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भीष्म पर्व · अध्याय 110

अर्जुन और दुःशासन का युद्ध

दसवें दिन अर्जुन शिखण्डी से निर्भय होकर भीष्म पर बढ़ने को कहते हैं, और समूची पाण्डव सेना उनके साथ पितामह पर टूट पड़ती है। सञ्जय बताते हैं कि कौरव पक्ष का कौन वीर किस पाण्डव योद्धा को रोकता है: चित्रसेन चेकितान को, कृतवर्मा धृष्टद्युम्न को, भूरिश्रवा भीम को, द्रोण युधिष्ठिर को, इत्यादि; उधर धृष्टद्युम्न अपनी सेना का उत्साह बढ़ाता है। दुःशासन अर्जुन को भीष्म तक पहुँचने से रोककर उनसे घोर युद्ध करता है; बुरी तरह घायल होकर वह भीष्म के रथ की शरण लेता है और फिर लौटकर लड़ने लगता है।

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.110.1)

अर्जुनस्तु रणे राजन्दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् । शिखण्डिनमथोवाच समभ्येहि पितामहम् ॥

arjunastu raṇe rājandṛṣṭvā bhīṣmasya vikramam | śikhaṇḍinamathovāca samabhyehi pitāmaham

हे राजन्, युद्ध में भीष्म का पराक्रम देखकर अर्जुन ने शिखण्डी से कहा: 'पितामह की ओर बढ़ो।'

अर्जुन उवाच

श्लोक 2 (6.110.2)

न चापि भीस्त्वया कार्या भीष्मादद्य कथंचन । अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्ये रथोत्तमात् ॥

na cāpi bhīstvayā kāryā bhīṣmādadya kathaṃcana | ahamenaṃ śaraistīkṣṇaiḥ pātayiṣye rathottamāt

आज तुम्हें भीष्म से किसी प्रकार भी डरने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपने तीखे बाणों से उन्हें उनके उत्तम रथ से गिरा दूँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (6.110.3)

एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ । अभ्यद्रवत गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥

evamuktastu pārthena śikhaṇḍī bharatarṣabha | abhyadravata gāṅgeyaṃ śrutvā pārthasya bhāṣitam

हे भरतश्रेष्ठ, पार्थ के ऐसा कहने पर उनकी बात सुनकर शिखण्डी गंगापुत्र पर टूट पड़ा।

श्लोक 4 (6.110.4)

धृष्टद्युम्नस्तथा राजन्सौभद्रश्च महारथः । हृष्टावाद्रवतां भीष्मं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥

dhṛṣṭadyumnastathā rājansaubhadraśca mahārathaḥ | hṛṣṭāvādravatāṃ bhīṣmaṃ śrutvā pārthasya bhāṣitam

हे राजन्, इसी प्रकार धृष्टद्युम्न और महारथी सौभद्र (अभिमन्यु) भी पार्थ की बात सुनकर हर्ष से भीष्म की ओर दौड़े।

श्लोक 5 (6.110.5)

विराटद्रुपदौ वृद्धौ कुन्तिभोजश्च दंशितः । अभ्यद्रवत गाङ्गेयं पुत्रस्य तव पश्यतः । नकुलः सहदेवश्च धर्मराजश्च वीर्यवान् ॥

virāṭadrupadau vṛddhau kuntibhojaśca daṃśitaḥ | abhyadravata gāṅgeyaṃ putrasya tava paśyataḥ | nakulaḥ sahadevaśca dharmarājaśca vīryavān

वृद्ध विराट और द्रुपद तथा कवचधारी कुन्तिभोज आपके पुत्र के देखते-देखते गंगापुत्र पर टूट पड़े; नकुल, सहदेव और पराक्रमी धर्मराज (युधिष्ठिर) भी,

श्लोक 6 (6.110.6)

तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशांपते । समाद्रवन्त गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥

tathetarāṇi sainyāni sarvāṇyeva viśāṃpate | samādravanta gāṅgeyaṃ śrutvā pārthasya bhāṣitam

और हे प्रजानाथ, बाकी सारी सेनाएँ भी पार्थ की बात सुनकर एक साथ गंगापुत्र पर टूट पड़ीं।

श्लोक 7 (6.110.7)

प्रत्युद्ययुस्तावकाश्च समेतांस्तान्महारथान् । यथाशक्ति यथोत्साहं तन्मे निगदतः शृणु ॥

pratyudyayustāvakāśca sametāṃstānmahārathān | yathāśakti yathotsāhaṃ tanme nigadataḥ śṛṇu

आपके योद्धा भी अपनी-अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार एक साथ आते उन महारथियों का सामना करने आगे बढ़े। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिए।

श्लोक 8 (6.110.8)

चित्रसेनो महाराज चेकितानं समभ्यायात् । भीष्मप्रेप्सुं रणे यान्तं वृषं व्याघ्रशिशुर्यथा ॥

citraseno mahārāja cekitānaṃ samabhyāyāt | bhīṣmaprepsuṃ raṇe yāntaṃ vṛṣaṃ vyāghraśiśuryathā

हे महाराज, भीष्म तक पहुँचने की इच्छा से रण में बढ़ते चेकितान पर चित्रसेन ऐसे झपटा, जैसे बाघ का बच्चा बैल पर झपटता है।

श्लोक 9 (6.110.9)

धृष्टद्युम्नं महाराज भीष्मान्तिकमुपागतम् । त्वरमाणं रणे यत्तं कृतवर्मा न्यवारयत् ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ mahārāja bhīṣmāntikamupāgatam | tvaramāṇaṃ raṇe yattaṃ kṛtavarmā nyavārayat

हे महाराज, भीष्म के निकट पहुँच चुके, शीघ्रता करते और युद्ध में सजग धृष्टद्युम्न को कृतवर्मा ने रोक लिया।

श्लोक 10 (6.110.10)

भीमसेनं सुसंक्रुद्धं गाङ्गेयस्य वधैषिणम् । त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिर्न्यवारयत् ॥

bhīmasenaṃ susaṃkruddhaṃ gāṅgeyasya vadhaiṣiṇam | tvaramāṇo mahārāja saumadattirnyavārayat

हे महाराज, अत्यन्त क्रुद्ध और गंगापुत्र के वध के इच्छुक भीमसेन को सोमदत्त के पुत्र (भूरिश्रवा) ने तेज़ी से बढ़कर रोक दिया।

श्लोक 11 (6.110.11)

तथैव नकुलं शूरं किरन्तं सायकान्बहून् । विकर्णो वारयामास इच्छन्भीष्मस्य जीवितम् ॥

tathaiva nakulaṃ śūraṃ kirantaṃ sāyakānbahūn | vikarṇo vārayāmāsa icchanbhīṣmasya jīvitam

इसी प्रकार बहुत-से बाण बरसाते शूरवीर नकुल को विकर्ण ने रोका, जो भीष्म के प्राणों की रक्षा चाहता था।

श्लोक 12 (6.110.12)

सहदेवं तथा राजन्यान्तं भीष्मरथं प्रति । वारयामास संक्रुद्धः कृपः शारद्वतो युधि ॥

sahadevaṃ tathā rājanyāntaṃ bhīṣmarathaṃ prati | vārayāmāsa saṃkruddhaḥ kṛpaḥ śāradvato yudhi

और हे राजन्, भीष्म के रथ की ओर जाते सहदेव को शरद्वान् के पुत्र कृप ने क्रोध में भरकर युद्ध में रोक लिया।

श्लोक 13 (6.110.13)

राक्षसं क्रूरकर्माणं भैमसेनिं महाबलम् । भीष्मस्य निधनप्रेप्सुं दुर्मुखोऽभ्यद्रवद्बली ॥

rākṣasaṃ krūrakarmāṇaṃ bhaimaseniṃ mahābalam | bhīṣmasya nidhanaprepsuṃ durmukho'bhyadravadbalī

बलवान् दुर्मुख भीमसेन के पुत्र, क्रूरकर्मा महाबली राक्षस (घटोत्कच) पर टूट पड़ा, जो भीष्म का अन्त चाहता था।

श्लोक 14 (6.110.14)

सात्यकिं समरे क्रुद्धमार्श्यशृङ्गिरवारयत् । भीष्मस्य वधमिच्छन्तं पाण्डवप्रीतिकाम्यया ॥

sātyakiṃ samare kruddhamārśyaśṛṅgiravārayat | bhīṣmasya vadhamicchantaṃ pāṇḍavaprītikāmyayā

युद्ध में क्रुद्ध सात्यकि को, जो पाण्डवों के प्रेमवश भीष्म का वध चाहता था, ऋष्यशृङ्ग के पुत्र (अलम्बुष) ने रोक लिया।

श्लोक 15 (6.110.15)

अभिमन्युं महाराज यान्तं भीष्मरथं प्रति । सुदक्षिणो महाराज काम्भोजः प्रत्यवारयत् ॥

abhimanyuṃ mahārāja yāntaṃ bhīṣmarathaṃ prati | sudakṣiṇo mahārāja kāmbhojaḥ pratyavārayat

हे महाराज, भीष्म के रथ की ओर जाते अभिमन्यु को काम्बोजराज सुदक्षिण ने रोक दिया।

श्लोक 16 (6.110.16)

विराटद्रुपदौ वृद्धौ समेतावरिमर्दनौ । अश्वत्थामा ततः क्रुद्धो वारयामास भारत ॥

virāṭadrupadau vṛddhau sametāvarimardanau | aśvatthāmā tataḥ kruddho vārayāmāsa bhārata

हे भारत, एक साथ बढ़ते शत्रुमर्दन वृद्ध विराट और द्रुपद को क्रुद्ध अश्वत्थामा ने रोक लिया।

श्लोक 17 (6.110.17)

तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् । भारद्वाजो रणे यत्तो धर्मपुत्रमवारयत् ॥

tathā pāṇḍusutaṃ jyeṣṭhaṃ bhīṣmasya vadhakāṅkṣiṇam | bhāradvājo raṇe yatto dharmaputramavārayat

इसी प्रकार भीष्म-वध के इच्छुक पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) को सजग भारद्वाज (द्रोण) ने युद्ध में रोक लिया।

श्लोक 18 (6.110.18)

अर्जुनं रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । भीष्मप्रेप्सुं महाराज भासयन्तं दिशो दश ॥

arjunaṃ rabhasaṃ yuddhe puraskṛtya śikhaṇḍinam | bhīṣmaprepsuṃ mahārāja bhāsayantaṃ diśo daśa

हे महाराज, युद्ध में वेग से भरे अर्जुन को, जो शिखण्डी को आगे करके भीष्म तक पहुँचना चाहते थे और दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे,

श्लोक 19 (6.110.19)

दुःशासनो महेष्वासो वारयामास संयुगे । अन्ये च तावका योधाः पाण्डवानां महारथान् ॥

duḥśāsano maheṣvāso vārayāmāsa saṃyuge | anye ca tāvakā yodhāḥ pāṇḍavānāṃ mahārathān

महाधनुर्धर दुःशासन ने युद्ध में रोक लिया। और आपके अन्य योद्धाओं ने पाण्डवों के उन महारथियों को

श्लोक 20 (6.110.20)

भीष्मस्याभिमुखान्यातान्वारयामासुराहवे । धृष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्राक्रोशंस्तु पुनः पुनः ॥

bhīṣmasyābhimukhānyātānvārayāmāsurāhave | dhṛṣṭadyumnastu sainyāni prākrośaṃstu punaḥ punaḥ

जो भीष्म के सामने बढ़ रहे थे, युद्ध में रोक लिया। परन्तु धृष्टद्युम्न ने सेनाओं को बार-बार पुकारा

श्लोक 21 (6.110.21)

अभ्यद्रवत संरब्धो भीष्ममेकं महारथः । एषोऽर्जुनो रणे भीष्मं प्रयाति कुरुनन्दनः ॥

abhyadravata saṃrabdho bhīṣmamekaṃ mahārathaḥ | eṣo'rjuno raṇe bhīṣmaṃ prayāti kurunandanaḥ

और वह क्रुद्ध महारथी अकेले ही भीष्म पर टूट पड़ा। 'देखो, कुरुनन्दन अर्जुन रण में भीष्म की ओर बढ़ रहे हैं!

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 22 (6.110.22)

अभ्यद्रवत माभैष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न वः । अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासवः ॥

abhyadravata mābhaiṣṭa bhīṣmo hi prāpsyate na vaḥ | arjunaṃ samare yoddhuṃ notsahetāpi vāsavaḥ

धावा बोलो, डरो मत; भीष्म तुम तक नहीं पहुँच पाएँगे। रण में अर्जुन से लड़ने का साहस तो इन्द्र भी नहीं कर सकते,

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (6.110.23)

किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोऽल्पजीवितः । इति सेनापतेः श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥

kimu bhīṣmo raṇe vīrā gatasattvo'lpajīvitaḥ | iti senāpateḥ śrutvā pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ

फिर भीष्म की तो बात ही क्या, वीरो, जिनका बल क्षीण हो चुका है और जीवन थोड़ा ही बचा है!' अपने सेनापति के ये वचन सुनकर पाण्डवों के महारथी

श्लोक 24 (6.110.24)

अभ्यद्रवन्त संहृष्टा गाङ्गेयस्य रथं प्रति । आगच्छतस्तान्समरे वार्योघानचला इव ॥

abhyadravanta saṃhṛṣṭā gāṅgeyasya rathaṃ prati | āgacchatastānsamare vāryoghānacalā iva

हर्ष से भरकर गंगापुत्र के रथ की ओर दौड़े। जैसे पर्वत जल की बाढ़ को रोक लेते हैं, वैसे ही युद्ध में आते उन वीरों को

श्लोक 25 (6.110.25)

अवारयन्त संहृष्टास्तावकाः पुरुषर्षभाः । दुःशासनो महाराज भयं त्यक्त्वा महारथः ॥

avārayanta saṃhṛṣṭāstāvakāḥ puruṣarṣabhāḥ | duḥśāsano mahārāja bhayaṃ tyaktvā mahārathaḥ

आपके नरश्रेष्ठ योद्धाओं ने हर्षपूर्वक रोक लिया। हे महाराज, महारथी दुःशासन भय त्यागकर

श्लोक 26 (6.110.26)

भीष्मस्य जीविताकाङ्क्षी धनञ्जयमुपाद्रवत् । तथैव पाण्डवाः शूरा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥

bhīṣmasya jīvitākāṅkṣī dhanañjayamupādravat | tathaiva pāṇḍavāḥ śūrā gāṅgeyasya rathaṃ prati

और भीष्म के प्राणों की रक्षा की इच्छा से धनञ्जय पर टूट पड़ा। इसी प्रकार शूरवीर पाण्डव भी गंगापुत्र के रथ की ओर बढ़ते हुए

श्लोक 27 (6.110.27)

अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान्महारथाः । तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशांपते ॥

abhyadravanta saṃgrāme tava putrānmahārathāḥ | tatrādbhutamapaśyāma citrarūpaṃ viśāṃpate

युद्ध में आपके महारथी पुत्रों पर टूट पड़े। हे प्रजानाथ, वहाँ हमने एक अद्भुत और विचित्र दृश्य देखा:

श्लोक 28 (6.110.28)

दुःशासनरथं प्राप्य यत्पार्थो नात्यवर्तत । यथा वारयते वेला क्षुब्धतोयं महार्णवम् ॥

duḥśāsanarathaṃ prāpya yatpārtho nātyavartata | yathā vārayate velā kṣubdhatoyaṃ mahārṇavam

दुःशासन के रथ के सामने पहुँचकर पार्थ उसे लाँघकर आगे न बढ़ सके। जैसे तट उफनते जल वाले महासागर को रोक लेता है,

श्लोक 29 (6.110.29)

तथैव पाण्डवं क्रुद्धं तव पुत्रो न्यवारयत् । उभौ तौ रथिनां श्रेष्ठावुभौ भारतदुर्जयौ ॥

tathaiva pāṇḍavaṃ kruddhaṃ tava putro nyavārayat | ubhau tau rathināṃ śreṣṭhāvubhau bhāratadurjayau

वैसे ही आपके पुत्र ने क्रुद्ध पाण्डव को रोक दिया। दोनों रथियों में श्रेष्ठ थे, दोनों भरतवंशियों में दुर्जय थे,

श्लोक 30 (6.110.30)

उभौ चन्द्रार्कसदृशौ कान्त्या दीप्त्या च भारत । तथा तौ जातसंरम्भावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥

ubhau candrārkasadṛśau kāntyā dīptyā ca bhārata | tathā tau jātasaṃrambhāvanyonyavadhakāṅkṣiṇau

हे भारत, कान्ति और तेज में दोनों चन्द्रमा और सूर्य के समान थे। इस प्रकार क्रोध से भरे और एक-दूसरे के वध के इच्छुक

श्लोक 31 (6.110.31)

समीयतुर्महासङ्ख्ये मयशक्रौ यथा पुरा । दुःशासनो महाराज पाण्डवं विशिखैस्त्रिभिः ॥

samīyaturmahāsaṅkhye mayaśakrau yathā purā | duḥśāsano mahārāja pāṇḍavaṃ viśikhaistribhiḥ

वे दोनों उस महासंग्राम में ऐसे भिड़े, जैसे प्राचीन काल में मय और इन्द्र भिड़े थे। हे महाराज, दुःशासन ने पाण्डव को तीन बाणों से

श्लोक 32 (6.110.32)

वासुदेवं च विंशत्या ताडयामास संयुगे । ततोऽर्जुनो जातमन्युर्वार्ष्णेयं वीक्ष्य पीडितम् ॥

vāsudevaṃ ca viṃśatyā tāḍayāmāsa saṃyuge | tato'rjuno jātamanyurvārṣṇeyaṃ vīkṣya pīḍitam

और वासुदेव को बीस बाणों से युद्ध में घायल किया। तब वार्ष्णेय (कृष्ण) को पीड़ित देखकर क्रोध से भरे अर्जुन ने

श्लोक 33 (6.110.33)

दुःशासनं शतेनाजौ नाराचानां समार्पयत् । ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥

duḥśāsanaṃ śatenājau nārācānāṃ samārpayat | te tasya kavacaṃ bhittvā papuḥ śoṇitamāhave

युद्ध में दुःशासन के शरीर में सौ नाराच बाण धँसा दिए। वे उसका कवच भेदकर रणभूमि में उसका रक्त पीने लगे,

श्लोक 34 (6.110.34)

यथैव पन्नगा राजंस्तटाकं तृषितास्तथा । दुःशासनस्त्रिभिः क्रुद्धः पार्थं विव्याध पत्रिभिः । ललाटे भरतश्रेष्ठ शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

yathaiva pannagā rājaṃstaṭākaṃ tṛṣitāstathā | duḥśāsanastribhiḥ kruddhaḥ pārthaṃ vivyādha patribhiḥ | lalāṭe bharataśreṣṭha śaraiḥ sannataparvabhiḥ

जैसे प्यासे सर्प, हे राजन्, तालाब का जल पीते हैं। हे भरतश्रेष्ठ, तब दुःशासन ने क्रुद्ध होकर झुकी गाँठों वाले तीन पंखदार बाणों से पार्थ के ललाट को बींध दिया।

श्लोक 35 (6.110.35)

ललाटस्थैस्तु तैर्बाणैः शुशुभे पाण्डवो रणे । यथा मेरुर्महाराज शृङ्गैरत्यर्थमुच्छ्रितैः ॥

lalāṭasthaistu tairbāṇaiḥ śuśubhe pāṇḍavo raṇe | yathā merurmahārāja śṛṅgairatyarthamucchritaiḥ

हे महाराज, ललाट में धँसे उन बाणों से पाण्डव रण में ऐसे शोभित हुए, जैसे अत्यन्त ऊँचे शिखरों से मेरु पर्वत शोभित होता है।

श्लोक 36 (6.110.36)

सोऽतिविद्धो महेष्वासः पुत्रेण तव धन्विना । व्यराजत रणे पार्थः किंशुकः पुष्पवानिव ॥

so'tividdho maheṣvāsaḥ putreṇa tava dhanvinā | vyarājata raṇe pārthaḥ kiṃśukaḥ puṣpavāniva

आपके धनुर्धर पुत्र द्वारा गहरे बींधे गए महाधनुर्धर पार्थ रण में फूलों से लदे किंशुक (पलाश) वृक्ष के समान चमक उठे।

श्लोक 37 (6.110.37)

दुःशासनं ततः क्रुद्धः पीडयामास पाण्डवः । पर्वणीव सुसंक्रुद्धो राहुः पूर्णं निशाकरम् ॥

duḥśāsanaṃ tataḥ kruddhaḥ pīḍayāmāsa pāṇḍavaḥ | parvaṇīva susaṃkruddho rāhuḥ pūrṇaṃ niśākaram

तब क्रुद्ध पाण्डव ने दुःशासन को ऐसे पीड़ित किया, जैसे पर्व के दिन अत्यन्त क्रुद्ध राहु पूर्ण चन्द्रमा को ग्रस लेता है।

श्लोक 38 (6.110.38)

पीड्यमानो बलवता पुत्रस्तव विशांपते । विव्याध समरे पार्थं कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ॥

pīḍyamāno balavatā putrastava viśāṃpate | vivyādha samare pārthaṃ kaṅkapatraiḥ śilāśitaiḥ

हे प्रजानाथ, उस बलवान् से पीड़ित होकर आपके पुत्र ने पत्थर पर तीखे किए कंकपत्र बाणों से युद्ध में पार्थ को बींध दिया।

श्लोक 39 (6.110.39)

तस्य पार्थो धनुश्छित्वा रथं चास्य त्रिभिः शरैः । आजघान ततः पश्चात्पुत्रं ते निशितैः शरैः ॥

tasya pārtho dhanuśchitvā rathaṃ cāsya tribhiḥ śaraiḥ | ājaghāna tataḥ paścātputraṃ te niśitaiḥ śaraiḥ

पार्थ ने उसका धनुष काट डाला, तीन बाणों से उसके रथ पर प्रहार किया और उसके बाद आपके पुत्र को तीखे बाणों से घायल किया।

श्लोक 40 (6.110.40)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय भीष्मस्य प्रमुखे स्थितः । अर्जुनं पञ्चविंशत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

so'nyatkārmukamādāya bhīṣmasya pramukhe sthitaḥ | arjunaṃ pañcaviṃśatyā bāhvorurasi cārpayat

दूसरा धनुष उठाकर, भीष्म के आगे खड़े होकर उसने अर्जुन की भुजाओं और छाती में पच्चीस बाण धँसा दिए।

श्लोक 41 (6.110.41)

तस्य क्रुद्धो महाराज पाण्डवः शत्रुतापनः । अप्रैषीद्विशिखान्घोरान्यमदण्डोपमान्बहून् ॥

tasya kruddho mahārāja pāṇḍavaḥ śatrutāpanaḥ | apraiṣīdviśikhānghorānyamadaṇḍopamānbahūn

हे महाराज, इस पर शत्रुओं को तपाने वाले पाण्डव ने क्रुद्ध होकर उस पर यमदण्ड के समान बहुत-से भयंकर बाण छोड़े।

श्लोक 42 (6.110.42)

अप्राप्तानेव तान्बाणांश्चिच्छेद तनयस्तव । यतमानस्य पार्थस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥

aprāptāneva tānbāṇāṃściccheda tanayastava | yatamānasya pārthasya tadadbhutamivābhavat

पार्थ के पूरे प्रयास के बावजूद आपके पुत्र ने उन बाणों को पहुँचने से पहले ही काट डाला; यह एक अद्भुत-सी बात थी।

श्लोक 43 (6.110.43)

पार्थं च निशितैर्बाणैरविध्यत्तनयस्तव । ततः क्रुद्धो रणे पार्थः शरान्संधाय कार्मुके ॥

pārthaṃ ca niśitairbāṇairavidhyattanayastava | tataḥ kruddho raṇe pārthaḥ śarānsaṃdhāya kārmuke

और आपके पुत्र ने तीखे बाणों से पार्थ को बींध दिया। तब रण में क्रुद्ध पार्थ ने धनुष पर बाण चढ़ाकर

श्लोक 44 (6.110.44)

प्रेषयामास समरे स्वर्णपुङ्खाञ्छिलाशितान् । न्यमज्जंस्ते महाराज तस्य काये महात्मनः ॥

preṣayāmāsa samare svarṇapuṅkhāñchilāśitān | nyamajjaṃste mahārāja tasya kāye mahātmanaḥ

युद्ध में पत्थर पर तीखे किए, सुनहरे पंखों वाले बाण चलाए। हे महाराज, वे उस महावीर के शरीर में ऐसे धँस गए,

श्लोक 45 (6.110.45)

यथा हंसा महाराज तटाकं प्राप्य भारत । पीडितश्चैव पुत्रस्ते पाण्डवेन महात्मना ॥

yathā haṃsā mahārāja taṭākaṃ prāpya bhārata | pīḍitaścaiva putraste pāṇḍavena mahātmanā

जैसे, हे महाराज, हे भारत, हंस तालाब पर पहुँचकर उसमें डुबकी लगाते हैं। महात्मा पाण्डव से पीड़ित होकर आपका पुत्र

श्लोक 46 (6.110.46)

हित्वा पार्थं रणे तूर्णं भीष्मस्य रथमाव्रजत् । अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीष्मोऽभवत्तदा ॥

hitvā pārthaṃ raṇe tūrṇaṃ bhīṣmasya rathamāvrajat | agādhe majjatastasya dvīpo bhīṣmo'bhavattadā

रण में पार्थ को छोड़कर तुरन्त भीष्म के रथ के पास चला गया। अथाह जल में डूबते उस (दुःशासन) के लिए उस समय भीष्म द्वीप बन गए।

श्लोक 47 (6.110.47)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां पुत्रस्तव विशांपते । अवारयत्ततः शूरो भूय एव पराक्रमी ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ putrastava viśāṃpate | avārayattataḥ śūro bhūya eva parākramī

हे प्रजानाथ, फिर होश में आकर आपके शूरवीर, पराक्रमी पुत्र ने एक बार फिर

श्लोक 48 (6.110.48)

शरैः सुनिशितैः पार्थं यथा वृत्रं पुरन्दरः । निर्बिभेद महाकायो विव्यथे नैव चार्जुनः ॥

śaraiḥ suniśitaiḥ pārthaṃ yathā vṛtraṃ purandaraḥ | nirbibheda mahākāyo vivyathe naiva cārjunaḥ

अत्यन्त तीखे बाणों से पार्थ को रोका, जैसे पुरन्दर (इन्द्र) ने वृत्र को रोका था; उस विशालकाय वीर ने उन्हें बींध डाला, फिर भी अर्जुन तनिक भी विचलित न हुए।

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