भीष्म पर्व · अध्याय 109
भीष्म का मारने या मरने का संकल्प
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि दसवें दिन शिखण्डी ने भीष्म पर कैसे आक्रमण किया और उसकी रक्षा किसने की। संजय बताते हैं कि अर्जुन ने सिंह की तरह गरजते हुए कौरव पंक्तियों को कैसे तितर-बितर किया, और दुर्योधन ने भीष्म से अपनी भागती सेना का सहारा बनने की प्रार्थना की। भीष्म उसे याद दिलाते हैं कि प्रतिदिन दस हजार क्षत्रियों को मारने की प्रतिज्ञा वे निभाते आए हैं, और संकल्प करते हैं कि आज या तो वे पाण्डवों को मारेंगे या स्वयं मारे जाकर रणभूमि में सोएँगे, और इस प्रकार स्वामी का ऋण चुकाएँगे। फिर वे पाण्डव सेना में घुसकर असंख्य मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों का संहार करते हैं; शत्रु उन्हें घेर लेते हैं और आपके पुत्र भी चारों ओर से उन्हें घेरकर युद्ध करने लगते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.109.1)
कथं शिखण्डी गाङ्गेयमभ्यधावत्पितामहम् । पाञ्चाल्यः समरे क्रुद्धो धर्मात्मानं यतव्रतम् ॥
kathaṃ śikhaṇḍī gāṅgeyamabhyadhāvatpitāmaham | pāñcālyaḥ samare kruddho dharmātmānaṃ yatavratam
पाञ्चालपुत्र शिखण्डी ने क्रोध में भरकर युद्ध में धर्मात्मा और व्रत के पक्के गंगानन्दन पितामह पर कैसे धावा किया?
श्लोक 2 (6.109.2)
केऽरक्षन्पाण्डवानीके शिखण्डिनमुदायुधाः । त्वरमाणास्त्वराकाले जिगीषन्तो महारथाः ॥
ke'rakṣanpāṇḍavānīke śikhaṇḍinamudāyudhāḥ | tvaramāṇāstvarākāle jigīṣanto mahārathāḥ
पाण्डव सेना के किन महारथियों ने अस्त्र उठाए, शीघ्रता के समय शीघ्रता करते हुए, विजय की इच्छा से शिखण्डी की रक्षा की?
श्लोक 3 (6.109.3)
कथं शान्तनवो भीष्मः स तस्मिन्दशमेऽहनि । अयुध्यत महावीर्यः पाण्डवैः सह सृञ्जयैः ॥
kathaṃ śāntanavo bhīṣmaḥ sa tasmindaśame'hani | ayudhyata mahāvīryaḥ pāṇḍavaiḥ saha sṛñjayaiḥ
उस दसवें दिन महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म पाण्डवों और सृञ्जयों से कैसे लड़े?
श्लोक 4 (6.109.4)
न मृष्यामि रणे भीष्मं प्रत्युद्यातं शिखण्डिना । कच्चिन्न रथभङ्गोऽस्य धनुर्वाऽशीर्यतास्यतः ॥
na mṛṣyāmi raṇe bhīṣmaṃ pratyudyātaṃ śikhaṇḍinā | kaccinna rathabhaṅgo'sya dhanurvā'śīryatāsyataḥ
युद्ध में शिखण्डी द्वारा भीष्म का सामना किया जाना मुझसे सहा नहीं जाता। कहीं उनका रथ तो नहीं टूट गया, या बाण चलाते समय उनका धनुष तो नहीं टूट गया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (6.109.5)
नाशीर्यत धनुश्चास्य रथभङ्गो न चाप्यभूत् । युध्यमानस्य संग्रामे भीष्मस्य भरतर्षभ । निघ्नतः समरे शत्रून्शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
nāśīryata dhanuścāsya rathabhaṅgo na cāpyabhūt | yudhyamānasya saṃgrāme bhīṣmasya bharatarṣabha | nighnataḥ samare śatrūnśaraiḥ sannataparvabhiḥ
हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध में लड़ते और झुकी गाँठों वाले बाणों से शत्रुओं का संहार करते हुए भीष्म का न धनुष टूटा, न रथ भंग हुआ।
श्लोक 6 (6.109.6)
अनेकशतसाहस्रास्तावकानां महारथाः । तथा दन्तिगणा राजन्हयाश्चैव सुसज्जिताः ॥
anekaśatasāhasrāstāvakānāṃ mahārathāḥ | tathā dantigaṇā rājanhayāścaiva susajjitāḥ
राजन्, आपके लाखों महारथी, उसी प्रकार हाथियों के झुंड और भली-भाँति सजे हुए घोड़े
श्लोक 7 (6.109.7)
अभ्यवर्तन्त युद्धाय पुरस्कृत्य पितामहम् ॥
abhyavartanta yuddhāya puraskṛtya pitāmaham
पितामह को आगे करके युद्ध के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 8 (6.109.8)
यथाप्रतिज्ञं कौरव्य स चापि समितिंजयः । पार्थानामकरोद्भीष्मः सततं समिति क्षयम् ॥
yathāpratijñaṃ kauravya sa cāpi samitiṃjayaḥ | pārthānāmakarodbhīṣmaḥ satataṃ samiti kṣayam
हे कुरुनन्दन, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार संग्रामविजयी भीष्म युद्ध में पार्थों का निरन्तर संहार करते रहे।
श्लोक 9 (6.109.9)
युध्यमानं महेष्वासं विनिघ्नन्तं पराञ्शरैः । पाञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं सर्वतः पर्यवारयन् ॥
yudhyamānaṃ maheṣvāsaṃ vinighnantaṃ parāñśaraiḥ | pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ sarvataḥ paryavārayan
जब वे महाधनुर्धर बाणों से शत्रुओं को मारते हुए लड़ रहे थे, तब पाञ्चालों ने पाण्डवों के साथ मिलकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 10 (6.109.10)
दशमेऽहनि संप्राप्ते ततस्तां रिपुवाहिनीम् । कीर्यमाणां शितैर्बाणैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
daśame'hani saṃprāpte tatastāṃ ripuvāhinīm | kīryamāṇāṃ śitairbāṇaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
दसवाँ दिन आने पर शत्रुओं की वह सेना उनके तीखे बाणों से सैकड़ों और हजारों की संख्या में छिन्न-भिन्न होती रही।
श्लोक 11 (6.109.11)
न हि भीष्मं महेष्वासं पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । अशक्नुवन्रणे जेतुं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥
na hi bhīṣmaṃ maheṣvāsaṃ pāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | aśaknuvanraṇe jetuṃ pāśahastamivāntakam
हे पाण्डु के बड़े भाई, पाण्डव युद्ध में महाधनुर्धर भीष्म को वैसे ही न जीत सके जैसे हाथ में पाश लिये यमराज को कोई नहीं जीत सकता।
श्लोक 12 (6.109.12)
अथोपायान्महाराज सव्यसाची धनञ्जयः । त्रासयन्रथिनः सर्वान्बीभत्सुरपराजितः ॥
athopāyānmahārāja savyasācī dhanañjayaḥ | trāsayanrathinaḥ sarvānbībhatsuraparājitaḥ
महाराज, तब अपराजित बीभत्सु सव्यसाची धनंजय सब रथियों को भयभीत करते हुए आ पहुँचे।
श्लोक 13 (6.109.13)
सिंहवद्विनदन्नुच्चैर्धनुर्ज्यां विक्षिपन्मुहुः । शरौघान्विसृजन्पार्थो व्यचरत्कालवद्रणे ॥
siṃhavadvinadannuccairdhanurjyāṃ vikṣipanmuhuḥ | śaraughānvisṛjanpārtho vyacaratkālavadraṇe
सिंह के समान ऊँचे स्वर में गरजते और बार-बार धनुष की डोरी टंकारते हुए, बाणों की बौछार करते पार्थ रणभूमि में काल के समान विचरने लगे।
श्लोक 14 (6.109.14)
तस्य शब्देन वित्रस्तास्तावका भारतर्षभ । सिंहस्येव मृगा राजन्व्यद्रवन्त महाभयात् ॥
tasya śabdena vitrastāstāvakā bhāratarṣabha | siṃhasyeva mṛgā rājanvyadravanta mahābhayāt
हे भरतश्रेष्ठ राजन्, उस गर्जना से डरे हुए आपके सैनिक बड़े भय से वैसे ही भागे जैसे सिंह से हिरन भागते हैं।
श्लोक 15 (6.109.15)
जयन्तं पाण्डवं दृष्ट्वा त्वत्सैन्यं चाभिपीडितम् । दुर्योधनस्ततो भीष्ममब्रवीद्भृशपीडितः ॥
jayantaṃ pāṇḍavaṃ dṛṣṭvā tvatsainyaṃ cābhipīḍitam | duryodhanastato bhīṣmamabravīdbhṛśapīḍitaḥ
पाण्डुपुत्र को विजयी होते और आपकी सेना को अत्यन्त पीड़ित देखकर बहुत दुखी दुर्योधन ने तब भीष्म से कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 16 (6.109.16)
एष पाण्डुसुतस्तात श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । दहते मामकान्सर्वान्कृष्णवर्त्मेव काननम् ॥
eṣa pāṇḍusutastāta śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ | dahate māmakānsarvānkṛṣṇavartmeva kānanam
तात, श्वेत घोड़ों वाला और श्रीकृष्ण को सारथि बनाए यह पाण्डुपुत्र मेरे सब सैनिकों को वैसे ही जला रहा है जैसे आग वन को जलाती है।
श्लोक 17 (6.109.17)
पश्य सैन्यानि गाङ्गेय द्रवमाणानि सर्वशः । पाण्डवेन युधां श्रेष्ठ काल्यमानानि संयुगे ॥
paśya sainyāni gāṅgeya dravamāṇāni sarvaśaḥ | pāṇḍavena yudhāṃ śreṣṭha kālyamānāni saṃyuge
हे गंगानन्दन, हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, देखिए, युद्ध में पाण्डुपुत्र द्वारा खदेड़ी जाती मेरी सेनाएँ सब ओर भाग रही हैं।
श्लोक 18 (6.109.18)
यथा पशुगणान्पालः संकालयति कानने । तथेदं मामकं सैन्यं काल्यते शत्रुतापन ॥
yathā paśugaṇānpālaḥ saṃkālayati kānane | tathedaṃ māmakaṃ sainyaṃ kālyate śatrutāpana
हे शत्रुओं को तपाने वाले, जैसे ग्वाला वन में पशुओं के झुंड को हाँकता है, वैसे ही मेरी यह सेना हाँकी जा रही है।
श्लोक 19 (6.109.19)
धनञ्जयशरैर्भग्नं द्रवमाणं ततस्ततः । भीमोऽप्येवं दुराधर्षो विद्रावयति मे बलम् ॥
dhanañjayaśarairbhagnaṃ dravamāṇaṃ tatastataḥ | bhīmo'pyevaṃ durādharṣo vidrāvayati me balam
धनंजय के बाणों से छिन्न-भिन्न होकर वह इधर-उधर भाग रही है; और दुर्जय भीम भी इसी प्रकार मेरी सेना को भगा रहे हैं।
श्लोक 20 (6.109.20)
सात्यकिश्चेकितानश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । अभिमन्युः सुविक्रान्तो वाहिनीं द्रवते मम ॥
sātyakiścekitānaśca mādrīputrau ca pāṇḍavau | abhimanyuḥ suvikrānto vāhinīṃ dravate mama
सात्यकि और चेकितान, माद्री के दोनों पुत्र पाण्डव नकुल-सहदेव, और अत्यन्त पराक्रमी अभिमन्यु मेरी सेना को भगा रहे हैं।
श्लोक 21 (6.109.21)
धृष्टद्युम्नस्तथा शूरो राक्षसश्च घटोत्कचः । व्यद्रावयेतां सहसा सैन्यं मम महारणे ॥
dhṛṣṭadyumnastathā śūro rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | vyadrāvayetāṃ sahasā sainyaṃ mama mahāraṇe
शूरवीर धृष्टद्युम्न और राक्षस घटोत्कच ने इस महायुद्ध में सहसा मेरी सेना को भगा दिया है।
श्लोक 22 (6.109.22)
वध्यमानस्य सैन्यस्य सर्वैरेतैर्महारथैः । नान्यां गतिं प्रपश्यामि स्थाने युद्धे च भारत ॥
vadhyamānasya sainyasya sarvairetairmahārathaiḥ | nānyāṃ gatiṃ prapaśyāmi sthāne yuddhe ca bhārata
हे भारत, इन सब महारथियों द्वारा मारी जाती मेरी सेना के लिए, टिके रहने या युद्ध करने में, मुझे कोई दूसरा सहारा नहीं दिखता,
श्लोक 23 (6.109.23)
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र देवतुल्यपराक्रमम् । पर्याप्तस्तु भवाञ्शीघ्रं पीडितानां गतिर्भव ॥
ṛte tvāṃ puruṣavyāghra devatulyaparākramam | paryāptastu bhavāñśīghraṃ pīḍitānāṃ gatirbhava
सिवा आपके, हे पुरुषसिंह, जिनका पराक्रम देवताओं के समान है। आप समर्थ हैं; शीघ्र ही इन पीड़ितों का सहारा बनिए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (6.109.24)
एवमुक्तो महाराज पिता देवव्रतस्तव । चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु कृत्वा निश्चयमात्मनः ॥
evamukto mahārāja pitā devavratastava | cintayitvā muhūrtaṃ tu kṛtvā niścayamātmanaḥ
महाराज, ऐसा कहे जाने पर आपके पिता देवव्रत ने क्षण भर विचार किया और मन में निश्चय करके,
श्लोक 25 (6.109.25)
तव संधारयन्पुत्रमब्रवीच्छंतनोः सुतः । दुर्योधन विजानीहि स्थिरो भूत्वा विशांपते ॥
tava saṃdhārayanputramabravīcchaṃtanoḥ sutaḥ | duryodhana vijānīhi sthiro bhūtvā viśāṃpate
आपके पुत्र को ढाढ़स बँधाते हुए शान्तनुनन्दन बोले: "हे प्रजानाथ दुर्योधन, स्थिर होकर यह जान लो।
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (6.109.26)
पातयिष्ये रिपूनन्यान्पाण्डवान्प्रतिपालयन् । प्रतिज्ञातो जयो ह्यद्य पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
pātayiṣye ripūnanyānpāṇḍavānpratipālayan | pratijñāto jayo hyadya pāṇḍavānāṃ mahātmanām
पाण्डवों को बचाते हुए मैं दूसरे शत्रुओं को गिराऊँगा, क्योंकि आज महात्मा पाण्डवों को विजय का वचन दिया जा चुका है।
श्लोक 27 (6.109.27)
पूर्वकालं तव मया प्रतिज्ञानं महाबल । हत्वा दशसहस्राणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ॥
pūrvakālaṃ tava mayā pratijñānaṃ mahābala | hatvā daśasahasrāṇi kṣatriyāṇāṃ mahātmanām
हे महाबली, मैंने पहले ही तुमसे प्रतिज्ञा की थी कि दस हजार महात्मा क्षत्रियों को मारकर
श्लोक 28 (6.109.28)
संग्रामादपयास्यामि ह्येतत्कर्म समाहितम् । इति तत्कृतवांश्चाहं यथोक्तं भरतर्षभ ॥
saṃgrāmādapayāsyāmi hyetatkarma samāhitam | iti tatkṛtavāṃścāhaṃ yathoktaṃ bharatarṣabha
मैं युद्ध से लौटूँगा; यही कार्य मैंने अपने लिए ठहराया था। हे भरतश्रेष्ठ, जैसा कहा था, वैसा ही मैंने किया भी है।
श्लोक 29 (6.109.29)
अद्य चापि महत्कर्म प्रकरिष्ये यथाबलम् । अहं वाऽद्य हतः शेष्ये हनिष्ये वाऽद्य पाण्डवान् ॥
adya cāpi mahatkarma prakariṣye yathābalam | ahaṃ vā'dya hataḥ śeṣye haniṣye vā'dya pāṇḍavān
आज भी मैं अपनी पूरी शक्ति से महान कर्म करूँगा: या तो आज मैं मारा जाकर रणभूमि में सोऊँगा, या आज पाण्डवों को मार डालूँगा।
श्लोक 30 (6.109.30)
अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः । किं पुनर्मर्त्यधर्मेण क्षत्रियेण महाबलाः ॥
aśakyāḥ pāṇḍavā jetuṃ devairapi savāsavaiḥ | kiṃ punarmartyadharmeṇa kṣatriyeṇa mahābalāḥ
इन्द्र सहित देवता भी पाण्डवों को नहीं जीत सकते; फिर मरणधर्मा क्षत्रिय उन महाबलियों को कैसे जीत सकता है!
श्लोक 31 (6.109.31)
अद्य ते पुरुषव्याघ्र प्रतरिष्ये ऋणं तव । भर्तृपिण्डकृतं राजन्निहतः पृतनामुखे ॥
adya te puruṣavyāghra pratariṣye ṛṇaṃ tava | bhartṛpiṇḍakṛtaṃ rājannihataḥ pṛtanāmukhe
हे पुरुषसिंह राजन्, आज सेना के अग्रभाग में मारा जाकर मैं स्वामी के अन्न से उपजा तुम्हारा ऋण चुका दूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 32 (6.109.32)
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ क्षत्रियान्प्रवपञ्छरैः । आससाद दुराधर्षः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
ityuktvā bharataśreṣṭha kṣatriyānpravapañcharaiḥ | āsasāda durādharṣaḥ pāṇḍavānāmanīkinīm
हे भरतश्रेष्ठ, यह कहकर क्षत्रियों पर बाण बिखेरते हुए वे दुर्जय भीष्म पाण्डवों की सेना पर जा पहुँचे।
श्लोक 33 (6.109.33)
अनीकमध्ये तिष्ठन्तं गाङ्गेयं भारतर्षभ । आशीविषमिव क्रुद्धं पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥
anīkamadhye tiṣṭhantaṃ gāṅgeyaṃ bhāratarṣabha | āśīviṣamiva kruddhaṃ pāṇḍavāḥ pratyavārayan
हे भरतश्रेष्ठ, सेना के बीच क्रुद्ध विषधर सर्प के समान खड़े गंगानन्दन को पाण्डवों ने रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 34 (6.109.34)
दशमेऽहनि भीष्मस्तु दर्शयञ्शक्तिमात्मनः । राजञ्शतसहस्राणि सोऽवधीत्कुरुनन्दन ॥
daśame'hani bhīṣmastu darśayañśaktimātmanaḥ | rājañśatasahasrāṇi so'vadhītkurunandana
हे कुरुनन्दन राजन्, दसवें दिन अपनी शक्ति दिखाते हुए भीष्म ने एक लाख योद्धाओं को मार डाला।
श्लोक 35 (6.109.35)
पाञ्चालानां च ये श्रेष्ठा राजपुत्रा महारथाः । तेषामादत्त तेजांसि जलं सूर्य इवांशुभिः ॥
pāñcālānāṃ ca ye śreṣṭhā rājaputrā mahārathāḥ | teṣāmādatta tejāṃsi jalaṃ sūrya ivāṃśubhiḥ
पाञ्चालों के जो श्रेष्ठ महारथी राजकुमार थे, उनका तेज उन्होंने वैसे ही हर लिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से जल सोख लेता है।
श्लोक 36 (6.109.36)
हत्वा दशसहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । सारोहाणां महाराज हयानां चायुतं तथा ॥
hatvā daśasahasrāṇi kuñjarāṇāṃ tarasvinām | sārohāṇāṃ mahārāja hayānāṃ cāyutaṃ tathā
महाराज, दस हजार वेगवान हाथियों और सवारों सहित दस हजार घोड़ों को मारकर,
श्लोक 37 (6.109.37)
पूर्णे शतसहस्रे द्वे पादातानां नरोत्तमः । प्रजज्वाल रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥
pūrṇe śatasahasre dve pādātānāṃ narottamaḥ | prajajvāla raṇe bhīṣmo vidhūma iva pāvakaḥ
तथा पूरे दो लाख पैदल सैनिकों का संहार करके नरश्रेष्ठ भीष्म युद्ध में धूमरहित अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 38 (6.109.38)
न चैवं पाण्डवेयानां केचिच्छेकुर्निरीक्षितुम् । उत्तरं मार्गमास्थाय तपन्तमिव भास्करम् ॥
na caivaṃ pāṇḍaveyānāṃ kecicchekurnirīkṣitum | uttaraṃ mārgamāsthāya tapantamiva bhāskaram
पाण्डव पक्ष का कोई भी योद्धा उनकी ओर देख तक न सका, जैसे उत्तरायण में तपते सूर्य को कोई नहीं देख पाता।
श्लोक 39 (6.109.39)
ते पाण्डवेयाः संरब्धा महेष्वासेन पीडिताः । वधायाभ्यद्रवन्भीष्मं सृञ्जयाश्च महारथाः ॥
te pāṇḍaveyāḥ saṃrabdhā maheṣvāsena pīḍitāḥ | vadhāyābhyadravanbhīṣmaṃ sṛñjayāśca mahārathāḥ
उन महाधनुर्धर से पीड़ित होकर क्रोध में भरे पाण्डव और सृञ्जयों के महारथी भीष्म को मारने के लिए उन पर टूट पड़े।
श्लोक 40 (6.109.40)
स वध्यमानो बहुभिर्भीष्मः शान्तनवस्तथा । अवकीर्णो महेष्वासैः शैलो मेघैरिवावृतः ॥
sa vadhyamāno bahubhirbhīṣmaḥ śāntanavastathā | avakīrṇo maheṣvāsaiḥ śailo meghairivāvṛtaḥ
बहुत से योद्धाओं द्वारा मारे जाते शान्तनुनन्दन भीष्म महाधनुर्धरों के बाणों से वैसे ही ढक गए जैसे बादलों से घिरा पर्वत।
श्लोक 41 (6.109.41)
पुत्रास्तु तव गाङ्गेयं समन्तात्पर्यवारयन् । महत्या सेनया सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥
putrāstu tava gāṅgeyaṃ samantātparyavārayan | mahatyā senayā sārdhaṃ tato yuddhamavartata
किन्तु आपके पुत्रों ने विशाल सेना के साथ गंगानन्दन को चारों ओर से घेर लिया, और तब युद्ध चलने लगा।