयाश्च सौभद्रश्चैव वीर्यवान् ॥

cakrarakṣau tatastasya bhīmasenadhanaṃjayau | pṛṣṭhato draupadeyāśca saubhadraścaiva vīryavān

भीमसेन और धनंजय उसके रथ के पहियों के रक्षक बने; उसके पीछे द्रौपदी के पुत्र और पराक्रमी सुभद्रानन्दन अभिमन्यु थे।

श्लोक 6 (6.108.6)

सात्यकिश्चेकितानश्च तेषां गोप्ता महारथः । धृष्टद्युम्नस्ततः पश्चात्पाञ्चालैरभिरक्षितः ॥

sātyakiścekitānaśca teṣāṃ goptā mahārathaḥ | dhṛṣṭadyumnastataḥ paścātpāñcālairabhirakṣitaḥ

महारथी सात्यकि और चेकितान उनके रक्षक थे; उनके पीछे पाञ्चालों से सुरक्षित धृष्टद्युम्न चल रहे थे।

श्लोक 7 (6.108.7)

ततो युधिष्ठिरो राजा यमाभ्यां सहितः प्रभुः । प्रययौ सिंहनादेन नादयन्भरतर्षभ ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā yamābhyāṃ sahitaḥ prabhuḥ | prayayau siṃhanādena nādayanbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, तब प्रभु राजा युधिष्ठिर नकुल और सहदेव के साथ सिंहनाद से रणभूमि को गुँजाते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 8 (6.108.8)

विराटस्तु ततः पश्चात्स्वेन सैन्येन संवृतः । द्रुपदश्च महाबाहो ततः पश्चादुपाद्रवत् ॥

virāṭastu tataḥ paścātsvena sainyena saṃvṛtaḥ | drupadaśca mahābāho tataḥ paścādupādravat

उनके पीछे अपनी सेना से घिरे विराट थे, और हे महाबाहो, उनके पीछे द्रुपद आगे बढ़े।

श्लोक 9 (6.108.9)

केकया भ्रातरः पञ्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । जघनं पालयामासुः पाण्डवेयश्च राक्षसः ॥

kekayā bhrātaraḥ pañca dhṛṣṭaketuśca vīryavān | jaghanaṃ pālayāmāsuḥ pāṇḍaveyaśca rākṣasaḥ

पाँचों केकय भाई, पराक्रमी धृष्टकेतु और पाण्डवों का पुत्र राक्षस घटोत्कच सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 10 (6.108.10)

एवं व्यूह्य महासैन्यं पाण्डवास्तव वाहिनीम् । अभ्यद्रवन्त संग्रामे त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥

evaṃ vyūhya mahāsainyaṃ pāṇḍavāstava vāhinīm | abhyadravanta saṃgrāme tyaktvā jīvitamātmanaḥ

इस प्रकार अपनी विशाल सेना का व्यूह बनाकर पाण्डवों ने प्राणों का मोह छोड़कर युद्ध में आपकी सेना पर धावा बोल दिया।

श्लोक 11 (6.108.11)

तथैव कुरवो राजन्भीष्मं कृत्वा महारथम् । अग्रतः सर्वसैन्यानां प्रययुः पाण्डवान्प्रति ॥

tathaiva kuravo rājanbhīṣmaṃ kṛtvā mahāratham | agrataḥ sarvasainyānāṃ prayayuḥ pāṇḍavānprati

राजन्, उसी प्रकार कौरव महारथी भीष्म को सब सेनाओं के आगे करके पाण्डवों की ओर बढ़े।

श्लोक 12 (6.108.12)

पुत्रैस्तव दुराधर्षो रक्षितः सुमहाबलैः । ततो द्रोणो महेष्वासः पुत्रश्चास्य महाबलः ॥

putraistava durādharṣo rakṣitaḥ sumahābalaiḥ | tato droṇo maheṣvāsaḥ putraścāsya mahābalaḥ

वे दुर्जय भीष्म आपके महाबली पुत्रों से सुरक्षित थे; उनके पीछे महाधनुर्धर द्रोण और उनका महाबली पुत्र अश्वत्थामा थे।

श्लोक 13 (6.108.13)

भगदत्तस्ततः पश्चाद्गजानीकेन संवृतः । कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तमनुव्रतौ ॥

bhagadattastataḥ paścādgajānīkena saṃvṛtaḥ | kṛpaśca kṛtavarmā ca bhagadattamanuvratau

उनके पीछे हाथियों की सेना से घिरे भगदत्त थे, और कृप तथा कृतवर्मा भगदत्त के पीछे-पीछे चल रहे थे।

श्लोक 14 (6.108.14)

काम्भोजराजो बलवांस्ततः पश्चात्सुदक्षिणः । मागधश्च जयत्सेनः सौबलश्च बृहद्बलः ॥

kāmbhojarājo balavāṃstataḥ paścātsudakṣiṇaḥ | māgadhaśca jayatsenaḥ saubalaśca bṛhadbalaḥ

उनके पीछे बलवान काम्बोजराज सुदक्षिण, मगधराज जयत्सेन, सुबलपुत्र शकुनि और बृहद्बल थे।

श्लोक 15 (6.108.15)

तथैवान्ये महेष्वासाः सुशर्मप्रमुखा नृपाः । जघनं पालयामासुस्तव सैन्यस्य भारत ॥

tathaivānye maheṣvāsāḥ suśarmapramukhā nṛpāḥ | jaghanaṃ pālayāmāsustava sainyasya bhārata

हे भारत, इसी प्रकार सुशर्मा आदि दूसरे महाधनुर्धर राजा आपकी सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 16 (6.108.16)

दिवसेदिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि । आसुरानकरोद्व्यूहान्पैशाचानथ राक्षसान् ॥

divasedivase prāpte bhīṣmaḥ śāntanavo yudhi | āsurānakarodvyūhānpaiśācānatha rākṣasān

प्रतिदिन, हर नया दिन आने पर, शान्तनुनन्दन भीष्म युद्ध में आसुर, पैशाच और राक्षस व्यूहों की रचना करते थे।

श्लोक 17 (6.108.17)

ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां च भारत । अन्योन्यं निघ्नतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tava teṣāṃ ca bhārata | anyonyaṃ nighnatāṃ rājanyamarāṣṭravivardhanam

हे भारत, तब आपके और उनके सैनिकों में युद्ध छिड़ गया; राजन्, एक-दूसरे को मारते हुए वे यमराज के राज्य को बढ़ाने लगे।

श्लोक 18 (6.108.18)

अर्जुनप्रमुखाः पार्थाः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । भीष्मं युद्धेऽभ्यवर्तन्त किरन्तो विविधाञ्शरान् ॥

arjunapramukhāḥ pārthāḥ puraskṛtya śikhaṇḍinam | bhīṣmaṃ yuddhe'bhyavartanta kiranto vividhāñśarān

अर्जुन के नेतृत्व में पार्थ शिखण्डी को आगे करके नाना प्रकार के बाण बरसाते हुए युद्ध में भीष्म की ओर बढ़े।

श्लोक 19 (6.108.19)

तत्र भारत भीमेन ताडितास्तावकाः शरैः । रुधिरौघपरिक्लिन्नाः परलोकं ययुस्तदा ॥

tatra bhārata bhīmena tāḍitāstāvakāḥ śaraiḥ | rudhiraughapariklinnāḥ paralokaṃ yayustadā

हे भारत, वहाँ भीम के बाणों से आहत होकर रक्त की धाराओं से भीगे हुए आपके सैनिक परलोक को चले गए।

श्लोक 20 (6.108.20)

नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः । तव सैन्यं समासाद्य पीडयामासुरोजसा ॥

nakulaḥ sahadevaśca sātyakiśca mahārathaḥ | tava sainyaṃ samāsādya pīḍayāmāsurojasā

नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि ने आपकी सेना पर टूटकर अपने बल से उसे पीड़ित किया।

श्लोक 21 (6.108.21)

ते वध्यमानाः समरे तावका भरतर्षभ । नाशक्नुवन्वारयितुं पाण्डवानां महद्बलम् ॥

te vadhyamānāḥ samare tāvakā bharatarṣabha | nāśaknuvanvārayituṃ pāṇḍavānāṃ mahadbalam

हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध में मारे जाते हुए आपके सैनिक पाण्डवों की विशाल सेना को रोक न सके।

श्लोक 22 (6.108.22)

ततस्तु तावकं सैन्यं वध्यमानं समन्ततः । संप्राद्रवद्दश दिशः काल्यमानं महारथैः ॥

tatastu tāvakaṃ sainyaṃ vadhyamānaṃ samantataḥ | saṃprādravaddaśa diśaḥ kālyamānaṃ mahārathaiḥ

तब चारों ओर से मारी जाती और महारथियों द्वारा खदेड़ी जाती आपकी सेना दसों दिशाओं में भाग खड़ी हुई।

श्लोक 23 (6.108.23)

त्रातारं नाध्यगच्छन्त तावका भरतर्षभ । वध्यमानाः शितैर्बाणैः पाण्डवैः सह सृञ्जयैः ॥

trātāraṃ nādhyagacchanta tāvakā bharatarṣabha | vadhyamānāḥ śitairbāṇaiḥ pāṇḍavaiḥ saha sṛñjayaiḥ

हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों और सृञ्जयों के तीखे बाणों से मारे जाते हुए आपके सैनिकों को कोई रक्षक न मिला।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 24 (6.108.24)

पीड्यमानं बलं दृष्ट्वा पार्थैर्भीष्मः पराक्रमी । यदकार्षीद्रणे क्रुद्धस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

pīḍyamānaṃ balaṃ dṛṣṭvā pārthairbhīṣmaḥ parākramī | yadakārṣīdraṇe kruddhastanmamācakṣva sañjaya

पार्थों से अपनी सेना को पीड़ित होते देखकर पराक्रमी भीष्म ने क्रोध में भरकर युद्ध में क्या किया? संजय, यह मुझे बताओ।

श्लोक 25 (6.108.25)

कथं वा पाण्डवा युद्धे प्रत्युद्याताः परंतपाः । निघ्नन्तो मामकान्वीरांस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

kathaṃ vā pāṇḍavā yuddhe pratyudyātāḥ paraṃtapāḥ | nighnanto māmakānvīrāṃstanmamācakṣva sañjaya

और शत्रुओं को तपाने वाले पाण्डव मेरे वीरों को मारते हुए युद्ध में कैसे आगे बढ़े? संजय, यह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (6.108.26)

आचक्षे ते महाराज यदकार्षीत्पिता तव । पीडिते तव पुत्रस्य सैन्ये पाण्डवसृञ्जयैः ॥

ācakṣe te mahārāja yadakārṣītpitā tava | pīḍite tava putrasya sainye pāṇḍavasṛñjayaiḥ

महाराज, जब आपके पुत्र की सेना पाण्डवों और सृञ्जयों से पीड़ित हुई, तब आपके पिता भीष्म ने जो किया, वह मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 27 (6.108.27)

प्रहृष्टमनसः शूराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । अभ्यवर्तन्त निघ्नन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥

prahṛṣṭamanasaḥ śūrāḥ pāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | abhyavartanta nighnantastava putrasya vāhinīm

हे पाण्डु के बड़े भाई, प्रसन्नचित्त शूरवीर पाण्डव आपके पुत्र की सेना को मारते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 28 (6.108.28)

तं विनाशं मनुष्येन्द्र नरवारणवाजिनाम् । नामृष्यत तदा भीष्मः सैन्यघातं रणे परैः ॥

taṃ vināśaṃ manuṣyendra naravāraṇavājinām | nāmṛṣyata tadā bhīṣmaḥ sainyaghātaṃ raṇe paraiḥ

हे नरेन्द्र, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों का वह विनाश, युद्ध में शत्रुओं द्वारा अपनी सेना का वह संहार, तब भीष्म सहन न कर सके।

श्लोक 29 (6.108.29)

स पाण्डवान्महेष्वासः पञ्चालांश्चैव सृञ्जयान् । नाराचैर्वत्सदन्तैश्च शितैरञ्जलिकैस्तथा ॥

sa pāṇḍavānmaheṣvāsaḥ pañcālāṃścaiva sṛñjayān | nārācairvatsadantaiśca śitairañjalikaistathā

उन महाधनुर्धर ने पाण्डवों, पाञ्चालों और सृञ्जयों पर नाराचों, वत्सदन्तों और तीखे अञ्जलिक बाणों से

श्लोक 30 (6.108.30)

अभ्यवर्षत दुर्धर्षस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । स पाण्डवानां प्रवरान्पञ्च राजन्महारथान् ॥

abhyavarṣata durdharṣastyaktvā jīvitamātmanaḥ | sa pāṇḍavānāṃ pravarānpañca rājanmahārathān

प्राणों का मोह छोड़कर बाणों की वर्षा की; वे दुर्जय थे। राजन्, पाण्डवों के पाँच श्रेष्ठ महारथियों को

श्लोक 31 (6.108.31)

आत्तशस्त्रो रणे यत्नाद्वारयामास सायकैः । नानाशस्त्रास्त्रवर्षैस्तान्वीर्यामर्षप्रवेरितैः ॥

āttaśastro raṇe yatnādvārayāmāsa sāyakaiḥ | nānāśastrāstravarṣaistānvīryāmarṣapraveritaiḥ

उन्होंने हाथ में शस्त्र लेकर युद्ध में यत्नपूर्वक अपने बाणों से रोका। पराक्रम और क्रोध से प्रेरित नाना शस्त्रास्त्रों की वर्षा से

श्लोक 32 (6.108.32)

निजघ्ने समरे क्रुद्धो हस्त्यश्वं चामितं बहु । रथिनोऽपातयद्राजन्रथेभ्यः पुरुषर्षभ ॥

nijaghne samare kruddho hastyaśvaṃ cāmitaṃ bahu | rathino'pātayadrājanrathebhyaḥ puruṣarṣabha

उन्होंने क्रोध में भरकर युद्ध में असंख्य हाथियों और घोड़ों को मार डाला; हे नरश्रेष्ठ राजन्, उन्होंने रथियों को रथों से गिराया,

श्लोक 33 (6.108.33)

सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यः पादातांश्च समागतान् ॥

sādinaścāśvapṛṣṭhebhyaḥ pādātāṃśca samāgatān

घुड़सवारों को घोड़ों की पीठ से, और सामने आए पैदल सैनिकों को भी,

श्लोक 34 (6.108.34)

गजारोहान्गजेभ्यश्च परेषां जयकारिणः । तमेकं समरे भीष्मं त्वरमाणं महारथम् ॥

gajārohāngajebhyaśca pareṣāṃ jayakāriṇaḥ | tamekaṃ samare bhīṣmaṃ tvaramāṇaṃ mahāratham

और शत्रुओं को विजय दिलाने वाले गजारोहियों को हाथियों से गिराया। युद्ध में अकेले और शीघ्रता करते उन महारथी भीष्म पर

श्लोक 35 (6.108.35)

पाण्डवाः समवर्तन्त वज्रहस्तमिवासुराः । शक्राशनिसमस्पर्शान्विमुञ्चन्निशिताञ्छरान् ॥

pāṇḍavāḥ samavartanta vajrahastamivāsurāḥ | śakrāśanisamasparśānvimuñcanniśitāñcharān

पाण्डव वैसे ही टूट पड़े जैसे असुर वज्रधारी इन्द्र पर टूट पड़े थे। इन्द्र के वज्र के समान स्पर्श वाले तीखे बाण छोड़ते हुए

श्लोक 36 (6.108.36)

दिक्ष्वदृश्यत सर्वासु घोरं सन्धारयन्वपुः । मण्डलीभूतमेवास्य नित्यं धनुरदृश्यत ॥

dikṣvadṛśyata sarvāsu ghoraṃ sandhārayanvapuḥ | maṇḍalībhūtamevāsya nityaṃ dhanuradṛśyata

वे भयंकर रूप धारण किए सभी दिशाओं में दिखाई देते थे। उनका धनुष सदा मण्डलाकार खिंचा हुआ ही दिखता था,

श्लोक 37 (6.108.37)

संग्रामे युध्यमानस्य शक्रचापोपमं महत् । तद्दृष्ट्वा समरे कर्म पुत्रास्तव विशांपते ॥

saṃgrāme yudhyamānasya śakracāpopamaṃ mahat | taddṛṣṭvā samare karma putrāstava viśāṃpate

जब वे युद्ध में लड़ रहे थे, तब वह इन्द्रधनुष के समान विशाल प्रतीत होता था। हे प्रजानाथ, युद्ध में उनका वह पराक्रम देखकर आपके पुत्र

श्लोक 38 (6.108.38)

विस्मयं परमं गत्वा पितामहमपूजयन् । पार्था विमनसो भूत्वा प्रैक्षन्त पितरं तव ॥

vismayaṃ paramaṃ gatvā pitāmahamapūjayan | pārthā vimanaso bhūtvā praikṣanta pitaraṃ tava

परम विस्मय में भरकर पितामह का सम्मान करने लगे। पार्थ उदास होकर आपके पिता को वैसे ही देखते रहे

श्लोक 39 (6.108.39)

युध्यमानं रणे शूरं विप्रचित्तिमिवामराः । न चैनं वारयामासुर्व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥

yudhyamānaṃ raṇe śūraṃ vipracittimivāmarāḥ | na cainaṃ vārayāmāsurvyāttānanamivāntakam

जैसे देवता युद्ध में लड़ते हुए शूरवीर विप्रचित्ति को देखते थे; और मुँह फाड़े हुए काल के समान उन भीष्म को वे रोक न सके।

श्लोक 40 (6.108.40)

दशमेऽहनि संप्राप्ते रथानीकं शिखण्डिनः । अदहन्निशितैर्बाणैः कृष्णवर्त्मेव काननम् ॥

daśame'hani saṃprāpte rathānīkaṃ śikhaṇḍinaḥ | adahanniśitairbāṇaiḥ kṛṣṇavartmeva kānanam

दसवाँ दिन आने पर उन्होंने तीखे बाणों से शिखण्डी की रथ-सेना को वैसे ही भस्म कर दिया जैसे आग वन को जला देती है।

श्लोक 41 (6.108.41)

तं शिखण्डी त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे । आशीविषमिव क्रुद्धं कालसृष्टमिवान्तकम् ॥

taṃ śikhaṇḍī tribhirbāṇairabhyavidhyatstanāntare | āśīviṣamiva kruddhaṃ kālasṛṣṭamivāntakam

क्रुद्ध विषधर सर्प के समान और काल द्वारा भेजे गए यमराज के समान उन भीष्म की छाती के बीच शिखण्डी ने तीन बाण मारे।

श्लोक 42 (6.108.42)

स तेनातिभृशं विद्धः प्रेक्ष्य भीष्मः शिखण्डिनम् । पुनर्नालोकयत्क्रुद्धः प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥

sa tenātibhṛśaṃ viddhaḥ prekṣya bhīṣmaḥ śikhaṇḍinam | punarnālokayatkruddhaḥ prahasannidamabravīt

उसके बाणों से अत्यन्त घायल भीष्म ने शिखण्डी की ओर देखा, फिर क्रोध में उसकी ओर दोबारा नहीं देखा, और हँसते हुए यह कहा:

भीष्म उवाच

श्लोक 43 (6.108.43)

कामं प्रहर वा मा वा न त्वां योत्स्ये कथंचन । यैव हि त्वं कृता धात्रा सैव हि त्वं शिखण्डिनी ॥

kāmaṃ prahara vā mā vā na tvāṃ yotsye kathaṃcana | yaiva hi tvaṃ kṛtā dhātrā saiva hi tvaṃ śikhaṇḍinī

चाहे प्रहार करो या न करो, मैं तुमसे किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। विधाता ने तुम्हें जैसी बनाया था, तुम अब भी वही शिखण्डिनी हो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 44 (6.108.44)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिखण्डी क्रोधमूर्च्छितः । उवाच भीष्मं समरे सृक्विणी परिलेलिहन् ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā śikhaṇḍī krodhamūrcchitaḥ | uvāca bhīṣmaṃ samare sṛkviṇī parilelihan

उनकी वह बात सुनकर क्रोध से मूर्च्छित-सा शिखण्डी अपने होठों के कोने चाटता हुआ युद्ध में भीष्म से बोला:

शिखण्ड्युवाच

श्लोक 45 (6.108.45)

जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रियाणां भयंकरम् । मया श्रुतं च ते युद्धं जामदग्न्येन वै सह ॥

jānāmi tvāṃ mahābāho kṣatriyāṇāṃ bhayaṃkaram | mayā śrutaṃ ca te yuddhaṃ jāmadagnyena vai saha

हे महाबाहो, मैं जानता हूँ कि तुम क्षत्रियों के लिए भयंकर हो; और जमदग्निपुत्र परशुराम के साथ तुम्हारे युद्ध की बात भी मैंने सुनी है।

श्लोक 46 (6.108.46)

दिव्यश्च ते प्रभावोऽयं मया च बहुशः श्रुतः । जानन्नपि प्रभावं ते योत्स्येऽद्याहं त्वया सह ॥

divyaśca te prabhāvo'yaṃ mayā ca bahuśaḥ śrutaḥ | jānannapi prabhāvaṃ te yotsye'dyāhaṃ tvayā saha

तुम्हारे इस दिव्य प्रभाव के विषय में भी मैंने बहुत बार सुना है। तुम्हारे प्रभाव को जानते हुए भी आज मैं तुमसे युद्ध करूँगा।

श्लोक 47 (6.108.47)

पाण्डवानां प्रियं कुर्वन्नात्मनश्च नरोत्तम । अद्य त्वां योधयिष्यामि रणे पुरुषसत्तम ॥

pāṇḍavānāṃ priyaṃ kurvannātmanaśca narottama | adya tvāṃ yodhayiṣyāmi raṇe puruṣasattama

हे नरश्रेष्ठ, पाण्डवों का और अपना भी प्रिय करते हुए, हे पुरुषोत्तम, आज मैं तुम्हें युद्ध में लड़ने को विवश करूँगा।

श्लोक 48 (6.108.48)

ध्रुवं च त्वां हनिष्यामि शपे सत्येन तेऽग्रतः । एतच्छ्रुत्वा च मद्वाक्यं यत्कृत्यं तत्समाचर ॥

dhruvaṃ ca tvāṃ haniṣyāmi śape satyena te'grataḥ | etacchrutvā ca madvākyaṃ yatkṛtyaṃ tatsamācara

और मैं निश्चय ही तुम्हें मार डालूँगा; यह मैं तुम्हारे सामने सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ। मेरी यह बात सुनकर जो करना हो, करो।

श्लोक 49 (6.108.49)

कामं युध्यस्व वा मा वा न मे जीवन्प्रमोक्ष्यसे । सुदृष्टः क्रियतां भीष्म लोकोऽयं समितिंजय ॥

kāmaṃ yudhyasva vā mā vā na me jīvanpramokṣyase | sudṛṣṭaḥ kriyatāṃ bhīṣma loko'yaṃ samitiṃjaya

चाहे लड़ो या न लड़ो, तुम मुझसे जीवित नहीं छूटोगे। हे युद्धविजयी भीष्म, इस संसार को भली-भाँति देख लो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 50 (6.108.50)

एवमुक्त्वा ततो भीष्मं पञ्चभिर्नतपर्वभिः । अविध्यत रणे भीष्मं प्रतुदन्वाक्यसायकैः ॥

evamuktvā tato bhīṣmaṃ pañcabhirnataparvabhiḥ | avidhyata raṇe bhīṣmaṃ pratudanvākyasāyakaiḥ

यह कहकर उसने युद्ध में भीष्म को झुकी गाँठों वाले पाँच बाणों से बींध दिया और अपने वचन-बाणों से भी उन्हें बेधता रहा।

श्लोक 51 (6.108.51)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सव्यसाची महारथः । कालोऽयमिति संचिन्त्य शिखण्डिनमचोदयत् ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā savyasācī mahārathaḥ | kālo'yamiti saṃcintya śikhaṇḍinamacodayat

उसकी बात सुनकर महारथी सव्यसाची अर्जुन ने "यही समय है" ऐसा सोचकर शिखण्डी को प्रेरित किया:

अर्जुन उवाच

श्लोक 52 (6.108.52)

अहं त्वामनुयास्यामि परान्विद्रावयञ्शरैः । अभिद्रव सुसंरब्धो भीष्मं भीमपराक्रमम् ॥

ahaṃ tvāmanuyāsyāmi parānvidrāvayañśaraiḥ | abhidrava susaṃrabdho bhīṣmaṃ bhīmaparākramam

मैं बाणों से शत्रुओं को खदेड़ता हुआ तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। तुम क्रोध में भरकर भयंकर पराक्रमी भीष्म पर टूट पड़ो।

श्लोक 53 (6.108.53)

न हि ते संयुगे पीडां शक्ताः कर्तुं महाबलाः । तस्मादद्य महाबाहो यत्नाद्भीष्ममभिद्रव ॥

na hi te saṃyuge pīḍāṃ śaktāḥ kartuṃ mahābalāḥ | tasmādadya mahābāho yatnādbhīṣmamabhidrava

युद्ध में महाबली योद्धा तुम्हें पीड़ा नहीं पहुँचा सकते; इसलिए हे महाबाहो, आज पूरे यत्न से भीष्म पर धावा करो।

श्लोक 54 (6.108.54)

अहत्वा समरे भीष्मं यदि यास्यसि मारिष । अवहास्योऽस्य लोकस्य भविष्यसि मया सह ॥

ahatvā samare bhīṣmaṃ yadi yāsyasi māriṣa | avahāsyo'sya lokasya bhaviṣyasi mayā saha

हे मान्यवर, यदि तुम युद्ध में भीष्म को मारे बिना लौट जाओगे, तो मेरे साथ तुम भी संसार में उपहास के पात्र बनोगे।

श्लोक 55 (6.108.55)

नावहास्या यथा वीर भवेम परमाहवे । तथा कुरु रणे यत्नं साधयस्व पितामहम् ॥

nāvahāsyā yathā vīra bhavema paramāhave | tathā kuru raṇe yatnaṃ sādhayasva pitāmaham

हे वीर, इस महायुद्ध में जिससे हम उपहास के पात्र न बनें, वैसा यत्न युद्ध में करो और पितामह को गिरा दो।

श्लोक 56 (6.108.56)

कुरूंश्च सहितान्सर्वान्यतमानान्महारथान् । अहमावारयिष्यामि साधयस्व पितामहम् ॥

kurūṃśca sahitānsarvānyatamānānmahārathān | ahamāvārayiṣyāmi sādhayasva pitāmaham

मैं एक साथ जुटे हुए, प्रयत्न करते सब कौरव महारथियों को रोक लूँगा; तुम पितामह को गिरा दो।

श्लोक 57 (6.108.57)

द्रोणं च द्रोणपुत्रं च कृपं चाथ सुयोधनम् । चित्रसेनं विकर्णं च सैन्धवं च जयद्रथम् ॥

droṇaṃ ca droṇaputraṃ ca kṛpaṃ cātha suyodhanam | citrasenaṃ vikarṇaṃ ca saindhavaṃ ca jayadratham

द्रोण और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, कृप और सुयोधन, चित्रसेन और विकर्ण, तथा सिन्धुराज जयद्रथ,

श्लोक 58 (6.108.58)

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्भोजं च सुदक्षिणम् । भगदत्तं तथा शूरं मागधं च महाबलम् ॥

vindānuvindāvāvantyau kāmbhojaṃ ca sudakṣiṇam | bhagadattaṃ tathā śūraṃ māgadhaṃ ca mahābalam

अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, काम्बोज के सुदक्षिण, शूरवीर भगदत्त और महाबली मगधराज,

श्लोक 59 (6.108.59)

सौमदत्तिं तथा शूरमार्श्यशृङ्गिं च राक्षसम् । त्रिगर्तराजं च रणे सह सर्वैर्महारथैः ॥

saumadattiṃ tathā śūramārśyaśṛṅgiṃ ca rākṣasam | trigartarājaṃ ca raṇe saha sarvairmahārathaiḥ

शूरवीर सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, ऋष्यशृंग का पुत्र राक्षस अलम्बुष, और युद्ध में सब महारथियों के साथ त्रिगर्तराज,

श्लोक 60 (6.108.60)

अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् । कुरूंश्च सहितान्सर्वान्युध्यमानान्महाबलान् । निवारयिष्यामि रणे साधयस्व पितामहम् ॥

ahamāvārayiṣyāmi veleva makarālayam | kurūṃśca sahitānsarvānyudhyamānānmahābalān | nivārayiṣyāmi raṇe sādhayasva pitāmaham

इन सबको मैं वैसे ही रोक रखूँगा जैसे तट मकरों के निवास समुद्र को रोकता है। एक साथ जुटे, युद्ध करते सब महाबली कौरवों को मैं रण में रोक दूँगा; तुम पितामह को गिरा दो।

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